रविवार, 6 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १९)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ
  
यह अवरोधक शक्ति मन की दूसरी वृत्ति है, जिसका नाम है विपर्यय। विपर्यय का मतलब है, मिथ्या ज्ञान। मिथ्या ज्ञान का मतलब है कि है कुछ, पर दिखता है कुछ। है रस्सी, पर नजर आ रहा है साँप। प्रायः जीवन में यह स्थिति बेहोशी भरे अंधकार के कारण पनपती है। जैसे शराबी, भँगेड़ी, नशा गाढ़ा होने पर कुछ अजीबोगरीब अनुभूतियाँ करते हैं। वैसे ही इन्द्रिय लालसाओं, मानसिक वासनाओं एवं कामनाओं के ज्वार में भी इस मिथ्या ज्ञान की बाढ़ आती है। सारी उम्र कभी न खत्म होने पर भटकन की पर्याय बन जाती है। ध्यान रहे इस विपर्यय की समाप्ति ही प्रमाण का जागरण है। योग साधकों को अपने प्रयासों की दिशा इसी प्रमाण वृत्ति के जागरण की ओर मोड़नी होगी। लालसाओं, वासनाओं एवं कामनाओं का नशा उतरते ही मन की विपर्यय का अवसान हो जाता है।
  
तीसरी वृत्ति विकल्प अथवा कल्पना है। यह मन की बड़ी अद्भुत शक्ति है। सामान्य जन इस शक्ति का  दुरुपयोग करते हुए प्रायः ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं। लेकिन जिन्हें इस शक्ति का थोड़ा-बहुत सदुपयोग करना आ जाता है, वे कवि या कलाकार बन जाते हैं। इस विकल्प वृत्ति का उत्कृष्ट उपयोग ही उनकी कला की उत्कृष्टता की पहचान बनता है। गुरुदेव कहते थे—विकल्प वृत्ति या कल्पना साधारण चीज नहीं है। यह योगियों, साधकों एवं मनस्वियों की चेतना शक्ति का माध्यम बनती है। इसके माध्यम से उनके प्राण प्रवाहित होते हैं। पश्चिम में एक मनोवैज्ञानिक हुए हैं- ‘कुए’। उसने अपने अनगिनत प्रयोगों से कल्पना शक्ति के चमत्कार को साबित कर दिखाया। उसने इस शक्ति का प्रयोग बड़े कठिन एवं जटिल रोगों से ग्रसित लोगों पर किया। अपने प्रयोगों में उसने इन रोगियों से कहा- ‘तुम अपने मन में प्रगाढ़ कल्पना करो कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ। अपना हर पल-हर क्षण इसी कल्पना में बिताओ।’ इस प्रयोग से कुए ने लाखों असाध्य रोगियों को ठीक किया।
  
अब तो पश्चिम में फेथ हीलिंग की एक समूची प्रक्रिया ही चल पड़ी है। यह और कुछ नहीं कल्पना शक्ति की प्रगाढ़ता से होने वाले परिणामों की चमत्कारी विधि है। इसकी महत्ता को न समझ करके हम इस बेशकीमती शक्ति का भारी दुरुपयोग करते हैं। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे- कल्पना का सर्वश्रेष्ठ उपयोग शाश्वत् अनन्तता की अनुभूति में है। विश्व चिन्तन ने मनुष्य जाति को जो सर्वश्रेष्ठ कल्पनाएँ दी हैं, उनमें श्रेष्ठतम कल्पनाएँ उपनिषदों में है। इनमें से किसी एक को भी अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। सोऽहम, अहं ब्रह्मास्मि जैसे श्रेष्ठतम महत्त्वाकांक्षाओं को जीवन में धारण कर कल्पना शक्ति की सहायता से उस परम तत्त्व की अनुभूति पायी जा सकती है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग ३)

मैं अकेला नहीं हम सब

इस तथ्य को भगवान बुद्ध जानते थे। इसलिए उन्होंने अपना कार्यक्रम सुनिश्चित रूप से स्थिर कर लिया था। वे बारबार कहा करते थे कि—‟जब तक एक भी प्राणी इस बन्धन में है तब तक मैं मुक्त नहीं हो सकता। मैं हर बार जन्म लेकर दूसरों को मुक्ति की प्रेरणा दूँगा और जब तक कोई भी जीव भव-बन्धनों में बंधा मिलेगा तब तक उसे छुड़ाने को ही अपना लक्ष बनाये रहूँगा।” सामाजिक जीवन का व्यक्तिगत जीवन से अटूट संबंध है। समाज की उपेक्षा करके एक व्यक्ति यदि अपनी ही भलाई की बात सोचता है तो यह उसकी संकीर्णता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कैसे अध्यात्मवादी कहला सकता है? और कैसे उस संकुचित हृदय वाले तुच्छ व्यक्ति को परमात्मा की महानता को समझने और प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है? परमात्मा दूसरों के लिए ही सब कुछ करने में निरन्तर संलग्न है, फिर उसका सच्चा भक्त अनुदार, स्वार्थी, संकीर्ण एवं केवल अपनी ही बात सोचने तक सीमित कैसे रह सकता है? साधक पर साध्य का कुछ तो प्रभाव पड़ना ही चाहिए। उदार, दानी, सहृदय, उपकारी परमात्मा का भक्त क्या इन गुणों से सर्वथा रहित ही रह जाएगा? क्या वह दूसरों की सेवा और सहायता करके समाज में सज्जनता एवं शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ भी न करके केवल पूजा पाठ में ही बैठा रहेगा?

भगवान का मंदिर तोड़ा न जाय

शरीर भगवान का मन्दिर है। आत्मा का निवास होने से उसकी पवित्रता सब प्रकार अक्षुण्य रखे जाने योग्य है। मंदिर को तोड़-फोड़ डालने वाला व्यक्ति पापी और दुष्ट कहा जाता है। फिर असंयम और अनियमितताओं की कुल्हाड़ी चलाकर शरीर को तोड़-फोड़ डालने वाला मनुष्य भला धर्मात्मा कैसे हो सकता है? मंदिरों का सुधारना, जीर्णोद्धार कराना पुण्य कार्यों में गिना जाता है तो अपने या दूसरों के शरीरों को स्वस्थ एवं सुन्दर बनाना, आत्मा के निवास मंदिर को ठीक करना भी एक धर्म कार्य ही माना जाएगा। हममें से प्रत्येक धर्म प्रेमी और अध्यात्मवादी को ईश्वर उपासना की भाँति ही स्वास्थ्य की समुन्नति की ओर भी रुचि लेनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 35

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १८)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ
  
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि यह शक्ति मन में है। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि प्रमाण हमारे मन की वह उच्चतम क्षमता है, जो सामान्य क्रम में अविकसित अथवा अल्प विकसित या अर्धविकसित दशा में होती है। यदि यह क्षमता ठीक तरह से विकसित या जाग्रत् हो जाए, तो फिर जो कुछ भी जाना जाय सत्य होता है। साधारण तौर पर प्रायः मन की यह शक्ति अविकसित ही रह जाती है। इसका प्रयोग हो ही नहीं पाता। मन की इस शक्ति को समझने के लिए पूज्य गुरुदेव एक उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे- ‘मान लो तुम जिस घर में रहते हो, उस घर में बिजली-बत्ती तो है, पर उसके स्विच का तुम्हें पता नहीं। एकदम घनघोर-घुप अन्धेरा वहाँ छाया रहता है। अब तुम्हें रहना उसी घर में है, और स्विच के बारे में तुम्हें पता नहीं है, तो क्या स्थिति होगी? बस जैसे-तैसे टटोल कर काम चलाना पड़ेगा। कई बार ठोकरें लगेंगी। यह भी हो सकता है कि कई बार सिर फूटे और पैर टूटे। इस अंधेरे के कारण न जाने कितनी मुश्किलें खड़ी होंगी।’
  
