शनिवार, 8 सितंबर 2018

👉 आत्मिक प्रगति के तीन अवरोध (भाग 1)

🔷 आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोध उत्पन्न करने वाली दुष्प्रवृत्तियों में तीन प्रधान हैं। इन्हें ताड़का, सूर्पणखा और सुरसा की उपमा दी जाती है। इन्हें निरस्त किये बिना असुरता के चंगुल में फँसी हुई सीता का-आत्मा का-उद्धार नहीं हो सकता। इन्हें पुत्रेषणा-वित्तेषणा और लोकेषणा कहा जाता है। वासना-तृष्णा और अहंता की प्रवृत्तियाँ ही सबल होने पर इन एषणाओं के रूप में परिलक्षित होती हैं।

🔶 इंद्रिय वासनाओं में यों सभी अपने-अपने ढंग की खींचतान करती हैं। पर उनमें रसना और कामुकता को प्रमुख माना गया है। चटोरपन के कुचक्र में पेट पर अभक्ष्य पदार्थों का अनावश्यक भार लदता है। अपच के फलस्वरूप शरीर में अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। दुर्बलता और रुग्णता ग्रसित होकर अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। अस्वस्थता की विपत्ति ढाने में जिह्वा का चटोरापन भयंकर शत्रु से भी अधिक आक्रमणकारी और विघातक सिद्ध होता है। वासना की दूसरी प्रवृत्ति है- कामुकता। यौनाचार की कल्पना और क्रिया में उलझा हुआ मस्तिष्क अपनी अति महत्त्वपूर्ण क्षमता को ऐसे जंजाल में फँसा देता है जिसमें, पाना रत्तीभर और गँवाना पहाड़ भर पड़ता है।

🔷 प्रकृति की चतुरता ही कहिए कि उसने प्राणियों की संख्या बनाये रहने के लिए कष्ट साध्य भार उठाने के लिए यौनाचार की सरसता उत्पन्न कर दी। यदि यह उन्माद न चढ़ता तो कदाचित ही कोई प्राणी प्रजनन की अति कठिन और अतीव बोझिल प्रक्रिया को अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार होता। वासनाओं में जीभ के चटोरेपन पर रोकथाम करना आवश्यक है। पेट में कोई वस्तु तभी पहुँचने दी जाय जब कड़ाके की भूख उसके लिए तीव्रतापूर्वक माँग करती हो। सात्विक सुपाच्य पदार्थ स्वेच्छापूर्वक शान्त चित्त से सीमित मात्रा में ग्रहण किये जायें। जो खाया जाय औषधि रूप हो। स्वाद की उत्तेजना तो नशेबाजी की तरह है, जिसमें हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है।

🔶 दूसरे यौनाचार लिप्सा के सम्बन्ध में और भी गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। जो जीवन रस, हमारे ओजस्-तेजस् और ब्रह्म वर्चस् का आधार हैं उसे क्षणिक आवेश में ऐसे ही गँवाते रहने की गलती को सुधारना ही समझदारी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1977 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/October/v1.17

👉 सँस्कार.................

🔷 "बहू !!!!!!!!!!🤨🤨
घर के काम निपटाने के बाद,अम्मा जी और मेरे पैरों की मालिश कर दिया करो"🤨

🔶 "मम्मी जी मुझसे इतना काम नहीं हो पायेगा, बहुत थक जाती हूँ।"...............😔

🔷 अरे !!!!!!😳😳😳
अभी महीना भर हुआ नहीं तुम्हें आये हुए और तुम जवाब देने लगी हमें, अम्माजी बुजुर्ग हैं, तुम उनके पैर की मालिश करने से मना कर रही हो 🤭🤭

🔶 "आप कर दिया करें उनकी मालिश, आप तो अभी एकदम ठीक हैं।"

🔷 शर्म नहीं आती तुम्हें जवाब देते हुए। यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी माँ ने 🤨🤨

संस्कार !! लेकिन वो आपने माँगे कहाँ थे ??

