रविवार, 4 फ़रवरी 2018

👉 बदलाव

🔶 मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति के कारण मैं मायके से लेकर ससुराल तक कभी प्रशंसा, तो कभी व्यंगबाण झेलती रही. मैं चाहकर भी किसी बात का प्रत्युत्तर नहीं दे पाती थी. बस, हर स्थिति में सामंजस्य बिठाकर चुप्पी ओढ़ लेती. मेरी इसी प्रवृत्ति का फ़ायदा जीवनभर मेरे पति और उनके बाद मेरे पुत्र ने उठाया. इन सब बातों को सोचने के लिए मैं आज क्यों विवश हुई? आज लगता है कि उसकी शादी आशू से कराकर मैंने बड़ी भारी भूल की. उसने अपने पिता का स्वभाव पाया था. वही शक्की मिज़ाज, वही अहंकारपूर्ण व्यवहार, वही हृदय को भेद देनेवाले कटीले व्यंगबाण कहना. आज रह-रहकर पश्‍चाताप हो रहा है. मैं कैसे भूल गयी कि बबूल के पेड़ पर आम नहीं लगते. आशू के पिता शुरू से ही अक्खड़ क़िस्म के व्यक्ति थे. लोक-लाज और मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति ने कभी मुझे उनसे विद्रोह नहीं करने दिया. आज वही भूल मेरे हृदय को शूल बनकर चुभ रही हैं. अपनी इस भूल का एहसास शायद जीवनभर मुझे न हो पाता, यदि मैं आशू की शादी रूपा से न कराती।

🔷 आशू आए दिन रूपा को किसी न किसी बात पर डांटता-फटकारता रहता. रूपा गृहकार्य में निपुण पढ़ी-लिखी लड़की थी. आशू उसके हर काम में दोष निकालता रहता. शायद इसके पीछे मुख्य कारण रूपा का सौंन्दर्य था. आशू अपने साधारण व्यक्तित्व की तुलना में रूपा का आकर्षक व्यक्तित्व देखकर अक्सर कुढ़ता रहता था. यही कारण था कि कभी रूपा उसे चरित्रहीन लगती, तो कभी फूहड़. उसे नीचा दिखाकर आशू के अहम् को संतुष्टि मिलती थी।

🔶 यह वही आशू है जिसने अपने दोस्त विनोद की शादी में रूपा को देखकर मुझसे कहा था कि मैं किसी भी तरह उसकी शादी रूपा से करा दूं. तब उसने स्वयं की तुलना उससे क्यों नहीं की थी? तब उसने क्यों अपने साधारण व्यक्तित्व को अनदेखा कर दिया था? आशू की सरकारी नौकरी और ऊंचे ओहदे ने उसकी सारी कमियों को ढंक लिया तथा रूपा के पिता ने रिश्ता स्वीकार कर लिया. इस तरह रूपा इस घर-आंगन में आ गयी. शुरुआती दिन हंसी-ख़ुशी से बीते, लेकिन धीरे-धीरे आशू के भीतर का ज़हर बाहर आने लगा और एक-एक करके उसके पिता की सारी विशेषताएं उसमें प्रकट होने लगीं।

🔷 यदि कोई मित्र या सम्बन्धी रूपा की प्रशंसाभर कर देता, उस समय तो वह हंस देता, लेकिन बाद में बेचारी को न जाने कितनी खरी-खोटी सुनाता था. वह बेचारी मुंह सिए निर्दोष होकर भी सब कुछ सुनती रहती. अचानक किसी पर नज़र पड़ जाती, तो उसके पीछे ही पड़ जाता कि वह जान-बूझकर उस व्यक्ति को देख रही है. मुझे वह जानता था कि मां तो गूंगी है. वो तो कुछ बोलेगी नहीं. मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस था कि मैं तो मैं, मेरी बहू भी गूंगी आ गयी थी. आशू उसे जली-कटी सुनाता रहता और वह सुनती रहती. मेरी समझ में ये नहीं आया कि मेरे बेटे में मेरी प्रवृत्ति के बजाय अपने पिता की प्रवृत्ति ही क्यों मुखर हुई थी. न जाने कितनी बार उसने अपने पिता के सन्मुख मुझे नीची गरदन किए अपशब्द सुनते देखा था. लेकिन उसने कभी अपने पिता का विरोध नहीं किया. कभी मुझे नहीं कहा कि ‘मां तुम ये सब क्यों सहन करती हो. तोड़ दो अपना मौनव्रत, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं मां होकर भी पुत्र से वंचित थी।

