मंगलवार, 2 मई 2017

👉 ऋषियुग्म से मिला अभयदान

🔵 मेरा जन्म स्थान झारखण्ड प्रांत के पूर्वी सिंहभूम जिले के ग्राम चाकुलिया में है। रोजी- रोटी के सिलसिले में मैं अपने बच्चों के साथ कटक (उड़ीसा) में बस गया। मुझे अपने चाचा श्री कैलाश चन्द्र जी, जो युग निर्माण मिशन के समर्पित कार्यकर्ता हैं, की प्रेरणा से पू.गुरुदेव से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

🔴 वर्ष २०११ के जनवरी- फरवरी के महीने में मेरे दाहिने पैर में अचानक असह्य वेदना शुरू हो गयी। इधर- उधर बहुत सारे चिकित्सकों से इलाज कराने के क्रम में चिकित्सकों द्वारा शल्य चिकित्सा की सलाह दी गयी, जिसका खर्च लगभग तीन लाख था। यह मेरे लिए दुष्कर ही नहीं, असंभव था। आशा की एकमात्र किरण पू.गुरुदेव ही थे।

🔵 मैं जहाँ काम करता था वहाँ के लोगों से बात की। उन्होंने सुझाव दिया कि ई.एस.आई. को लिखने पर आपकी समस्या का समाधान हो सकता है। ई.एस.आई. को पत्र लिखा गया और गुरुदेव की कृपा से मेरे ऑपरेशन के लिए आदित्य केयर हॉस्पिटल में व्यवस्था हो गयी। दिनांक १३ जुलाई को ऑपरेशन की तारीख रखी गयी। मुझे ऑपरेशन के नाम से ही डर लगता था। हमारे घर के सभी लोग बहुत घबड़ाये हुए थे। मैं भी ऑपरेशन के नाम से बहुत भयभीत था।

🔴 ऑपरेशन के एक दिन पहले घर के सभी परिजन बहुत परेशान थे। क्या होगा? कैसे होगा? मेरे चाचाजी ने रात्रि ८ बजे शांतिकुंज में आदरणीय विनय बाजपेयी जी भाई साहब से फोन पर मेरे ऑपरेशन की बात बताई और आध्यात्मिक उपचार हेतु प्रार्थना की। भाई साहब ने तुरन्त आश्वासन दिया कि जैसा आप चाहते है मैं व्यवस्था कर रहा हूँ। आप परेशान न हों, हम गुरुसत्ता से प्रार्थना करेंगे। उनके आश्वासन पर हम सभी को बहुत राहत मिली। लग रहा था, सचमुच गुरुदेव का ही संरक्षण मिल रहा है, अब कुछ अनिष्ट नहीं होगा। १३ जुलाई को मुझे एडमिट कर लिया गया। एडमिट होते ही डॉक्टर ने कहा कि पेशेन्ट के ग्रुप का २ बोतल खून चाहिए। मेरे जामाता एवं मेरे एक मित्र के खून का ग्रुप मुझसे मिलता था। दोनों लोगों को खून देने के लिए समय पर हॉस्पिटल पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्यवश मित्र महोदय समय पर नहीं पहुँचने के कारण उनके आने की राह देख रहे थे।

🔵 सभी चिन्तित थे और सभी मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना कर रहे थे। अचानक एक अपरिचित सज्जन हम सबके बीच आये और कहने लगे कि आप लोग परेशान न हों मैं खून दूँगा। मेरे खून का ग्रुप इनके खून से मैच करता है। इनके इतना कहते ही जिन मित्र महोदय का खून लेना था वे भी वहाँ पहुँच गये। सभी लोग उनके देर होने आदि के सम्बन्ध में बातचीत करने लगे। जब हम उस अपरिचित सज्जन को धन्यवाद देने के लिए पीछे मुड़े तो देखा, उनका कहीं कोई पता नहीं था। सभी ने पता करने की कोशिश की, मगर वे नहीं मिले। बाद में अनुभव हुआ कि हम जिस समर्थ सत्ता से जुड़े हैं वे हमारी कष्ट कठिनाइयाँ देख नहीं सकते, वे किसी न किसी रूप में सहायता कर ही देते हैं।

🔴 इस घटना से हम सभी के मन में गुरुदेव के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ गया कि अब हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जिसके ऊपर महाकाल की छत्रछाया हो उसका काल क्या बिगाड़ेगा?

🔵 ऑपरेशन की सारी व्यवस्थाएँ हो चुकी थीं। मैं और मेरे परिवार के सभी लोग केवल गुरुदेव को मन ही मन स्मरण कर रहे थे। मेरा विश्वास इतना सघन हो गया था कि ऑपरेशन थियेटर में जाते समय मेरा भय समाप्त सा हो गया था। मेरा ऑपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। मुझे दो दिन तक गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया। उसके पश्चात् मुझे जनरल वार्ड वी.के.सी. बेड पर स्थान दिया गया। मुझे यहाँ कुछ असुविधा हो रही थी। मैं तीन- चार दिन जनरल वार्ड में रहा। इसके पश्चात् मैंने अपनी सुविधा हेतु अपना स्थानान्तरण बेड सं. ए में करवा लिया। लेकिन यहाँ पर मेरा सोचना गलत था। यहाँ स्थान सुविधा की दृष्टि से तो अच्छा था, किन्तु यहाँ पर आने के पश्चात् मेरे साथ अजीबोगरीब घटनाएँ होने लगीं, जो असामान्य थी।

