शनिवार, 24 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 June 2023

🔷 लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया, उससे सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल, कपट और असत्य आदि दुष्कर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

🔶यदि आपको अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में कुरूपता, कुत्सा और कलुष उन्मुखता का आभास मिले तो समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा सोई हुई है और साथ ही यह भी मान लेना चाहिए कि यह एक बड़ा दुर्भाग्य है-एक प्रचंड हानि है। इतना ही क्यों, वरन् तुरन्त उसे दूर करने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। यदि आप प्रमादवश जिस स्थिति में हैं, उसमें ही पड़े रहना चाहेंगे तो निश्चय ही अपनी ऐसी क्षति करेंगे, जो युग-युग तक, जन्म-जन्मांतरों तक पूरी नही हो सकती।

🔷 जो लोग यह सोचते हैं कि अपनी उन्नति करना एक स्वार्थ मात्र है, वे भारी भ्रम में हैं। अपना उद्धार करना संसार का उद्धार करने का प्रथम चरण है। जो अपना उपकार आप नहीं कर सकता, वह संसार अथवा किसी दूसरे का उपकार क्या कर सकता है? जो स्वयं अच्छा है, वही दूसरों को अच्छा बना सकता है, जो स्वयं उदार और निर्लोभ है, वह ही किसी दूसरे को इसकी शिक्षा दे सकने का अधिकारी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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उन्नति के पथ पर (भाग 1)

प्रत्येक पुरुष में उन्नति की भावना हमेशा विद्यमान रहती है। उसके हृदय में अपने आप को दूसरों से अलग अनुभव करने की एक हूक सी उठती है। वह चाहता है कि मनुष्य मेरा आदर करें और मेरा नाम उन्नति शील पुरुषों की तरह प्रसिद्ध हो जाये। मनुष्य प्रायः प्रत्येक कार्य इसी उद्देश्य को लेकर करता है।

यह उन्नति की भावना एक ऐसी जल धारा है जिसका प्रवाह कभी बंद नहीं होता परन्तु प्रवाह की दिशा बदल सकती है। जब मनुष्य एक तरफ उन्नति नहीं कर पाता तो दूसरी ओर पिल पड़ता है। विद्यार्थी जब पढ़ाई में सबसे आगे नहीं हो सकता तो वह खेलों में प्रसिद्ध होना चाहता है। यदि वहाँ भी सफलता प्राप्त न हो तो वह मजाक, बदमाशी, अधिक बोलना, या कम बोलना-इनमें ही वह साथियों से कहलवा लेना चाहता है कि वह ऐसा ही है। एक प्रकार वह उन्नति अवश्य करता है परन्तु यह नहीं कह सकते कि उसकी उन्नति से जगत् की कितनी उन्नति हुई है।

जब मनुष्य उन्नति करता है या करना चाहता है, तो सबसे पहली कमी जो पथारुढ़ होने से उसे रोकती है वह है आत्म विश्वास की कमी। जब मनुष्य कार्य क्षेत्र में प्रवेश करता है तो दूसरे उन्नत पुरुषों को देखकर उसकी हिम्मत पस्त हो जाती है। “मैं कहाँ, ये कहाँ। जमीन आसमान का अन्तर हैं इनके आगे मेरी कैसे पेश चलेगी।” आदि क्षुद्र विचार उसके नवपल्लवित शुभ विचारों पर आक्रमण कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 23


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शुक्रवार, 23 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 23 June 2023

🔷 यह संसार कर्मभूमि है। कर्म और निरन्तर कर्म ही सिद्धि एवं समृद्धि की आधारशिला है। कर्मवीर, कर्मयोगी तथा कर्मठ व्यक्ति कितनी ही निम्न स्थिति और पिछड़ी हुई अवस्था में क्यों न पड़ा हो, आगे बढ़कर परिस्थितियों को परास्त कर अपना निर्दिष्ट स्थान प्राप्त कर ही लेता है। उठिये अपना लक्ष्य प्राप्त करके दिशा देखिए कि वह किधर आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यह मानकर जीवन पथ पर अभियान कीजिए कि आप एक महापुरुष हैं, आपको अपने अनुरूप, अपने चरित्र के बल पर समाज में अपना स्थान बना ही लेना है।