अब यदि किसी तरह प्रयास, प्रयत्न से अथवा गुरुकृपा या भगवत्कृपा से बिजली का स्विच मिल जाय, यही नहीं वह स्विच ऑन हो जाय और घर के कोने-कोने में रोशनी बिखर जाय, हर ओर उजियारा फैल जाय, तो एक पल में सारी परेशानियाँ, सारी मुश्किलें समाप्त हो जाएँगी। फिर सब कुछ साफ-साफ नजर आएगा। सत्य प्रश्न या जिज्ञासा की विषय वस्तु न बनकर जीवन का अनुभव हो जाएगा। बस यही है प्रमाणवृत्ति। इसके विकसित होने का मतलब है कि हाथ में स्विच आ गया। कहीं किसी तरह की कोई भटकन नहीं। किसी से कुछ पूछने की भी जरूरत नहीं। किसी तरह के भ्रम अथवा सन्देह की भी कोई गुंजाइश नहीं।
  
बुद्ध, महावीर, श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण या फिर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव इन सबमें इस प्रमाणवृत्ति की स्वाभाविक जागृति थी। गुरुदेव अपने जीवन काल में हजारों जगह गए और वहाँ लाखों लोगों से मिले। लोगों से मिलने का यह सिलसिला तब भी चलता रहा, जब उन्होंने कहीं भी आना-जाना बन्द कर दिया। जहाँ कोई जो भी मिला, गुरुदेव ने उसके प्रश्नों का बड़ी सहजता से समाधान कर दिया। कई बार तो पूछने वाले ने संकोचवश प्रश्न पूछा भी नहीं, और गुरुदेव ने उसके सवाल का सही जवाब दे दिया। उनके प्रवचनों में यह बात रोज ही देखी जाती थी। उस समय जिस किसी व्यक्ति की जो भी जिज्ञासा, शंका या प्रश्न होते, गुरुदेव उसी का समाधान करते। उनके प्रवचनों में एक साथ अनेकों के समाधान का सिलसिला चलता रहता था।
  
किसी के पूछने पर वह हँस देते और कहते- अरे भाई! तुम सोचते हो, टटोलते हो, उलझते हो और मैं सब कुछ साफ-साफ देखता हूँ। मुझे तुम्हारा प्रश्न भी दिखाई देता है, उत्तर भी। मुझे तो तुम्हारे वे अजन्मे सवाल भी दिखाई देते हैं जो कल जन्म लेंगे। साथ ही वे समाधान भी नजर आते हैं, जिनकी तुम्हें कल जरूरत होगी। यह होती है—प्रमाण वृत्ति। इसके विकास का मतलब है सहज बोध की प्राप्ति। फिर उधार के विचारों की, किसी तरह के तर्कजाल की, बौद्धिक जोड़-तोड़ की कोई जरूरत नहीं। गुरुदेव कहते थे कि गायत्री महामंत्र की भावभरी साधना से मन की यह शक्ति अपने आप ही कुछ वर्षों में जाग जाती है। साथ ही इस शक्ति के जागरण में अवरोध उत्पन्न करने वाली शक्ति समूल नष्ट हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग २)

छलाँग नहीं लगाई जा सकती

जो साधक इन आरम्भिक बातों की उपेक्षा करते हैं और समाधि तक ही सीधे पहुँचना चाहते हैं, जीवन को सब प्रकार अस्त-व्यस्त और पतित-गलित स्थिति में पड़ा रखकर जो आध्यात्मिक पूर्णता की बात सोचते हैं, वे अतिवादी ही कहे जायेंगे। आग के बिना जैसे भोजन पका लेना कठिन है वैसे ही आत्मिक प्रगति के आवश्यक उपकरणों का परित्याग कर, शरीर मन और समाज को हीन स्थिति में रखने से प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा? प्राचीन काल में कठिन तपश्चर्या और साधना का मार्ग अपनाकर लोग इन तीनों साधनों को शुद्ध करते थे। आज के जल्दबाज लोगों ने अमुक जगह स्नान कर लेने, अमुक पुस्तक पढ़ लेने, अमुक जप कर लेने मात्र से चुटकियों में परम-लक्ष की प्राप्ति की कल्पना आरम्भ कर दी है। स्नान, पाठ, जप का पूरा लाभ उन्हीं को मिल सकता है जिनके साधन सबल हैं। सब प्रकार की हीन और पतित स्थिति में पड़े हुए लोगों का केवल इन उपचारों का मात्र सहारा लेकर भव-सागर से पार हो सकना कठिन है। यदि यह मार्ग इतना ही सरल होता तो प्राचीन काल में किसी को इतनी कष्ट-साध्य, श्रम-साध्य और समय साध्य साधनाऐं न करनी पड़तीं। वे भी आज के लोगों की तरह कुछ उपचार मात्र करके सब कुछ प्राप्त कर लेने की बात क्यों न सोच लेते?

राजमार्ग यही रहा है

प्राचीन इतिहास पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो हमें अध्यात्म-लक्ष की प्राप्त करने वाले महापुरुषों में प्रथम सोपान की सफलता प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होती है। जिन्होंने परमात्मा की प्राप्ति की, वे परशुराम, विश्वामित्र, अगस्त, शुक्राचार्य, द्रोणाचार्य आदि क्या शारीरिक दृष्टि से दुर्बल थे? अत्रि, वशिष्ठ, अंगिरा, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, गौतम आदि ऋषियों के मानसिक स्तर क्या गिरे हुये थे? समाज को अवसाद की ओर जाते देखकर उसे रोकने के लिए व्यास जी ने पुराणों की साहित्य रचना आरम्भ की थी। चरक, सुश्रुत, वागभट्ट ने आयुर्वेद शास्त्र का निर्माण किया था। नारद जी प्रचार के लिए परिव्राजक बन गये थे। परशुरामजी ने लड़ाई ही ठान दी थी। भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि अर्वाचीन ऋषियों ने भी अस्वस्थ समाज को स्वस्थ बनाने के प्रयत्न को ही अपनी प्रधान साधना बना लिया था। वे जानते थे कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अधिक भाग पतित स्थिति में पड़ा रहे तो थोड़े से साधना-रत व्यक्तियों के लिए भी उस कीचड़ को पार कर सकना कठिन होगा। बलवान हाथी भी दलदल में फंस जाता है, पतित-समाज की परिस्थितियाँ ध्यान, भजन में संलग्न व्यक्तियों का मन भी अपने जाल में उलझा लेती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 35

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

👉 *** जिंदगी की कहानी ***

टॉल्सटॉय की प्रसिद्ध कहानी है कि एक आदमी के घर एक संन्यासी मेहमान हुआ – एक परिव्राजक। रात गपशप होने लगी; उस परिव्राजक ने कहा कि तुम यहाँ क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में मैं यात्रा पर था तो वहाँ जमीन इतनी सस्ती है मुफ्त ही मिलती है। तुम यह जमीन छोड़-छाड़कर, बेच-बाचकर साइबेरिया चले जाओ। वहाँ हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी इतनी जमीन में। वहाँ करो फसलें और बड़ी उपयोगी जमीन है और लोग वहाँ के इतने सीधे-सादे हैं कि करीब-करीब मुफ्त ही जमीन दे देते हैं।
उस आदमी को वासना जगी। उसने दूसरे दिन ही सब बेच-बाचकर साइबेरिया की राह पकड़ी। जब पहुँचा तो उसे बात सच्ची मालूम पड़ी। उसने पूछा कि मैं जमीन खरीदना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा, जमीन खरीदने का तुम जितना पैसा लाए हो, रख दो; और जीवन का हमारे पास यही उपाय है बेचने का कि कल सुबह सूरज के ऊगते तुम निकल पड़ना और साँझ सूरज के डूबते तक जितनी जमीन तुम घेर सको घेर लेना।