🔴 मुझे चौबीसों घण्टे बेचैनी छाई रहती। नींद बिल्कुल नहीं आती थी। मैं एक मिनट के लिए भी सो नहीं पाता था। रात्रि तो मेरे लिए काल बन कर आती थी। मैं सुबह होने का इन्तजार करता। रात्रि के आते ही मेरी परेशानी बढ़ने लगती। लगता था, कमरे के सारे परदे अपने आप हिल रहे हों। लगता कोई मेरा गला दबा रहा हो। मैं बोलने का प्रयास करता तो मेरा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता। मैंने अपनी धर्मपत्नी से यह बात कही तो उसने कहा ऐसा कुछ नहीं है। मेरी धर्मपत्नी ऑपरेशन के समय से ही मेरे साथ थीं और मेरी देखभाल करती थीं। मैं असहाय था और मेरी परेशानी का हल किसी के पास नहीं था। पत्नी ने दिलासा दिया ताकि मैं घबरा न जाऊँ।

🔵 घबराहट की ऐसी मनोदशा में मुझे भय और निराशा के विचारों ने बुरी तरह घेर लिया। अवसादजन्य भावना से वशीभूत होकर मेरे अंदर बुरी आत्मा के चंगुल में आ जाने और अपना अंत होने का आभास होने लगा। लेकिन इस क्षण मुझे गायत्री मंत्र का आश्रय और गुरुदेव की कृपा अनन्य रूप से एक मात्र सहायक और संबल प्रतीत हुआ। पूरी व्याकुलता के साथ मैं पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र जपने लगा। जप करते- करते लगभग चार बजे ब्राह्ममुहूर्त में क्षणिक निद्रा में मुझे गुरुदेव- माताजी के दिव्य दर्शन हुए। मैंने देखा उनके चरण कमलों में नतमस्तक हो चरण स्पर्श कर रहा हूँ एवं वे मुझे आशीर्वाद के साथ अभयदान दे रहे हैं। मुझे अनुभव हो रहा था कि अब मेरे सारे कष्ट दूर हो गए हैं।

🔴 चेतना आने पर मैंने अपनी धर्मपत्नी से इस बात को बताया कि मुझे ऐसा स्वप्न हुआ है। आज मुझे यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी। जबकि सच तो यह था कि उस दिन छुट्टी मिलने का प्रश्र ही नहीं था। डॉक्टर ने पहले ही कह दिया था कि २९ जुलाई से पूर्व आपको रिलीज नहीं किया जा सकता।

🔵 लेकिन मुझे गुरु के ऊपर विश्वास था कि आज मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। २७ तारीख को जब डॉक्टर विजिट में आए तो मैंने उनसे रिलीज कर देने के लिए आग्रह किया। वे कुछ देर तक मौन रहे और बाद में अनुमति दे दी। मैं उसी दिन रात्रि ७ बजे रिलीज होकर अपने घर आ गया। मेरे गुरुदेव ने मुझे उस अतृप्त आत्मा से बचाकर नया जीवन दिया। अगर मैं वैसी विषम स्थिति में दो दिन और रह जाता तो मेरी मौत निश्चित थी।              
  
🌹 पवन कुमार शर्मा कटक (उड़ीसा)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/mila.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 91)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 बाजरे का-मक्का का एक दाना सौ दाने होकर पकता है। यह उदाहरण हमने अपनी संचित सम्पदा के उत्सर्ग करने जैसा दुस्साहस करने में देखा। जो था, वह परिवार के लिए उतनी ही मात्रा में, उतनी ही अवधि तक दिया, जब तक कि वे लोग हाथ पैरों से कमाने-खाने लायक नहीं बन गए। उत्तराधिकार में समर्थ संतान हेतु सम्पदा छोड़ मरना, अपना श्रम मनोयोग उन्हीं के लिए खपाते रहना हमने सदा अनैतिक माना और विरोध किया है। फिर स्वयं वैसा करते भी कैसे? मुफ्त की कमाई हराम की होती है, भले ही वह पूर्वजों की खड़ी की हुई हो। हराम की कमाई न पचती है, न फलती है। इस आदर्श पर परिपूर्ण विश्वास रखते हुए हमने शारीरिक श्रम, मनोयोग, भाव संवेदना और संग्रहीत धन की चारों सम्पदाओं में से किसी को भी कुपात्रों के हाथ नहीं जाने दिया है।

🔵 उसका एक-एक कण सज्जनता के सम्वर्धन में, भगवान की आराधना में लगाया है। परिणाम सामने है। जो पास में था, उससे अगणित लाभ उठा चुके। यदि कृपणों की तरह उन उपलब्धियों को विलास में, लालच में, संग्रह में, परिवार वालों को धन-कुबेर बनाने में खर्च किया होता, तो वह सब कुछ बेकार चला जाता। कोई महत्त्वपूर्ण काम न बनता, वरन् जो भी उस मुफ्त के श्रम साधन का उपयोग करते वे दुर्गुण, दुर्व्यसनी बनकर नफे में नहीं, घाटे में ही रहते। कितने पुण्य फल ऐसे हैं, जिनके सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, पर लोक साधना का परमार्थ ऐसा है, जिसका प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पोंछते समय असाधारण आत्म-संतोष होता है। कोई बदला न चुका सके, तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है, आशीर्वाद देता है, इसके अतिरिक्त और एक ऐसा दैवी विधान जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है, उसकी भरपाई करता रहता है। 

🔴 भेड़ ऊन कटाती रहती है, हर वर्ष उसे नई ऊन मिलती है। पेड़ फल देते हैं, अगली बार टहनियाँ फिर उसी तरह लद जाती हैं, बादल बरसते हैं, पर खाली नहीं होते। अगले दिनों वे फिर उतनी ही जल सम्पदा बरसाने के लिए समुद्र से प्राप्त कर लेते हैं, उदारचेताओं के भण्डार कभी खाली नहीं हुए। किसी ने कुपात्रों को अपना श्रम-समय देकर भ्रमवश दुष्प्रवृत्तियों का पोषण किया हो और उसे भी पुण्य समझा हो तो फिर बात दूसरी है। अन्यथा लोक साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है, जो हाथों-हाथ मिलता है। आत्मसंतोष, लोक सम्मान, दैवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला व्यवसाय ऐसा है, जिसने भी हाथ डाला कृत-कृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं, जो चतुरता का दम भरते किंतु हर दृष्टि से घाटा उठाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2017


