रविवार, 8 जुलाई 2018
👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (अन्तिम भाग)
🔶 परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इसे .... श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।
🔷 अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे।
🔶 अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.30
🔷 अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे।
🔶 अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.30
शनिवार, 7 जुलाई 2018
👉 आस्तिकता का स्वरूप
🔷 आस्तिकता का अर्थ है विश्वास। अविश्वासी ही मस्तिष्क कहा जा सकता है। संसार चक्र को नियमबद्ध नियंत्रण में रखकर चलाने वाली परम सत्ता पर विश्वास करना आस्तिकता का चिह्न है। कर्म फल सुनिश्चित है, जो किया है वह भोगना पड़ेगा यह मानना आस्तिकता का ही स्वरूप है। सब प्राणियों का अंततः कल्याण ही होगा, सब एक दिन विकास की मंजिल पूरी करते हुए परम मंगल को प्राप्त करेंगे यह मान्यता भी आस्तिकता के अनुरूप हैं।
🔶 यह विश्व परमात्मा से ही ओत-प्रोत है। यह उसी का एक प्रत्यक्ष रूप है। जो कुछ हमें दिखाई पड़ता है वह उसी प्रभु के एक अंश का दर्शन है। उसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न घृणा। यह घृणा या उपेक्षा वस्तुतः परमात्मा के एक अंश के प्रति व्यक्त की हुई मानी जाएगी।
🔶 यह विश्व परमात्मा से ही ओत-प्रोत है। यह उसी का एक प्रत्यक्ष रूप है। जो कुछ हमें दिखाई पड़ता है वह उसी प्रभु के एक अंश का दर्शन है। उसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न घृणा। यह घृणा या उपेक्षा वस्तुतः परमात्मा के एक अंश के प्रति व्यक्त की हुई मानी जाएगी।
👉 संत और अहंकार
🔷 महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव तथा मुक्ताबाई के साथ तीर्थाटन करते हुए प्रसिद्ध संत गोरा के यहां पधारे। संत समागम हुआ, वार्ता चली।
🔶 तपस्विनी मुक्ताबाई ने पास रखे एक डंडे को लक्ष्य कर गोरा कुम्हार से पूछा- 'यह क्या है?'
🔷 गोरा ने उत्तर दिया- “इससे ठोककर अपने घड़ों की परीक्षा करता हूं कि वे पक गए हैं या कच्चे ही रह गए हैं।“
🔶 मुक्ताबाई हंस पड़ीं और बोलीं- “हम भी तो मिट्टी के ही पात्र हैं। क्या इससे हमारी परीक्षा कर सकते हो?”
🔷 “हां, क्यों नहीं” - कहते हुए गोरा उठे और वहां उपस्थित प्रत्येक महात्मा का मस्तक उस डंडे से ठोकने लगे।
🔶 उनमें से कुछ ने इसे विनोद माना, कुछ को रहस्य प्रतीत हुआ। किंतु नामदेव को बुरा लगा कि एक कुम्हार उन जैसे संतों की एक डंडे से परीक्षा कर रहा है। उनके चेहरे पर क्रोध की झलक भी दिखाई दी।
🔷 जब उनकी बारी आई तो गोरा ने उनके मस्तक पर डंडा रखा और बोले- “यह बर्तन कच्चा है।“
🔶 फिर नामदेव से आत्मीय स्वर में बोले- “तपस्वी श्रेष्ठ! आप निश्चय ही संत हैं, किंतु आपके हृदय का अहंकार रूपी सर्प अभी मरा नहीं है, तभी तो मान-अपमान की ओर आपका ध्यान तुरंत चला जाता है। यह सर्प तो तभी मरेगा, जब कोई सद्गुरु आपका मार्गदर्शन करेगा।“
🔷 संत नामदेव को बोध हुआ। स्वयं स्फूर्त ज्ञान में त्रुटि देख उन्होंने संत विठोबा खेचर से दीक्षा ली, जिससे अंत में उनके भीतर का अहंकार मर गया।
🔶 तपस्विनी मुक्ताबाई ने पास रखे एक डंडे को लक्ष्य कर गोरा कुम्हार से पूछा- 'यह क्या है?'
🔷 गोरा ने उत्तर दिया- “इससे ठोककर अपने घड़ों की परीक्षा करता हूं कि वे पक गए हैं या कच्चे ही रह गए हैं।“
🔶 मुक्ताबाई हंस पड़ीं और बोलीं- “हम भी तो मिट्टी के ही पात्र हैं। क्या इससे हमारी परीक्षा कर सकते हो?”
🔷 “हां, क्यों नहीं” - कहते हुए गोरा उठे और वहां उपस्थित प्रत्येक महात्मा का मस्तक उस डंडे से ठोकने लगे।
🔶 उनमें से कुछ ने इसे विनोद माना, कुछ को रहस्य प्रतीत हुआ। किंतु नामदेव को बुरा लगा कि एक कुम्हार उन जैसे संतों की एक डंडे से परीक्षा कर रहा है। उनके चेहरे पर क्रोध की झलक भी दिखाई दी।
🔷 जब उनकी बारी आई तो गोरा ने उनके मस्तक पर डंडा रखा और बोले- “यह बर्तन कच्चा है।“
🔶 फिर नामदेव से आत्मीय स्वर में बोले- “तपस्वी श्रेष्ठ! आप निश्चय ही संत हैं, किंतु आपके हृदय का अहंकार रूपी सर्प अभी मरा नहीं है, तभी तो मान-अपमान की ओर आपका ध्यान तुरंत चला जाता है। यह सर्प तो तभी मरेगा, जब कोई सद्गुरु आपका मार्गदर्शन करेगा।“
🔷 संत नामदेव को बोध हुआ। स्वयं स्फूर्त ज्ञान में त्रुटि देख उन्होंने संत विठोबा खेचर से दीक्षा ली, जिससे अंत में उनके भीतर का अहंकार मर गया।
👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 4)
🔷 जहाँ तक हम दोनों की भावी नियति के बारे में भविष्य बोध कराया गया है, वह सन्तोषजनक और उत्साहवर्धक है। कहा गया है कि पिछले पचास वर्ष से हम दोनों “दो शरीर-एक प्राण” बनकर नहीं, वरन एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रहे है। शरीरों का अन्त तो सभी का होता है; पर हम लोग वर्तमान वस्त्रों को उतार देने के उपरान्त भी अपनी सत्ता में यथावत बने रहेंगे और जो कार्य सौंपा गया है, से तब तक पूरा करने में लगे रहेंगे, जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। युग परिवर्तन एक लक्ष्य है जनमानस की परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन उसके दो कार्यक्रम।
🔶 अगली शताब्दी इक्कीसवीं सदी अपने गर्भ में उन महती सम्भावनाओं को संजोये हुए है, जिनके आधार पर मानवी गरिमा को पुनर्जीवित करने की बात सोची जा सकती है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते है। इस प्रयोजन के लिए हम दोनों की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?
🔷 इस बीच छोटे से व्यवधान की आशंका रहती है, जो यथार्थ भी है। प्रकृति के नियम नहीं बदले जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29
🔶 अगली शताब्दी इक्कीसवीं सदी अपने गर्भ में उन महती सम्भावनाओं को संजोये हुए है, जिनके आधार पर मानवी गरिमा को पुनर्जीवित करने की बात सोची जा सकती है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते है। इस प्रयोजन के लिए हम दोनों की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?
🔷 इस बीच छोटे से व्यवधान की आशंका रहती है, जो यथार्थ भी है। प्रकृति के नियम नहीं बदले जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29
शुक्रवार, 6 जुलाई 2018
👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 3)
🔶 अखण्ड-ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक नहीं सीमित हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो, तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र संचालन है, अन्यथा साधना विहीन एकाकी, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ व्यक्ति बड़े सपने तो देख सकता है; पर बड़े कामों का भार अपने दुर्बल कंधों पर नहीं उठा सकता। विशेषतया उन कामों का जिनकी कल्पनाएँ करते रहने वाले, योजनाएँ बनाते रहने वाले थोड़े बहुत कदम बढ़ाते रहने पर भी हवा में उड़ने वाले गुब्बारों की तरह कुछ ही समय में ठण्डे होते और अपने अस्तित्व को समाप्त करते देखे गये।
🔷 सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते है। इस दृष्टि से माताजी भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी, जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले वाले अनिवार्य कामों को जल्दी-जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जायगा। सन्देह है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले उतार–चढ़ावों के आधार पर अनुमान लगाते है। उनमें ही प्रतिभावान व्यक्तियों के हट जाने पर भट्ठा बैठ जाता है और सरंजाम बिखर जाता है; पर यहाँ वैसी कोई बात नहीं। न व्यक्ति विशेष ने कुछ असाधारण किया है, और न ही उसे भूतकाल पर गर्व है। न वर्तमान को देखते हुए उत्साह और न भविष्य की गिरावट सम्बन्धी कोई आशंका। कारण स्पष्ट है।
🔶 कठपुतली न अपने अभिनय पर गर्व करती है, और न पिटारी में बन्द कर दिये जाने की शिकायत। यदि वह समझ होती, तो निश्चित ही उसकी सोच यही होती कि वह बाजीगर की उँगलियों में बँधे हुए धागों से हलचल करने वाली लकड़ी की टुकड़ी मात्र है। उसे गर्व किस बात का होना चाहिए और अपने भविष्य की चिन्ता क्यों करनी चाहिए? यह काम बाजीगर का है। वही कोई गड़बड़ी होते देखेगा और तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ-हानि तो उसी का है। लकड़ी के टुकड़े तो निर्जीव एवं निमित्त मात्र है। मिशन के भविष्य के सम्बन्ध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29
🔷 सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते है। इस दृष्टि से माताजी भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी, जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले वाले अनिवार्य कामों को जल्दी-जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जायगा। सन्देह है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले उतार–चढ़ावों के आधार पर अनुमान लगाते है। उनमें ही प्रतिभावान व्यक्तियों के हट जाने पर भट्ठा बैठ जाता है और सरंजाम बिखर जाता है; पर यहाँ वैसी कोई बात नहीं। न व्यक्ति विशेष ने कुछ असाधारण किया है, और न ही उसे भूतकाल पर गर्व है। न वर्तमान को देखते हुए उत्साह और न भविष्य की गिरावट सम्बन्धी कोई आशंका। कारण स्पष्ट है।
🔶 कठपुतली न अपने अभिनय पर गर्व करती है, और न पिटारी में बन्द कर दिये जाने की शिकायत। यदि वह समझ होती, तो निश्चित ही उसकी सोच यही होती कि वह बाजीगर की उँगलियों में बँधे हुए धागों से हलचल करने वाली लकड़ी की टुकड़ी मात्र है। उसे गर्व किस बात का होना चाहिए और अपने भविष्य की चिन्ता क्यों करनी चाहिए? यह काम बाजीगर का है। वही कोई गड़बड़ी होते देखेगा और तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ-हानि तो उसी का है। लकड़ी के टुकड़े तो निर्जीव एवं निमित्त मात्र है। मिशन के भविष्य के सम्बन्ध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29
👉 Rise! Have Courage
🔶 Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life. Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.
🔷 So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.
🔶 So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.
📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940
🔷 So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.
🔶 So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.
📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940
👉 अखंड ज्योति का प्रधान उद्देश्य (अन्तिम भाग)
🔶 हम प्रत्येक धर्मप्रेमी से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि धर्म के वर्तमान विकृत रूप में संशोधन करें और उसको सुव्यवस्थित करके पुनरुद्धार करें। धर्माचार्यों और आध्यात्म शास्त्र के तत्वज्ञानियों पर इस समय बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, देश को मृत से जीवित करने का, पतन के गहरे गर्त में से उठाकर समुन्नत करने की शक्ति उनके हाथ में है, क्योंकि जिस वस्तु से-समय और धन से-कौमों का उत्थान होता है, वह धर्म के निमित्त लगी हुई हैं। जनता की श्रद्धा धर्म में है। उनका प्रचुर द्रव्य धर्म में लगता है, धर्म के लिये छप्पन लाख साधु संत तथा उतने ही अन्य धर्मजीवियों की सेना पूरा समय लगाये हुए है।
🔷 करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।
🔶 अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी।
🔷 आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.7
🔷 करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।
🔶 अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी।
🔷 आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.7
👉 समझदार बहू....
🔶 शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी।
🔷 फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया।
🔶 उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।
🔷 उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।
🔶 अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं, उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उनका माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।
🔷 जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ। मन में ऐसा अहसास होता है, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो।
🔶 और फिर वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, ये तो मेरा "तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।" और ये कहकर वो सुबक-सुबक कर रो पड़ी।
🔷 मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की। कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए, अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं।
🔷 फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया।
🔶 उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।
🔷 उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।
🔶 अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं, उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उनका माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।
🔷 जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ। मन में ऐसा अहसास होता है, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो।
🔶 और फिर वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, ये तो मेरा "तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।" और ये कहकर वो सुबक-सुबक कर रो पड़ी।
🔷 मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की। कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए, अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं।
गुरुवार, 5 जुलाई 2018
👉 भाई कब मरेगा?
🔷 एक गांव था जहां सभी धर्म-जाति के लोग निवास करते थे। उसी गांव में एक गरीब किसान अपने परिवार के साथ रहता था। यह दर्दनाक घटना उसी किसान परिवार की है जिसमें परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और दो बच्चे थे। घर का मुखिया एक लम्बे अर्से से बीमार था जो जमा पूंजी थी, वह डाक्टरों की फीस व दवाखानों में खत्म हो चुकी थी लेकिन वह अभी भी चारपाई से लगा हुआ था और एक दिन इसी हालत में अपने बच्चों को अनाथ कर इस दुनिया से चला गया।
🔶 मुसीबत का मारा परिवार खाने-पीने का मोहताज हो गया मगर लोग अपने काम-धंधों में लग चुके थे। किसी ने भी इस परिवार की ओर ध्यान नहीं दिया। बच्चे अक्सर बाहर निकल कर सामने वाले मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तैयार हो रहा है। पर मां तो मां होती है उसने घर में रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे-तैसे बहला-फुसला कर सुला दिया।
🔷 अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या, जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर खोज के बाद चार चीजें निकल आईं जिन्हें बेचकर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया। भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा मां से देखा नहीं गया। सातवें दिन मां अपने बच्चों के लिए मोहल्ले के पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई। दुकानदार से महिला ने उधार कुछ राशन मांगा तो दुकानदार ने साफ इंकार कर दिया। एक तो पिता के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया।
🔶 बेटे के लिए दवा कहां से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों एक घर के कोने में सिमटे पड़े थे। मां बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी। तब पांच साल की छोटी बहन अचानक उठी, मां के कान से मुंह लगाकर बोली, ‘‘मां भाई कब मरेगा?’’
🔷 मां के दिल पर मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा, ‘‘मेरी बच्ची तुम यह क्या कह रही हो?’’
🔶 बच्ची मासूमियत से बोली, ‘‘हां मां! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएंगे न?’’
🔷 मां यह सुन कर तड़प उठी। इसलिए अपनी दौलत को धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने की बजाय किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें, इससे सारे जहां के मालिक भी खुश होंगे और आपके मन को भी सुकून मिलेगा।
🔶 मुसीबत का मारा परिवार खाने-पीने का मोहताज हो गया मगर लोग अपने काम-धंधों में लग चुके थे। किसी ने भी इस परिवार की ओर ध्यान नहीं दिया। बच्चे अक्सर बाहर निकल कर सामने वाले मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तैयार हो रहा है। पर मां तो मां होती है उसने घर में रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे-तैसे बहला-फुसला कर सुला दिया।
🔷 अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या, जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर खोज के बाद चार चीजें निकल आईं जिन्हें बेचकर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया। भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा मां से देखा नहीं गया। सातवें दिन मां अपने बच्चों के लिए मोहल्ले के पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई। दुकानदार से महिला ने उधार कुछ राशन मांगा तो दुकानदार ने साफ इंकार कर दिया। एक तो पिता के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया।
🔶 बेटे के लिए दवा कहां से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों एक घर के कोने में सिमटे पड़े थे। मां बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी। तब पांच साल की छोटी बहन अचानक उठी, मां के कान से मुंह लगाकर बोली, ‘‘मां भाई कब मरेगा?’’
🔷 मां के दिल पर मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा, ‘‘मेरी बच्ची तुम यह क्या कह रही हो?’’
🔶 बच्ची मासूमियत से बोली, ‘‘हां मां! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएंगे न?’’
🔷 मां यह सुन कर तड़प उठी। इसलिए अपनी दौलत को धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने की बजाय किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें, इससे सारे जहां के मालिक भी खुश होंगे और आपके मन को भी सुकून मिलेगा।
👉 Worship Interrupted to Help the Needy
🔷 King Vikramaditya had gone out for hunting. He lost his way in a very dense and dark forest. His soldiers were left behind and he was all alone. In the dreadful forest the King could not find water and his throat was choking with thirst. Suddenly he saw a hut nearby. He went in and saw a holy man in deep meditation. The King then fell down and lost his consciousness.
🔶 When King Vikramaditya regained his consciousness he was surprised to see that the holy man was washing his face, fanning him and gave him water to drink. The King quickly stood up and asked with folded hands, "O Holy one, why did you interrupt your meditation and the worship of God for me?" The saint replied in a soft voice, "Son, it is the wish of God that no one in this world should suffer. Fulfillment of God's wish is very important for me. Worship of God can succeed only by the service of mankind"
📖 From Pragya Puran
🔶 When King Vikramaditya regained his consciousness he was surprised to see that the holy man was washing his face, fanning him and gave him water to drink. The King quickly stood up and asked with folded hands, "O Holy one, why did you interrupt your meditation and the worship of God for me?" The saint replied in a soft voice, "Son, it is the wish of God that no one in this world should suffer. Fulfillment of God's wish is very important for me. Worship of God can succeed only by the service of mankind"
📖 From Pragya Puran
👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 2)
🔷 इन दोनों की सफलता का श्रेय समर्पित प्रतिभाओं को ही दिया जाता है। वे अपने आप ही नहीं उपज पड़ी थीं, वरन किन्हीं चतुर चितेरों द्वारा गढ़ी गई थीं। अपने को कुछ बना लेना एक बात है, किन्तु अपने समकक्ष सहधर्मी-सहकर्मी विनिर्मित कर देना सर्वथा दूसरी। ऐसी संस्थापनाएँ यदा-कदा ही कोई विरले कर पाते है। उन्हीं को देखकर सर्वसाधारण को यह अनुभव होता है कि परिष्कृत व्यक्तित्वों की कार्य क्षमता किस स्तर की कितनी सक्षम होती है और वह जनमानस के उलटी दिशा में बहते प्रवाह को किस सीमा तक उलट सकने में समर्थ होती है।
🔶 कई सोचते है कि वर्तमान विभूतियाँ सफलताएँ गुरु जी-माताजी की प्रचण्ड जीवन साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था। निजी रूप से तो हनुमान वही सामान्य वानर थे जो बालि के भय से भयभीत जान बचाने के लिए छिपे हुए सुग्रीव की टहल चाकरी करते थे और राम-लक्ष्मण के उस क्षेत्र में पहुँचने पर वेष बदल कर नव आगन्तुकों की टोह लेने पहुँचे थे।
🔷 बीज के वृक्ष बनने का चमत्कार सभी देखते है, पर अनेक बार क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनते भी देखा जाता है। ऐसे कायाकल्पों में किसी अदृश्य सत्ता की परोक्ष भूमिका काम करती पाई जाती है। शिवाजी और चन्द्रगुप्त किन्हीं अदृश्य सूत्र संचालकों के अनुग्रह से वैसा कुछ करने में समर्थ हुए, जिसके लिए उन्हें असाधारण श्रेय और यश मिला। विवेकानन्द की कथा-गाथा भी ठीक ऐसी ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.28
🔶 कई सोचते है कि वर्तमान विभूतियाँ सफलताएँ गुरु जी-माताजी की प्रचण्ड जीवन साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था। निजी रूप से तो हनुमान वही सामान्य वानर थे जो बालि के भय से भयभीत जान बचाने के लिए छिपे हुए सुग्रीव की टहल चाकरी करते थे और राम-लक्ष्मण के उस क्षेत्र में पहुँचने पर वेष बदल कर नव आगन्तुकों की टोह लेने पहुँचे थे।
🔷 बीज के वृक्ष बनने का चमत्कार सभी देखते है, पर अनेक बार क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनते भी देखा जाता है। ऐसे कायाकल्पों में किसी अदृश्य सत्ता की परोक्ष भूमिका काम करती पाई जाती है। शिवाजी और चन्द्रगुप्त किन्हीं अदृश्य सूत्र संचालकों के अनुग्रह से वैसा कुछ करने में समर्थ हुए, जिसके लिए उन्हें असाधारण श्रेय और यश मिला। विवेकानन्द की कथा-गाथा भी ठीक ऐसी ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.28
👉 अखंड ज्योति का प्रधान उद्देश्य (भाग 1)
🔷 अखंड ज्योति के जीवन का प्रधान उद्देश्य ‘धर्म की सेवा’ है। यह धर्म की पूजा के लिये ही प्रकट हुई है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे जीवित रहना है। जिसका प्राण ही धर्म में पिरोया हुआ हो, वह अपने ईष्ट पर इस प्रकार की आपत्ति आते देखकर, उसे लाँछित और तिरस्कृत होते देखकर, मार्मिक वेदना का अनुभव करती है “प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक बने” यह उपदेश करने के साथ हम धर्म के वर्तमान स्वरूप में शोधन भी करना चाहते हैं।
🔶 हम अनुभव करते हैं कि सदियों की पराधीनता गरीबी और अज्ञान ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को बहुत ही विकृत, दोषपूर्ण, एवं जर्जरित कर दिया है, अनेक छिद्रों के कारण उसका वर्तमान स्वरूप छलनी की तरह छिरछिरा हो गया है, जिससे राष्ट्र की उच्चतम सद्भावनाओं के साथ डाली हुई पञ्चमाँश शक्ति नीचे गिर पड़ती है और छलनी में दूध दुहने वाले के समान केवल पश्चात्ताप और निराशा ही प्राप्त होती है।
🔷 सद्भावना से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिए जो लोकोपकारी कार्य किये जाते हैं, वे धर्म कहलाते हैं।” धर्म की इस मूलभूत आधार शिला के ऊपर हमें देश काल की स्थिति के अनुसार नवीन कर्मकाँडों की रचना करनी होगी। दूध रखने के लिये छेदों वाले बर्तन को हटाना होगा, जिसमें से कि सारा दूध चू कर मिट्टी में मिल जाता है। ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं।
🔶 धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी कौम अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है। जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर माला तो सारे दिन जपता है, पर बीमार पड़ौसी की सेवा के लिये आधा घंटा की भी फुरसत नहीं पाता, हमें संदेह होगा कि वह कहीं धर्म की विडम्बना तो नहीं कर रहा है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.6
🔶 हम अनुभव करते हैं कि सदियों की पराधीनता गरीबी और अज्ञान ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को बहुत ही विकृत, दोषपूर्ण, एवं जर्जरित कर दिया है, अनेक छिद्रों के कारण उसका वर्तमान स्वरूप छलनी की तरह छिरछिरा हो गया है, जिससे राष्ट्र की उच्चतम सद्भावनाओं के साथ डाली हुई पञ्चमाँश शक्ति नीचे गिर पड़ती है और छलनी में दूध दुहने वाले के समान केवल पश्चात्ताप और निराशा ही प्राप्त होती है।
🔷 सद्भावना से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिए जो लोकोपकारी कार्य किये जाते हैं, वे धर्म कहलाते हैं।” धर्म की इस मूलभूत आधार शिला के ऊपर हमें देश काल की स्थिति के अनुसार नवीन कर्मकाँडों की रचना करनी होगी। दूध रखने के लिये छेदों वाले बर्तन को हटाना होगा, जिसमें से कि सारा दूध चू कर मिट्टी में मिल जाता है। ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं।
🔶 धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी कौम अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है। जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर माला तो सारे दिन जपता है, पर बीमार पड़ौसी की सेवा के लिये आधा घंटा की भी फुरसत नहीं पाता, हमें संदेह होगा कि वह कहीं धर्म की विडम्बना तो नहीं कर रहा है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.6
बुधवार, 4 जुलाई 2018
👉 आओ देखे समस्या कहां है
👉 अचानक इस देश मे #रेप क्यो बढ़ गए ?
