शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2018


👉 एकाग्रता की अदभुद सामर्थ्य

🔶 एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है, जो मन: संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्त्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबने विचारों पर नियन्त्रण करने उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त की है।

🔷 इसके बिना चंचलता की वानरी वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्त्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। बाल चपलता का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे- विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके, तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।
  
🔶 आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है, जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं, वरन्ï विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी गयी है। प्रार्थनाएँ सामूहिक ही होती हैं। उपासना भी सामूहिक हो, तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज, गरिजाघरों में प्रेयर, मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज है। इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है। एक दिशाधारा का चिंतन हो रहा हो, तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितांत एकांत में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है।
  
🔷 कई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं और शिकायत करते हैं कि उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अंतर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा संबंध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है, उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त  हो ही जाय, यह आवश्यक नहीं है।
  
🔶 जिस एकाग्रता की आवश्यकता, अध्यात्म प्रगति के लिए बताई गयी है वह मन की स्थिरता नहीं वरन्ï चिंतन की दिशा धारा है। उपासना के समय सारा चिंतन, आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझने में लगाना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि ब्राह्मïी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है, उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 4)

🔷 क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को अपने रोष, विरोध या पराक्रम का परिचय देकर डराना होता है और यह भाव रहता है कि दबाव देकर उसे वह करने के लिए विवश किया जाय जो चाहा गया है। किन्तु देखा गया है कि यह उद्देश्य कदाचित ही कभी पूरा होता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में जिस पर अपना रौद्र रूप प्रकट किया जाता है या जिन असंस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है, उससे सामने वाले के स्वाभिमान को चोट पहुँचती है। इससे एक नई समस्या खड़ी होती है। सामने वाला क्षुब्ध होता है और प्रतिशोध लेने, नीचा दिखाने की बात सोचता है। विग्रहों में से अधिकांश की जड़ वहीं पाई जाती है। मतभेद दूर करने या अनुरोध को स्वीकारने के लिए यदि सौम्य तरीका अपनाया गया होता तो विग्रह की नौबत न आती और प्रयोजन पूरा न सही, आधा अधूरा तो सध ही जाता। क्रोध उन सभी सम्भावनाओं को परास्त कर देता है।

🔶 क्रोध एक प्रकार का सन्निपात ज्वर है जिससे आक्रान्त व्यक्ति न केवल बेचैन दीखता, हाथ पैर पीटता और अपनी दयनीय स्थिति का परिचय देता है वरन् गलत सोचता और दूसरों से अपशब्द कहता तथा दुर्व्यवहार करता भी पाया जाता है। सन्निपात ग्रस्त को रुग्णता के चंगुल में फँसा हुआ, विवश, निर्दोष भी मान लिया जाता है और दया सहानुभूति का पात्र समझ कर उसका व्यवहार भुला दिया जाता है। किन्तु क्रोध के बारे मे ऐसी बात नहीं है। उसे दरिद्र, दुष्ट, अहंकारी माना जाता है और बदले में प्रतिशोध उभरता है। क्रोधी को न केवल प्रतिशोध का प्रहार सहना पड़ता है वरन् उत्तेजना के उबाल में ढेरों रक्त जलाना पड़ता है और मनःसंस्थान की कार्यकर्त्री मशीन को तोड़-मरोड़ कर रख देने जैसा दुहरा संकट सहना पड़ता है।

🔷 क्रोध किस कारण किया गया इसे कोई नहीं देखता। आक्रोश का उन्माद एक प्रकार का आक्रमण है जिसके कारण पक्ष सही होने पर, कारण का औचित्य रहने पर भी आवेशग्रस्त को अपराधी की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है। न्याय पाने का अवसर चला जाता है। स्वभाव और व्यक्तित्व अनगढ़ होने की मान्यता यदि बनने लगे तो समझना चाहिए कि प्रामाणिकता चली गई। ऐसे लोग न दूसरे की सहानुभूति पाते हैं और न सहयोग का लाभ ले पाते हैं। शरीर जलता रहता है सो अलग, मन उबलता रहता है सो अलग।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 1)

🔷 The third job that develops internal consciousness is ‘‘Social Revolution’’. Besides opposing & going against minor flaws visible in society there is also a need to induce in life creative things to make a good society. High profile principles are such creative things that make a man society-oriented. The sentiment of ‘‘ATMVAT SARVBHUTESHU’’ must be enlightened in consciences of general masses. Every one of masses must be committed for doing to others what one expects from others. This is the primary condition that must be induced deep within public mind to trigger a social revolution.                                    
                                 
🔶 Each one of us must be convinced about ‘‘VASUDHAIV KUTUMBKAM’’ or that ‘‘the whole world is our abode’’. Not two or three houses rather the whole earth is our home and the way we take care of our home and siblings, the same way we must be careful about peace and harmony the world over and pursue the same. Social revolution can be triggered only with revival of essence of spirituality which underlines such principles that help a man to control over individualism to become society-oriented. If we could wield in our life the principle of ‘‘ATMANAH PRATIKULANI PARESHAAM NAH SAMAACHARET’’, Excellency is bound to descend in social life. If we could develop within us a tendency to mutually share our resources, we can very easily & happily survive with scale of means that we have today with us. We should earn generously and use what is earned and not consume.
                                      
🔷 Evenness must be a part of life-style. Evenness among all societies in which equality between male and female and economical structure must also be put in high steam. Each one of us must become a responsible citizen and manage our family and social affairs on principles of cooperation. We should gather and show courage like that of JATAYU in case of any injustice and impropriety seen anywhere.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 6)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसी तरह सूरदास, प्रतिभा वाले और हिम्मत वाले सूरदास जब खड़े हो गए और जो भी दिशा उन्होंने पकड़ ली, उसमें उन्होंने टॉप किया। सूरदास ने जब अपने आपको सँभाल लिया और अपने आपको बदल लिया, तब उन्होंने टॉप किया। टॉप से कम में तो वे रह ही नहीं सकते। वही बिल्वमंगल जब वेश्यागामी था तो पहले नंबर का और जब संत बना तब भी पहले नंबर का। पहले नंबर का क्यों? इसलिए कि वह भगवान् का भक्त हो गया। जब वह भगवान् का भक्त हो गया, तो फिर वह ऐसा मजेदार भक्त हुआ कि उसने वह काम कर दिखाए, जिस पर हमको अचंभा होता है। हिम्मत वाला और दिलेर आदमी जो काम कर सकता है, मामूली आदमी उसे नहीं कर सकता।

🔶 उसने अपनी आँखें गरम सलाखें डालकर फोड़ डालीं। हम और आप कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते। ऐसा कोई दिलेर आदमी ही कर सकता है। उसने दिलेरी के साथ और तन्मयता के साथ ऐसी मजबूत भक्ति की कि श्रीकृष्ण भगवान् को भागकर आना पड़ा और बच्चे के रूप में, जिनको कि वे अपना इष्टदेव मानते थे, उसी रूप में उनकी सहायता करनी पड़ी। आँखों के अंधे सूरदास की लाठी पकड़ करके टट्टी-पेशाब कराने के लिए, स्नान कराने के लिए भगवान् ले जाया करते थे और सारा इंतजाम किया करते थे। भगवान् उनकी नौकरी बजाया करते थे।

🔷 कौन से सूरदास की? उस सूरदास की, जो प्रतिभावान् था। मैं किसकी प्रशंसा कर रहा हूँ? भक्ति की? भक्ति की बाद में, सबसे पहले प्रतिभा की, समझदारी की। प्रतिभा की बात मैं कह रहा हूँ। प्रतिभा अपने आप में एक जबरदस्त वस्तु है। वह जहाँ कहीं भी चली जाएगी, जिस दिशा में भी चली जाएगी, चाहे वह जहाँ कहीं भी जाएगी, पहले नंबर का काम करेगी। तुलसीदास ने क्या काम किया? तुलसीदास ने जब अपनी दिशाएँ बदल दीं, जब उनकी बीबी ने कहा, नहीं, तुम्हारे लिए ये मुनासिब नहीं है। क्या तुम इसी तरीके से वासना में अपनी जिंदगी खत्म कर दोगे?