👉 MANAN (Part 2)

(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 So, the gap also is to be filled. Rectification (identification coupled with commitment to remove) alone is not all that is to be done. Let it be compensated also. Rectified, well but it alone will not serve the purpose. Will you not compensate or fill the gap created out of removal of some undesirable specification? Will you not improve your health that has been stabilized after identification & then removal by you, of some undesirable specification of your personality? Will you not add to your public contacts, not proceed for public-service? Will you not do the jobs you have to do now? No sir! We have rectified our mistakes & that’s enough. 

🔵 What do you mean by ‘Mistakes Rectified’? ‘Mistakes Rectified’ must be compulsorily followed by ‘Qualities-Developed’, ‘Competency-Developed’ and ‘Sensitivity-Developed’. Process of ‘SELF-BUILDING’ will require you to repeatedly inspect your gaps just to fill that or compensate that. We should make our temperament and habits morally justified. Make up yourself, your health, your personality, your character, your temperament and of course your working-style. Make up everything. Besides making up these specifications, just take care of one more thing and that is your family, make up its scenario too.

🔴 Building, only of ourselves! We will become a saint in ourselves, will study RAMAYANA and not consume sweets. You are right, but again the family is there which a part of you is also. You are not alone. Your family is also associated with you, therefore your job also warrants its building as well. If you cannot do that then all your family members are likely to remain fool, wicked and uncivil and in that condition how will you ensure your peace of mind, do BHAJAN? Then how will you live a happy life, practice good habits and words? Why will you not be angry to see everybody puzzled in your family? That is why what is to be additionally done is to take necessary measures to ensure peace, happiness and harmony within your family and of course in your personal life also.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 मानवता के हित में महत्त्वाकांक्षा त्यागी

🔵 घटना उस समय की है, जब यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्ला सलाल को अपदस्थ कर रिपब्लिकन नेता श्री रहमान हरयानी को सत्तारूढ किया गया। यह क्रांति रक्तहीन था। बाद में प्रकाशित समचारों से पता चला है कि जन-जीवन को रक्तपात और लूटमार से बचाने का संपूर्ण श्रेय अपदस्थ राष्ट्रपति सलाल को ही था।

🔴 इस युग में जब कि हर देश के नेता अपनी स्वार्थलिप्सा और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं चूकते, श्री सलाल ने एक आदर्श सिद्धांत स्थापित किया है कि कोई बात मानवता के हित में है तो उसके लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को ठुकराया भी जा सकता है। श्री सलाल के इस आदर्श ने उनकी खोई प्रतिष्ठा से भी अधिक उन्हें श्रेय और सम्मान दिलाया।

🔵 राष्ट्रपति सलाल जब सत्तारूढ थे, तभी उनकी कई नीतियों का यमन मे तीव्र विरोध चल रहा था। जन-चेतना को सामूहिक शक्ति आज के युग की प्रबलतम शक्ति गिनी गई है। संगठित व्यक्तियों के आगे वैसे भी किसी की चल नहीं सकती। यदि जनतंत्र में बौद्धिक जागृति हो तब तो उसका मुकाबला सेना और तलवारें भी नहीं कर सकती। यदि कुछ हो सकता है तो संघर्ष और रक्तपात अवश्य हो सकता है। यमन में उसी की तैयारी चल पडी थी और अब्दुल्ला सलाल को उस सबकी पूरी और पक्की जानकारी भी थी।

🔴 राष्ट्रपति सलाल सत्तारूढ थे, चाहते तो गृह युद्ध करा देते। अपने अनेक विरोधियों को मारकर वे उस अस्थिरता को समाप्त भी कर सकते थे पर सिद्धॉंतवादी व्यक्ति अपने शत्रु के साथ भी अमानवीय का व्यवहार नहीं करते, यह जो कुछ हो रहा था, वह तो उनके ही देशवासी कर रहे थे, उसके प्रति सलाल जैसा सहृदय व्यक्ति क्रूर एवं कठोर क्यों होता ?

🔵 उन्होंने बगदाद और मास्को यात्रा का कार्यक्रम इसी उद्देश्य से बनाया। एक पक्ष जब निबल पड जायेगा तो गृह-युद्ध की स्थिति ही न आने पायेगी। विरोधी व्यक्तियों ने समझा, यह सब विद्रोह के लिए अच्छा रहेगा। बाद मे सही स्थिति का पता चला तो वह लोग, जिन्होंने श्री सलाल के विरुद्ध बगावत की थी, वह भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रहे।

🔴 सबसे पहले अल अनवर समाचार पत्र ने यह खबर देते हुए बताया कि श्री सलाल जब बगदाद यात्रा के लिए चलने लगे तो उन्होंने विद्रोही नेता श्री अनवर हरयानी को पत्र लिखा कि अपने देश को रक्तपात और दूसरे देशों के सामने शर्मिदगी से बचाने के लिए मैं देश छोड रहा हूँ। मैं अपने विरुद्ध की गई हर तैयारी से अवगत हूँ किंतु अपनी प्रजा के अहित के साथ मेरा नाम जुडे मैं यह कभी नहीं चाहता। आप मेरा स्थान ग्रहण करने के लिए चुने गये हैं, तब तक आप गणराज्य बनाए रख सकते है। मैं पहला व्यक्ति हूँ जो इस बात का स्वागत करता हूँ।

🔵 राष्ट्रपति सलाल ने इसके बाद शेष जीवन बगदाद में ही रहकर ईश्वर की उपासना और आत्म-कल्याण में बिताने का निश्चय किया। सारे संसार के नेता ऐसे उदार और मानवता के हितैषी हो जाये तो रक्तपात की परिस्थितियाँ संसार में आए ही क्यों?

