शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

👉 पाप का गुरु

🔶 एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे। फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला।

🔷 अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी..! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला।

🔶 एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी…! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी। स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए। वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया।

🔷 पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है?
वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। यह लोभ ही पाप का गुरु है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Jan 2018

🔶 अपनी प्रसन्नता को जब अपनी मुट्ठी में रखा जा सकता है और हर घड़ी आनन्दित रहने का नुस्खा मालूम है तो क्यों न उसी का प्रयोग किया जाय? फिर क्यों इस बात पर निर्भर रहा जाय कि जब कभी सफलता मिलेगी, अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी तब कहीं प्रसन्न होंगे? इस प्रतीक्षा में मुद्दतें गुजर सकती हैं और यह भी हो सकता है कि सफलता न मिलने पर वह प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा जीवन भर हाथ रहे। इसलिये गीताकार ने यह सहज नुस्खा हमें बताया है कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो, न तो सफलता के लिए आतुरता दिखाओ और न सफलता मिलने पर परेशान होओ। चित्त को शान्त और स्वस्थ रखकर अपने कर्तव्य को एक पुरुषार्थी व्यक्ति की तरह ठीक तरह पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें लोक में भी शान्ति मिलेगी और परलोक भी सुधरेगा।

🔷 विचारणीय बात यही है कि जब हम अपनी जीवन समस्याओं में से अधिकांश को, अपना भीतरी सुधार करके, अपनी विचार शैली में थोड़ा परिवर्तन करके हल कर सकते हैं तो फिर उलझन भरा जीवन क्यों व्यतीत करें? मनुष्य बहुत चतुर है, विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण चातुर्य का परिचय देता है, उसकी बुद्धिमत्ता की जितनी सराहना की जाय उतना ही कम है। पर इतना होते हुए भी जब वह अपने दृष्टिकोण को सुधारने की आवश्यकता को नहीं समझ पाता और उस पर समुचित ध्यान नहीं दे पाता तो उसकी बुद्धिमत्ता पर सन्देह होने लगता है। वह प्रयत्न पूर्वक बड़े-बड़े महान् कार्य पूरे करता है तब यह बात उसके लिए क्यों कठिन होनी चाहिये कि अपनी मनोगत, भावनागत त्रुटियों पर विचार करे और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हो जाय।

🔶 आत्मचिन्तन, आत्मशोधन एवं आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को सर्वांगासन, मयूरासन, शीर्षासन आदि आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास डालना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है, यदि अभ्यासी इन बातों से डर कर अभ्यास न करें या छोड़ दें तो आसनों के द्वारा होने वाले सत्परिणामों से लाभान्वित होना संभव न होगा। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूंढ़ने में उत्साह न हो, जो कुछ हम करते या सोचते हैं सो सब ठीक है, ऐसा दुराग्रह हो तो फिर न तो अपनी गलतियां सूझ पड़ेगी और न उन्हें छोड़ने की उत्साह होगा। वरन् साधारण व्यक्तियों की तरह अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूंढ़ता रहेगा जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 3)

🔷 जीवन-निर्माता धर्म का आधार है सत्य और ईमानदारी। मनुष्य जो कुछ कहे, करे और सोचे उसका आधार सत्य ही होना चाहिये। जिसने आत्म-निर्माण के लिये धनाढ्यता को आदर्श बनाया है उसे चाहिये कि वह धन के लिये जिस व्यवसाय को अपनाता है उसमें पूरी तरह ईमानदार रहे। यदि दुकानदारी करता है तो पूरा तोले, उचित मूल्य ले। खरा माल दे, ठीक पैसे बतलाये। वस्तु, मूल्य तथा उसके गुण बतलाते समय सच बोले। जिस कीमत में किसी एक ग्राहक को वस्तु दे उसी कीमत में दूसरे को। मुनाफा कमाने के लिये वस्तुएं छिपाकर न रखे। होते हुए किसी से इनकार न करे। आबाल वृद्ध सभी के साथ उसकी इसी प्रकार की एक जैसी ही नीति रहनी चाहिए। किसी अनजान, अबोध अथवा निर्बल से चीज होते हुए भी इनकार कर देना अथवा ज्यादा दाम लेकर देना और किसी जानकार, बुद्धिमान अथवा बलवान व्यक्ति को अलभ्य वस्तुएं भी ठीक दामों पर दे देना, व्यापार जैसे पवित्र काम में एक बड़ा कलंक है।

