शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 36) 17 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 यह लोग मेरे आत्म त्याग की कद्र करते हैं या नहीं? इन प्रश्नों को मन में कभी प्रवेश न करने देना चाहिए। वरन् सदा यह सोचना चाहिए कि एक ईमानदार माली की तरह मैं अपनी वाटिका को सुरभित बनाने में शक्ति भर प्रयत्न कर रहा हूं या नहीं? अपनी योग्यता और सामर्थ्य में से कुछ चुराता तो नहीं हूं? मेरी निस्वार्थता और निष्पक्षता में किसी प्रकार की कमी तो नहीं आ रही है? कर्तव्य पालन में किसी प्रकार का आलस्य प्रमाद तो नहीं हो रहा है? यदि इन प्रश्नों का सन्तोष जनक, उत्तर मिलता हो तो यह बड़ी ही आनन्ददायक और शान्तिप्रद बात समझी जानी चाहिये।

🔴 प्रशंसा होती है या नहीं? कोई अहसान मिलता है या नहीं? सफलता मिलती है या नहीं? ऐसे प्रश्नों का लेखा लेना अपनी साधना को चौपट करना है। इन प्रश्नों का सन्तोषजनक या असन्तोषजनक उत्तर देना दूसरों के हाथ की बात है। साधक को अपनी प्रसन्नता दूसरों के हाथ नहीं बेचनी चाहिए? दूसरों के कुछ देने से प्रसन्नता मिले, यह एक कंगाली की स्थिति है। हमें आनन्द का स्रोत अपनी आत्मा में ढूंढ़ना चाहिये। यदि ठीक प्रकार कर्तव्य का पालन किया गया हो तो इससे अधिक आनन्ददायक दुनियां की और कोई बात नहीं हो सकती।

🔵 संसार की सुख शान्ति में वृद्धि करना यही तो परमार्थ का लक्षण है। प्याऊ, धर्मशाला, कुंआ, तालाब, बावड़ी, बगीचा, सड़क, पाठशाला, औषधालय आदि का निर्माण करने वाले धर्मात्मा लोग इन कार्यों द्वारा दूसरे लोगों के कष्ट निवारण और सुख में वृद्धि करना चाहते हैं। अनेक प्रकार की संस्थाओं के स्थापन और संचालन का भी यही उद्देश्य है। महात्मा, त्यागी, वैरागी, तपस्वी, देशभक्त, लोक सेवक, परोपकारी सत्पुरुषों की साधना भी इसी उद्देश्य के लिये होती है। शास्त्रकारों ने विश्व की सुख शान्ति बढ़ाने वाले कार्यों का करना ही धर्म तथा ईश्वर प्राणिधान बताया है और कहा है कि ऐसे कार्यों से ही मनुष्य को लोक परलोक में पुण्यफल प्राप्त होता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 49)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 70. गायकों का संगठन— भाषण की भांति ही गायन का भी महत्व है। विधिवत् गाया हुआ गायन मनुष्य के हृदय को पुलकित कर देता है। भावनाओं को तरंगित करने की उतनी ही शक्ति गायन में रहती है, जितनी विचारों को बदलने की भाषण में रहती है। गायकों को संगठित करना चाहिए और उन्हें युग-निर्माण भावनाओं के अनुरूप कविताएं सीखने तथा गाने की प्रेरणा देनी चाहिए।

🔵 जहां-तहां भजन मण्डलियां और कीर्तन मण्डलियां अपने बिखरे रूप में पाई जाती हैं, उन्हें संगठित करना अभीष्ट होगा। व्यक्तिगत रूप से जो लोग गाया करते हैं, उन्हें भी अपनी कला द्वारा जन-समूह को लाभ पहुंचाने की प्रेरणा करनी चाहिए। सामूहिक संगीत कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर होता रहे और उनमें उत्कर्ष की भावनाओं की प्रधानता रहे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।

🔴 71. संगीत शिक्षा का प्रबन्ध—
गाने बजाने के क्रमबद्ध शिक्षण की व्यवस्था न होने से ऐसे लोगों की कला अविकसित ही पड़ी रहती है, जिनके गले मधुर हैं और लोगों को प्रभावित करने की प्रतिभा विद्यमान है। साधारण गायन और मामूली बाजे बजाने का शिक्षण कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। उसे मामूली जानकार भी कर सकते हैं। खंजरी, करताल, मजीरा, ढोलक, चिमटा, इकतारा जैसे बाजे लोग बिना किसी के सिखाये—देखा-देखी ही सीख जाते हैं। यदि उनकी व्यवस्थित शिक्षण व्यवस्था हो तो उसका लाभ अनेकों को आसानी से मिल सकता है और नये गायक तथा बजाने वाले पैदा हो सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 18)

🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ

(3) क्रियमाणः
🔵  कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया। विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदला मिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहार-विहार करने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है। मजदूर परिश्रम करता है, बदले में उसे पैसे मिल जाते हैं। जिन शारीरिक कर्मों के पीछे कोई मानसिक गुत्थी नहीं होती केवल शरीर द्वारा शरीर के लिए किए जाते हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं। पाठक समझ गए होंगे कि संचित कर्मों का फल मिलना संदिग्ध है यदि अवसर मिलता है, तो वे फलवान होते हैं। नहीं तो विरोधी परिस्थितियों से टकरा कर नष्ट हो जाते हैं।
    
🔴 प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना निश्चित है, परंतु उसके अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने में कुछ समय लग जाता है। यह समय कितने दिन का होता है, इस सम्बन्ध में कुछ नियम मर्यादा नहीं है, वह आज का आज भी हो सकता है और कुछ जन्मों के अंतर से भी हो सकता है, किंतु प्रारब्ध फल होते वही हैं, जो अचानक घटित हों और जिसमें मनुष्य का कुछ वश न चले। पुरुषार्थ की अवहेलना से जो असफलता मिलती है उसे कदापि प्रारब्ध फल नहीं कहा जा सकता। क्रियमाण तो प्रत्यक्ष हैं ही उनके बारे में ऊपर बता ही दिया गया है कि निश्चित फल वाले शारीरिक कर्म क्रियमाण हुआ करते हैं। इनके फल मिलने में अधिक समय नहीं लगता। इस प्रकार तीन प्रकार के कर्म और उसके फल मिलने की मर्यादा के सम्बन्ध में ऊपर कुछ प्रकाश डाल दिया गया है।   

🔵 कष्टों का स्वरूप अप्रिय है, उनका तात्कालिक अनुभव कड़ुआ होता है, अंततः वे जीव के लिए कल्याणकारी और आनंददायक सिद्ध होते हैं। उनसे दुर्गुणों के शोधन और सद्गुणों की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है। आनंदस्वरूप, आत्म प्रकाशमय जीवन और सुखमय संसार में कष्टों का थोड़ा स्वाद परिवर्तन इसलिए लगाया गया है कि प्रगति में बाधा न पड़ने पाए। घड़ी में चाबी भर देने से उसकी चाल फिर ठीक हो जाती है, हारमोनियम में हवा धोंकते रहने से उसके स्वर ठीक तरह बजते हैं। पैडल चलाने से साइकिल ठीक तरह घूमती है, अग्नि की गर्मी से सूखकर भोजन पक जाते हैं। थोड़ा-सा कष्ट भी जीवन की सुख वृद्धि के लिए आवश्यक है। संसार में जो कष्ट है वह इतना ही है और ऐसा ही है, किंतु स्मरण रखिए जितना भी थोड़ा-बहुत दुःख है, वह हमारे अन्याय का, अधर्म का, अनर्थ का फल है। आत्मा दुःख रूप नहीं है, जीवन दुःखमय नहीं हैं और न संसार में ही दुःख है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.2

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Dec 2016


👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 35)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 स्वादिष्ट व्यंजन की कल्पना मात्र से मुंह में पानी भर आता है। शोक समाचार पाकर उदासी छा जाती है, चेहरा लटक जाता है। प्रफुल्ल मुखाकृति से आन्तरिक प्रसन्नता का पता चलता है। इस प्रकार अदृश्य होते हुए भी मन की हलचलों का भला और बुरा प्रभाव जीवन में पग-पग पर अनुभव होता है।

🔴 मनुष्य अपने मानस का प्रतिबिम्ब है। मानसिक दशा का स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। नवीनतम शोधों के आधार पर तो यह भी कहा जाने लगा है कि रोग शरीर में नहीं, बल्कि मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। यही कारण है कि उत्तम और समग्र स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है।

🔵 राबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने अंग्रेजी में कई साहसिक उपन्यास लिखे हैं, उन्हें पढ़ने वाले सोचते थे कि लेखक भी योद्धा जैसा दिखने वाला कोई भारी भरकम कद्दावर होगा, जबकि वास्तविकता यह थी कि उनने अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कृतियां रुग्णावस्था में चारपाई पर पड़े हुए लिखीं। शंकराचार्य अपने जीवन के उत्तरार्ध में भगन्दर के मरीज रहे, वैद्य ने उनकी स्थिति को देखते हुए शारीरिक श्रम करने तथा चलने-फिरने की मनाही की थी। परन्तु उस जर्जर काया को लेकर ही उनने चारों धामों की स्थापना, शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय तथा पातंजलि के भाष्य आदि का गुरुत्तर कार्य भी सम्पन्न किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 35) 16 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 ऐसी दुखदायी स्थिति उत्पन्न न होने पाये इसके लिये समझौते ही नीति से काम लेना पड़ता है। अपनी मर्जी पर अड़ने, या उसे दूसरों पर बलात् थोपने की अपेक्षा अपने आपको नरम बनना पड़ता है। जिस सीमा तक कोई दुष्परिणाम उपस्थित न होता हो उस सीमा तक समझौता कर लेना चाहिए। यह ठीक है कि घर के लोगों को ठीक मार्ग पर रखना अपना कर्तव्य है। पर यह भी ठीक है कि पूर्ण रूप से किसी को तत्काल इच्छानुवर्ती बना लेना भी सुगम नहीं। थोड़ा झुकने से ही काम चलता है। समझौते की नीति से गुजर होती है।

