गुरुवार, 18 जनवरी 2018

👉 गुरुगीता (भाग 20)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्
🔷 सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं, जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठा को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया, सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

🔶 ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न  बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है; परन्तु उन्हें लाज लगती है, शरम आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठा का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे, तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? परमहंस देव ने कहा—इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएँ सामने आएँ, उनका सामना करने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

🔷 स्वामी विवेकानन्द महाराज कहा करते थे- तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूँ? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ अथवा पत्नी हूँ, माँ हूँ, पुत्री हूँ। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएँगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएँ साकार हो सकती हैं और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को सद्गुरु कृपा किस रूप में फलती है, इसका बोध भगवान् भोलेनाथ ने गुरुगीता के अगले मंत्रों में कराया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 36

👉 भाग्य और कर्म

🔶 एक बार देवर्षि नारद जी वैकुंठधाम गए, वहां उन्होंने भगवान विष्णु का नमन किया। नारद जी ने श्रीहरि से कहा,
'प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।'

🔷 तब श्रीहरि ने कहा, 'ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के जरिए हो रहा है।'

🔶 नारद बोले, मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।

🔷 भगवान ने कहा, कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।
तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।

🔶 थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया।

🔷 प्रभु! बताइए यह कौन सा न्याय है?

🔶 नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, 'यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।'

🔷 वहीं, उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।

🔶 इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है।

संक्षेप में
🔷 इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं भाग्य कुछ नहीं होता।
🔶 और भाग्यवादी लोग कहते हैं किस्मत में जो कुछ लिखा होगा वही होके रहेगा।
🔷 यानी इंसान कर्म और भाग्य इन दो बिंदुओं की धूरी पर घूमता रहता है।
🔶 और एक दिन इस जग को अलविदा कहकर चला जाता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Jan 2018


👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

🔶 (1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।   

🔷 (2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।   

🔶 (3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।
  
🔷 (4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।
  
🔶 (5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1973 पृष्ठ 1


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/April/v1

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 1)

🔶 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। प्रारम्भ में वह एक चेतन-पिण्ड के रूप में ही उत्पन्न होता है। अपने जन्म के साथ न तो वह गुणी होता है, न बुद्धिमान, न विद्वान और न किसी विशेषता का अधिकारी। परमात्मा उसे मानव-मूर्ति के रूप में जन्म देता है और बीज रूप में उपयोगी शक्तियों को उसके साथ कर देता है। इसके बाद का सारा काम स्वयं मनुष्य को करना होता है। अपने इस उत्तरदायित्व के अनुसार वह स्वतन्त्र है कि अपनी रचना योग्यतापूर्वक करे अथवा अयोग्यतापूर्वक। जो अपनी रचना योग्यतापूर्वक करते हैं पुरस्कार रूप में वे परम पद पाकर चिदानन्द के अधिकारी होते हैं और जो अपनी रचना में असफल होते हैं वे जन्म-मरण के चक्र में चौरासी लाख योनियों की यातना सहते हैं।

🔷 मानव-पिण्ड के रूप में आया प्रारम्भिक मनुष्य अपने वंश के अनुसार विकसित होता हुआ अपना निर्माण प्रारम्भ कर देता है। अपनी सूझ-बूझ और निर्णय के अनुसार कोई धनवान बनता है, कोई विद्वान् बनता है, कोई व्यापारी बनता है तो कोई श्रमिक। कोई पापी बनता है तो कोई पुण्यात्मा। मनुष्य अपना निर्माण अनेक प्रकार का कर सकता है। मानव-निर्माण का कोई एक स्वरूप नहीं, असंख्य स्वरूप एवं प्रकार हैं। किन्तु उन सबको बांटकर दो प्रकारों में किया जा सकता है। एक उत्कृष्ट निर्माण दूसरा निकृष्ट निर्माण।

🔶 मनुष्य कुछ भी बने, किसी क्षेत्र अथवा किसी दिशा में बढ़े, विकास करे, यदि उसमें उसने श्रेष्ठता का समावेश किया हुआ है तो उसका निर्माण उत्कृष्ट निर्माण ही कहा जायेगा और यदि वह उसमें अधमता का समावेश करता है तो उसका निर्माण निकृष्ट ही माना जायेगा। उदाहरणार्थ यदि वह धन के क्षेत्र में बढ़कर अपना निर्माण धनाढ्य के रूप में करता है किन्तु इसकी सिद्धि में दुष्ट साधनों तथा उपायों का प्रयोग करता है, तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण निकृष्ट कोटि का कर रहा है। यदि वह इसकी सिद्धि में सत्य, शिव और सुन्दर से सुशोभित साधनों तथा उपायों का अवलम्बन करता है तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण उत्कृष्ट कोटि का कर रहा है। इस प्रकार मनुष्य का कोई भी आत्म निर्माण या तो उत्कृष्ट कोटि का होता है अथवा निकृष्ट कोटि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16

👉 Meaningful Utilization of Time

🔷 There is not a single moment of life that may be called ordinary. Every moment is extraordinary and unique. It was some moment which gave life to us. It is also some moment which makes us feel good or bad, gives the blessing of success or the bane of failure. Every moment brings with it a unique experience. True wisdom lies in proper utilization of that moment. Time is full of boons. Awakened persons fully live in the present moment and utilize their time wisely. But most of us go through life unconsciously and aimlessly. Thus nothing worthwhile is gained.

🔶 On the other hand, whatever is already available also gets wasted. If one searches the cause of failures, one will easily find it to be the laziness that has unconsciously crept into the psyche. This vice burns time like a firework. Therefore there is need to cultivate the habit of learning new techniques that save time and make the tasks easy. It requires making disorganized lifestyle orderly and moulding the thoughts according to the task at hand. Then only will it be possible to utilize the time in a meaningful way. The present moment is the only moment we have and we must utilize it wisely.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔶 मित्रो! भगवान बुद्ध ने यही मुनासिब समझा। उन्होंने यह नहीं किया कि अपने शिष्यों को एक स्थान पर बैठाकर और उनको योगाभ्यास करा करके और संत बना करके और एक आश्रम बना करके, शान्त कुटीर बना करके वहीं उनको निवास करने के लिए कहें। उन्हें ध्यान करने के लिए, जप करने के लिए और पूजा करने के लिए कहें और गंगा स्नान करने के लिए कहें। उन्होंने यह मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारा योगाभ्यास कर्मक्षेत्र में होगा, स्थान विशेष में नहीं होगा। इसलिए चलो, कर्मक्षेत्र में उतरो। प्रत्येक शिष्य से उन्होंने यही कहा कि तुम्हें तीन दिन से अधिक किसी एक स्थान पर नहीं रहना चाहिए। क्यों? क्योंकि स्थान विशेष से मोह हो जाता है और व्यक्ति विशेष से मोह हो जाता है। व्यक्ति विशेष से, जिस आदमी के अंदर लगाव हो गया है, मोह हो गया है, वह आदमी उसका हिमायती, उसका पक्षधर हो जाता है। गलत काम के लिए भी उसका समर्थन करता है। उसी आदमी को शिष्य बनाने के लिए न जाने क्या-से करता चला जाता है।

🔷 पुराने जमाने में लोग तीन-चार दिन के लिए थोड़े-थोड़े समय के लिए घर से निकल जाते थे। क्योंकि हमारा घर में और व्यक्ति विशेष में इतना ज्यादा मोह हो जाता है, इतना ज्यादा पक्षपात हो जाता है कि हम उनकी उचित और अनुचित-दोनों ही तरह की आवश्यकताओं को-माँगों को पूरा करने के लिए अपने आपको खपाते रहते हैं। इसमें हम यह अनुभव करते हैं कि हम जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। हम जो कर रहे हैं, मुनासिब कर रहे हैं। इसमें गलत और सही का फर्क हमें मालूम नहीं हो पाता। मालूम होने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उन स्थानों में, जिनमें हमारा मोह अत्यधिक बढ़ा हुआ है, थोड़े समय के लिए, वहाँ से बाहर निकल जाना चाहिए। प्राचीनकाल में गृहस्थ जीवन के लिए भी यह आवश्यक समझा जाता था। तीर्थयात्राओं के लिए, परिक्रमाओं के लिए समय-समय पर सामान्य गृहस्थ भी बाहर निकल जाते थे और वहाँ चले जाते थे, जहाँ शान्ति की वर्षा होती थी, अमृत की वर्षा होती थी। वहाँ ज्ञान का प्रकाश हमें मिलता था।

🔶 मित्रो! तब उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए चलते रहना ही मनुष्य की नियति थी। ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’—चलते रहो-चलते रहो, यही शिक्षण संतों ने हमेशा अपने परिव्राजकों को दिया है, भावनाशील लोगों को दिया है। शिक्षकों के लिए दिया गया है और योगाभ्यास करने वाले तप करने वाले लोगों को हमेशा यही उपदेश दिया गया हैं। भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को यही उपदेश दिया और कहा कि जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई देता हो, वहाँ सबसे पहले चले जाना। जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई पड़ा, बुद्ध के शिष्य वहाँ चले गये, उन-उन स्थानों को चले गये। मध्य एशिया के उन स्थानों में चले गये, जहाँ रेगिस्तानी प्रदेश था। जहाँ खाना भी नसीब नहीं होता था। उन स्थानों पर उन सबको भेज दिया। वहाँ भेज दिया जहाँ जंगल पड़े हुए थे। कौन से वाले क्षेत्र में? जावा से लेकर सुमात्रा तक, इण्डोनेशिया से लेकर मलाया तक, सारे-के देश-जिसमें पूर्वी देश भी सम्मिलित थे। जहाँ जंगली लोग, अशिक्षित लोग रहते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 19)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्

🔷 इस कृपा के धारण व ग्रहण की विधि बताते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-

