शनिवार, 9 अप्रैल 2022

👉 व्यक्ति की पहचान

व्यक्ति को पहचानने की एक ही कसौटी है कि उसकी वाणी घटिया है या बढ़िया। व्याख्यान कला अलग है। मंच पर तो सभी शानदार मालूम पड़ते हैं। प्रत्यक्ष सम्पर्क में आते ही व्यक्ति नंगा हो जाता है। जो प्राण वाणी में है, वही परस्पर चर्चा- व्यवहार में परिलक्षित होता है। वाणी ही व्यक्ति का स्तर बताती है। व्यक्तित्व बनाने के लिए वाणी की विनम्रता जरूरी है। प्याज खाने वाले के मुँह से, शराब पीने वाले मसूड़े के मुँह से जो बदबू आती है, वाणी की कठोरता ठीक इसी प्रकार मुँह से निकलती है। अशिष्टता छिप नहीं सकती। यह वाणी से पता चल ही जाती है। अनगढ़ता मिटाओ, दूसरों का सम्मान करना सीखो। तुम्हें प्रशंसा करना आता ही नहीं, मात्र निन्दा करना आता है। व्यक्ति के अच्छे गुण देखो, उनका सम्मान करना सीखो। तुरन्त तुम्हें परिणाम मिलना चालू हो जाएँगे।

वाणी की विनम्रता का अर्थ चाटुकारिता नहीं है। फिर समझो इस बात को, कतई मतलब नहीं है चापलूसी- वाणी की मिठास से। दोनों नितान्त भिन्न चीजें हैं। दूसरों की अच्छाइयों की तारीफ करना, मीठी बोलना एक ऐसा सद्गुण है, जो व्यक्ति को चुम्बक की तरह खींचता व अपना बनाता है। दूसरे सभी तुम्हारे अपने बन जाएँगे, यदि तुम यह गुण अपने अन्दर पैदा कर लो। इसके लिए अन्तः के अहंकार को गलाओ। अपनी इच्छा, बड़प्पन, कामना, स्वाभिमान को गलाने का नाम समर्पण है, जिसे तुमसे करने को मैंने कहा है व इसकी अनन्त फलश्रुतियाँ सुनाई हैं। अपनी इमेज विनम्र से विनम्र बनाओ। मैनेजर की, इंचार्ज की, बॉस की नहीं, बल्कि स्वयंसेवक की। जो स्वयंसेवक जितना बड़ा हैं, वह उतना ही विनम्र है, उतना ही महान बनने के बीजांकुर उसमें हैं। तुम सबमें वे मौजूद हैं। अहं की टकराहट बन्द होते ही उन्हें अन्दर टटोलो कि तुमने समर्पण किया है कि नहीं।

हमारी एक ही महत्त्वाकाँक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु- शिष्य एक- दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति- पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक- दूसरे से घुल- मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है- दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकाँक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकाँक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (अंतिम भाग)

हमें यह बात किसी भी तरह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ‘नारी’ अर्थात् ‘माँ’ इस जगती का सबसे सुकोमल, संवेदनशील एवं श्रेष्ठतम तत्त्व है। यह उन्हीं जगन्माता की अभिव्यक्ति का सबसे सार्थक माध्यम है, जिनकी उपासना हम नवरात्रि के दिनों में कर रहे हैं। यदि हमें अपना स्वत्व प्राप्त करना है अपने संकल्प को सिद्ध करना है तो हमें इस सत्य को पहचानना होगा। जो तरल प्रेम, वात्सल्य, ममता और परमेश्वरीय करुणा का विग्रह है, उस माँ को और उसके मातृत्व भाव को दूषित, प्रदूषित करने की प्रक्रिया, आधुनिकता के नाम से जानी जाने वाली परम्परा नहीं रुकी, तो पशुवत् मनुष्य ही जन्मेंगे, मनुष्यवत् देवता नहीं।

मातृत्व का सम्यक् बोध, माँ के सही स्वरूप की पहचान नवरात्रि की साधना का सार ही नहीं, हमारी संस्कृति का निष्कर्ष भी है। वेदों की घोषा, अपाला, लोपामुद्रा आदि मंत्रदृष्टाओं में अभ्भृण ऋषि की कन्या ‘वाक्’ का स्थान महिमामय है। उसके द्वारा रचित देवीसूक्त में भावी युगों की शक्ति उपासना का अंकुरण मिलता है। ‘अहं राष्ट्रीय संगमनी वसूनाँ’ एवं ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि’ आदि मंत्रों में वह कहती है कि ‘मैं राष्ट्र को बाँधने वाली शक्ति हूँ। मैं ही उसे ऐश्वर्यों से सम्पन्न करती हूँ। मैं ही ब्रह्मद्वेषियों के संहार के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होकर मनुष्य के लिए संहार करती हूँ।’ स्पष्ट ही इस सूक्त में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के विविध आयाम प्रकट हुए हैं।

यही है हमारे देश में व्याप्त होने वाला मातृभाव। यही है नवरात्रि के दिनों में सारे देश में होने वाला प्रेम, करुणा, ममता, वात्सल्य, सृजन एवं पालन, संरक्षण का मातृरूप अवतरण। इस दिव्य भावाभिव्यक्ति को प्रकट करना ही नवरात्रि के नौ दिनों में की जाने वाली साधना का सार है। इसी में निहित है मातृत्व की सम्यक् पहचान। जिसे हम अपनी मानसिक एवं सामाजिक बुराइयों को दूर करके ही पा सकते हैं। नवरात्रि के दिनों में गायत्री महामंत्र के 24 हजार अक्षरों वाले मंत्र के 24,000 जप का अनुष्ठान तो करें ही, पर साथ ही अपने संवेदनशून्य मन को माँ के प्रेम से भी संवेदित करें। अपनी माँ को सच्ची और सम्यक् प्रतिष्ठ प्रदान करने के अधिकारी बनने का अनुष्ठान भी करें। नारी के जीवन में- देश की व्यापकता में, धरती के कण-कण में व्याप्त माँ को यदि हम पहचान सके, उसकी भावभरी पूजा कर सके, तभी हमें सुख-समृद्धि एवं भक्ति-शक्ति के सारे सुफल मिल सकेंगे। माँ की अपार करुणा हम पर बरसेगी और देश ही नहीं हमारा अपना जीवन भी मातृमय हो सकेगा।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 14

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गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 11

हम विचार करते रहते हैं कि कलुषित चूने जैसा, लोगों को खा डालने वाला; दीवार पोतने के काम आने वाला; जहाँ भी डाल दें, वहीं खाली जमीन बना देने वाला बेकार का चूना कपड़े पर डाल दें तो कपड़े को जला दें। मेरा ऐसे चूने जैसा निकृष्ट जीवन यदि हल्दी के साथ मिल गया होता तो रोली बन गया होता। रोली, जिसे हम रोज मस्तक में लगाते हैं और इन्हीं भावनाओं में बहते हुए चले जाते हैं और हमारी उपासना न जाने क्या से क्या हमें दे जाती है?