🔷 शादी के पाँच दिन पहले आपने जिन सामानों की लिस्ट भिजवाई थी उसमें संस्कार तो कहीं नहीं लिखे थे 😓😓

🔶 "आपकी माँग को पूरा करने के लिए जब माँ ने अपने गहने और जमीन गिरवी रखे तो मैंने उनके दिए हुए संस्कार भी गिरवी रख दिये।"😭😭

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

🔷 पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा- तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

🔶 अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा- 'प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

🔷 भगवान् राम ने कहा- तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

🔶 गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा- देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक- एक कण धूल एक- एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी।'

🔷 जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित- मृतकों के समान ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 19

👉 आज का सद्चिंतन 8 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 6)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔷 विज्ञान ने जहाँ एक से एक अद्भुत चमत्कारी साधन उत्पन्न किए वहाँ दूसरे हाथ से उन्हें छीन भी लिया। कुछ समर्थ लोग जन्नत का मजा लूटते और शेष सभी दोषारोपण की सड़न में सड़ते हुए न पाए जाते। विज्ञान के साथ सद्ज्ञान का समावेश भी यदि रह सका होता तो भौतिक और आत्मिक सिद्धान्तों पर आधारित प्रगति सामने होती और उसका लाभ हर किसी को समान रूप से मिल सका होता। पर किया क्या जाए? भौतिक विज्ञान जहाँ शक्ति और सुविधा प्रदान करता है, वहीं प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ नीति, धर्म, संयम, स्नेह, कर्तव्य आदि को झुठला भी देता है। ऐसी दशा में उद्दण्डता अपनाए हुए समर्थ का दैत्य-दानव बन जाना स्वाभाविक है। उनका बढ़ता वर्चस्व उन दुर्बलों का शोषण करेगा ही जिन्हें प्रगति ने बहुलता से पैदा करके समर्थों को उदार बनने एवं ऊँचा उठाने का श्रेय देने के लिए पैदा किया है। तथाकथित प्रगति ने इसी नीतिमत्ता का बोलबाला होते देखने की स्थिति पैदा कर दी है।
  
🔶 उदाहरण के लिए प्रगति के नाम पर हस्तगत हुई उपलब्धियों को चकाचौंध में नहीं उनकी वस्तुस्थिति में खुली आँखों से देखा जा सकता है। औद्योगीकरण के नाम पर बने कारखानों ने संसार भर में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भर दिया है। अणु शक्ति की बढ़ोत्तरी ने विकिरण से वातावरण को इस कदर भर दिया है कि तीसरा युद्ध न हो तो भी भावी पीढ़ियों को अपंग स्तर की पैदा होना पड़ेगा। ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग ने संसार का तापमान इतना बढ़ा दिया है कि हिम प्रदेश पिघल जाने पर समुद्रों में बाढ़ आने और ओजोन नाम से जानी जाने वाली पृथ्वी की कवच फट जाने पर ब्रह्माण्डीय किरणें धरती की समृद्धि को भूनकर रख सकती हैं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 8

👉 Awakening of Supernormal Faculties Through Sadhana (Part3 )

🔷 The seeker has to mould his thinking as well as activities according to the set goal. Musicians do not become expert in either vocal or instrumental music in a day. They have to make a persistent effort. In the absence of practice, the voice of a vocalist sounds erratic and jarring and the fingers of an instrumentalist lack coordination. A true artist remains indifferent both to the reaction of the audience and to the remuneration paid to him. He feels contented with the joy derived from his daily sadhana of music.

🔶 A true devotee of art would maintain his inner peace even if he does not get any immediate and tangible reward or recognition for his art. He would continue to do his sadhana of music without any lessening of interest, even though he may have to dwell in a hut in a remote forest. The mental make-up of a person practicing atma sadhana should have at least this much dedication and commitment. Dancers, actors, sculptors, etc. know the importance of daily practice to maintain their art. Soldiers participate compulsorily in routine parades to maintain their skills of marksmanship and fighting.