🔶 व्यापारियों और कारखानेदारों को चाहिए कि वे खरा माल बेचे-बनायें, नकली अथवा निकृष्ट माल बाजार में न भेजें, अधिक मुनाफाखोरी से बचें। लागत के अनुसार कीमत लें। मजदूरों तथा कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक दें। शोषण, मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की नीति से बचें। इन सब आदर्शों के साथ धनाढ्यता का लक्ष्य पाने वाले ही उस दिशा में अपने निर्माता माने जाएंगे।

🔷 जिसका लक्ष्य एक अच्छा श्रमिक बनना हो वह किसी भी काम को पूरे तन-मन के साथ पूरे समय भर करे। पारिश्रमिक की मात्रा के अनुसार अपने श्रम की मात्रा घटाने-बढ़ाने के बजाय हर स्थिति में पूरी ईमानदारी बरतें अर्थात् पारिश्रमिक भले ही कम हो लेकिन अपने श्रमदान की मात्रा पूरी रखें। कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करें। उनके काम पर आने का जो नियत समय हो, अकारण ही उससे देर न करें। पूरे समय पर एकनिष्ठ भाव से काम करें। समय पूरा होने से पहले काम न छोड़ें। कामचोरी, रहस्योद्घाटन, चुगली, पिशुनता आदि से बचे रहें। इस प्रकार अपने साधारण कामों में भी पूरी ईमानदारी और सत्य का निर्वाह करके आत्म-निर्माण किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 20 Jan 2018

🔷 To achieve success in all the sections of Yug Nirman Yojna. I need talented people as volunteers. We will find talents from every field of their actions. Because this is the time when talents must engage themselves for a new creation of humanity is this world.

🔶 If our children learn the object of life from the very beginning, they will be able to control the impronts of bad habits, which spolk the entire life. Imprints of previous lives and the social atmosphere which effect our haracters and makes us more selfish and materialistic in life. But if object of life is always in front of you, you will be on righteous path.

🔷 All rituals of worship, sadhana, Contemplation, yog exercises are to develop “Shraddha” i.e. love for ideality life. Shraddha is based on your true sincerity. Love and service to all who are needy. In the script of ‘Ramayan’ written by Goswami Tulsidas ji Shraddha and Vishwas(Firm believe) is compressed with Lord Shiva and Mata Parvati. So the object of life is ideality and all other rituals are stepping stones to achieve ‘Shraddha’.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 3)

🔷 अच्छा बेटे, यह बता कि कुछ काम भी करेगा या नहीं करेगा? माता जी! काम पर तो नहीं जाऊँगा। तो फिर क्या करेगा? बस यहीं पर आपका सत्संग सुनूँगा और आपकी रोटी खाया करूँगा। रोटी से पेट भर जायेगा, तो भी खाऊँगा और खाता रहूँगा। बेटे, तब तो तेरा पेट फट जायेगा और तू बीमार हो जायेगा। नहीं साहब! सत्संग किया करूँगा और बाबा जी के यहाँ रहा करूँगा और रामायण पढ़ा करूँगा और भागवत् पढ़ा करूँगा। बेटे, तूने भागवत् पढ़ ली और सुन ली, दवा भी खाली और इंजेक्शन भी ले लिया। अब तू काम करने के लिए चल। नहीं साहब! हम तो काम नहीं करेंगे। जिन्दगी भर स्कूल में पढ़ा करेंगे। बेटे, पढ़ने के बाद नौकरी करेगा या नहीं? महाराज जी! नौकरी तो नहीं करूँगा, खेती तो नहीं करूँगा। मैं तो स्कूल में पाँचवें दर्जे में भर्ती हो गया हूँ और जब तक मेरी नौकरी नहीं लग जायेगी, मैं रोजाना रामायण और महाभारत पढ़ा करूँगा। क्यों पढ़ेगा? पढ़ने की वजह क्या है?