मित्रो! जब मैं पूजा पाठ करता हूँ, तो इतना हलका फील करता हूँ कि आप जानते नहीं। भावनाओं के प्रवाह, भावनाओं की तरंगें मेरे अंदर बहती रहती हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि मेरा सारे का सारा मस्तिष्क भाव विभोर होता हुआ चला जाता है। मेरा भगवान् हँसता हुआ जाता है और मैं भगवान् की गोदी में बैठा बैठा पूजा करता रहता हूँ। जब मैं कर्मकाण्ड में बैठा रहता हूँ, तो उसमें भावनाओं का सम्मिश्रण होने के बाद क्या मजा आता है? यही पूजा करने की विधि मैं आपको सिखाने वाला था।

मित्रो! उपासना अगला वाला हिस्सा नाम जप के बाद शुरू होता है। इसमें नाम जप के साथ साथ ध्यान का समावेश होता है। ‘धी’ मन की एकाग्रता का प्रतीक है। मस्तिष्क में न जाने कितनी धारायें बहती रहती हैं, कितने कंपन बहते रहते हैं। इसके भीतर जितने प्रशांत प्रवाह बहते हैं, उनका यदि एकीकरण कर लिया जाये, तो न जाने क्या से क्या चमत्कार उत्पन्न हो जाये।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 10

मित्रो! मेरी माला के हर मोती में मेरा राम बैठा हुआ है। उसके हर मनके को मैं घुमाता रहता हूँ और अपने मन की विचारणा को बनाता रहता हूँ। अपने मन के पहिए को घुमाता रहता हूँ और कहता रहता हूँ कि रे मन के पहिए। लौट, सारे संसार का प्रवाह इस तरह से उलटा पुलटा बह रहा है। मुझे माला वाले प्रवाह की ओर लौट जाने दें। मुझे अपना रास्ता बनाने दे। मुझे अपने ढंग से विचार करने दें और मुझे वहाँ चलने दें, जहाँ मेरा प्रियतम मुझे आज्ञा देता है। इसीलिए पूजा के सारे के सारे उपक्रम मेरे सामने खड़े हो जाते हैं।

 हैं तो वे निर्जीव, पर बड़ा अद्भुत शिक्षण करते हैं। मेरे सामने बहुत उपदेश करते हैं। वे सात ऋषियों के तरीके से बैठे रहते हैं। पत्थर का भगवान् बैठा रहता है, मुस्कराता रहता है। मेरे सामने कागज की तस्वीर वाला भगवान् बैठा रहता है और जाने क्या क्या सिखाता रहता है और यह भगवान्! जिसका पूजन करने के लिए हमने फूल रख लिये थे, चंदन रख लिया था, चावल रख लिये थे, रोली रख ली थी, उनको भी मैं देखता रहता हूँ, जाने कैसी कैसी भावनायें आती रहती हैं। 

मित्रो! एक हल्दी का टुकड़ा और एक चूने का टुकड़ा है। चूने का टुकड़ा अगर खा लिया जाये तो दिमाग फट जाये और हल्दी? हल्दी, जो साग, दाल में काम आती है, कपड़े में लगा ले, तो वह खराब हो जाये। लेकिन हल्दी और चूने को मिला देते हैं तो रोली बन जाती है। रंग बदल जाता है। मैं विचार करता रहता हूँ कि चूने जैसे निकम्मे प्राण को अपने प्रियतम की हल्दी के साथ घुला मिला दें, ताकि वह रोली बन जाये। और वह रोली भगवान के ऊपर लगा लूँ और अपने ऊपर लगा लूँ, तो मैं धन्य हो जाऊँगा। निहाल हो जाऊँगा। श्री कहलाऊँगा ‘‘श्री’’ कहते हैं रोली को। चूना और हल्दी मिलकर श्री बन जाते हैं, पवित्र लक्ष्मी बन जाते हैं। उसे हम देवता पर चढ़ाते हैं।

 क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 3)

आरती का मतलब होता है श्रद्धास्पद का, पूज्य का, देवी माँ का, भगवान् का दुःख बाँटना। उसकी पीड़ा को अपने माथे पर लेना। उनका भार हल्का कर देना। अपने भिखारीपन को भुलाकर उनकी सेवा में अर्पित होना। उनके साथ अपनी एकात्मता की अनुभूति एवं प्रतीति पाना कि जैसे हम दुःखी-पीड़ित होते हैं, थकते हैं, वैसे ही माँ भी थकती होगी। उसे भूख सताती होगी। इसलिए उनका कष्ट अपने माथे पर लेने के लिए आरती उतारी जाती है। दीपों की लहराती जगमग ज्योति के बीच यह भाव व्यक्त किया जाता है कि ‘मैं प्रस्तुत हूँ माँ। जो तू चाहेगी, कहेगी, वही करूंगा।’ लेकिन हम हैं कि उनसे माँगते ही रहते हैं, उनको सताते ही चले जाते हैं।

माँ मुझे धन दो, यश दो, सन्तान दो, क्या नहीं माँगते। मजे की बात तो यह है कि हमारे पास माँ से माँगने के लिए समय है, उसके पास बैठने के लिए समय नहीं है। इसके लिए बहुत हुआ तो किसी पण्डित, पुजारी को नौकर रख लेंगे। ठीक किसी कुपुत्र या कुपुत्री की तरह, जो अपनी माँ की सेवा न करके, इसके लिए किसी नर्स को रख देती है। भला नर्स की नौकरी और सन्तान की सेवा का सुख या परिणाम क्या समान हो सकता है?

नवरात्रि के दिनों में देश तो मातृमय हो रहा है, हम मन्दिरों और घरों में जुट भी रहे हैं। लेकिन उस परमानन्द के आदिस्रोत से नहीं जुड़ पा रहे, जहाँ से जीवन मिलता और चलता है। कहाँ है मेलों में मिलन का मूलभाव? किधर है विलग के विलीन होने की स्थिति? हमारे अपने-अपने अहं की दीवारें तो यथावत है। माँ को वाणी से तो माँ कह रहे हैं, जोर-जोर से कह रहे हैं, लेकिन हृदय से उसे माँ मान नहीं पा रहे। लगता है कि हम सिर्फ प्रतीक की परिक्रमा, पूजा एवं कर्मकाण्ड तक ही ठहर गए हैं। हम प्रतीति, प्रीति, श्रद्धा, संवेदना, प्रेम एवं माँ के चरणों में अनुराग की एक सच्ची सन्तान की भाँति निष्कपट हो जी नहीं पा रहे। अगर ऐसा होता तो हमारी यह नवरात्रि लोक परम्परा एवं लोक व्यवहार की लीक न रहकर माँ की अलौकिक प्रभा से जगमग कर रही होती। हमारे जीवनों में माँ का दिव्य ज्योति अवतरण हो रहा होता।

कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले वर्ष की ही भाँति हम इस वर्ष की नवरात्रि में फिर से चूक रहे हैं। हम माँ के होकर भी माँ के बन नहीं पा रहे। हम केवल रोटी बनकर उसके सामने माथा नवाते हैं। सुख-साधन, दाम, दुकान की कामना का दम्भ लेकर माँ के पास आते हैं। और यह जबरदस्ती करते हैं कि हम जो चाहते हैं, वह तो तुम्हें देना ही पड़ेगा। हाँ हमें तुम्हारे दुःख से कोई सरोकार नहीं रहा। रोज-मर्रा की तरह नवरात्रि के दिनों में भी हम यह नहीं जान पा रहे कि माँ हमसे यह चाहती है कि हम सब उसकी सन्तानें मिल-जुलकर, एक मन और एक प्राण होकर रहें।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12


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रविवार, 3 अप्रैल 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 9

बेटे, सही क्रिया के प्रति मैं निराशा क्यों उत्पन्न करूँगा? मैंने क्रियाशीलता को जीवन में उतारा है। मैंने माला जपते जपते सन् १९५१ में इतना बड़ा तंत्र खड़ा किया है। मैंने अपने जीवन देवता को सँवारा है। मेरा बेशकीमती समय, सबसे बढ़िया और बेहतरीन समय पूजा में खर्च हुआ है, कर्मकाण्डों में खर्च हुआ है। सबसे बेहतरीन समय और सबसे बढ़िया सवेरे का समय होता है, जो मेरा पूजा में खर्च हुआ है, कर्मकाण्डों में खर्च हुआ है।

सवेरे वाले प्रातःकाल के समय जब गुरुदीक्षा दी जाती है, पढ़ने वाले विद्यार्थी पढ़ाई किया करते हैं और पहलवान लोग अखाड़े में पहलवानी किया करते हैं। संसार के इस सबसे बेहतरीन समय को मैंने कर्मकाण्डों में लगाया है। कर्मकाण्डों के प्रति आपकी आस्था को मैं क्यों कम करूँगा? आपके मन को क्यों डगमगाऊँगा और यह कहूँगा कि फेंक दो माला? न, मैं नहीं कह सकता।

मित्रो! माला मेरे प्राणों से प्यारी है। इसको मैं अपने सीने से लगाए रखता हूँ, हृदय में रखता हूँ। हनुमान् जी के पास भी यह माला थी। सीताजी ने जब उन्हें मोती की माला पहनाई, तो हनुमान् जी ने उसके मोती को तोड़ तोड़कर, घुमा घुमाकर देखा कि इस माला में मेरे रामजी कहाँ हैं।

सीता जी घबराईं। उन्होंने कहा कि राम कहीं माला में होते हैं क्या? हनुमान् जी ने कहा कि वह मेरे हृदय में रहते हैं। उन्होंने कहा कि हृदय चीरकर दिखाओ? हनुमान् जी ने अपना हृदय चीरकर दिखाया। हृदय में सीताराम बैठे हुए थे।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 2)

जगन्माता की श्रद्धा में डूबे, अपने अनुष्ठान संकल्प-साधना में निमग्न सब ऐसे होते हैं, जैसे वे एक ही वृक्ष के पत्ते हों, फूल हों, फल हों, फल में निहित बीज हों। वे सिर्फ पहचान पाना चाहते हैं, अपने अस्तित्व के मूल की पहचान। अपनी सबकी माँ की पहचान, जो सब कुछ देती है, सतत् अविराम। जीवन भी उससे मिलता है, जीवन यापन के साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं। लेकिन हमारी ये सभी इच्छाएँ माँ से जुड़कर ही पूर्ण होती है। जब हम अपने अन्तर का सब कुछ माँ के चरणों में न्यौछावर कर देते हैं और एक आन्तरिक शून्यता की अनुभूति पाते हैं, तो माँ बरबस ही इस शून्यता में पूर्णता भर देती है। क्योंकि शून्यता में ही पूर्णता भरती है। और जब अनेक एक साथ मिलकर मेला बनकर, माला की तरह गुँथकर, आन्तरिक शून्यता को पाते हैं, जो जीवन की परम सम्भावना प्रकट होती है।

जीवन की समस्त सम्भावनाओं की कोख क्या है? जिस कोख में ये सम्भावनाएँ, इस प्रकार के भाव और प्रतीति पलती हैं और जहाँ से वह प्रसवित होती है, वह है मनुष्य के लिए जननी की कोख और सृष्टि के लिए धरती की कोख। इसमें फर्क कोख का नहीं, क्रम का है, कर्म का है, ज्ञान का है। हमारी जननी का माँ होना ही हमारे लिए और सृष्टि के लिए विशिष्ट बात है। जन्म देना और जन्म लेना एक भौतिक एवं प्राकृतिक बात है। पर उसका अच्छा या बुरा होना, मंगलमय या अमंगलपूर्ण होना हमारी और प्रकृति की प्रवृत्ति, संकल्प और संस्कार पर निर्भर है। नारी जननी क्यों बनी? धरती पर अंकुर क्यों उगा? यदि वह ऊटपटांग ढंग से उगा होता तो जंगली होगा और यही किसी माली ने जतन से उगाया होगा तो उपवन और उद्यान की महक लिए होगा। यही क्रम है सृष्टि का, यही सार है मनुष्य के जन्मने और जीने का।यही है जननी के माँ होने का पुण्य प्रताप। अनादि को भी अपना आदि माँ से ही मिलता है।

नवरात्रि के नौ दिन इसी अनादि की आदि ‘माँ’ की पहचान करने के लिए है। अपवाद की बात छोड़ दें तो प्रायः किसी को यह सच्ची पहचान मिल नहीं पायी। हम माँ के द्वार दरबार में आते हैं, घर पर पूजा बेरी के ऊपर रखे माँ के चित्र के सामने माथा नवाते हैं, पर हृदय नहीं उड़ेलते। आन्तरिक शून्यता की अनुभूति नहीं कर पाते। और शून्यता के बिना माँ पूर्णता दे भी तो कैसे? हम दिखावे के लिए माँ की आरती उतारते हैं, पर दरअसल हम अपना आरत (दुःख) माँ के माथे मढ़ते हैं। भूखे रहकर मढ़ते हैं, कीर्तन करके मढ़ते हैं, जप करके मढ़ते हैं। उसकी पूजा करने का धोखा देकर मढ़ते हैं। जैसे माँ नहीं अपना दुःख, पीड़ा फेंकने का कोई कूड़ा-घर हो। भला यह कैसी पूजा, जिसमें श्रद्धा कम, लोभ और भय अधिक समाया रहता है। तनिक निहारें तो सही अपने अंतर्मन को कि नवरात्रि के ये नौ दिन हमारी श्रद्धा के हैं या स्वार्थ के? प्रार्थना के हैं अथवा फिर कामना या वासना के।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2002/April/v1.12