    गुरुमूॄत स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्।
    गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत्॥ १८॥
    गुरुवक्त्रस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः।
    गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् कुलस्त्री स्वपतेर्यथा॥ १९॥
    स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीॄत पुष्टिवर्धनम्।
    एतत्सर्वं परित्यज्य गुरोन्यन्न भावयेत्॥ २०॥

🔶 सद्गुरु कृपा से अपने जीवन में भौतिक, आध्यात्मिक, लौकिक-अलौकिक समस्त विभूतियों को पाने की चाहत रखने वाले साधक को सदा ही गुरुदेव की छवि का स्मरण करना चाहिए। उनके नाम का प्रति पल, प्रति क्षण जप करना चाहिए। साथ ही गुरु आज्ञा का जीवन की सभी विपरीतताओं के बावजूद सम्पूर्ण निष्ठा से पालन करना चाहिए। अपने जीवन में कल्याण कामना करने वाले साधक को गुरुदेव के अतिरिक्त अन्य कोई भावना नहीं रखनी चाहिए॥ १८॥ गुरु के मुख में ब्रह्मा का वास है। इस कारण उनके मुख से बोले हुए शब्द ब्रह्म वाक्य ही हैं। गुरु कृपा प्रसाद से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से सदा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह अध्यात्म तत्त्व के अभीप्सु साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए॥ १९॥ साधक में इस ध्यान की प्रगाढ़ता कुछ इस कदर होनी चाहिए कि उसे अपना आश्रम, अपनी जाति, अपनी कीर्ति का पोषण, वर्धन, सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा अन्य कोई भावना उसे न व्यापे॥२०॥

🔷 इन महामंत्रों का मनन और इनका आचरण साधकों के लिए राजमार्ग है। साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान् और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी। इन शिष्यों में एक लाटू महाराज भी थे। निरे अपढ़-गँवार, विद्या-बुद्धि का कोई चमत्कार उनमें नहीं था। बस हृदय में भक्ति थी। न वे शास्त्र चर्चा के गाम्भीर्य में डूब सकते थे और न ही किसी से शास्त्रार्थ कर सकते थे। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान तो उन्हें छू भी नहीं गया था। अपनी इस स्थिति पर विचार कर उन्होंने परमहंस देव से कहा- ठाकुर! मेरा कैसे होगा? श्री श्री ठाकुर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा- तेरे लिए मैं हूँ न। बस मेरा नाम स्मरण करने से मेरा ध्यान करने से, सब कुछ हो जाएगा।
  
🔶 तब से लाटू महाराज का नियम बन गया- अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम स्मरण, उन्हीं का ध्यान और उनकी सेवा। ठाकुर की आज्ञा ही उनके लिए सर्वस्व हो गयी। यह सब करते हुए उनके जीवन में आश्चर्यजनक आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। अनेकों दैवी घटनाएँ एवं चमत्कारों ने उनकी साधना को धन्य किया। उनके अद्भुत आध्यात्मिक जीवन और योग शक्तियों के अद्भुत विकास को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें अद्भुतानन्द नाम दिया। श्री रामकृष्ण संघ में वह इसी नाम से विख्यात हुए। स्वामी विवेकानन्द उनके बारे  में कहा करते थे- लाटू ठाकुर का चमत्कार है। वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञापालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है। जो जन्म-जन्मान्तरों के तप से सम्भव नहीं, वह सद्गुरु  कृपा से सहज ही साकार हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 34

बुधवार, 17 जनवरी 2018

👉 सच्चा लाभ:-


🔶 एक आदमी के पास बहुत से पशु-पक्षी थे। उसने सुना था कि गांव के बाहर एक संत आए हुए हैं, जो पशु-पक्षियों की भाषा समझते हैं। वह उनके पास गया और उनसे उस कला को सीखने की हठ करने लगा। संत ने शुरुआत में कई बार टालने की कोशिश भी की, पर वह आदमी संत की सेवा में जुटा रहा। अंत में प्रसन्न होकर संत ने व्यक्ति को वह कला सिखा दी। उसके बाद से वह व्यक्ति पशु-पक्षियों की बातें सुनने लगा।

🔷 एक दिन मुर्गे ने कुत्ते से कहा कि ये घोड़ा शीघ्र मर जाएगा। यह सुनकर उस व्यक्ति ने घोडे को बेच दिया। इस तरह वह नुकसान से बच गया।

🔶 कुछ दिनों के बाद उसने उसी मुर्गे को कुत्ते से कहते हुए सुना कि जल्द ही खच्चर भी मरने वाला है। उसने नुकसान से बचने की आशा में वह खच्चर भी बेच दिया।

🔷 फिर मुर्गे ने कहा कि अब नौकर की मृत्यु होने वाली है। बाद में उसके परिवार को कुछ न देना पड़े, इसलिए उस व्यक्ति ने नौकर को नौकरी से हटा दिया।

🔶 वह बहुत खुश हो रहा था कि उसे उसके ज्ञान का इतना फल प्राप्त हो रहा है। तब एक दिन उसने मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि यह आदमी भी मर जाने वाला है।

🔷 अब वह भय से कांपने लगा। वह दौड़ता हुआ संत के पास गया। पूछा कि अब क्या करूं?

🔶 संत ने कहा, ‘जो अब तक कर रहे थे।’

🔷 व्यक्ति ने कहा, ‘आप क्या कह रहे हैं, मैं समझा नहीं?’

🔶 संत ने कहा, ‘जाओ और स्वयं को भी बेच डालो।’

🔷 व्यक्ति ने कहा, ‘आप मजाक क्यों कर रहे हैं? मैं परेशान हूं और आपसे पूछ रहा हूं कि क्या करूं?

🔶 संत ने कहा, ‘जो तुम्हारे अपने थे, तुमने उनका अंत जानकर उन्हें बेच दिया। उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा। तुम खुश हुए कि हानि से बच गए। तर्क के हिसाब से अभी भी वही करो, जो अब तक किया है। अब तक तुम भौतिक हानि से बचने के लिए सब कर रहे थे। फिर अब भय क्यों? अभी समय है, खुद को बेच लो। जो भी मिल जाए, बचा लो, लाभ कर लो। बाद में तो वो भी नहीं मिलेगा।

🔷 तुमने कभी मुर्गे से जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कब मरूंगा? अगर यह जानते तो जीवन को इस तरह न बिताते, जैसे बिता रहे थे। अपने अंत को जानने वाले व्यर्थ के लाभ में नहीं पड़ते। वे असली लाभ कमाने में लगे रहते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 Jan 2018

👉 अनेकता में एकता-देव - संस्कृति की विशेषता

🔶 यहाँ एक बात याद रखनी चाहिए कि संस्कृति का माता की तरह अत्यंत विशाल हृदय है। धर्म सम्प्रदाय उसके छोटे-छोटे बाल-बच्चों की तरह हैं, जो आकृति-प्रकृति में एक-दूसरे से अनमेल होते हुए भी माता की गोद में समान रूप से खेलते और सहानुभूति, स्नेह, सहयोग पाते हैं। भारत एक विचित्र देश है। इसमें धर्म, सम्प्रदायों की, जाति विरादरियों की, प्रथा परम्पराओं की बहुलता है। भाषाएँ भी ढेरों बोली जाती हैं। इनके प्रति परम्परागत रुझान और प्रचलनों का अभ्यास बना रहने पर भी सांस्कृतिक एकता में कोई अन्तर नहीं आता। इसीलिए एक ही धर्म संस्कृति के लोग मात्र प्रान्त, भाषा, सम्प्रदाय, प्रथा-प्रचलन जैसे छोटे कारणों को लेकर एक-दूसरे से पृथक् अनुभव करें, उदासीनता बरतें और असहयोग दिखाएँ, तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है।
  
🔷 यह एक शोचनीय बात है कि देवसंस्कृति की गरिमा को उसके उत्तराधिकारी ही उपेक्षा के गर्त में धकेलते चले जा रहे हैं, जबकि अन्यत्र धर्म-संस्कृतियों में वैसी अवमानना दृष्टिगोचर नहीं होती। संस्कृति को प्रथा प्रचलन की परिपाटी भर मान बैठना भूल है। उसके साथ एक महान परम्परा की दिव्यधारा प्रवाहित होती है। उसे यदि सही रूप से समझाया और अपनाया जा सके, तो अतीत जैसे गौरव, वातावरण और वैभव का पुनर्जीवित हो उठना सुनिश्चित है। अस्तु, प्रयत्न यह होना चाहिए कि देवसंस्कृति के दर्शन, स्वरूप, प्रचलन, प्रतिपादन को जानने, अपनाने के अवसर संसार भर के मनुष्य समुदाय को मिलता रहे। यदि वर्तमान परिस्थितियों में वैसा न बन पड़े, तो कम से कम इतना तो होना चाहिए कि जो लोग भारतीय संस्कृति पर विश्वास करते हैं, वे उसके स्वरूप को भली प्रकार समझें और जितना संभव हो, उतना अपनाए रहने का सच्चे मन से प्रयास करें।
  
🔶 यह आवश्यकता भारत व बाहर बसे प्रत्येक देव-संस्कृति के अनुयायी को अनुभव करनी चाहिए कि मध्यकालीन कुरीतियों, अन्धविश्वासों एवं धर्म क्षेत्र में घुस पड़ी अनेकानेक विकृतियों को बुहारने के उपरांत जो शाश्वत और सत्य बच जाता है, उसे न केवल मान्यता देने का, वरन् जन-जन को अवगत कराने तथा व्यवहार में सुस्थिर बनाये रहने का भाव भरा प्रसास किया जाय।
  