🔶 मित्रो! सत्संग की कोई वजह भी तो होनी चाहिए। आप किसके लिए सत्संग करेंगे। नहीं साहब! सत्संग करूँगा। बेटे, तू बता तो सही कि सत्संग क्यों करेगा? नहीं साहब! मैं तो सत्संग करूँगा? बेटे, तू पागल आदमी नहीं है, जिसे यह पता ही नहीं है कि सत्संग क्यों किया जाता है। मित्रो! सत्संग करने का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर जीवट पैदा करना होता है। सत्संग का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर क्रियाशीलता उत्पन्न करना होता है। क्रियाशीलता अगर हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, भावना हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, तो भावना को कार्यक्षेत्र में चलना चाहिए और कार्यक्षेत्र में उसका समावेश होना चाहिए। अगर हमने ऐसा करना शुरू नहीं किया और ऐसा करना हमारे लिए संभव नहीं हुआ, तो बहुत भारी मुश्किल हो जायेगी और बहुत दिक्कत खड़ी हो जायेगी, बड़ी कठिनाई पैदा हो जायेगी।

🔷 मित्रो! आपको जो सत्संग दिया गया, जो शिक्षण दिया गया है, उस सत्संग और प्रशिक्षण का उद्देश्य एक होना चाहिए। और वह उद्देश्य यह होना चाहिए कि हमारे दिये हुए विचार और हमारे दिये हुए क्रियाकलाप किसी कार्यक्षेत्र में परिणत हो सकें। भगवान बुद्ध ने यही किया। अपने पास लोगों को थोड़े समय तक रखने के पश्चात् सबको कार्यक्षेत्र के लिए भेज दिया। आप लोगों को जो क्रियाकलाप बताये गये हैं और जो सत्संग सुनाये गये हैं, उसमें जो आपको सीखना है, वह इसलिए सीखना है कि संसार में जहाँ कहीं भी आपको पतन मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको असुविधा मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको पीड़ा मालूम पड़े, उस पीड़ा के स्थान पर और पतन के स्थान पर आपको चले जाना चाहिए। भगवान बुद्ध ने यही किया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 21)

👉 समर्पण-विसर्जन-विलय

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना जीवन का परम सत्य निहित है। इनमें वह परम रहस्य सँजोया है, जिसके आचरण का स्पर्श पारसमणि की भाँति है। जो छूने भर से साधक के अनगढ़ जीवन और कुसंस्कारों को आमूल-चूल बदल देता है। गुरुकृपा से मानवीय कमियाँ-कमजोरियाँ ईश्वरीय विभूतियों व उपलब्धियों में बदल जाती हैं। गुरु निष्ठा से क्या नहीं हो सकता? इस प्रश्न चिह्न का एक ही उत्तर है सब कुछ सम्भव है-सब कुछ सम्भव है। इसलिए हानि में-लाभ में, यश में-अपयश में, जीवन में-मरण में, किसी भी स्थिति में सद्गुरु का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि परम कृपालु सद्गुरु का प्रत्येक अनुदान उनकी कृपा ही है। ये अनुदान सुख भरे हों या फिर दुःख से सने हों, साधक के साधनामय जीवन के लिए कल्याणकारी ही हैं। परम रहस्य सद्गुरु की कृपा भी बड़ी ही रहस्यमय होती है। इसका बौद्धिक विवेचन किसी भी तरह सम्भव नहीं। इसे तो बस सजल भावनाओं में ग्रहण किया जा सकता है।
  
🔶 गुरु गीता के उपर्युक्त मंत्रों में इसके धारण-ग्रहण की कतिपय विधियों का उल्लेख किया गया है। गुरुदेव की छवि का स्मरण, उनके नाम का जप, जीवन की विपरीतताओं में भी गुरुवर की आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन साधक को गुुरुकृपा का सहज अधिकारी बनाता है। गुरु के मुख में तो ब्रह्म का वास है, वे जो भी बोलें—वह शिष्य के लिए ब्रह्मवाक्य  है। गुरुकृपा ही साधक को ब्रह्मानुभूति का वरदान देती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से हमेशा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह से साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान इतना प्रगाढ़ हो कि उसे अपना आश्रय, जाति, कुल, गोत्र सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा कोई अन्य भावना उसे न भाये।
  