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शनिवार, 2 अप्रैल 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 8

तुम्हारी प्रक्रिया और तुम्हारी गतिविधियाँ तुम्हारे पल्ले में, लेकिन मेरे शरीर को और मेरे आदर्श को व्यथित नहीं किया जा सकता। घिसो जितना घिस सकते हो। मैंने भी घिसा। घिसते घिसते पसीना निकाल दिया। वह एक रत्ती मात्र रह गया। उसकी सारी की सारी हड्डियों को लोगों ने पीस डाला, लेकिन चंदन सुगंध फैलाता रहा। जब ऐसा महान देवत्व लकड़ी में है, यदि ऐसा ही इंसान में हो जाये तब? तब हम लकड़ी के चंदन को घिसेंगे मस्तक पर लगायेंगे और सोचेंगे कि हे चंदन! अपनी जैसी वृत्तियाँ कुछ हमारे मस्तिष्क में भी ठोंक, जिसमें कि कषाय कल्मष भरे पड़े हैं।

 ईर्ष्या और द्वेष भरे पड़े हैं। डाह और छल भरे पड़े हैं। आकांक्षाएँ, इच्छाएँ भरी हुई पड़ी हैं। हमारे सामने न कोई आदर्श है, न कोई उद्देश्य। हे चंदन! आ और घुस जा हमारे दिमाग में अपनी वृत्तियों सहित। हमने तुझे हरदम लगाया, पर भावना रहित होकर लगाया।

मित्रो! पूजा का उद्देश्य बहुत ही विशेष और महत्त्वपूर्ण है। पूजा के पीछे न जाने क्या क्या विधान और उद्देश्य भरे पड़े हैं। पर क्या कभी यह हमारे दिमाग में आया? कभी नहीं आया। केवल लक्ष्यविहीन कर्मकाण्ड, भावनारहित कर्मकाण्ड करते रहे, जिनके पीछे न कोई मत था न उद्देश्य। जिनके पीछे न कोई भावना थी न विचारणा। केवल क्रिया और क्रिया...। ऐसी क्रिया की मैं निन्दा करता हूँ और ऐसी क्रिया के प्रति आपके मन में अविश्वास पैदा करता हूँ, बाधा उत्पन्न करता हूँ।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

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👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग १)

नवरात्रि के नौ दिनों में सम्पूर्ण देश मातृमय हो रहा है। हम सभी देशवासियों का मन अपने मूल में उतरने की कोशिश में है। मनुष्य अपने जन्म और जीवन के आदि को यदि सही ढंग से पहचान सके, उससे जुड़ सके तो उसके सारे पाप-ताप अनायास ही शान्त हो जाते हैं। युगशक्ति जगन्माता गायत्री और उसके काली, दुर्गा, तारा आदि विविध रूपों की उपासना का रहस्य यही है। श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास रूपिणी माँ को सभी भूतों-प्राणियों, चर-अचर सभी में अनुभव कर मन अनायास पवित्रता से भर जाता है। माँ की उपासना से हमारी आत्मा को ढाँकने-ढाँपने वाला कुहासा कुछ-कुछ ही सही हटता है। नवरात्रि के पर्व की खासियत यही है कि समग्र भारतीय मन समेकित रूप में माँ के द्वार-दरबार पर आ खड़ा होता है।

सभी की कोशिश रहती है, अपने अनादि और आदि को देखने की, अपनी अनन्त जीवन यात्रा को आगे बढ़ाने की। जिसमें कुछ भी पुराना नहीं होता, नित्य नया-नया घटित होता रहता है। माँ की शक्ति के प्रभाव से बीज और वृक्ष का चक्र यूँ ही चलता रहता है। जीवन चक्र का कोई भी सत्य हो, सबमें बीज अवधारणा में है। बीज का अंकुरण, उसका पौधा बनना, तना बनना, फूल बनना, फल बनना और फिर बीज बन जाना। समूचा वृक्ष फिर से बीज में समा जाता है। अपनी नयी पूर्णता पाने के लिए। यही है चिर पुरातन, किन्तु नित्य नूतन सृष्टि का सनातन क्रम। इस सबका मूल, अनादि और आदि है ‘माँ’। मनुष्य के ही नहीं सृष्टि के अन्तर्बाह्य में मातृत्व का वास है।

माँ को केन्द्र में रखकर नवरात्रि के उत्सव का उल्लास छाता है। गली-गली में मेला जुड़ता है। इन मेलों का भी अपना एक खास कोमल मन होता है। मानव मन में समायी भाव संवेदना की अभिव्यक्ति होता है, मेला और मिलन। हमारे देश के मनीषियों ने चेताया है कि अलग-अलग आयु, लिंग और योग्यता के लोग मेले में मिलते हैं तो वे गिने जाने के लिए नहीं, अपनी किसी तोल, भाव के लिए नहीं, अलग से पहचान के लिए नहीं, वे भाव रूप में एक होने के लिए होते हैं। सबकी अलग-अलग मनौतियाँ होती हैं, सब अलग-अलग आए होते हैं, लेकिन माँ के द्वार पर सबका मिलन-मेला महान् माँगल्यमय होता है। विषम होते हुए भी सब एक क्षण के लिए सम हो जाते हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12


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मंगलवार, 29 मार्च 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 7

लेकिन हाय रे अभागे लोग! जिनको हम केवल कर्मकाण्ड सिखाते रहे और यह सिखाते रहे कि चावल फेंकते रहना, रोली फेंकते रहना, धूप जलाते रहना, फूल चढ़ाते रहना और चंदन चढ़ाते रहना। लेकिन चंदन जैसे सुगंधित जीवन जीने का ख्याल नहीं आया। चंदन हमने सिर पर लगाया था तो जरूर, पर कभी यह ख्याल नहीं आया कि चंदन जैसा जीवन जियें। सारे मस्तक को हम चंदन से लेप लेते हैं, लेकिन यह कभी नहीं सोचते कि तेरी जैसी उपमा, तेरे जैसा जीवन बनाने का शिक्षण हमारे मस्तिष्क को दे।

सुगंध से भरा हुआ चंदन, साँप को छाती से लपेटे रहने वाला चंदन, आस पास उगे हुए छोटे छोटे पौधों को अपने समान बनाने वाला चंदन, घिसे जाने पर भी सुगंध फैलाने वाला चंदन, जलाये जाने पर भी सुगंध देने वाला चंदन, क्या मजाल कि उसे गुस्सा आ जाय। चंदन, हम तो तुम्हें जलायेंगे। जला लो, पर मुझमें तो सुगंध निकलेगी। लेकिन सुगंध न निकली तब? गालियाँ दीं तब? चंदन कहता है कि ऐसा होना बड़ा कठिन है। मैं कैसे गालियाँ दूँगा। गालियाँ मेरे पेट में हैं कहाँ? मेरे पेट में तो केवल सुगंध है। चंदन को हम जलाते रहे, गालियाँ देते रहे और चंदन खुशबू फैलाता रहा। उसको गुस्सा कहाँ आया? उसके मन में क्रोध कहाँ आया? उसके मन में ईर्ष्या कहाँ आई?