🔶 आज फिर वह न जाने किस बात पर बहू पर गरज-बरस रहा था. मैंने उनके कमरे का दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला. आशू पलंग पर बैठा रूपा को लताड़ रहा था और वह बेचारी चुपचाप खड़ी उसकी जहरीली बातें सुन रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे रूपा के स्थान पर मैं खड़ी हूं और आशू के स्थान पर मुझे उसके पिता नज़र आने लगे. मैंने दरवाज़ा ज़ोर से धकेलकर खोल दिया, ‘‘ख़बरदार आशू, जो अब बहू को एक शब्द भी कहा. तुम यह न समझ लेना कि अगर बहू तुम्हारी बातें सहन कर रही है, तो उसमें कमी है या वह कमज़ोर है. सुन्दरता चरित्रहीनता का कारण नहीं होती. तुम ये बात अच्छी तरह जानते हो. जानते-बूझते भी तुम्हें अपनी पत्नी के चरित्र पर सन्देह करते शर्म नहीं आती. रूपा केवल तुम्हारी पत्नी नहीं है, बल्कि बहू के रूप में मेरी बेटी भी है. इस घर की मान-मर्यादा है. आज के बाद बहू पर किसी भी तरह की तोहमत लगाई, तो मुझसे बुरा कोई न होगा. आज से इसे अकेली न समझना।’’

🔷 आशू आश्‍चर्य से मेरी ओर देख रहा था. एक शब्द में उत्तर देनेवाली मां से इतने बड़े भाषण की उसे उम्मीद नहीं थी. रूपा मुझसे लिपटकर रो रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सिर से बड़ा भारी बोझ उतर गया हो।

🔶 ‘‘चल बहू, अपना सम्मान खोकर अगर किसी रिश्ते को जीवित रखा भी तो क्या रखा.’’ इतना कहकर मैं रूपा को लेकर अपने कमरे में आ गई. आज मैंने अपनी खोई हुई आवाज़ को पा लिया है. मैंने आज महसूस किया कि यदि लड़ाई अपने हक़ की है, तो आवाज़ उठाना ग़लत नहीं है. अगर हम सच्चे हैं, तो उस सच्चाई के आगे एक न एक दिन सबको झुकना ही होगा।

🔷 ‘‘आज के बाद मैं तुम्हारे चेहरे पर ये उदासी न देखूं.’’ मैं धीरे-धीरे रूपा को समझा रही थी. आज मेरी ज़िन्दगी ने करवट ली थी. सब कुछ बदला-बदला-सा लग रहा था और इस बदलाव को महसूस कर आशू ख़ुद क्षमा मांगकर रूपा को ले जाएगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है. सोचते-सोचते मेरे होंठों पर गहरी मुस्कुराहट आ गई।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2018

👉 The Art of Sadhana

🔷 The essence of Sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own divine attributes and virtues. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine self is awakened and activated, we realize that we are full of spiritual powers (riddhi and siddhi). The sole aim of Sadhana is to activate these dormant attributes through a dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔶 A farmer understands the significance of Sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day after day throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he provides it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting. The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipment comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste.

🔷 He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific time to ripen and so he has to wait patiently till then. He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His Sadhana of farming continues single-mindedly. It cannot be said that he does not encounter any obstacles. He overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature. This is s³dhan³ of a farmer, which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no tiredness, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of Sadhana from the farmer.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 13)

🔶 मित्रो! आप संन्यासी हो जायँ, आप वैरागी हो जायँ। आप गृहस्थ बने रहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। संतों, ऋषियों में से अधिकांश गृहस्थ थे। जितने भी देवी-देवता थे, सबके सब गृहस्थ थे, ऐसे मुझे मालूम पड़ता है। शंकर जी भी गृहस्थ थे। उनके दो बच्चे भी थे। दो बच्चों के अलावा उनके पास बैल था, शेर था, कबूतर था और उनके बेटों के पास चूहा था, मोर था। सारे का सारा सर्कस लेकर वे चलते थे। कौन? शंकर जी। बजाने के लिए डमरू, चलाने के लिए त्रिशूल और ढेर सारा सरंजाम लेकर शंकर जी और उनका खानदान चलता था। वे गृहस्थ थे। ऐसा नहीं है कि आप गृहस्थ रहते हैं, तो आप योग्य नहीं हो सकते और सुयोग्य व्यक्ति नहीं हो सकते, महामानव नहीं बन सकते। गार्हस्थ्य जीवन आपके मार्ग में बाधक नहीं बन सकता। मैं तो स्वयं गृहस्थ बनकर के रहा, ताकि मैं लोगों को यकीन दिला सकूँ, इस बात का विश्वास दिला सकूँ कि गृहस्थ रहने से किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है।

🔷 मित्रो! आदमी का नुकसान गृहस्थ होने से नहीं होता है। नुकसान आदमी का लोभी होने से होता है, मोहग्रस्त होने से होता है। आदमी का विनाश लोभी होने से होता है, गृहस्थ होने से नहीं होता है। संत-बाबा जी भी ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने ढेरों की ढेरों सम्पदा कमाई और मरने के समय तक धन का मोह, स्थान का मोह, आश्रम का मोह उन्हें बना रहा। उनको मैं गृहस्थ कहूँगा। उनको मैं संन्यासी नहीं कह सकता। मैं ऐसे असंख्य गृहस्थों को जानता हूँ जिन्होंने अपने बच्चों का तो पालन किया, जिन्होंने उसी तरीके से किया जिस तरीके से माली अपने बगीचे का पालन किया करता है। पालन करने के बाद वह समझ जाता है कि यह पौधा हमारा नहीं है, वरन् यह मालिक का है। हम मालिक के पौधे की देख−भाल इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमें रोटी खिलाता है। इसलिए हमें उसके पौधों को सींचना चाहिए, पौधों को बड़ा बनाना चाहिए। यह संपदा हमारी कैसे हो सकती है?