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 143, 144

👉 ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी

🔵 प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं, तो उसे अपना सबसे भरोसेमन्द सेवक प्रदान करते हैं और उससे कहते हैं कि तुम-हर हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ो। कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाए, ओछे आकर्षणों की भूल-भुलैयों में भटक जाए अथवा फिर सुख-भोगों की झाड़ियों में अटक जाए। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है-दुःख। सचमुच वह ईश्वरभक्त के साथ-साथ छाया की तरह चिपका रहता है।

🔴 निःसन्देह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है। च्यों ही इसका आगमन होता है, हमारी चेतना ईश्वरोन्मुख होने लगती है। दुःख का हर पल, दिल की गहराइयों में संसार की यथार्थता-उसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में हमें सत्य की सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने कितने अधिक पराए हैं? जिन सगे-सम्बन्धियों, मित्रों-परिजनों, कुटुम्बियों-रिश्तेदारों को अपना कहने और मानने में गर्व की अनुभूति होती थी, दुःख के सघन होते ही उनके पराएपन का रहस्य एक के बाद एक उजागर होने लगता हैं। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद विकल करती है, ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।
  
🔵 प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख अपने साथ न रहे, तो अन्तरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। ‘अहं’ का विषधर समूची चेतना को ही डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता है। जीव सघन अँधेरे और घने कुहासे में घिर जाता है। इन अँधेरों में मूर्च्छना में वह संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेम को पराया। और तब प्रभु अपने प्रिय को उबारने के लिए-उसे अपनाने के लिए अपने सबसे भरासेमन्द सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।

🔴 जिनके लिए दुःख सहना कठिन है, उनके लिए भगवान् को अपना बनाना भी कठिन है। ईश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-जीवन को आदर्शों की जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन नई आग में तपाते हुए, उसकी आभा को नित नये ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान् को अपना बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का वरदान माँगते हैं। कुन्ती, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने में रहने वाले परमात्मा के दीवानों ने अपने जीवन में आने वाले प्रचण्ड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकार किया और हँसते-हँसते सहन किया। प्रभु ने जिनको अपनाया, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर गूँजे हैं कि ईश्वर-भक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना, यही दो हाथ हैं, जिन्हें जोड़कर भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 51

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 19)

🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए

🔴 समय संसार की सबसे मूल्यवान् सम्पदा है। विद्वानों एवं महापुरुषों ने वक्त को सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना है। समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति कभी भी निर्धन अथवा दुःखी नहीं रह सकते। कहने को कहा जा सकता है कि श्रम से ही सम्पत्ति की उपलब्धि होती है किन्तु श्रम का अर्थ भी वक्त का सदुपयोग ही है। असमय का श्रम पारिश्रमिक से अधिक थकान लाया करता है।

🔵 मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही इसका श्रम या तो निष्फल चला जायेगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किन्तु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। वक्त पर न जोत कर असमय पर जोता हुआ खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है। वक्त पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिये निश्चित वक्त पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।

🔴 प्रकृति का प्रत्येक कार्य एक निश्चित वक्त पर होता है। वक्त पर ग्रीष्म तपता है, वक्त पर पानी बरसता है, वक्त पर ही शीत आता है। वक्त पर ही शिशिर होता और वक्त पर ही बसन्त आकर वनस्पतियों को फूलों से सजा देता है। प्रकृति के इस ऋतु-क्रम में जरा-सा भी व्यवधान पड़ जाने से न जाने कितने प्रकार के रोगों एवं इति-भीति का प्रकोप हो जाता है चांद-सूरज, गृह-नक्षत्र सब समय पर ही उदय अस्त होते, वक्त के अनुसार ही अपनी परिधि एवं कक्ष में परिभ्रमण किया करते हैं। इनकी सामयिकता में जरा-सा व्यवधान पड़ने से सृष्टि में अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं और प्रलय के दृश्य दीखने लगते हैं, समय पालन ईश्वरीय नियमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख नियम है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्म की स्वतंत्रता

🔴 समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किए गए हैं कि वह प्रत्येक काम को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इंद्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्मसिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता, तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा की अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।

🔵 कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा।

🔴 गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1946 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1946/October.17

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 18)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 समय की बर्बादी आज-कल मनोरंजन के नाम पर भी बहुत होती है। रेडियो, सिनेमा, खेल-तमाशे, ताश, शतरंज आदि में हम नित्य ही अपना बहुत-सा समय बर्बाद करते रहते हैं। महात्मा गांधी ने एक बार अपने पुत्र मणिलाल को पत्र में लिखा था। ‘‘खेल-कूद मनोरंजन का समय बारह वर्ष की उम्र तक है।’’ आज हम इसमें अपना कितना वक्त खर्च करते हैं यह स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। मनोरंजन खेल आदि को जीवन में रखा ही जाय तो उसके लिए भी एक नियत समय रखना चाहिये।

🔵 अपने आस-पास का वातावरण, ऐसा रखना चाहिए कि अपना समय किसी कारण बर्बाद न हो। वक्त बर्बाद करने वाले दोस्तों से दूर की ‘नमस्ते’ रखनी चाहिए। निठल्ले लोग ही अक्सर दूसरे का वक्त बर्बाद करने जा पहुंचते हैं। इन्हें दोस्त नहीं दुश्मन मानना ही उचित है।