इस भक्ति कथा में नई कड़ी जोड़ते हुए भगवान् महादेव माता पार्वती को समझाते हैं-

अनन्यश्चिन्तयन्तो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु॥ २१॥
त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्यसुरपन्नगाः। गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते॥ २२॥
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥ २३॥
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्ति विनाशनम्॥ २४॥
एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं। हाहाहूहू गणैश्चैव गन्धर्वैश्च प्रपूज्यते॥ २५॥
  
🔶 शिष्य को यह तथ्य भलीभाँति आत्मसात् कर लेना चाहिए कि सद्गुरु का अनन्य चिंतन मेरा ही (भगवान् सदाशिव) चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज, सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्नपूर्वक  गुरु आराधना करनी चाहिए॥ २१॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं कि ब्रह्मविद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥ २२॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है  प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ २३॥ शास्त्र वचनों से यह प्रमाणित होता है कि ‘गुरु’ शब्द के प्रथम वर्ण ‘गु’ से माया आदि गुण प्रकट होते हैं और इसके द्वितीय वर्ण ‘रु’ से ब्रह्म प्रकाशित होता है। जो माया की भ्रान्ति को विनष्ट करता है॥ २४॥ इसलिए गुरुपद सर्वश्रेष्ठ है, यह देवों के लिए भी दुर्लभ है। हाहाहूहू गण और गन्धर्व आदि भी इसकी पूजा करते हैं॥ २५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 37

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

👉 अपनापन

🔶 कॉलबेल की आवाज़ सुनकर जैसे ही सुबह सुबह शांतनु ने दरवाजा खोला सामने एक पुराना से ब्रीफकेस लिए गांव के मास्टर जी और उनकी बीमार पत्नी खड़ी थीं। मास्टर जी ने चेहरे के हाव भाव से पता लगा लिया कि उन्हें सामने देख शांतनु को जरा भी खुशी का अहसास न हुआ है। जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए बोला "अरे सर आप दोनों बिना कुछ बताए अचानक से चले आये!अंदर आइये।"

🔷 मास्टर साहब ब्रीफकेस उठाये अंदर आते हुए बोले" हाँ बेटा, अचानक से ही आना पड़ा मास्टरनी साहब बीमार हैं पिछले कुछ दिनों से तेज फीवर उतर ही नहीं रहा, काफी कमजोर भी हो गई है। गाँव के डॉक्टर ने AIIMS दिल्ली में अविलंब दिखाने की सलाह दी। अगर तुम आज आफिस से छुट्टी लेकर जरा वहाँ नंबर लगाने में मदद कर सको तो..."

🔶 "नहीं नहीं, छुट्टी तो आफिस से मिलना असंभव सा है "बात काटते हुए शांतनु ने कहा। थोड़ी देर में प्रिया ने भी अनमने ढंग से से दो कप चाय और कुछ बिस्किट उन दोनों बुजुर्गों के सामने टेबल पर रख दिये। सान्या सोकर उठी तो मास्टर जी और उनकी पत्नी को देखकर खूब खुशी से चहकते हुए "दादू दादी"बोलकर उनसे लिपट गयी दरअसल छः महीने पहले जब शांतनु एक सप्ताह के लिए गाँव गया था तो सान्या ज्यादातर मास्टर जी के घर पर ही खेला करती थी। मास्टर जी निःसंतान थे और उनका छोटा सा घर शांतनु के गाँव वाले घर से बिल्कुल सटा था। बूढ़े मास्टर साहब खूब सान्या के साथ खेलते और मास्टरनी साहिबा बूढ़ी होने के बाबजूद दिन भर कुछ न कुछ बनाकर सान्या को खिलातीं रहतीं थीं। बच्चे के साथ वो दोनों भी बच्चे बन गए थे।