🔶 मित्रो! आप जहाँ कहीं भी रहें, जहाँ कहीं भी जायँ, मालिक बनकर नहीं, माली बनकर रहें। इससे आपका अहंकार गलता हुआ चला जायेगा और आपका प्रभाव बढ़ता हुआ चला जायेगा। अगर आपने ऐसी मनःस्थिति बना ली और इस बात पर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया कि जो लोग आपके संपर्क में आये, उन पर आपने कैसी छाप डालने की कोशिश की और कैसा प्रभाव छोड़कर के आये। मैं इस बात की तलाश करूँगा कि जहाँ भी आप गये थे, वहाँ हिलने-मिलने का, व्यवहार करने का आपका क्रम क्या रहा? अगर आप यह छाप छोड़कर आये कि हम शान्तिकुञ्ज से आये हैं। वहाँ जो विचारधारा दी जाती है, जो प्रेरणाएँ दी जाती हैं, जो दिशायें दी जाती हैं, उन तीनों को लेकर आपने अपनी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारे मिशन की इज्जत को कैसे बढ़ाया। हम यही देखना पसंद करेंगे। आपकी वाणी का व्यवहार कैसा रहा। लोगों के साथ में आपने अपनी वाणी की मिठास का किस तरह से इस्तेमाल किया। जहाँ आप गये थे, वहाँ बात-बात पर लड़ाई करके आये होंगे, बात-बात पर झगड़ा करके आये होंगे, तो हमको बुरा लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 32)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔶 कुलदानन्द ब्रह्मचारी ने अपनी डायरी में कई रहस्यमय साधना प्रसंग की चर्चा की है। ऐसी एक चर्चा उनके जीवन के उस कालखण्ड की है, जब वह गहरे साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटें इस काम रूपी महाअसुर से। हारकर उन्होंने अपनी विकलता गुरुदेव से निवेदित की। अपनी व्यथा कहते हुए वह बिलख-बिलख कर रो पड़े। उनके आँसुओं से महात्मा विजय कृष्ण गोस्वामी के चरण भीग गए। उनकी इस विह्वलता से द्रवित होकर गोस्वामी जी ने उठाकर ढाँढस बँधाया और कहा- पुत्र! तुम रोते क्यों हो? गुरु के रहते उसके शिष्य को असहाय अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अपने सद्गुरु के रहते हुए यदि कोई शिष्य विवशता अनुभव करता है, तो उसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उसका शिष्यत्व सच्चा नहीं है अथवा उसके गुरु की चेतना अभी भगवान् से एकाकार नहीं हुई है।
  
🔷 अपनी बातों को कहते हुए विजयकृष्ण गोस्वामी उठकर खड़े हुए और दीवार पर लगी अलमारी से अपनी एक छोटी फोटो कुलदानन्द को थमाई। और बोले- बेटा! तुम शिव भाव से इस फोटो की नित्य पूजा करना। तुम्हें अपने जीवन की आन्तरिक व बाह्य आपदाओं से सुरक्षा मिलेगी। फोटो लेकर कुलदानन्द जी अपने निवास स्थान पर आ गए और नित्य प्रति गुरुदेव के चित्र का पूजन करते हुए अपनी साधना में विलीन हो गए। साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अन्तर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।
  
🔶 इन्हीं दिनों उन्हें एक अन्य अनुभव भी हुआ। एक दिन साधना करते समय उनके कमरे की छत गिर पड़ी। जिस ढंग से छत गिरी उस तरह उन्हें दबकर मर जाना चाहिए था; परन्तु आश्चर्यजनक ढंग से जिस स्थान पर वे बैठे थे, उस स्थान पर छत का मलबा अधर में ही लटका रह गया। गुरु कृपा को अनुभव करते हुए पहले वह उठे, फिर गुरुदेव के चित्र को उठाया, और बाहर आ गए। इसी के साथ पूरी छत भी गिर गयी। साथ ही ध्यान आया उन्हें गुरुदेव का कथन, जो उन्होंने फोटो देते हुए कहा था- पुत्र! मेरा यह चित्र तुम्हें आन्तरिक व बाह्य विपत्तियों से बचाएगा। और सचमुच ऐसा ही हुआ। गुरु कृपा से शिष्य को सब कुछ अनायास ही सुलभ हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 55

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 4)

🔷 जो नमक शरीर में घुलते और पोषण प्रदान करते हैं वे अन्न, शाक, फल आदि खाद्य पदार्थों में प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। वे ही पचते और खपते भी हैं। इस प्रकार शरीर की लवण आवश्यकता की पूत के लिए उसका समुचित अनुपात उन खाद्य पदार्थों में सँजोया हैं जो खाने के काम आते हैं। उनका अन्यान्य रासायनिक पदार्थों के साथ ऐसा समन्वय भी रहता है, जिससे उनके पचने में सुविधा रहे। आवश्यक नहीं कि उन उपयोगी लवणों का स्वाद खारा ही रहे। फ्रूट साल्ट खारे कहाँ होते हैं?