🔶 आत्म अवमूल्यन आत्महत्या जैसी क्रिया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बनकर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छाप छोड़ना चाहते हैं और आशा करते हैं कि इस आधार पर यश मिलेगा, वे मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करते हैं।

🔷 मुसीबतें दरअसल बोझ नहीं, संकेत हैं जो आत्म विकास का दिशा निर्देश करती हैं। इन संकेतों को समझना और उनसे लाभ उठाना ही मनुष्य की बुद्धिमानी है। यदि इतनी कला मनुष्य को आ जाय तो कठिनाई से बड़ा देवता नहीं, विपत्ति से बढ़कर हितैषी नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अनिश्चित व्यय वाले व्यक्ति

आमदनी का सम्बन्ध हमारी प्रकृति, आदतों, फैशन, रहन सहन का ढंग, जलवायु, देशकाल, आवश्यकताओं, घर के सदस्यों की संख्या, रीति रस्म, आचार व्यवहार पर निर्भर है। इनमें से प्रत्येक का ध्यान हमें रखना पड़ता है। उपभोक्ताओं की परिस्थितियों के अनुसार आमदनी की कमी या अधिकता बदलती रहती है। प्रायः देखा जाता है कि आदत पड़ जाने पर मनुष्य विलासिता पर व्यय करना आवश्यकताओं पर व्यय करने से अधिक उत्तम समझता है। जिस व्यक्ति को शराब, चाय, सिनेमा, वेश्यागमन, तम्बाकू, गाँजा, चरस का व्यसन लग जाता है, वे दूध, दही, मक्खन, हवादार मकान इत्यादि जीवन रक्षण और निपुणता - दायक पदार्थों में व्यय करना पसन्द नहीं करते।

फैशन परस्त लोग घर की गरीबी न देखते हुए भी बाहरी टीपटाप, मिथ्या प्रदर्शन में फंसे रहते हैं। निर्धन लोग थोड़ी सी वाहवाही के लिए कर्ज लेकर विवाह, जनेऊ या दान इत्यादि में व्यय कर देते हैं। गरीब मजदूर भी पान, बीड़ी, सिनेमा, चाय, जुआ, सट्टा, शराब इत्यादि व्यसनों में व्यय करते हुए नहीं डरते। भिक्षुक तक चाय या बीड़ी पीना दूध रोटी से अधिक पसन्द करते हैं।

एक अमीर व्यक्ति के लिए आलीशान महल, बिजली के पंखे, लैम्प, मोटर, फाउन्टेन पेन, भड़कीले वस्त्र, सजावट की वस्तुएँ आराम की वस्तुएँ समझी जायेंगी, किन्तु एक गरीब किसान, या क्लर्क, मामूली दुकानदार नौकरी पेशा के लिए ये ही वस्तुएँ विलासिता की चीजें मानी जावेंगी।

सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10

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गुरुवार, 22 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 22 June 2023

🔷 ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ यह सिद्धान्त मात्र सूक्ति ही नहीं, बल्कि यह पुरुषार्थी एवं परिश्रमी व्यक्तियों का अनुभव सिद्ध सत्य है। परिश्रम के अभाव में प्रतिभा बेकार पड़ी रहती है, पर काम करते-करते योग्यता का विकास हो जाया करता है। प्रतिभा को उन्नति का आधार मानने वालों को यह बात न भूलनी चाहिए कि परिश्रम प्रतिभा का पिता है।

🔶 सहानुभूति दूसरों का प्रेम पाने का सर्वोत्तम उपाय है और आत्म संतोष का सर्वसुलभ साधन है।  जिस व्यक्ति, जिस समाज में सहानुभूति जिन्दा रहती है, दुःख-दर्द और अभाव में भी वहाँ के प्राणी राहत अनुभव करते हैं और दिव्य प्रेम के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करते हैं।