बस चलते जाना… जितनी जमीन तुम घेर लो। साँझ सूरज के डूबते-डूबते उसी जगह पर लौट आना जहाँ से चले थे- बस यही शर्त है। जितनी जमीन तुम चल लोगे, उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी।

रात-भर तो सो न सका वह आदमी। तुम भी होते तो न सो सकते; ऐसे क्षणों में कोई सोता है ? रातभर योजनाएँ बनाता रहा कि कितनी जमीन घेर लूँ। सुबह ही भागा। गाँव इकट्ठा हो गया था। सुबह का सूरज ऊगा, वह भागा। उसने साथ अपनी रोटी भी ले ली थी, पानी का भी इंतजाम कर लिया था। रास्ते में भूख लगे, प्यास लगे तो सोचा था चलते ही चलते खाना भी खा लूँगा, पानी भी पी लूँगा। रुकना नहीं है; चलना क्या है; दौड़ना है। दौड़ना शुरू किया, क्योंकि चलने से तो आधी ही जमीन कर पाऊँगा, दौड़ने से दुगनी हो सकेगी – भागा …भागा।

सोचा था कि ठीक बारह बजे लौट पड़ूँगा; ताकि सूरज डूबते – डूबते पहुँच जाऊँ। बारह बज गए, मीलों चल चुका है, मगर वासना का कोई अंत है? उसने सोचा कि बारह तो बज गए, लौटना चाहिए; लेकिन सामने और उपजाऊ जमीन, और उपजाऊ जमीन…थोड़ी सी और घेर लूँ। जरा तेजी से दौड़ना पड़ेगा लौटते समय – इतनी ही बात है, एक ही दिन की तो बात है, और जरा तेजी से दौड़ लूँगा।

उसने पानी भी न पीया; क्योंकि रुकना पड़ेगा उतनी देर – एक दिन की ही तो बात है, फिर कल पी लेंगे पानी, फिर जीवन भर पीते रहेंगे। उस दिन उसने खाना भी न खाया। रास्ते में उसने खाना भी फेंक दिया, पानी भी फेंक दिया, क्योंकि उनका वजन भी ढोना पड़ा रहा है, इसलिए दौड़ ठीक से नहीं पा रहा है। उसने अपना कोट भी उतार दिया, अपनी टोपी भी उतार दी, जितना निर्भार हो सकता था हो गया।

एक बज गया, लेकिन लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे और-और सुंदर भूमि आती चली जाती है। मगर फिर लौटना ही पड़ा; दो बजे तक वो लौटा। अब घबड़ाया। सारी ताकत लगाई; लेकिन ताकत तो चुकने के करीब आ गई थी। सुबह से दौड़ रहा था, हाँफ रहा था, घबरा रहा था कि पहुँच पाऊँगा सूरज डूबते तक कि नहीं। सारी ताकत लगा दी। पागल होकर दौड़ा। सब दाँव पर लगा दिया। और सूरज डूबने लगा…। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई है; लोग दिखाई पड़ने लगे। गाँव के लोग खड़े हैं और आवाज दे रहे हैं कि आ जाओ, आ जाओ! उत्साह दे रहे हैं, भागे आओ! अजीब सीधे-सादे लोग हैं – सोचने लगा मन में; इनको तो सोचना चाहिए कि मैं मर ही जाऊँ, तो इनको धन भी मिल जाए और जमीन भी न जाए। मगर वे बड़ा उत्साह दे रहे हैं कि भागे आओ!

उसने आखिरी दम लगा दी – भागा – भागा…। सूरज डूबने लगा; इधर सूरज डूब रहा है, उधर वो भाग रहा है…। सूरज डूबते – डूबते बस जाकर गिर पड़ा। कुछ पाँच – सात गज की दूरी रह गई है, घिसटने लगा।

अभी सूरज की आखिरी कोर क्षितिज पर रह गई. घिसटने लगा। और जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुँचा, जहाँ से भागा था, उस खूँटी पर, सूरज डूब गया। वहाँ सूरज डूबा, यहाँ यह आदमी भी मर गया। इतनी मेहनत कर ली! शायद हृदय कर दौरा पड़ गया। और सारे गाँव के सीधे – सादे लोग जिनको वह समझाता था, हँसने लगे और एक – दूसरे से बात करने लगे!

ये पागल आदमी आते ही जाते हैं! इस तरह के पागल लोग आते ही रहते हैं! यह कोई नई घटना न थी; अक्सर लोग आ जाते थे खबरें सुनकर, और इसी तरह मरते थे। यह कोई अपवाद नहीं था; यही नियम था। अब तक ऐसा एक भी आदमी नहीं आया था, जो घेरकर जमीन का मालिक बन पाया हो।

यह कहानी तुम्हारी कहानी है, तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, सबकी जिंदगी की कहानी है। यही तो तुम कर रहे हो – दौड़ रहे हो कि कितनी जमीन घेर लें! बारह भी बज जाते हैं, दोपहर भी आ जाती है, लौटने का भी समय होने लगता है – मगर थोड़ा और दौड़ लें! न भूख की फिक्र है, न प्यास की फिक्र है।

जीने का समय कहाँ है; पहले जमीन घेर लें, पहले जितोड़ी भर लें, पहले बैंक में रुपया इकट्ठा हो जाए, फिर जी लेंगे, फिर बाद में जी लेंगे, एक ही दिन का तो मामला है। और कभी कोई नहीं जी पाता। गरीब मर जाते हैं भूखे; अमीर मर जाते हैं भूखे, कभी कोई नहीं जी पाता। जीने के लिए थोड़ी विश्रांति चाहिए। जीने के लिए थोड़ी समझ चाहिए। जीवन मुफ्त नहीं मिलता।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १७)

जीवन कमल खिला सकती हैं—पंच वृत्तियाँ

ऐसा अनूठा रूप परिवर्तित करने वाली वृत्तियाँ हैं कौन सी, इस तत्व को छठे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और भी अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं-
प्रमाणविपर्यय विकल्पनिद्रास्मृतयः॥ १/६॥
  
यानि कि ये वृत्तियां हैं- प्रमाण (सम्यक् ज्ञान), विपर्यय (मिथ्याज्ञान), विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति। ये पाँचों वृत्तियाँ मन की पाँच सम्भावनाएँ हैं, मन के पाँच रहस्य हैं। इन्हें जान-समझ लेने पर समूचे मन को जान-समझ लिया जाता है।  इन पाँच वृत्तियों को मन की पाँच शक्तियाँ भी कहा जा सकता है, जिनके सही सदुपयोग से जीवन सहस्रदल कमल की भांति पुष्पित एवं सुरभित हो उठता है।
  
इस बारे में परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि जीवन को समझना है, तो मन को समझना होगा और मन को समझने के लिए मन की पाँचों वृत्तियों को जान लेना बहुत जरूरी है। तो शुरूआत पहली वृत्ति से करते हैं। यह पहली वृत्ति है ‘प्रमाण’ यानि कि सम्यक् ज्ञान। ‘प्रमाण’ संस्कृत भाषा का बहुत गहरा शब्द है। इसकी गहराई इस कदर है कि किसी भी अन्य भाषा में इसका एकदम सही अनुवाद सम्भव नहीं। यह जो सम्यक् ज्ञान कहा गया, वह ‘प्रमाण’ का सही अर्थ नहीं, बल्कि अर्थ की हल्की सी छाया भर है। दरअसल प्रमाण मूल शब्द ‘प्रमा’ से आया है। इसका भावार्थ है- सत्य-अनुभव। इस प्रमा का करण यानि की प्रमाण। सार संक्षेप में प्रमाण को यथार्थ अनुभव सा सत्य अनुभव करने की शक्ति कहा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अध्यात्म-लक्ष और उसका आवश्यक कर्तृत्व (भाग १)

आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया को अपनाना आवश्यक है। जप, तप, ध्यान-भजन की सारी आध्यात्मिक विधि व्यवस्था इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए है। पर यह उद्देश्य जिन साधनों से प्राप्त होता है वह शरीर, मन और समाज हैं। इनके सुव्यवस्थित रहे बिना आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त होना तो दूर जीवित रहने के दिन कटने भी कठिन हो जाते हैं। साधना का प्रथम सोपान, बाह्य-जीवन को सुव्यवस्थित बनाते हुए आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना है। इस प्रथम कक्षा को उत्तीर्ण किये बिना जो लोग छलाँग मारकर ऊपर चोटी पर चढ़ना चाहते हैं, सीधे प्रत्याहार, समाधि, चक्र-वेधन, कुण्डलिनी जागरण की बात सोचते हैं उन्हें असफलता ही मिलती है। आत्मिक पूर्णता का लक्ष मलीन और दूषित साधनों से कैसे प्राप्त किया जा सकेगा?