🔶 मनुष्य है जिसे खारी नमक के बिना एक ग्रास गले उतारना कठिन पड़ता है। दाल, शाक, चटनी, अचार कुछ क्यों न हो, हरेक में चटकीला नमक रहना चाहिए। इसके बिना जायका ही क्या? यह बुरी आदत जान-बूझकर डाली गई है। संसार के अनेक क्षेत्र इन दिनों भी ऐसे हैं जहाँ खारी नमक का उपयोग प्रायः नहीं ही होता है। देखा-देखी प्रचलन हुआ है तो उसकी मात्रा नगण्य जितनी रखी गई है। इसका प्रतिफल प्रत्यक्ष है। उन-उन क्षेत्रों में सभ्य जगत की प्राणप्रिय बीमारियाँ अभी भी पहुँच नहीं पाई हैं।

🔷 अन्य मसालों के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। जीरा, धनिया, हल्दी जैसे मसालों को तो किसी प्रकार सहन भी किया जा सकता है किन्तु मिर्च, लौंग, हींग, तेजपात जैसे गरम मशालें तो ऐसे हैं, जिन्हें एक प्रकार का तेजाब ही कहना चाहिए। वे जलाने-गलाने के अतिरिक्त दूसरा कोई काम कर ही नहीं पाते। हंटर मार-मार कर दौड़ाने जैसी उत्तेजना देकर पेट के साथ अत्याचार ही करते रहते हैं। अधिक खाये को जल्दी पचाने की बात आमतौर से मसालों का लाभ बताते हुए कही जाती हैं। पर वस्तुतः वे निर्दय चाबुकमार की गतिविधियाँ ही अपनाते हैं और नशे की तरह आदत में सम्मिलित हो जाने के बाद यह विवशता उत्पन्न करते हैं कि उनके बिना गाड़ी धकेगी ही नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

👉 परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है :-

🔷 गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वैश्या का मकान था।

🔶 वैश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वैश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—

🔷 ‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

🔶 संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

🔷 बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

🔶 उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा

🔷 “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

🔶 पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

🔷 उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

🔴 यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया।

🔷 भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा, छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 Feb 2018


👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 3)

🔷 दूसरी ओर दृष्टि डालने से जो दृश्य सामने आता है, उसे देखते हुए यह मानने को भी जी नहीं करता है कि शरीर को मित्र माना गया है और उसकी सुरक्षा, स्थिरता तथा प्रगति का वैसा ध्यान रखा गया है जैसा कि किसी समझदार को रखना चाहिए था। एक-एक करके पर्यवेक्षण करना हो तो सर्वप्रथम दृष्टि आहार पर जानी चाहिए, क्योंकि इसी ईंधन के सहारे यह भट्टी गरम रहती है और इसी पर पकने वाली खिचड़ी के सहारे जीवन की गाड़ी चलती है। रस-रक्त का तेल-पानी ही है जिसके बलबूते यह मोटर दौड़ती है। इस सन्दर्भ में असावधानी बरती जाय, उलटी नीति अपनाई जाय तो स्पष्ट है कि उस आधार को विषाक्त होना पड़ेगा, जिसे आरोग्य की आधारशिला कह सकते हैं।

🔶 अनुपयुक्त आहार करते रहने पर भी कोई किस प्रकार अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रख सकेगा? इस तथ्य को समझने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फिर भी स्पष्ट है कि आहार के सम्बन्ध में वह ढर्रा अपनाया गया है, जिसके रहते निरोग रह सकने की बात सोची भी नहीं जा सकती। आश्चर्य यह है कि दुष्परिणाम भुगतने में इतनी देरी क्यों होती रहती है। प्रकृति को कठोर अनुशासन की अधिष्ठात्री कहा जाता है फिर भी वह मनुष्य के साथ धीमी और थोड़ी प्रताड़ना देने की उदारता क्यों कर दिखा पाती है।

🔷 अभ्यस्त आहार का निरीक्षण पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होता है कि उसे निर्जीव और विषाक्त बनाने में कोई कमी नहीं रहने दी गई है। स्वादिष्ट के ध्रुवकेन्द्र समझे जाने वाले नमक पर दृष्टि डाली जाय तो प्रतीत होता है कि यह मनुष्य के आहार में सम्मिलित होने योग्य स्थिति में किसी भी प्रकार नहीं है। रासायनिक विश्लेषण करने पर वह सोडियम क्लोराइड नामक विष है। जिसकी पोषण में सहायता दे सकने जैसी स्थिति तनिक भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 3)