🔷 Fulfilment of an inner resolution (samkalpa) for some worldly purpose may be achieved by performing the specific sadhana of chanting a particular mantra for a fixed number of times. But the mere ritual will not satisfy a true aspirant of atma sadhana. He understands that in order to mine the gems of his hidden talents he must plunge into the silent depths of his inner self daily and persistently. Brushing teeth, bathing, washing the clothes etc. is a part of daily routine. One cannot ignore them. The perturbed and perverse environment of the outer world pollutes the inner-consciousness. If it is not cleaned out every day, pollutants keep on accumulating and ultimately give rise to some serious problems....

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (अन्तिम भाग)

🔷 आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा लाभ आत्मोद्धार माना गया है। अध्यात्मवादी का किसी भी दिशा में किया हुआ पुरुषार्थ परमार्थ का ही दूसरा रूप होता है। वह प्रत्येक कार्य को परमात्मा का कार्य और परिणाम को उसका प्रसाद मानता है। पुरुषार्थ द्वारा परमार्थ-लगन व्यक्ति के ईर्ष्या, द्वेष, माया, मोह, लोभ, स्वार्थ, तृष्णा, वासना आदि के संस्कार नष्ट हो जाते हैं और उनके स्थान पर त्याग, तपस्या, संतोष, परोपकार तथा सेवा आदि के शुभ संस्कार विकसित होने लगते हैं। अध्यात्म मार्ग के पुण्य पथिक के हृदय से तुच्छता दीनता, हीनता, दैन्य तथा दासता के अवगुण वैसे ही निकल जाते हैं जैसे शरद ऋतु में जलाशयों का जल मलातीत हो जाता है। स्वाधीनता, निर्भयता, सम्पन्नता, पवित्रता तथा प्रसन्नता आदिक प्रवृत्तियाँ आध्यात्मिक जीवन की सहज उपलब्धियाँ हैं, इन्हें पाकर मनुष्य को कुछ भी तो पाना शेष नहीं रह जाता। इस प्रकार की स्थायी प्रवृत्तियों को पाने से बढ़कर मनुष्य जीवन में कोई दूसरा लाभ हो नहीं सकता।

🔶 संसार का कोई संकट, कोई भी विपत्ति आध्यात्मिक व्यक्ति को विचलित नहीं कर सकती, उसके आत्मिक सुख को हिला नहीं सकती। जहाँ बड़ा से बड़ा भौतिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति तनिक सा संकट आ जाने पर बालकों की तरह रोने चिल्लाने और भयभीत होने लगता है, वहाँ आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला मनुष्य बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी प्रसन्न एवं स्थिर रहा करता है। उसका दृष्टिकोण आध्यात्मिकता के प्रसाद से इतना व्यापक हो जाता है कि वह सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों को समान रूप से परमात्मा का प्रसाद मानता है और आत्मा को उसका अभोक्ता, जब कि भौतिकवादी अहंकार से दूषित दृष्टिकोण के कारण अपने को उनका भोक्ता मानता है। आध्यात्मिक व्यक्ति आत्म-जीवी और भौतिकवादी शरीर-जीवी होता है। इसी लिये उनकी अनुभूतियों में इस प्रकार का अन्तर रहा करता है।

🔷 सुख सम्पत्ति की प्राप्ति से लेकर संकट सहन करने की क्षमता तक संसार की जो भी दैवी उपलब्धियाँ हैं वे सब आध्यात्मिक जीवन यापन से ही सम्भव हो सकती हैं। मनुष्य जीवन का यह सर्वोपरि लाभ है इसकी उपेक्षा कर देना अथवा प्राप्त न करने से बढ़कर मानव-जीवन की कोई हानि नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 4

👉 विधाता के बहुमूल्य उपहार

🔷 एक सच्चे मित्र की तरह जीवन का हर प्रभात तुम्हारे लिए अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप उसके उपहारों को उत्साहपूर्वक ग्रहण करें। उससे उज्ज्वल भविष्य का शृंगार करें। उसकी प्रतीक्षा रहती है कि कब नया दिन गया है, उसका महत्व समझें और आदर पूर्वक ग्रहण करें।

🔶 किन्तु जो दिया गया है, उसका मूल्य नहीं समझा जाता और कूड़े करकट की तरह फेंक दिया जाता है, तो निराश होकर लौट जाता है। बार- बार अवज्ञा होने पर पुनः अपरिचित राही की तरह आता है और निराश होकर लौट जाता है।