🔷 विश्वास रखिए संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर कोई न कोई महान् पुरुष सोया पड़ा रहता है। आपके अंदर भी है। यदि ऐसा न होता तो एक साधारण दीन-हीन मजूदर का अपढ़ पुत्र अब्राहम लिंकन संसार का महान् व्यक्ति न हो पाता। एक जिल्दसाज की नौकरी करने वाला माइकल फैरिडे महान् वैज्ञानिक न होता। साधारण वकील के स्तर से महात्मा गाँधी विश्व बंधु बापू न हो पाते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 कभी उधार न लीजिये-

उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है। उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है। 

“उधार लेने की आदत कैसी है, इस पर दो राये नहीं हो सकतीं। इसका तो एक ही उत्तर है- आदत बहुत बुरी है। उधार लेते समय तो चाहे वह रुपया हो या और कोई चीज कुछ पता नहीं चलता, परन्तु देते समय दशा बिगड़ जाती है। ऐसा लगता है, जैसे पैसे फेंक रहे हैं। धीरे-2 यह आदत इतनी जोर पकड़ती है कि उधार की चीज या पैसा लौटाने को मन नहीं होता और फल यह होता है- मित्रों का कन्नी काटना, समाज में निरादर, बदनामी आदि। फिर वह “भेड़िया आया” वाली बात होती है। यदि कभी वास्तविक आवश्यकता पड़ी भी तो पैसा नहीं मिलता। इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ऋण के चार प्रमुख कारण बतलाये हैं- कपड़े-लत्ते, जूता, तड़क भड़क और आमोद-प्रमोद। ऋण पर ऋण बढ़ता है और उसका तार जीवन भर नहीं छूटता। शुक्ल जी लिखते हैं-“ऋण एक नाले के समान है, जो ज्यों ज्यों आगे चलता है, त्यों त्यों बढ़ता है। सबसे बुरी बात ऋण में यह है कि जिसे ऋण का अभ्यास पड़ जाता है, उसकी घडक खुल जाती है, उसे आगम का भय नहीं रहता और जब तक उसका नाश नहीं होता, तब तक वह विष का घूँट बराबर पिये जाता है। यदि उसका चित्त ऐसा हुआ कि जिसमें लतें जल्दी लगती हो, तो वह निर्द्वन्द्व न रह सकेगा, ऋण के बराबर बढ़ते हुए बोझ से दब कर वह छटपटाया करेगा।

आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये। व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है। बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है। सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है। टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है।

अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10


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बुधवार, 21 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 21 June 2023

🔶 असंतोष से असंतोष का जन्म होता है। यदि आज हम किसी के लिए असंतोष के कारण बनते हैं, तो यह न समझना चाहिए कि उसे सताकर हम स्वयं सुख-शान्ति से रह सकेंगे। पहली बात तो यह है कि मनुष्य की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिशोधगामिनी होती है। उसकी प्रेरणा रहती है कि जिसने उसके साथ दुःखद व्यवहार किया है उसके साथ भी वैसा ही दुःखद व्यवहार करके बदला लिया जाये। इस प्रकार विद्वेष की कष्ट एवं हानिमूलक परम्परा लग जाती है जिससे सूत्रपाती तथा प्रतिशोधी दोनों ही समान रूप से अशांत तथा संतप्त रहते हैं।

🔷 यदि हम सुंदर बनना और सुंदरता को स्थिर रखना चाहते हैं तो हमें प्रसाधन अथवा शृंगार सामग्री के स्थान पर आंतरिक दशा को सुधारने का प्रयत्न करना होगा। यदि हमारा स्वभाव क्रोधी है, हम ईर्ष्या-द्वेष से जलते-भुनते रहते हैं, लोभ, स्वार्थ अथवा पराया धन प्राप्ति की विषैली भावना को पालते रहते हैं, तो दुनिया भर के प्रसाधनों का प्रयोग करते रहने पर भी हमारा व्यक्तित्व मोहक अथवा मनभावन नहीं बन सकता।