लक्ष की ओर गति

स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के सहारे ही आत्मा अपने लक्ष की ओर गतिवान होती है। इसलिए प्रगति की इस पहली मंजिल को हमें सावधानी से पूरा करना चाहिए। इसके बाद अगली मंजिलें बहुत ही सरल हो जाती हैं। प्रथम कक्षा कमजोर रहे तो आगे का काम कैसे चलेगा? जिसके पैर ही कमजोर हैं उससे दौड़ कैसे लगाई जा सकेगी? जिसने प्राथमिक पाठशाला के स्वर, व्यंजन, गिनती, पहाड़े ही ठीक तरह याद नहीं किए हैं, उसके लिए एम.ए. की उत्तीर्णता का स्वप्न, काल्पनिक ही रह जाएगा।

योग-साधना में पहले यम-नियमों की साधना करनी पड़ती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—यम और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है। तप का अर्थ है शारीरिक और मानसिक श्रम—आसन, प्राणायाम, व्यायाम, तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता आदि। इन्हीं या ऐसे ही सद्गुणों से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। सत्य, सन्तोष, स्वाध्याय और ईश्वर उपासना यह चार आधार मानसिक स्वच्छता के लिए हैं। छल-कपट, दंभ-पाखंड आदि कुविचारों का शमन सत्य-निष्ठा से होता है। सन्तोषी को तृष्णाऐं और वासनाऐं क्यों सतावेंगी? स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है। इन्हीं तथ्यों पर कोई समाज फलता-फूलता और संगठित रहता है। यम और नियम योग-साधना के प्राथमिक कार्यक्रम हैं। योग से ही आत्मा की प्राप्ति संभव है। इसलिए लक्ष पूर्ति की सच्ची अभिलाषा जिन्हें है उन्हें सच्चा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 34

👉 Heard the Bhagwat four times

Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

📖 Pragya Puran Stories

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

👉 अच्छे कर्म करते रहिए

एक राजा की आदत थी, कि वह भेस बदलकर लोगों की खैर-ख़बर लिया करता था, एक दिन अपने वज़ीर के साथ गुज़रते हुए शहर के किनारे पर पहुंचा तो देखा एक आदमी गिरा पड़ा हैl

राजा ने उसको हिलाकर देखा तो वह मर चुका था! लोग उसके पास से गुज़र रहे थे, राजा ने लोगों को आवाज़ दी लेकिन लोग राजा को पहचान ना सके और पूछा क्या बात है? राजा ने कहा इस को किसी ने क्यों नहीं उठाया? लोगों ने कहा यह बहुत बुरा और गुनाहगार इंसान है

राजा ने कहा क्या ये "इंसान" नहीं है? और उस आदमी की लाश उठाकर उसके घर पहुंचा दी, उसकी बीवी पति की लाश देखकर रोने लगी, और कहने लगी "मैं गवाही देती हूं मेरा पति बहुत नेक इंसान है" इस बात पर राजा को बड़ा ताज्जुब हुआ कहने लगा "यह कैसे हो सकता है? लोग तो इसकी बुराई कर रहे थे और तो और इसकी लाश को हाथ लगाने को भी तैयार ना थे?"

उसकी बीवी ने कहा "मुझे भी लोगों से यही उम्मीद थी, दरअसल हकीकत यह है कि मेरा पति हर रोज शहर के शराबखाने में जाता शराब खरीदता और घर लाकर नालियों में डाल देता और कहता कि चलो कुछ तो गुनाहों का बोझ इंसानों से हल्का हुआ, उसी रात इसी तरह एक बुरी औरत यानी वेश्या के पास जाता और उसको एक रात की पूरी कीमत देता और कहता कि अपना दरवाजा बंद कर ले, कोई तेरे पास ना आए घर आकर कहता भगवान का शुक्र है,आज उस औरत और नौजवानों के गुनाहों का मैंने कुछ बोझ हल्का कर दिया, लोग उसको उन जगहों पर जाता देखते थे।

मैं अपने पति से कहती "याद रखो जिस दिन तुम मर गए लोग तुम्हें नहलाने तक नहीं आएंगे,ना ही कोई तुम्हारा क्रियाकर्म करेंगा ना ही तुम्हारी चिता को कंधा देंगे वह हंसते और मुझसे कहते कि घबराओ नहीं तुम देखोगी कि मेरी चिता खुद राजा और भगवान के नेक बंदे उठायेंगे..

यह सुनकर बादशाह रो पड़ा और कहने लगा मैं राजा हूं, अब इसका क्रियाकर्म में ही करूँगा ओर इसको कंधा भी में ही दूंगा

हमेशा याद रखिये अपना किया कर्म कभी खाली नही जाता

इसलिए अच्छे कर्म करते रहिए

👉 स्वार्थपरता और संकीर्णता

राष्ट्रीय दृष्टि से स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, असहयोग, संकीर्णता हमारा एक प्रमुख दोष है। सारी दुनियाँ परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ रही है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग के आधार पर ही बढ़ा और समुन्नत हुआ है। जहाँ प्रेम, ममता, एकता, आत्मीयता, सहयोग और उदारता है वहीं स्वर्ग रहेगा। समाजवाद और साम्यवाद की मान्यता यही है कि व्यक्ति को अपने लिए नहीं समाज के लिए जीवित रहना चाहिए। सामूहिक सुख-शान्ति बढ़ाने के लिए अपनी समृद्धि और सुविधा का त्याग करना चाहिए। धर्म और अध्यात्म की शिक्षा भी वही है कि व्यक्ति अपने लिए धन, वैभव जमा न करके अपनी प्रतिभा, बुद्धि, क्षमता और सम्पदा को जीवन निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए ही उपयोग करे और शेष जो कुछ बचता हो सबको सामूहिक उत्थान में लगा दे।

जिस समाज में ऐसे परमार्थी लोग होंगे वही फलेगा, फूलेगा और वही सुखी रहेगा। जहाँ स्वार्थपरता आपाधापी, जमाखोरी की प्रवृत्ति पनप रही होगी वहाँ अनैतिकता के सभी कुकर्म बढ़ेंगे और फैलेंगे। सामान्य नागरिकों के स्तर से अत्यधिक ऊँचे स्तर का सुखोपभोग करने की प्रवृत्ति जहाँ भी पनपेगी वहीं शोषण, अन्याय, दुराचार, द्वेष, संघर्ष, ईर्ष्या आदि बुराइयाँ विकसित होंगी। प्राचीनकाल में जिनकी प्रतिभा अधिक कमाने की होती थी वे अपने राष्ट्रीय स्तर से अधिक उपलब्ध धन को लोकहित के कार्यों में दान कर देते थे। जीवन की सार्थकता, सेवा कार्यों में लगी हुई शक्ति के आधार पर ही आँकी जाती थी।