🔷 ईश्वर ने मनुष्य को अपार सम्पदाओं से भरा- पूरा जीवन दिया है, पर वह पोटली बाँधकर नहीं, एक- एक खण्ड के रूप में गिन- गिन कर। नया खण्ड देने से पहले पुराने का  ब्यौरा पूछता है कि उसका क्या हुआ? जो उत्साह भरा ब्यौरा बताते हैं, वे नये मूल्यवान खण्ड पाते हैं। दानी मित्र तब बहुत निराश होता है, जब देखता है कि उसके पिछले अनुदान धूल में फेंक दिये गये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 7 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 September 2018


👉 भक्ति में भावना की प्रधानता

🔶 चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथ पुरी से दक्षिण की यात्रा पर जा रहे थे तो उन्होंने एक सरोवर के किनारे कोई ब्राह्मण गीता पाठ करता हुआ देखा वह संस्कृत नहीं जानता था और श्लोक अशुद्ध बोलता था। चैतन्य महाप्रभु वहाँ ठहर गये कि उसकी अशुद्धि के लिये टोके। पर देखा कि भक्ति में विह्वल होने से उसकी आँखों से अश्रु बह रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने आश्चर्य से पूछा-आप संस्कृत तो जानते नहीं, फिर श्लोकों का अर्थ क्या समझ में आता होगा और बिना अर्थ जाने आप इतने भाव विभोर कैसे हो पाते है। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया आपको यह कथन सर्वथा सत्य है।

🔷 कि मैं न तो संस्कृत जानता हूँ और न श्लोकों का अर्थ समझता हूँ। फिर भी जब मैं पाठ करता हूँ तो लगता है मानों कुरुक्षेत्र में खड़े हुये भगवान अमृतमय वाणी बोल रहे हैं और मैं उस वाणी को दुहरा रहा है। इस भावना से मेरा आत्म आनन्द विभोर हो जाता है।

🔶 चैतन्य महाप्रभु उस भक्त के चरणों पर गिर पड़े और उनने कहा तुम हजार विद्वानों से बढ़कर हो, तुम्हारा गीता पाठ धन्य है।

🔷 भक्ति में भावना ही प्रधान हैं, कर्मकाण्ड तो उसका कलेवर मात्र हैं। जिसकी भावना श्रेष्ठ है उसका कर्मकाण्ड अशुद्ध होने पर भी वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। केवल भावना हीन व्यक्ति शुद्ध कर्मकाण्ड होने पर भी कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 5)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔶 ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि उत्पादित सम्पदा यदि सभी में बँट गई होती तो सभी लोग लगभग एक ही तरह का - समान स्तर का जीवन जी रहे होते। अभाव कृत्रिम है। वह मात्र एक ही कारण उत्पन्न हुआ है कि कुछ लोगों ने अधिक बटोरने की विज्ञान एवं प्रत्यक्षवाद की विनिर्मित मान्यता के अनुरूप यह उचित समझा है कि नीति, धर्म, कर्तव्य सदाशयता, शालीनता, समता, परमार्थ परायणता जैसे उन अनुबन्धों को मानने से इंकार कर दिया जाए जो पिछली पीढ़ियों में आस्तिकता और धार्मिकता के आधार पर आवश्यक माने जाते थे।

🔷 अब उन्हें प्रत्यक्षवाद ने अमान्य ठहरा दिया, तो सामर्थ्यवानों को कोई किस आधार पर मर्यादा में रहने के लिए समझाए? किस तर्क के आधार पर शालीनता और समता की नीति अपनाने के लिए बाधित करे। पशुओं को जब नीतिवान परोपकारी बनाने के लिए बाधित नहीं किया जा सका, तो बन्दर की औलाद बताए गए मनुष्य को यह किस आधार पर समझाया जा सके कि उसे उपार्जन तो करना चाहिए पर उसको उपभोग में ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए। सदुपयोग की उन परम्पराओं को भी अपनाना चाहिए जो न्याय, औचित्य, सद्भाव एवं बाँटकर खाने की नीति अपनाने की बात कहती है। यदि वह अध्यात्मवादी प्रचलन जीवित रहा होता तो प्रस्तुत भौतिकवादी प्रगति के आधार पर बढ़ते हुए साधनों का लाभ सभी को मिला होता। सभी सुखी एवं समुन्नत पाए जाते। न कोई अनीति बरतता और न किसी को उसे सहने के लिए विवश होना पड़ता ।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 7