स्मरण रखिये समय बहुत मूल्यवान् वस्तु है। इससे आप जितना लाभ उठा सकते हैं उठायें। आप वक्त को नष्ट करेंगे तो वक्त भी आपको नष्ट कर देगा। वक्त के सदुपयोग पर ही आप कुछ बन सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 क्रान्ति का महापर्व

🔵 क्रान्ति के बीज किसी एक महान् विचारक के दिमाग में जमते हैं। वहाँ से फूल-फलकर क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में बाहर आते हैं और संक्रामक रोग की तरह अन्य दिमागों में उपजकर बढ़ते हैं। सिलसिला जारी रहता है। क्रान्ति की उमंगों की बाढ़ आती है। सब ओर क्रान्ति का पर्व मनने लगता है। चिंगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उसके प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग जाती है।

🔴 ऐसे में नियति का नियन्त्रण करने वाली अदृश्यसत्ता परिवर्तन के क्रान्तिकारी आवेग से भरी प्रतीत होती है। वेदमाता, आद्यशक्ति समूचे विश्व को अपने हाथों में लेकर उसे नया रूप देने का संकल्प लेती हैं। तोपों की गरज, फौजों के कदमों के धमाके, बड़े-बड़े सत्ताधीशों के अधःपतनों और समूचे विश्व में व्यापक उथल-पुथल के शोरगुल से भरे ये क्रान्ति के समारोह हर ओर तीव्र विनाश और सशक्त सृजन की बाढ़ ला देते हैं। क्रान्ति के इस पर्व में दुनिया को गलाने वाली कड़ाही में डाल दिया जाता है और वह नया रूप, नया आकार लेकर निकल आती है। महाक्रान्ति के इस पर्व में ऐसा बहुत कुछ घटित होता है, जिसे देखकर बुद्धिमानों की बुद्धि चकरा जाती है और प्राज्ञों की प्रज्ञा हास्यास्पद बन जाती है।
  
🔵 वर्तमान युग में विचार-क्रान्ति के बीजों को परमपूच्य गुरुदेव ने अपने क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से जनमानस की उर्वर भूमि में बड़े यत्न से बोया है। वन्दनीया माताजी के साथ सतत तप करके इन्हें अपने प्राणों से सींचा है। इसके चमत्कारी प्रभावों से क्रान्ति की केसरिया फसल लहलहा उठी है। परिवर्तन की च्वालाएँ धधकने लगी हैं। क्रान्ति के महापर्व की उमंगों की थिरकन चहुँ ओर फैल रही है। ये वही महान् क्षण हैं, जब भारतमाता अपनी ही सन्तानों के असंख्य आघातों को सहते हुए असह्य वेदना और आँखों में आँसू लिए अपना नवल सृजन करने को तत्पर है।

🔴 अपने समय की इस महाक्रान्ति के लिए समर्पित युगसैनिक अपना धैर्य न खोएँ और न ही निराशा से अपनी आत्माओं को अभिभूत और हतोत्साहित होने दें। देवत्व और असुरता के इस महासंग्राम में जो हमारा नेतृत्व कर रहा है, वह स्वयं सर्वशक्तिमान महाकाल है। कालपुरुष, युगात्मा स्वयं इस क्रान्ति महोत्सव को सम्पन्न करने के लिए उठ खड़ा हुआ है। उसके प्रभाव, शक्तिमत्ता और अप्रतिरोध्यता को कौन रोक सकता है? वह तो केवल उस तिमिर का नाश कर रहा है, जो मानवता को अनेक रूपों से आक्रान्त किए हुए है। जो होने जा रहा है, उस उज्ज्वल भविष्य का तो वह सृजन कर रहा है।

🔵 यह समय युगसेनानियों की चेतना में महाकाल के दिव्यप्रकाश के अवतरण के लिए हैं। उन्हें यह चेताने के लिए हैं कि इस क्रान्ति के अवसर में हृदय मूर्छित न होने पाए और न ही उदासी छाए तथा कोई अदूरदर्शी उत्तेजना भी न हो। हमारी भयंकर परीक्षा का समय है। मार्ग सरल नहीं होने का, मुकुट सस्ते में नहीं मिल जाएगा। भारत मौत के साए की घाटी से, अंधकार और यंत्रणा के घोर संत्रास से गुजर कर ही इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनने का गौरव प्राप्त करेगा। क्रान्ति के इस अवसर पर पहली अपेक्षा साहस की है, ऐसे साहस की जो पीछे हटना बिलकुल न जानता हो। क्रान्ति के संवर्ग समारोहों में शामिल होने वाले ऐसे साहसी व्यक्ति ही क्रान्तिवीरों का गौरव प्राप्त करेंगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 49

सोमवार, 1 मई 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 May 2017


👉 MANAN (Part 1)

(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.

🔴 Now comes, the second leg that is to be considered after first leg of ‘CHINTAN’ during the period you are in solitude. Its name is ‘MANAN’ (motivating the self-being). What is ‘MANAN’? ‘MANAN’ again like ‘CHINTAN’ comprises of two stages. The first stage here is called ‘SELF-INCULCATING/ AUTO-SUGGESTION’ while the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What to do in ‘INCULCATING’. ‘INCULCATING’ here stands for incorporating some new specification that you usually do not have by now in your temperament, virtue and action. For example you are illiterate and have no knowledge, so now starts trying for that. What to try? You have to start studying.  