🔴 सरकस के लिये जानवरों को साधने वाले मास्टर जानते हैं कि उजड़ जंगली जानवरों को रास्ते पर लाने में, इच्छित खेल सिखाने में, कितनी देर लगती है, कितना नरम गरम होना पड़ता है। बिल्कुल कड़ाई और बिल्कुल ढील यह दोनों ही बातें उपयोगी नहीं। बीच के रास्ते से चलना, उदारता और सहनशीलता के आधार पर काम करना ही हितकर होता है इसी आधार पर घर की सुख शान्ति कायम रह सकती है।

🔵 शान्ति, सन्तोष और व्यवस्था कायम रखने का तरीका यह है कि आत्म त्याग की नीति को प्रधानता दी जाय। आप अपना उदाहरण ऐसा रखें, जिसे देखकर घर के अन्य लोगों को भी आत्म-त्याग की प्रेरणा मिले। ‘‘मुझे कम आपको ज्यादा’’ यह भाव जितनी ही प्रधानता प्राप्त करेंगे उतनी ही शान्ति और सुव्यवस्था कायम रहेगी। गृहस्थ योगी को अपने को एक निस्वार्थ, निष्पक्ष एवं सद्भावी सेवक के रूप में घर वालों के सामने उपस्थित करना चाहिए। घर के लोगों से मुझे क्या लाभ मिलता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 48)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 मानव अन्तःकरण को पुलकित एवं भावविभोर करने की क्षमता कला में रहती है। कला का वासना को भड़काने में इन दिनों बड़ा हाथ रहा है। अब इस महान शक्ति को हमें जीवन निर्माण एवं समाज रचना की महान प्रक्रिया में लगाना होगा। कला शाश्वत है। उसमें दोष कुछ नहीं वरन् मानव अन्तःकरण का सीधा स्पर्श करने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण वह आवश्यक है और अभिवन्दनीय है । विरोध का एक मात्र तथ्य है कला का दुरुपयोग, इसे रोका जाना चाहिये और इस सृजनात्मक शक्ति को जन मानस की श्रेष्ठता की ओर प्रेरित करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिए।
इस सन्दर्भ में नीचे आठ सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं—

🔵 69. वक्तृत्व कला विकास— बोलना संसार की सबसे बड़ी कला है। व्यक्तिगत जीवन में जन सहयोग का लाभ प्राप्त करना मुख्यतया मनुष्य के बोलने, बात करने की शैली पर निर्भर है। मीठा बोलने से पराये अपने हो जाते हैं और कटु भाषण से अपने पराये बनते हैं। जीवन की प्रगति में उतनी और कोई बात सहायक नहीं होती जितनी शिष्ट, मधुर, उदार और परिमार्जित वाणी। इसी प्रकार सामाजिक जीवन में सफलता प्राप्त करने का भी बहुत कुछ श्रेय विधिवत् वक्तृता पर ही निर्भर रहता है।

🔴
पने पक्ष को ठीक प्रतिपादित करने में वही व्यक्ति सफल होता है जिसकी भाषण-शैली परिमार्जित है। युग-निर्माण के लिए प्रधानतया हम सबको इसी शस्त्र का पग-पग पर उपयोग करना पड़ेगा। इसलिए उसका अभ्यस्त भी होना ही चाहिये। व्यक्तिगत वार्तालाप में और जन समूह के सामने भाषण देने में किन तथ्यों का ध्यान रखना और किन बातों का अभ्यास करना आवश्यक है, इसका प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के सदस्यों को विधिवत् मिलना चाहिए। अन्यथा बौद्धिक क्रान्ति का यह विशाल अभियान किस प्रकार व्यापक बन सकेगा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 17)

🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ

(2) प्रारब्ध
🔵   वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं। इन कार्यों को विशेष मनोयोग के साथ किया जाता है, इसलिए उनका संस्कार भी बहुत बलवान बनता है। हत्या, खून, डकैती, विश्वासघात, चोरी, व्याभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूरकर्मों की प्रतिक्रिया अंतःकरण में बहुत ही तीव्र होती है, उस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता निरंतर व्यग्र बनी रहती है और एक न एक दिन उसे निकाल कर बाहर कर ही देती है।
    
🔴 हम बता चुके हैं कि हमारी अंतःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता-अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था करती रहती है। चूँकि मानसिक दण्ड अपने आप अंदर ही अंदर पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होती है, दण्ड कार्य को पूरा करने लिए सूक्ष्म लोक में से उसी प्रकार का घटनाक्रम उपस्थित करने के लिए हमारी अंतःचेतना एक वातावरण तैयार करती है। इस तैयारी में कभी बहुत समय भी लग जाता है। जैसे छल स्वभाव के निवारण के लिए शोक रूपी दण्ड की आवश्यकता है। अब यह देखा जाएगा कि छल किस दर्जे का है, उसकी शुद्धि किस दर्जे के शोक से पूरी हो सकती है।

🔵 अंतःचेतना वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा करने में भीतर ही भीतर लगी रहेगी। वह शरीर में ऐसे तत्त्व पैदा करेगी, जिससे पुत्र उत्पन्न हो, उस पुत्र शरीर में ऐसी आत्मा का मेल मिलवाएगी, जिसे अपने कर्मों के अनुसार दस वर्ष ही जीना पर्याप्त हो, दस वर्ष का पुत्र हो जाने पर वही हमारी अंतःचेतना गुप्त रूप से पुत्र पर पिल पड़ेगी और उसे रोगी करके मार डालगी एवं शोक का इच्छित अवसर पैदा कर देगी। ऐसे अवसर तैयार करने में केवल अपना ही कार्य अकेला नहीं होता, वरन् दूसरे पक्ष का भी कार्य होता है। दोनों ओर की चेतनाएँ अपने-अपने लिए अवसर तलाश करती फिरती हैं और फिर जब उन्हें इच्छित जोड़ मिल जाता है, तो एक घटना की ठीक भूमिका बँध जाती है। ऐसे कार्यों में कई बार एक, दो, तीन या कई जन्मों का समय लग जाता है। लड़की के लिए वर और वर के लिए लड़की की तलाश बहुत दिनों तक जारी रहती है, सैकड़ों प्रसंग उठाए जाते हैं, पर कुछ न कुछ कमी होने से वे तय नहीं होते, जब दोनों पक्ष रजामंद हो जाते हैं, तो विवाह जल्द हो जाता है। इसी प्रकार पिता को पुत्र शोक और पुत्र को अल्पायु का संयोग, जब दोनों ही विधान ठीक बैठ जाते हैं, तो वे एकत्रित हो जाते हैं।

🔴 अफ्रीका में वेन्सस नामक एक दस फुट ऊँचा एक झाड़ होता है, इसकी डालियों में से सूत जैसे अंकुर फुटते हैं। यह अंकुर बढते हैं और इधर-उधर हवा में झूलते रहते हैं। दूसरा कोई अंकुर जब उससे छू जाता है, तो वे दोनों आपस में गुँथ जाते हैं और रस्सी की तरह बल डालकर एक हो जाते हैं। जब तक दूसरे अंकुर से भेंट न हो, तब तक सूत बढ़ते ही रहते हैं और कभी न कभी वे किसी न किसी से मिल जाते हैं। कोई सूत तो चार छः अंगुल दूरी पर ही जाकर किसी से मिलकर लिपट जाता है, कोई-कोई चार फुट लंबा होने के बाद सफल होता है। यही हालत कर्मफलों की है। शारीरिक दण्ड एकांगी है विष खाते ही तुरंत मृत्यु हो जाती है, परंतु मानसिक दण्ड में अपवाद है।

🔴 जैसे क्रूरता से प्रेरित होकर किसी की हत्या की गई, वह यदि प्रकट हो गयी तो राज्य द्वारा दण्ड मिल जाएगा, किंतु यदि हत्यारे ने अपना कार्य छिपा लिया तो उसका अंतःकरण तुरंत ही पाप दण्ड न दे बैठेगा, वरन् उसी दिन से वेन्सस पेड़ की तरह अंकुर फोड़कर इस तलाश में फिरेगा कि हिंसा वृत्ति से घृणा कराने के लिए हिंसा में जो दुःख होता है, उसका अनुभव उसे कराऊँ। जब दूसरी ओर का भी कोई अंकुर मिल जाता है, तो दोनों आपस में लिपट कर एक निर्धारित घटना की भूमिका बन जाते हैं। उपरोक्त कारणों से कभी-कभी अचानक सत्कर्म करते हुए भी दुःख उपस्थित हो जाता है और कभी-कभी बुरे काम करते हुए भी दुःख नहीं मिलता, इसका कारण उपयुक्त अवसर तैयार होने में विलम्ब लगना ही होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.1

👉 सतयुग की वापसी (भाग 11) 16 Dec

🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें  

🔴 नि:सन्देह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी दुरूह है। पर हमें उस परम सत्ता के सहयोग पर विश्वास करना चाहिए जो इस समूची सृष्टि को उगाने, उभारने, बदलने जैसे क्रियाकलापों को ही अपना मनोविनोद मानती और उसी में निरन्तर निरत रहती है। मनुष्य के लिए छोटे काम भी कठिन हो सकते हैं, पर भगवान् की छत्रछाया में रहते कोई भी काम असम्भव नहीं कहा जा सकता। विषम वेलाओं में अपनी विशेष भूमिका निभाने के लिए तो ‘‘सम्भवामि युगे-युगे के सम्बन्ध में वह वचनबद्ध भी है। फिर इन दिनों समस्त संसार पर छाई हुई विपन्नता की वेला में उसके परिवर्तन, प्रयास गतिशील क्यों न होंगे? जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे को उजाले में बदल देने जैसा प्रभात पर्व लाने में क्यों कुछ कठिनाई होगी?