🔶 तुमको भगवान् की भक्ति में लगा जाना चाहिए और जितना हमको प्यार करते हो, उतना ही भगवान् से करो, तो मजा आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बदल जाए। उनको यह बात चुभ गई। हमको और आपको चुभती है क्या? नहीं चुभती। हमारी औरतें सौ गालियाँ देती रहती हैं। और फिर हम ऐसे ही हाथ-मुँह धोकर के आ बैठते हैं। वह फिर गाली सुनाती है और गुस्सा होकर के चले जाते हैं और कहते हैं कि फिर तेरे घर नहीं आएँगे और बस वह जाता है और दुकान पर बैठा बीड़ी पीता रहता है। शाम को घूम-फिरकर फिर आ जाता है। क्यों फिर आ गए? आ गए, क्योंकि उसके अंदर वह चीज नहीं है, जिसे जिंदगी कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 44)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार

🔷 भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है; किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे; लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए, तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।
  
🔶 श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानन्द की चरण धूलि इकट्ठा कर एक डिबिया में रख ली थी। स्वामी जी के खड़ाँऊ उसकी पूजा बेदी में थे। इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना उसका नित्य नियम था। इसके अलावा उसे किसी और योगविधि का पता न था। कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ उसे नहीं मालूम थी। मुद्राओं एवं बन्ध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता न था। किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान न था। अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था। इसी का वह जाप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता।
  
🔷 एक दिन प्रातः जब वह रोज की भाँति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ उनके चरणों का चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावलि प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था; पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ, जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
  
🔶 गुरु नाम की धुन के साथ ही ये दोनों श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयी और उसके अन्दर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात् उसे अनायास ही अपने आश्रम में  स्वामी भास्करानन्द ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई दिए। योग विद्या से अनभिज्ञ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा। दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया, तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनायी। लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बोले- बेटा! इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं। अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे, वही तुम्हें दिखने लगेगा।
  
🔷 स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा- ‘हे गुरुदेव, मैं तो सदा-सदा आप को ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को अपनी भौहों के बीच में लगाया करता था। यह जो कुछ भी है, आपकी चरण धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास हो गया है कि गुरुचरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भवसागर पार कर सकता है।’ लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। बस उतना ही सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति चाहिए। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 71

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

👉 तीन कसौटियाँ

🔶 प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्ध था। सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला, “मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है।”

🔷 ये सुनते ही सुकरात ने कहा, “दो पल रूकें”, “मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं ‘तीन कसौटियों का परीक्षण’ कहता हूँ।”

🔶 “तीन कसौटियाँ? कैसी कसौटियाँ?”, परिचित ने पूछा।

🔷 “हाँ”, सुकरात ने कहा, “मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि आप कैसी बात कहने जा रहे हैं, इसलिए किसी भी बात को जानने से पहले मैं इन कसौटियों से परीक्षण करता हूँ।

🔶  इसमें पहली कसौटी सत्य की कसौटी है। क्या आप सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात आप मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?

🔷 “नहीं”, परिचित ने कहा, “दरअसल मैंने सुना है कि…”

🔶 “ठीक है”, सुकरात ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि आप आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है।

🔷 चलिए, अब दूसरी कसौटी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की कसौटी कहता हूँ। मेरे मित्र के बारे में आप जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?

🔶 “नहीं, बल्कि वह तो…”, परिचित ने कहा.

🔷 “अच्छा”, सुकरात ने कहा, “इसका मतलब यह है कि आप मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और आप यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ। लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि आखिरी यानि तीसरी कसौटी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है; और वह है उपयोगिता की कसौटी।

🔶 जो बात आप मुझे बताने वाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?”

🔷 “नहीं, ऐसा तो नहीं है”, परिचित ने असहज होते हुए कहा।

🔶 “बस, हो गया”, सुकरात ने कहा, “जो बात आप मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?”

🔷 दोस्तों आज के नकारात्मक परिवेश में हमें अक्सर ऐसे लोगों से पाला पड़ता है जो हमेशा किसी न किसी की बुराईयों का ग्रन्थ लेकर घूमते रहते हैं और हमारे बीच मतभेद पैदा करने को कोशिश करते रहते हैं, इनसे निबटने के लिए सुकरात द्वारा बताई गयी इन तीन कसौटियों, सत्य की कसौटी, अच्छाई की कसौटी और उपयोगिता की कसौटी को आप भी अपने जीवन में अपनाकर अपना जीवन सरल और खुशहाल बना सकते हैं। 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 Feb 2018


👉 निराशा हर स्थिति से हटे

🔷 अनाचार अपनाने पर प्रत्यक्ष व्यवस्था में तो अवरोध खड़ा होता ही है, साथ ही यह भी प्रतीत होता है कि नियतिक्रम के निरंतर उल्लंघन से प्रकृति का अदृश्य वातावरण भी इन दिनों कम दूषित नहीं हो रहा है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, विद्रोह, अपराध, महामारियाँ आदि इस तेजी से बढ़ रहे हैं कि इन पर नियंत्रण पा सकना कैसे संभव होगा, यह समझ में नहीं आता। किंकत्र्तव्य विमूढ़ स्थिति में पहुँचा हुआ हतप्रभ व्यक्ति क्रमश: अधिक निराश ही होता है। विशेषतया तब जब प्रगति के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में किए गये प्रयास खोखले लगते हों, महत्त्वपूर्ण सुधार हो सकने की संभावना से विश्वास क्रमश: उठता जाता हो।
  
🔶 इतना साहस और पराक्रम तो विरलों में ही होता है, जो आँधी, तूफानों के बीच भी अपनी आशा का दीपक जलाए रह सकें। सृजन प्रयोजनों के लिए साथियों का न जुट पाते हुए भी सुधार संभावना के लिए एकाकी साहस संजोए रह सकें, उलटे को उलटकर सीधा कर देने की योजना बनाते और कार्य करते हुए अडिग बने रहे, गतिशीलता में कमी न आने दें, ऐसे व्यक्तियों को महामानव-देवदूत कहा जाता है, पर वे यदाकदा ही प्रकट होते हैं। उनकी संख्या भी इतनी कम रहती है कि व्यापक निराशा को हटाने में उन प्रतिभाओं का जितना योगदान मिल सकता था, उतना मिल नहीं पाता। आज जनसाधारण का मानस ऐसे ही दलदल में फँसा हुआ है। होना तो यह चाहिए था कि अनौचित्य के स्थान पर औचित्य को प्रतिष्ठिïत करने के लिए साहसिक पुरुषार्थ जगता, पर लोक मानस में घटियापन भर जाने से उस स्तर का उच्च स्तरीय उत्साह भी तो नहीं उभर रहा है। अवांछनीयता को उलट देने वाले ईसा, बुद्ध, गाँधी, लेनिन जैसे प्रतिभाएँ भी उभर नहीं रही हैं।
  
🔷 इन परिस्थितियों में साधारण जनमानस का निराश होना स्वाभाविक है। यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि निराशा हल्के दर्जे की बीमारी नहीं है, वह जहाँ भी जड़ जमाती है, वहाँ घुन की तरह मजबूत शहतीर को भी खोखला करती जाती है। निराशा अपने साथ हार जैसे मान्यता संजोएं रहती है, खीझ और थकान चिपक जाती हैं। इतने दबावों से दबा हुआ आदमी स्वयं तो टूटता ही है अपने साथियों को भी तोड़ता है। इससे शक्ति का अपहरण होता है, जीवनी शक्ति जबाव दे जाती है, तनाव बढ़ते जाने से उद्विग्नता बनी रहती है और ऐसे रचनात्मक उपाय दीख नहीं पड़ते, जिनका साथ लेकर तेज बहाव वाली नाव को खेकर पार लगाया जाता है। निराश व्यक्ति जीत की संभावना को नकारने के कारण जीती बाजी हारते हैं। निराशा न किसी गिरे को ऊँचा उठने देती है और न प्रगति की किसी योजना को क्रियान्वित होने देती है।
  
🔶 अस्तु, आवश्यकता है कि निराशा को छोटी बात न मानकर उसके निराकरण का हर क्षेत्र में प्रयत्न करते रहा जाए। इसी में सबकी सभी प्रकार की भलाई है। उत्साह और साहस जीवित बने रहें, तभी यह संभव है कि प्रगति प्रयोजनों को कार्यान्वित कर सकना संभव हो सके। उज्ज्वल भविष्य की संरचना को ध्यान में रखते हुए जहाँ भी निराशा का माहौल हो, उसके निराकरण का हर संभव उपाय करना चाहिए।
  
🔷 समय की रीति-नीति में अवांछनीयता जुड़ी होने की बात बहुत हद तक सही है, पर उसका उपचार यही है कि प्रतिरोध में समर्थ चिंतन और पुरुषार्थ के लिए जन जन की विचार शक्ति को उत्तेजित किया जाए। उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान देने और उन्हें समर्थ बनाने के लिए जिस मनोवृत्ति को उत्साह पूर्ण प्रश्रय मिलना चाहिए, उसके लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार की जाए। इस संबंध में जन-जन को विश्वास दिलाने के लिए एक समर्थ और व्यापक प्रयास को समुचित विस्तार दिया जाए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 3)

🔶 मनोरोगों में एक वर्ग अवसादजन्यों का और दूसरा आवेश स्तर वालों का है। उदासी, निराशा, भय, चिन्ता, आशंका, अविश्वास जैसों की गणना अवसाद वर्ग में आती है। वे मनुष्य को ठंडा कर देते हैं और लो ब्लड प्रेशर की तरह उस स्थिति में नहीं रहने देते कि कुछ करते-धरते बन सके। इन व्याधियों से आक्रान्त व्यक्ति पक्षाघात पीड़ित अपंगों की तरह दीन हीन बने गई गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। उन पर अभागे होने का लांछन लगता है, जो अनुकूलता रहते हुए भी सही चिन्तन और सही प्रयास बन पड़ने के कारण ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। इतने पर भी उन्हें उपद्रवियों की तुलना में भारभूत होते हुए भी किसी प्रकार सहन कर लिया जाता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज खुद तो अशक्त वयोवृद्ध की तरह चारपाई पकड़े रहता है, पर दूसरों से अपना भार उठवाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार का त्रास नहीं देते।