🔷 सुदुर बसे भारतीयों को भिन्न परिस्थितियों, भिन्न वातावरण में एवं भिन्न प्रकार के व्यक्तियों के बीच निर्वाह करना पड़ता है। स्वभावत: बहुसंख्यक लोगों का प्रभाव अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। इन दिनों भारतीय संस्कृति की अवहेलना उसके अनुयायियों द्वारा ही की जाने के कारण अन्य देशों में उनका पक्ष और भी अधिक कमजोर पड़ता है। स्थिरता एवं प्रोत्साहन का आधार न मिलने और भिन्न-भिन्न प्रचलनों का दबाव पडऩे से गाड़ी स्वभावत: उसी पटरी पर घूमने लगती है। प्रवासी भारतियों को हर पीढ़ी अपने पूर्वजों की तुलना में देवसंस्कृति के लिये कम रुचि दिखाती और अधिक उपेक्षा बरतती देखी जा सकती है। प्रवाह इसी दिशा में बहता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब प्रवासी भारतीय अपनी सांस्कृतिक आस्थाओं से विरत होते-होते किसी दिन उसे पूर्णतया तिलाञ्जलि दे बैठेंगे।
  
🔶 होना यह चाहिए था कि प्रवासी भारतीय अपने-अपने देशों में अपने राष्ट्र के प्रति पूरी निष्ठा रखते हुए वहाँ भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि बनकर रहते-अपनी स्थिति संगठित एवं प्रभावोत्पादक बनाते अपरिचित लोगों को इस गरिमा से परिचित एवं प्रभावित करते। ऐसा बन पड़ा होता, तो शताब्दियों से बसे प्रवासी भारतीय उन-उन देशों में से असंख्य लोगों को इस महान् परम्परा का अनुयायी बनाने में सफल हो चुके होते। किन्तु हो उलटा रहा है। बढ़ाना तो दूर, वे घटे ही हैं, जबकि सर्वत्र जनसंख्या वृद्धि की बाढ़ सी आयी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (अन्तिम भाग)

🔶 मन के दमन के सम्बन्ध में पाश्चात्य मनोवेत्ताओं की शंका है कि—मन का दमन करने से भले ही उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो पर उसकी भावना मनुष्य के अवचेतन में दबे-दबे जीवित रहती है और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही उसे कोई अनुकूल परिस्थिति मिलती है वह सक्रिय होकर विविध प्रकार के उपद्रव उत्पन्न कर देती है। मनुष्य के मानसिक उपद्रवों के पीछे अधिकांश में दमन किये गये मन की वह अतृप्ति ही रहती है जो मनुष्य के अन्तर्मन में दबी पड़ी रहती है। सम्भव है पाश्चात्यों की इस शंका में सत्य का कोई अंश हो। किन्तु इस प्रकार का उपद्रव तभी सम्भव है जब मन का दमन अवैज्ञानिक ढंग से किया जाता है।

🔷 विषयों में अनुरक्ति रखते हुए मन की इच्छाओं का हनन अवैज्ञानिक है। इसका उचित मार्ग यही है कि विषय सेवन की हानियों पर विवेक द्वारा विचार किया जाये। ऐसा करने से विषयों से घृणा उत्पन्न होने लगेगी जिसका परिपाक वैराग्य में होगा। विषयों के प्रति वैराग्य होते ही मन उनसे स्वभावतः विमुख हो जायेगा। इस वैज्ञानिक विधि से वश में किए हुए मन की कोई ऐसी वासना न रहेगी जो अवचेतन में दबी पड़ी रहे और अवसर पाकर उपद्रव उपस्थित करे।

🔶 संसार में विषयों और उनके प्रति वांछाओं की कमी नहीं। उनसे हटाया हुआ मन, सम्भव है चतुर्दिक् वातावरण से प्रभावित होकर कभी फिर विपथी हो उठे—इस शंका से बचने के लिये विषयों से विरक्त मन को भी भगवान् अथवा उनके क्रियात्मक रूप परोपकार एवं परमार्थ में नियुक्त करना चाहिये क्योंकि मन निराधार नहीं रह सकता, उसको टिकने के लिये आधार चाहिये ही। परमात्मात्मक आधार से शुभ एवं निरापद, मन की एकाग्र स्थिति के लिये अन्य आधार नहीं हो सकता। वह परम है, उसी से सब कुछ का उदय है और उसमें सब कुछ का समाधान है और फिर परमात्मक रूप में एकाग्र किए हुए मन में जिस सुख-शांति एवं सन्तुष्टि का प्रस्फुरणा होगा, वह सुख होगा जो शाश्वत, अक्षय एवं स्थायी होता है उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। इस शाश्वत सुख को पाकर फिर कुछ पाना शेष न रह जायेगा। आज का विषयी एवं चंचल मन सदा सर्वदा के लिए सन्तुष्ट होकर स्थिर, एकाग्र तथा परिपूर्ण हो जायेगा। मन की यही दशा तो वह सुख शांति है जिसे पाने के लिये मनुष्य रूप जीवन जन्म-जन्मान्तर से भटकता चला आ रहा है किन्तु पा नहीं रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.10

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 King Dileep and Nandini

🔷 After his retirement King Dileep went for spiritual pursuits along with his wife to stay at saint Vasishtha's monastery. The saint assigned him to look after the sacred cow Nandini. Dileep would follow Nandini wherever she went for grazing. He kwpt his bow and arrow ready for her protection. One day Nandini went deep in the woods and Dilep followed her. All of a sudden a ferocious Lion attacked the sacred cow. Dileep immediately got ready to shoot the arrow, but the Lion said, "O king! I am no ordinary lion. I belong to Lord Shiva, your arrows cannot harm me a bit."

🔶 "Whoever you are", replied Dileep, "I shall protect my Guru's cow by all means." The Lion said, "Alright, I will let Nandini go, if you provide me your own flesh to satiate my hunger." "I am gladly ready for this deal" replied Dileep. And he set aside his bow and arrow. He then sat down with eyes closed, waiting for the lion to attack. But there was no sign of any activity for quite sometime. Dileep opened his eyes, and behold! In place of the lion saint Vasishtha himself was smiling at him. "The test of your credibility is over. You truly deserve to learn the science of spirituality", said Vasishtha, and took him back to the monastery.

📖 From Pragya Puran

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔶 देवियो, भाइयो! आज हमारा प्रारंभिक शिक्षण समाप्त हुआ। अब हम आपको उसी तरह से कार्यक्षेत्र में भेजना चाहेंगे, जैसे कि भगवान बुद्ध ने अपने सारे शिष्यों को योगाभ्यास और तप करने के लिए भेज दिया था। कुछ समय तक अपने समीप रखने के बाद भगवान बुद्ध ने यह आवश्यक समझा था कि जो उनको सिखाया गया है और जो उन्होंने सीखा है, उसको परिपक्व और परिपुष्ट बनाने के लिए, उनके क्रियाकलापों को परखने के लिए कार्यक्षेत्र में भेज दिया जाय। बुद्ध के शिष्य थोड़े दिन तप करने के बाद निकल गये, चले गये। कहाँ चले गये? हिन्दुस्तान के कोने-कोने में चले गये, जहाँ पर अज्ञान का अंधकार था। मित्रो! सूरज कहाँ चला गया? वहाँ चला गया, जहाँ अंधकार ने उसको बुलाया था। जहाँ अँधेरा छुपा हुआ था। वहाँ से वह हटता हुआ चला गया और सूरज आगे बढ़ता हुआ चला गया। सूरज के पास अंधकार नहीं आया था। सूरज ही गया था, अंधकार को दूर करने के लिए।

🔷 मित्रो! बादलों के पास जमीन नहीं आयी, खेत नहीं आये, पेड़ नहीं आये। कोई नहीं आया बादलों के पास, बादल ही चले गये। कहाँ चले गये? खेतों के पास, खलिहानों के पास, पेड़ों के पास। जहाँ लोग बीमार पड़े हुए थे, कॉलरा फैला हुआ पड़ा था, तपेदिक फैला हुआ पड़ा था, ऐसे मरीज डॉक्टर के पास नहीं आ सके, वहाँ डॉक्टर चले गये, कहाँ चले गये? वहाँ चले गये, जिन गाँवों में कॉलरा फैला हुआ था, हैजा फैला हुआ था, तपेदिक फैैला हुआ था। भूकम्प से पीड़ित, अकाल से पीड़ित, दुर्भिक्ष से पीड़ित, दुःख से पीड़ित लोग मालदारों के दरवाजे पर खड़े हुए हैं, क्योंकि हम भूकम्प से पीड़ित हैं, क्योंकि हम बाढ़ से पीड़ित हैं, क्योंकि हम अभावग्रस्त हो गये हैं और हमारे घर वाले पानी में डूबे हुए पड़े हैं। इसलिए आप चलिए और हमारी सहायता कीजिए। वे लोग नहीं आयें। फिर कौन आये सहायता देने के लिए? वे आदमी गये, जिनके पास दिल था, जिनके पास भावनायें थीं, जिनके पास श्रम था और जिनके पास सहानुभूति थी।

🔶 मित्रो! वे लोग वहाँ चले गये, जहाँ पतन और पीड़ा ने उन्हें बुलाया था। जहाँ भूकम्प से पीड़ित, बाढ़ में डूबे हुए आदमी थे और अभाव में और बाढ़ में भरे हुए आदमी थे। वे वहाँ चले गये। कौन चले गये? वे आदमी, जिनको हम स्वयंसेवक कह सकते हैं, भावनाशील कह सकते हैं और दिलवाले कह सकते हैं। तो क्या उन्हें जाना चाहिए? हाँ बेटे, उन्हीं को जाना चाहिए, अन्यथा पीड़ा और पतन का निवारण कैसे होगा? छप्पर जल रहा है, तो जलता हुआ छप्पर किस तरह से आपके पास आयेगा कि आप हमारे ऊपर पानी डाल दीजिए। आपको ही भागना पड़ेगा और पानी डालने के लिए वहाँ जाना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

सोमवार, 15 जनवरी 2018

👉 नोक वाली पेंसिल

🔶 शिवांगी शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में कक्षा तृतीय की छात्रा है। वह भी अन्य बच्चियों की तरह चंचल, हंसमुख शरारती बच्ची है। दशहरे के बाद विद्यालय खुलने और नये गणित के टीचर आने के बाद से सबके लिये सबकुछ पहले की तरह सामान्य है, किन्तु शिवांगी के लिये उसका प्यारा स्कूल एक भयावह जगह बन गई है।