🔵 युग परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी, पर उसके पीछे अदृश्य सत्ता का असाधारण योगदान रहेगा। कठपुतलियों के दृश्यमान अभिनय के पीछे भी तो बाजीगर की अँगुलियों से बँधे हुए तार ही प्रधान भूमिका निभाते हैं। सर्वव्यापी सत्ता निराकार है, पर घटनाक्रम तो दृश्यमान शरीरों द्वारा ही बन पड़ते हैं। देवदूतों में ऐसा ही उभयपक्षीय समन्वय होता है। शरीर तो मनुष्यों के ही काम करते हैं पर उन श्रेयाधिकारियों का पथ प्रदर्शन, अनुदानों का अभिवर्षण उसी महान् सत्ता द्वारा होता है, उपनिषद् जिसे ‘अणोरणीयान्, महतो महीयान्’ कहकर उसका परिचय देने का प्रयास करता है।

🔴 हवाई जहाज के लिए उपयुक्त हवाई पट्टियाँ पहले से ही विनिर्मित करनी होती हैं। शासनाध्यक्षों के लिए साफ-सुथरे सुरक्षित और उपयुक्त स्थान की पहले से ही व्यवस्था करनी पड़ती है। जिस महान् प्रयोजन में इन दिनों परमेश्वर की महती भूमिका सम्पन्न होने जा रही है, उसका श्रेय तो उन जागरूकों, आदर्शवादियों और प्रतिभा संपन्नों को ही मिलेगा, जिनने अपने व्यक्तित्व को, परम सत्ता के साथ जुड़ सकने जैसी स्थिति को विनिर्मित कर लिया है। इसी आवश्यकता पूर्ति को कोई चाहे तो युगसाधना भी कह सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 10) 15 Dec

🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें  

🔴 निष्ठा भरे पुरुषार्थ में अद्भुत आकर्षण होता है। उनका प्रभाव भले-बुरे दोनों तरह के प्रयोगों में दिखाई देता है। जब चोर-उचक्के लवार-लफंगे दुराचारी, व्यभिचारी, नशेबाज, धोखेबाज मिल-जुलकर अपने-अपने सशक्त गिरोह बना लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि सृजन संकल्प के धनी, प्रामाणिक और प्रतिभाशालियों को अन्त तक एकाकी ही बना रहना पड़े। भगीरथ ने लोकमंगल के लिए सुरसरि को पृथ्वी पर बुलाया तो ब्रह्मा-विष्णु ने गंगा को प्रेरित करके भेजा और धारण करने लिए शिवजी तत्काल तैयार हो गए। नवसृजन में संलग्न व्यक्तियों की कोई सहायता न करे, यह हो ही नहीं सकता। जब हनुमान्, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू योद्धाओं की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती चली न आए?

🔵 विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसे मुँह बनाए खड़ी दीखती हैं आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, भँवर, अँधड़, तूफान अपनी विनाश क्षमता का नग्न प्रदर्शन करने में कोई कसर रहने नहीं दे रहे हैं। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद महामारी की तरह जन-जन को भ्रमित और संत्रस्त कर रहा है। नीति को पीछे धकेलकर अनीति ने उसके स्थान पर कब्जा जमा लिया है। यह विपन्नता संसार व्यापी समूचे जनसमुदाय पर अपने-अपने आकार-प्रकार में बुरी तरह आच्छादित हो रही है। ऐसी स्थिति में ६०० करोड़ मनुष्यों का विचार परिष्कार (ब्रेन वाशिंग) कैसे सम्भव हो? गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले? जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इनसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान् बुलाने जैसी असम्भव दीख पड़ने वाली सृजन प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 34)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 गांधीजी हंसमुख थे, उनके सामने देश की अत्यन्त गम्भीर समस्यायें रहती थीं तो भी वे थोड़ी-थोड़ी देर में हंसते रहने के अवसर ढूंढ़ते रहते थे। कहते थे कि गम्भीरता को सुरक्षित रखने के लिए अपने को बोझिल न होने देने के लिए हंसना भी एक मानसिक टॉनिक है।

🔴 परिहास प्राणियों के मध्य एकता, समता और समस्वरता लाता है। यदि ऐसा न होता तो विषमता की आग में चेतना की दुनिया कभी की जल-भुनकर नष्ट हो गई होती।

🔵 यह मान्यता सही नहीं है कि बुद्धिमत्ता यथार्थवादी और कठोर होती है, इसलिए उसे भावुकतावश परिहास की आवश्यकता नहीं होती और न उसके लिए अवसर मिलता है। यदि ऐसा रहा होता तो बुद्धिमत्ता बड़ी कर्कश, कुरूप, बोझिल और संकट उत्पन्न करने वाली हो गई होती। मानवी परिहास की प्रवृत्ति संसार की सबसे बड़ी जीवन्त सुन्दरता है। यों प्रकृति की संरचना, ऋतुओं का परिवर्तन, चित्र-विचित्र वनस्पतियां और प्राणियों की विशेषतायें स्वयंमेव में ऐसी हैं कि मनुष्य उन्हें अपनी सौंदर्य दृष्टि से देखने पर मुग्ध होकर रह जाय।

🔴 यह कथन सही नहीं है कि उच्चस्तरीय व्यक्ति गम्भीर रहते हैं। इस गम्भीरता के पीछे भी उनके लक्ष्य विशेष का उत्साहवर्धक और आशाजनक सौन्दर्य समाहित रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 34) 15 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 स्वार्थ बुद्धि से व्यवहृत होने वाले गृहस्थ को माया बन्धन कहा गया है, ‘‘मैं घर का स्वामी हूं। घर के प्रत्येक सदस्य को मेरी आज्ञाओं का पालन करना चाहिये, प्रत्येक को मेरी इच्छानुसार चलना चाहिए, प्रत्येक को मेरी मर्जी और सुविधा का आचरण करना चाहिए, मैं जिस तरह देखना चाहूं उस तरह रहना चाहिये’’ इस प्रकार की इच्छा और आकांक्षाओं को लेकर जो गृहस्थ में प्रवेश करता है, उसे निस्सन्देह उसमें नरक, दुःख, क्लेश, भार, बन्धन या माया के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

🔴 यह संभव नहीं कि सब लोग अपनी मन मर्जी के बन जावें। गुण कर्म और स्वभाव की भिन्नता हर मनुष्य में पाई जाती है, अनेक जन्मों के संचित संस्कारों के समूह द्वारा स्वभाव बनता है, प्रयत्न करने पर उसमें सुधार हो तो जाता है पर यह सम्भव नहीं कि कोई प्राणी अपनी मौलिकता को बिलकुल खोदे। हर व्यक्ति की रुचि-इच्छा, वृत्ति, भावना एवं प्रवृत्ति भिन्न होती है, मिट्टी के पुतले की तरह चुपचाप हर एक आज्ञा को मन, वचन और कर्म से कोई शिरोधार्य करले यह सम्भव नहीं।

🔵 इस प्रकार कुछ न कुछ मतभेद रहे ही, अपने स्वार्थों का संघर्ष नहीं मिट सकता, इस प्रकार आपकी आज्ञा मानने में जहां उसके निजी स्वभाव में स्वार्थ में संघर्ष होता होगा, वह व्यक्ति आज्ञा पालन में आनाकानी करेगा। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि अपनी मर्जी यदि पारिवारिक स्थिति की अपेक्षा बहुत आगे बढ़ गई तो भी दूसरे उसे मानने में तत्पर न होंगे। ऐसी दशा में जो असन्तोष, मन मुटाव, क्रोध, कलह एवं संघर्ष होगा वह अशान्ति का कारण बनेगा। घर में दुख ही दुख दिखाई देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 47)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 67. युग-निर्माण प्रेस— प्रायः प्रत्येक नगर में एक-एक युग-निर्माण प्रेस होना चाहिए, जिसके माध्यम से उसके संचालक अपनी रोजी-रोटी सम्मानपूर्वक कमा लिया करें और साथ ही उस केन्द्र से आस-पास के क्षेत्र में भावनाओं के विस्तार का कार्य-क्रम चलता रहा करे। छोटे प्रेस न्यूनतम 4 हजार की पूंजी से भी चल सकते हैं। साधन सम्पन्न प्रेसों के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध करनी पड़ेगी।

🔵 व्यक्तिगत पूंजी से या सहयोग समितियां गठन करके यह कार्य आरम्भ किये जा सकते हैं। आमतौर से नये कार्यकर्ताओं को निजी अनुभव तो होता नहीं, उस व्यवसाय में लगे हुए लोग बारीकियों को बताते नहीं, इसलिये ऐसे कार्यक्रम प्रायः असफल हो जाते हैं, पर जब उन्हें सांगोपांग शिक्षण उपलब्ध हो जायगा तो फिर किसी कठिनाई की सम्भावना न रहेगी और ऐसे प्रेस प्रत्येक नगर में चलने लगेंगे। इन केन्द्रों से विचार क्रान्ति में भारी योगदान मिल सकता है।

🔴 68. कविताओं का निर्माण और प्रसार— युग निर्माण विचारधारा के उपयुक्त भावनापूर्ण कविताएं प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा में, लिखी जांय। उन्हें सस्ते मूल्य पर छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के रूप में छापा जाय। जीवन के हर पहलू को स्पर्श करने वाली प्रेरणाप्रद कविताएं सर्वत्र उपलब्ध हों जिससे गायन सम्बन्धी जन-मानस की एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति हो सके। लोकगीतों में प्रेरणा भर देने का कार्य हमें पूरा करना चाहिये। गायन का कोई क्षेत्र ऐसा न बचे जहां उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली कविताएं गूंज न रही हों। स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले गीत मंगल अवसर की आवश्यकता के अनुरूप लिखे-छापे और उन्हें सिखाये जाने चाहिये। उच्च साहित्य क्षेत्र से लेकर हल जोतते हुए किसानों तक में गाये जाने योग्य प्रेरणाप्रद कविताओं की भारी आवश्यकता है। इसकी पूर्ति सुसंगठित योजना बना कर ही की जानी चाहिए। यह अभाव किसी भी क्षेत्र में, किसी भी भाषा में रहने न पावे। इस रचनात्मक कार्य को पूरा किये बिना धरती पर स्वर्ग लाने का स्वप्न साकार न हो सकेगा। इसके लिये कवि-हृदय साहित्यकारों को बहुत कुछ करना है।

🔵 साहित्य-निर्माण की उपरोक्त योजनाएं सब दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। इनमें भाग लेने वाले अपना जीवन धन्य बनावेंगे और देश, जाति की भी बहुत बड़ी सेवा करेंगे। प्रतिभावान लोगों को इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए हम भावना-पूर्वक आमन्त्रण भेजते हैं, उन्हें आवश्यक मार्ग-दर्शन मिलेगा और सहयोग भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 17) 15 Dec

🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ

🔵  तीन दुःखों का निरूपण करने के पूर्व कर्म के तीन प्रकारों को जान लेना भी आवश्यक है।
(1) संचित
(2) प्रारब्ध और
(3) क्रियमाण

इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। चित्रगुप्त का परिचय लेख के अंतर्गत पाठक पढ़ चुके हैं कि मनुष्य की अंतःचेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव न करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भले-बुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।

(1) संचितः
        
🔴 दिन भर के कामों का यदि निरीक्षण किया जाय, तो वे तीन श्रेणियों में बाँट देने पड़ेंगे। कुछ तो ऐसे होते हैं, जो बिना जानकारी में होते हैं। जैसे बुरे लोगों के मुहल्ले में या सत्संग में रहने से उनका प्रभाव किसी न किसी अंश में गुप्त रूप से अपने ऊपर पड़ जाता है। यह प्रभाव पड़ा तो परंतु हमने उसे इच्छापूर्वक स्वीकार नहीं किया इसलिए वह हल्का, निर्बल एवं कम प्रभाव वाला होकर हमारी भीतरी चेतना के एक कोने में पड़ा रहा, ऐसे हीन वीर्य संस्कार वाले, संचित कर्म कहे जाते हैं। जो कार्य विवशता में, दबाए जाने पर, असहाय अवस्था में करने तो पड़ें, पर मन की आंतरिक इच्छा यही रही कि यदि विवशता न होती, तो इस काम को मैं कदापि न करता।

🔵 इस तरह लाचारी से जो काम करना पड़े और मन जिनके विरुद्ध विद्रोह करता रहा एवं उस काम को स्वभाव बनाकर अपना नहीं लिया, तो उस कार्य का संस्कार भी हल्का, अल्प वीर्य और कम प्रभाव वाला होता है। ऐसे काम भी संचित कर्म के ही श्रेणी में आते हैं। इन संचित कर्मों के संस्कार बहुत कमजोर एवं हल्के होते हैं, इसलिए वे मनोभूमि के किसी अज्ञात कोने में सिमटे हुए हजारों वर्ष तक पड़े रहतें हैं, यदि इन्हें प्रकट होने के कोई अच्छा अवसर न मिले, तो यों ही दबे दबाए पड़े रहते हैं, किंतु यदि उसी प्रकार के बुरे कर्म कभी जानबूझ कर स्वेच्छा से, विशेष मनोयोग के साथ किए गए, तो वे सड़े-गले संचित संस्कार भी कुलबुलाने लगते हैं।

🔴 जैसे अच्छे घोड़ों के झुण्ड में पड़कर लँगड़े घोड़े भी चलने लगते हैं, वैसे ही वे भी कब्र में से निकल कर जीवित हो जाते हैं। जिस प्रकार घुना हुआ बीज भी अच्छी भूमि और अच्छी वर्षा पाकर उग आता है, वैसा ही संचित संस्कार भी अपनी जाति के बलवान कर्मों की सहायता पाकर उग आते हैं। हिमायत पाकर उनकी हिम्मत दूनी हो जाती है, परंतु यदि उन संचित संस्कारों को लगातार विपरीत स्वभाव के बलवान कर्म संस्कारों के साथ रहना पड़े, तो वे नष्ट भी हो जाते हैं। गर्म जगह में रखा हुआ एक घड़ा पानी गर्मी के प्रभाव से आखिर एक-दो महीने में सूख ही जाता है, इसी प्रकार उत्तम कर्मों के संस्कार जमा हो रहे हों, तो वे बेचारे बुरे संस्कार उनकी गर्मी में जलकर नष्ट भी हो जाते हैं। धर्म ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि तीर्थयात्रा आदि अमुक शुभ कर्म करने से इतने जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं, असल में वह संकेत इन अल्पवीर्य वाले संचित संस्कारों के सम्बन्ध में ही है। भले और बुरे दोनों ही प्रकार के संचित कर्म संस्कार अनुकूल परिस्थिति पाकर फलदायक होते हैं एवं तीव्र प्रतिकूल परिस्थितियों में नष्ट भी हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 46)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 65. पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता— युग-निर्माण लक्ष्य में निर्धारित प्रेरणाओं को विशेष रूप से गतिशील बनाने वाले पत्र-पत्रिकाओं की बहुत बड़ी संख्या में आवश्यकता है। जीवन को सीधा स्पर्श करने वाले ऐसे अगणित विषय हैं जिनके लिये अभी कोई शक्तिशाली विचार केन्द्र दृष्टिगोचर नहीं होते। नारी-समस्या, शिशु-पालन, स्वास्थ्य, परिवार-समस्या, अर्थ-साधन, गृह-उद्योग, कृषि, पशु-पालन, समाज शास्त्र, जातीय समस्याएं, अध्यात्म, धर्म, राजनीति, कथा-साहित्य, बाल शिक्षण, मनोविज्ञान, मानवता, सेवा धर्म, सदाचार आदि कितने ही विषय ऐसे हैं जिन पर नाम मात्र का साहित्य है और पत्र-पत्रिकाएं तो नहीं के बराबर हैं। आज जो पत्र निकल रहे हैं वे एक खास ढर्रे के हैं, उनमें न तो मिशिनरी जोश है और न वैसा कार्य-क्रम ही लेकर वे चलते हैं। अब ऐसे पत्र-पत्रिकाओं को बड़ी संख्या में प्रकाशित होना चाहिए जो मानव जीवन के हर पहलू पर प्रकाश उत्पन्न कर सकें।

🔵 योजना के अनुरूप कम से कम सौ पत्र तो इन विषयों पर तुरन्त निकलने चाहिये। जिनमें आवश्यक योग्यता और उत्साह हो उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है।

🔴 66. प्रकाशन की सुगठित श्रृंखला— पुस्तक प्रकाशकों की एक सुगठित ऐसी श्रृंखला होनी चाहिये जो एक-एक विषय पर परिपूर्ण साहित्य तैयार करे। श्रृंखला से संबद्ध प्रकाशक एक दूसरे से अपनी पुस्तकों का परिवर्तन कर लिया करें। इस प्रकार हर प्रकाशक के पास प्रत्येक विषय का प्रचुर साहित्य जमा हो जाया करेगा। अपनी निजी दुकान चला कर, फेरी से अथवा विज्ञापन आदि से जैसे भी उपयुक्त हो उस साहित्य का विक्रय किया जाया करे। इस प्रकार एक विषय का प्रकाशक पारस्परिक सहयोग के आधार पर सभी विषयों की पुस्तकों का प्रचारक बन सकेगा। अनेक वस्तुएं पास में होने से विक्रय सम्बन्धी असुविधा भी न रहेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 16)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 ईश्वरीय नियम है हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिए भरसक प्रयत्न करे। यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करती, तो उसे भी दूसरों का पाप लगता है। उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।
        
🔴 देखा जाता है कि अन्याय करने वाले अमीरों की अपेक्षा मूक पशु की तरह जीवन बिताने वाले भोले-भाले लोगों पर दैवी प्रकोप अधिक होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि का कष्ट गरीब किसानों को ही अधिक सहन करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक बड़ा पापी होता है। कहते हैं कि ‘‘बुजदिल जालिम का बाप होता है।’’ कायरता में यह गुण है कि वह अपने ऊपर जुल्म करने के लिए किसी न किसी को न्यौत बुलाता है।

🔵 भेड़ की ऊन गड़रिया छोड़ देगा तो दूसरा कोई न कोई उसे काट लेगा। कायरता, कमजोरी, अविद्या स्वयं बड़े भारी पातक हैं। ऐसे पातकियों पर यदि भौतिक कोप अधिक हों तो कुछ आश्यर्च नहीं? संभव है उनकी कायरता को दूर करने एवं स्वाभाविक सतेजता जगाकर निष्पाप बना देने के लिए अदृश्य सत्ता द्वारा यह घटनाएँ उपस्थित होती हों। यह भौतिक दुर्घनाएँ सृष्टि के दोष नहीं हैं वरन् अपने ही दोष हैं। अग्नि में तपाकर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार कृपापूर्वक आया करते हैं और संसार को जोरदार चेतावनी देकर सामाजिक निष्पापता बढ़ाने का आदेश दिया करते हैं।

🔴 दैविक, दैहिक, भौतिक दुःखों का कुछ विवेचन ऊपर की पंक्तियों में किया जा चुका है। अब हम इसी लेखमाला के अंतर्गत यह बताएँगे कि किस प्रकार के पाप-पुण्यों का फल कितने-कितने समय में मिलता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/theen.2

👉 गृहस्थ-योग (भाग 33) 14 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 आप सब आत्म निरीक्षण द्वारा अपनी भूलों को देखें तो देखकर निराश न हों वरन् इस भावना को मनःक्षेत्र में स्थान दें— ‘‘वीर योद्धा की तरह मैं जीवन युद्ध में रत हूं। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते समय के जो बुरे संस्कार अभी हम लोगों में लगे हुए शेष रह गये हैं, वे बार बार मार्ग में विघ्न उपस्थित करते हैं, कभी मैं गलती कर बैठता हूं कभी दूसरे गलती कर देते हैं, आये दिन ऐसे विघ्न सामने आते रहते हैं, परन्तु मैं उससे जरा भी विचलित नहीं होता, मैं नित्य इन कठिनाइयों से लड़ूंगा।

🔴  ठोकर या चोट खाकर भी चुप न बैठूंगा। गिर पड़ने पर फिर उठूंगा और धूलि झाड़कर फिर युद्ध करूंगा। लड़ने वाला ही गिरता और घायल होता है, कुसंस्कार यदि मुझे गिरा देते हैं तो भी मुझे उनके विरुद्ध युद्ध जारी रखना चाहिए। मैं सत्य मार्ग का पथिक हूं सच्चिदानन्द आत्मा हूं, अपने और दूसरे के कुसंस्कारों से निरन्तर युद्ध जारी रखना और उन्हें परास्त कर देने तक दम न लेना ही मेरा कर्तव्य है। मैं अपने संकल्प, व्रत, साधन और उद्देश्य के प्रति सच्चा हूं। अपनी सच्चाई की रक्षा करूंगा और इन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करके रहूंगा। भूलों को नित्य परखने, पकड़ने और उन्हें हटाने का कार्य मैं सदा एक रस उत्साह के साथ जारी रखूंगा।’’