मित्रो! ईसा को फाँसी पर चढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि ये लोग नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं? हे परमपिता परमात्मा! इन्हें क्षमा करना। ईसामसीह उनके लिए क्षमा की भीख माँगते रहे और उन्हें सूली पर टाँगा जाता रहा। खून टपकता रहा और कीलें गाड़ी जाती रहीं। चंदन जैसे हड्डियों को निचोड़ा जाता रहा। चंदन को भी पत्थर पर घिसा जा रहा था। हमने उस चंदन से पूछा कि तुम्हें दर्द नहीं होता। चंदन ने कहा कि यह तुम्हारा काम है और वह तुमको मुबारक हो।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

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सोमवार, 28 मार्च 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 6

मित्रो! भावनाओं से भरी हुई, भावनाओं से रंगी हुई जब कभी भी आपकी जिंदगी होगी, तब रामकृष्ण परमहंस की तरह से आपको सर्वत्र काली नजर आयेगी। मीरा की तरह से एक छोटे वाले पत्थर में आपको भगवान नजर आयेगा तब मीरा दस बारह साल की एक छोटी बच्ची थी। एक बाबा जी आये थे। उससे उसने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा दीजिए। मीरा ने कहा कि भगवान् मिलेगा? महात्मा जी ने कहा कि हाँ, मिल जायेगा। तो हमको भी दर्शन करा दीजिए।

बाबा जी ने अपने झोले में से पत्थर का एक बड़ा सा टुकड़ा निकाला, जो हाथ से छेनी द्वारा तराशा गया था। ऐसा भी चिकना नहीं था, जैसी कि मूर्तियाँ मिलती हैं। गोल सफाचट पत्थर को खोदकर मूर्ति बना दी गयी थी। बाबा जी ने वही मूर्ति मीरा के हाथ में थमा दिया। उसने कहा कि ये कौन हैं? ये तो भगवान् हैं। तो इन भगवान् को मैं क्या मानूँ? उन्होंने कहा कि जो तेरे मन में आये, मान सकती है।

मीरा ने कहा कि मेरे ब्याह शादी की जिरह चल रही है। मैं इनसे ब्याह कर लूँ तो? बाबा ने कहा कि कर लो। फिर तो वह तुम्हारा पति हो जायेगा तेरा भगवान्। बस मीरा का पति हो गया भगवान्। उस गोल वाले पत्थर के टुकड़े को लेकर गिरिधर गोपाल मानकर के मीरा जब घुँघरू पहन करके नाचती थी और जब गीत गाती थी, तो भगवान् का कलेजा गीत में बस जाता था और मीरा का हृदय गीत गाता था।

मित्रो! यह भावनाओं से भरी उपासना जब कभी भी आपके जीवन में आयेगी, तब भगवान् आयेगा और भगवान एवं भक्त दोनों तन्मय हो जायेंगे, तल्लीन हो जायेंगे।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 March 2022

विचारशीलता ही मनुष्य की एकमात्र निधि है। इसी आधार पर उसने उच्च स्थान प्राप्त किया है। इस शक्ति का दुरुपयोग होने लगे तो जितना उत्थान हुआ है, उतना ही पतन भी संभव है। बुद्धि दुधारी तलवार है। वह सामने वाले को भी मार सकती है और अपने को काटने के लिए भी प्रयुक्त हो सकती है। उच्च स्थिति पर पहुँचा हुआ मनुष्य अपने उत्तरदायित्वों को न पहचाने, अपने कर्त्तव्य, कर्म के प्रति आस्थावान् न रहे तो वह अपनी विशेष स्थिति के कारण संसार का भारी अहित करने और भारी अव्यवस्था उत्पन्न करने का कारण बन सकता है।

मनुष्य का जीवनकाल बहुत थोड़ा होता है, किन्तु कामनाओं की कोई सीमा नहीं। इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। भोगों से आज तक कभी आत्म- संतुष्टि नहीं मिली, फिर इन्हीं तक अपने जीवन को संकुचित कर डालना बुद्धिमानी की बात नहीं है। मनुष्य जीवन मिलता है देश, धर्म, जाति और संस्कृति के लिए। बहुत बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह शरीर मिला है। हमें यह बात खूब देर तक विचारनी चाहिए और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए तपने, गलने और विस्तृत होने की परम्परा डालनी चाहिए।

मन को-मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त उड़ानें उड़ने की छूट नहीं देनी चाहिए। शरीर की तरह उसे भी क्रमबद्ध और उपयोगी चिंतन के लिए सधाया जाना चाहिए। कुसंस्कारी मन जंगली सुअर की तरह कहीं भी किधर भी दौड़ लगाता रहता है। शरीर भले ही विश्राम करे पर मन तो कुछ सोचेगा ही। यह सोचना भी शारीरिक श्रम की तरह ही उत्पादक होता है। समय की बर्बादी की तरह ही अनुपयोगी और निरर्थक  चिंतन भी हमारी बहुमूल्य शक्ति को नष्ट करता है। दुष्ट चिंतन तो आग से खेलने की तरह है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 27 मार्च 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? (भाग 5)

कौन मना करेगा? कोई नहीं करेगा। खिला हुआ फूल बीबी के हाथ में रख दिया जाय, तो बीबी मना करेगी क्या? नाक से लगाकर सूँघेगी छाती से लगा लेगी और कहेगी कि मेरे प्रियतम ने गुलाब का फूल लाकर के दिया है। मित्रो! फूल को हम क्या करते हैं? उस सुगंध वाले फूल को हम पेड़ से तोड़कर भगवान् के चरणों पर समर्पित कर देते हैं और कहते हैं कि हे परम पिता परमेश्वर! हे शक्ति और भक्ति के स्रोत! हम फूल जैसा अपना जीवन तेरे चरणारविन्दों पर समर्पित करते हैं। यह हमारा फूल, यह हमारा अंतःकरण सब कुछ तेरे ऊपर न्यौछावर है।

हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं और तेरे पर बलि बलि जाते हैं। हे भगवान्! तू धन्य है। सूरज तेरी आरती उतारता है, चाँद तेरी आरती उतारता है। हम भी तेरी आरती उतारेंगे। तेरी महत्ता को समझेंगे, तेरी गरिमा को समझेंगे। तेरे गुणों को समझेंगे और सारे विश्व में तेरे सबसे बड़े अनुदान और शक्ति प्रवाह को समझेंगे। हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं, तेरे स्वरूप को देखते हैं। तेरा आगा देखते हैं, तेरा पीछा देखते हैं, नीचे देखते हैं। सारे मुल्क में देखते हैं। हम शंख बजाते हैं। शंख एक कीड़े की हड्डी का टुकड़ा है और वह पुजारी के मुखमंडल से जा लगा और ध्वनि करने लगा। दूर दूर तक शंख की आवाज पहुँच गयी। हमारा जीवन भी शंख की तरीके से जब पोला हो जाता है।

इसमें से मिट्टी और कीड़ा जो भरा होता है, उसे निकाल देते हैं।जब तक इसे नहीं निकालेंगे, वह नहीं बजेगा मिट्टी को निकाल दिया, कीड़े को निकाल दिया। पोला वाला शंख पुजारी के मुख पर रखा गया और वह बजने लगा। पुजारी ने छोटी आवाज से बजाया, छोटी आवाज बजी। बड़ी आवाज से बजाया, बड़ी आवाज बजी। हमने भगवान् का शंख बजाया और कहा कि मैंने तेरी गीता गाई। भगवान्! तूने सपने में जो संकेत दिये थे, वह सारे के सारे तुझे समर्पित कर रहे हैं। शंख बजाने का क्रियाकलाप मानव प्राणियों के कानों में, मस्तिष्कों में भगवान् की सूक्ष्म इच्छाएँ आकांक्षाएँ फैलाने का प्रशिक्षण करता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 March 2022

‘खाली मस्तिष्क शैतान की दुकान’ की कहावत सोलह आने सच है। जो फालतू बैठा रहेगा, उसके मस्तिष्क में अनावश्यक और अवांछनीय बातें घूमती रहेंगी और कुछ न कुछ अनुचित, अनुपयुक्त करने तथा उद्विग्न, संत्रस्त रहने की विपत्तियाँ मोल लेगा। लेकिन जो व्यस्त है, उसे बेकार की बातें सोचने की फुरसत ही नहीं, गहरी नींद भी उसी को आती है, कुसंग और दुर्व्यसनों से भी वही बचा रहता है। जो मेहनत से कमाता है, उसे फिजूलखर्ची भी नहीं सूझती। इस प्रकार परिश्रमी व्यक्ति अनेक दोष-दुर्गुणों से बच जाता है।

विश्वास  रखिए दुःख का अपना कोई मूल अस्तित्व नहीं होता। इसका अस्तित्व मनुष्य का मानसिक स्तर ही होता है। यदि मानसिक स्तर योग्य और अनुकूल है तो दुःख की  अनुभूति या तो होगी ही नहीं और यदि होगी तो बहुत क्षीण। तथापि, यदि आपको दुःख की अनुभूति सत्य प्रतीत होती है, तब भी उसका अमोघ उपाय यह है कि उसके विरुद्ध अपनी आशा, साहस और उत्साह के प्रदीप जलाये रखे जायें। अंधकार के  तिरोधान और प्रकाश के अस्तित्व से बहुत से अकारण भय हो जाता है।

दूसरों के प्रति बैर भाव रखने से मानस क्षेत्र में उत्तेजना और असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। हम जिन व्यक्तियों को शत्रु मानते हुए उनसे घृणा करते हैं, उन्हें याद कर अपने ऊपर हावी कर लेते हैं। गुप्त मन में उन वस्तुओं, व्यक्तियों या शत्रुओं के प्रति भय बना रहता है। मानसिक जगत् में निरन्तर बैर और शत्रुता का भाव बना रहने से हमारे स्वास्थ्य पर दूषित प्रभाव पड़ता है। शत्रु भाव हमारी भूख बंद कर देता है-नींद हराम कर देता है। फल यह होता है कि हमारा स्वास्थ्य और प्रसन्नता सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं। हम जीवित रहकर भी दुर्भावनाओं के कारण नरक की यातनाएँ भोगते हैं।

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गुरुवार, 24 मार्च 2022

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 4

मित्रो! हमने दीपक जलाया और कहा कि ऐ दीपक! जल और हमको भी सिखा। ऐ कम हैसियत वाले दीपक, एक कानी कौड़ी की बत्ती वाले दीपक, एक छटाँक भर तेल लिए दीपक, एक मिट्टी की ठीकर में पड़े हुए दीपक! तू अंधकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकता है। मेरे जप से तेरा संग ज्यादा कीमती है। तेरे प्रकाश से मेरी जीवात्मा प्रकाशवान हो, जिसके साथ में खुशियों के इस विवेक को मूर्तिवान बना सकूँ। शास्त्रों में बताया गया है तमसो मा ज्योतिर्गमय’’। ऐ दीपक! हमने तुझे इसलिए जलाया कि तू हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले तमसो मा ज्योतिर्गमय अंतरात्मा की भूली हुई पुकार को हमारा अंतःकरण श्रवण कर सके और इसके अनुसार हम अपने जीवन को प्रकाशवान बना सकें।

अपने मस्तिष्क को प्रकाशवान बना सकें।दीपक जलाने का यही उद्देश्य है। सिर्फ भावना का ही दीपक जलाना होता, तो भावना कहती कि दीपक जला लीजिए तो वही बात है, मशाल जला लीजिए तो वही बात है, आग जला लीजिए तो वही बात है। स्टोव को जला लीजिए, बड़ी वाली अँगीठी, अलाव जलाकर रख दीजिए। इससे क्या बनने वाला है और क्या बिगड़ने वाला है? आग जलाने से भगवान् का क्या नुकसान है और दीपक जलाने से भगवान् का क्या बनता है? अतः ऐ दीपक! तू हमें अपनी भावना का उद्घोष करने दे।

साथियो! हम भगवान् के चरणारविन्दों पर फूल चढ़ाते हैं। हम खिला हुआ फूल, हँसता हुआ फूल, सुगंध से भरा हुआ फूल, रंग बिरंगा फूल ले आते हैं। इसमें हमारी जवानी थिरक रही है और हमारा जीवन थिरक रहा है। हमारी योग्यताएँ प्रतिभायें थिरक रही हैं। हमारा हृदयकंद कैसे सुंदर फूल जैसे है। उसे जहाँ कहीं भी रख देंगे, जहाँ कहीं भी भेज देंगे, वहीं स्वागत होगा। उसे कुटुम्बियों को भेज देंगे, वे खुश। जब लड़का कमा कर लाता है। आठ सौ पचास रुपये कमाने वाला इंजीनियर पैसा देता है, तो सोफासेट बनते हुए चले जाते हैं। माया घर में आती हुई चली जाती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 March 2022