🔷 I have taken so many big jobs but none of them was ever halted. Have not you seen that? BHAGWAN said to me, ‘‘Change the minds and the hearts of people through spirituality.’’ When I told him about my efficiency in doing that, BHAGWAN just said to me, ‘‘BETA! Efficiency lies within your soul.’’ Well what all I did thereafter is before you. I actually concentrated, researched and exploited the very efficiency of my own soul only to provide this world with so much voluminous literature that stirred the minds & the hearts of millions of people leading them to remember me. I have given DIKSHA to 5 million persons and found a permanent place in hearts and minds of millions of million people all over the world, is it not any surprise?
                                          
🔶 O YES! I was a person, who initially had no means & no man to help & cooperate but my own soul only. I was alone, absolutely alone. Only support I had was of only my own soul. How a lonely person in spiritual field can do miracle cannot be evaluated right now. But pause just a minute. In days to come it will be evaluated that how I have stirred the society through literature, voice and teachings. When I open my voice, it pierces like a gun-bullet in the hearts and minds of listeners.

🔷 My words have been piercing & stirring the people and will continue to do so in future also. Whether I am finishing right now? Yes, right now I am giving my BAIKHARI voice a stop but will continue to stir and pierce through my PARAA, PASHYANT & MADHYAMA voices, the hearts and minds of people just to awaken them.
                                         
🔶 Such kind of efficiency must be visible in people. Yes, how has been that possible? It has been possible only and only through pure spirituality and not because of a little person like me who is without any means. I have told people that a righteous approach of utilizing the resources available can lead them to draw maximum advantages as I had been drawing.
                                                                                   
Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 12)

🔷 मित्रो! हमारे गुरुदेव भी इसी प्रकार के हैं। वे बहुत दूर रहते हैं। यहाँ से बहुत दूर, जहाँ मनुष्यों का कभी जाना संभव नहीं होता। उन्होंने अपनी जबान का-अपनी वाणी का कभी इस्तेमाल नहीं किया। शक्ति होते हुए भी अपनी जिंदगी में कभी व्याख्यान नहीं दिया। किसी को कभी गुरुदीक्षा नहीं दी। मुझे भी जब वे बुलाते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा चार दिन के लिए बुलाते हैं और मौन बैठे रहते हैं। मुँह से-जबान से एक शब्द भी नहीं निकालते, लेकिन उनके पुण्य के प्रभाव से, शक्ति के प्रभाव से, तेज के प्रभाव से, ब्रह्मवर्चस के प्रभाव से समीप में जो कोई भी आदमी आता है, प्रभावित होता हुआ चला जाता है, बढ़ता हुआ, हिलता हुआ, काँपता हुआ चला जाता है। यह विशेषता उनकी वाणी की विशेषता नहीं है। उनकी क्रियाओं की विशेषता नहीं है। उनके पैसे की विशेषता नहीं है। यह उनके अंतःकरण की विशेषता है।

🔶 मित्रो! आप यहाँ से जाने के पश्चात् योगी बनकर रहना और तपस्वी बनकर रहना। योगी और तपस्वी की परिभाषाएँ आपको मैं कल बता चुका हूँ। आप भूलना मत। आप भूल जायेंगे तो मुश्किल हो जायेगी। आप फिर नाक में से पानी पीने को योग कहना शुरू कर देंगे और गले में से रस्सी डालने को योग कहना शुरू कर देंगे और टट्टी के रास्ते पानी चढ़ाने को योग कहना शुरू कर देंगे। आप नाक में से हवा निकालने को योग कहना शुरू कर देंगे। योग का यह आशय नहीं है, मैं आपको कितनी बार समझा चुका हूँ। योग का इन सबसे कोई ताल्लुक नहीं है। यह अभ्यास है, क्रियाकलाप है, जिससे शरीर को अच्छा रखा जा सके। यह सूत्र है, प्रक्रिया है, योग नहीं है। आप यहाँ से जाने के पश्चात् अपने आपको योगी बनाये रखने के लिए तप करना। आप अपने आपको भावनाओं में मत बहने देना। आप हमेशा यह विचार करना कि हम किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हम किसी कुटुम्ब विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हमारा मन किसी घर विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है और किसी खानदान विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।