आओ देखे समस्या कहां है कुछ समझने की कोशिश करें कुछ उद्धारण से समझते हैं
🔷 1) लोग कहते हैं कि #रेप क्यों होता है?
एक 8 साल का लडका सिनेमाघर मे राजा हरिशचन्द्र फिल्म देखने गया और फिल्म से प्रेरित होकर उसने सत्य का मार्ग चुना और वो बडा होकर महान व्यक्तित्व से जाना गया ।
#परन्तु
🔷 आज 8 साल का लडका #टीवी पर क्या देखता है ?
सिर्फ #नंगापन और #अश्लील वीडियो और #फोटो, मैग्जीन में अर्धनग्न फोटो, पडोस मे रहने वाली भाभी के छोटे कपडे!!
लोग कहते हैं कि रेप का कारण बच्चों की #मानसिकता है।
पर वो मानसिकता आई कहा से?
उसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम खुद जिम्मेदार है। क्योकि हम #joint family में नही रहते।
हम अकेले रहना पसंद करते हैं। और अपना परिवार चलाने के लिये माता पिता को बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर जाना है। और बच्चे अपना अकेलापन दूर करने के लिये #टीवी और #इन्टरनेट का सहारा लेते हैं।
और उनको देखने के लिए क्या मिलता है सिर्फ वही #अश्लील# #वीडियो और #फोटो तो वो क्या सीखेंगे यही सब कुछ ना?
अगर वही बच्चा अकेला न रहकर अपने दादा दादी के साथ रहे तो कुछ अच्छे संस्कार सीखेगा ।
कुछ हद तक ये भी जिम्मेदार है।
👉 2) पूरा देश रेप पर उबल रहा है,
छोटी छोटी बच्चियो से जो दरिंदगी हो रही उस पर सबके मन मे गुस्सा है, कोई सरकार को कोस रहा, कोई समाज को तो कई feminist सारे लड़को को बलात्कारी घोषित कर चुकी है !
लेकिन आप सुबह से रात तक
कई बार sunny leon के कंडोम के add देखते है ..!!
फिर दूसरे add में रणवीर सिंह शैम्पू के ऐड में लड़की पटाने के तरीके बताता है ..!!
ऐसे ही Close up, लिम्का, Thumsup भी दिखाता है #लेकिन तब आप को गुस्सा नही_आता है, है ना ?
आप अपने छोटे बच्चों के साथ music चैनल पर सुनते हैं
दारू बदनाम कर दी,
कुंडी मत खड़काओ राजा,
मुन्नी बदनाम, चिकनी चमेली, झण्डू बाम, तेरे साथ करूँगा गन्दी बात, और न जाने ऐसी कितनी मूवीज गाने देखते सुनते है
#तब आप को गुस्सा नहीआता??
मम्मी बच्चों के साथ Star Plus, जी TV, सोनी TV देखती है जिसमें एक्टर और एक्ट्रेस सुहाग रात मनाते है। किस करते है। आँखो में आँखे डालते है
और तो और भाभीजी घर पर है, जीजाजी छत पर है, टप्पू के पापा और बबिता जिसमे एक व्यक्ति दूसरे की पत्नी के पीछे घूमता लार टपकता नज़र आएगा
पूरे परिवार के साथ देखते है।-
#इन सबserial को देखकर आप को गुस्सा नहीआता ??
फिल्म्स आती है जिसमे किस (चुम्बन, आलिंगन), रोमांस से लेकर गंदी कॉमेडी आदि सब कुछ दिखाया जाता है।
पर आप बड़े मजे लेकर देखते है
इन सबको देखकर आप को गुस्सा नही_आता ??
खुले आम TV- फिल्म वाले आपके बच्चों को बलात्कारी बनाते है, उनके कोमल मन मे जहर घोलते है।
#तब आपको गुस्सा नही आता ?
क्योकि
आपको लगता है कि
रेप रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। पुलिस, प्रशासन, न्यायव्यवस्था की जिम्मेदारी है ....
लेकिन क्या समाज, मीडिया की कोई जिम्मेदारी नही। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ भी परोस दोगे क्या?
आप तो अखबार पढ़कर, News देखकर बस गुस्सा निकालेंगे, कोसेंगे सिस्टम को, सरकार को, पुलिस को, प्रशासन को, DP बदल लेंगे, सोशल मीडिया पे खूब हल्ला मचाएंगे, बहुत ज्यादा हुआ तो कैंडल मार्च या धरना कर लेंगे लेकिन....
TV, चैनल्स, वालीवुड, मीडिया को कुछ नही कहेंगे। क्योकि वो आपके मनोरंजन के लिए है ।
सच पुछिऐ तो TV Channels अश्लीलता परोस रहे है ...
पाखंड परोस रहे है ,
झूंठे विषज्ञापन परोस रहे है ,
झूंठेऔर सत्य से परे ज्योतिषी पाखंड से भरी कहानियां एवं मंत्र, ताबीज आदि परोस रहै है।
उनकी भी गलती नही है, क्योंकि हम आप खरीददार हो .....??
बाबा बंगाली, तांत्रिक बाबा, स्त्री वशीकरण के जाल में खुद फंसते हो।
👉 3) अभी टीवी का खबरिया चैनल मंदसौर के गैंगरेप की घटना पर समाचार चला रहा है |
जैसे ही ब्रेक आये :
पहला विज्ञापन बोडी स्प्रे का जिसमे लड़की आसमान से गिरती है,
दूसरा कंडोम का ,
तीसरा नेहा स्वाहा-स्नेहा स्वाहा वाला,
और चौथा प्रेगनेंसी चेक करने वाले मशीन का......
जब हर विज्ञापन, हर फिल्म में नारी को केवल भोग की वस्तु समझा जाएगा तो बलात्कार के ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलना निश्चित है ......
क्योंकि
"हादसा एक दम नहीं होता,
वक़्त करता है परवरिश बरसों....!"
ऐसी निंदनीय घटनाओं के पीछे निश्चित तौर पर भी बाजारवाद ही ज़िम्मेदार है ..
👉 4) आज सोशल मीडिया इंटरनेट और फिल्मों में @पोर्न परोसा जा रहा है ।
तो बच्चे तो बलात्कारी ही बनेंगे ना
😢😢😢
ध्यान रहे समाज और मीडिया को बदले बिना ये आपके कठोर सख्त कानून कितने ही बना लीजिए।
ये घटनाएं नही रुकने वाली है।
इंतज़ार कीजिये बहुत जल्द आपको फिर केंडल मार्च निकालने का अवसर
हमारा स्वछंद समाज, बाजारू मीडिया और गंदगी से भरा सोशल मीडिया देने वाला है ।
अगर अब भी आप बदलने की शुरुआत नही करते हैं तो समझिए कि ......
फिर कोई भारत की बेटी
निर्भया
आसिफा
गीता
दिव्या
संस्कृति
की तरह बर्बाद होने वाली है।
आपको आपकी बेटियां बचाना है तो सरकार कानून पुलिस के भरोसे से बाहर निकलकर समाज मीडिया और सोशल मीडिया की गंदगी साफ करने की आवश्यकता है।
आओ देखे समस्या कहां है कुछ समझने की कोशिश करें कुछ उद्धारण से समझते हैं
🔷 1) लोग कहते हैं कि #रेप क्यों होता है?
एक 8 साल का लडका सिनेमाघर मे राजा हरिशचन्द्र फिल्म देखने गया और फिल्म से प्रेरित होकर उसने सत्य का मार्ग चुना और वो बडा होकर महान व्यक्तित्व से जाना गया ।
#परन्तु
🔷 आज 8 साल का लडका #टीवी पर क्या देखता है ?
सिर्फ #नंगापन और #अश्लील वीडियो और #फोटो, मैग्जीन में अर्धनग्न फोटो, पडोस मे रहने वाली भाभी के छोटे कपडे!!
लोग कहते हैं कि रेप का कारण बच्चों की #मानसिकता है।
पर वो मानसिकता आई कहा से?
उसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम खुद जिम्मेदार है। क्योकि हम #joint family में नही रहते।
हम अकेले रहना पसंद करते हैं। और अपना परिवार चलाने के लिये माता पिता को बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर जाना है। और बच्चे अपना अकेलापन दूर करने के लिये #टीवी और #इन्टरनेट का सहारा लेते हैं।
और उनको देखने के लिए क्या मिलता है सिर्फ वही #अश्लील# #वीडियो और #फोटो तो वो क्या सीखेंगे यही सब कुछ ना?
अगर वही बच्चा अकेला न रहकर अपने दादा दादी के साथ रहे तो कुछ अच्छे संस्कार सीखेगा ।
कुछ हद तक ये भी जिम्मेदार है।
👉 2) पूरा देश रेप पर उबल रहा है,
छोटी छोटी बच्चियो से जो दरिंदगी हो रही उस पर सबके मन मे गुस्सा है, कोई सरकार को कोस रहा, कोई समाज को तो कई feminist सारे लड़को को बलात्कारी घोषित कर चुकी है !