आज जो जितना धनी है वह उतना बड़प्पन पाता है, यह मूल्याँकन गलत है। जिसने राष्ट्रीय स्तर से जितना अधिक जमा कर रखा है वह उतनी ही बड़ी गलती कर रहा है। इस गलती को प्रोत्साहित नहीं, निरुत्साहित किया जाना चाहिए, अन्यथा हर व्यक्ति अधिक धनी, अधिक सुख सम्पन्न, अधिक विलासी होने की इच्छा करेगा। इससे संघर्ष और पाप बढ़ेंगे। सहयोग, प्रेम, त्याग, उदारता और परमार्थ की सत्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यक्तिगत स्वार्थपरता ही कर रही है। इसे हटाने और उदारता, सहकारिता, लोकहित, परमार्थ की भावनाओं को पनपाने के लिए हमें शक्ति भर प्रयत्न करना होगा, तभी हमारा समाज सभ्य बनेगा। अन्यथा शोषण और विद्रोह की, जमाखोरी और चोरी की, असभ्यता फैलती ही रहेगी और मानव जाति का दुख बढ़ता ही रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १६)

अनूठी हैं—मन की पाँचों वृत्तियाँ
  
गुरुदेव कहा करते थे कि वृत्तियों का खेल समझ में न आये, तो सब कुछ किया-धरा बेकार चला जाता है। सारा जोग-जाप व्यर्थ हो जाता है। तपस्या-साधना रावण, कुम्भकर्ण, हिरण्यकश्यपु एवं हिरण्याक्ष ने भी कम नहीं की थी। इनकी घोर तपस्या के किस्सों से पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। पुराण कथाएँ कहती हैं कि इनकी तपस्या से मजबूर होकर स्वयं विधाता इन्हें वरदान देने के लिए विवश हुए। परन्तु वृत्तियों के शोधन के अभाव में समस्त तप की परिणति अन्ततः क्लेश का ही स्रोत साबित हुई। अपनी तमाम उम्र ये वासनाओं की अतृप्ति की आग में जलते-झुलसते रहे। इन्हें जो कुछ भी मिला, इन्होंने जो भी अर्जित किया, उसने इनकी अतृप्ति की पीड़ा को और अधिक चरम तक पहुँचा दिया।
  
इसके विपरीत उदाहरण भी हैं। सन्त कबीर और महात्मा रैदास के पास साधारण जीवन यापन के साधन भी मुश्किल से थे। बड़ी मुश्किल से इनकी गुजर-बसर चलती थी। इनके जीवन का ज्यादातर भाग कपड़ा बुनने और जूता गाँठने में चला जाता था। इनमें से किसी ने अद्भुत एवं रोमांचकारी तपस्या भी नहीं की। परन्तु एक काम अपनी हर श्वास के साथ किया। आने-जाने वाली हर श्वास के साथ मन और उसकी वृत्तियों के शोधन में लगे रहे। अपनी प्रगाढ़ भगवद्भक्ति से अपनी प्रत्येक मानसिक वृत्ति को परिष्कृत कर डाला। इसकी परिणति भी इनके जीवन में अति सुखद हुई। सभी पाँचों वृत्तियों इनके जीवन में अक्लेश का, आनन्द का स्रोत बन गयी। वृत्तियों की निर्मलता की इसी अनुभूति को पाकर महात्मा कबीर गा उठे थे- ‘कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पाछे-पाछे हरि फिरैं कहत कबीर-कबीर॥’
  
वृत्तियों की दुर्गन्ध मिटाने वाली, इन्हें शोधित, सुरभित एवं सुगंधित करने वाली बयार विराट् से आती है। यह बयार हमारे अपने जीवन में आए, इसके लिए हमें स्वार्थ एवं अहं के दोनों कपाट खोलने पड़ेंगे। आनन्द तो समस्त सृष्टि में, विराट् ब्रह्माण्ड में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। यह उमड़-घुमड़कर हमारे भीतर आने के लिए आतुर है। बस हमीं अपने कपाट बन्द किए बैठे हैं। इस बात को हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि सुबह होने पर भी यदि हम अपने कमरे की खिड़कियाँ, दरवाजे न खोलें, तो सूर्य की किरणें चाहकर भी हमारे कक्ष में घुस न पाएँगी। जबकि खिड़कियाँ खोलते ही हजारों-हजार किरणें एक साथ आकर कक्ष को उजाले से भर देती हैं। खिड़की खोलने से पहले भी सूर्य यथावत था। यदि वह वहाँ नहीं होता, तो भला किरणें कहाँ से आती। बस खिड़कियों के अवरोध के अवरोधक हटते ही अँधेरा उजाले में रूपान्तरित हो गया।
  
कुछ ऐसा ही रूपान्तरण वृत्तियों का भी होता है। स्वार्थ और अहं के कपाट खुले, वासना की तृप्ति की जगह भक्ति की अनुरक्ति में लगा कि वृत्तियाँ बदलने लगती हैं। जो पहले कभी केवल दुःखों को, पीड़ा को, सन्ताप को, अतृप्ति को जन्म देती थीं, वही अब आनन्द की, तृप्ति की, सुखों की उफनती बाढ़ की जन्मदात्री बन जाती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Everlasting happiness is within us.

Happiness is the natural characteristic of soul. When man is happy his soul becomes happy. Development of spiritual self increases the span of life and gives us an insight to life. The body languages, the radiant face, the romantic body speaks of the happiness. All of us in our lifetime experience such a bliss.

When we think of the passage from life to death, a point becomes clear that the center of happiness changes with the phases of life. At the time of birth in the lap of mother, childhood amongst toys and books, young age with wife and creation of wealth and fame and old age with grandchildren. When we think deeply we realize that we have spent our time in seeking happiness in worldly matters; in reality they are devoid of happiness. If there were true happiness the mind would be engrossed in it. But the center of happiness is always changing and that itself denotes that happiness is not there in worldly pleasures.
 
The center of our happiness and peace is our soul and is within us. Soul creates a state of happiness and makes us realize that state of happiness. Though happiness is within us we are seeking it outside in worldly pleasures and we accept it as a means of happiness.

Light rays of the soul, penetrate into things and create beauty, we try to own and enjoy the beauty but in vain. For some time it gives happiness but after some time it no longer gives us happiness. Then it is neither attractive nor feisty. The moment the light of the soul disappears from worldly things it ceases to be beautiful and does not give any happiness or enjoyment.

What kind of irony this is? The mockery of life goes on life long. From the time of birth, we try to find various ways of enjoyment and happiness. Though all of us have a flow of happiness within us we fail to realize it.  It is like exploring the jungle for the musk, instead of looking for a deer; similarly we look for happiness in the world outside. We must look for happiness within us and to do so one must use spiritual means. Happiness is the natural characteristic of soul; we can reach it only by knowing our soul through spiritual means.