🔷 मित्रो! वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् और पीला कपड़ा पहनने के पश्चात् आपको भले से ही किसी घर में रहना पड़े, इसके लिए मैं आपको मजबूर नहीं करता और यह भी नहीं कहता कि जो बच्चे आपके बाकी रह गये हैं, उनकी सेवा नहीं करना चाहिए। उनका पालन-पोषण नहीं करना चाहिए, मैं यह भी नहीं कहता, पर मैं यह अवश्य कहता हूँ कि आप अपनी मन की स्थिति को बदल देना। आप अपनी मनःस्थिति को इस प्रकार बदल देना कि हम किसी खास आदमियों की संपदा नहीं है और हमारा कोई खास घर नहीं है। हम किसी खास वस्तु से जुड़े हुए नहीं हैं। अब हमारा कायाकल्प हो गया है और हमारे जीवन की नयी दिशायें बन गयी हैं। अब हम समाज की संपत्ति हैं। अब हम धर्म की संपत्ति हैं। अब हम भगवान की संपत्ति हैं। अब हम राष्ट्र की संपत्ति हैं और हम संस्कृति की संपत्ति हैं। अब हम व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं हैं। अगर आप मन का यह कायाकल्प करने में समर्थ हो गये और मन का स्तर बदलने में समर्थ हो गये, तो मैं आपको सच्चा वैरागी कहूँगा और सच्चा संन्यासी कहूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 31)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔷 गुरु नमन की यह महिमा अनन्त और अपरिमित है। इसका विस्तार असीम है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् महेश्वर जगन्माता भवानी से कहते हैं-

यस्य कारणरूपस्य कार्यरूपेण भाति यत्। कार्यकारणरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४१॥
नानारूपम् इदं सर्वं न केनाप्यस्ति भिन्नता। कार्यकारणता चैव तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४२॥
यदङ् घ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकम्। तारकं सर्वदाऽऽपद्भ्यः श्रीगुरुं प्रणमाम्यहम्॥ ४३॥
शिवे क्रुद्धे गुरुस्राता गुरौ कु्रद्धे शिवो न हि। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ ४४॥
वन्दे गुरुपदद्वन्द्वं वाङ्मनश्चित्तगोचरम्। श्वेतरक्तप्रभाभिन्नं शिवशक्त्यात्मकं परम्॥ ४५॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में जीवन साधना का सार समाहित है। भगवान् सदाशिव की वाणी शिष्यों को बोध कराती है कि ब्राह्मी चेतना से एकरूप गुरुदेव इस जगत् का परम कारण होने के साथ ही कारण रूप यह  जगत् भी हैं। वे ही महाबीज हैं और वे ही महावट हैं। ऐसे कार्य-कारण रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ४१॥ इस संसार में यद्यपि ऊपरी तौर पर सब जगह भेद व भिन्नता दिखाई देती है; परन्तु तात्त्विक दृष्टि से ऐसा नहीं है। इस दृष्टि से तो कार्य-कारण की परमात्म चेतना के रूप में गुरुदेव ही सर्वत्र व्याप्त हैं। ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु को नमन है॥ ४२॥ जिनके दोनों चरण कमल शिष्य के जीवन में आने वाले सभी द्वन्द्वों, सर्वविधि तापों और सब तरह की आपदाओं का निवारण करते हैं उन श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४३॥ भगवान् भोलेनाथ स्वयं कहते हैं कि यदि शिव स्वयं क्रुद्ध हो जाएँ, तो भी शिष्य का त्राण करने में सद्गुरु समर्थ हैं; परन्तु यदि गुरुदेव रुष्ट हो गए, तो महारुद्र शिव भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए सब तरह की कोशिश करके श्री गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ४४॥ श्री गुरु के चरणों की महिमा मन-वाणी, चित्त व इन्द्रिय ज्ञान से परे है। श्वेत-अरुण प्रभा युक्त गुरु चरण कमल परम शिव व परा शक्ति का सहज वासस्थान हैं, उनकी मैं बार-बार वन्दना करता हूँ॥ ४५॥
  
गुरु नमन के इन महामंत्रों के भाव को सही ढंग से वही समझ सकते हैं, जिन्हें इस सत्य की अनुभूति हो चुकी है कि सद्गुरु चेतना एवं ब्राह्मी चेतना सर्वथा एक हैं; अपने गुरुदेव कोई और नहीं, स्वयं देहधारी ब्रह्म हैं। इन महामंत्रों की व्याख्या को और अधिक सुस्पष्ट ढंग से समझने के लिए एक सत्य घटना का उल्लेख करना सम्भवतः अधिक उपयुक्त होगा। यह घटना बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी एवं उनके शिष्य कुलदानन्द ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में है। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी योग विभूतियों से सम्पन्न सिद्ध योगी थे। उनका सन्त जीवन अनेकों सन्तों व महान् देश भक्तों के लिए प्रेरक रहा है। उनके शिष्यों ने न केवल साधना जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ अर्जित कीं, अपितु कइयों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी भी निभायी। इन शिष्यों में कुलदानन्द ब्रह्मचारी उनके ऐसे शिष्य थे, जिन्होंने अपने तप और योग साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 54

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

👉 रिश्ते मृत्यु के साथ मिट जाते हैं

🔷 एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बरू के साथ कहीं जा रहे थे गर्मियों के दिन थे। एक प्याऊ से उन्होंने पानी पिया और पीपल के पेड़ की छाया में जा बैठे। इतने में एक कसाई वहाँ से 25-30 बकरों को लेकर गुजरा। उसमें से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर मोठ खाने लपक पड़ा।