लेकिन आप सुबह से रात तक
कई बार sunny leon के कंडोम के add देखते है ..!!
फिर दूसरे add में रणवीर सिंह शैम्पू के ऐड में लड़की पटाने के तरीके बताता है ..!!
ऐसे ही Close up, लिम्का, Thumsup भी दिखाता है #लेकिन तब आप को गुस्सा नही_आता है, है ना ?
आप अपने छोटे बच्चों के साथ music चैनल पर सुनते हैं
दारू बदनाम कर दी,
कुंडी मत खड़काओ राजा,
मुन्नी बदनाम, चिकनी चमेली, झण्डू बाम, तेरे साथ करूँगा गन्दी बात, और न जाने ऐसी कितनी मूवीज गाने देखते सुनते है
#तब आप को गुस्सा नहीआता??
मम्मी बच्चों के साथ Star Plus, जी TV, सोनी TV देखती है जिसमें एक्टर और एक्ट्रेस सुहाग रात मनाते है। किस करते है। आँखो में आँखे डालते है
और तो और भाभीजी घर पर है, जीजाजी छत पर है, टप्पू के पापा और बबिता जिसमे एक व्यक्ति दूसरे की पत्नी के पीछे घूमता लार टपकता नज़र आएगा
पूरे परिवार के साथ देखते है।-
#इन सबserial को देखकर आप को गुस्सा नहीआता ??
फिल्म्स आती है जिसमे किस (चुम्बन, आलिंगन), रोमांस से लेकर गंदी कॉमेडी आदि सब कुछ दिखाया जाता है।
पर आप बड़े मजे लेकर देखते है
इन सबको देखकर आप को गुस्सा नही_आता ??
खुले आम TV- फिल्म वाले आपके बच्चों को बलात्कारी बनाते है, उनके कोमल मन मे जहर घोलते है।
#तब आपको गुस्सा नही आता ?
क्योकि
आपको लगता है कि
रेप रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। पुलिस, प्रशासन, न्यायव्यवस्था की जिम्मेदारी है ....
लेकिन क्या समाज, मीडिया की कोई जिम्मेदारी नही। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ भी परोस दोगे क्या?
आप तो अखबार पढ़कर, News देखकर बस गुस्सा निकालेंगे, कोसेंगे सिस्टम को, सरकार को, पुलिस को, प्रशासन को, DP बदल लेंगे, सोशल मीडिया पे खूब हल्ला मचाएंगे, बहुत ज्यादा हुआ तो कैंडल मार्च या धरना कर लेंगे लेकिन....
TV, चैनल्स, वालीवुड, मीडिया को कुछ नही कहेंगे। क्योकि वो आपके मनोरंजन के लिए है ।
सच पुछिऐ तो TV Channels अश्लीलता परोस रहे है ...
पाखंड परोस रहे है ,
झूंठे विषज्ञापन परोस रहे है ,
झूंठेऔर सत्य से परे ज्योतिषी पाखंड से भरी कहानियां एवं मंत्र, ताबीज आदि परोस रहै है।
उनकी भी गलती नही है, क्योंकि हम आप खरीददार हो .....??
बाबा बंगाली, तांत्रिक बाबा, स्त्री वशीकरण के जाल में खुद फंसते हो।
👉 3) अभी टीवी का खबरिया चैनल मंदसौर के गैंगरेप की घटना पर समाचार चला रहा है |
जैसे ही ब्रेक आये :
पहला विज्ञापन बोडी स्प्रे का जिसमे लड़की आसमान से गिरती है,
दूसरा कंडोम का ,
तीसरा नेहा स्वाहा-स्नेहा स्वाहा वाला,
और चौथा प्रेगनेंसी चेक करने वाले मशीन का......
जब हर विज्ञापन, हर फिल्म में नारी को केवल भोग की वस्तु समझा जाएगा तो बलात्कार के ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलना निश्चित है ......
क्योंकि
"हादसा एक दम नहीं होता,
वक़्त करता है परवरिश बरसों....!"
ऐसी निंदनीय घटनाओं के पीछे निश्चित तौर पर भी बाजारवाद ही ज़िम्मेदार है ..
👉 4) आज सोशल मीडिया इंटरनेट और फिल्मों में @पोर्न परोसा जा रहा है ।
तो बच्चे तो बलात्कारी ही बनेंगे ना
😢😢😢
ध्यान रहे समाज और मीडिया को बदले बिना ये आपके कठोर सख्त कानून कितने ही बना लीजिए।
ये घटनाएं नही रुकने वाली है।
इंतज़ार कीजिये बहुत जल्द आपको फिर केंडल मार्च निकालने का अवसर
हमारा स्वछंद समाज, बाजारू मीडिया और गंदगी से भरा सोशल मीडिया देने वाला है ।
अगर अब भी आप बदलने की शुरुआत नही करते हैं तो समझिए कि ......
फिर कोई भारत की बेटी
निर्भया
आसिफा
गीता
दिव्या
संस्कृति
की तरह बर्बाद होने वाली है।
आपको आपकी बेटियां बचाना है तो सरकार कानून पुलिस के भरोसे से बाहर निकलकर समाज मीडिया और सोशल मीडिया की गंदगी साफ करने की आवश्यकता है।
👉 Motivational Story 4 July
🔶 A rich man was extremely miser. He had instructed even the ladies of his house never to give alms to the beggars. One day a crippled beggar came to the house. The newly-wed daughter-in-law of the house was from a noble family. She told the beggar that the house had nothing to give him. He beggar asked, “Then what do you people eat?” Came the reply, “We eat the left overs and stale foods, and when even these will be consumed, we too will start begging like you.”
🔷 The master of the house upstairs was overhearing this dialogue. He was greatly annoyed. The daughter-in-law explained, “Whatever we have earned as a result of good deeds in our previous births, we are reaping and consuming only that. We in this life are adding nothing to that asset, devoid as we are completely of the qualities of charity and munificence. Naturally when the previously wealth of ‘punya’ is exhausted, we too will be left distitute. The rich man highly appreciated the wisdom of the young damsel and thence onwards started devoting his time and money towards the general weal.
📖 From Pragya Puran
🔷 The master of the house upstairs was overhearing this dialogue. He was greatly annoyed. The daughter-in-law explained, “Whatever we have earned as a result of good deeds in our previous births, we are reaping and consuming only that. We in this life are adding nothing to that asset, devoid as we are completely of the qualities of charity and munificence. Naturally when the previously wealth of ‘punya’ is exhausted, we too will be left distitute. The rich man highly appreciated the wisdom of the young damsel and thence onwards started devoting his time and money towards the general weal.
📖 From Pragya Puran
👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 1)
🔶 अखण्ड-ज्योति की प्रकाश प्रेरणा से अनेकों महत्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा संस्थाओं की निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि युग निर्माण योजना से प्रज्ञा परिवार का हर सदस्य परिचित है। आचार्य जी की जन्मभूमि में स्थित शक्तिपीठ से जुड़े लड़कों के इण्टरमीडिएट कालेज लड़कियों के इण्टर महाविद्यालय तो अधिकाँश ने देखे है। इसके अतिरिक्त देश के कोने-कोने में विनिर्मित चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों की गणना होती है। इन सभी को दूसरे शब्दों में “चेतना विस्तार केन्द्र” कहना चाहिए। इन सभी में प्रधानतया जन-मानस के परिष्कार को प्रशिक्षण ही अपनी-अपनी सुविधा और शैली से अनुशासन में बद्ध रहकर चलता है।
🔷 हरिद्वार का शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई जैसे दीखते है। पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो वे सभी अखण्ड-ज्योति के अण्डे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा कि वह पत्रिका मात्र नहीं है, उसमें लेखक का सूत्र संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अन्त तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युग-सृजेताओं की सेवा वाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयायियों की भी यह विशेषता है कि जिस लक्ष्य को उनने हृदयंगम किया है। उसके लिए निरन्तर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है।
🔶 देश के कोने-कोने में बिखरी हुई प्रज्ञा पीठें, हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दीखती है उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ-वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान, नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग काम करता देखा जा सकता है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। उन्हें बनाने, पकाने और शानदार बनाने में कोई अदृश्य ऊर्जा काम करती देखी जा सकती है। उसकी तेजस्विता और यथार्थता हजारों बार हजारों कसौटियों पर कसी जाती रही है और सौ टंच सोने की तरह खरी उतरती रही है। चमत्कार उसी का है। कौतूहलवर्धक कौतुक तो मदारी, बाजीगर भी दिखा लेते है पर व्यक्तित्व को साधारण से असाधारण बनाकर उन्हें कठिन कार्य क्षेत्र में उतार देना ऐसा कार्य है जिसकी तुलना करने के लिए किसी सामयिक प्रजापति की ही कल्पना उठती है; बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन और गान्धी के सत्याग्रह आन्दोलन का स्मरण दिलाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
🔷 हरिद्वार का शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई जैसे दीखते है। पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो वे सभी अखण्ड-ज्योति के अण्डे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा कि वह पत्रिका मात्र नहीं है, उसमें लेखक का सूत्र संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अन्त तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युग-सृजेताओं की सेवा वाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयायियों की भी यह विशेषता है कि जिस लक्ष्य को उनने हृदयंगम किया है। उसके लिए निरन्तर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है।
🔶 देश के कोने-कोने में बिखरी हुई प्रज्ञा पीठें, हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दीखती है उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ-वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान, नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग काम करता देखा जा सकता है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। उन्हें बनाने, पकाने और शानदार बनाने में कोई अदृश्य ऊर्जा काम करती देखी जा सकती है। उसकी तेजस्विता और यथार्थता हजारों बार हजारों कसौटियों पर कसी जाती रही है और सौ टंच सोने की तरह खरी उतरती रही है। चमत्कार उसी का है। कौतूहलवर्धक कौतुक तो मदारी, बाजीगर भी दिखा लेते है पर व्यक्तित्व को साधारण से असाधारण बनाकर उन्हें कठिन कार्य क्षेत्र में उतार देना ऐसा कार्य है जिसकी तुलना करने के लिए किसी सामयिक प्रजापति की ही कल्पना उठती है; बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन और गान्धी के सत्याग्रह आन्दोलन का स्मरण दिलाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
👉 मजबूत आधारशिला रखना है—
🔶 युग निर्माण योजना की मजबूत आधारशिला रखे जाने का अपना मन है। यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। उसकी प्रसव पीड़ा में अगले दस वर्ष अत्यधिक अनाचार, उत्पीड़न, दैवीय कोप, विनाश और क्लेश, कलह से भरे बीतने हैं। दुष्प्रवृत्तियों का परिपाक क्या होता है, इसका दंड जब भरपूर मिल लेगा, तब आदमी बदलेगा। यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रक्रियाओं को अपना सकने योग्य जनमानस तैयार करना है। लोगों को यह बताना है कि अगले दिनों संसार का एक राज्य, एक धर्म, एक अध्यात्म, एक समाज, एक संस्कृति, एक कानून, एक आचरण, एक भाषा और एक दृष्टिकोण बनने जा रहा है, इसलिए जाति, भाषा, देश, सम्प्रदाय आदि की संकीर्णताएँ छोड़ें और विश्वमानव की एकता की, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना स्वीकार करने के लिए अपनी मनोभूमि बनाएँ।
🔷 लोगों को समझाना है कि पुराने से सार भाग लेकर विकृत्तियों को तिलांजलि दे दें। लोकमानस में विवेक जाग्रत् करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार शिरोधार्य करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास कराना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत संपदाएँ न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीरी दोनों ही संसार से विदा हो जाएँगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने-जाड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते स्वल्प संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी-ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज अनर्गल जैसी लगती हैं।
🔶 संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिए पर लुढ़कती हुई उपरोक्त महान लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1969 पृष्ठ 59-60
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1969/March.59
🔷 लोगों को समझाना है कि पुराने से सार भाग लेकर विकृत्तियों को तिलांजलि दे दें। लोकमानस में विवेक जाग्रत् करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार शिरोधार्य करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास कराना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत संपदाएँ न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीरी दोनों ही संसार से विदा हो जाएँगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने-जाड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते स्वल्प संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी-ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज अनर्गल जैसी लगती हैं।
🔶 संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिए पर लुढ़कती हुई उपरोक्त महान लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1969 पृष्ठ 59-60
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1969/March.59
मंगलवार, 3 जुलाई 2018
👉 Motivational Story
🔷 A student asked his teacher: “Who are the two angels who nurture life?” “Heart and tongue”, was the reply. The next question was: “Who are the two demons who destroy life?” “Heart and tongue”, was the reply again.