🔷 आज करीब एक माह से वो मासूम एक नारकीय कष्ट सह रही थी, जिस दिन से उसके गणित के सर ने खेल के लिये निर्धारित पीरियड में अकेले बुलाया। उसे गणित पढ़ाने पर पढ़ाने के बजाये बच्ची को एक नर्क से परिचय करा दिया साथ ही धमकी दी की किसी से कहा तो फेल कर स्कूल से निकाल देंगे, मासूम के लिये यह धमकी काफी थी। आज फिर वही हुआ वह रोती हुई बस में चढ़ी आश्चर्य किसी ने उसके रोने का कारण नहीं पूछा।

🔶 बस से उतर घर आने पर भी किसी ने उसके उदासी का कारण नही पूछा। पड़ोस वाले भैया आये थे जिद करके शिवांगी के तीन साल के भाई को उसकी मर्जी के खिलाफ गोदी में उठा बाहर ले जा रहे थे, बच्चे ने उनकी मनमानी के विरोध में हाथ में रखी पेंसिल उनकी आँख मे डाल दी। परिणाम जो हुआ अच्छा नहीं था सब उन भैया को लेकर अस्पताल भागे माँ और पिता दोनो ने भाई एक एक थप्पड़ मार कर उसे रोता छोड़ उन भैया के परिवार के साथ हो लिये। शिवांगी शायद अपने भाई के दर्द को समझ गई उसने उसे अपने से लिपटा लिया नन्ही दीदी कछ ही पल के लिये माँ बन गई।

🔷 आज सबेरे फिर स्कूल है, गणित के पिरियड में सर ने शिवांगी को फिर बुलाया है गणित समझाने। आज खाने की छुट्टी में शिवांगी ने टिफिन खाने से ज्यादा जरूरी समझा अपनी दोनों पेंसिल की नोक तेज धार करना। खेल के पीरियड में जब गणित के सर ने बुलाया वह गई पर आज की नन्ही शिवांगी और दिनों की तरह सहमी हुई नही थी आज वह आत्भविश्वास से भरी हुई थी, हाँ वह अपनी पेंसिल साथ लेना नही भूली। कुछ ही देर में गेम्सरूम से एक भयानक दिल दहलाने वाली चीख सुनाई दी, सारे शिक्षक गेम्स रूम की तरफ भागे आश्चर्य आज सबने चीख सुनी इतने दिन बच्ची की चीख किसी ने नही सुनी थी खैर।

🔶 गेम्स रूम का दृष्य चीख से भी भयावह था, गणित के सर अर्धनग्न अवस्था में अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर रखे चीख रहे थे जिनसे तेजी से खून बह रहा था, और उनके ठीक सामने नन्ही शिवांगी अपने फटे हुये यूनिफाॅर्म के साथ साक्षात शिव की अर्धांगिनी बन आँखों से आंसू की जगह अंगारे बरसाती अपनी पेंसिल रूपी रक्त से भरी त्रिशूल लिये गर्व से खड़ी थी।

🔷 सर गिरफ्तार हो गये अदालत मे किसी सबूत की जरूरत नहीं पड़ी, जज नया क्या न्याय करते। नन्ही शिवांगी स्वयं साक्षी, साक्ष्य और न्याय करता बन अदालत में खड़ी थी, उसने तो न्याय कर ही दिया था जज ने और दस साल की सजा सुना दी।

🔶 अब शिवांगी निश्चिंत होकर स्कूल जाती है पर साथ में दो अतिरिक्त तेज नोक वाली पेंसिल रखना नही भूूलती

🔷 हाँ उस विद्यालय की सभी छात्राओं की मायें अपनी बेटियों के पेंसिल बाॅक्स में तेज धार की हुई दो पेंसिल याद से रख देती है इस सीख के साथ कि यह सिर्फ पेंसिल नहीं वक्त आने पर तुम्हें दुर्गा बना खुद त्रिशूल बन जायेंगी।

👉 वेश्या से तपस्विनी

🔷 आम्रपाली नामक एक वेश्या भगवान् बुद्ध को भोजन का निमन्त्रण देने गई। उनने स्वीकार कर लिया, थोड़ी देर बाद वैशाली राजवंश के लिच्छवि राजकुमार आये और उनने राजमहल में चलकर भोजन करने के लिए प्रार्थना की तो उनने कहा- मैं अम्वपानी के यहाँ भोजन की स्वीकृति दे चुका हूँ। उनने मीठे चावल और रोटी की भिक्षा प्रेम पूर्वक ग्रहण की। कुछ समय बाद वह वेश्या भी बुद्ध भगवान् के उपदेशों से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।

🔶 पाप से घृणा करते हुए भी पापी से प्यार करके उसे सुधारा जा सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 16 Jan 2018


👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 4)

🔶 भारतीय दार्शनिकों ने मानसिक सुख-शांति का जो उपाय निर्देश किया है वह सत्य, शाश्वत, सार्वभौम, सार्वजनिक, सुलभ, सरल तथा सात्विकतापूर्ण है। उसका अवलम्बन लेकर क्या धनी, क्या निर्धन, क्या साधन सम्पन्न, क्या असावधान, क्या निर्बल सभी समान रूप से सुखी एवं शान्त रह सकते हैं। भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि सच्ची सुख शांति मन की मनमानी करने में नहीं। मन की इच्छाओं एवं लालसाओं की पूर्ति करते रहने से सुख-शान्ति की उपलब्धि कदापि नहीं हो सकती। सच्ची सुख-शान्ति की प्राप्ति मन का रंजन करने से नहीं उसका दमन करने, कामनाओं एवम् लालसाओं को कम करने से ही प्राप्त हो सकती है।

🔷 लालसाओं की ज्यों-ज्यों पूर्ति की जाती है तृष्णा बढ़ती जाती है, जिसका परिणाम असन्तोष एवं अशान्ति के सिवाय और कुछ नहीं होता। मन की लालसा अभिलाषा एक दो हों और वह उन पर स्थिर भी रहे तो सम्भव है कि उनकी पूर्ति की जा सके और मन शान्त एवं सन्तुष्ट रहे। किन्तु यह चंचल मन अनन्त एवं असीम अभिलाषाओं का अभियुक्त होता है, ऐसी दशा में उसे किसी प्रकार भी सुखी तथा सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। मानव मन की विवशता, विपरीतता तथा वितृष्णा स्पष्ट बतलाती है कि अपने सुख के लिये उसकी न तो कोई विशेष अभिलाषा होती है और न उसकी कोई एक ऐसी आकांक्षा होती है जिसकी पूर्ति से वह वास्तव में सुखी एवम् सन्तुष्ट हो सकता है।

🔶 यही नहीं उसका किसी विषय विशेष में भी अभिन्न योग नहीं होता, जिसके प्रसंग से वह सदा सर्वदा को सन्तुष्ट एवं सुखी हो सकता हो। मन प्रयत्नशील होता है वह अबोध बालकों अथवा शेखचिल्लियों की तरह क्षण भर में ‘वह-यह’ किया करता है। उसे डांट-डपट कर इस ‘यह-वह’ से मुक्त कर देना ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर देना है। इस प्रकार कहना न होगा कि भारतीय दार्शनिक द्वारा बताया हुआ उपाय मन का दमन ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर सकता है। निःसन्देह जिनका मन स्थिर एकाकांक्षी अथवा एक लक्ष्यीय होता है वे अवश्य ही अपेक्षाकृत अधिक सुखी तथा सन्तुष्ट रहा करते हैं। मन की विविधता, बहुलता एवम् चंचलता ही उसके दुःखी एवम् अशान्त होने का मूलभूत कारण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 Aruni and Upmanyu

🔷 This is a story about how Aruni and Upmanyu proved their credibility and thus obtained wisdom from their Guru. Aruni was a new entrant into Guru Dhoumya's monastery. He was confronted with a tough test the very first day. The Guru said to him, "Son, it is raining very hard. Will you please go and check that boundary of the paddy field is intact. Otherwise, all the rain water will be wasted." Aruni immediately got up and left for the field. He saw that in the heavy rain, the boundary was really damaged and all the water was flowing away.

🔶 He tried all means to stop the flow, but when nothing worked, he himself lay down across the boundary and blocked the flow with his body. When Aruni did not return the whole night, Guru Dhoumya got worried, and set out to look for him. When he reached the field, he saw Aruni lying unconscious stopping the water flow with his own body. Seeing this, the Guru's eyes were filled with tears. He brought Aruni back and treated him. Aruni had passed the test of trustworthiness in flying colors. The Guru then made him a master of spiritual wisdom in a very short time.

🔷 The Guru ordered his disciple Upmanyu to graze the cattle while studying. He deliberately did not make any arrangements for his sustenance. The disciple begged food from nearby households or drank cow's milk. But, Guru Dhoumya objected, saying, "Son, a disciple must follow the monastery's discipline and should not take anything without Guru's permission. Upamanyu vowed never take anything without Guru's permission. He went without food for several days and became very feeble. He finslly passed the test of credibility and became a great spiritual leader.