🔷 गाँव से दिल्ली वापस लौटते वक्त सान्या खूब रोई उसके अपने दादा दादी तो थे नहीं मास्टर जी और मास्टरनी जी में ही सान्या दादा दादी देखती थी। जाते वक्त शांतनु ने घर का पता देते हुए कहा कि "कभी भी दिल्ली आएं तो हमारे घर जरूर आएं बहुत अच्छा लगेगा।" दोनों बुजुर्गों की आँखों से सान्या को जाते देख आँसू गिर रहे थे और जी भर भर आशीर्वाद दे रहे थे।

🔶 कुल्ला करने जैसे ही मास्टर जी बेसिन के पास आये प्रिया की आवाज़ सुनाई दी "क्या जरूरत थी तुम्हें इनको अपना पता देने की दोपहर को मेरी सहेलियाँ आती हैं उन्हें क्या जबाब दूँगी और सान्या को अंदर ले आओ कहीं बीमार बुढ़िया मास्टरनी की गोद मे बीमार न पड़ जाए"

🔷 शांतनु ने कहा "मुझे क्या पता था कि सच में आ जाएँगे रुको किसी तरह इन्हें यहाँ से टरकाता हूँ"

🔶 दोनों बुजर्ग यात्रा से थके हारे और भूखे आये थे सोचा था बड़े इत्मीनान से शांतनु के घर चलकर सबके साथ आराम से नाश्ता करेंगे। इस कारण उन्होंने कुछ खाया पिया भी न था। आखिर बचपन में कितनी बार शांतनु ने भी तो हमारे घर खाना खाया है। उन्होंने जैसे अधिकार से उसे उसकी पसंद के घी के आलू पराठे खिलाते थे इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी शांतनु उन्हें वैसे ही पराठे खिलायेगा।

🔷 " सान्या!!" मम्मी की तेज आवाज सुनकर डरते हुए सान्या अंदर कमरे में चली गयी। थोड़ी देर बाद जैसे ही शांतनु हॉल में उनसे मिलने आया तो देखा चाय बिस्कुट वैसे ही पड़े हैं और वो दोनों जा चुके हैं।

🔶 पहली बार दिल्ली आए दोनों बुजुर्ग किसी तरह टैक्सी से AIIMS पहुँचे और भारी भीड़ के बीच थोड़ा सुस्ताने एक जगह जमीन पर बैठ गए। तभी उनके पास एक काला सा आदमी आया और उनके गाँव का नाम बताते हुए पूछा" आप मास्टर जी और मास्टरनी जी हैं ना। मुझे नहीं पहचाना मैं कल्लू। आपने मुझे पढ़ाया है।"

🔷 मास्टर जी को याद आया "ये बटेसर हरिजन का लड़का कल्लू है बटेसर नाली और मैला साफ करने का काम करता था। कल्लू को हरिजन होने के कारण स्कूल में आने पर गांववालो को ऐतराज था इसलिए मास्टर साहब शाम में एक घंटे कल्लू को चुपचाप उसके घर पढ़ा आया करते थे।"

🔶 " मैं इस अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हूँ। साफ सफाई से लेकर पोस्टमार्टम रूम की सारी जिम्मेवारी मेरी है।"

🔷 फिर तुरंत उनका ब्रीफकेस सर पर उठाकर अपने एक रूम वाले छोटे से क्वार्टर में ले गया। रास्ते में अपने साथ काम करने वाले लोगों को खुशी खुशी बता रहा था मेरे रिश्तेदार आये हैं मैं इन्हें घर पहुँचाकर अभी आता हूँ घर पहुँचते ही पत्नी को सारी बात बताई पत्नी ने भी खुशी खुशी तुरंत दोनों के पैर छुए फिर सब मिलकर एक साथ गर्मा गर्म नाश्ता किए। फिर कल्लू की छोटी सी बेटी उन बुजुर्गों के साथ खेलने लगी।

🔶 कल्लू बोला "आपलोग आराम करें आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी बदौलत ही हूँ फिर कल्लू अस्पताल में नंबर लगा आया। "कल्लू की माँ नहीं थी बचपन से ही।