👉 Awakening of Supernormal Faculties Through Sadhana (Part 2)

🔶 Many deities are worshipped and it is believed that they grant suitable boons to their devotee. The underlying truth is that while moving along the path of sadhana, an intrinsic faith has to be developed and the wayward propensities and perversities of the lower self have to be identified, curbed, refined and transformed into divine virtues. Natural adoption of virtuous life is a visible sign of divine grace. Once it is accomplished, an aspirant can smoothly move ahead in the direction of the ultimate goal of human endeavour - self-realisation.

🔷 The field of sadhana is one's own inner being. Buried herein is a treasure-trove of immense spiritual wealth. Futile then is the need of seeking it in the outer world. In fact, the intrinsic virtues have been described as devi-devata (deities) by the seers. They have devised external rituals for the awakening of specific virtues within and in the process unearthing the hidden treasure. In order to acquire physical strength one makes use of various appliances of the gymnasium. There is no strength in these appliances; strength is embedded in the muscles.

🔶 The equipments are helpful only in activating the latent strength in the muscles. The same is true about the external rituals of atma sadhana (sadhana of the soul). One can learn a lot by keenly observing the mental state and the physical activities of a wrestler who does his regular practice each day with enthusiasm. Not only does he do the physical exercises but also takes nutritious food, observes continence, massages his body, adheres to a healthy daily routine and above all keeps himself free from worry. If all other aspects are neglected and only the physical exercises are given importance, his aim of becoming a wrestler will remain a fantasy. Similarly, the rituals of upasana (worship) have their own significance, but they alone do not lead to the achievement of the desired aim.

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 4)

🔶 वासनापूर्ण निकृष्ट जीवन त्याग कर शुद्ध सात्विक जीवन यापन करने की प्रेरणा देने वाला अध्यात्मवाद ही है। वह मनुष्य को तम से ज्योति और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाला है। बाह्य वस्तुओं के सुख की भाँति अध्यात्मवाद का आन्तरिक सुख अस्थिर नहीं होता। वह चिरन्तन स्थिर एकरस होता है। संसार की अशुद्धताएँ, इन्द्रिय भोग की लिप्सा और वस्तुवाद की असारता अध्यात्मवादी को प्रभावित नहीं कर पातीं। वह अन्तर बाहर एक जैसा तृप्त सन्तुष्ट तथा महान रहा करता है।

🔷 आत्मा में अखण्ड विश्वास रख कर जीवन यापन करने वाला आध्यात्मिक ही कहा जायेगा। आत्मा है यह मान लेना ही आत्मा में विश्वास करना नहीं है। आत्मा में विश्वास करने का आशय है इस अनुभूति से प्रतिक्षण ओत-प्रोत रहना कि ‘संसार में व्याप्त परमात्मा के अंश आत्मा द्वारा हमारा निर्माण किया गया है। हम यह पच भौतिक शरीर ही नहीं हैं बल्कि आत्मरूप में वही कुछ हैं जो परमात्मा है’। ऐसी अनुभूति होने से ही हम अपने को ठीक से पहचान सकेंगे और सत्य, प्रेम, सहानुभूति, दया, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों का आदर कर सकेंगे। जिस समय हममें इन गुणों के ठीक-ठीक मूल्याँकन तथा इनको अपने अन्दर विकसित करने की चाह जाग उठेगी हम अध्यात्म पथ पर अग्रसर हो चलेंगे।

🔶 अध्यात्म सदाचरण और सदाचरण अध्यात्म के प्रेरक मित्र हैं। सदाचरण अध्यात्मवाद का सक्रिय रूप है और अध्यात्मवाद सदाचरण की घोषणा है। सदाचारी आध्यात्मिक तथा आध्यात्मिक व्यक्ति का सदाचारी होना अवश्यम्भावी है।