🔵 We are honest, do not smoke, that is nice but I ask why you do not fill the gap created due to your illiteracy or being uneducated? If you do not do that how progress will begin?  How your knowledge-base will widen?  How your mind will develop? That is why there is bulk of jobs to be done here as far as building your personality is concerned. Your health is weak due to smoking but your commitment alone to stop smoking will not work as it will only put a break to incurring losses. Yes, it was to be compulsorily stopped but one more thing will also have to be done. To add to your health, you will also have to make necessary changes in your food-habits. You will have to exercise celibacy besides adopting some new way of physical exercise. These new specifications for what, for unleashing the chain of progress as all these are the parts of ‘SELF-INCULCATING’.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 90)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 गुरुदेव के निर्देशन में अपनी चारों ही सम्पदाओं को भगवान के चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया। १-शारीरिक श्रम, २-मानसिक श्रम, ३-भाव संवेदनाएँ, ४-पूर्वजों का उपार्जित धन। अपना कमाया तो कुछ था ही नहीं। चारों को अनन्य निष्ठा के साथ निर्धारित लक्ष्य के लिए लगाते चले आए हैं। फलतः सचमुच ही वे सौ गुने होकर वापस लौटते रहे हैं। शरीर से बाहर घण्टा नित्य श्रम किया है। इससे थकान नहीं आई। वरन् कार्य क्षमता बढ़ी ही है। इन दिनों इस बुढ़ापे में भी जवानों जैसी कार्य क्षमता है। मानसिक श्रम भी शारीरिक श्रम के साथ सँजोए रखा। उसकी परिणति यह है कि मनोबल में-मस्तिष्कीय क्षमता में कहीं कोई ऐसे लक्षण प्रकट नहीं हुए जैसे कि आमतौर से बुढ़ापे में प्रकट होते हैं।

🔵 हमने खुलकर प्यार बाँटा और बिखेरा है। फलस्वरूप दूसरी ओर से भी कमी नहीं रही है, व्यक्तिगत स्नेह, सम्मान, सद्भाव ही नहीं, मिशन के लिए जब-जब, जो-जो अपील, अनुरोध प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, उनमें कमी नहीं पड़ी है। २४०० प्रज्ञापीठों का दो वर्ष में बनकर खड़े हो जाना इसका जीवंत उदाहरण है। आरम्भ में मात्र अपना ही धन था। पैतृक संपत्ति से ही गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ। जन्मभूमि में हाईस्कूल खड़ा किया गया, बाद में एक और शक्तिपीठ वहाँ विनिर्मित हो गया। आशा कम ही थी कि लोग बिना माँगे देंगे और निर्माण का इतना बड़ा स्वरूप खड़ा हो जाएगा।  

🔴 आज गायत्री तपोभूमि, शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस् की इमारतों को देखकर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बोया हुआ बीज सौ गुना होकर फलता है या नहीं। यह श्रद्धा का अभाव ही है, जिसमें लोग अपना संचय बगल में दबाए रखना चाहते हैं, भगवान से लाटरी अथवा लोगों से चंदा माँगते हैं। यदि बात आत्मसमर्पण से प्रारंभ की जा सके तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम होगा। विनिर्मित गायत्री शक्ति पीठों में से जूनागढ़ के निर्माता ने अपने बर्तन बेचकर कार्य आरम्भ किया था और वही अब तक विनिर्मित, सभी इमारतों में मूर्धन्यों में से एक है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4

👉 यम के दूत निकट नहीं आवें

🔵 मैं अपने परिवार के साथ मई २००४ में शान्तिकुञ्ज दर्शन करने आया। हमें याद है, मैं शान्तिकुञ्ज में चार- पाँच दिन रुका था। १८ मई को वापस बलरामपुर अपने सरकारी आवास पर पहुँच गया। रास्ते की थकान होने के कारण हमें काफी सुस्ती महसूस हो रही थी। इसी बीच भाई की पत्नी भी आ गई। उसे मालूम हुआ कि हम लोग शान्तिकुञ्ज से वापस आ गए हैं। इसलिए एक दिन के लिए मिलने चली आई थी। उस दिन रुककर २० तारीख शाम को ४ बजे वापस चली गई।

🔴 चूँकि हम लोग काफी थके हुए थे, इसलिए उस दिन जल्दी खाना बन गया। हम लोग खा- पीकर जल्दी सो गए। रात में, करीब १२- १ बजे का समय रहा होगा- सात- आठ अज्ञात लोग अचानक मेरे घर में घुस आए। घर में आवाज सुनकर मैं हड़बड़ाकर जाग उठा। मेरी पत्नी और लड़का सो रहा था। मैं बहुत घबड़ा गया था। सोचा उठकर शोर मचाऊँ, तो शायद कोई पड़ोसी ही पहुँच जाए। इतने सारे हथियार बंद लोगों के सामने मेरी क्या औकात थी? उन लोगों ने मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी के हाथ पैरों को बाँध दिया। उसने उठकर चिल्लाने की कोशिश की तो मुँह पर टेप चिपका दिया। मैंने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन लोगों ने कट्टे के बट से मेरी कनपटी पर वार कर दिया, जिसके कारण मेरे सिर से खून की धार बह निकली। मेरी स्थिति को देख पत्नी अचेत हो गई। मैं अन्दर से बुरी तरह काँप उठा। मुझे लगा कि अब मेरा परिवार तो गया। मैं बुरी तरह जख्मी हो गया था। मेरी दोनों लड़कियाँ दूसरे कमरे में सो रही थीं। मेरा मन आशंका से भर उठा कि वे लोग अब न जाने क्या करें? शरीर से खून बह जाने के कारण कमजोर इतना हो गया था कि उठा भी नहीं जा रहा था। वे लोग मुझे साक्षात् यम के दूत की तरह से लग रहे थे।