🔷 उपद्रवी मनोरोगों में क्रोध, आवेश, सनक, आक्रमण, अपराध जैसे कुकृत्यों की गणना होती है। वस्तुतः यह सभी विकृत अहंकार के बाल-बच्चे हैं। निज की अहमन्यता और दूसरे का असम्मान करने का दुस्साहस ही उस स्तर की विक्षिप्तता को जन्म देते हैं। सामान्य शिष्टाचार और सज्जनोचित सौजन्य की मर्यादा है कि अपनी नम्रता, विनम्रशीलता बनाये रखी जाय और सम्पर्क में आने वालों को सम्मान दिया जाय। जो इतना कर पाते हैं उनकी गणना सभ्य नागरिकों के लिए आवश्यक शिष्टाचार के जानकार में की जाती है, भले मानसों की पंक्ति में बिठाया जाता है।

🔶 किन्तु जो ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे दूसरों का जितना तिरस्कार करते हैं उससे कही अधिक मात्रा में स्तर गिरा लेने के रूप में निज की हानि कर चुके होते हैं। ऐसे ही नागरिक मर्यादाओं से अपरिचित या अनभ्यस्त लोग क्रोधी कहे जाते हैं। वे अपनी ही मान्यता या मर्जी को सब कुछ मानते हैं। दूसरे की सुनते ही नहीं। यह नहीं सोचते कि अपना निर्धारण सही भी है या नहीं। सही हो तो भी यह आवश्यक नहीं कि दूसरे उसे उसी रूप में मानने या कर सकने की स्थिति में भी है या नहीं। जो अपनी ही अपनी चलाते हैं, दूसरों की स्थिति समझने और विचार विनिमय से मतभेद दूर करने की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही लोग बात-बात पर आग बबूला होते और क्रोध में लाल-पीले होते देखे गये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to become a Pursuer (SADHAK)? (Part 3)

🔷 It will be interesting if you concede to my one invitation and that is to join my club. You please join my club for it is the only profit-making club in the world. Everyone may get a dividend paying share in the business. Persons with demands will get only little of it by me. How can I give enough? Who gives enough to beggars?  Why don’t you enter into a partnership with me? Why don’t you join me like a combination of blind and lame? I have been a partner with my GURUDEV. SHANKERACHARYA had shared with MANDHATA. King ASHOK had shared with BUDDH.

🔶 Samarth guru RAMDAS had entered into a partnership with SHIVAJI. VIVEKANAND had joined RAMKRISHAN PRAMHANS. Couldn’t you do like that? Can’t this happen that you join me so that you and me both together do the same job and distribute gains coming out of business. If you can dare to do that and if you can believe my credibility then come and enter into partnership  with me as I had with my GURUDEV. Invest your resources (capital) in it. Invest your capital of time, labour, brain in my shop and earn so much profit that makes you happy.
                                   
🔷 This is how I have been gaining all my life that I employed all my capital/resources in GURUDEV’s business and became a partner in that. My GURUDEV is a partner in company of BHAGWAN and I in that of my GURUDEV.I call each of you to come if you have courage and join me and this way you will get as much of worldly and spiritual gains that can make you obliged as I was. Very this is my humble request to SADHAKs.

Finished, today’s session.
====OM SHANTI====
                                    
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 5)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! अक्ल बड़ी जबरदस्त है और आदमी का प्रभाव, जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ, विभूति कहता हूँ, यह विभूति बड़ी समझदारी से भरी है। अगर यह विभूति आदमी के अंदर हो, जिसको मैं आदमी का तेज कहता हूँ, चमक कहता हूँ, तो वह आदमी जहाँ कहीं भी जाएगा, वो टॉप करेगा। वह टॉप से कम कर ही नहीं सकता। सूरदास जब वेश्यागामी थे, बिल्वमंगल थे, तो उन्होंने अति कर डाली और सीमा से बाहर चले गए। वहाँ तक चले गए जहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी के कंधे पर बैठकर वहाँ गए, जहाँ उनके पिताजी का श्राद्ध हो रहा था। वहाँ भी पिताजी के श्राद्ध के समय भी वे वेश्यागमन के लिए चले गए। श्राद्ध करने के लिए भी नहीं आए। अति हो गई।

🔷 और तुलसीदास? तुलसीदास जी भी जिजीविषा के मोह में पड़े हुए थे। सारी क्षमता और सारी प्रतिभा इसी में लग रही थी। एक बार उनको अपनी पत्नी की याद आई। वह अपने मायके गई हुई थी। नदी बह रही थी। वे नदी में कूद पड़े।

🔶 नदी में कूदने पर देखा कि अब हम डूबने वाले हैं और कोई नाव भी नहीं मिल रही है। तभी कोई मुरदा बहता हुआ चला आ रहा था, बस वे उस मुरदे के ऊपर सवार हो गए और तैरकर नदी पार कर ली। उनकी बीबी छत पर सो रही थी। वहाँ जाने के लिए उन्हें सीढ़ी नहीं दिखाई पड़ी, रास्ता दिखाई नहीं पड़ा। वहाँ पतनाले के ऊपर एक साँप टँगा हुआ था। उन्होंने साँप को पकड़ा और साँप के द्वारा उछलकर छत पर जा पहुँचे। कौन जा पहुँचे? तुलसीदास। यही तुलसीदास जब हिम्मत वाले, साहस वाले तुलसीदास बन गए, प्रतिभा वाले तुलसीदास बन गए, तब वे संत हो गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 43)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार

🔷 गुरुदेव की कृपा को उद्घाटित करने वाले इन मन्त्रों में अनगिनत गूढ़ अनुभूतियाँ समायी हैं। इन अनुभूतियों को गुरुभक्तों की भावचेतना में सम्प्रेषित करते हुए भगवान् महादेव के वचन हैं- गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतुबन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। उन गुरुदेव की उपासना मैं करूँगा, ऐसा भाव प्रत्येक शिष्य को रखना चाहिए॥ ५५॥ जिनके अनुग्रह मात्र से महान् अज्ञान का नाश होता है। वे गुरुदेव सभी अभीष्ट की सिद्धि देने वाले हैं। उन्हें नमन करना शिष्य का कर्त्तव्य है॥ ५६॥

🔶 गुरुगीता के इन महामन्त्रों के अर्थ गुरुभक्त शिष्यों के जीवन में प्रत्येक युग में, प्रत्येक काल में प्रकट होते रहे हैं। प्रत्येक समय में शिष्यों ने गुरुकृपा को अपने अस्तित्व में फलित होते हुए देखा है। ऐसा ही एक उदाहरण लक्ष्मण मल्लाह का है, जो अपने युग के सिद्ध सन्त स्वामी भास्करानन्द का शिष्य था। काशी निवासी सन्तों में स्वामी भास्करानन्द का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। सन्त साहित्य से जिनका परिचय है, वे जानते हैं कि अंग्रेजी के सुविख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन ने उनके बारे में कई लेख लिखे थे। जर्मनी के सम्राट् कैसर विलियम द्वितीय, तत्कालीन पिं्रस ऑफ वेल्स स्वामी जी के भक्तों में थे। भारत के तत्कालीन अंग्रेज सेनापति जनरल लूकार्ट, तो उन्हें अपना गुरु मानते थे। इन सब विशिष्ट महानुभावों के बीच यह लक्ष्मण मल्लाह भी था। जो न तो पढ़ा लिखा था और न ही उसमें कोई विशेष योग्यता थी; लेकिन उसका हृदय सदा ही अपने गुरुदेव के प्रति विह्वल रहता था।

🔷 भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है; किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे; लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए, तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 70

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (अन्तिम भाग)

🔷 उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है। वास्तविक लाभ न अपना हो सकता है और न दूसरों का।

🔶 अस्तु आत्मबल से संबंधित सिद्धियाँ और आत्म-कल्याण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने के लिए जो वस्तुतः निष्ठावान हों उन्हें अपने गुण-कर्म स्वभाव पर गहरी दृष्टि डालनी चाहिए और जहाँ कहीं छिद्र हों उन्हें बन्द करना चाहिए। फूटे हुए बर्तन में जल भरा नहीं रह सकता- छेद वाली नाव तैर नहीं सकती, दुर्बुद्धि और दुश्चरित्र व्यक्ति इन छिद्रों में अपना सारा उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसे छूँछ बनकर खाली हाथ रहना पड़ता है।

🔷 हर दिन नया जन्म हर रात नई मौत वाली साधना इस दृष्टि से अति उपयोगी सिद्ध होती है। प्रातःकाल उठते ही यह अनुभव करना कि अब से लेकर सोते समय तक के लिए ही आज का नया जन्म मिला है। इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है। इस आधार पर दिन भर की पूरी दिनचर्या निर्धारित कर ली जाय। समय जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक कण भी बर्बाद होने की उसमें गुंजाइश न रहे। एक भी अनाचार बन पड़ने की ढील न रखी जाय। निकृष्ट स्तर पर सोचने और हेय कर्म करने पर पूरा प्रतिबन्ध लगाया जाय। इस प्रकार नित्य कर्म से लेकर आजीविका उपार्जन तक संभाषण से लेकर कर्तृत्व तक जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय।