🔶 उस दुकान पर नाम लिखा था – ‘शगालचंद सेठ।’ दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर दो-चार घूँसे मार दिये बकरा ‘बैंऽऽऽ…. बैंऽऽऽ…’ करने लगा और उसके मुँह में से सारे मोठ गिर पड़े। फिर कसाई को बकरा पकड़ाते हुए कहाः “जब इस बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी मुंडी मेरे को देना क्योंकि यह मेरे मोठ खा गया है।

🔷 ”देवर्षि नारद ने जरा-सा ध्यान लगाकर देखा और जोर-से हँस पड़े। तुम्बरू पूछने लगाः “गुरुजी! आप क्यों हँसे? उस बकरे को जब घूँसे पड़ रहे थे तब तो आप दुःखी हो गये थे, किंतु ध्यान करने के बाद आप हँस पड़े। इसमें क्या रहस्य है?

🔶 ”नारद जी ने कहाः “छोड़ो भी…. यह तो सब कर्मों का फल है, छोड़ो। ”“नहीं गुरुजी! कृपा करके बताइये।”“ इस दुकान पर जो नाम लिखा है ‘शगालचंद सेठ’ – वह शगालचंद सेठ स्वयं यह बकरा होकर आया है। यह दुकानदार शगालचंद सेठ का ही पुत्र है। सेठ मरकर बकरा हुआ है और इस दुकान से अना पुराना सम्बन्ध समझकर इस पर मोठ खाने गया। उसके बेटे ने ही उसको मारकर भगा दिया।

🔷 मैंने देखा कि 30 बकरों में से कोई दुकान पर नहीं गया फिर यह क्यों गया कमबख्त? इसलिए ध्यान करके देखा तो पता चला कि इसका पुराना सम्बंध था। जिस बेटे के लिए शगालचंद सेठ ने इतना कमाया था, वही बेटा मोठ के चार दाने भी नहीं खाने देता और गलती से खा लिये हैं तो मुंडी माँग रहा है बाप की। इसलिए कर्म की गति और मनुष्य के मोह पर मुझे हँसी आ रही हैं कि अपने – अपने कर्मों का फल को प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है और इस जन्म के रिश्ते – नाते मृत्यु के साथ ही मिट जाते हैं, कोई काम नहीं आता।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 Feb 2018


👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 2)

🔷 इतना जानते हुए भी यदि कोई जान बूझकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारे, काँटों पर चले, गड्ढे में गिरे और बर्र के छत्ते में हाथ डाले तो कोई क्या करे? समझदारी का अभाव समझ में आता है। उसके लिए भाग्य-भगवान को दोष देकर भी जी हलका किया जा सकता है। किन्तु तब क्या किया जाय, जब समझदारी उलटे रास्ते चले? पैर ऊपर करके, हाथों के बल, धरती से सिर रगड़ते हुए चलने में विशिष्टता के अहंकार का प्रदर्शन करे।

🔶 मनुष्य की गतिविधियों को देखकर ऐसी ही स्थिति का अवलोकन करना पड़ता है। जब अपने परमप्रिय सेवक-सम्बन्धी के लिए नासमझी भरी अनीति अपनाते हुए देखा जाता है तब आश्चर्य होता है और असमंजस पड़ता है कि मनुष्य की समझदारी को सराहा जाय या उसकी उलटे पैरों चलने लौटने की विडम्बना को मूर्खतापूर्ण कहकर कोसा जाय।

🔷 शरीर के साथ जो व्यवहार किया जाता है उसे उलट-पुलट कर देखा जाय तो एक शब्द में विचित्र ही कहा जा सकता है। शरीर के साथ शत्रुता निबाही जाय, उसे तोड़-फोड़कर बर्बाद किया जाय ऐसा भी किसी का मन नहीं दीखता, यदि ऐसी बात रही होती तो उसे वस्त्र-आभूषणों से, श्रृंगार प्रसाधनों से क्यों सजाया जाता? केश-विन्यास बनाने जैसे अनेकों कामों मेंं कितना समय लगता है? सजधज में कितना धन व्यय होता है? वाहनों, सेवकों द्वारा उसके लिए कितनी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। विनोद के कितने ही साधन जुटाये जाते हैं? पौष्टिक आहार लेने का भी ध्यान रहता है। इन सब बातों को देखते हुए यह कैसे कहा जाय कि अपनी काया के प्रति किसी का मन शत्रुता निबाहने का है और उसे बर्बाद कर देने का इरादा बन गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 2)

🔷 I did PUJA-UPASANA (worship-intercession) but with aforesaid mentality. I never approached BHAGWAN with mentality of a beggar, poor, as happens to be generally the case with public-mentality. By today I have been taking the name of RAM as if I have been using soap or a scrub brush. I used RAM-NAM as stone of a washer man to wash my house; I used RAM-NAM as tool of a cotton-comber to thrash myself. Is not so that cotton is repeatedly thrashed at a single point?