🔷 मास्टरनी साहब का नंबर आते ही कल्लू हाथ जोड़कर डॉक्टर से बोला "जरा अच्छे से इनका इलाज़ करना डॉक्टर साहब ये मेरी बूढ़ी माई है "सुनकर बूढ़ी माँ ने आशीर्वाद की झड़ियां लगाते हुए अपने काँपते हाथ कल्लू के सर पर रख दिए। वो बांझ औरत आज सचमुच माँ बन गयी थी उसे आज बेटा मिल गया था और उस बिन माँ के कल्लू को भी माँ मिल गयी थी....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 Jan 2018


👉 कुसंगत में मत बैठो!

🔶 पानी जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे लोगों के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन अच्छे व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और अपने को भी वैसा ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, परन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भर रहती है जहाँ वह उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे कहीं भी हो, पर असल में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों की सोहबत पसन्द करता है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति के ऊपर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे काम करे यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग से ही उत्पन्न होती है। याद रखो कुसंग से बढ़कर कोई हानि नहीं और सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1942 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/December/v1.1

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 2)

🔶 निर्माण निर्माण है। वह कैसा भी हो—आखिर वह निर्माण ही है—इस उक्ति को मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि निकृष्ट निर्माण को भी मान्यता दी जाने लगेगी, तो संसार में उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का कोई मूल्य, महत्व ही न रह जायेगा। निर्माण संज्ञा का वास्तविक अधिकारी उत्कृष्ट निर्माण ही हो सकता है, निकृष्ट निर्माण नहीं। अपने को धनवान् अथवा विद्वान् निर्माण करने में जिसने अयोग्य तथा अनुचित उपायों का प्रयोग किया है उसे यदि धनवान और विद्वान् मान लिया जायेगा तो फिर चोर, धूर्त अथवा ठग किसे कहा जाएगा और इस तथाकथित धनवान तथा विद्वान् में क्या अन्तर रह जायेगा। जिसने परिश्रम, पुरुषार्थ, अध्यवसाय एवं तपस्या के आधार पर अपना निर्माण किया है।

🔷 शिव और अशिव के दो विरोधी उपायों से अर्जित उपलब्धियों को समान श्रेय नहीं दिया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता अथवा मानता है तो वह या तो अज्ञानी है अथवा अधम प्रकृति का व्यक्ति। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है और निकृष्ट निर्माण मिथ्या क्रियाकलाप। अस्तु, उचित यही है कि वह जिस क्षेत्र में अपना निर्माण करे तो उत्कृष्ट रीति से ही करे, नहीं तो कंचन के रूप में पापों की गठरी बांधने से कहीं अच्छा है कि वह निर्धन और गरीब बना रहे।

🔶 उत्कृष्ट निर्माण का आधार धर्म है। धर्म का अर्थ अधिकतर लोग पूजा-पाठ, जप, उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते हैं। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रम के साथ जीवन क्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है।

🔷 केवल मात्र पूजा-पाठ, जप-तप तक ही सीमित रहकर यदि कोई चाहे कि वह अपना उत्कृष्ट निर्माण कर लेगा, तो उसे निराश ही रहना होगा। उत्कृष्ट निर्माण तभी सम्भव होगा जब जीवन की प्रत्येक गतिविधि का धर्म-निर्वाह किया जायेगा। कोई पूजा-पाठ तो करता रहे, साथ ही कार-रोजगार, आचार-व्यवहार में असत्य, मिथ्या और बेईमान बना रहे तो उसका निर्माण निकृष्ट कोटि का ही हो सकेगा। जीवन क्रम में पग-पग पर ईमानदार, सत्यपरायण और आदर्शवान बने रहने पर यदि कोई पूजा-पाठ वाले धर्म के लिये समय नहीं दे पाता तो भी उसका निर्माण उत्कृष्ट ही होगा। उस छोटी-सी कमी के कारण उसकी जीवन तपस्या असफल नहीं हो सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.16

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.11

👉 Amrit Chintan 19 Jan

🔷 What is known as illusion a Maya in our scripts of ancient time is nothing but it is human shortsightedness weaknesses and ignorances in life. We put blame to God or luck that everything is God planned no. is not so. Our weaknesses must be overpowered your own self control and hard sincere work. If we will not control our-self we will ruin our life.