इस तथ्य को हमें हजार बार समझना चाहिए कि मनुष्य हाड़-मांस का पुतला नहीं है। वह एक चेतना है। भूख चेतना की भी होती है। विषाक्त आहार से शरीर मर जाता है और भ्रष्ट चिंतन से आत्मा की दुर्गति होती है। प्रकाश न होगा तो अंधकार का साम्राज्य ही होना है। सद्ज्ञान का आलोक बुझ जाएगा तो अनाचार की व्यापकता बढ़ेगी ही। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट कर्तृत्व का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में सामने आ सकता है।

जो व्यक्ति कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं से घबड़ाकर हिम्मत हार बैठा, वह हार गया और जिसने उनसे समझौता कर लिया, वह सफलता की मंजिल पर पहुँच गया। इस प्रकार हार बैठने, असफल होने या विजयश्री और सफलता का वरण करने के लिए और कोई नहीं, मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है। चुनाव उसी के हाथ में है कि वह सफलता को चुने या विफलता को। वह चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और चाहे तो अभिशाप भी।

विनोद वृत्ति जहाँ स्वस्थ चित्त की द्योतक है, वहीं बात-बात पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति हीन भावना एवं रुग्ण मनःस्थिति का परिणाम है। हास-परिहास स्वस्थ होता है, किन्तु दूसरों का उपहास सदा कलहकारी एवं हानिकर होता है। खिल्ली उड़ाना तथा विनोद करना दो सर्वथा भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। खिल्ली उड़ाने वाली प्रवृत्ति प्रारंभ में भले ही रोचक  प्रतीत हो, किन्तु उसका अंत सदा आपसी दरार, तनाव और कटुता में होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 22 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १५

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

सद्गुणों की मनुष्य में कमी नहीं है, जिसे बुरा या दुर्गुणी कहते हैं वह बेशक देव श्रेणी के सुसंस्कृत मनुष्यों से सात्विक गुणों में पीछे है तो भी यथार्थ में ऐसी बात नहीं है, वह बिलकुल बुरा ही हो। निष्पक्ष रीति से यदि उसकी मनःस्थिति का परीक्षण किया जाए तो बुराइयों की ही अधिक मात्रा उसमें न मिलेगी। चौरासी लाख योनियों को पार करता हुआ जो प्राणी मुक्ति के अंतिम प्रवेश द्वार पर आ खड़ा हुआ है वह उतना घृणित नहीं हो सकता जितना कि समझा जाता है। जो विद्यार्थी एम० ए० के प्रथम वर्ष में है, कॉलेज की सर्वोच्च डिग्री प्राप्त करने में जिसे केवल एक ही वर्ष और लगाना शेष रह गया है, क्या आप उसे अशिक्षित, बेपढ़ा -लिखा कहेंगे? आवेश में चाहे जो कह सकते हैं पर शांत अवस्था में यह मानना पडेगा कि इतना अधिक परिश्रम करने के उपरांत इतनी कक्षाओं को उत्तीर्ण करता हुआ जो छात्र एम० ए० के प्रथम वर्ष में है वह पढ़ा है, विद्यावान है।
संभव है आप अपने को, दुर्गुणी अनुभव रहित, अल्पज्ञ, अशक्त या ऐसे ही अन्य दोषों युक्त समझते हैं, दूसरे लोग जब आपका मजाक उडाते हैं मूर्ख बताते हैं विश्वास नहीं करते, नाक- भौं सिकोड़ते है, सहयोग नहीं करते और बार-बार यह कहते हैं कि अभागे हैं, बेवकूफ हैं। नहीं, सदा असफल ही रहेंगे, तो संभव है कि आपका मन बैठ जाता हो और सोचते हों कि इतने लोगों का कहना क्या झूँठ थोडे ही होगा, हो सकता है कि मैं ऐसा ही होऊँ। पिछली अपनी दों-चार असफलताओं की ओर जब ध्यान जाता होगा और उन घटनाओं को लोगों के कथन से जोडकर देखते होंगे तो संभव है मन में यह बात और भी बैठ जाती हों कि हम अशक्त हैं, अल्प बुद्धि हैं, ' सद्गुणों से रहित हैं, हमें इस जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।
 
ऐसा भी है कि जब आत्मनिरीक्षण करने बैठते हैं तो विजातीय तत्त्वों पर ही पहले दृष्टि जाती है। किसी प्रीतिभोज में पाँच सौ सभ्य सज्जन उपस्थित हों और उसी में दो उजड्ड शामिल हो जाएँ तो देखने वालों का ध्यान उन उजड्डों की तरफ अधिक आकर्षित होगा। उनकी बेढंगी हरकतें बहुत बुरी लगेंगी, पाँच सौ सभ्य आदमियों की सज्जनता की ओर विशेष ध्यान न जाएगा पर उन दो की करतूतें स्मृति पटल पर गहरी जम जाएँगी। प्रीतिभोज में अनेक सुस्वादिष्ट सामान हों पर हलुआ में मिर्चें गिर पड़ने से उसका स्वाद बिगड़ गया हो तो अनेक सुस्वादिष्ट भोजनों का ध्यान आपको भले ही न रहे पर उस अटपटे हलुए को न भूलेंगे। जब कभी उस प्रीतिभोज का ध्यान आवेगा, उजड्ड आदमियों की हरकतें और मिर्च पड़ा हुआ हलुआ-यह दो बातें जरूर और सबसे पहले याद आवेंगी। शायद आप उन दो ही कारणों से उस भोजन को नापसंद करें। बुराइयों की अपेक्षा अच्छाइयाँ उसमें अधिक थीं, सभ्य आगंतुकों' की और स्वादिष्ट भोंजनों की संख्या अधिक थी तो भी थोडे विजातीय तत्त्वों का मिश्रण आपका ध्यान अधिक खींचने और बुरे निष्कर्ष पर पहुँचाने में समर्थ हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २३

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👉 भक्तिगाथा (भाग ११७)

श्रेष्ठ ही नहीं, सुलभ भी है भक्ति

महात्मा सत्यधृति ने भक्त विमलतीर्थ की यह बात सुनाते हुए कहा- ‘‘उन परमभक्त की बात ने उन दिनों मुझमें नया विश्वास जगाया। मुझे उन्हें सुनकर उस समय ऐसा लगा था कि सब प्रकार की आध्यात्मिक अयोग्यताओं के बावजूद मैं भी भगवान की कृपा का अधिकारी बन सकता हूँ अन्यथा मैं तो स्वयं की ही सोच में डूबकर पूर्णतया निराश हो बैठा था। मुझे लगने लगा था कि जैसे मेरे लिए कोई आशा ही नहीं है लेकिन भक्त विमलतीर्थ ने मेरे अस्तित्त्व में अपनी बातों से नयी चेतना का संचार किया।’’