🔶 रात को सोते समय लेखा-जोखा लिया जाय कि आज उत्कृष्टता और निकृष्टता में से किस का उपार्जन ज्यादा हुआ। पाप अधिक बना या पुण्य। भूलें प्रबल रहीं या सतर्कता जीती। इस प्रकार आत्म निरीक्षण करने के उपरान्त दूसरे दिन और भी अधिक सतर्क रहने- और भी उत्तम दिनचर्या बनाने की तैयारी करते हुए निद्रा माता को मृत्यु समझ कर उसकी गोद में शान्ति-पूर्वक जाना चाहिए। यह क्रम निरन्तर जारी रखा जाय तो जीवन में क्रमशः अधिकाधिक पवित्रता का समावेश होता चला जाता है और तदनुरूप आत्मिक प्रगति तीव्र होती चली जाती है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 10

👉 चश्मा

🔷 जल्दी -जल्दी घर के सारे काम निपटा, बेटे को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस जाने का सोच, घर से निकल ही रही थी कि... फिर पिताजी की आवाज़ आ गई, "बहू, ज़रा मेरा चश्मा तो साफ़ कर दो।" और बहू झल्लाती हुई....सॉल्वेंट ला, चश्मा साफ करने लगी। इसी चक्कर में आज फिर ऑफिस देर से पहुंची।

🔶 पति की सलाह पर अब वो सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ़ करके रख देती, लेकिन फिर भी घर से निकलते समय पिताजी का बहू को बुलाना बन्द नही हुआ।

🔷 समय से खींचातानी के चलते अब बहू ने पिताजी की पुकार को अनसुना करना शुरू कर दिया।

🔶 आज ऑफिस की छुट्टी थी तो बहू  ने सोचा - घर की साफ- सफाई कर लूँ। अचानक, पिताजी की डायरी हाथ लग गई। एक पन्ने पर लिखा था- दिनांक 23/12/17 आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सर पर रख देता। वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा...

🔷 आज पिताजी को गुजरे ठीक 2 साल बीत चुके हैं। अब मैं रोज घर से बाहर निकलते समय पिताजी का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती हूँ। उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में.....।

🔶 जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो.......  और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 Feb 2018


👉 जीवन का अर्थ

🔶 जीवन का अर्थ है- सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। निराशा का परिणाम होता है- निष्क्रियता, हताशा, भय, उद्विग्रता और अशांति। जीवन है प्रवाह, निराशा है सडऩ। जीवन का पुष्प आशा की उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने को बाध्य करता है। निराशा एक भ्रांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
  
🔷 आज तक ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, जिसके जीवन में विपत्तियाँ और विफलताएँ न आयी हों। संसार चक्र किसी एक व्यक्ति की इच्छा के संकेतों पर गतिशील नहीं है। वह अपनी चाल से चलता है। इसके अलग-अलग धागों के बीच व्यक्तियों का अपना एक निजी संसार होता है। चक्र-गति के साथ आरोह-अवरोह अनिवार्य है, अवश्यंभावी है। उस समय सम्मुख उपस्थित परिस्थितियों का निदान-उपचार भी आवश्यक है, पर उसके कारण कुंठित हो जाना, व्यक्ति के जीवन की एक हास्यास्पद प्रवृत्ति मात्र है। उसका विश्व गति से कोई भी तालमेल नहीं। निराशा व्यक्ति का अपना ही एक मनमाना और आत्मघाती उत्पादन है। ईश्वर की सृष्टि में वह एक विजातीय तत्त्व है। इसलिए निराशा का कोई भी स्वागत करने वाला नहीं।
  
🔶 सामान्य जीवन के उतार-चढ़ावों से ही जो उद्विग्र, अशांत हो जाते हैं, वे जीवन में किसी बड़े काम को करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बड़े काम तो धैर्य, अध्यवसाय तथा कठोर श्रम की अपेक्षा रखते हैं। मानसिक संतुलन वहाँ पहली शर्त है। तरह-तरह की जटिल, पेचीदी परिस्थितियाँ बड़े कामों में पैदा होती रहती हैं। अशांत, व्यग्र मन:स्थिति में डरके बीच कोई रास्ता नहीं ढूँढा जा सकता। असफलता और हताशा ही ऐसे व्यक्तियों की ललाट रेखा है।
  
🔷 संसार बना ही सफलता-असफलता दोनों के ताने बाने से है। सभी व्यक्ति असफलताओं, अवरोधों से हताश होकर, हिम्मत हारकर बैठ जाएँ, तब तो संसार की सारी सक्रियता ही नष्ट हो जाए। पतझड़ के बाद वसंत-रात्रि के बाद दिन-दु:ख के बाद सुख तो सृष्टि चक्र की सुनिश्चित गति व्यवस्था है। इसमें निराश होने जैसी कोई बात है नहीं।
  
🔶 इससे भी उच्च मन:स्थिति उन महापुरुषों की होती है, जो अपने समय की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प लेकर आजीवन चलते रहते हैं, यह जानते हुए भी कि पीड़ा का विस्तार, अतिव्यापक है और पतन की शक्तियाँ अति प्रबल हैं। अपने प्रयास का प्रत्यक्ष परिणाम संभवत: सामान्य लोगों को नहीं ही दिखे, तो भी वे लक्ष्य पथ पर धीर- गंभीर भाव से बढ़ते ही जाते हैं। वे उत्कृष्टतर मन:स्थिति में जीते हैं।
  
🔷 ऐसे ही व्यक्ति देश, समाज और युग के पतनोन्मुख प्रवाह को विपरीत दिशा में मोड़ देते हैं। अपनी गतिविधियों से आये परिवर्तनों को-नवीन दिशाधारा को वे स्वयं तो स्पष्टï देख पाते हैं, पर सामान्य व्यक्ति अपने परिवेश में कोई अधिक स्थूल परिवर्तन उस समय तक उत्पन्न नहीं देख पाने के कारण उन परिवर्तनों और सफलताओं का आकलन नहीं कर पाते।
  
🔶 विशाल वटवृक्ष के पत्तों में वायु की प्रत्येक पुलक से स्पन्दन होता है, पीपल के पत्ते हवा के हर झोकों से खड़-खड़ कर उठते हैं, पर इससे स्वयं पीपल या बरगद पर रंचमात्र हलचल नहीं होती। जबकि छोटे कमजोर पौधे झंझा के एक ही थपेड़े में लोटपोट हो जाते हैं। अवरोधों की राई को पहाड़ मान बैठने और निराशा के नैश अंधकार में ऊषा की स्वर्णिम आभा का अस्तित्व ही भुला बैठने की गलती तो नहीं ही करनी चाहिए, निराशा एक भ्रांति है, यथार्थ जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 2)

🔶 मनोरोगों में एक वर्ग अवसादजन्यों का और दूसरा आवेश स्तर वालों का है। उदासी, निराशा, भय, चिन्ता, आशंका, अविश्वास जैसों की गणना अवसाद वर्ग में आती है। वे मनुष्य को ठंडा कर देते हैं और लो ब्लड प्रेशर की तरह उस स्थिति में नहीं रहने देते कि कुछ करते-धरते बन सके। इन व्याधियों से आक्रान्त व्यक्ति पक्षाघात पीड़ित अपंगों की तरह दीन हीन बने गई गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। उन पर अभागे होने का लांछन लगता है, जो अनुकूलता रहते हुए भी सही चिन्तन और सही प्रयास बन पड़ने के कारण ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। इतने पर भी उन्हें उपद्रवियों की तुलना में भारभूत होते हुए भी किसी प्रकार सहन कर लिया जाता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज खुद तो अशक्त वयोवृद्ध की तरह चारपाई पकड़े रहता है, पर दूसरों से अपना भार उठवाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार का त्रास नहीं देते।

🔷 उपद्रवी मनोरोगों में क्रोध, आवेश, सनक, आक्रमण, अपराध जैसे कुकृत्यों की गणना होती है। वस्तुतः यह सभी विकृत अहंकार के बाल-बच्चे हैं। निज की अहमन्यता और दूसरे का असम्मान करने का दुस्साहस ही उस स्तर की विक्षिप्तता को जन्म देते हैं। सामान्य शिष्टाचार और सज्जनोचित सौजन्य की मर्यादा है कि अपनी नम्रता, विनम्रशीलता बनाये रखी जाय और सम्पर्क में आने वालों को सम्मान दिया जाय। जो इतना कर पाते हैं उनकी गणना सभ्य नागरिकों के लिए आवश्यक शिष्टाचार के जानकार में की जाती है, भले मानसों की पंक्ति में बिठाया जाता है।

🔶 किन्तु जो ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे दूसरों का जितना तिरस्कार करते हैं उससे कही अधिक मात्रा में स्तर गिरा लेने के रूप में निज की हानि कर चुके होते हैं। ऐसे ही नागरिक मर्यादाओं से अपरिचित या अनभ्यस्त लोग क्रोधी कहे जाते हैं। वे अपनी ही मान्यता या मर्जी को सब कुछ मानते हैं। दूसरे की सुनते ही नहीं। यह नहीं सोचते कि अपना निर्धारण सही भी है या नहीं। सही हो तो भी यह आवश्यक नहीं कि दूसरे उसे उसी रूप में मानने या कर सकने की स्थिति में भी है या नहीं। जो अपनी ही अपनी चलाते हैं, दूसरों की स्थिति समझने और विचार विनिमय से मतभेद दूर करने की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही लोग बात-बात पर आग बबूला होते और क्रोध में लाल-पीले होते देखे गये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to become a Pursuer (SADHAK)? (Part 2)

🔶 ARJUN DEV neither did anything nor got done anything, he rather built himself. That is why his GURUDEV deemed him to be a fit person. The seven-hermits (SAPTRISHIs) built/improved themselves. They had wealth of austerity and knowledge within themselves. Wherever they lived, whatever thereafter they did was categorized as work of great level. Had their personalities been of low standard, how it could do?
                                   