🔶 केवल राम-नाम लेने से आत्मिक उद्देश्य पूरे हो सकते हैं, इस भ्रान्त धारणा को मन में से हटा देना चाहिए। इतना सस्ता आत्म कल्याण का मार्ग नहीं हो सकता। पूजा उचित और आवश्यक है, पर उसकी सफलता एवं सार्थकता तभी संभव है, जब जीवन क्रम भी उत्कृष्ट स्तर का हो, अन्यथा तोता रटन्त किसी का कुछ हित साधन नहीं कर सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (अन्तिम भाग)

तप का एक मात्र कार्य आत्मा पर पड़े हुए मल को-या आवरण को दूर करने मात्र का ही है। व्यास ने स्वाध्याय को परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला इसी लिए बतलाया है क्योंकि जो आवरण के अन्धकार में चला गया है उसे प्रकट करने के लिए अन्धकार को दूर करने की आवश्यकता है।

जीवन का उद्देश्य कुछ भी हो, उस उद्देश्य तक जाने के लिए भी स्वाध्याय की आवश्यकता होती है। स्वाध्याय जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने की खामियों को भी दूर कर सकती है। जो स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।

स्वाध्याय को श्रम की सीमा कहा गया है। श्रम में ही पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष तथा स्वर्ग तक के समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं। बिना स्वाध्याय के साँगोपाँग रूप से कर्म नहीं हो सकते और साँगोपाँग हुए बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। इसलिए सम्पूर्ण सिद्धियों का एक मात्र मूल मंत्र है स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।

आत्म निरीक्षण में अपनी शक्ति का निरीक्षण और अपने कर्म का निरीक्षण किया जाता है। शक्ति अनुसार कर्म करने में ही सफलता मिलती है। कौन सी शक्ति किस कर्म की सफलता में सहायक हो सकती है यह बिना ज्ञान हुए भी सफलता नहीं मिलती। ज्ञान का साधन भी स्वाध्याय ही है। इसी कारण ज्ञान हो और प्रमाद से वह विस्मृत हो गया हो तब भी स्वाध्याय की आवश्यकता है। अग्रसर होकर जिस कार्य को किया जाता है, सम्पूर्ण शक्ति जिस कार्य में लगी रहती है, उसकी सिद्धि में किंचित भी सन्देह नहीं करना चाहिए इसीलिए इहलौकिक और पारलौकिक दोनों स्थानों की सिद्धि के लिए, आत्मकल्याण के लिए निरन्तर स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-

स्वाध्यायान्माप्रमदः -स्वाध्याय में प्रमाद न करो और अहरहः स्वाध्यायमध्येतव्यः -रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 दिसम्बर पृष्ठ 4


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मंगलवार, 20 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 20 June 2023

🔶 देवताओं की प्रसन्नता खुशामद पसंद लोभी व्यक्तियों की तरह सस्ती नहीं होती। उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए किसी को भी कदम-कदम पर अपने दोष दुर्गुणों को दूर करना होगा, जीवन को पवित्र बनाना होगा। अपने मन, वचन तथा कर्मों में देवत्व का समावेश करना होगा जिसके लिए आत्म-संयम, त्याग तथा तपश्चर्या पूर्वक जीवन साधना करनी होगी अन्यथा केवल देवदर्शन अथवा दक्षिणा-प्रदक्षिणा द्वारा मनोरथ को सिद्ध नहीं कर सकता।

🔷 महत्वाकाँक्षा बुरी नहीं है, सम्मान एवं आदर की इच्छा है, किन्तु यह अहमन्यता, राग, द्वेष, प्रतिहिंसा, स्पर्द्धा, ईर्ष्या अथवा अपात्रत्व से दूषित हो जाती है तो विष बनकर अपने आश्रयदाता को नष्ट कर देती है। हीनता से भड़की हुई महत्ता की भावना प्रायः ध्वंसक बना देती है जिससे मनुष्य ऐतिहासिक होकर भी अपयश के कारण लोक-परलोक दोनों में पाप एवं अपवाद का भागी बनता है।