🔷 भौतिक लोभ लिप्सा को त्याग कर निर्विकार अध्यात्म पथ को अवलम्बन करने से मनुष्य स्वभावतः आन्तरिक संतोष, प्रेम, आनन्द एवं आत्मीयता की दैवी संप्रदाएं प्राप्त कर लिया करता है। अक्षय दैवी सम्पदा पा जाने पर मनुष्य पूर्ण काम हो जाता है और तब फिर उसे और कुछ चाहने की अभिलाषा नहीं रह जाती। अध्यात्म जन्य दैवी सम्पदाओं में संसार के सारे भौतिक तथा अभौतिक सुख निहित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/January/v1.3

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 4)

👉 विज्ञान और प्रत्यक्षवाद ने क्या सचमुच हमें सुखी बनाया है?  

🔷 समय का बदलाव, वैज्ञानिक उपलब्धियों तक, तर्क के आधार पर, प्रदर्शन करने के रूप में जब लाभदायक प्रतीत होता है तो उसके स्थान पर तप, संयम, परमार्थ जैसी उन मान्यताओं को क्यों स्वीकार कर लिया जाए, जो आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता की दृष्टि से कितनी ही सराही क्यों न जाती हो, पर तात्कालिक लाभ की कसौटी पर उनके कारण घाटे में ही रहना पड़ता है।
  
🔶 नए समय के नए तर्क, अपराधियों-स्वेच्छाचारियों से लेकर हवा के साथ बहने वाले मनीषियों तक को समान रूप से अनुकूल पड़ते हैं और मान्यता के रूप में अंगीकार करने में भी सुविधाजनक प्रतीत होते हैं, तो हर कोई उसी को स्वीकार क्यों न करे? उसी दिशा में क्यों न चलें? मनीषी नीत्से ने दृढ़तापूर्वक घोषणा की है कि ‘‘तर्क के इस युग में पुरानी मान्यताओं पर आधारित ईश्वर मर चुका। अब उसे इतना गहरा दफना दिया गया है कि भविष्य में कभी उसके जीवित होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।’’ धर्म के सम्बन्ध में भी प्रत्यक्षवादी बौद्धिक बहुमत ने यही कहा है कि वह अफीम की गोली भर है, जो पिछड़ों को त्रास सहते रहने और विपन्नता के विरुद्ध मुँह न खोलने के लिए बाधित करता है, साथ ही वह अनाचारियों को निर्भय बनाता है ताकि लोक में अपनी चतुरता और समर्थता के बल पर वे उन कार्यों को करते रहें, जिन्हें अन्याय कहा जाता है।

🔷 परलोक का प्रश्न यदि आड़े आता हो तो वहाँ से बच निकलना और भी सरल है। किसी देवी-देवता की पूजा-पत्री कर देने या धार्मिक कर्मकाण्ड का सस्ता-सा आडम्बर बना देने भर से पाप-कर्मों के दण्ड से सहज छुटकारा मिल जाता है। जब इतने सस्ते में तथाकथित पापों की प्रतिक्रिया से बचा जा सकता है तो रास्ता बिल्कुल साफ है। मौज से मनमानी करते रहा जा सकता है और उससे कोई कठोर प्रतिफल की आशंका हो तो पूजा-पाठ के सस्ते से खेल-खिलवाड़ करने से वह आशंका भी निरस्त हो सकती है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 5

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 3)

🔶 मनुष्य साँसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करे किन्तु आध्यात्मिक उपलब्धि का बलिदान देकर नहीं। यदि वह ऐसी भूल करता है तो निश्चय ही अपने को प्रवंचित एवं प्रताड़ित करता है। जीवन को आध्यात्मिक मार्ग पर नियुक्त कर देने से साँसारिक लाभ तो होता ही है साथ ही मनुष्य अपने परम लक्ष्य अक्षय आनन्द की ओर भी अग्रसर होता जाता है। अध्यात्मवाद में दोनों लाभ अपनी क्षमता भर प्राप्त ही करना चाहिए। यही उसके लिये लिये प्रेय भी है और श्रेष्ठ भी।