🔵 उपरोक्त मन्त्र की सफलता के निरीक्षण के साथ मनन करना चाहिए। इससे निराशा नहीं आने पाती। गृहस्थ योग के मूलभूत सिद्धान्तों का बीज मन्त्र, दृढ़ता का संकल्प और त्रुटियों में धर्म युद्ध जारी रखने की प्रतिक्षा यह तीनों ही महामंत्र साधक की मनोभूमि में खूब गूंजने चाहिये। अधिक से अधिक समय इन विचारधाराओं में ओत-प्रोत रहना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 33) 14 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 इसके विपरीत जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने वाले लोग यद्यपि सस्ते मनोरंजन से अपने मन बहलाव के बहाने नहीं खोजते, प्रत्युत समस्याओं के महत्वपूर्ण हल निकालते और वास्तविक प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। मनोरंजन के पुराने साधन सिनेमा, सिगरेट, शराब और गन्दे नाच-गाने अब बीते युग की बातें होती जा रही हैं, इन दुष्प्रवृत्तियों से जितनी जल्दी मुक्ति मिले अच्छा है। अब तो प्रबुद्ध वर्ग इलेक्ट्रानिक खोजों, चांद पर जाने या अन्तरिक्ष शोधों में व्यस्त रहना ही अपना मनोरंजन समझता है।

🔴 वस्तुतः गम्भीर दृष्टिकोण अपनाकर भी स्वस्थ मनोरंजन किया जा सकता है। कब गम्भीर रहना व कब हल्का रहना यह भी एक कला है। बच्चों का विकास करने के लिए उनमें हिल-मिलकर समय काटने में सबको बड़ा आनन्द आता है और एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के दायित्व की पूर्ति होती है। ऐसे कार्यों में मन लगाना जिससे स्वस्थ मनोरंजन भी हो और उस मनोरंजन से लाभ भी मिले—गम्भीर लोगों को प्रिय होता है, इसी में वे स्वयं को तनावमुक्त कर लेते हैं।

🔵 उद्देश्यों-आदर्शों के प्रति गम्भीर रहने में हर्ज नहीं, इससे अपना चित्त एकाग्र रखने और हाथ में लिए काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने उसका महत्व विचारने का अवसर मिलता है किन्तु यह गम्भीरता ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उदासी-उपेक्षा जैसी प्रतीत हो और लगे कि मनुष्य किसी परेशानी में डूबा हुआ है। ऐसा होने पर लोग दूर रहने और बचने की कोशिश करते हैं, इस स्थिति में मनुष्य अपने को अकेला और जीवन को नीरस अनुभव करता है।

🔴 गम्भीरता के दबाव को हलका करने के लिए हंसने-हंसाने की आदत डालनी चाहिए, पर वह होनी बाल सुलभ चाहिए, उसमें व्यंग, उपहास, तिरस्कार जैसी भावनायें मिल जाने से वह हंसी भी विषाक्त हो जाती है। उसमें तो दूसरों को चोट पहुंचाने, किसी अनुपस्थित व्यक्ति की या अपनी अटपटी बातों की चर्चा करते हुए परिहास का अवसर ढूंढ़ा जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Dec 2016


👉 सकारात्मक सोच

🔴 एक घर के पास काफी दिन एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। वहा रोज मजदुरों के छोटे बच्चे एक दुसरों की शर्ट पकडकर रेल-रेल का खेल खेलते थे।

🔵 रोज कोई इंजिन बनता और बाकी बच्चे डिब्बे बनते थे...

🔴 इंजिन और डिब्बे वाले बच्चे रोज बदल  जाते, पर... केवल चङ्ङी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में रखा कपड़ा घुमाते हुए गार्ड बनता था।

🔵 उनको रोज़ देखने वाले एक व्यक्ति ने कौतुहल से गार्ड बनने वाले बच्चे को बुलाकर पुछा, "बच्चे, तुम रोज़ गार्ड बनते हो। तुम्हें कभी इंजिन, कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती?"

🔴 इस पर वो बच्चा बोला...

🔵 "बाबूजी, मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। तो मेरे पिछले वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे? और मेरे पिछे कौन खड़ा रहेगा?

🔴 इसलिये मैं रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हुँ।

🔵 "ये बोलते समय मुझे उसके आँखों में पानी दिखाई दिया।

🔴 आज वो बच्चा मुझे जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ा गया...

🔵 अपना जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता। उस में कोई न कोई कमी जरुर रहेगी।

🔴 वो बच्चा माँ-बाप से ग़ुस्सा होकर रोते हुए बैठ सकता था। वैसे न करते हुए उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा।

🔵 हम कितना रोते है? कभी अपने साँवले रंग के लिए, कभी छोटे क़द के लिए, कभी पड़ौसी की कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने कम मार्क्स, कभी अंग्रेज़ी, कभी पर्सनालिटी, कभी नौकरी मार तो कभी काम धंदे में मार...
हमें इससे बाहर आना पड़ता है।

🔴  ये जीवन है... इसे ऐसे ही जीना पड़ता है।

👉 सतयुग की वापसी (भाग 9) 14 Dec

🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें  

🔴 गिरने-गिराने की, मिटने-मिटाने की ध्वंसात्मक योजनाओं में, अनेकों मनचले साथ देने, सहायता करने के लिए सहज ही तैयार हो जाते हैं। होली जलाने के कौतूहल हेतु, छोटे बच्चों से लेकर किशोर युवकों तक का एक बड़ा समूह लकड़ियाँ बीनते देखा जाता है। जब उस ढेर में आग लगती है तो तालियाँ बजाने और हुल्लड़ मचाने वालों की भी कमी नहीं रहती। कठिनाई तब पड़ती है जब छप्पर छाने की आवश्यकता पड़ती है। बुलाने पर भी पड़ोसी तक आनाकानी और बहानेबाजी करते देखे गए हैं। तब काम अपने बलबूते ही आरम्भ करना पड़ता है।

🔵 कवि टैगोर ने ठीक ही कहा था कि यदि सत्प्रयोजन की दिशा में कुछ करना सँजोना हो तो— ‘‘एकला चलो रे’’ की नीति अपनानी चाहिए। गीताकार के परामर्शानुसार सारा संसार जब मोह निद्रा में लम्बी तानकर सो रहा हो, तब भी योगी को प्रचलन के विपरीत जागते रहने की, जनसुरक्षा की हिम्मत जुटानी चाहिए।

🔴 निविड़ अन्धकार से निपटने के लिए जब माचिस की एक तीली अपने को जलाने का साहस सँजोकर प्रकट होती है तो दीपक उस तीली के बुझने से पहले ही अपने को ज्योर्तिमय कर लेते हैं। इतना ही नहीं, दीवाली जैसे विशेष पर्वों पर प्रज्ज्वलित दीपकों की विशालकाय वाहिनी तक स्थान-स्थान पर जगमगाती दृष्टिगोचर होती है। अकेले चल पड़ने वालों का उपहास और विरोध आरम्भ में ही होता है, पर जब स्पष्ट हो जाता है कि उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में कोई चल ही पड़ा, तो उसके साथी-सहयोगी भी क्रमश: मिलते और बढ़ते चले जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 15)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 मानसिक पाप भी जिस शारीरिक पाप के साथ घुलामिला होता है, वह यदि राजदण्ड, समाज दण्ड या प्रायश्चित द्वारा इस जन्म से शोधित न हुआ, तो अगले जन्म के लिए जाता है, परंतु यदि पाप केवल शारीरिक है या उसमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है, जैसे नशा पिया, उन्माद आया। विष खाया-मृत्यु हुई। आहार-विहार में गड़बडी हुई, बीमार पड़े। इस तरह शरीर अपने साधारण दोषों की सफाई जल्दी-जल्दी कर लेता है और इस जन्म का भुगतान इस जन्म में कर जाता है, परंतु गम्भीर शारीरिक दुर्गुण, जिनमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।
        
🔴 भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप हैं। संपूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बँधी हुई है। विश्वव्यापी जीव तत्व एक है। आत्मा सर्वव्यापी है। जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमण्डल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गंध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है, इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिए दूसरा भी जिम्मेदार है। एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता-पिता को लज्जित करता है, अपने घर व कुटुम्ब को शर्मिंदा करता है। वे इसलिए शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्तव्य भी बँधा हुआ है। अपने पुत्र, कुटुम्बी या घर वाले को सुशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुम्बियों की भी है।

🔵 कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी, परंतु कुटुम्बियों की आत्मा स्वयमेव ही शर्मिंदा होगी, क्योंकि उनकी गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं। सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक-दूसरे की हीनता के लिए जिम्मेदार है। पड़ौसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ौसी खड़ा-खड़ा तमाशा देखे, तो कुछ देर बाद उसका भी घर जल सकता है। मुहल्ले के एक घर में हैजा फैले और दूसरे लोग उसे रोकने की चिंता न करें, तो उन्हें भी हैजा का शिकार होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और सामर्थ्य होते हुए भी उसे रोकने का प्रयास न करे, तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार वह भी दण्डनीय समझा जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 45)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 63. प्रत्येक भाषा में प्रकाशन— युग निर्माण के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त साहित्य प्रकाशित करने के लिए देश की प्रत्येक भाषा में प्रकाशक उत्पन्न किये जांय, जो व्यवसाय ही नहीं मिशन भावना भी अपने कार्य-क्रम में सम्मिलित रखें और इसी दृष्टि से अपना कार्य-क्रम चलावें। देश में 14 भाषाएं राष्ट्र भाषा का स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। पन्द्रहवीं अंग्रेजी है। इन सभी भाषाओं में युग-निर्माण साहित्य स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित और प्रचारित होने लगे, उसके लिए आवश्यक प्रयत्न किया जाना चाहिये।