🔶 यदि उन्नति की आकाँक्षा है तो साहस संचय कीजिए और आगे बढ़िये। जो कुछ है वह भी जा  सकता है इस अनिष्ट आशंका को दूर भगाइए। संसार में कुछ खो कर ही पाया जा सकता है। खतरा पार करके ही विजय मिल सकती है। बीज गलकर ही फसल प्राप्त हो सकती है। बिना साहस किये और खतरा मोल लिये न तो कोई आज तक आगे बढ़ पाया है और न आगे ही उन्नति कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (भाग 2)

अपने आपको जानने के लिए स्वाध्याय से बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। यहाँ तक इससे बढ़कर कोई पुराण भी नहीं है। शतपथ में लिखा है कि :-
जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है।

मानवजीवन का धर्म ही एक मात्र अध्ययन है। इस धर्म के यह अध्ययन एवं दान के ये ही तीन आधार हैं :-

त्रयोधर्मस्कन्धा यशोऽध्ययनं दानमिति।
छान्दो॰ 2।32।1
अपने स्वत्व को छोड़ना दान कहलाता है और अपना कर्त्तव्य करना यश। लेकिन स्वत्व छोड़ने तथा कर्त्तव्य करने का ज्ञान देने वाला तथा उसकी तैयारी कराकर उस पथ पर अग्रसर कराने वाला स्वाध्याय या अध्ययन है।

किन्हीं महापुरुषों का कहना है कि स्वाध्याय तो तप है। तप के द्वारा शक्ति का संचय होता है। शक्ति के संचय से मनुष्य शक्तिवान बनता है। चमत्कार को नमस्कार करने वाले बहुत हैं, जिसके पास शक्ति नहीं है उसे कोई भी नहीं पूछता। इसलिए जो तपस्वी हैं उनसे सभी भयभीत रहते हैं और उनके भय से समाज अपने अपने कर्त्तव्य का साँगोपाँग पालन करता रहता है।

तप का प्रधान अंग है एकाग्रता। निरन्तरपूर्वक एकाग्रता के साथ निश्चित समय पर जिस कार्य को किया जाता है उसमें अवश्य सफलता मिलती है। उत्कंठा से प्रेरणा मिलती है, और मन के विश्वास में दृढ़ता आती है। बिना दृढ़ता के दुनिया का कोई कार्य कभी भी सफल नहीं हुआ है। अनेकों में दृढ़ता की व्यक्ति की एकाग्रता के लिए अपेक्षा रहती है। और जब नियमितता आ जाती है तो ये सब मिलकर तप का रूप धारण कर लेती है। यह तप आत्मा पर पड़े हुए मल को दूर करेगा और उसे चमका देगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 19 जून 2023

👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (भाग 1)

जितने सन्त तथा महापुरुष हुए हैं उन्होंने स्वाध्याय की महिमा का गान किया है। हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि ‘स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए।’

स्वाध्याय के अर्थ के सम्बन्ध में लोगों में अनेक मतभेद हैं। कुछ लोग पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं, कुछ लोग खास प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं। कुछ का कहना है कि आत्म निरीक्षण करते हुए अपनी डायरी भरने का नाम स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।

स्वाध्याय का विश्लेषण करने वालों ने इसके दो प्रकार से समास किये हैं-

स्वस्यात्मनोऽध्ययनम्- अपना, अपनी आत्मा का अध्ययन, आत्मनिरीक्षण।
स्वयम्ध्ययनम्- अपने आप अध्ययन अर्थात् मनन।

दोनों प्रकार के विश्लेषणों में स्व का ही महत्व है।

प्रति घड़ी प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वयं चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशुओं जैसा है अथवा सत्पुरुष जैसा। आत्मनिरीक्षण की इस प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। जितने महापुरुष हुए हैं वे सब इसी मार्ग का अनुसरण करते रहे। उन्होंने स्वाध्याय के इस मार्ग से कहीं भी अपने अन्दर कमी नहीं आने दी बल्कि समस्त कमियों को निकालने और पूर्ण मानव बनने के उद्देश्य से इस मार्ग को ग्रहण किया।