🔷 A tendency to further improve own personality was always seen in Gandhi JI. This led thousands of people to follow him. BUDDHA continued to improve himself to subsequently inspire thousands of people to follow him. We must generate magnetism within us. Iron ores & particles gather at a place within mines because of presence of certain magnetic field within the Mine appealing other iron particles from all around the magnetic area within mines scattered in a vast area. The mine continues to drag iron particles from all around. We should improve our qualities. We should improve our magnetism. We should improve our personalities for very this is the biggest challenge or assignment for us to complete.
                                           
🔶 We serve the society. Yes! It is good, that too you should do but what I say is that even more important is to improve your being. Metal that is drawn out of mines happens to be ore but when it is cooked on fire to be refined, the same impure metal becomes famous as pure gold, pure silver or pure steel. We must make ourselves like steel, gold etc. we should wash ourselves, clean ourselves and improve ourselves.

🔷 If this much could be done, must be understood has been done what was to be done. It must be understood that answer has been found. Social service too must be done but priority must be accorded to make oneself a tool for that purpose. It is far more important to endeavor to rectify, refine and improve oneself. Do social service also but do not forget that self-improvement is a never-ending process. Friends let me say one more thing before I finish.
                                    
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 4)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 समझदारी जहाँ कहीं भी होगी, न जाने क्या-से-क्या करती चली जाएगी? समझदार आदमी आर्थिक क्षेत्र में चला जाएगा, तो वो मोनार्क पैदा हो जाएगा और हेनरी फोर्ड पैदा हो जाएगा। पहले ये छोटे-छोटे आदमी थे। नवसारी गुजरात का एक नन्हा-सा आदमी, जरा-सा आदमी और समझदार आदमी अगर व्यापार क्षेत्र में चला जाएगा, तो उसका नाम जमशेद जी टाटा होता चला जाएगा। राजस्थान का एक अदना-सा आदमी जुगल किशोर बिड़ला होता चला जाएगा। अगर आदमी के अंदर गहरी समझदारी हो तब? तब एक नन्हा-सा आदमी, जरा सा आदमी, दो कौड़ी का आदमी जिधर चलेगा, अपनी समझदारी के साथ, वह गजब ढाता हुआ चला जाएगा।

🔶 मित्रो! गहरी समझदारी की बड़ी कीमत है। गहरी समझदारी वाले सुभाषचंद्र बोस गजब ढाते हुए चले गए। सरदार पटेल एक मामूली से वकील। यों तो दुनिया में एक ही नहीं, बहुत सारे वकील हुए हैं, लेकिन पटेल ने अपनी क्षमता और प्रतिभा यदि वकालत में खरच की होती, तो शायद अपनी समझदार अक्ल की कीमत एक हजार रुपया महीना वसूल कर ली होती और उन रुपयों को वसूल करने के बाद में मालदार हो गए होते और उनका बेटा शायद विलायत में पढ़कर आ जाता और वह भी वकील हो सकता था।

🔷 उनकी हवेली भी हो सकती थी और घर पर मोटरें भी हो सकती थीं, लेकिन वही सरदार पटेल अपनी समझदारी को और अपनी बुद्धिमानी को लेकर खड़े हो गए। कहाँ खड़े हो गए? वकालत करने के लिए। किसकी वकालत करने के लिए? काँग्रेस की वकालत करने के लिए और आजादी की वकालत करने के लिए। जब वे वकालत करने के लिए खड़े हो गए, तो कितनी जबरदस्त बैरिस्टरी की और किस तरीके से वकालत की और किस तरीके से तर्क पेश किए और किस तरीके से उनने फिजाँ पैदा की कि हिंदुस्तान की दिशा ही मोड़ दी और न जाने क्या-से-क्या हो गया?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 42)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार
🔶 गुरुगीता का गायन शिष्यों के अन्तर्मन को गुरुभक्ति से भिगोता है। उनके हृदय में सद्गुरु समर्पण के स्वर फूटते हैं। मन-प्राण में गुरुवर के लिए अपने सर्वस्व को  न्योछावर करने की उमंग जगती है। अन्तर्चेतना में सद्गुरु की चेतना झलकने और छलकने लगती है। जिन्होंने भी गुरुगीता की अनुभूति पायी है- सभी का यही मत है। साधनाएँ अनेक हैं, मत और पथ भी अनगिनत हैं; पर गुरुभक्तों के लिए यही एक मंत्र है—अपने गुरुदेव का नाम। उनका एक ही कर्म है, अपने गुरुवर की सेवा। उनमें सदा एक ही भाव विद्यमान रहता है, गुरुदेव के प्रति समर्पण का भाव। जिन्दगी के सारे रिश्ते-नाते, सभी सम्बन्ध गुरुदेव में ही हैं। उनके सिवा त्रिभुवन में न कोई सत्य है और न कोई तथ्य।
  
🔷 उपर्युक्त मंत्रों में भगवान् भोलेनाथ के इन वचनों को हमने पढ़ा है कि दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले प्राणायाम का भला क्या प्रयोजन है? अरे! गुरुवर की चेतना के अन्तःकरण में उदय होने मात्र से बलवान वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है। ऐसे गुरुदेव की निरन्तर सेवा करनी चाहिए; क्योंकि इससे सहज ही आत्मलाभ हो जाता है। अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा चिन्तन भी शिव-चिन्तन के समान है। उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी शिव-कीर्तन के बराबर है। सद्गुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण-शिष्यों के जीवन का सार है। इस सरल; किन्तु समर्थ साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।

🔶 गुरु भक्ति की इस साधना महिमा के अगले क्रम को स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव जगन्माता पार्वती से कहते हैं-

यत्पादरेणुकणिका काऽपि संसारवारिधेः। सेतुबंधायते नाथं देशिकं तमुपास्महे॥ ५५॥
यस्मादनुग्रहं लब्ध्वा महदज्ञानमुत्सृजेत्। तस्मै श्रीदेशिकेन्द्राय नमश्चाभीष्टसिद्धये॥ ५६॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 69

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 5)

🔶 आत्मिक प्रगति के लिए उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम क्रिया प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि की छह मंजिली इमारत बनानी ही चाहिए पर उससे पहले यम नियम का ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए। मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।

🔷 ओछी मनोभूमि के व्यक्ति यदि किसी प्रकार किसी तन्त्र-विधि से कुछ लाभ वरदान प्राप्त भी करलें तो भी वह अन्ततः उनके लिए विपत्ति ही सिद्ध होगी। आमाशय में अर्बुद और आंतों में व्रण से संत्रस्त रोगी यदि मिष्ठान पकवान खा भी लें उसके लिए वे बहुमूल्य और पौष्टिक होते हुए भी कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे। जबकि पेट से स्वस्थ सबल होने पर ज्वार, बाजरा भी पुष्टिकर सिद्ध होते हैं। रहस्यमय अनुष्ठान साधनों की मन्त्र प्रक्रिया एवं साधना विधि की गरिमा इन पंक्तियों में कम नहीं की जा रही है और न उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।

🔶 अच्छी उपज लेने के लिए केवल अच्छा बीज ही पर्याप्त नहीं, अच्छी भूमि भी होनी चाहिए। पूजा विधान बीज है और साधक की मनोभूमि खेत। किसान भूमि जोतने, सींचने, संभालने में छह महीने लगाता है और बीज बोने में एक दिन। यदि अन्तःकरण निर्मल बना लिया जाय तो थोड़ा सा मंत्र साधन की शबरी जैसे अनजान साधकों को भी सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। इसके विपरीत कर्म-काण्ड में पारंगत कठोर प्रयत्न रत होने पर भी मिली हुई सफलता उल्टी विनाशकारी होती है। दूषित मनोवृत्ति बनाये रहने के कारण रावण, कुम्भ-करण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि को दुर्गति के गर्त में गिरना पड़ा। वह तप तथा वरदान उनके अहंकार और अनाचार को बढ़ाने में- सर्प को दूध पिलाने की तरह अनर्थ मूलक ही सिद्ध हुए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 9

👉 पेड़

🔶 एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

🔷 बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।

🔶 एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।"

🔷 बच्चे ने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है मुझे पढना है, लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे, इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"

🔷 उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया। आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

🔶 एक दिन वो फिर आया और कहने लगा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"

🔷 आम के पेड ने कहा, "तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।" उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

🔶 आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था।

🔷 पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी। फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा, "शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"

🔶 आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।"

🔷 वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा, "आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"  इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

🔷 वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों।

🔶 जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई।

🔷 आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

🔶 जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 Feb 2018

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 1)