📖  Akhand Jyoti

रविवार, 30 अगस्त 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १५)

अनूठी हैं—मन की पाँचों वृत्तियाँ
वृत्तियों की कथा का अभी अंत नहीं हुआ है। पाँचवे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं-

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥ १/५॥
यानि मन की वृत्तियाँ पाँच हैं। वे क्लेश का स्रोत भी हो सकती हैं और अक्लेश का भी।
  
योगसूत्रकार महर्षि का यह सूत्र पहली नजर में एकदम पहेली सा लगता है। एक बार में ठीक-ठीक समझ में नहीं आता कि मन की पाँचों वृत्तियाँ किस तरह और क्यों अपना रूप बदल लेती हैं? कैसे वे क्लेश यानि की दुःख, पीड़ा की जन्मदात्री बन जाती हैं? और कैसे वे हमें अक्लेश अर्थात् गैर दुःख या पीड़ा विहीन अवस्था में ले जाती है? इन सवालों का जवाब पाने के लिए हम सभी को सत्य की गहन अन्वेषण करना पड़ेगा। तत्त्व की गहराई में प्रवेश करना होगा। तब कहीं जाकर बात को समझने की उम्मीद बँधेगी।
  
यहाँ भी ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ के साथ ‘गहरे पानी पैठि’ की शर्त जुड़ी हुई है। इस शर्त को पूरा करके ही महर्षि का मन्तव्य जाना जा सकता है। लेकिन इस गहरे पानी में पैठने की शुरूआत कहीं किनारे से ही करनी होगी। और यह किनारा है शरीर। जिससे हम सब काफी सुपरिचित हैं। यह परिचय इतना प्रगाढ़ हो चला है कि हममे से कइयों ने यह मान लिया है कि वे शरीर से भिन्न और कुछ हैं ही नहीं। इस दृश्यमान शरीर के मुख्य अवयव भी पाँच हैं, जिन्हें पंच कर्मेन्द्रियाँ भी कहते हैं। इस शरीर से ही जुड़ा एक पाँच का समूह और भी है, जिसे पंच ज्ञानेन्द्रियाँ कहा गया है। इन्हीं पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हमारी अन्तर्चेतना वाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित करती है। वाह्य जगत् की अनुभूतियों का आस्वादन प्राप्त करती है। वाह्य जगत् एक सा होने पर भी इसकी अनुभूति का रस और आस्वादन का सुख हर एक का अपना निजी होता है। यह निजीपन मन और उसकी वृत्तियों के ऊपर निर्भर है। ये वृत्तियाँ भी कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों की ही भाँति पाँच हैं।
  
जहाँ तक मन की बात है, तो परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि मन शरीर से बहुत अलग नहीं है। यह शरीर से काफी कुछ जुड़ा और चिपटा है। शरीर से मन का जुड़ाव इस कदर है कि इसे यदि शरीर का सूक्ष्म हिस्सा कहा जाय, तो कोई गलत बात न होगी। यही कारण है शरीर के सुखों-दुःखों से यह सामान्य अवस्था में बुरी तरह प्रभावित होता है। यह भी एक तरह से शरीर ही है, परन्तु योग साधना के बिना इसका अलग अस्तित्व अनुभव नहीं हो पाता। हालाँकि योग साधना करने वाले इस सच्चाई को बड़ी आसानी से जान लेते हैं कि दृश्य शरीर यदि स्थूल शरीर है, तो अपनी शक्तियों एवं सम्भावनाओं के साथ मन सूक्ष्म शरीर है। इसका विकास इस तथ्य पर निर्भर करता है कि मन और उसकी वृत्तियों का किस तरह से उपयोग किया गया?
  
यदि बात दुरुपयोग तक सीमित रही है, मानसिक शक्तियाँ केवल इन्द्रिय भोगों में खपती रही हैं, केवल क्षुद्र स्वार्थ के साधन जुटाए जाते रहे हैं, खोखले अहंकार की प्रतिष्ठा को ही जीवन का सार सर्वस्व समझा गया है, तो फिर मन की पाँचों वृत्तियाँ जीवन में क्लेश का स्रोत साबित होने लगती है। यदि बात इसके उलट है, दिशा मन के सदुपयोग की है, मन को योग साधना में लीन किया गया है, तो मन की यही पाँचों वृत्तियों अक्लेश का स्रोत सिद्ध होती है। मन की पञ्चवृत्तियाँ जिन्दगी में क्लेश की बाढ़ किस तरह लाती है, इसका अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। परन्तु इनका अक्लेश के स्रोत के रूप में सिद्ध होना परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बताए गए जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्रों से ही सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 29 अगस्त 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १४)

सावधान! बड़ा बेबस बना सकता है मन

विचारों के प्रवाह के साथ कब एकात्मता सध जाती है, पता ही नहीं चलता। ये विचार कैसे भी हो सकते हैं, किसी भी तरह के हो सकते हैं। विचारों के बादलों के साथ हम एक हो जाते हैं। कई बार सफेद बादलों के साथ, कई बार वर्षा से भरे बादलों के साथ, तो कई बार वर्षा रिक्त खाली बादलों के साथ। लेकिन कुछ भी हो, किसी न किसी विचार के बादल के साथ तादात्म्यता बनी रहती है। और ऐसे में हम आकाश की शुद्धता गँवा देते हैं। अपने आत्मस्वरूप के अन्तरिक्ष की शुद्धता खो देते हैं। और बादलों का यह घिराव घटित ही इस कारण होता है, क्योंकि हम तादात्म्य जोड़ लेते हैं। विचारों के साथ एक हो जाते हैं।
  
ख्याल आता है कि हम भूखे हैं और विचार मन में कौंध जाता है। विचार इतना भर है कि पेट को भूख लगती है। बस, उसी क्षण हम तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। उसकी आसक्ति से घिर जाते हैं। हम कहने लगते हैं, मैं भूखा हूँ। मुझे भूख लगी है। मन में तो भूख का विचार भर आया था, पर हमने उसके साथ तादात्म्य बना लिया है। हम कहने लगे, मुझे भूख लगी है। बस यही तादात्म्य है।
  
ऐसी बात नहीं है कि ज्ञानियों को, योगियों को, साधकों को, सिद्धों को भूख महसूस नहीं होती। भूख तो वे भी महसूस करते हैं। बुद्ध भी भूख महसूस करते थे, पतंजलि भी भूख महसूस करते हैं। लेकिन पतंजलि कभी यह नहीं कहेंगे कि मुझे भूख लगी है। वे तो बस इतना कहेंगे कि शरीर भूखा है, वे कहेंगे, मेरा पेट भूख महसूस कर रहा है। बुद्ध कहेंगे, भूख तो पेट में है। मैं तो केवल साक्षी भर हूँ। पेट भूखा है, लेकिन योगीजन उसके साक्षी मात्र बने रहेंगे। लेकिन हम सब तादात्म्य बना लेते हैं, विचार के साथ एक हो जाते हैं।
  
विचार और वृत्तियों के बदलते स्वरूप के साथ हमारा तादात्म्य भी बदलता है। कभी हम एक के साथ होते हैं, तो कभी दूसरी, तीसरी, चौथी, और पाँचवी वृत्ति के साथ। ये तादात्म्य ही संसार बनाते हैं। दरअसल यही संसार है। यदि हम तादात्म्यों में हैं, तो संसार में हैं, दुःख में हैं। और यदि इन तादात्म्यों के पार और परे चले गए, तो समझो मुक्त हो गए। योग की परम सिद्धि एवं सम्बोधि की परम अवस्था यही है। यही है निर्वाण और कैवल्य। वृत्तियों से तादात्म्य टूटते ही हम इस दुःख भरे संसार से पार होकर आनन्द के जगत् में प्रविष्ट हो जाते हैं।
  
आनन्द का यह जगत् बिलकुल अभी और यहाँ है। बिलकुल अभी, इसी क्षण। इसके लिए एक पल भी प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है। बस मन का साक्षी भर होना है। केवल वृत्तियों से नाता तोड़ना है। यह तथ्य कुछ यूँ है-
सुख कहीं मिलेगा, इस भ्रान्ति का नाम संसार है,
सुख अभी है, यहीं है, इस बोध का नाम निर्वाण है,
सुख किसी से मिलेगा, इस भ्रान्ति का नाम संसार है,
सुख अपना स्वभाव है, इस जागृति का नाम मोक्ष है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ २९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

👉 अच्छा लड़ाका क्रोध नहीं करता

वर्ष की अंतिम प्रतियोगिता होने वाली थी मुर्गों की लड़ाई की, एक सम्राट भी अपने मुर्गे को लड़ाई में भेजना चाहता था। तो उसने एक बहुत बड़े झेन फकीर को बुलाया। क्योंकि उस झेन फकीर की बड़ी प्रसिद्धि थी कि उसे युद्ध में कोई हरा नहीं सकता। हराना तो दूर, उसके पास आकर लोग हारने को उत्सुक हो जाते थे। उसके पास हार कर प्रसन्न होकर लौटते थे। उसके साथ हार जाना बड़ी महिमा की बात थी। तो सम्राट ने सोचा कि यह फकीर अगर मुर्गे को तैयार कर दे।

फकीर को बुलाया। मुर्गा फकीर ले गया। तीन सप्ताह बाद सम्राट ने खबर भेजी, मुर्गा तैयार है? फकीर ने कहा, अभी नहीं। अभी तो दूसरे मुर्गे को देख कर वह सिर खड़ा करके आवाज देता है। सम्राट थोड़ा हैरान हुआ कि यह तो ठीक ही लक्षण है। क्योंकि लड़ना है तो सिर खड़ा करके आवाज न दोगे तो दूसरे मुर्गे को डराओगे कैसे?