📖 From Pragya Puran

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (अन्तिम भाग)

🔶 यह ध्यान जो हम आपको बताते हैं-मेडिटेशन कराते हैं और कहते हैं कि अपने मन का बिखराव-फैलाव रोकिए। फैलाव के कारण न आपका विद्या पढ़ने में मन लगता है, न स्वास्थ्य संवर्द्धन में कभी मन लगता है। हर समय बिखराव ही बिखराव। यह जो मन की अस्त-व्यस्त स्थिति है, इसको आप इकट्ठा कीजिए भगवान के माध्यम से, जप के माध्यम से, ध्यान के माध्यम से और प्रत्येक काम को जब करना हो तो इतना तीखा अभ्यास डालिए कि जब जो काम करना पड़े उसी में तन्मय हो जाएँ। सांसारिक कार्य में भी और भगवान के कार्य में भी। यह एकाग्रता अध्यात्मिकता का गुण है।

🔷 आप जब भी जो भी काम करें उसमें इतने तन्मय हो जाएँ कि 'वर्क इन वर्क', 'प्ले इन प्ले' अर्थात जब आप खेलें तो इस कदर खेलें कि खेल के अतिरिक्त और कोई चीज ध्यान में ही न रहे और जब आप काम करें तो इस मुस्तैदी से काम करें कि काम के अलावा आपको कोई दूसरी चीज दिखाई ही न पड़े। इस तरह की तन्मयता के साथ किए गए काम सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। मित्रो, तन्मयता हमारे जीवन का वह वास्तविक स्वरूप होना चाहिए जो वैज्ञानिकों के पास होता है।

🔶 वैज्ञानिकों में और साधारण बी० एस० सी० में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, दोनों एक जैसे होते हैं। वैज्ञानिक उसे कहते हैं जो अपने रिसर्च कार्य में जब लगता है तो इतना गहरा डूबता हुआ चला जाता है जैसे मोती ढूँढ़ने के लिए पनडुब्बी सागर में गहराई तक चला जाता है और उसको बीन करके ले आता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। आपको एकाग्रता केवल भजन में ही नहीं लानी है, वरन हर काम में इसका अभ्यास करना है।
 
🔷 एकाग्रता का अभ्यास न होने के कारण ही सदैव यह शिकायत बनी रहती है कि गुरुजी हमारा मन भजन-पूजन में नहीं लगता। तो क्या किसी काम में आपकी एकाग्रता होती है? हर काम में बिखराव है। आप अपने मन को निग्रहीत करना सीखिए। जब जो काम करना हो, तब उसमें इतनी मुस्तैदी से तन्मय होना सीखिए ताकि आप जब भजन करना शुरू करें तो भजन में भी उतनी तन्मयता हो जाए जितनी एक योगी की होती है। यदि आपने प्रकाश का ध्यान करना सही तरीके से सीख लिया तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जो एक अध्यात्मवादी को प्राप्त करना चाहिए।
 
ॐ शान्तिः
 
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 18)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्

🔷 गुरुगीता की भक्ति कथा गुरुभक्तों के  लिए अमृत सरोवर है। इसके अवगाहन से मिलने वाले भक्ति-संवेदन गुरु भक्त साधक को सहज ही  सद्गुरु कृपा का संस्पर्श करा देते हैं। परम कृपालु सद्गुरु की कृपा साधक के सभी दोष-दुर्मति जन्य विकारों का हरण करके उसे जीवन के परमलक्ष्य की प्राप्ति करा देती है। इसी सत्य को दर्शाते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने एक स्थान पर कहा है-

तुलसी सद्गुरु त्यागि कै, भजहि जे पामर भूत।
अंत फजीहत होहिं गे, गनिका के से पूत॥

🔶 जो पामर मनुष्य परम कृपालु सद्गुरु और उनके बताए साधन मार्ग को छोड़ कर तंत्र-मंत्र भूत-प्रेतों में उलझे रहते हैं, उनकी अन्त में भारी फजीहत होती है। वे गणिका पुत्र की भाँति हर कहीं दुत्कारे और फटकारे जाते हैं।

🔷 सद्गुरु की कृपा साधक का परम आश्रय है। इस तत्त्व की अनुभूति कैसे और किस तरह हो यही तो गुरुगीता के प्रत्येक मंत्र में उद्घाटित हो रहा है। पिछले मंत्र में भगवान् सदाशिव ने जगन्माता पार्वती को बताया कि गुरु चरणामृत की महिमा अतुलनीय है। गुरु प्रसाद श्रेष्ठतम है। गुरु का सान्निध्य ही पवित्र काशीधाम है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वेश्वर हैं। वही तारक ब्रह्म है। अक्षयवट और तीर्थराज प्रयाग भी वही है। भगवान् महादेव एक ही सत्य को बार-बार सुनाते हैं, बताते हैं, समझाते हैं- अन्यत्र कहीं भटको मत, अन्यत्र कहीं उलझो मत, अन्यत्र कहीं अटको मत। उन्हीं की शरण गहो, जिन्होंने तुम्हें मंत्र का दान दिया, जिन्होंने जीवन की राह दिखाई। जो हर पल, हर क्षण अपनी अजस्र कृपा तुम पर बरसाते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 33

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Jan 2018


रविवार, 14 जनवरी 2018

👉 कुत्ते में भगवान्

🔷 पढरपुर में कातिकी का मेला लगा। भक्त नामदेव भी वहाँ पधारे वे भोजन बना रहे थे कि एक कुत्ता उनकी रोटियाँ उठाकर भागा। नामदेव उसके पीछे-पीछे घी की कटोरी भी लेकर भागे कि- भगवान्, रूखी रोटी मत खाओ मेरे पास यह घी बचा है इससे उन्हें चुपड़ भी लो, कुत्ता रुका, नामदेव ने उसकी रोटियाँ चुपड़ दी और उसने उन्हें प्रेम पूर्वक खाया। भक्तों ने अपने दिव्य चक्षुओं से स्पष्ट देखा कि कुत्ते के रूप में भगवान पढरीनाथ ही विराजमान थे। सच्चा भक्त वह है जो प्राणिमात्र में भगवान् का दर्शन करे।

👉 'आप दीपक बनो'

🔶 भगवान बुद्ध जब मृत्युशय्या पर अंतिम सांसें गिन रहे थे कि किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। गौतम बुद्ध ने अपने नजदीक बैठे शिष्य आनंद से पूछा, 'आनंद कौन रो रहा है।'

🔷 आनंद ने कहा, 'भंते! भद्रक आपके अंतिम दर्शन के लिए आया है।' बुद्ध ने कहा, 'तो उसको मेरे पास बुला लो। आते ही भद्रक फूट-फूट कर रोने लगा, उसने कहा आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखाएगा।'

🔶 बुद्ध ने भद्रक से कहा, 'भद्रक प्रकाश तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जो अज्ञानी है इसे देवालयों, तीर्थों, कंदराओं या गुफाओं में भटकते हुए खोजने का प्रयत्न करते हैं। वे अंत में निराश होते हैं। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर जो साधना में निरंतर लगे रहते हैं।'

🔷 उनका अंतः करण स्वयं दीप्त हो उठता है। इसलिए भद्रक, 'आप दीपक बनो।' यही मेरा जीवनदर्शन है जिसे मैं आजीवन प्रचारित करता रहा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Jan 2018

🔶 अनन्य भाव से परमात्मा की उपासना शरणागति का मुख्य आधार है। ईश्वर के समीप बैठने से वैसे ही दिव्यता उपासक को भी प्राप्त होती है साथ ही उसके पाप- सन्ताप गलकर नष्ट होने लगते हैं। नित्य- निरन्तर यह अभ्यास चलाने से ही जीवन में वह शुद्धता आ पाती है, जो पूर्ण शरणागति के लिये आवश्यक होती है।

🔷 संगठन, सामूहिकता, एकता, कौटुम्बिकता और मिल- जुलकर रहने की अभिरुचि जितनी अधिक विकसित होगी, समाज की समर्थता, सभ्यता उसी क्रम में बढ़ती जायेगी। आज इन स्वस्थ परम्पराओं का भारी अभाव है। हमें समाज का नया निर्माण करने के लिये प्रचलित अवांछनीय प्रथाओं के विरुद्ध विरोध, संघर्ष का झंडा खड़ा करना पड़ेगा और स्वस्थ परम्पराओं को प्रतिष्ठापित करने का भागीरथी प्रयत्न करना पड़ेगा, तभी हम अपने समाज को देवोपम और सुख- शान्ति का केन्द्र- बिेन्दु बना सकने में समर्थ हो सकेंगे।

🔶 जीवात्मा सत्य है- शिव है और सुन्दरता से युक्त भी। उसी के शक्ति एवं प्रकाश की छाया से बहिर्जगत यथार्थ लगता है। सत्य और शिव से, सुन्दरता से युक्त जीवात्मा की प्रतिच्छाया मात्र से यह संसार इतना यथार्थ सुन्दर एवं आनंद दायक लगता है, फिर उसका शाश्वत स्वरूप कितना सुन्दर, चिरन्तन आनन्द देने वाला होगा, इसकी कल्पना मात्र से मन एक अनिवर्चनीय आन्द से पुलकित हो उठता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 3)

🔶 इस सत्य का यदि पाश्चात्य मनोवेत्ताओं के पास कोई उत्तर हो सकता है तो केवल यह है कि मन को प्रसन्न करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि उसकी लालसाओं की पूर्ति करने का यथासाध्य प्रयत्न किया जाये। जो जिस सीमा तक इस प्रयत्न में सफल होता रहेगा वह उस सीमा तक सुखी एवं सन्तुष्ट रहेगा और जो जितनी सीमा तक असफल होगा वह उस सीमा तक दुःखी एवं अशांत रहेगा। उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

🔷 क्या पाश्चात्य मानस-वेत्ताओं का यह उत्तर उपयुक्त माना जा सकता है? इसका तो ठीक-ठीक आशय यह है कि जो अधिक शक्तिशाली, साधन सम्पन्न तथा चतुर है वह वांछाओं को किसी प्रकार भी पूरी कर सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है और जो सामान्य जन जिनके पास शक्ति, साधन तथा चातुर्य की कमी है वे दुःख की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ही पड़े-पड़े रोते-कलपते रहेंगे। सुखी होने का यह उपाय शाश्वत, सार्वजनिक तथा सभ्यतापूर्ण नहीं है। निःसन्देह इसी प्रकार के दृष्टिकोण ने संसार में स्वार्थ, संघर्ष, शोषण तथा साम्राज्यवाद को जन्म दिया और बढ़ाया है। संसार में फैले अन्याय, अत्याचार तथा अनैतिकता का उत्तरदायी भी यही दूषित दृष्टिकोण ही है।