पानी बहता है क्योंकि उसका बहना ही धर्म है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र चलते हैं। क्योंकि गति करना, चलना यह उनका स्वभाव है। यदि ये अपने स्वभाव को छोड़ दें, गति हीन हो जावें तो सृष्टि का काम ही रुक जावे। ऐसे ही मानव का स्वाभाविक काम स्वाध्याय है जिस दिन वह स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन वह मानवत्व से पतित हो जाता है-

वेद शास्त्रों में श्रम का सब से बड़ा महत्व है। हर एक को कुछ न कुछ श्रम नित्य प्रति करना ही चाहिए। श्रम इसी त्रिलोकी में होता है। भू, भुवः और स्वर्ग लोक ही श्रम का क्षेत्र है। इस श्रम के क्षेत्र में स्वाध्याय ही सबसे बड़ा क्षेत्र है। योग भाष्यकार व्यास का कहना है कि :-

स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय योगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।1।28


अर्थात् स्वाध्याय द्वारा परमात्मा से योग करना सीखा जाता है और समत्व रूप योग से स्वाध्याय किया जाता है। योगपूर्वक स्वाध्याय से ही परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 19 June 2023

डर तभी हो सकता है, जब हृदय कमजोर हो। हृदय कमजोर करने वाली एक ही वस्तु है, संसार में चाहे उसे अविश्वास, अपघात, धोखेबाजी, बेईमानी कह लें अथवा पाप। मुख्य बात यह है कि हमें किसी से भय न हो इसके लिए यह आवश्यक है कि हम किसी के साथ क्षुद्रता न करें। जब कोई बुरी बात मन में आती है तभी मनःस्थिति कमजोर होती है और छुपाने का स्थान ढूँढना पड़ता है। हमारे कार्य इतने स्वच्छ हों कि कभी किसी को अँगुली उठाने का अवसर न मिले तो फिर डर भी किसलिए होगा।
 
सफलता पानी है तो दृढ़ निश्चयी बनिये। एक बार विवेकपूर्वक जो निश्चय कर लीजिए उसे पूरा करने में अपनी सारी शक्तियाँ संगठित रूप से नियोजित कर दीजिए। निश्चय करने से पूर्व अपने हितैषियों, मित्रों एवं शुभचिंतकों से परामर्श कर लेना ठीक हो सकता है, किन्तु निश्चय हो जाने के बाद किसी के कहने से उसे बदलना कमजोरी का द्योतक है।

जिज्ञासा मानव जीवन के विकास का बहुत बड़ा आधार है। जो जिज्ञासु है, जानने को उत्सुक है, वही जानने का प्रयत्न भी करेगा। जो जिज्ञासु नहीं, उसे जड़ ही समझना चाहिए। पेड़-पौधे यहाँ तक पशु-पक्षी भी कुछ नया जानने के लिए कभी उत्सुक नहीं होते। जिज्ञासा की विशेषता ही मनुष्य को पशुओं से भिन्न करती है। वैसे जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य भी अन्यों की तरह दो हाथ-पैर वाला पशु ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 18 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 18 June 2023

जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने के लिए मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति, पूरे प्रयत्न तथा पूरी आयु लगा देनी चाहिए। सफलता बहुत बड़े मूल्य पर ही मिलती है। जो व्यक्ति थोड़े से प्रयत्न के साथ ही मनोवाँछित सफलता पाना चाहते हैं वे उन लोगों जैसे ही संकीर्ण विचार वाले होते हैं जो किसी चीज को पूरा मूल्य दिए बिना ही हस्तगत करने को लालायित रहते हैं। ऐसे लोभी, लालची व्यक्ति का चरित्र किसी समय भी गिर सकता है।

औरों को उपदेश करने की अपेक्षा अपना उपदेश आप कर लिया जाये, औरों को ज्ञान देने की अपेक्षा स्वयं के ज्ञान को परिपक्व कर लिया जाये, दूसरों को सुधारने की अपेक्षा अपने को ही सुधार लिया जाये तो अपना भी भला हो सकता है और दूसरे लोगों को भी कर्मजनित प्रेरणा देकर प्रभावित किया जा सकता है।