🔷 आध्यात्मिक जीवन कोई अप्राकृतिक अथवा आरोपित जीवन नहीं है। आध्यात्मिक जीवन ही वास्तविक एवं स्वाभाविक जीवन है। इससे भिन्न जीवन ही अस्वाभाविक एवं आरोपित जीवन है। दुःख, क्लेश, चिन्ता एवं विक्षोभ के बीच से बहते हुए जीवन प्रवाह को स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। जीवन का प्रसन्न प्रवाह ही वास्तव में स्वाभाविक जीवन है। अध्यात्मवाद का त्याग करके अपनाया हुआ जीवन प्रवाह किसी प्रकार भी निर्मल स्निग्ध धारा के रूप में नहीं बन सकता। एक मात्र साँसारिक जीवन में लोभ, मोह, काम-क्रोध आदि विकारों के आवर्त बनते ही रहेंगे जो कि मनुष्य को अशान्त एवं असंतुलित बनायेंगे ही। जब कि आध्यात्मिक जीवन सुख एवं शाँति के क्षणों में प्रसन्नता पूर्वक बहता हुआ मनुष्य को सुख शान्ति की शीतलता प्रदान करता रहेगा।

🔶 आध्यात्मिक जीवन अपनाने का अर्थ है असत् से सत् की ओर जाना। सत्य, प्रेम और न्याय का आदर करना, निकृष्ट जीवन से उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ना। इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन अपनाये बिना मनुष्य वास्तविक सुख शान्ति नहीं पा सकता। धनवान, यशवान होकर भी यदि मनुष्य आत्मा की उच्च भूमिका में न पहुँचा सका तो क्या वह किसी प्रकार भी महान कहा जायेगा। सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके, छल-कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडंबना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा। महानता की वह अनुभूति जो आत्मा को पुलकित अथवा देवत्व की ओर प्रेरित करती है कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। यह दिव्य अनुभूति केवल आध्यात्मिक जीवन अपनाने से ही प्राप्त हो सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 3

👉 आज का सद्चिंतन 6 September 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 September 2018


बुधवार, 5 सितंबर 2018

👉 "शीघ्रता नहीं

🔷 उत्तम रीती अंग्रेजी भाषा में प्रख्यात साहित्यकार बुल्वर लिटन शौकिया तौर पर ही लिखा करते थे लेकिन उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह इतना श्रेष्ठ था कि उसके कारण लिटन की गणना अंग्रेजी के अग्रणी लेखकों में की जाती है। एक बार किसी ने उनसे इसका रहस्य पूछा तो लिटन ने कहा कि "मैं कभी शीघ्रतापूर्वक बहुत अधिक काम कर डालने की कोशिश नहीं करता बल्कि उसे उत्तम रीति से करना ही ज्यादा पसंद करता हूँ। अगर आज अपनी शक्ति से अधिक काम कर डाला जाए तो कल तक थकान आ जाएगी और फिर थोड़ा-सा काम भी ठीक ढंग से नहीं हो सकेगा।

🔶 जब मैंने कालेज छोड़ा और सांसारिक कामों में पड़ा तो उसके पहले वास्तव में मैंने ऐसे कामों का कोई अध्ययन नहीं किया था। लेकिन इसके बाद मैं पढ़ने लगा और मेरा विश्वास है कि मैंने सामान्य लोगों से कम नहीं पढ़ा। मैंने बहुत-सी दूर-दूर देशों की यात्राएँ कीं, राजनीति में भाग लिया और उद्योग धंधों में भी समय बिताया। फिर भी साठ से अधिक किताबें लिख डालीं। आपको विश्वास नहीं होगा कि मैंने इस पढ़ने-लिखने में कभी तीन घंटे से अधिक समय खर्च नहीं किया। लेकिन इन तीन घंटों में जो भी पढ़ता-लिखता था वह पूरी एकाग्रता, तन्मयता और तत्परता के साथ।"

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृ. 21"

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...