🔶 Body and mind are one for the life mind controls body. The whole life of a man is governed by the nature of mind he has. It is all his thinking which is translated in action. This is the reason that any evil in our thinking will also affect body.

🔷 It is Brahmvarchas Sadhana – that is self-restraint and self-discipline, which will to solve our worldly problems and to develop the self, but for that continuous practice and devotion to realize that effect.

🔶 There are some basic concepts to have a cheerful life. They are so simple that you don’t need any training in any institute. You need not to find any Guru in the caves. The difference between the people of good and bad nature can always be seen easily the handsome look of a boy or a beauty of a girl is not by color of skin or so but happiness and good character radiates the beauty.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 2)

🔷 मित्रो! जंगली लोगों के लिए शिक्षा की आवश्यकता थी, त्याग की आवश्यकता थी और न जाने किस-किस चीज की आवश्यकता थीं। बहुत सारी चीजों की आवश्यकता थी। उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सुयोग्य व्यक्ति वहाँ चले गये। हिन्दुस्तान में उन दिनों शिक्षा की बहुत सुविधाएँ थीं, बहुत श्रम था, बहुत सारे ऋषि थे। गंगा, जमुना में बहुत निर्मल जल था। यहाँ साधनों की कमी नहीं थी। जहाँ साधन हैं, वहीं पर संत को रोककर रखा जाय, यह भी कोई तुक है? जहाँ पर साधन हैं, सुविधा है, वहाँ किनको रहना चाहिए? बीमारों को रहना चाहिए, बुजुर्गों को रहना चाहिए। वहाँ थके हुए लोगों को रहना चाहिए। शान्तिकुंज में हमें उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, काली कमली वाले के यहाँ उन्हीं लोगों को रखना चाहिए, जो थक गये हों, जो टूट गये हों, मरे-मराये से हों, जिनके शरीरों में अब दम नहीं रहा और उनके मन में कोई उत्साह नहीं रहा। उत्साह जिनका खत्म हो गया, आँखों का प्रकाश जिनका खत्म हो गया, जीवट जिनका खत्म हो गया। अब हम उनको कहाँ रखें? अब हम उनको काली कमली वाले बाबा की झोपड़ी में रखेंगे। बस वह वहीं बैठा रहा करेगा। टट्टी-पेशाब कर आया करेगा। कुल्ला कर लिया करेगा, मुँह धो लिया करेगा। गंगा जी नहा लिया करेगा और शांतिपूर्वक रहा करेगा।

🔶 मित्रो! हम उनको वहीं रखेंगे, क्योंकि वे और आगे चल नहीं सकते। अब उनकी जिन्दगी खत्म हो गयी। अब उनका जीवन खत्म हो गया। अब उनका जोश खत्म हो गया। अब उनकी भावनायें खत्म हो गयीं। अब जिनकी भावनायें खत्म हो गयी हैं, जो थक गये हैं, जो टूट गये हैं, जो मर गये हैं, उनको अब हम कहाँ से भेज सकते हैं? उनको अब हम श्मशान भूमि की तैयारी के लिए उचित स्थान पर रखेंगे। डेड बॉडी को पोस्टमार्टम करने के बाद बड़े अस्पतालों में, मुर्दाघरों में रख देते हैं, ताकि उनके खानदान वाले आयें और लाश को उठाकर ले जा सकें। फिर उसको मरघट में ले जाकर या उसको कब्रिस्तान में ले जाकर दफन कर दें। ऐसे लोगों को हम कहाँ रखेंगे, जिनका जीवट खत्म हो गया है, जो भुस्स गये हैं। इन्हें तो बस काली कमली वाले बाबाजी के आश्रम में रखेंगे, स्वर्गाश्रम में रखेंगे और उनको हम परमार्थ आश्रम में रखेंगे। क्यों? क्योंकि वे कुछ काम नहीं कर सकते, चल नहीं सकते। उनके भीतर चलने वाली वस्तु नहीं है, माद्दा नहीं है और उनके अंदर क्रियाशीलता जैसी कोई वस्तु नहीं है। और जीवट जैसी वस्तु नहीं हैं। आप ही बताइये? उनको हम कहाँ रख सकते हैं।