कितने आश्चर्य की बात है कि भाग्य के अंधविश्वासी अपनी दशा बदलने का उपाय किये बिना ही बड़ी आसानी से यह मान लेते हैं कि गरीबी तो उनका प्रारब्ध भोग है। वह किसी उपाय अथवा उद्योग से नहीं बदली जा सकती। इसलिए इसके विरोध में डटकर मोर्चा लेना बेकार है। इस प्रकार के भाग्य ज्ञाताओं को जरा सोचना चाहिए कि जब तक उन्होंने परिश्रम एवं पुरुषार्थ नहीं किया, तब तक उन्हें यह किस प्रकार पता चल गया कि कोई भी उद्योग सफल न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ (अंतिम भाग)

अतएव हमें महात्मा कबीरदास की नम्रतापूर्ण उक्ति को सदा ध्यान में रखना चाहिए।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न होय॥


दूसरों के व्यक्तिगत दोषों के प्रति हमारा क्या रुख होना चाहिए इसका विवेचन करते हुए महात्मा तुलसी दास लिखते हैं कि “साधुओं का चरित्र कपास जैसा निर्मल और शुभ्र होता है, उसका फल परम गुणमय होता है और वह स्वयं दुख सहकर दूसरों के पाप रूपी छिद्रों को ढकता है। इसी गुण के कारण वह संसार में वन्दनीय है। अतएव यदि हमें भी इस शुभ्र कपास जैसा वन्दनीय होना है तो हमें दूसरों की व्यक्तिगत भूलों के प्रति बड़ा सहृदय होना चाहिए। सहृदय होने पर ही, हम किसी व्यक्ति के हृदय में स्थान पा सकते हैं। तभी वह हमें अपना हितेच्छु जानकर हम पर अपने हृदय का भेद प्रकट कर सकता है और तभी हम उसके मन की गाँठें खोलने में उसकी सहायता कर उसका सच्चा सुधार कर सकते हैं।

हमें किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत दोषों के लिए जितना सहृदय होना है उतना ही हमें सामाजिक अपराध करने वालों के प्रति निर्मम होना पड़ेगा। सामाजिक अपराध करने वालों के उन अपराधों को हजार कान और आँखों से हमें सुनना और देखना पड़ेगा और उन्हें उनका दण्ड दिलवाना होगा।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 18

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शनिवार, 17 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 June 2023

आवेश एक प्रकार का क्षणिक उन्माद है। पागल व्यक्ति जिस प्रकार कोई काम करते समय उसका परिणाम नहीं सोच पाता, उत्तेजना ग्रस्त मनुष्य का विवेक उसी प्रकार नष्ट हो जाता है। आवेग की अवस्था में किया हुआ काम कभी ठीक नहीं होता। गलती, भूल, उत्तेजना अथवा क्रोध करने वाला अपने कल्याण की आशा नहीं कर सकता।

हर बुद्धिमान् व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है कि वह किसी के वैभव-विलास  से प्रभावित होकर उसका मूल्यांकन करने से पूर्व यह अवश्य देख ले कि इस संपत्ति का आधार नीतिपूर्ण रहा है या नहीं? उसे उसके साधन, उपायों तथा युक्तियों की पवित्रता की खोज कर लेना आवश्यक है, जिससे कि गलत कार्यों के मूल्यांकन का अपराध न हो जाये।

अविश्वास के साथ किया हुआ कोई भी कार्य सफल नहीं होता। अपने प्रयत्नों में विश्वास न रखने वाले व्यक्ति की शक्तियाँ अपमानित जैसा अनुभव करती रहती हैं और कभी भी पूरी तरह से काम नहीं करतीं। वस्तुतः अपने प्रयत्न को दुर्भाग्य का अभिशाप देने वाले नासमझ लोग शुभ संकल्पों का महत्त्व नहीं जानते, इसीलिए आत्म अभिशापित उनके प्रयत्न निष्फल चले जाते हैं। अपने को किसी दूसरे का शाप लगे या न लगे, किन्तु अपना शाप अवश्य लग जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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