🔶 शरीर का तापमान सीमित और स्थिर रहे तो ही वह अपना दैनिक सामान्य क्रम ठीक तरह चलाते रह सकने की स्थिति में रहता है। उसमें घट-बढ़ हो तो मुसीबत खड़ी होती है। बढ़े हुए तापमान को ज्वर माना जाता है और बेचैनी उत्पन्न करता है। घट जाने पर शीत रोग में भी प्राण संकट उत्पन्न होता है। यही बात रक्तचाप के सम्बन्ध में भी है। हाई ब्लड प्रेशर के मरीज उद्विग्न रहते, अनिद्रा, चक्कर आदि की शिकायत करते हैं। लो ब्लड प्रेशर में शिथिलता आ घेरती है और ऐसी स्थिति बनती है मानों उठने चलने तक की सामर्थ्य नहीं रही। शरीर स्वस्थ तभी माना जायेगा जब तापमान, रक्तचाप आदि की स्थिति सामान्य रहे। असामान्य होने पर वह दैनिक काम-काज करने योग्य नहीं रहता और रोगियों जैसी चिन्ताजनक व्यथा सहन करता है।

🔷 यही बात मस्तिष्क के सम्बन्ध में भी है। उस पर सिरदर्द, आधासीसी, अनिद्रा, विस्मृति, उन्माद, अपस्मार जैसे रोग तो यदा कदा ही चढ़ते हैं, जिनकी हानि उपरोक्त रोगों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। सिर रोगों का कारण, निदान, उपचार जानने के लिए चिकित्सकों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, किन्तु तनाव वर्ग की आधि-व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका कारण, निदान और उपचार थोड़ी गहराई तक उतरने पर हर व्यक्ति स्वयं ही जान सकता है। जान ही नहीं, यदि चाहे तो उनका उपचार भी बिना किसी की सहायता के स्वयमेव भी कर सकता है।

🔶 शिरोरोग शरीर को क्षति पहुँचाते और उसकी क्रियाशक्ति को कुंठित बनाते हैं। किन्तु मनोरोगों की हानि उससे कहीं अधिक हैं। मन मस्तिष्क ही चिन्तन, निर्धारण की अति महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। यदि वह ठीक तरह न बन पड़े तो मनुष्य न केवल अपंग निरर्थक जैसी बन जाता है, वरन् उन्मादियों की तरह विग्रह भी खड़े करता है। स्वयं हैरान होता और दूसरों को हैरानी में डालता है। निर्वाह कठिन हो जाता है। साथियों से पटरी नहीं बैठती है। गलत निर्णय होते रहने पर अनुकूलता भी प्रतिकूलता बनती जाती है। मित्रों का घटना और शत्रुओं का बढ़ना आरम्भ हो जाता है। फलतः ऐसा व्यक्ति उपेक्षा और तिरस्कार सहता है।

🔷 कहना न होगा कि ऐसे व्यक्ति के पल्ले असफलताओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता है। क्षमताओं के सुनियोजन से ही प्रगति और सम्पन्नता हाथ लगती है। जब वे अवांछनीय कृत्यों में नष्ट-भ्रष्ट होने लगेंगी तो फिर सामान्य या महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक भी करते धरते न बन सकेगा। ऐसे व्यक्ति या तो जिस-तिस पर बरसते हैं, अपने ऊपर खीजते हैं या और किसी से बस न चलने पर भाग्य, भगवान, देवता या किसी के द्वारा जादू कर दिये जाने, वैर निबाहने जैसे बहाने गढ़कर किसी कदर मन हलका करते हैं। इन विडम्बनाओं के अपनाने पर भी कुछ काम नहीं बनता, स्थिति यथावत बनी रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to become a Pursuer (SADHAK)? (Part 1)

🔶 Many of SADHAKs keep questioning me- what to do? What to do? I keep telling each of them not to ask that rather ask what to become? What to become?  Your becoming something is more important than your doing something because thereafter will be righteous what you will be doing. If you only try to become a modeling tool then any watered clay coming in contact with you would be converting into a toy like you and of your wish. Be a sun, you will move and shine and result? People coming in your contact will accompany you and shine. Nine planets and 32 satellites all are with the sun; all shine and keep moving in tune with the sun because the sun moves. We must do that.
                                    
🔷 We must be glorious. We will see that the masses which we wished otherwise to follow us; to copy us will be following us. What is ridiculous is to expect others to move with a stagnant figure, to follow a static figure. Dissolve yourself like a seed to become a tree to subsequently produce from within you many seeds like you. You need seeds and ask others to bring seeds for you--it is quite ridiculous. Why not you produce seeds from within you?  Why not you produce fruits from within you to subsequently produce seeds from those fruits?
                                          
🔶 Friends! People who have built themselves never required asking such questions like what to do? Their every action itself implied what to do. So attractive were their personalities and that was enough to mark the peak of success and greatness. ARJUN DEV used to wash pans and mould himself in tune with discipline of his GURUDEV. His GURUDEV, when required to nominate his successor out of many pupils that time, selected ARJUN DEV as his befitting successor despite the fact that many others were seniors and more learned ones. His GURUDEV RAMDAS justified his choice by saying that ARJUN DEV had built/improved himself while rest of candidates were busy in what they could get done by others and what they themselves do, whereas it should have been aimed at improving themselves.
                                    
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 3)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! हमको समाज में सोए हुए, गड़े हुए कुंभकरणों को जगाना चाहिए। कुंभकरणों की कमी है क्या? नहीं, इनकी कमी नहीं है, पर वे सो गए हैं। हमारा एक काम यह भी होना चाहिए कि जहाँ कहीं भी आपको विभूतिवान् मनुष्य दिखाई पड़ें, तो आपको उनके पास बार-बार चक्कर काटना चाहिए और बार-बार उनकी खुशामद करनी चाहिए।

🔶 विभूतिवान् लोगों में एक तबके के वे लोग आते हैं, जिनको हम विचारवान् कहते हैं, समझदार कहते हैं। समझदार मनुष्य इस ओर चल पड़ें, तो भी गजब ढा देते हैं और उस ओर चल पड़ें, तो भी गजब ढा देते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना बड़े समझदार आदमी थे और बड़े अक्लमंद आदमी थे। मालबार हिल के ऊपर मुंबई में उनकी कोठी बनी हुई है। उनके यहाँ चालीस जूनियर वकील काम करते थे और केस तैयार करते थे। मोहम्मद अली जिन्ना केवल बहस करने के लिए हाईकोर्ट में जाते थे और एक-एक केस का हजारों रुपया वसूल करते थे-उस जमाने में। मोतीलाल नेहरू के मुकाबले के आदमी थे। उनमें बड़ी अक्ल थी, बड़े दिमाग वाले थे। बड़ा दिमाग वाला, अक्ल वाला मनुष्य इधर को चले, तो भी गजब और उधर को चले, तो भी गजब। सही भी कर सकता था वह तथा गलत भी। यही हुआ।

🔷 मोहम्मद अली जिन्ना एक दिन खड़े हो गए और पाकिस्तान की वकालत करने लगे, पाकिस्तान की हिमायत करने लगे। परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि सारे पाकपरस्तों के अंदर उन्होंने एक ऐसी बगावत का माद्दा पैदा कर दिया, ऐसी लड़ाई पैदा कर दी, जेहाद पैदा कर दी और न जाने क्या-क्या पैदा कर दिया कि एक ही देश के लोग एक दूसरे के खूनी हो गए, बागी हो गए। खूनी और बागी होकर के जहाँ-तहाँ दंगे करने लगे। आखिर में गाँधीजी को यह बात मंजूर करनी पड़ी कि पाकिस्तान बनकर ही रहेगा। निर्णय सही था कि गलत, यह चर्चा का विषय नहीं है। वास्तविकता यह जाननी चाहिए कि यह जहर किसने बोया? यह जहर उस आदमी ने बोया, जिसको हम समझदार कहते हैं और अक्लमंद कहते हैं, मोहम्मद अली जिन्ना कहते हैं। यह तो मैं उदाहरण दे रहा हूँ। मनुष्यों का क्या उदाहरण दूँ, मैं तो समझदारी का उदाहरण दे रहा हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 41)

👉 गुरुकृपा से असंभव भी संभव है

🔶 गुरुगीता के इन मन्त्रों के अर्थ को अधिक स्पष्ट रीति से समझने के लिए गुरुभक्ति साधना की एक सत्यकथा साधकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कथा आदि गुरु शंकराचार्य एवं उनके शिष्य तोटकाचार्य से सम्बन्धित है। आचार्य शंकर उन दिनों बद्रीनाथ धाम में वेदान्त दर्शन पर अपने प्रसिद्ध शारीरक भाष्य को लिख रहे थे। वेदान्त दर्शन यानि कि ब्रह्मसूत्र पर यह सुप्रसिद्ध भाष्य है। इसकी एक-एक पंक्ति में वेदान्त साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य सँजोये हैं। हिमालय के शुभ्र धवल शिखरों की छाँव में भगवान् नारायण की पावन तपस्थली में उन दिनों आचार्य की लेखन पयस्विनी प्रवाहित हो रही थी। आचार्य का प्रायः सम्पूर्ण दिन अपने एकान्त चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।
  
🔷 आदिगुरु भगवान् शंकराचार्य के शिष्यों में पद्मपाद, सुरेश्वर आदि परम विद्वान् शिष्य थे। विद्वान् शिष्यों की इस मण्डली में एक मूढ़मति मन्दबुद्धि, बेपढ़ा-लिखा एक बालक भी था। यह बालक बिना पढ़ा-लिखा भले ही था, उसकी बुद्धि भले ही तीव्र न थी; परन्तु उसका हृदय आचार्य के प्रति भक्ति से भरा था। आचार्य उसके लिए सर्वस्व थे। आचार्य की सेवा ही उसका जीवन था। इसके अलावा उसे और कुछ भी न आता था। उसकी मूढ़ता और मन्दबुद्धि पर कभी-कभी आचार्य के अन्य शिष्य उपहास भी कर लेते थे। पर इससे उसे कोई फर्क न पड़ता था। वह तो बस गुरुगत प्राण था। गुरुसेवा के अलावा उसे और कोई चाह न थी। फिर भी आचार्य न जाने क्यों उसे अपनी सायं कक्षा में बुलाना न भूलते थे।
  