🔶 इसके अतिरिक्त इस पाश्चात्य कथन में सत्य का अंश भी नहीं है। यदि धन, धाम, वैभव-विभूति, साधन-सुविधा, वस्तुयें एवं उपादान संचय कर लेने से कोई सुख का अधिकारी बन सकता होता तो संसार का कोई भी साधन सम्पन्न व्यक्ति दुःखी अथवा असन्तुष्ट नहीं दिखाई देता। उसका जीवन शांतिपूर्वक शरद-सरिता की तरह निर्विकार रूप से आनन्द कलरव के साथ कल्लोल करता हुआ बहता चला जाता। इसके विपरीत असाधनवानों का कभी मानसिक समाधान ही न होता। वे सर्वदा क्षण-प्रतिक्षण अशान्ति एवं असुख के अनुपात में जलते मरते रहते। जबकि ऐसा देखने में नहीं आता। एक से एक बढ़कर सम्पन्न व्यक्ति दुःखी और एक से एक असम्पन्न व्यक्ति सुखी एवं असन्तुष्ट देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 Sacrifice-Dedication (Last Part)

🔷 A little story of Ravindra Nath Tagore, listen. R N Tagore sang a song, a poem,’ I tapped each door to beg, I filled my bag with grains. One beggar came to me and asked me to give him something from that bag.’’ R N Tagore in that important poet has written, ‘‘I gathering great courage drew one seed of grain to place the same in the palm of that beggar who went back smiling and I came back to my home.’’  R N Tagore sang, ‘‘I overturned the bag but was surprised to see that it contained one seed of gold also. Seeing that bead of gold I burst into tears. I said, had I given all the seeds of grain to that beggar, my bag would have been full of golden beads.’’ Well, this is the net outcome of my life; this is the conclusion of my austere-measures; this is the culmination of my UPASANA, SADHANA and ARADHANA.

🔶  I offered all my bag, time, money, brain, mind and power in the feet of BHAGWAN. This led BHAGWAN also to make all his RIDDHI, SIDDHI available for my use. I continued to say, ‘‘I don’t need your RIDDHIs.’’ He in turn kept saying, I don’t need your money.’’ I kept saying, I don’t need you’re your SIDDHIs.’’ He in turn kept saying, I don’t need your glory.’’ Thus went on this Give and Take between me and my BHAGWAN. I am sure you too do like that but then what goes wrong with you is the technique, the method and the mechanism of doing all that. Friends, I am sure by now you are not in position to identify your BHAGWAN, whereas I have found it in the form of Resonance (PRATID-DHWANI) & Reflection (PRATICH-CHCHAYA).
                                      
🔷 Friends! This is how jostling has been taking place between us (me & BHAGWAN). Had I been approaching the life in a different way to say, ‘‘O BHAGWAN, tell what you have to give me, do you have what I need?’’ in turn BHAGWAN would have said to me, ‘‘No, I will not give you a bit. First you tell me what you have to give me.’’ Had I been doing like this, I too would have been jostling like all of you that would have led me to nowhere.
                              
🔶  I wish such a clash to be necessarily initiated between you and BHAGWAN so that you too start enjoying spirituality like I have been. I wish you to be blessed in very this birth as I am departing after having enjoyed for 60 years my life led by spirituality. 

Finished, today’s session.
================OM SHANTI==============

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 9)

🔶 प्यार, मित्रो किसे कहते हैं, आप जानते नहीं हैं। प्यार एक ही चीज का नाम है, जिसमें आदमी को दिया जाता है। प्यार का अर्थ देना होता है। जिसको भी हम प्यार करते हैं उसको हम कुछ दिए बिना नहीं रह सकते। हम बच्चे को प्यार करेंगे तो उसको कुछ देंगे। जिस किसी को भी प्यार करेंगे उसको हम देंगे। भक्तियोग का अर्थ है-दया, भक्तियोग का अर्थ है-करुणा, भक्तियोग का अर्थ है-प्रेम, भक्तियोग का अर्थ है सेवा। नहीं महाराज जी सेवा का अर्थ होता है-मूर्ति पर टन-टन घंटी बजा दी, बस हो गई नवधा भक्ति। तो यही है तेरी नवधा भक्ति-कौन सी-'पाद सेवनम् पंखाझलनम्'-पाद सेवन और पंखा झलने को ही नवधा कहता है। जो बातें भक्ति की हैं उनसे तो हजारों मील दूर भागते रहते हैं और स्वांग करते रहते हैं, खेल-खिलौने बनाते रहते हैं। दंड-कमंडल पेलते हैं और भगवान को भी धोखा देते हैं और अपने को भी धोखा देते हैं और कहते हैं कि नवधा भक्ति करते हैं। बेटे, इसे नवधा भक्ति नहीं कहते।
 
🔷 मित्रो, क्या करना पड़ेगा? भक्तियोग के उस वास्तविक स्वरूप को समझना पड़ेगा जिसके लिए हमने आपको बताया था कि आप प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। प्रकाश का ध्यान करेंगे तब फिर आपको वहाँ चलने का मौका मिल जाएगा, जहाँ कि 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की बात बताई थी। एकाग्रता ध्यान का एक उद्देश्य है। बिखराव को रोकना भी कह सकते हैं, क्योंकि हमने अपने आप को सब जगह बिखेर दिया है। यदि हमने अपने आप को एक लक्ष्य पर केंद्रीभूत किया होता तो बंदूक की नली में से बारूद जिस तरीके से एक दिशा में चली जाती है और लक्ष्य भेद करने में सफल होती है, हम भी अपने जीवनलक्ष्य में सफल हो गए होते।

🔶 अर्जुन ने अपने बिखराव को एक केंद्र पर इकट्ठा कर लिया था। द्रौपदी-स्वयंवर में जब वह गया था तो द्रोणाचार्य ने लोगों से पूछा था कि क्या दिखाई पड़ता है? किसी ने कहा-मछली की पूँछ, तो किसी ने कहा-मछली की टाँग, मछली का पेट। तो आचार्य द्रोण ने कहा-आप मछली का निशाना नहीं बेध सकते, भागिए यहाँ से। फिर अर्जुन से पूछा कि आपको क्या दिखाई पड़ता है? अर्जुन ने कहा-हमें एक ही चीज दिखाई पड़ती है और वह है मछली की आँख। तो मारिए निशाना और सफलता का वरण कीजिए। मित्रो, असंख्य दिशाओं में फैला हुआ हमारा मस्तिष्क कभी सफलता नहीं सा सकता। इसे एक दिशा में इकट्ठा कीजिए।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 17)

👉 साक्षात् भगवान् विश्वनाथ होते हैं—सद्गुरु

🔷 श्रद्धालुजनों में काशीवास के प्रति गहरी आस्था है। लोग वृद्धावस्था में घर-परिवार के मोह को छोड़कर काशी जाकर रहा करते थे। क्योंकि शास्त्र-पुराण सभी एक स्वर से कहते हैं कि काशीवास करने से काशी में जाकर शरीर छोड़ने से फिर से जीवन भवबन्धनों में नहीं पड़ता। भगवान् भोलेनाथ उसे मुक्ति प्रदान करते हैं। वही सभी जनों के मुक्तिदाता कृपालु भोलेनाथ माता पार्वती से गुरुगीता में कहते हैं कि गुरुधाम किसी भी तरह से काशी से कम नहीं है। गुरु जहाँ भी रहते हैं, वहीं काशी है। इस काशी के विश्वनाथ स्वयं गुरु हैं। वही साक्षात् तारक ब्रह्म का स्वरूप है। उनकी कृपा से शिष्य को अनायास और अप्रयास ही मुक्ति लाभ होता है। गुरुचरणों का जल ही इस काशी में गंगा की जलधारा है। जिसका एक कण भी जीवों को त्रिविध तापों से छुटकारा देता है।

🔶 भगवान् सदाशिव इस प्रकरण को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि गुरुदेव का चरणोदक काशी तीर्थ तो है ही, गयातीर्थ भी है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी जन गया की महिमा से परिचित हैं। गया वह पवित्र क्षेत्र है, जहाँ प्रेतात्माओं को मुक्ति मिलती है। पुराणों में कथा है कि भगवान् विष्णु ने यहाँ पर गयासुर का वध किया था। असुर होने के बावजूद गयासुर के मन में भगवान् के प्रति भक्ति भी थी। इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उससे वरदान माँगने के लिए कहा। तब गयासुर ने सृष्टि के पालनहार विष्णु से यह वर माँगा कि प्रभु यहाँ जो भी अपने पितरों का श्राद्ध करे अथवा प्रेतयोनि में किसी भी आत्मा के लिए कोई यहाँ श्राद्ध संकल्प करे, तो उन पितर और प्रेत आत्माओं की मुक्ति हो जाए।

🔷 गुरुचरणों और चरण जल का प्रभाव भी कुछ ऐसा ही है। गुरुचरण केवल गुरुभक्त शिष्य के लिए ही  कल्याणकारी नहीं है; बल्कि उनके लिए भी कल्याणकारी है, जिनके कल्याण की कामना उस शिष्य के मन में उठती है। अपने गुरु का सच्चा शिष्य जिस किसी के लिए भी कल्याण की प्रार्थना करेगा, उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहेगा। गुरुदेव के चरणों का सान्निध्य अक्षय वट एवं तीर्थराज प्रयाग की भाँति है, जहाँ की गयी थोड़ी सी भी साधना अनन्त गुना फलवती हो जाती है। यहाँ थोड़े से भी शुभकर्म अपरिमित एवं असीम फलदायी होते हैं। ऐसे कृपालु गुरुदेव के चरणों में साधक-शिष्यों का बार-बार नमन कल्याणकारी है।

🔶 कृपालु गुरुदेव की महिमा का अथ-इति से रहित अनन्त स्वरूप भगवान् भोलेनाथ के सिवा और कौन जान सकता है। सद्गुरु का स्मरण-चिन्तन ही शिष्य के लिए महासाधना है। जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 31

शनिवार, 13 जनवरी 2018

👉 नन्हीं चिड़िया

🔶 बहुत समय पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था। एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी| सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा?