🔵 64. अनुवाद कार्य का विस्तार— जो व्यक्ति कई भाषाएं जानते हैं वे एक भाषा का सत्साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद करें और उस भाषा के प्रकाशकों के लिए एक बड़ी सुविधा उत्पन्न करें। भाषाओं की भिन्नता के कारण उच्च कोटि का ज्ञान सीमाबद्ध न पड़ा रहे इसलिये यह अनुवाद कार्य भी स्वतन्त्र लेखन से कम महत्वपूर्ण नहीं है। संसार के महान मनीषियों ने जो ज्ञान अपनी-अपनी भाषाओं में प्रस्तुत किया है उसका लाभ सीमित क्षेत्र में न रहकर समस्त भाषा-भाषी लोगों के लिए उपलब्ध हो ऐसा प्रयास करने से ही एक बड़ी आवश्यकता पूर्ण हो सकेगी। हिन्दी भाषा में परिवार के साहित्यकार जो उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत करें, उनका अनुवाद जल्दी ही देश की 15 भाषाओं में हो जाया करे तो विचार विस्तार का क्षेत्र बहुत व्यापक हो सकता है। आगे चल कर तो यही प्रक्रिया विश्वव्यापी बननी है। संसार के किसी भी कोने में किसी भाषा में छपे उत्कृष्ट विचार विश्व भर की जनता को उपलब्ध हो सकें ऐसे प्रकाशन तन्त्र का विकास होना आवश्यक है और वह हम भी करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 32) 13 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग की अपनी साधना आरम्भ करते हुए आप इस बात के लिए कमर कस कर तैयार हो जाइए कि भूलों त्रुटियों कठिनाइयों और असफलताओं का आपको नित्य सामना करना पड़ेगा, नित्य उनसे लड़ना पड़ेगा, नित्य उनका संशोधन और परिमार्जन करना होगा, और अन्त में एक ना एक दिन सारी कठिनाइयों को परास्त कर देना होगा।

🔴 जैसे भूख, निद्रा, मल त्याग आदि नित्य कर्मों में रोज करते हैं तो भी दूसरे दिन फिर उनकी जरूरत पड़ती है, इस रोज रोज के झमेले से कोई निराशा या अनुत्साहित नहीं होता वरन् धैर्य पूर्वक नित्य ही उसकी व्यवस्था की जाती है। इसी प्रकार गृहस्थ योग की साधना में अपनी या दूसरों की कमजोरी से जो भूलें हों उनसे डरना या निराश न होना चाहिए वरन् अधिक दृढ़ता एवं उत्साह से परिमार्जन का धैर्य पूर्वक प्रयत्न करते रहना चाहिए।

🔵 पूर्ण रूप से सुधार हुआ है या नहीं यह देखने की उपेक्षा यह देखना चाहिए कि पहले की अपेक्षा सात्विकता में कुछ वृद्धि हुई है या नहीं? यदि थोड़ी बहुत भी बढ़ोतरी हुई हो तो यह आशा, उत्साह, प्रसन्नता और सफलता की बात है। बूंद बूंद से घड़ा भर जाता है, कन कन जमा होने से मन जमा हो जाता है, राई राई इकट्ठा करने से पर्वत बन जाता है, यदि प्रति दिन थोड़ी थोड़ी सफलता भी मिले तो हमारे शेष जीवन के असंख्य दिनों में वह सफलता बड़ी भारी मात्रा में जमा हो सकती है। यह सम्पत्ति किसी प्रकार नष्ट होने वाली नहीं है। यह जमा होने का क्रम अगले जन्म में भी जारी रहेगा और लक्ष तक एक न एक दिन पहुंच ही जाया जायेगा, धीरे धीरे सफलता मिले तो अधिक उत्साह से काम करना चाहिए। निराश होकर छोड़ बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 32)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 गम्भीर रहना वैसे सामान्यतया बुरा माना जाता है और समझा जाता है कि हंसना-हंसाना, हल्के-फुल्के रहना अच्छा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य को प्रसन्न चित्त रहना चाहिए किन्तु गम्भीर रहना भी एक कला है। यहां पर गम्भीरता से तात्पर्य जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने से है। प्राचीनकाल से ही जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने की नीति प्रचलित थी, इस चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शितापूर्ण कहा जा सकता है।

🔴 मनीषी, दार्शनिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोग हमेशा जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर रहे हैं। वर्तमान युग में लोग चिन्तित रहते हैं गम्भीर नहीं। चिन्तित रहना एक बात है और गम्भीर रहना दूसरी।

🔵 आधुनिक युग में लोग चिन्ता और तनाव से बचने के लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा नशाखोरी का सहारा लेते रहते हैं। ठाली बैठकर गपशप करना, हल्के-फुल्के तथा गन्दे मजाक करना, ठिठोली करना और उसी में समय काट देना ही एक उनका उद्देश्य होता है। ऐसे लोग अन्दर से चिन्तित तथा तनावग्रस्त होते हैं और बाहर से सस्ते मनोरंजन का आधार लेकर प्रसन्न रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 8) 13 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता 

🔴 अहंकारी यदुवंशी आपस में ही लड़-मरकर खप गए थे। उन पर बाहर से कोई वज्रपात नहीं हुआ था। आग सबसे पहले उसी स्थान को जलाती है, जहाँ से वह प्रकट होती है। उद्दीप्त वासना, अनियंत्रित तृष्णा और उन्माद जैसी अहंकारिता का त्रिदोष, जब महाग्राह की तरह मानवी गरिमा को निगलता-गटकता चला जा रहा हो, तब बच सकने की आशा यत्किंचित ही शेष रह जाती है। वर्तमान में उफनते तूफानी अनाचार को देखते हुए लगता है कि सचमुच हम महाविनाश प्रलय-प्रक्रिया की ओर सरपट चाल से दौड़े चले जा रहे हैं।  

🔵 प्रचण्ड प्रवाह को रोक सकने वाला बाँध विनिर्मित करने, जलधारा को नहरों के माध्यम से खेत-बगीचे तक पहुँचाने का काम तो निश्चय ही बड़ा कष्टसाध्य और श्रमसाध्य है। पर करने वाले जब प्राणपण से अपने पुरुषार्थ को सृजन की सदाशयता के साथ सम्बद्ध करते हैं तो उनकी साधना भी कम चमत्कारी परिणाम उत्पन्न नहीं करती। फरहाद, शीरी को पाने के लिए पहाड़ खोदकर लम्बी नहर निकाल सकने में, एकाकी प्रयासों के बलबूते ही सफल हो गया था। गंगा को स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर बहने के लिए बाधित करने में भगीरथ अकेले ही सफल हो गए थे। व्यापक अन्धकार पर छोटा दीखने वाला सूरज ही विजय प्राप्त कर लेता है, अस्तु यह आशा भी की जा सकती है कि मनुष्य में उत्कृष्टता का उदय होगा, तो यह वातावरण भी बदल जाएगा, जो हर दृष्टि से भयंकर-ही-भयंकर दीख पड़ रहा है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 44)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 विशिष्ट प्रतिभावान व्यक्ति अपने विशेष व्यक्तित्व के द्वारा युग-निर्माण की दिशा में विशेष कार्य कर सकते हैं। कलाकारों का योग इस सम्बन्ध में विशेष रूप से अभीष्ट है। लेखक, कवि, वक्ता, संगीतज्ञ, चित्रकार, धनी, विद्वान, राजनीतिज्ञ, यदि चाहें तो अपनी विभूतियों का सदुपयोग करके नव-निर्माण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के सामने युग-निर्माण योजना निम्न सुझाव प्रस्तुत करती है:—

🔵 61. लेखकों और पत्रकारों से अनुरोध— देश की विभिन्न भाषाओं में जो लेखक और कवि आज कल लेखन कार्य में लगे हुए हैं, उनसे सम्पर्क बना कर यह प्रेरणा दी जाय कि वे युग-निर्माण की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखा करें। इसी प्रकार जो पुस्तक प्रकाशक एवं पत्रकार साहित्य प्रकाशन का कार्य हाथ में लिए हुए हैं, उन्हें मानव जीवन में प्रकाश भरने वाला साहित्य छापने की प्रेरणा की जाय। समाचार-पत्र एवं पुस्तक-विक्रेताओं से भी यही अनुरोध किया जाय कि उन वस्तुओं के विक्रय में विशेष ध्यान दें जो जन कल्याण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है। इसी प्रकार वर्तमान साहित्य क्षेत्र में लगे हुए लोगों से सम्पर्क स्थापित करके उन्हें युग की आवश्यकता पूर्ण करने की प्रेरणा दी जाय।

🔴 62. युग-साहित्य के नव निर्माता— इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में विशेष मनोयोग-पूर्वक युग की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए मिशनरी ढंग से काम करने वाले लेखकों एवं कवियों का एक विशेष वर्ग तैयार किया जाय जो साहित्य-निर्माण कार्य को अपना प्रधान सेवा-साधन बनाकर तत्परतापूर्वक इसी कार्य में लग सकें। ऐसे अनेक व्यक्ति मौजूद हैं जिनमें इस प्रकार की प्रतिभा और सेवा भावना पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, पर आवश्यक साधन, मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन न मिलने से वे अविकसित ही पड़े रहते हैं। अपना प्रयत्न ऐसे लोगों को संगठित एवं विकसित करने का हो। इस अभिरुचि एवं योग्यता के लोगों को ढूंढ़ना, उन्हें इकट्ठा करना और आवश्यक प्रशिक्षण देकर इस योग्य बनाना हमारा काम होगा कि वे कुछ ही दिनों में युग-निर्माता साहित्यकारों की एक भारी आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ में इस प्रतिभा के जो लोग होंगे उन्हें सर्व-प्रथम तैयार करेंगे और उनको आवश्यक शिक्षा देने के लिए जल्दी-जल्दी ही शिविरों की श्रृंखला आरम्भ करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 14)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 शरीर द्वारा किए हुए चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, हिंसा, आदि में मन ही प्रमुख है। हत्या करने में हाथ का कोई स्वार्थ नहीं है वरन् मन के आवेश की पूर्ति है, इसलिए इस प्रकार के कार्य, जिनके करते समय इंद्रियों को सुख न पहुँचता हो, मानसिक पाप कहलाते हैं। ऐसे पापों का फल मानसिक दुःख होता है। स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनों की मृत्यु, धन-नाश, लोक निंदा, अपमान, पराजय, असफलता, दरिद्रता आदि मानसिक दुःख हैं, उनसे मनुष्य की मानसिक वेदना उमड़ पड़ती है, शोक संताप उत्पन्न होता है, दुःखी होकर रोता-चिल्लाता है, आँसू बहाता है, सिर धुनता है।
         