🔶 Is not so that cotton-comber repeatedly strikes his hammer over a floor-mat? I used RAM-NAM as a cotton-comber uses his hammer, but how can a cunning fellow, a selfish fellow, a begging fellow, a cowardice fellow and a beseeching fellow get the love of BHAGWAN? How can such person save his grace before BHAGWAN? I think any person with such approach cannot save his faces.
                                             
🔷 I am a respected person before my BHAGWAN. He has saved my grace for I have saved his grace. I said to my BHAGWAN, ‘‘your grace and dignity depends on the dignified life your child lives. Your dignity is associated with my dignity.’’ I maintained the dignity of BHAGWAN to tell him that he has not committed any mistake by giving me the life of a human being. I got its results. BHAGWAN maintained  own as well as my dignity. BHAGWAN too assured me of no loss to my dignity. I am a magnificent person. No one can mark any blot over my dignity, so none did so. No one could point a censoring finger towards me nor did I allow that.
                                             
🔶 I continued to teach people about mechanics and process of spirituality that honesty, sincerity and dignity are the elements only with which one should approach the BHAGWAN. On doing so no deficiency will be left with that person and no objective in his life will be left uncompleted.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 11)

🔷 मित्रो! यदि उद्देश्य और दिशा सही होती, तो एक-एक संत एक-एक व्यक्ति को व्यक्तित्ववान बनाने में अपनी जिंदगी में समर्थ हो गया होता। हम छप्पन लाख संत-छप्पन लाख अच्छे व्यक्ति तैयार कर देते। फिर यह न कहना पड़ता कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, तो दुनिया को हम कष्टों से, दुखों से त्राण दिला देते। स्वामी विवेकानन्द दुनिया में चिल्ला-चिल्लाकर चले गये कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, जैसे कि मैं चाह रहा हूँ और जैसे की मैं तलाश कर रहा हूँ। मेरे हाथ में यदि सौ आदमी आ गये होते, तो सारी दुनिया में भारतीय संस्कृति की जड़ें जमा देता और भारतवर्ष में संस्कृति के प्रति जो अनास्था उत्पन्न हो गयी है, वह अनास्था उत्पन्न नहीं होने देता। विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी। इसी तरह गाँधी जी की इच्छा पूरी न हो सकी और सौ आदमी उनको न मिल सके।

🔶 मित्रो! विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी, क्योंकि उनको सौ आदमी न मिल सके और वे खाली हाथ चले गये। कैसे चले गये? क्योंकि उस तरह के आदमी तैयार न किये जा सके। अगर आदमी तैयार करने के साँचे हमारे पास होते, तो मित्रो! हम न जाने क्या से क्या करके दिखा देते और न जाने क्या से क्या हो जाता। मशीनें बनाना सरल है, पर मनुष्य को बनाना बहुत मुश्किल है। इन्सान अगर सही रूप में इंसान हो, तो उसके प्रभाव के बराबर किसी का प्रभाव नहीं हो सकता। अगर आप अपने आपमें सही हों तब और अपने आप में गलत हों, तब क्या हो सकता है? मित्रो! यदि आदमी अपने आप में गलत हो, तो उसके व्याख्यानों का किसी पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। ऐसा व्यक्ति किसी आदमी को पैदा करने में समर्थ हो सकता है? नहीं, किसी आदमी को पैदा नहीं कर सकता। क्यों नहीं पैदा कर सकता? क्योंकि उसके अंदर जो चुम्बकत्व होना चाहिए, मैग्नेट होना चाहिए, वह मैग्नेट उसके अंदर नहीं होता, आप इस बात पर ध्यान देना।

🔷 मित्रो! आप इस बात पर ध्यान देना कि जनता का स्वभाव इस तरह संभव हुआ कि नहीं। आपका चुम्बकत्व उन्हें प्रभावित कर सका कि नहीं कर सका। साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना कि आपकी लगन और आपकी निष्ठा इस आस्था में लगी हुई है कि नहीं। अगर आपकी आस्था जमी हुई है, तो कोई चिन्ता की बात नहीं है कि कोई आदमी आपको सुनता है या नहीं और कोई आदमी आपको समझता है या नहीं और कोई आदमी आपकी ओर ध्यान देता है कि नहीं। आप अपने आपमें ही काफी हैं। आप स्वयं के द्वारा, अपने चरित्र के द्वारा, अपने क्रियाकलापों के द्वारा, अपनी भावना के द्वारा, अपने मस्तिष्क के द्वारा, अपने अन्तःकरण के द्वारा इस वायुमंडल में एक ऐसा वातावरण पैदा कर रहे होंगे, एक ऐसी हवा पैदा कर रहे होंगे और एक ऐसी फिजा पैदा कर रहे होंगे, जो आप चुपचाप रहते हुए भी न जाने क्या से क्या पैदा करके दिखा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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