इतना कहते हुए सत्यधृति ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ आदि महर्षियों की ओर देखा और बोले- ‘‘हे ऋषिगण! मेरे पास अपना कहने जैसा तो कुछ नहीं है, लेकिन यदि आप अनुमति दें, तो उन परमभक्त की कही हुई बातें आप लोगों के सामने रखने का प्रयास करूँ?’’ ‘‘अवश्य महात्मन्!  हम सब अवश्य सुनना चाहेंगे।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के इस कथन का सभी ने हृदय से अनुमोदन किया। पिछले दिनों से महात्मा सत्यधृति के मुख से उनकी भक्तिगाथा सुनते हुए सभी को उनसे एक विचित्र सी निजता हो गयी थी। उपस्थित सभी जनों को वे अपने स्वजन लगने लगे थे। भक्त विमलतीर्थ की बातों को सभी और अधिक सुनना चाहते थे।

सबकी इस उत्कण्ठा से महात्मा सत्यधृति को तो जैसे मनमांगी मुराद मिल गयी। उन्होंने बड़े मीठे स्वर में कहना शुरू किया- ‘‘भक्त विमलतीर्थ का कहना था- यदि पुण्य अथवा पाप प्रबल हो तो आध्यात्मिक साधनाएँ सम्भव नहीं बन पड़तीं क्योंकि पुण्य अपने परिणाम में सुख-समृद्धि के साथ इतने दायित्व ला देता है कि इनके चलते साधनाएँ सम्भव नहीं हो पातीं। इसी तरह पाप अपने परिणाम में विपदाओं के इतने झंझावात खड़े कर देता है कि आध्यात्मिक साधना के बारे में सोचना तक सम्भव नहीं हो पाता। इन दोनों ही स्थितियों में सम्भव और सुगम है- भगवान का स्मरण। इस स्मरण से पाप हो अथवा पुण्य, दोनों का कर्मभार हल्का होने लगता है।

भगवान का स्मरण जैसे-जैसे गहरा व प्रगाढ़ होता है, वैसे-वैसे भगवान के प्रति भाव गहरे होते जाते हैं और उनके मिलने की अभिलाषा भी तीव्र होने लगती है। यह तीव्र अभिलाषा जब विरह का रूप धारण करने लगे तो समझो कि अस्तित्त्व व अन्तःकरण में भक्ति का उदय हो गया। विरह की वेदना के साथ स्मरण व समर्पण दोनों ही गहरे हो जाते हैं। इनकी गहराई में जीवात्मा के पाप व पुण्य, दोनों ही गहरे डूब जाते हैं। जीवन समस्त कर्मभार से मुक्त होने लगता है। यह मार्ग सभी के लिए सुलभ है। इस सर्वसुलभ पथ पर कोई भी चल सकता है। जैसे-जैसे भक्त अपने भक्तिपथ पर चलता है, स्वयं भगवान आगे बढ़कर उसके अवरोध हटा देते हैं। फिर न कोई सम्पदा बाधा बनती है और न ही कोई आपदा। बस मन प्रभुनाम के मनन में लीन होता चला जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३२

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आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 3

मित्रो! आध्यात्मिक व्यक्ति बनने के लिए पूजा की क्रिया करते- करते हम मर जाते हैं। यह आध्यात्मिक शिक्षण है। यह शिक्षण हमको सिखलाता है कि धूपबत्ती जलाने के साथ साथ में हमको यह विचार करना है कि यह हमारे भीतर प्रकाश उत्पन्न करती है। दीपक लेकर हम बैठ जाते हैं। दीपक जलता रहता है। रात में भगवान् को दिखाई न पड़े, बात कुछ समझ में आती है; लेकिन क्या दिन में भी दिखाई नहीं पड़ता? दिन में भगवान् के आगे दीपक जलाने की क्या जरूरत है? इसकी जरूरत नहीं है।

कौन कहता है कि दीपक जलाइए क्यों हमारा पैसा खर्च कराते हैं? क्यों हमारा घी खर्च कराते हैं। इससे हमारा भी कोई फायदा नहीं और आपका भी कोई फायदा नहीं। आपकी शक्ल हमको भी दिखाई पड़ रही है और बिना दीपक के भी हम आपको देख सकते हैं। आपकी आँखें भी बरकरार हैं; फिर क्यों दीपक जलाते हैं और क्यों पैसा खराब करवाते हैं?

मित्रो! सवाल इतना छोटा सा है, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गूढ़ हैं। इसका सम्बन्ध भावनात्मक स्तर के विकास से है। दीपक प्रकाश का प्रतीक है। हमारे अंदर में प्रकाश और सारे विश्व में प्रकाश का यह प्रतीक है। अज्ञानता के अंधकार ने हमारे जीवन को आच्छादित कर लिया है। उल्लास और आनन्द से भरा हुआ, भगवान् की सम्पदाओं से भरा हुआ जीवन, जिसमें सब तरफ विनोद और हर्ष छाया रहता है; लेकिन हाय रे अज्ञान की कालिमा! तूने हमारे जीवन को कैसा कलुषित बना दिया? कैसा भ्रान्त बना दिया? स्वयं का सब कुछ होते हुए भी कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

सब कुछ तो हमारे पास है, पर मालूम पड़ता है कि संसार में हम ही सबसे ज्यादा दरिद्र हैं। हमारे पास किसी चीज की कमी है क्या? हमारे मन की एक एक धारा ऐसी निकलती है कि हमको हँसी में बदल देती है; लेकिन हमको हर वक्त रूठे रहने का मौका, नाराज रहने का मौका, शिकायतें करने का मौका, छिद्रान्वेषण करने का मौका, देश घूमने का मौका, विदेश घूमने का मौका ही दिखाई देता है। सारा का सारा जीवन इसी अशांति में निकल गया।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २२

चिंतन और चरित्र का समन्वय  

अपने दोष दूसरों पर थोपने से कुछ काम न चलेगा। हमारी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं के लिए दूसरे उत्तरदायी नहीं वरन् हम स्वयं ही हैं। दूसरे व्यक्तियों,, परिस्थितियों एवं प्रारब्ध भोगों का भी प्रभाव होता है। पर तीन चौथाई जीवन तो हमारे आज के दृष्टिकोण एवं कर्तव्य का ही प्रतिफल होता है। अपने को सुधारने का काम हाथ में लेकर हम अपनी शारीरिक और मानसिक परेशानियों को आसानी से हल कर सकते हैं।

प्रभाव उनका नहीं पड़ता जो बकवास तो बहुत करते हैं पर स्वयं उस ढाँचे में ढलते नहीं। जिन्होंने चिंतन और चरित्र का समन्वय अपने जीवन क्रम में किया है, उनकी सेवा साधना सदा फलती- फूलती रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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