🔷 थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी अपनी जान बचाने में लगा हुआ था। उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी उसने देखा क़ि सभी लोग भयभीत हैं जंगल में आग लगी है मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए।

🔶 यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी। वह बार बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती| पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला क़ि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है।

🔷 यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है।

🔶 चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया- “मुझे पता है कि मेरे इस प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से प्रयास करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूँगी”

🔷 उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ।

🔶 तो मित्रों यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। जब कोई परेशानी आती है तो इंसान घबराकर हार मान लेता है लेकिन हमें बिना डरे प्रयास करते रहना चाहिए यही इस कहानी की शिक्षा है।

👉 कोढ़ी का अभ्युत्थान

🔷 बंगाल के राजमहल जिले के रूप और सनातन नामक दो भगवद् भक्त हुए है। सनातन को कोढ़ था। चैतन्य महाप्रभु से सनातन की भेंट हुई, उन्हें मालूम हुआ कि यह भगवद् भक्त है तो उन्होंने यह जानते हुए भी कि यह कोढ़ी है, उठा कर छाती से लग लिया। कोढ़ का मवाद उनके शरीर पर लग गया तो भी उनने उससे किसी प्रकार की घृणा न की। उन्होंने सनातन को पढ़ाया भी। उस शिक्षा के आधार पर सनातन ने भक्ति रस के कई ग्रन्थ भी लिखे। कोढ़ी होते हुए भी वे महान भगवद् भक्त बन सके।

🔶 पतित और तुच्छ दीखने वाले में भी कितनी ही ऐसी आत्माऐं होती है जिन्हें उत्कर्ष का अवसर मिले तो वे महान बन सकती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 Jan 2018


👉 घृणा का स्थान

🔶 निंदा, क्रोध और घृणा ये सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इन दुर्गुणों को निकल दीजिए, तो संसार नरक हो जायेगा। यह निंदा का ही भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है। यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पाखंड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की धाक न हो तो जीवन विश्रृंखल हो जाय और समाज नष्ट हो जाय। इनका जब हम दुरुपयोग करते हैं, तभी ये दुर्गुण हो जाते हैं, लेकिन दुरुपयोग तो अगर दया, करुणा, प्रशंसा और भक्ति का भी किया जाय, तो वह दुर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थ-हीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त। प्रकृति जो कुछ करती है, जीवन की रक्षा ही के लिए करती है।

🔷 आत्म-रक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी भावनाएँ और मनोवृत्तियाँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। कौन नहीं जानता कि वही विष, जो प्राणों का नाश कर सकता है, प्राणों का संकट भी दूर कर सकता है। अवसर और अवस्था का भेद है। मनुष्य को गंदगी से, दुर्गन्ध से, जघन्य वस्तुओं से क्यों स्वाभाविक घृणा होती है? केवल इसलिए कि गंदगी और दुर्गन्ध से बचे रहना उसकी आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक है। जिन प्राणियों में घृणा का भाव विकसित नहीं हुआ, उनकी रक्षा के लिए प्रकृति ने उनमें दबकने, दम साथ लेने या छिप जाने की शक्ति डाल दी है। मनुष्य विकास-क्षेत्र में उन्नति करते-करते इस पद को पहुँच गया है कि उसे हानिकर वस्तुओं से आप ही आप घृणा हो जाती है। घृणा का ही उग्र रूप भय है और परिष्कृत रूप विवेक। ये तीनों एक ही वस्तु के नाम हैं, उनमें केवल मात्रा का अंतर है।

🔶 तो घृणा स्वाभाविक मनोवृति है और प्रकृति द्वारा आत्म-रक्षा के लिए सिरजी गयी है। या यों कहो कि वह आत्म-रक्षा का ही एक रूप है। अगर हम उससे वंचित हो जाएँ, तो हमारा अस्तित्व बहुत दिन न रहे। जिस वस्तु का जीवन में इतना मूल्य है, उसे शिथिल होने देना, अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना है। हममें अगर भय न हो तो साहस का उदय कहाँ से हो। बल्कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप ही साहस है। जरूरत केवल इस बात की है कि घृणा का परित्याग करके उसे विवेक बना दें। इसका अर्थ यही है कि हम व्यक्तियों से घृणा न करके उनके बुरे आचरण से घृणा करें। धूर्त से हमें क्यों घृणा होती है? इसलिए कि उसमें धूर्तता है। अगर आज वह धूर्तता का परित्याग कर दे, तो हमारी घृणा भी जाती रहेगी।

🔷 एक शराबी के मुँह से शराब की दुर्गन्ध आने के कारण हमें उससे घृणा होती है, लेकिन थोड़ी देर के बाद जब उसका नशा उतर जाता है और उसके मुँह से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है, तो हमारी घृणा भी गायब हो जाती है। एक पाखंडी पुजारी को सरल ग्रामीणों को ठगते देखकर हमें उससे घृणा होती है, लेकिन कल उसी पुजारी को हम ग्रामीणों की सेवा करते देखें, तो हमें उससे भक्ति होगी। घृणा का उद्देश्य ही यह है कि उससे बुराइयों का परिष्कार हो। पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवृत्तियों के प्रति हमारे अंदर जितनी ही प्रचंड घृणा हो उतनी ही कल्याणकारी होगी। घृणा के शिथिल होने से ही हम बहुधा स्वयं उन्हीं बुराइयों में पड़ जाते हैं और स्वयं वैसा ही घृणित व्यवहार करने लगते हैं। जिसमें प्रचंड घृणा है, वह जान पर खेलकर भी उनसे अपनी रक्षा करेगा और तभी उनकी जड़ खोदकर फेंक देने में वह अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। महात्मा गाँधी इसलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछूतपन से प्रचण्ड घृणा है।

🔶 जीवन में जब घृणा का इतना महत्व है, तो साहित्य कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता है, जो जीवन का ही प्रतिबिंब है? मानव-हृदय आदि से ही सु और कु का रंगस्थल रहा है और साहित्य की सृष्टि ही इसलिए हुई कि संसार में जो सु या सुंदर है और इसलिए कल्याणकर है, उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पन्न हो और कु या असुंदर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा। साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है। कु और सु का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है। प्राचीन साहित्य धर्म और ईश्वर द्रोहियों के प्रति घृणा और उनके अनुयायियों के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भावों की सृष्टि करता रहा।

✍🏻 प्रेमचंद

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 2)

🔶 इस विषय में पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों से भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि जीव अर्थात् मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति सुखमय है। उसका सत्य रूप आनन्दस्वरूप है। संसार की बाधायें माया जन्य हैं जो दुःख रूप में मानव मन पर आरोपित होती हैं। यदि जीव अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करले तो दुःख की सारी अनुभूतियों का अत्यन्ता भाव हो जाये, फिर वह न तो कभी दुःखी हो और न पीड़ित।

🔷 इस प्रश्न के उत्तर में कि जब संसार में शोक संघर्षों का अस्तित्व स्थायी है और मनुष्य सांसारिक प्राणी है तो उसे सुख प्राप्ति ही किस प्रकार हो सकती है। उसके भाग्य में मानो सदा सर्वदा के लिए दुःख शोक ही अंकित हो गये हैं।—उत्तर में आधुनिक मानस वेत्ताओं का उत्तर है कि मानव-मन की कुछ अभिलाषायें होती हैं, इच्छायें तथा कामनायें होती हैं। जिनकी पूर्ति के लिये वह लालायित रहता है। अपनी कामनाओं की आपूर्ति में ही मन को दुःख तथा अशांति होती है। यदि उसकी लालसाओं, अभावों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे तो मन के दुःखी अथवा अशान्त होने का कोई कारण ही उपस्थित न हो। इसलिये मनुष्य को सुखी होने अथवा मन को सुखी करने के लिये उसी दिशा में बढ़ना होगा जिस दिशा में उसकी लालसाओं का पूर्ति-लाभ हो। मन जो कुछ चाहता है वह उसे मिल जाये तो निश्चय ही वह सुखी एवं सन्तुष्ट रहे।

🔶 सुनने में तो पाश्चात्यों का यह उत्तर बड़ा सीधा, सरल तथा समीचीन मालूम होता है पर भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार वह वैसा है नहीं। उनका कहना है कि मनुष्य का मन-मानस हर समय तरंगित होता रहता है। उसकी हर तरंग की तृप्ति नहीं की जा सकती। मनुष्य के चंचल मन की वासनाओं, कामनाओं, इच्छाओं, अभिलाषाओं तथा लालसाओं का वारापार नहीं। एक की पूर्ति होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। साथ ही चंचल मन में असन्तोष का एक दोष रहता है। किसी विषय की कामना करने पर यदि वह उसे मिल भी जाये तो वह उससे तृप्त नहीं होता, उसे ‘और-और’ का दौरा जैसा पड़ने लगता है। इस प्रकार वह विषय की पूर्ति में भी असन्तुष्ट एवं अशान्त रहने लगता है, और यदि एक बार उसकी और, और की तृष्णा भी बहुतायत से पूरी की जा सके तो उसे शीघ्र ही उस विषय से अरुचि होने लगती है और वह नवीन विषय के लिये उत्सुक हो उठता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8
http://awgpskj.blogspot.in/2018/01/1_12.html

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.8

👉 Sacrifice-Dedication (Part 1)

🔷 I have been sharing with you the knowledge; I have gained from this world. I have talking to you the whole night; I, seated beside you, have been caressing, telling you lullaby, while you have been in sleep and many other things I have been doing to you. I have been for long trying to convince you. O men! My friends! Will you not see me? Will you continue to treat me like a teacher blessing his pupils? I am a burning man; I am a right man. Would you too not become a burning man? Can’t you induce a fire within you to ignite the fires of knowledge within many others?