🔴 इससे वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और भविष्य में अधर्म न करने एवं धर्म में प्रवृत्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है। देखा गया है कि मरघट में स्वजनों की चिता रचते हुए ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं कि जीवन का सदुपयोग करना चाहिए। धन नाश होने पर मनुष्य भगवान को पुकारता है। पराजित और असफल व्यक्ति का घमण्ड चूर हो जाता है। नशा उतर जाने पर वह होश की बात करता है, मानसिक दुःखों का एकमात्र उद्देश्य मन में जमे हुए ईर्ष्या, कृतघ्नता, स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता, छल, दम्भ, घमण्ड की सफाई करना होता है। दुःख इसलिए आते हैं कि आत्मा के ऊपर जमा हुआ प्रारब्ध कर्मों का पाप संस्कार निकल जाय। पीड़ा और वेदना की धारा उन पूर्व कृत्य प्रारब्ध कर्मों के निकृष्ट संस्कारों को धोने के लिए प्रकट होती है।

🔵 दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरांत अब दैहिक-शारीरिक कष्टों का कारण समझना चाहिए। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है । इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यंत निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरुप सम्भव है कि वह अगले जन्म में नपुंसक हो जाय। यह नपुंसकता केवल कठोर दण्ड नहीं है, वरन् सुधार का एक उत्तम तरीका भी है।

🔴 कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिए वह सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों के शारीरिक लाभ के लिए पापपूर्ण, अमर्यादित, अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म से ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं। या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग-भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिए सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिए फिर तरोताजा हो जाता है, साथ ही मानसिक दुःख मिलने से मन का पाप-भार भी धुल जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 31) 12 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 साधक सोचता है, इतने दिन से प्रयत्न कर रहा हूं, पर स्वभाव पर विजय ही नहीं मिलती, नित्य गलतियां होती है, ऐसी दशा में साधना चल नहीं सकती। कभी सोचता है हमारे घर वाले उजड्ड, गंवार, मूर्ख और कृतघ्न हैं यह लोग मुझे परेशान और उत्तेजित करते हैं और मेरे जीवन को साधना की नियत दिशा में चलने देते तो साधन व्यर्थ है, इस प्रकार के निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर वह अपने व्रत को छोड़ देता है।

🔴 उपरोक्त कठिनाई से हर साधक को आगाह हो जाना चाहिए। मनुष्य स्वभाव में त्रुटियां और कमजोरियां रहना निश्चित है। जिस दिन मनुष्य पूर्ण रूपेण त्रुटियों से परे हो जायेगा उसी दिन वह परम पद को प्राप्त कर लेगा, जीवन मुक्त हो जायेगा। जब तक उस मंजिल तक नहीं पहुंच जाता, जब तक मनुष्य योनि में है, देव योनि से पीछे है, तब तक यही मानना पड़ेगा कि मनुष्य त्रुटिपूर्ण हैं। जहां कई ऐसे व्यक्तियों का सम्मिलन है जिसमें कोई तो आध्यात्मिक भूमिका में बहुत आगे, कोई बहुत पीछे है ऐसे क्षेत्र में नित नई त्रुटियों का कठिनाइयों का सामने आना स्वाभाविक है। इन में से कुछ अपनी गलती के कारण उत्पन्न हुई होंगी कुछ अन्यों की गलती से।

🔵 यह क्रम धीरे दूर होता जाता है पर यह कठिन है कि अपना परिवार पूर्ण रूपेण देव परिवार हो जाय, इसके लिए बहुत कठिनाई से डरने घबराने या विचलित होने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। समाज का अर्थ ही— ‘‘त्रुटियों के सुधार का अभ्यास’’ है। अभ्यास को निरन्तर जारी रखना चाहिए। योगीजन नित्य प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा-ध्यान आदि की साधना करते हैं, क्योंकि उनको मनोभूमि अभी दोषपूर्ण है, जिस दिन उनके दोष सर्वथा समाप्त हो जायेंगे उसी दिन, उसी क्षण वे ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त कर लेंगे।

🔴 दोषों का सर्वथा अभाव, यह अन्तिम सीढ़ी का सिद्ध अवस्था का लक्षण है। वहां तक पहुंच जाने पर तो कुछ करना ही बाकी नहीं रह जाता। साधकों को यह आशा न करनी चाहिये कि थोड़े ही समय में इच्छित भावनाएं पूर्ण रूप से क्रिया में आ जायेंगी। विचार क्षण भर में बन जाता है पर उसे संस्कार का रूप धारण करने में बहुत समय लगता है हथेली पर सरसों नहीं जमती। पत्थर पर निशान करने के लिए रस्सी की रगड़ बहुत समय तक जारी रहनी चाहिए। स्मरण रखिए से सर्वथा मुक्ति—लक्ष है, ध्येय है, सिद्ध अवस्था है। साधक का आरंभिक लक्षण यह नहीं है। आम का पौधा उगते ही यदि मीठे आम तोड़ने के लिए उसके पत्तों को टटोलेंगे तो मनोकामना पूर्ण न होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 31) 12 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आवेशग्रस्त लोगों का एक और भी तरीका है कि वे आत्महत्या या पलायन की बात सोचते हैं और यह कल्पना करते हैं कि उनके न रहने पर प्रतिपक्षी को कितनी व्यथा सहनी पड़ेगी या कठिनाई उठाने पड़ेगी? जिनको आक्रमण की अपेक्षा आत्मघात सरल प्रतीत होता है वे उस रीति को अपना लेते हैं और जो भी तरीका समझ में आता है उससे आत्मघात कर बैठते हैं।

🔴 हत्या या आत्महत्या मनुष्य के हेय व्यक्तित्व का उभार है। मनुष्य में श्रेष्ठता और दुष्टता दोनों के अंश होते हैं। प्रयत्नपूर्वक उसकी करुणा और सहृदयता भी जगाई जा सकती है, जिससे प्रेरित होकर वह सेवा-सहायता जैसी सत्प्रवृत्तियां भी अपना सकता है, पर इसके लिए जन्मजात संस्कार ही नहीं वातावरण और प्रशिक्षण भी ऐसा मिलना चाहिए जिसके प्रभाव से सज्जनता उभरे। ऐसे छोटे-छोटे काम उसे आरम्भ में ही सौंपे जाय, जिसके सहारे सहानुभूति और संवेदना उभरे तथा निजी महत्वाकांक्षाओं के आवेशों पर नियन्त्रण करने का अभ्यास पड़े।

🔵  इसके विपरीत जिन्हें दुश्चिंतन का आधार मिलता है उन्हें कुकर्मियों के दुस्साहसों में शौर्य-पराक्रम ढूंढ़ने की आदत पड़ जाती है। वह दुर्बलों पर अनीति बरतते-बरतते इतने निष्ठुर हो जाते हैं जो दूसरों का अहित करने की तरह अपने आपको भी प्रतिशोध और आत्म प्रताड़ना का दुहरा काम सहने के लिए बाधित करे—इस मार्ग पर आने की रोकथाम किशोरावस्था में ही करनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 11 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 7) 12 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 यही है अपने समय के मनुष्य का तात्त्विक पर्यवेक्षण। मूर्खता को कहने-सुनने में तो उपहासास्पद बताया जाता है पर वस्तुत: वह इतनी प्रबल एवं आतुर होती है कि उसके आवेश को रोक सकना अच्छे-अच्छों के लिए भी कठिन हो जाता है। यह उन्माद जब सामूहिकता के साथ जुड़ जाता है तो फिर स्थिति उस विशालकाय पागलखाने जैसी हो जाती है, जिसमें रोगी एक-दूसरे को उकसाने, भड़काने, गिराने, सताने जैसी विडम्बनाओं में ही लगे रहते हैं। वे सभी मात्र हानि ही हानि उठाते हैं।

🔵 गीताकार ने सच कहा है कि जब दुनिया सोती है, तब योगी जागते हैं। यह अनबूझ पहेली तभी प्रामाणिक सिद्ध हो सकती है, जब यह सोचा जाए कि असंख्यों अवांछनीयताओं की लहरें उठाते चलने वाले प्रस्तुत प्रवाह के साथ-साथ बढ़ते रहने की अपेक्षा कोई आश्रय दे सकने वाला किनारा खोजा जाए। प्रचलनों से हटकर नए तौर-तरीके अपनाकर, यथार्थता का आश्रय लेने वाली उमंग उमगे, अन्यथा अच्छे-भले नदी-नालों वाली जल सम्पदा, खारे समुद्र में गिरकर अपेय ही बनती चली जाएगी  

🔴 वर्तमान में तो सर्वत्र कुहासा छाया दीखता है। पतझड़ की तरह सर्वत्र ठूँठों ही ठूँठों का जमघट दीख पड़ता है। पतन और पराभव का नगाड़ा बजता सुनाई देता है। भविष्य अन्धकारमय प्रतीत होता है और लगता है कि मनुष्य समुदाय अब सामूहिक आत्महत्या करने पर ही उतारू आवेश से बुरी तरह ग्रसित हो रहा है। चूहों और खरगोशों की संख्या जब असाधारण रूप से बढ़ जाती है और उनके लिए खाने, पीने, रहने कि लिए सहारा शेष नहीं रहता, तो वे किसी बड़े जलाशय में डूब मरने के लिए बेतहाशा दौड़ लगाते देखे जाते हैं। चल रही गतिविधियों की समीक्षा करने पर लगता है मानो एक ऐसा तूफान उभर रहा है कि मानवी सत्ता, महत्ता, सम्पदा और प्रगति जैसे संचय में से कुछ भी उनकी चपेट से बचकर रह नहीं सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 6)