🔶 The cruelty and tenderness of heart makes a personmean or great respectively. Non-control over tongue leads to loss of health and friendship. Sweet and amiable speech, on the other hand, begets ample love and affection of the multitudes.
📖 From Pragya Puran
🔶 The cruelty and tenderness of heart makes a personmean or great respectively. Non-control over tongue leads to loss of health and friendship. Sweet and amiable speech, on the other hand, begets ample love and affection of the multitudes.
📖 From Pragya Puran
👉 Motivational Story
🔷 The Bhagwad Gita quotes-‘Nahi Gyanam Sadrisham Pavitramiha Vidyate’. Meaning, nothig is purer than knowledge in this world. True knowledge generates pure thoughts, which enable righteous development of character, awakening of good tendencies and sentiments and refinement of the inner self. Such knowledge is the key to real success in life. Thorough study of inspired talks, deep thinking and contemplation over the thoughts and works of great sages, seers, and saints is the surest way of acquisition of this knowledge.
📖 From Pragya Puran
📖 From Pragya Puran
👉 बुद्धिमानों! मूर्ख क्यों बनते हो!
🔷 मनुष्य की बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। उसकी चतुरता, क्रिया- कुशलता और सोचने की अद्भुत शक्ति की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है। सृष्टि का मुकुटमणि होने का गौरव उसने अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर प्राप्त किया है और विविध दिशाओं में अनेकानेक आविष्कार करके अपने को साधन- संपन्न बनाया है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य में मूर्खता का मात्रा कम नहीं है।
🔶 हम नित्य असंख्यों को मरते हुए देखते हैं, पर अपने आपको अमर जैसा अनुभव करके काम और लोभ के फंदे में फँसे रहते हैं। पाप के दुष्परिणामों से असंख्य प्राणी दु:ख से बिलबिलाते हुए देखे जाते हैं। उन्हें देखते हुए भी हम पाप करते हैं और सोचते हैं कि पाप के फल से मिलने वाले दु:ख से बचे रहेंगे। क्षणिक सुखों के बदले चिरकालीन सुख- शांति को ठुकराते रहने वालों की संख्या कम नहीं है। इन क्रिया- कलापों को किस प्रकार बुद्धिमानी कहा जाएगा?
🔷 सांसारिक मनोरंजन की बातों में बुद्धिमानी दिखाना और आत्मस्वार्थ को भूले रहना, यह कहाँ की समझदारी है? पाठको! मूर्ख मत बनो। मनुष्योचित बुद्धिमत्ता को अपनाओ। खिलौने रंगने के लिए अपना रक्त मत बहाओ। सच्चे स्वार्थ को ढूँढो और परमार्थ की ओर कदम बढ़ाओ। परमार्थ से बढ़कर कोई स्वार्थ नहीं है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति – नवम्बर 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.1
🔶 हम नित्य असंख्यों को मरते हुए देखते हैं, पर अपने आपको अमर जैसा अनुभव करके काम और लोभ के फंदे में फँसे रहते हैं। पाप के दुष्परिणामों से असंख्य प्राणी दु:ख से बिलबिलाते हुए देखे जाते हैं। उन्हें देखते हुए भी हम पाप करते हैं और सोचते हैं कि पाप के फल से मिलने वाले दु:ख से बचे रहेंगे। क्षणिक सुखों के बदले चिरकालीन सुख- शांति को ठुकराते रहने वालों की संख्या कम नहीं है। इन क्रिया- कलापों को किस प्रकार बुद्धिमानी कहा जाएगा?
🔷 सांसारिक मनोरंजन की बातों में बुद्धिमानी दिखाना और आत्मस्वार्थ को भूले रहना, यह कहाँ की समझदारी है? पाठको! मूर्ख मत बनो। मनुष्योचित बुद्धिमत्ता को अपनाओ। खिलौने रंगने के लिए अपना रक्त मत बहाओ। सच्चे स्वार्थ को ढूँढो और परमार्थ की ओर कदम बढ़ाओ। परमार्थ से बढ़कर कोई स्वार्थ नहीं है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति – नवम्बर 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.1
👉 भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा
🔷 इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।
🔶 बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।
🔷 समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1987 पृष्ठ 59
🔶 बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।
🔷 समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1987 पृष्ठ 59
👉 मिठास चाहते हो तो अहंकार हटा दो
🔷 एक नगर के बाहर एक गुरुकुल मे दो शिष्य शिक्षा ग्रहण के लिये आये थे एक सेठजी का लड़का था नाम विवेक और दुसरा साधारण किसान का बेटा राम! दोनो ही गुरुकुल मे शिक्षाप्राप्त व जीवन निर्माण के उद्देश्य से वहाँ अध्ययन हेतु आये! राम मे साधारण बुद्धी थी तो विवेक बहुत ही बुद्धिमान और तेज दिमाग का था!
🔶 एक बार निर्जला एकादशी पर संत श्री ने कहा की आप दोनो कल अपने घर जाना और वहाँ से अपने हिसाब से एक एक कलश लाना और उन्हे कुएँ से भरकर लाना और हम तीनो ही निर्जला का वास रखेंगे सूर्यास्त पर ही जल ग्रहण करेंगे और ध्यान रखना कलश आप अपने हिसाब से लाना ! और वही जल हम सब को शाम को पीना है!
🔷 दोनो घर गये और कलश लाये पुरे दिन जल न पिया सूर्यास्त तक सभी के कण्ठ सुखने लगे आम के वृक्ष के नीचे रखे अपने अपने कलश लेकर आये और सन्त श्री ने पहले राम के कलश से सभी ने ठण्डा और मीठा जल आराम के साथ पिया और फिर राम को संत श्री ने कुएँ पर जल लेने को भेजा और राम जल सेवा के लिये चले गये!
🔶 पर विवेक की प्यास न बुझी वो छटपटा रहा था! क्योंकि वो जो कलश लेकर आया था वो मिट्टी का न था!
🔷 अपने ज्ञान और वैभव पर उसे अहंकार होने लगा था और उसके मन मे राम को नीचा दिखाने के भाव आने लगे और वो मिट्टी के कलश की जगह सोने का कलश लाया और जल्दबाजी तथा अपने ऐश्वर्य के प्रदर्शन के चक्कर मे वो कलश मे खारा पानी ले आया!
🔶 अब एक तो पानी गरम था और ऊपर से खाराऊस पानी था इसलिये उस पानी को पीना तो दुर वो मुँह मे भी न ले पाया और जब संत श्री ने उसकी तरफ देखा तो विवेक अपने अपराध को समझ गया और वो संत श्री के चरणों मे जाकर क्षमा प्रार्थना करने लगा तो संत श्री ने उसे बड़े ही प्यार से समझाया बेटे विवेक जिन्दगी का जो महत्व वास्तविकता मे है वो प्रदर्शन मे नही और किसी को नीचा दिखाने का भाव अपने मन मे न रखो वत्स किसी को भी तुच्छ समझने की भुल न करो वत्स तुमने मिट्टी के कलश को तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना की और सोने के कलश को वरीयता दी और प्रदर्शन के चक्कर मे उसमें खारा पानी ले आये पर वो कलश वो पानी तुम्हारी प्यास को शांत न कर पाया!
🔷 हॆ वत्स यदि जीवन मे मिठास चाहते हो तो मन मे बसी खारास को अर्थात अहंकार को हटा दो वत्स! क्योंकि अहंकार से दबा इंसान कभी ऊपर नही उठ पाता है वत्स, हॆ वत्स जीवन की जो सौंदर्यता सादगी और वास्तविकता मे है वो प्रदर्शन और अहंकार मे नही! हॆ वत्स जीवन की मिठास किसी को बड़ा समझने मे है न की उसे नीचा दिखाने मे हॆ वत्स यदि वास्तव मे ही सफलता चाहते हो तो सब को सम्मान और प्रेम देते हुये सबका उत्साह बढ़ाते हुये चलो!
🔶 और फिर विवेक ने गलती न दोहराने का संकल्प लिया! इतने मे राम कुएँ से जल ले आया और विवेक ने ठण्डा और मीठा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई!
🔷 एक बात हमेशा याद रखना की सादगी और प्रेम मे मिठास का निवास है तो उपेक्षा और अहंकार से जीवन कसेला और खारा हो जायेगा इसलिये सभी को मान देते हुये सभी का उत्साह बढ़ाते हुये सत्यपथ पर आगे बढ़ते चलो!
🔶 एक बार निर्जला एकादशी पर संत श्री ने कहा की आप दोनो कल अपने घर जाना और वहाँ से अपने हिसाब से एक एक कलश लाना और उन्हे कुएँ से भरकर लाना और हम तीनो ही निर्जला का वास रखेंगे सूर्यास्त पर ही जल ग्रहण करेंगे और ध्यान रखना कलश आप अपने हिसाब से लाना ! और वही जल हम सब को शाम को पीना है!
🔷 दोनो घर गये और कलश लाये पुरे दिन जल न पिया सूर्यास्त तक सभी के कण्ठ सुखने लगे आम के वृक्ष के नीचे रखे अपने अपने कलश लेकर आये और सन्त श्री ने पहले राम के कलश से सभी ने ठण्डा और मीठा जल आराम के साथ पिया और फिर राम को संत श्री ने कुएँ पर जल लेने को भेजा और राम जल सेवा के लिये चले गये!
🔶 पर विवेक की प्यास न बुझी वो छटपटा रहा था! क्योंकि वो जो कलश लेकर आया था वो मिट्टी का न था!
🔷 अपने ज्ञान और वैभव पर उसे अहंकार होने लगा था और उसके मन मे राम को नीचा दिखाने के भाव आने लगे और वो मिट्टी के कलश की जगह सोने का कलश लाया और जल्दबाजी तथा अपने ऐश्वर्य के प्रदर्शन के चक्कर मे वो कलश मे खारा पानी ले आया!