🔷 इसलिए मित्रो! उन लोगों के लिए कोई स्थान विशेष में निवास करने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन जिनके अंदर जीवट है, जिनके अंदर जीवन है, जिनके अंदर प्रकाश है, जिनके अंदर प्रेरणा विद्यमान है, उनको हम कार्यक्षेत्र में भेजेंगे। अब उनको कार्यक्षेत्र में भेजे बिना काम बनेगा नहीं। भगवान बुद्ध ने यही किया था। प्रत्येक जीवन्त व्यक्ति को, जिसके अंदर आध्यात्मिकता का थोड़ा-बहुत प्रकाश मौजूद था, उन्होंने उनको अपने विहारों में रखा ही नहीं। उन्होंने कहा कि हम आपके विहार में रहेंगे और आपका सत्संग करेंगे। भगवान बुद्ध ने कहा कि बहुत लम्बे समय तक सत्संग करना आवश्यक नहीं है। बहुत लम्बे समय तक दवाइयाँ खाना आवश्यक नहीं है। व्यायाम करना आवश्यक है, पर सारे समय रोटी खाना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि गुरुजी! हम तो आपके पास रहा करेंगे और रोटी खाया करेंगे। माता जी आप बनाती जायँ और हम खाते जायँ। बेटे, कितने दिन खायेगा? माता जी आपका चौका सबेरे छः बजे से चलता है, उस वक्त से खाया करूँगा। कब तक खायेगा? तब तक खाऊँगा, जब तक रात के दस बजे तब बंद नहीं हो जाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 20)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्
🔷 सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं, जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठा को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया, सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

🔶 ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न  बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है; परन्तु उन्हें लाज लगती है, शरम आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठा का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे, तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? परमहंस देव ने कहा—इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएँ सामने आएँ, उनका सामना करने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

🔷 स्वामी विवेकानन्द महाराज कहा करते थे- तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूँ? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ अथवा पत्नी हूँ, माँ हूँ, पुत्री हूँ। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएँगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएँ साकार हो सकती हैं और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को सद्गुरु कृपा किस रूप में फलती है, इसका बोध भगवान् भोलेनाथ ने गुरुगीता के अगले मंत्रों में कराया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 36

👉 भाग्य और कर्म

🔶 एक बार देवर्षि नारद जी वैकुंठधाम गए, वहां उन्होंने भगवान विष्णु का नमन किया। नारद जी ने श्रीहरि से कहा,
'प्रभु! पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है।'

🔷 तब श्रीहरि ने कहा, 'ऐसा नहीं है देवर्षि, जो भी हो रहा है सब नियति के जरिए हो रहा है।'

🔶 नारद बोले, मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है।

🔷 भगवान ने कहा, कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।
तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, वह उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर चोर को सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिली।

🔶 थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया।

🔷 प्रभु! बताइए यह कौन सा न्याय है?

🔶 नारद जी की बात सुन लेने के बाद प्रभु बोले, 'यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरें ही मिलीं।'

🔷 वहीं, उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।

🔶 इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है।

संक्षेप में
🔷 इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं भाग्य कुछ नहीं होता।
🔶 और भाग्यवादी लोग कहते हैं किस्मत में जो कुछ लिखा होगा वही होके रहेगा।
🔷 यानी इंसान कर्म और भाग्य इन दो बिंदुओं की धूरी पर घूमता रहता है।
🔶 और एक दिन इस जग को अलविदा कहकर चला जाता है। इंसान को कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म से भाग्य बदला जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Jan 2018


👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

🔶 (1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।   

🔷 (2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।   

🔶 (3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।
  
🔷 (4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।
  
🔶 (5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1973 पृष्ठ 1


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/April/v1

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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