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने में कुबेर की सम्पदा और इन्द्र की समर्थता भी कम पड़ती है। तृष्णा की रेगिस्तानी जलन को बुझाने के लिए साधन सामग्री का थोड़ा-सा पानी, कुछ काम नहीं करता। अतृप्ति जहाँ की तहाँ बनी रहती है। थोड़े से उपभोग तो उस ललक को और भी तेजी से आग में ईंधन पड़ने की तरह भड़का देते हैं।

🔵 मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या? वह यक्ष राक्षस की तरह अदृश्य तो रहता है, पर कौतुक-कौतूहल इतने बनाता-दिखाता रहता है कि उस व्यामोह में फँसा मनुष्य दिग्भ्रान्त बनजारे की तरह, इधर-उधर मारे-मारे फिरने में ही अपनी समूची चिन्तन क्षमता गँवा-गुमा दे। तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई से भी बढ़कर है। उसे तो भस्मासुर, वृत्रासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी न कर सके, फिर बेचारे मनुष्य की तो बिसात ही क्या है, जो उसे शान्त करके सन्तोष का आधार प्राप्त कर सके।

🔴 दिग्भ्रान्त मनुष्य अपने आप को शरीर तक सीमित मान बैठा है क्योंकि प्रत्यक्ष तो इतना ही कुछ दीख पड़ता है। मन यद्यपि अदृश्य है, पर वह भी शरीर का एक अवयव है। इसे ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहा जाता है। वासना, तृष्णा इन्हीं दोनों का मिला-जुला खेल है जो अनन्त काल तक चलते रहने पर भी कभी समाप्त नहीं हो सकता। इसी उलझन के भवबन्धनों में बँधा हुआ जीव, चित्र-विचित्र प्रकार के अभाव अनुभव करता, असन्तुलित रहता और उद्विग्नता, चिन्ता, आशंका के त्रास सहता रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि अवांछनीय जाल-जंजालों से अपने को उबारने के लिए कुछ करना तो दूर, सोचने तक का मनुष्य प्रयास नहीं कर पाता, उलटे अनाचारों पर उतारू होकर दूसरों को भी वैसा ही करते रहने के लिए उकसाता रहता है, भले ही वह अनर्थ स्तर का ही घृणित क्यों न हो?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 30)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आक्रमण के बदले में क्या दण्ड मिलते हैं? इसे जानते हुए भी वह उस सम्बन्ध में भी विचार नहीं करता और जिसके साथ चाहे जैसा व्यवहार कर बैठता है। एक ही पक्ष पर आरूढ़ रहता है, दूसरे विकल्प का विचार नहीं करता—ऐसा व्यक्ति शत्रुता को देर तक जकड़े रहता है। साधारणतया प्रेम और द्वेष के आवेश कुछ समय में उतर जाते हैं, पर जब घृष्टता चरम सीमा पर होती है तो उसका दुष्प्रयोजन एक निश्चय की तरह जड़ जमा लेता है और अपनी दृष्टि में जिसे भी अपराधी ठहरा लिया है, उससे प्रतिशोध लिए बिना नहीं मानता।

🔴 आमतौर से हत्याकाण्ड ऐसी ही आवेशग्रस्त मनःस्थिति में होते हैं। दूसरा कारण है—लालच। जिस उपाय से कोई बड़ी पूंजी हाथ लगे उसे कर गुजरने में भी निर्भय लोग चूकते नहीं। उसे यह सोचने की क्षमता नहीं होती कि जिसे सताया जा रहा है उस पर क्या बीतेगी? आवेशग्रस्तों की तरह निर्ममता या नृशंसता भी ऐसा ही मनोविकार है जो संवेदना रहित होता है। उसे दूसरों की पीड़ा के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती, वे ऐसे कुकृत्य कर बैठते हैं जिससे अपने राई भर लाभ के लिए दूसरों को भले ही मर्मांत पीड़ा सहनी पड़े।

🔵  यह अपराधी मनोवृत्ति का चिन्ह है जो संगति और सहमति से पनपती है। हत्याओं-अपराधों का साहित्य बाजार में भरा पड़ा है, अपनी शेखी बघारने के लिए क्रूरकर्मी दूसरे के सामने भी अपने कुकृत्यों की बढ़ी-चढ़ी शेखी बघारते हैं और बताते हैं कि उस शौर्य के बदले उनने कितना लाभ उठाया। ऐसे लोगों की संगति से भी आदर्श विहीन लोगों का मन उस ओर ढुलक जाता है और कौतूहलवश ऐसे कुकृत्य करते-करते वे उस व्यवसाय में कसाइयों की भांति नृशंस हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 30)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 रात्रि को सोने से पूर्व दिन भर के कार्यों पर विचार करना चाहिए।
(1) आज परिवार से सम्बन्ध रखने वाले क्या क्या कार्य किये?
(2) उसमें क्या भूल हुई?
(3) स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया?
(4) भूल के कारण क्या अनुचित कार्य हुआ
(5) क्या क्या कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप हुए?

🔴 इन पांच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यों का विभाजन करना चाहिए और आगे से त्रुटियों के सुधार का उपाय सोचना चाहिए।

(1) भूल की तलाश करना
(2) उसे स्वीकार करना,
(3) गलती के लिए लज्जित होना और
(4) उसे सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना

🔵 यह चार बातें जिसे पसन्द हैं, जो इस मार्ग पर चलता है, उसकी गलतियां दिन दिन कम होती जाती हैं और वह शीघ्र ही दोषों से छुटकारा पा लेता है।

🔴 गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित नई कठिनाइयां आती रहती हैं। कभी अपनी भूल से, कभी दूसरों की भूल से, ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिनका नियत सिद्धान्त से मेल नहीं खाता। इच्छा रहती है कि अपना हर एक आचरण ठीक रहे, हर प्रक्रिया सिद्धान्तानुकूल हो, परन्तु अक्सर भूलें होती रहती हैं, साधक कुछ दिन तक सोचता है कि दस बीस दिन में या महीने में यह दूर हो जायेगी और मेरी सम्पूर्ण क्रियायें सिद्धान्ताकूल होने लगेंगी, पर जब काफी समय बीत जाता है और तब भी भूलें समाप्त नहीं होती तो चिन्ता, निराशा और पराजय की भावनाएं मन में घूमने लगती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 43)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 60. भूत-पलीत और बलि प्रथा— भूत-पलीतों का मानसिक विभ्रम पैदा करके सयाने दिवाने और ओझा लोग भोली जनता का मानसिक और आर्थिक शोषण बुरी तरह करते हैं। मानसिक रोगों, शारीरिक कष्टों एवं दैनिक जीवन में आती रहने वाली साधारण-सी बातों को भूत की करतूत बना कर व्यर्थ ही भोले लोग भ्रमित होते हैं। उस भ्रम का इतना घातक प्रभाव पड़ता है कि कई बार तो उस प्रकार के विश्वास से जीवन-संकट तक उपस्थित हो जाते हैं।

🔴 धर्म-ग्रन्थों में जिन देवी देवताओं का वर्णन है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है। पर उतने से भी सन्तोष न करके लोगों ने जाति-जाति के, वंश-वंश के, गांव-गांव के, इतने अधिक देवता गढ़ लिए हैं कि आश्चर्य होता है। उन पर मुर्गे, अण्डे, भैंसे, बकरे, सुअर आदि चढ़ाते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि दया और प्रेम लिए बने हुए देवता अपने ही पुत्र—पशु-पक्षियों का खून पीवें।

🔵 हमें एक परमात्मा की ही उपासना करनी चाहिए और इन भूत-पलीतों के भ्रम जंजाल से सर्वथा दूर रहना चाहिए। जन-समाज को भी इससे बचाना चाहिए।

🔴 और भी अनेकों कुरीतियां विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाई जाती हैं। हानिकारक और अनैतिक बुराइयों का उन्मूलन करना ही श्रेयस्कर है। सभ्य समाज को विवेकशील ही होना चाहिए और इन उपहासास्पद विडम्बनाओं से जल्दी ही अपने को मुक्त कर लेना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 13)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (1) दैविक, (2) दैहिक, (3) भौतिक। दैविक दुःख वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं, जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। दैहिक दुःख होते हैं, जो शरीर को होते हैं, जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। भौतिक दुःख वे होते हैं, जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं, जैसे भूकंप, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी, युद्ध आदि। इन्हीं तीन प्रकार के दुःखों की वेदना से मनुष्यों को तड़पता हुआ देखा जाता है। यह तीनों दुःख हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्मों के फल हैं। मानसिक पापों के परिणाम से दैविक दुःख आते हैं, शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक और सामाजिक पापों के कारण भौतिक दुःख उत्पन्न होते हैं।
         
🔴 दैविक दुःख-  मानसिक कष्ट, उत्पन्न होने के कारण वे मानसिक पाप हैं, जो स्वेच्छापूर्वक तीव्र, भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं, जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दंभ, घमण्ड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि। इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है, उससे अंतःचेतना पर उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है, जिस प्रकार के धुएँ के कारण दीवार काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गंदा हो जाता है। आत्मा स्वभावतः पवित्र है, वह अपने ऊपर इन पाप-मूलक कुविचारों, प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गंदगी को साफ करूँ?

🔵 पेट में हानिकारक वस्तुएँ जमा हो जाने पर पेट उसे कै या दस्त में निकाल बाहर करता है। इसी प्रकार तीव्र इच्छा से, जानबूझ कर किए गए पापों को निकाल बाहर करने के लिए आत्मा आतुर हो उठती है। हम उसे जरा भी जान नहीं पाते, किंतु आत्मा भीतर ही भीतर उसके भार को हटाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो जाती है। बाहरी मन, स्थूल बुद्धि को अदृष्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता, पर अंर्तमन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है, जिससे वह भार हट जाय। अपमान, असफलता, विछोह, शोक, दुःख आदि यदि प्राप्त होते हों, ऐसे अवसरों को मनुष्य कहीं से एक न एक दिन, किसी प्रकार खींच लाता है, ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 24 Aug 2026

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