🔶 अब एक तो पानी गरम था और ऊपर से खाराऊस पानी था इसलिये उस पानी को पीना तो दुर वो मुँह मे भी न ले पाया और जब संत श्री ने उसकी तरफ देखा तो विवेक अपने अपराध को समझ गया और वो संत श्री के चरणों मे जाकर क्षमा प्रार्थना करने लगा तो संत श्री ने उसे बड़े ही प्यार से समझाया बेटे विवेक जिन्दगी का जो महत्व वास्तविकता मे है वो प्रदर्शन मे नही और किसी को नीचा दिखाने का भाव अपने मन मे न रखो वत्स किसी को भी तुच्छ समझने की भुल न करो वत्स तुमने मिट्टी के कलश को तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना की और सोने के कलश को वरीयता दी और प्रदर्शन के चक्कर मे उसमें खारा पानी ले आये पर वो कलश वो पानी तुम्हारी प्यास को शांत न कर पाया!
🔷 हॆ वत्स यदि जीवन मे मिठास चाहते हो तो मन मे बसी खारास को अर्थात अहंकार को हटा दो वत्स! क्योंकि अहंकार से दबा इंसान कभी ऊपर नही उठ पाता है वत्स, हॆ वत्स जीवन की जो सौंदर्यता सादगी और वास्तविकता मे है वो प्रदर्शन और अहंकार मे नही! हॆ वत्स जीवन की मिठास किसी को बड़ा समझने मे है न की उसे नीचा दिखाने मे हॆ वत्स यदि वास्तव मे ही सफलता चाहते हो तो सब को सम्मान और प्रेम देते हुये सबका उत्साह बढ़ाते हुये चलो!
🔶 और फिर विवेक ने गलती न दोहराने का संकल्प लिया! इतने मे राम कुएँ से जल ले आया और विवेक ने ठण्डा और मीठा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई!
🔷 एक बात हमेशा याद रखना की सादगी और प्रेम मे मिठास का निवास है तो उपेक्षा और अहंकार से जीवन कसेला और खारा हो जायेगा इसलिये सभी को मान देते हुये सभी का उत्साह बढ़ाते हुये सत्यपथ पर आगे बढ़ते चलो!
सोमवार, 2 जुलाई 2018
👉 "आलस्य में न पड़े
🔶 उत्साह, चुस्त स्वभाव और समय की पाबंदी यह तीन गुण बुद्धि बढ़ाने के लिए अद्वितीय कहे गये हैं। इनके द्वारा इस प्रकार के अवसर अनायास ही होते रहते हैं, जिनके कारण ज्ञानभंडार में अपने आप वृद्धि होती है। एक विद्वान् का कथन है -“कोई व्यक्ति छलांग मारकर महापुरुष नहीं बना जाता, बल्कि उसके और साथी जब आलस में पड़े रहते हैं, तब वह रात में भी उन्नति के लिये प्रयत्न करता है।
🔷 आलसी घोड़े की अपेक्षा उत्साही गधा ज्यादा काम कर लेता है । एक दार्शनिक का कथन है - “यदि हम अपनी आयु नहीं बढ़ा सकते तो जीवन की उन्हीं घड़ियों का सदुपयोग करके बहुत दिन जीने से अधिक काम कर सकते हैं ।"
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔷 आलसी घोड़े की अपेक्षा उत्साही गधा ज्यादा काम कर लेता है । एक दार्शनिक का कथन है - “यदि हम अपनी आयु नहीं बढ़ा सकते तो जीवन की उन्हीं घड़ियों का सदुपयोग करके बहुत दिन जीने से अधिक काम कर सकते हैं ।"
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 "Do not succumb to laziness
🔶 Enthusiasm, disciplined nature and time-keeping are three qualities which are considered to be indispensable in improving intellect or brainpower. These qualities automatically create such favourable conditions which will help to boost person’s knowledge without much effort. Someone learned has aptly said, “No one becomes a great person overnight. They became great by making active concerted efforts day and night while their friends were wasting their time doing nothing.
🔷 A donkey which is eager to work would accomplish more than a (mighty but) lazy horse.” One philosopher has said, “We may not be able to lengthen our life but if we make proper use of each and every moment of life, we can accomplish far more than what is only possible by living a longer life.”
🔶 Buddhi badhane ki Vaigyanik Vidhi (The Scientific Approach to Enhance Wit and Wisdom) page 27"
Pt. Shriram Sharma Acharya
🔷 A donkey which is eager to work would accomplish more than a (mighty but) lazy horse.” One philosopher has said, “We may not be able to lengthen our life but if we make proper use of each and every moment of life, we can accomplish far more than what is only possible by living a longer life.”
🔶 Buddhi badhane ki Vaigyanik Vidhi (The Scientific Approach to Enhance Wit and Wisdom) page 27"
Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 अपनी शक्तियों को विकसित कीजिए
🔶 परमेश्वर ने सबको समान शक्तियाँ प्रदान की हैं, ऐसा नहीं कि किसी में अधिक, किसी में न्यून हो या किसी के साथ खास रियायत की गई हो। परमेश्वर के यहाँ अन्याय नहीं है। समस्त अद्भुत शक्तियाँ तुम्हारे शरीर में विद्यमान हैं। तुम उन्हें जाग्रत करने का कष्ट नहीं करते। कितनी ही शक्तियों से कार्य न लेकर तुम उन्हें कुंठित कर डालते हो। अन्य व्यक्ति उसी शक्ति को किसी विशेष दिशा में मोड़ कर उसे अधिक परिपुष्ट एवं विकसित कर लेते हैं। अपनी शक्तियों को जाग्रत तथा विकसित कर लेना अथवा उन्हें शिथिल, पंगु, निश्चेष्ट बना डालना, स्वयं तुम्हारे ही हाथ में है।
🔷 स्मरण रखो, संसार की प्रत्येक उत्तम वस्तु पर तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यदि अपने मन की गुप्त महान् सामर्थ्यों को जाग्रत कर लो और लक्ष्य की ओर प्रयत्न, उद्योग और उत्साहपूर्वक अग्रसर होना सीख लो, तो जैसा चाहो आत्मनिर्माण कर सकते हो। मनुष्य जिस वस्तु की आकांक्षा करता है, उसके मन में जिन महत्त्वाकांक्षाओं का उदय होता है और जो आशापूर्ण तरंगें उदित होती हैं, वे अवश्य पूर्ण हो सकती हैं, यदि वह दृढ़ निश्चय द्वारा अपनी प्रतिभा को जाग्रत कर ले।
🔶 अतएव प्रतिज्ञा कर लीजिए कि आप चाहे तो कुछ हों, जिस स्थिति, जिस वातावरण में हो, आप एक कार्य अवश्य करेंगे, वह यही कि अपनी शक्तियों को ऊँची से ऊँची बनाएँगे।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-जन. 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/January/v1.1
🔷 स्मरण रखो, संसार की प्रत्येक उत्तम वस्तु पर तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यदि अपने मन की गुप्त महान् सामर्थ्यों को जाग्रत कर लो और लक्ष्य की ओर प्रयत्न, उद्योग और उत्साहपूर्वक अग्रसर होना सीख लो, तो जैसा चाहो आत्मनिर्माण कर सकते हो। मनुष्य जिस वस्तु की आकांक्षा करता है, उसके मन में जिन महत्त्वाकांक्षाओं का उदय होता है और जो आशापूर्ण तरंगें उदित होती हैं, वे अवश्य पूर्ण हो सकती हैं, यदि वह दृढ़ निश्चय द्वारा अपनी प्रतिभा को जाग्रत कर ले।
🔶 अतएव प्रतिज्ञा कर लीजिए कि आप चाहे तो कुछ हों, जिस स्थिति, जिस वातावरण में हो, आप एक कार्य अवश्य करेंगे, वह यही कि अपनी शक्तियों को ऊँची से ऊँची बनाएँगे।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-जन. 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/January/v1.1
रविवार, 1 जुलाई 2018
👉 अनीति से धन मत जोड़िए।
🔷 आज सर्वत्र अशाँति ही अशाँति विराजमान है। संसार में जितने भी झगड़े फैले हैं उसका एक मात्र कारण अन्याय से दूसरों का अधिकार लेना है। चोरी, ठगी, दुराचार, शोषण, अन्याय, दूसरों की कमाई हुई सम्पत्ति का अपहरण करना अन्याय है और अन्याय से धन जोड़ने से ही समस्त प्रकार के संघर्ष होते हैं। किसी भी प्रकार धन प्राप्त करने के नशे ने ही प्रत्येक देश, जाति परिवार को ऐसा मतवाला बना रखा है। जिसके परिणाम स्वरूप सर्वत्र कलह का साम्राज्य स्थापित है। सब अपनी-2 स्वार्थ सिद्धि में चिंतित रहते हैं। भाई ही भाई को सर्वनाश के लिए उद्यत है। परिवार का सारा सुख नर्क के रूप में परिणित हो जाता है कोई भाग्यवान परिवार की शायद इस दुख से मुक्त हो। प्रायः यह देखा जाता है कि मनुष्य के पास पर्याप्त धन होने पर भी उसकी तृष्णा एवं लोलुपता बढ़ती ही जाती है और वह उस तृष्णा के वशीभूत होकर धनोपार्जन की अभिलाषा से सहस्रों प्रकार के पाप करने में भी नहीं हिचकिचाता। इस प्रकार वह अपने को पापी बना लेता है।
🔶 प्रतिक्षण धन में ही अपने को लिप्त बनाये रखना और धनाढ्य बनना अपना परम कर्त्तव्य समझता है। धन-उपयोग की वस्तुएं अधिकाधिक रूप से निरंतर ऐसी प्रबल होती जाती हैं कि मनुष्य को चैन नहीं लेने देतीं। जिस आनन्द की अभिलाषा में वह धन एकत्रित करता है वह आनन्द क्षणिक समय के लिए प्राप्त होता है। अन्याय से एकत्रित किये धन से इस संसार में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं देखे गए हैं।
🔷 अनीति से संचय किया हुआ धन कभी आनन्ददायक नहीं होता। वह बुरी तरह नष्ट हो जाता है। उसके नष्ट होने पर लोग रोते हैं, सिर धुनते हैं यहाँ तक कि पागल भी हो जाते हैं, परन्तु फिर भी अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करते। यदि वे यह समझने लगें कि मेरा संचित किया हुआ धन नष्ट होने पर मुझे जैसा दुख हो रहा है वैसे ही जिसके धन को मैंने अनाधिकार से ग्रहण किया उसे भी होता होगा तो वह अपहरण का अन्याय करने को तत्पर नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य में इस प्रकार के आत्म भाव की कमी रहेगी वह कमी भी वास्तविक उन्नति के शिखर पर नहीं चढ़ सकता।
🔶 अपार धन का स्वामी होने पर भी कोई सुख ओर शाँति नहीं प्राप्त कर सकता। कहीं अनाचार और अत्याचार से एकत्रित किये हुए धन से कोई सुखी भी रहा है?