🔶 एक दिन आचार्य की नियमित कक्षा का समय हो गया था। पद्मपादाचार्य, सुरेश्वराचार्य, हस्तामलकाचार्य आदि सभी भगवान् शंकराचार्य के श्रीचरणों के समीप आ जुटे थे; किन्तु आचार्य का वह सेवक शिष्य दिखाई नहीं दे रहा था। आचार्य को उसी की प्रतीक्षा थी। वह रह-रहकर इधर-उधर देख लेते। कक्षा में विलम्ब हो रहा था। उपस्थित शिष्यों में से प्रत्येक को प्रतीक्षा असह्य हो रही थी। सभी को भारी उत्सुकता थी कि उनके गुरुदेव ने आज नया क्या लिखा है। यह उत्सुकता अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँची, पर कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। अन्त में पद्मपाद ने साहस किया, पाठ प्रारम्भ करने की कृपा करें भगवन्। वत्स! मुझे अपने एक शिष्य की प्रतीक्षा है। आचार्य ने उत्तर दिया। पर वह तो निरा विमूढ़ है भगवन्! उसका आना न आना दोनों ही एक जैसे हैं। पद्मपाद के स्वरों में विनम्रता होते हुए भी एक खीझ थी।
  
🔷 आचार्य भगवत्पादशंकर से यह बात छुपी न रही। उन्होंने यह जान लिया कि उनके इन विद्वान् शिष्यों को अपनी विद्वता का कुछ अभिमान हो आया है। शिष्यों का गर्वहरण करने वाले आचार्य शंकर मुस्कराए और एक क्षण के लिए ध्यानस्थ हो गए। उनका वह शिष्य, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी, उन्हीं के वस्त्र धोने के लिए गया था। यह उसका नित्य का कार्य था; किन्तु आज अचानक उसके अन्तःकरण में समस्त विद्याएँ एक साथ प्रकाशित हो गयी। वह गुरुकृपा की इस अनुभूति पर कृतकृत्य हो गया। अपने कांधे पर गुरुदेव के धुले वस्त्रों को लिए हाथ जोड़े तोटक छन्दों में आचार्य की स्तुति करते हुए वह चला आ रहा था।

विदिताखिलशास्त्र सुधा जलधे, महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
हृदये कमले विमलं  चरणं, भवशंकरदेशिक मम शरणम्॥
करुणावरुणालय पालयमाम्, भवसागरदुःखविदून हृदम्।
रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं, भव शंकरदेशिकमम शरणं॥

🔷 तोटक छन्द में स्व स्फुरित इस गुरु वन्दना को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी अवाक् रह गए। उन्हें भारी अचरज तो तब हुआ, जब उसे आचार्य ने आदेश दिया- वत्स! आज मेरे स्थान पर तुम इन्हें ब्रह्मसूत्र पर मेरे मन्तव्य को समझाओ। इतना ही नहीं, तुम इनके सम्मुख उन सूत्रों की व्याख्या भी करो, जिन पर अभी मैंने भाष्य नहीं लिखा है। तोटकाचार्य- जो आज्ञा गुरुदेव! कहकर आचार्य की आज्ञा का पालन कर दिखाया। तोटकाचार्य की अनायास उदित हुई प्रखर प्रतिभा को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो गयी कि तोटकाचार्य पर गुरु-कृपा बरस गयी है। त्राहिमाम गुरुदेव! कहते हुए सभी शिष्य आचार्य के चरणों में गिर पड़े। आचार्य ने उन्हें निराभिमानी बनने की सलाह दी। सभी अनुभव कर रहे थे कि गुरु-कृपा से सब कुछ सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 67

👉 नफरत को ख़त्म करके अपने विचारों को शुद्ध करें


🔶 ये मनुष्य की प्रकृति है कि वो नकारात्मक चीजों को बहुत जल्दी पकड़ता है। परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष के बारे में बहुत कम लोग सोचते है। कोई भी स्थिति हो हम सबसे पहले दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ते हैं, उनकी गलतियाँ तलाश करते हैं और फिर बिना सोचे समझे लग जाते हैं उन पर आरोप, इल्ज़ाम लगाने में।

🔷 किसी से कोई काम गलत हो गया, किसी से कोई गलती हो गयी, किसी ने हमारे अनुसार काम नहीं किया, कोई हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा तो बस आरोपों का सिलसिला शुरू। और कभी कभी इस प्रक्रिया में हम दूसरों के प्रति अपने मन में इस कदर नफरत पाल लेते हैं कि हर पल वो नफरत हमें परेशान करती है। और कभी कभी तो हम ऐसी फ़ालतू बातों को लेकर नफरत करने लग जाते है जिसका सामने वाले को पता तक नहीं होता। हम अकेले ही घुटते रहते हैं मरते रहते है और सामने वाला उस बारे में सोच तक नहीं रहा होता है।

🔶 एक बार की बात है। एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल से गुजर रहे थे। जंगल से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि एक नदी किनारे एक लड़की चट्टान पर बैठी हुई है। लड़की ने संत को प्रणाम करके कहा, ” महाराज!  मैं ये नदी पार करके सामने के गाँव में जाना चाहती हूँ, परन्तु नदी के बहाव को देखकर, इसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। लड़की ने संत से प्रार्थना करते हुए कहा, ”महाराज!  शाम होने को है और मुझे अपने घर पहुँचना है, अगर आप मुझे नदी पार करवा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी।”

🔷 संत ने एक पल के लिए कुछ विचार किया। फिर उन्होंने उस लड़की को अपनी पीठ पर बिठाया और तैर कर नदी के पार उतार दिया। लड़की ने संत को प्रणाम करके विदा ली। शिष्य संत के इस व्यवहार को देख कर विस्मित सा हो रहा था। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।

🔶 तीन महीने बाद, एक दिन दोनों गुरु शिष्य पेड़ के नीचे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे। एकाएक शिष्य चिल्ला उठा, ”बस अब और नहीं, मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता। उसने संत से कहा, महाराज!  मुझे यकीन नहीं होता कि आपने एक संत होते हुए भी एक स्त्री को छुआ और उसे पीठ पर बैठा कर नदी के पार उतारा। मैंने आपको एक सच्चा संत मान कर आपकी दिन-रात सेवा की और आपने ये कर्म किया? आपने न केवल मेरा विश्वास तोड़ा है बल्कि आपने तो उस परमात्मा को भी धोखा दिया है। आप संत नहीं हो सकते।”

🔷 अपने शिष्य के वचन सुनकर संत हल्के से मुस्कुराये और बोले, ”वत्स, मैंने उस स्त्री को केवल दो मिनट में नदी के उस पार उतार दिया। क्योंकि मानव सेवा और समाज का भला ही एक संत का उदेश्य होता है। उस दिन के बाद एक पल के लिए भी वो स्त्री मेरे मन या स्मरण में नहीं रही। परन्तु तुमने हर पल उसको अपने मन में रखकर, पिछले तीन महीने उसके साथ बिताये है। ध्यान के समय, विचरण करते समय, भोजन करते हुए, पल-पल वो तुहारे साथ थी। वो रह रही थी उस नफरत में, जो तुम्हारे मन में घर कर गयी, उसने तुम्हारी विचार करने की शक्ति पर भी अधिकार कर लिया।”

🔶 फिर संत ने शिष्य को समझाते हुए कहा, “वत्स, मनुष्य के अंदर ह्रदय ही वो स्थान है जहां शांति और शुद्धता का वास ज़रूरी है। जीवन के सफ़र में साथ चलने वाले राहगीरों के कार्यो से हमारे मन में अशुद्धता का आगमन नहीं होना चाहिए। मानव सेवा और समाज का भला करते हुए हमें अपने हृदय में अशुद्ध  विचारों को कभी नहीं आने देना चाहिए।”

गुरु की बात सुनकर शिष्य निरुत्तर हो गया।

🔷 मित्रों, हमारे साथ भी ज़्यादातर ऐसा ही होता है। हममें से भी ज़्यादातर लोग परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष को ना देखते हुए उसके नकारात्मक पक्ष को पकड़ कर बैठ जाते हैं। फिर वे नकारात्मक विचार धीरे धीरे नफरत में बदल जाते हैं और हमारे जीवन के हर एक पल में इस कदर शामिल हो जाते हैं कि उठते, बैठते, सोते, जागते, खाना खाते हुए, कुछ भी काम करते हुए हर पल हमें परेशान करते हैं। हम अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। जबकि कभी कभी उस नकारात्मक विचार या नफरत को कोई मतलब ही नहीं होता है।

🔶 तो मित्रों, फ़ालतू के नकारात्मक विचारो को, नफरत को अपने दिलो दिमाग से निकाल दो। परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष को देखते हुए सभी पहलुओं पर विचार करो तथा सकारात्मक विचारों से अपने मन को शुद्ध करें और समाज का भला करते हुए अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का प्रयास करें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 Feb 2018


👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (अन्तिम भाग)

🔶 बड़े संघर्ष जैसी स्थिति न बन पड़ रही हो तो कम से कम विरोध तो जारी रहना ही चाहिए। चर्चा का जब विषय आये तो अपनी असहमति ही व्यक्त नहीं करनी चाहिए वरन् असहयोग भी करना चाहिए। कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं, अन्धविश्वासों के अवसर जब भी आयें तो अपना विरोधी अभिमत खुली जुबान से प्रकट करना चाहिए। कौन बुरा मानता है, कौन भला, इसी पर विचार करते रहा जाय और चुप रहकर झंझट से बचने का तरीका अपनाया जाय तो यह आदर्शवादिता का पक्ष कमजोर करना हुआ।

🔷 चुप रहना भी प्रकारान्तर से यथास्थिति बनाये रहने की सहमति है। इससे भी न्याय दुर्बल पड़ता है और अन्याय को बल मिलता है। दुर्योधन की सभा में जब द्रौपदी नंगी की जा रही थी तो भीष्म द्रोण जैसे महारथी चुप बैठे रहे और उस अनीति की ओर से आँखें मूूूँदे रहे। फलतः उद्दण्डता को परोक्ष समर्थन मिला और अन्ततः महाभारत जैसा महाविनाश उत्पन्न हुआ। समय रहते यदि रोकथाम की आवाज उठी होती तो उस समय की थोड़ी कटुता महाअनर्थ करने को रोक सकती थी।

🔶 दहेज जैसे अपव्यय, कुप्रचलनों में खुला विरोध करने और अपने कुटुम्बी-सम्बन्धियों द्वारा किये जाने पर भी उसमें सम्मिलित न होने की जो सलाह दी जाती रही है, उसका कारण यही है कि अनीति को पुनर्विचार का अवसर मिले। अवांछनीयता के विरुद्ध असहयोग और अवरोध तो जारी रहना ही चाहिए, उससे उसमें सुधार होने की बहुत कुछ सम्भावना रहती है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to live our life? (Last Part)

🔶 Live in this world, do in this world but concentrate your mind on BHAGWAN, which means concentrate your mind on noble, higher and better outcomes of what you do. We are not expected to absorb ourselves in this world rather expected to live a sportive role and not to be much concerned about win or defeat. We should live like an actor. Whether we played our prescribed role properly or not, well only this much should be our concern and only this much is sufficient for our satisfaction.

🔷 It is ok if things did not worked as desired after all much depends on circumstances which may not always be in conformity with us.  What we could do if circumstances were not with us? We did our duties and that is all we could do and it is enough for us. Living with this mindset implies that our happiness is in our hands. Such mentality confirms that success is not any condition for you to be happy. You can thus live a cheerful sportive life 24*7. In very this lies the relevancy and success of your life and very this is how life must go on.

Finished, today’s session.                                       
===OM SHANTI===
                                        
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 2)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 किसी के पास जमीन है। भगवान् की कृपा से उस साल अच्छी वर्षा हो गई, तो दो सौ क्विंटल अनाज पैदा हो गया। दो सौ क्विंटल अनाज बिक गया, तो ढेरों पैसा आ गया और उसे बैंक में जमा करा दिया। मकान बन गया, ये बन गया-वो बन गया। पैसे का खेल बन गया। क्या कहता हूँ मैं इनको? इनको मैं संपत्तियाँ कहता हूँ। संपत्ति जमीन में गड़ी हुई मिल सकती है, बाप-दादों की उत्तराधिकार में भी मिल सकती है और किसी बड़े आदमी की कृपा एवं आशीर्वाद से भी मिल सकती है। संपत्ति किसी भी तरीके से मिल सकती है, किंतु संपत्तियों का कोई मूल्य नहीं है, विभूतियों का मूल्य है। विभूतियाँ जहाँ कहीं भी दिखाई पड़ें, उनको आप यह मानकर चलना कि वे भगवान् का विशेष अंश हैं। विशेष अंश जो उनके भीतर है, वह जहाँ कहीं भी हो, उस अंश को जाग्रत् करना, उसको उद्बोधन करना और सोए हुओं को जगाना हमारा-आपका विशेष काम है।

🔶 साथियो! रावण के घर में ढेरों-के-ढेरों आदमी थे। सुना है एक लाख बच्चे थे और सवा लाख नाती-पोते थे, लेकिन जब रामचंद्र जी से लड़ाई हो गई और दोनों और की सेनाएँ खड़ी हो गईं, तो उसने देखा कि हमारे पास एक ही सहायक, एक ही मजबूत और जबरदस्त आदमी है, उसको जगाया जाना चाहिए और उसकी खुशामद की जानी चाहिए। उसकी खुशामद की जाने लगी, उसे जगाया जाने लगा। कौन आदमी था वह? उसका नाम था कुंभकरण। वह छह महीने जागा करता था। रावण को यह विचार आया कि कुंभकरण यदि जाग करके खड़ा हो जाए, तो सारे रीछ-बंदरों को एक ही दिन में मारकर खा जाएगा।

🔷 एक ही दिन में सफाया कर देगा और लड़ना भी नहीं पड़ेगा और रामचंद्र जी की सेना का सफाया हो जाएगा। सुना है, इसीलिए उसके ऊपर बैल, घोड़े और हाथियों को चलाना पड़ा था, ताकि कुंभकरण की नींद छह महीने पहले ही खुल जाए और वह उठकर खड़ा हो जाए। अगर वह तुरंत उठकर खड़ा हो गया होता, अगर जाग गया होता, तो रामचंद्र जी की सेना के लिए मुसीबत खड़ी कर दी होती, लेकिन भगवान् की कृपा ऐसी हुई, भगवान् का जोश और प्रताप ऐसा हुआ कि वह काफी देर से जागा। तब तक रावण युद्ध हार चुका था। इसीलिए रावण मारा गया, मेघनाद मारा गया और सारी लंका तहस-नहस हो गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 40)

👉 गुरुकृपा से असंभव भी संभव है

🔶 गुरुदेव भगवान् के इस अध्यात्ममय स्वरूप को स्पष्ट करने के बाद भगवान् सदाशिव साधकों को निर्देश देते हैं कि अपने परम पूज्य गुरुदेव का आश्रय छोड़कर अन्य कहीं भी न भटको। वेदान्त एवं तन्त्र की किन्हीं रहस्यमय उलझनों में मत उलझो। सद्गुरु शरण में, सद्गुरु समर्पण में सब कुछ है। इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट स्वरों में बताते हुए देवाधिदेव महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

अभ्यस्तैः सकलैः सुदीर्घमनिलैः व्याधिप्रदैर्दुष्करैः     प्राणायाम शतैरनेककरणै र्दुःखात्मकैर्दुजयैः।
यस्मिन्नभ्युदिते विनश्यति बली वायुः स्वयं तत्क्षणात् प्राप्तुं तत्सहजं स्वभावमनिशं सेवध्वमेकं गुरुम्॥ ५३॥
स्वदेशिकस्यैव शरीर चिन्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य चिन्तनं।
स्वदेशिकस्यैव च नाम कीर्तनं     भवेदनन्तस्य शिवस्य कीर्तनं॥ ५४॥

🔷 गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना के रहस्य को प्रकट करने वाले ये मंत्र अपने फलितार्थ में रहस्यमय एवं गूढ़ होते हुए भी प्रक्रिया में अति सरल हैं। देवाधिदेव महादेव स्कन्दमाता जगदम्बा से कहते हैं, देवी! दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले, इन्द्रियों को पीड़ा पहुँचाने वाले, दुर्जय दीर्घश्वास की क्रिया रूपी सैकड़ों की संख्या में प्राणायाम के अभ्यास का भला क्या सुफल है? अरे! जिनकी चेतना के अन्तःकरण में उदय होने मात्र से बलवान् वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है। ऐसे गुरुदेव की निरन्तर सेवा करनी चाहिए; क्योंकि इस गुरुसेवा से सहज ही आत्मलाभ हो जाता है॥ ५३॥ अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा भी चिन्तन भगवान् शिव के स्वरूप के अनन्त चिन्तन के समान है। गुरुदेव के नाम का थोड़ा सा भी कीर्तन भगवान् शिव के अनन्त नाम कीर्तन के बराबर है॥ ५४॥

🔶 गुरुगीता के इन मन्त्रों के अर्थ को अधिक स्पष्ट रीति से समझने के लिए गुरुभक्ति साधना की एक सत्यकथा साधकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कथा आदि गुरु शंकराचार्य एवं उनके शिष्य तोटकाचार्य से सम्बन्धित है। आचार्य शंकर उन दिनों बद्रीनाथ धाम में वेदान्त दर्शन पर अपने प्रसिद्ध शारीरक भाष्य को लिख रहे थे। वेदान्त दर्शन यानि कि ब्रह्मसूत्र पर यह सुप्रसिद्ध भाष्य है। इसकी एक-एक पंक्ति में वेदान्त साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य सँजोये हैं। हिमालय के शुभ्र धवल शिखरों की छाँव में भगवान् नारायण की पावन तपस्थली में उन दिनों आचार्य की लेखन पयस्विनी प्रवाहित हो रही थी। आचार्य का प्रायः सम्पूर्ण दिन अपने एकान्त चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 65

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...