खैर, कुछ देर और प्रतीक्षा की। फिर तीन सप्ताह बाद पुछवाया। फकीर ने कहा, अभी भी नहीं। अब पुरानी आदत तो जा चुकी है, लेकिन दूसरा मुर्गा आता है तो तन जाता है, तनाव भर जाता है। और तीन सप्ताह बीत गए। फिर पुछवाया। फकीर ने कहा कि अब थोड़ा-थोड़ा तैयार हो रहा है, लेकिन अभी थोड़ी देर है। अब दूसरा मुर्गा कमरे के भीतर आए तो खड़ा तो रहता है, लेकिन भीतर व्यथित हो जाता है, भीतर एक तनाव की रेखा खिंच जाती है। और तीन सप्ताह बाद फकीर ने कहा, अब मुर्गा बिलकुल तैयार है। अब वह ऐसे खड़ा रहता है जैसे न कोई आया, न कोई गया। और अब कोई फिक्र नहीं है। पर सम्राट ने कहा कि यह मुर्गा जीतेगा कैसे? उस फकीर ने कहा, तुम फिक्र ही मत करो; अब हारने की कोई संभावना ही न रही। दूसरे मुर्गे इसे देखते ही भाग खड़े होंगे। इसको लड़ना नहीं पड़ेगा। इसकी मौजूदगी काफी है।

और यही हुआ। जब प्रतियोगिता में मुर्गा खड़ा किया गया। तो दूसरे मुर्गों ने सिर्फ झांक कर उस मुर्गे को देखा; न तो उसने आवाज दी, क्योंकि वह कमजोरी का लक्षण है, वह भय का लक्षण है। भय को छिपाने के लिए वह जोर से कुकडूं कूं बोलता है। वह डरवाना चाहता है आवाज से, लेकिन खुद डरा हुआ है। न तो उस मुर्गे ने आवाज दी, न उस मुर्गे ने देखा। जैसे कुत्ते भौंकते रहते हैं और हाथी गुजर जाता है। ऐसे वह मुर्गा खड़ा ही रहा, जैसे पत्थर की मूर्ति हो। दूसरे मुर्गों ने देखा, उनको कंपकंपी छूट गई। क्योंकि यह तो बड़ा, यह तो मुर्गे जैसा मुर्गा ही नहीं है! इसके पास जाना तो खतरे से खाली नहीं है। वे भाग खड़े हुए। प्रतियोगिता में दूसरे मुर्गे उतर ही न सके।

लाओत्से कहता है, "अच्छा लड़ाका क्रोध नहीं करता।' यह लक्षण है योद्धा का कि वह क्रोध न करे, कि वह उत्तप्त न हो जाए, कि उसका मन ज्वरग्रस्त न हो, कि वह ऐसा शांत बना रहे जैसे बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया हो।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १३)

सावधान! बड़ा बेबस बना सकता है मन

परम पूज्य गुरुदेव महर्षि पतंजलि के बारे में कहा करते थे कि वे अद्भुत हैं। वे साधक को तपाने में, उससे साधना कराने में विश्वास करते हैं। उनका इधर-उधर की कहानियाँ-किस्से सुनाने में कतई विश्वास नहीं है। बहलाने-फुसलाने में उनका कोई यकीन नहीं है। एक प्रसंग में गुरुदेव के सामने जब इस सूत्र की चर्चा चली, तो उन्होंने कहा- ‘अब यहीं देखो कैसी दो टूक बात कह दी उन्होंने। साधकों के सामने बिलकुल बात साफ कर दी कि या तो साक्षी भाव को उपलब्ध कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाओ या फिर वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके भटकते रहो। इन दो के अलावा कोई तीसरी सच्चाई नहीं हो सकती। जान सको तो जानो, मान सको तो मानो।’
  
गुरुदेव कहा करते थे, पतंजलि के सूत्र तो साधकों के लिए भेजे गए टेलीग्राम हैं। इनमें इधर-उधर का एक भी फालतू  शब्द नहीं है। कभी-कभी तो एक सूत्र पूरा वाक्य तक नहीं है। वह तो अल्पतम सारभूत है। ये सूत्र ऐसे हैं, जैसे कोई तार करने जाय और वहाँ बेकार के अनावश्यक शब्द काट दे। तार का मतलब ही यही है, कम से कम शब्दों में सम्पूर्ण सन्देश कह दिया जाय। तार की जगह अगर पत्र लिखा जाता, तो शायद दस पन्नें भरने के बावजूद बातें पूरी न हो पाती। लेकिन एक तार में, दस शब्दों में वह केवल पूरा ही नहीं होता, बल्कि पूरे से भी थोड़ा अधिक होता है। वह सीधी हृदय पर चोट करता है। उसमें सारतम होता है।
  
इसी प्रसंग में गुरुदेव ने यह भी बताया कि उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने भी उनसे बड़ी सीधी-सपाट भाषा में एकदम थोड़े शब्दों में कहा था, साधना करनी है, तो इन्द्रिय सुखों से मुँह मोड़ना होगा। एकदम रूखी-सूखी जिन्दगी जीनी होगी। ये बातें बताकर वह थोड़ा रूके, फिर कहने लगे- यह तो बाद में पता चला कि इस रूखे-सूखे पन में आनन्द की अनन्तता समायी है। बस यही बात महर्षि पतंजलि के बारे में है। वह बहुत ही रूखी-सूखी धरती पर ले चलेंगे, मरुस्थल जैसी भ्ूामि पर। लेकिन मरुस्थल का अपना सौन्दर्य है। उसमें वृक्ष नहीं होते, उसमें नदियाँ नहीं होती, लेकिन उसका एक अपना विस्तार होता है। किसी जंगल की तुलना उससे नहीं की जा सकती। जंगलों का अपना सौन्दर्य है, पहाड़ियों का अपना सौन्दर्य है, नदियों की अपनी सुन्दरताएँ हैं। मरुस्थल की अपनी विराट् अनन्तता है। हाँ, इस राह पर चलने के लिए हिम्मत की जरूरत है। पतंजलि का हर सूत्र साधकों के साहस के लिए चुनौती है। उनके विवेक को सावधान रहने की चेतावनी है।
  
पतंजलि बिलकुल साफ तौर पर कहते हैं कि यदि आपको, हमको, मनुष्य मात्र को यदि भटकन, उलझन, तनाव, चिन्ता, दुःख, पीड़ा, अवसाद से सम्पूर्ण रूप से मुक्ति पानी है, तो साक्षी भाव को उपलब्ध होने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है। क्योंकि अन्य अवस्थाओं में तो मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य बना ही रहेगा। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है। यह बात किसी एक पर, किसी व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होती। बात तो सारे मनुष्यों के लिए कही गयी है। मानव प्रकृति की बनावट व बुनावट की यही पहचान है। साक्षी के अतिरिक्त दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तादात्म्य बना रहता है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ २८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 धर्म के नाम पर पाखण्ड