🔶  I have been explaining so many things. I have been using my all the four voices-PARAA, PASHAYANTI, MADHYAMAA & BAIKHARI. I have been speaking through your soul, heart, brain and ears. You go and go with my voice impressed in your mind. I am not going to leave you. I will be talking to you, quarreling with you, wherever I live. I will stop saying only when you begin to proceed on my path, the path I have been heading on the advice of my GURUDEV. I spent all my life on his hints.
                                                 
🔷 I wish your time, sweat and money to be spent for the divine cause for which I have been born and for which I have lived my life, for the works which are for the welfare of the world that is uplifting of humanity. For this very reason I have been asking you to do a minor SADHANA in which you are expected to spend 10 paisa per day and time of 1 hour per day. These were little things to begin with, which I have been regularly saying to you but in days to come you will have to dedicate all you have at your disposal in the feet of BHAGWAN, as I have done so that you become eligible to have all that BHAGWAN has.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 8)

🔶 हम किसी से प्यार करते हैं क्या? नहीं, हम किसी से प्यार नहीं करते। बीबी से प्यार करते हैं? नहीं। बीबी के लिए तो हम जोंक है। खून की प्यासी जोंक जिससे चिपकती है उसका खून पी जाती है। औरत के लिए तो हम जोंक हैं। उसकी जवानी हमने चूस ली। उसको छूँछ बना दिया। पचासों बीमारियों की वह मरीज बन गई है। उसके पास जो कुछ भी था, अपने माँ-बाप के घर से गुलाब का सा शरीर लेकर आई थी हमने उसको वासना की आग में जला दिया। वह जली हुई औरत कराहती, कसकती, सिसकती हुई पड़ी रहती है। जल्लाद छुरे लेकर के जिस तरह से मारता है, हमने भी अपनी औरत में इतने छुरे मारे कि सारा का सारा खून निकाल करके फेंक दिया।

🔷 बच्चे पर बच्चा पैदा करते रहे और वह चिल्लाती रही कि हमारी हड्डियाँ इस लायक नहीं हैं और हमारे पास माँस उतना नहीं है, कृपा कीजिए अब हम बच्चा पैदा नहीं कर सकते और आप हैं कि बच्चे पैदा करते चले गए। वह हजार बीमारियाँ लेकर के कभी हकीम जी के यहाँ चक्कर काटती है, कभी आचार्य जी के यहाँ चक्कर काटती है और कहती है कि गुरुजी यह बीमारी है, वह बीमारी है। अगर आपने अपनी स्त्री को प्यार किया होता तो उसको पढ़ाया होता, शिक्षा दी होती, दीक्षा दी होती। उसके स्वास्थ्य की रखवाली की होती और उसको सुयोग्य बनाया होता, उसको विकसित किया होता और श्रेष्ठ बनाया होता, पर अब तो वह किसी काम की नहीं बची।
 
🔶 प्यार है आपके पास? भक्ति है आपके पास? नहीं है। अगर भक्ति और प्यार रहा होता तो आपने अपने माँ-बाप की सेवा को होती। बहन-भाइयों की सेवा की होती। अपने बच्चों की सेवा की होती। नहीं, गुरुजी हमने तो की है। बेटे आप सेवा करना नहीं जानते। प्यार करना जानते ही नहीं हैं। आप तो एक ही बात जानते हैं-पैसा। बेटे को पैसा दे जा। अरे क्यों पड़ा हुआ है इन बच्चों के पीछे। इनका भविष्य खराब करने के लिए पैसा जमा करता चला जा रहा है, क्या इनको शराबी बनाएगा, ऐय्याश बनाएगा? दुराचारी बनाएगा? क्या बनाएगा? नहीं, महाराज जी मैं तो पैसा छोड़ करके जाऊँगा, बेटे को देकर के जाऊँगा और वह सारी को मारी जिंदगी मौज करेगा। बेटे वह मौज नहीं अपनी जिन्दगी खराब करेगा और सबका सत्यानाश करेगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 16)

👉 साक्षात् भगवान् विश्वनाथ होते हैं—सद्गुरु

🔶 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना का परम रहस्य है। इसे जानने वाला जीवन की सारी भटकन से क्षण में ही उबर जाता है। जब समर्थ सद्गुरु के चरणों का आश्रय सुलभ हो, तब भला और कहीं भटकने से क्या फायदा? दयामय गुरुदेव के चरणों की महिमा की कथा उपर्युक्त मंत्रों में कही गयी है। इसमें भगवान् महादेव ने माता पार्वती को बताया  है कि सद्गुरु के चरणों के जल से किस तरह से साधक को यौगिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। किस तरह उसमें ज्ञान-वैराग्य आदि गुणों का विकास होता है। शिष्य के अन्तर्मन में ज्यों-ज्यों गुरु भक्ति प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों उसका अन्तःकरण ज्ञान के प्रकाश से भरता जाता है। ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ शिष्य के साधनामय जीवन का एक मात्र सत्य है।
इसे समझाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगदम्बा पार्वती से आगे कहते हैं-

गुरोः पादोदकं पीत्वा गुरोरुच्छिष्टभोजनम्।
गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुमन्त्रं सदा जपेत्॥ १५॥
काशीक्षेत्रं तन्निवासो जाह्नवी चरणोदकम्।
गुरुःविश्वेश्वरः साक्षात् तारकं ब्रह्मनिश्चितम्॥ १६॥
गुरोः पादोदकं यत्तु गयाऽसौ सोऽक्षयोवटः।
तीर्थराज प्रयागश्च गुरुमूर्त्यै नमोनमः॥ १७॥

🔷 गुरु भक्त साधक की समर्थ साधना का सार इतना ही है कि वह गुरु चरणों के जल (चरणामृत) को पिए। गुरु को पहले भोज्य पदार्थों को समर्पित कर बाद में स्वयं उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करे॥ १५॥ गुरु का निवास ही मुक्तिदायिनी काशी है। उनका चरणोदक ही इस काशीधाम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरने वाला गंगाजल है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वनाथ हैं। वही साक्षात् तारक ब्रह्म हैं॥ १६॥ गुरुदेव का चरणोदक गया तीर्थ है। वह स्वयं अक्षयवट एवं तीर्थराज प्रयाग है। ऐसे सद्गुरु भगवान् को प्रणाम करना, नमन करना ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है॥ १७॥

🔶 इन मंत्रों के भाव गहन हैं, पर इनकी साधना अति सुगम और महाफलदायी है। जब सर्वदेव देवीमय कृपालु सद्गुरु का सान्निध्य हमें सुलभ है, तब अन्यत्र क्यों भटका जाए? गुरुदेव का चरणोदक महाप्रभावशाली है। यह सामान्य जल नहीं है। इसमें तो उनकी तप चेतना घुली रहती है। गुरुदेव जब स्थूल कलेवर में नहीं हैं, तब ऐसी स्थिति में जल पात्र में उनके चरणों की भावना करते हुए चरणोदक तैयार किया जा सकता है। इसका पान साधक के हृदय में भक्ति को प्रगाढ़ करता है। इसी तरह साधक का भोजन भी गुरुदेव का प्रसाद होना चाहिए। स्वयं भोजन करने से पहले गुरुदेव को भोग लगाए। मन ही मन सभी भोज्य पदार्थों को उन्हें अर्पित करे। प्रगाढ़ता से भावना करे कि कृपालु गुरुदेव हमारे द्वारा अर्पित पदार्थों को ग्रहण कर रहे हैं। बाद में उस भोजन को उनका प्रसाद समझ कर ग्रहण करे।

🔷 मनुष्य शरीर में होने पर भी सद्गुरु कभी भी सामान्य मनुष्य नहीं होते। वह तो परमात्म चेतना का घनीभूत रूप है। उनका निवास शिष्यों के लिए मुक्तिदायिनी काशी है। इस कथन में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है; क्योंकि सद्गुरु जहाँ रहते हैं, वहाँ उनकी तपश्चेतना का घनीभूत प्रभाव छाया रहता है। न जाने कितने देवी-देवता, ऋषि-महर्षि सिद्धजन उनसे मिलने के लिए आते हैं। उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा भी उस क्षेत्र में घुलती रहती है। इस समस्त ऊर्जा की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया अपने आप ही वहाँ रहने वालों पर पड़ती रहती है। जिनका हृदय अपने गुरु के प्रति भक्ति से भरा है। जो गुरुदेव की चेतना के प्रति ग्रहणशील हैं, ऐसे भक्त-साधकों का मोक्ष निश्चित है। गुरुधाम में निवास काशीवास से किसी भी तरह से कम नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 29

👉 लोहड़ी उत्सव की शुभकामनाएं Lohri Utsav


🔶 वीर पंजाबी नायक, युग निर्माणी दुल्ला भट्टी जिसने मुगलों से विद्रोह कर कुँवारी लड़कियों को दासत्व से मुक्त कर उनका घर बसाया, लोहड़ी के पर्व में हम उसे याद कर वैसा ही अपने समाज में बुराईयों के नाश के लिए संकल्पित हों, युग निर्माणी समाज सेवक युवाओं का आवाहन अखिल विश्व गायत्री परिवार (All World Gayatri Pariwar) करता है, जो समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व निर्भीक साहसी दुल्ला भट्टी सा निबाहें। 24 गायत्री मन्त्र और 5 महामृत्यंजय मन्त्र के साथ लोहड़ी की अग्नि में टिल,रेवड़ी, मूंगफली, लावा का हवन करें और सामूहिक यज्ञ प्रसाद लें।

लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भट्टी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं की लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।

🔶 दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी की हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई।

दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार में था अब संदल बार पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।

🔶 गायत्री मन्त्र - ॐ भूर्भूवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्

🔷 महामृत्युंज मन्त्र- ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

🙏🏻 विचारक्रांति अभियान शांतिकुञ्ज हरिद्वार

🔶 सही उद्देश्य और लोहड़ी की कहानी को जन जन तक पहुंचाने के लिए ये पोस्ट शेयर अवश्य करें। अधिकांश लोग लोहड़ी का महत्व नहीं जानते।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...