🔷 जिन व्यक्तियों के कर्म शुभ हैं और जिनका लक्ष्य उत्तम है वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति त्याग देने पर भी दुखी नहीं होते। उनके सुख की सामग्री सर्वथा एकत्रित ही रहेगी। महात्मा गाँधी, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर आदि महापुरुषों ने अपनी सब सम्पदा त्याग दी थी, फिर भी उन्हें निर्धनता का दुख नहीं भोगना पड़ा। सत्पुरुषों के पास अन्य आत्मिक सम्पत्तियाँ इतनी एकत्रित हो जाती है कि उन्हें थोड़े साधनों से भी अमीरों से अधिक सुख प्राप्त होता रहता है।
🔶 स्मरण रखिए वही धन फलीभूत होगा, वही सुख अशाँति की वृद्धि करेगा जो परिश्रम एवं ईमानदारी से, उचित प्रयत्नों द्वारा, प्राप्त किया जाता है। अन्यायोपार्जित धन चाहे कितनी ही जल्दी कितनी ही अधिक मात्र में एकत्रित क्यों न हो जाय पर उससे रोग, शोक, चोरी, विपत्ति, राजदंड, हानि आदि का ही कुयोग जमेगा और वह धन अनेक प्रकार के दुख देता हुआ नष्ट होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 2
🔶 प्रतिक्षण धन में ही अपने को लिप्त बनाये रखना और धनाढ्य बनना अपना परम कर्त्तव्य समझता है। धन-उपयोग की वस्तुएं अधिकाधिक रूप से निरंतर ऐसी प्रबल होती जाती हैं कि मनुष्य को चैन नहीं लेने देतीं। जिस आनन्द की अभिलाषा में वह धन एकत्रित करता है वह आनन्द क्षणिक समय के लिए प्राप्त होता है। अन्याय से एकत्रित किये धन से इस संसार में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं देखे गए हैं।
🔷 अनीति से संचय किया हुआ धन कभी आनन्ददायक नहीं होता। वह बुरी तरह नष्ट हो जाता है। उसके नष्ट होने पर लोग रोते हैं, सिर धुनते हैं यहाँ तक कि पागल भी हो जाते हैं, परन्तु फिर भी अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करते। यदि वे यह समझने लगें कि मेरा संचित किया हुआ धन नष्ट होने पर मुझे जैसा दुख हो रहा है वैसे ही जिसके धन को मैंने अनाधिकार से ग्रहण किया उसे भी होता होगा तो वह अपहरण का अन्याय करने को तत्पर नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य में इस प्रकार के आत्म भाव की कमी रहेगी वह कमी भी वास्तविक उन्नति के शिखर पर नहीं चढ़ सकता।
🔶 अपार धन का स्वामी होने पर भी कोई सुख ओर शाँति नहीं प्राप्त कर सकता। कहीं अनाचार और अत्याचार से एकत्रित किये हुए धन से कोई सुखी भी रहा है?
🔷 जिन व्यक्तियों के कर्म शुभ हैं और जिनका लक्ष्य उत्तम है वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति त्याग देने पर भी दुखी नहीं होते। उनके सुख की सामग्री सर्वथा एकत्रित ही रहेगी। महात्मा गाँधी, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर आदि महापुरुषों ने अपनी सब सम्पदा त्याग दी थी, फिर भी उन्हें निर्धनता का दुख नहीं भोगना पड़ा। सत्पुरुषों के पास अन्य आत्मिक सम्पत्तियाँ इतनी एकत्रित हो जाती है कि उन्हें थोड़े साधनों से भी अमीरों से अधिक सुख प्राप्त होता रहता है।
🔶 स्मरण रखिए वही धन फलीभूत होगा, वही सुख अशाँति की वृद्धि करेगा जो परिश्रम एवं ईमानदारी से, उचित प्रयत्नों द्वारा, प्राप्त किया जाता है। अन्यायोपार्जित धन चाहे कितनी ही जल्दी कितनी ही अधिक मात्र में एकत्रित क्यों न हो जाय पर उससे रोग, शोक, चोरी, विपत्ति, राजदंड, हानि आदि का ही कुयोग जमेगा और वह धन अनेक प्रकार के दुख देता हुआ नष्ट होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 2
शनिवार, 30 जून 2018
👉 काश ! दुर्गा जग सके ...
🔷 आज सबको दुर्गा शक्ति के तत्वदर्शन को समझना चाहिए! विश्व को अब दुर्गाशक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता है! दुर्गा संघशक्ति का प्रतीक है!
🔶 पुराणों में जो वर्णन आता है उसके अनुसार एक समय शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि असुरों के अत्याचारों से पृथ्वी पर धर्म की जड़ें हिलने लगी थीं! ये मांसाहारी, मदिरा पीने वाले, व्यभिचारी, लुटेरे और हत्यारे असुर जब देव पुरुषों को नाना प्रकार के दुःख देने लगे तो देवताओं ने ब्रह्मा जी की सलाह पर अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संचित किया! दैवीय शक्तियों की वह संगठित शक्ति दुर्गा, काली, चंडी अथवा अंबिका नामों से प्रसिद्ध हुई! उसने असुरों को मारा और दैवीय तत्वों की रक्षा की तभी से देवी की पूजा होने लगी!
🔷 परमात्मा की शक्तियों ने संगठित होकर दुर्गा के रूप में अवतरित होकर संसार को यह शिक्षा दी कि हम देव स्वाभाव के व्यक्ति यदि अधर्मी असुरों के मुकाबले में अपनी सज्जनता और धर्म धारणा के कारण कमजोर पड़ते हैं तो संगठित होकर अपनी संगठन की शक्ति का उपयोग करें! इससे वे निश्चय ही बड़े से बड़े असुरों को भूमिसात कर सकते हैं! आज इसी दुर्गा शक्ति के जागरण की आवश्यकता है!
🔶 सारे देश में घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले में दुर्गा जागरण संपन्न कराये जा रहे हैं! काश!! इनसे दुर्गा शक्ति का जागरण हो सका होता! दुर्गा माता ने अवतरित होकर महिषासुर, मधुकैटभ, शुंभ-निशुंभ आदि असुरों का संहार किया था! महिषासुर अर्थात् आलस्य! मधुकैटभ अर्थात् असंयम! शुंभ-निशुंभ अर्थात् लोभ-मोह!
🔷 दुर्गा का अर्थ है अनीति अनाचार के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करना! यदि दुर्गा माता के भक्तों ने अपने अंदर दुर्गा माता को अर्थात् आत्म-शक्ति को जगाकर व्यक्तिगत जीवन में इन असुर कुत्साओं का दमन किया होता, लौकिक जगत में अज्ञान, अन्याय और अभाव के रूप में व्याप्त इन तीन असुरों को परास्त किया होता तो भक्तों की दुर्गा पूजा और दुर्गा जागरण सार्थक हो जाता!!
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 पुराणों में जो वर्णन आता है उसके अनुसार एक समय शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि असुरों के अत्याचारों से पृथ्वी पर धर्म की जड़ें हिलने लगी थीं! ये मांसाहारी, मदिरा पीने वाले, व्यभिचारी, लुटेरे और हत्यारे असुर जब देव पुरुषों को नाना प्रकार के दुःख देने लगे तो देवताओं ने ब्रह्मा जी की सलाह पर अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संचित किया! दैवीय शक्तियों की वह संगठित शक्ति दुर्गा, काली, चंडी अथवा अंबिका नामों से प्रसिद्ध हुई! उसने असुरों को मारा और दैवीय तत्वों की रक्षा की तभी से देवी की पूजा होने लगी!
🔷 परमात्मा की शक्तियों ने संगठित होकर दुर्गा के रूप में अवतरित होकर संसार को यह शिक्षा दी कि हम देव स्वाभाव के व्यक्ति यदि अधर्मी असुरों के मुकाबले में अपनी सज्जनता और धर्म धारणा के कारण कमजोर पड़ते हैं तो संगठित होकर अपनी संगठन की शक्ति का उपयोग करें! इससे वे निश्चय ही बड़े से बड़े असुरों को भूमिसात कर सकते हैं! आज इसी दुर्गा शक्ति के जागरण की आवश्यकता है!
🔶 सारे देश में घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले में दुर्गा जागरण संपन्न कराये जा रहे हैं! काश!! इनसे दुर्गा शक्ति का जागरण हो सका होता! दुर्गा माता ने अवतरित होकर महिषासुर, मधुकैटभ, शुंभ-निशुंभ आदि असुरों का संहार किया था! महिषासुर अर्थात् आलस्य! मधुकैटभ अर्थात् असंयम! शुंभ-निशुंभ अर्थात् लोभ-मोह!
🔷 दुर्गा का अर्थ है अनीति अनाचार के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करना! यदि दुर्गा माता के भक्तों ने अपने अंदर दुर्गा माता को अर्थात् आत्म-शक्ति को जगाकर व्यक्तिगत जीवन में इन असुर कुत्साओं का दमन किया होता, लौकिक जगत में अज्ञान, अन्याय और अभाव के रूप में व्याप्त इन तीन असुरों को परास्त किया होता तो भक्तों की दुर्गा पूजा और दुर्गा जागरण सार्थक हो जाता!!
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Mahamana Mohan Malviya
🔷 It happened in the initial days of the Banaras Hindu University. Some students went to meet the founder vice-chancellor, Mahamana Mohan Malviya. They had many complaints against some of their teachers and classmates. Malviyaji was an eminent scholar and patriot, who genuinely cared for the younger generation of the nation.
🔶 He patiently listened to the complaints then replied affectionately- “My young friends! There may be some thorns of angularities in those people, but these thorns would bother us only when we are not able to see the beauty of the flowers of their positive qualities. You should endeavor seeing the flowers of goodness indwelling their lives; then the thorns will lose their prominence and your life will also begin to get fragrant with the sweet scent of those flowers”.
📖 From Pragya Puran
🔶 He patiently listened to the complaints then replied affectionately- “My young friends! There may be some thorns of angularities in those people, but these thorns would bother us only when we are not able to see the beauty of the flowers of their positive qualities. You should endeavor seeing the flowers of goodness indwelling their lives; then the thorns will lose their prominence and your life will also begin to get fragrant with the sweet scent of those flowers”.
📖 From Pragya Puran
शुक्रवार, 29 जून 2018
👉 संतोषी बनो
🔶 आप किसी के लिये कितना भी कुछ कर दीजिये पर यदि सामने वाले के मन मे आत्मसंतुष्टी नही है तो वो कभी सुखी नही रह सकता है वो हमेशा दुःखी का दुःखी ही रहेगा क्योंकि बिना आत्मसंतुष्टी के आत्मशान्ति की प्राप्ति कभी नही हो सकती है!
🔷 एक नगर मे श्री मन नाम के एक सेठजी रहा करते थे बहुत बड़ा व्यापार था उनका और बहुत बड़ी सम्पदा भी थी पर उनके आगे पिछे कोई न था! सन्तों की संगत मिल जाने से धीरे धीरे वो भगवत प्रेम की तरफ बढ़ने लगे निरंतर साधनात्मक जीवन से धीरे धीरे उन्हे संसार से वैराग्य होने लगा!
🔶 और एक दिन उन्होंने अपनी सारी सम्पति परमार्थ के निमित्त दान कर दी और स्वयं गंगा माँ की शरण-स्थली मे जाकर वही साधूओ की सेवा करने लगे और हरी भजन मे डूब गये!