🔵 अब पूज्य गुरुदेव को पुकारने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मैं व्याकुल होकर कह उठा- हे गुरुदेव! मैंने कौन सा अपराध किया है, जिसका मुझे इस तरह दण्ड मिल रहा है। अब तो मेरे परिवार का अन्त हो जाएगा। आपके रहते ऐसा कैसे सम्भव है? मेरे मन में न जाने कितने भाव आ रहे थे! इधर मैं प्रार्थना में तल्लीन था। इस बीच घटना ने किस तरह मोड़ लिया यह मैंने बाद में अपनी पत्नी से सुना। मुझे चोटिल देख उसे मूर्छा आ गई थी। मूर्छा में ही उसने सुना कि बाहर से कोई दरवाजा खोलने के लिए कह रहा है। फिर पता नहीं कैसे दरवाजा अपने आप खुल गया। उसने देखा कि स्वयं गुरुदेव कमरे में प्रवेश कर रहे हैं। सफेद धोती कुर्ता पहने हुए हैं। उनको देखते ही पत्नी की मूर्छा टूट गई। वह चिल्लाई गुरुदेव- गुरुदेव! इतने में सारे बदमाश अचानक डर गए। वे समझे इन लोगों को बचाने वाले आ गए।

🔴 इतना सब कुछ होने के बावजूद कोई व्यक्ति सहायता के लिए नहीं पहुँचा था। अचानक मैंने देखा कि कर्नल साहब का चपरासी अन्दर चिल्लाते हुए आया कि क्या बात है? न जाने मुझमें कहाँ से हिम्मत आ गई। मैं एक ईंट उठाकर बदमाशों के पीछे- पीछे भागा। पता नहीं कैसी कृपा गुरुदेव की हुई कि थोड़ी देर पहले मैं डर के मारे परेशान था, बोलने की हिम्मत नहीं थी। मैंने उन लोगों को बहुत दूर तक दौड़ा दिया। वे लोग डर कर भाग गए।

🔵 इतना घाव एवं रक्त बहने के बावजूद मैं कपड़े से अपने सर को पकड़े हुए एक हाथ से जीप चलाते हुए थाने पहुँच गया। वहाँ मैंने रिपोर्ट लिखवाई। मेरे दिमाग में काफी चोट आने के कारण मेरा दिमागी संतुलन बिगड़ गया था। मुझे बात भूलने की समस्या हो गई थी। लेकिन धीरे- धीरे गुरुकृपा से सब सामान्य हो गया। सभी बदमाश पकड़े गए। मुकदमा चला लेकिन बाद में मंैने मुकदमा समाप्त करा दिया। सभी को बाद में बरी करवा दिया।

🔴 मुझे अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास हो गया था। जब उनकी कृपादृष्टि है तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। मैं किसी को दण्ड क्यों दूँ। सारा न्याय तो ऊपर वाले के हाथ में है। इस प्रकार गुरुकृपा से थोड़े दिनों के भीतर सारी परिस्थितियाँ सामान्य हो गईं। अगर गुरुजी का सहारा न होता तो हमारे परिवार का न जाने क्या हाल होता! इस घटना के बाद से मेरी श्रद्धा गुरुदेव के प्रति हमेशा के लिए बँध गई।              
  
🌹 सुरेश कुमार सोनी तहसीलदार, धामपुर  बिजनौर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/yam

रविवार, 30 अप्रैल 2017

👉 पवित्रता ही प्रभु मिलन का द्वार

🔵 गहन समाधि के नीरव पलों में ईश्वरीय गान गूँजता है- याद रखो, हमेशा याद रखो, पवित्र हृदय वाले व्यक्ति ही मेरा सान्निध्य पाते हैं। जो लोग अपनी आकांक्षाओं के कीचड़ में सने हैं, अपनी वासनाओं के अँधेरों में घिरे हैं, वे परमचेतना का प्रकाश नहीं पा सकते। इसलिए सदा-सर्वदा पवित्रता उपलब्ध करने की तीव्र इच्छा रखो। गहराई और अध्यवसायपूर्वक पवित्रता की खोज करो। केवल यही प्रयोजनीय है।

🔴 पवित्रता परमसत्य को पाने की ड्योढ़ी है। मेरा चिन्तन करने से पूर्व पवित्रता का चिन्तन करो। पवित्रता वह चाबी है जिससे ध्यान रूपी द्वार खुलता है, समाधि के आगार में प्रवेश मिलता है और सर्वशक्तिमान से मिलन होता है।
  
🔵 मेरी शक्ति के समुद्र में स्वयं को फेंक दो। इच्छा न करो। आकांक्षाएँ न रखो। जानो कि मैं हूँ। यही ज्ञान मेरी इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ युक्त होकर तुम्हारा उद्धार करेगा। भयभीत न होओ। क्या तुम मुझमें नहीं हो? क्या मैं तुममें नहीं हूँ? यह जान लो कि सांसारिक यश-वैभव, ऐश्वर्य-ख्याति सब कुछ एक दिन चली जाती है। मृत्यु जीवन के विभिन्न प्रकारों को निगलती हुई सर्वत्र विद्यमान है। मृत्यु और  परिवर्तन आत्मा को छोड़कर अन्य सभी को अपने जाल में फँसाते और बाँधते हैं, इसे जानो। पवित्रता ही इस ज्ञानप्राप्ति का उपाय है। यह आधार भित्ति है। पवित्रता के साथ निर्भयता आती है और आती है स्वतन्त्रता और तुम्हारे स्वरूप की अनुभूति, जिसका सार मैं हूँ।

🔴 तूफान आने दो। किन्तु जब इच्छाएँ तुम्हें जलाएँ, सन्ताप तुम्हें सताए और मन चंचल हो तब मुझे पुकारो। मैं सुनूँगा। लेकिन ध्यान रखो, मुझे भावनाओं के अति सूक्ष्म स्पन्दन भी सुनायी दे जाते हैं, किन्तु हृदयविहीन वाणी की उच्च पुकार भी मुझ तक नहीं पहुँच पाती। हृदय से पुकारो, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। जो मुझे आन्तरिकता पूर्वक पुकारते हैं, मैं उनकी त्याग नहीं करता। केवल आन्तरिकता नहीं, अध्यवसायपूर्वक मुझे पुकारो।