अगणित कुरीतियाँ हमें घेरे हुए हैं। स्वास्थ्य सुधार के लिए, शिक्षा के लिए, मनोरंजन के लिए, दूसरों की भलाई के लिए, आत्मकल्याण के लिए हम कुछ कर नहीं पाते। आधी से अधिक कमाई उन व्यर्थ की बातों में बर्बाद हो जाती है जिनका कोई प्रयोजन नहीं, कोई लाभ नहीं, कोई परिणाम नहीं। धर्म के नाम पर हमारे मनों में जो उच्चकोटि की भावनाएँ उठती हैं दान देने की जो श्रद्धा उत्पन्न होती है उनका लाभ ज्ञान और धर्म बढ़ाने वाले, पीड़ित और पतितों को राहत देने वाले कार्यों की वृद्धि के रूप में विकसित होना चाहिए था पर होता इससे सर्वथा विपरीत है।

काल्पनिक सब्ज बाग दिखाकर संडे-मुसंडे लाल-पीले कपड़े पहनकर लोगों को ठगते रहते हैं। भोले लोग समझते हैं धर्म हो गया, पुण्य कमा लिया, पर वास्तविकता ऐसी कहाँ होती है। धूर्त लोगों को गुलछर्रे उड़ाने के लिए दिया हुआ धन भला धर्म कैसे हो जाएगा? पुण्य कर्म कैसे माना जाएगा? जिसका परिणाम न तो ज्ञान की सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि हो और न पीड़ितों को कोई राहत मिले, वह कार्य पाखंड ही रहेगा, धर्म नहीं। आज धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला है और भोली जनता अपनी गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया उसी पाखंड पर स्वाहा कर देती है।

पाखण्डों पर खर्च होने वाला समय और धन यदि उपयोगी कार्यों में लगे तो उसका कितना बड़ा सत्परिणाम उत्पन्न हो। मृत्युभोज, पशुबलि, बालविवाह, नींच-ऊँच, स्याने, दिवाने, भूत पलीत, कन्या विक्रय, स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले गन्दे गीत, पर्दा, होली में कीचड़ उछालना, दिवाली पर जुआ खेलना आदि अगणित ऐसी कुरीतियाँ हमारे समाज में प्रचलित हैं, जिनके कारण अनेक रोगों से ग्रसित रोगी की तरह हम सामाजिक दृष्टि से दिन-दिन दुर्बल होते चले जा रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 Due to bad karma, fallen ascetic became demons

Ravana was a wise man. Through his austerities he had acquired great capabilities. In spite of all this, due to his abominable behavior, God himself had to take birth on the planet to kill him. Example of Bhasmasur, illustrates that even after having reached a high spiritual state, without any compellations, due to ill state of mind one digs a hole for himself. Similarly, great powerful fighters like Hiranyaksh and Hiranyakashyapu had to die due to evil state of mind and behavior. 

Durga killed Shumbh-Nishumbh, Madhukaitabh and Mahishasur. Parshuramji killed Sahasrabahu and Shri Krishna killed Vanasur. Bhim killed Jarasandh. Shoorpnakha used to tease Rishis performing austerities in Khardooshan forest. Tadka used to disturb the yagyas. Bali had out thrown his younger brother and kept his wife with him. Ram and Lakshman killed all of them and ended their tyranny.

Pragya Puran Part 1

बुधवार, 26 अगस्त 2020

👉 कौन सा रास्ता सही

एक गरीब युवक, अपनी गरीबी से परेशान होकर, अपना जीवन समाप्त करने नदी पर गया, वहां एक साधू ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। साधू ने, युवक की परेशानी को सुन कर कहा, कि मेरे पास एक विद्या है, जिससे ऐसा जादुई घड़ा बन जायेगा जो भी इस घड़े से मांगोगे, ये जादुई घड़ा पूरी कर देगा, पर जिस दिन ये घड़ा फूट गया, उसी समय, जो कुछ भी इस घड़े ने दिया है, वह सब गायब हो जायेगा।

अगर तुम मेरी 2 साल तक सेवा करो, तो ये घड़ा, मैं तुम्हे दे सकता हूँ और, अगर 5 साल तक तुम मेरी सेवा करो, तो मैं, ये घड़ा बनाने की विद्या तुम्हे सिखा दूंगा। बोलो तुम क्या चाहते हो, युवक ने कहा, महाराज मैं तो 2 साल ही आप  की सेवा करना चाहूँगा , मुझे तो जल्द से जल्द, बस ये घड़ा ही चाहिए, मैं इसे बहुत संभाल कर रखूँगा, कभी फूटने ही नहीं दूंगा।

इस तरह 2 साल सेवा करने के बाद, युवक ने वो जादुई घड़ा प्राप्त कर लिया, और अपने घर पहुँच गया।

उसने घड़े से अपनी हर इच्छा पूरी करवानी शुरू कर दी, महल बनवाया, नौकर चाकर मांगे, सभी को अपनी शान शौकत दिखाने लगा, सभी को बुला-बुला कर दावतें देने  लगा और बहुत ही विलासिता का जीवन जीने लगा, उसने शराब भी पीनी शुरू कर दी और एक दिन नशें में, घड़ा सर पर रख नाचने लगा और ठोकर लगने से घड़ा गिर गया और फूट गया.

घड़ा फूटते ही सभी कुछ गायब हो गया, अब युवक सोचने लगा कि काश मैंने जल्दबाजी न की होती और घड़ा बनाने की विद्या सीख ली होती, तो आज मैं, फिर से कंगाल न होता।

"ईश्वर हमें हमेशा 2 रास्ते पर रखता है एक आसान -जल्दी वाला और दूसरा थोडा लम्बे समय वाला, पर गहरे ज्ञान वाला, ये हमें चुनना होता है की हम किस रास्ते पर चलें"

"कोई भी काम जल्दी में करना अच्छा नहीं होता, बल्कि उसके विषय में गहरा ज्ञान आपको अनुभवी बनाता है।"

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १२)

सावधान! बड़ा बेबस बना सकता है मन

समर्पण हुआ, तो निश्चित ही साक्षी भाव की अनुभूति होगी और साधक अपने स्वरूप में अवस्थित होगा। पर यदि समर्पण न हो सका तब? इस प्रश्न का उत्तर महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र यानि कि समाधि पाद के चौथे सूत्र में देते हैं। वह कहते हैं-
वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥ १/४॥
  
साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये वृत्तियाँ साधक की अन्तर्चेतना को मनचाहा भटकाती हैं। सुख-दुख के सपने दिखाती हैं। कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं। इच्छाओं के कच्चे धागों से बाँधती हैं। कल्पनाओं और कामनाओं की मदिरा पिला कर बेहोश करती हैं।
  
साक्षी होने के अतिरिक्त अन्य सभी अवस्थाओं का यही सत्य है। जिसे हम सभी किसी न किसी रूप में रोजमर्रा की जिन्दगी में अनुभव करते रहते हैं। मजे की बात तो यह है कि यदा-कदा हम में से कई या यूं कहें कि प्रायः हम सभी इन्हीं कामनाओं की तृप्ति के लिए साधना भी करने लगते हैं। गाढ़ी बेहाशी को और गाढ़ा करने के लिए जप-तप-व्रत का सिलसिला शुरू करते हैं। इसकी सफलताओं पर खुशियों की अठखेलों से खेलते हैं और असफल होने पर गम के आँसूओं से अपने-आपको भिगोते हैं। वृत्तियों का यह बहुरंगी तमाशा हमारे जीवन का सामान्य परिचय है। इसमें स्वप्न तो अनेक हैं, सत्य एक भी नहीं। इसी तथ्य का संकेत महर्षि के सूत्र में है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ २७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...