🔷 उनका एक बहुत ही दुर का रिश्तेदार दुर्भागी लाल था उन्होंने उसके लिये अपने एक सेवक के हाथों दस लाख रुपये भिजवायें सेवक वहाँ तक पहुँचा और दुर्भागी को दस लाख रुपये दिये दुर्भागी ने बहुत आदरसत्कार किया और सेठजी के गुणगान करता हुआ नही रुका भोजन के दौरान बातो ही बातो मे सेवक ने सेठजी का सारा वृतान्त सुनाया और जैसै ही दुर्भागी को पता चला की सेठजी ने करोड़ों अरबों की सम्पति दान कर दी और मुझे दस लाख रुपये दिये वो वही पर सेठजी को गाली देने लगा की अरे खुद के आगे पिछे तो कोई न था और मुझे केवल दस लाख रुपये दिये मूरखों की तरह सारी सम्पति लुटाने की क्या जरूरत थी पागल की बुद्धि सटिया गई!
🔶 और इस तरह से उसने धन्यवाद देना तो दुर रहा गालियाँ देने लगा!
🔷 ईश्वर ने हमें जितना दिया क्या वास्तव मे हम उसके उतने लायक है? जब हम ईमानदारी से अपना अवलोकन करे तो हमें हमारे भीतर बहुत गन्दगी दिखेगी और हमारे पापों के विशाल पर्वत है हमें जो उसने दिया वो तो उसने दया करके दिया है हम उसके लायक नही है फिर भी दिया है उस करूणानिधि का आभार प्रकट करना तो दुर और उसे कोसते है!
🔶 ये जितने भी कोसने वाले है वो सब दुर्भागी लाल है उन्हे संतुष्टी नही है और ऐसे असंतुष्टों के लिये आप कितना भी कुछ कर दो वो कभी सुखी नही रह सकते है! जिसने दिल से आभार प्रकट किया उसके दुःख स्वतः ही समाप्त हो गये और जिसने केवल शिकायत की उसके सुख स्वतः ही समाप्त हो गये है!
🔷 सन्तोष से बड़ा कोई सुख नही है और ये कभी न भुलना की संतोषी हर पल सुखी और आनन्द मे जीता है तो असंतोषी हर पल दुःखी ही रहता है!
🔷 एक नगर मे श्री मन नाम के एक सेठजी रहा करते थे बहुत बड़ा व्यापार था उनका और बहुत बड़ी सम्पदा भी थी पर उनके आगे पिछे कोई न था! सन्तों की संगत मिल जाने से धीरे धीरे वो भगवत प्रेम की तरफ बढ़ने लगे निरंतर साधनात्मक जीवन से धीरे धीरे उन्हे संसार से वैराग्य होने लगा!
🔶 और एक दिन उन्होंने अपनी सारी सम्पति परमार्थ के निमित्त दान कर दी और स्वयं गंगा माँ की शरण-स्थली मे जाकर वही साधूओ की सेवा करने लगे और हरी भजन मे डूब गये!
🔷 उनका एक बहुत ही दुर का रिश्तेदार दुर्भागी लाल था उन्होंने उसके लिये अपने एक सेवक के हाथों दस लाख रुपये भिजवायें सेवक वहाँ तक पहुँचा और दुर्भागी को दस लाख रुपये दिये दुर्भागी ने बहुत आदरसत्कार किया और सेठजी के गुणगान करता हुआ नही रुका भोजन के दौरान बातो ही बातो मे सेवक ने सेठजी का सारा वृतान्त सुनाया और जैसै ही दुर्भागी को पता चला की सेठजी ने करोड़ों अरबों की सम्पति दान कर दी और मुझे दस लाख रुपये दिये वो वही पर सेठजी को गाली देने लगा की अरे खुद के आगे पिछे तो कोई न था और मुझे केवल दस लाख रुपये दिये मूरखों की तरह सारी सम्पति लुटाने की क्या जरूरत थी पागल की बुद्धि सटिया गई!
🔶 और इस तरह से उसने धन्यवाद देना तो दुर रहा गालियाँ देने लगा!
🔷 ईश्वर ने हमें जितना दिया क्या वास्तव मे हम उसके उतने लायक है? जब हम ईमानदारी से अपना अवलोकन करे तो हमें हमारे भीतर बहुत गन्दगी दिखेगी और हमारे पापों के विशाल पर्वत है हमें जो उसने दिया वो तो उसने दया करके दिया है हम उसके लायक नही है फिर भी दिया है उस करूणानिधि का आभार प्रकट करना तो दुर और उसे कोसते है!
🔶 ये जितने भी कोसने वाले है वो सब दुर्भागी लाल है उन्हे संतुष्टी नही है और ऐसे असंतुष्टों के लिये आप कितना भी कुछ कर दो वो कभी सुखी नही रह सकते है! जिसने दिल से आभार प्रकट किया उसके दुःख स्वतः ही समाप्त हो गये और जिसने केवल शिकायत की उसके सुख स्वतः ही समाप्त हो गये है!
🔷 सन्तोष से बड़ा कोई सुख नही है और ये कभी न भुलना की संतोषी हर पल सुखी और आनन्द मे जीता है तो असंतोषी हर पल दुःखी ही रहता है!
👉 Influence of Bioelectricity on Food Products – Last Part
🔶 1. Manifestation Against the Backdrop of a Dark Curtain:
This simple experiment would demonstrate the presence of the invisible bioelectric field of the body. Keep one of the chairs facing the least illuminated wall of the room and cover its back with the thick black cloth. Place a dimly lighted wick lamp on the chair. The light should not be visible on the cloth from behind the chair. Be seated on the second chair facing the back of the first chair at a distance of about a foot from the cloth. Resting elbows on the arms of chair, keep arms in an upright position with the palms and fingers pressed together (as in traditional Indian salutation `Namastey'). Now start rubbing both palms together vertically, slowly in the beginning, then gradually accelerate.
🔷 A close observation will show a fog-like hazy luminous emission emanating from the palms. The palms may also appear to glow with a couple of sparks flying out of them. Edges of nails would particularly appear luminous.
🔶 2. Sensory Perception of Bioelectric Magnetism: This experiment shows the bioelectric magnetism present in the body. Be seated on a non-conducting chair placed on the insulated floor. Keep body-parts away from any conducting surface (walls, floor or any other conducting body likely to leak the bioelectric charges from the body). Tightly press fingers of both hands together, leaving a little space between the palms. For about a minute keep the hands pressed together in this position. Now keeping the palms together, try to pull the fingers apart. The bioelectric magnetism of the body would resist the effort to separate them. A vibration will be felt in the fingers.
📖 Akhand Jyoti – April 2004
This simple experiment would demonstrate the presence of the invisible bioelectric field of the body. Keep one of the chairs facing the least illuminated wall of the room and cover its back with the thick black cloth. Place a dimly lighted wick lamp on the chair. The light should not be visible on the cloth from behind the chair. Be seated on the second chair facing the back of the first chair at a distance of about a foot from the cloth. Resting elbows on the arms of chair, keep arms in an upright position with the palms and fingers pressed together (as in traditional Indian salutation `Namastey'). Now start rubbing both palms together vertically, slowly in the beginning, then gradually accelerate.
🔷 A close observation will show a fog-like hazy luminous emission emanating from the palms. The palms may also appear to glow with a couple of sparks flying out of them. Edges of nails would particularly appear luminous.
🔶 2. Sensory Perception of Bioelectric Magnetism: This experiment shows the bioelectric magnetism present in the body. Be seated on a non-conducting chair placed on the insulated floor. Keep body-parts away from any conducting surface (walls, floor or any other conducting body likely to leak the bioelectric charges from the body). Tightly press fingers of both hands together, leaving a little space between the palms. For about a minute keep the hands pressed together in this position. Now keeping the palms together, try to pull the fingers apart. The bioelectric magnetism of the body would resist the effort to separate them. A vibration will be felt in the fingers.
📖 Akhand Jyoti – April 2004
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)
🔶 सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।
🔷 मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।
🔶 मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔷 मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।
🔶 मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 संयमशील जीवन
🔶 जिह्वा और कामेन्द्रिय की उत्तेजना को यदि साध लें तो स्वास्थ्य रक्षा की प्रक्रिया बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है। भोजन भूख मिटाने या शक्ति प्राप्त करने के लिए करते हैं, जीभ के स्वाद के लिए नहीं। भोगी व्यक्तियों की रुचि स्वादयुक्त व्यंजनों में बनी रहती है, किंतु संयमशील व्यक्ति का आहार केवल जीवन धारण किये रहने के लिए होता है, जिसमें स्वाद, चटपटे मसालों, विविध व्यंजनों की राई-रत्तीभर भी गुँजाइश नहीं होती। शराब, माँस और दूसरे मादक द्रव्यों का सेवन हानिकारक होता है। ये पदार्थ व्यक्ति की विवेक बुद्धि को समाप्त कर देते है।
🔷 जो सदैव ईर्ष्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण के विचारों में डूबे रहते है, वे अकारण ही अपनी मानसिक शक्तियों का अपव्यय करते रहते हैं। उन्हें न तो किसी प्रकार का भौतिक सुख मिलता है, न आध्यात्मिक लाभ। सामाजिक-कलह अव्यवस्था का कारण भी ऐसे ही लोग होते है, जिनके विचार संयमित नहीं होते।
🔶 शारीरिक और मानसिक शक्तियों का नियन्त्रण कर लें तो सामाजिक नियन्त्रणों की बात अपने आप पूरी हो जाती है। इन दोनों का मिश्रित रूप ही समाज की व्यवस्था का कारण बनता है। व्यक्ति से ही समाज बनता है। जिस समाज के व्यक्तियों में भले विचार होंगे, वहाँ शांति व सुव्यवस्था अवश्य होगी। अनियंत्रित स्वेच्छाचारी मनुष्य ही स्थान-स्थान पर कलह व कटुता उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियन्त्रण की आवश्यकता है, इसी से शक्ति सन्तुलन व सुव्यवस्था बनी रह सकती है। इस पुण्य प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म संयम से ही करना होगा। पीछे इसके लाभों को देखते हुए दूसरे भी चल पड़ेंगे, पर पहले हमें यह पग स्वयं बढ़ाना पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.17
🔷 जो सदैव ईर्ष्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण के विचारों में डूबे रहते है, वे अकारण ही अपनी मानसिक शक्तियों का अपव्यय करते रहते हैं। उन्हें न तो किसी प्रकार का भौतिक सुख मिलता है, न आध्यात्मिक लाभ। सामाजिक-कलह अव्यवस्था का कारण भी ऐसे ही लोग होते है, जिनके विचार संयमित नहीं होते।
🔶 शारीरिक और मानसिक शक्तियों का नियन्त्रण कर लें तो सामाजिक नियन्त्रणों की बात अपने आप पूरी हो जाती है। इन दोनों का मिश्रित रूप ही समाज की व्यवस्था का कारण बनता है। व्यक्ति से ही समाज बनता है। जिस समाज के व्यक्तियों में भले विचार होंगे, वहाँ शांति व सुव्यवस्था अवश्य होगी। अनियंत्रित स्वेच्छाचारी मनुष्य ही स्थान-स्थान पर कलह व कटुता उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियन्त्रण की आवश्यकता है, इसी से शक्ति सन्तुलन व सुव्यवस्था बनी रह सकती है। इस पुण्य प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म संयम से ही करना होगा। पीछे इसके लाभों को देखते हुए दूसरे भी चल पड़ेंगे, पर पहले हमें यह पग स्वयं बढ़ाना पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 17
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