🔵 मैं विश्व नहीं, उसमें समायी आत्मा हूँ। तभी तो मुझे विश्वात्मा कहा जाता है। विश्व कितना भी विशाल क्यों न हो, पर वह मेरे लिए पंचभौतिक देह से अधिक कुछ भी नहीं। मेरी प्रीति केवल आत्मा में है। वस्तुओं की बाहरी विशालता से भ्रमित न होओ। दिव्यता न तो रूप में है और न ही विचारों में। वह शुद्ध, मुक्त, आध्यात्मिक, आनन्दपूर्ण, रूपरहित, विचाररहित चेतना में है। जो कलुष, पाप बन्धन या सीमा से परिचित नहीं है, परिचित हो भी नहीं सकता।

🔴 हे आत्मन्! अन्तर के अन्तर में तुम वही हो। इसकी अनुभूति तुम्हें होगी। इसका होना अनिवार्य है, क्योंकि जीवात्मा के जीवन का यही लक्ष्य है। स्मरण रखो कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं सर्वशक्तिमान, काल का भी काल महेश्वर महाकाल तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी समस्त दुर्बलताओं के निवारण के लिए मैं शक्ति हूँ। तुम्हारे समस्त पापों के लिए मैं क्षमा हूँ। तुम्हारी पीड़ा दूर करने के लिए मैं दया हूँ। तुम्हारे कष्टों को मिटाने के लिए मैं करुणा हूँ। मेरी खोज में मैं तुम्हारा प्रेम हूँ। विश्वास करो मैं ही तुम हूँ, तुम ही मैं हो।

🔵 आत्मा के सम्बन्ध में अन्य सभी विचारों को त्याग दो; क्योंकि इस विचार में कि तुम्हारी आत्मा मुझसे किसी प्रकार भी भिन्न नहीं है सभी अज्ञान और दुर्बलताएँ निहित हैं। ओ ज्योतिस्वरूप! उठो, जानो कि मैं ही तुम्हारी आत्मा हूँ और पवित्रता ही मेरे सान्निध्य का पथ है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 47

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 April 2017



👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2017


शनिवार, 29 अप्रैल 2017

👉 भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ

🔵 इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ तनिक भी रुकने का मतलब है, राह में झुलसकर नष्ट हो जाना। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सरल विश्वास को तोड़ने वाले कपटजाल में फँसकर उसका अनुसरण न करो। परम विश्वासी शिष्य की भाँति एक उन्मत्त छलाँग लगाकर स्वयं को सद्गुरु की कृपासागर में डुबो दो।

🔴 ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! सरल विश्वास से बढ़कर और कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं है। इसी क्षण अपने आप से पूछो, क्या तुम विश्वास करते हो? पहले स्वयं पर विश्वास करो आखिर यह सरल, निश्छल एवं वज्र की भाँति वज्र विश्वास ही तो परमशिव है। विश्वास! विश्वास!! विश्वास!!! सभी कुछ विश्वास पर ही निर्भर करता है। वह विश्वास नहीं जो केवल आस्था मात्र है, किन्तु वह विश्वास है जो दर्शन है। संशय के अतिरिक्त और कोई महापाप नहीं। गीता के इस उपदेश को अपने अस्तित्त्व की गहराइयों में अनुभव करो-‘‘संशयात्मा विनश्यति’’ संशय को विष के समान त्याग देना सीखो। सबसे बड़ी दुर्बलता संशय है, जो शिष्य को सद्गुरु के अनुदानों-वरदानों से वंचित रखती है।
  
🔵 ओ अमृतपुत्र! सरल विश्वास से ओत-प्रोत अन्तःकरण में ही सजल भावनाएँ अंकुरित, प्रस्फुटित एवं विकसित होकर श्रद्धा का रूप लेती हैं। सजल श्रद्धा ही समस्त दिव्यशक्तियों का स्रोत है। विश्व के समस्त महामानव इस सजल श्रद्धा की शक्ति से अभिभूत होकर ही अपने महान् लक्ष्य को पा सके। यह शक्ति जो कि जगन्माता का स्वरूप है, परम शिव से सर्वथा अभिन्न है, उसका ध्यान करो और तुम अनायास ही सभी भयों से मुक्त होकर उन महाशक्ति की प्र्ररेणा ग्रहण कर सकोगे। उनके दिव्य-वात्सल्य के सुख को सहज अनुभव कर पाओगे।

🔴 सरल विश्वास और सजल श्रद्धा-प्राण और देह की भाँति गुँथे हुए हैं। द्वैत का आभास होने पर भी इनमें सर्वथा अद्वैत है। शिव और शक्ति भला एक दूसरे से भिन्न हो भी कैसे सकते हैं? स्वयं के अन्तःकरण में इनकी अनुभूति सघन होते ही अपनी अन्तर्दृष्टि के समक्ष प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा की युगल मूर्ति सहज साकार हो उठेगी और सुनायी पड़ने लगेगी-गुरुपर्व पर उनकी यह परावाणी-शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिए जा चुके हैं, अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ है। तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया, इस बात का तुम्हारे साथ हमें भी गहरा दुःख है। जब रास्ता मिल गया है, तब वीरतापूर्वक आगे बढ़ो। जिसने भी श्रद्धा-विश्वास का अवलम्बन लिया है, वह अकेला नहीं है। ईश्वर ही उसका साथी है, मित्र है, सर्वस्व है। मेरी समस्त शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं। आगे बढ़ो और लक्ष्य प्राप्त करो।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 47

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026

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