शनिवार, 15 जुलाई 2023

👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 5)

किन्तु नियम है कि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। आदान के अभाव में प्रदान सम्भव नहीं होता। पति के साथ पत्नी को भी ऐसे कारण उपस्थित नहीं करना चाहिये, जिससे पति का उसकी ओर से मन फिरने की सम्भावना हो जाय।

सबसे पहले तो उसे पति की उचित सेवा में न तो प्रमाद करना चाहिये और न अरुचि ही। पति को जो कुछ पसन्द है खाने की वस्तुओं में उनका समावेश करते रहना चाहिये। दिन भर के परिश्रम के बाद रुचि कर भोजन और पत्नी की आवभगत उसको पूरी तरह ताजा कर देने के लिए पर्याप्त है। पति के आने पर जो पत्नियाँ उसकी सेवा स्वागत भूल कर अपनी गाथा लेकर बैठ जाती हैं या तत्काल बाजार का काम बतलाने लगती हैं, वे उसकी अनुकूलता कभी प्राप्त नहीं कर सकतीं।

खरीद फरोख्त के समय पति की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दीजिये और सदैव यह ध्यान रखना चाहिये कि उसके कपड़े ज्यादा पुराने, फटे अथवा कम नहीं होने चाहिये। खाने-पीने की वस्तुओं में प्रयत्न करिए कि पति को अधिक न सही पुरुषोचित भाग तो मिलना ही चाहिये। पौष्टिक पदार्थों के उपयोग में पति की बराबरी करने का प्रयत्न न कीजिये और न अपने ऊपर इस स्पर्धा से अधिक खर्च करिये कि जब वह इतना व्यय करते हैं तो मैं क्यों न करूं। अपने वस्त्रों का स्तर यथा-सम्भव उतना ही रखिये जितना कि पति का हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 27

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 July 2023

युग निर्माण परिवार के तथाकथित अछूतों को यह कहा गया है कि अपने वर्ग में जितनी अच्छी तरह, जितनी अधिक मात्रा में काम कर सकते हैं, उतना दूसरे लोग नहीं कर सकते। उनमें से जिनमें जीवन हो, प्रकाश हो, उत्पीड़न के प्रति दर्द, विद्रोह तो वे भी निरी सुख-सुविधाओं की योजनान बनाएँ, वरन् पिछड़े वर्ग में प्रगतिशीलता उत्पन्न करने के लिए अपनी समस्त योग्यताओं को, साधनों को समर्पित कर दें।

पुरुष का विशेष उत्तरदायित्व है कि वे नारी उत्कर्ष में अतिरिक्त योगदान देकर पिछले दिनों किये गये अन्याय का प्रायश्चित करें, इसी प्रकार सवर्ण लोगों का कर्त्तव्य है कि तथाकथित अछूतों को पिछले दिनों लांछित किया गया है उतनी ही अधिक सुविधाएँ उन्हें ऊँचा उठाने तथा आगे बढ़ाने के लिए प्रदान करें। नीचे वाले ऊपर उठने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दें और ऊपर वाले पूरा सहारा देकर उन्हें ऊपर उठायें तथी वर्तमान विषमता का अंत हो सकेगा।

नारी समाज के उत्कर्ष में नारी को ही आगे आना पड़ेगा। भारतीय समाज की दशा विचित्र है। उसमें नर और नारी का सम्मिश्रण विचित्र शंका-कुशंकाओं, अविश्वासों और कुकल्पनाओं से घिरा रहता है। इसलिए नारी वर्ग के उत्कर्ष की अगणित योजनाओं को कार्यान्वित कर सकना नर को उतना सुगम नहीं, जितना नारी के लिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 4)

अपने से अच्छे कपड़े पत्नी को पहनाने वाले पति अपनी पत्नी पर बिना मंत्र के वशीकरण कर देते हैं और प्यार में बदली उसकी कृतज्ञता का आनन्द प्राप्त करते हैं। यदि अपने से अच्छे न भी पहनाये जायें तो कम से कम उस स्तर और उस मात्रा का तो प्रबन्ध किया ही जाना चाहिये, जो स्वयं अपने लिये करते हैं। इसी प्रकार साबुन, तेल आदि का भी प्रबन्ध पत्नी के लिये अपने से अच्छा ही करना चाहिये।

इन कतिपय पदार्थिक कर्तव्यों के साथ-साथ पति को कुछ मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का भी निर्वाह करना चाहिये। इनमें से सबसे पहला कर्तव्य है प्रशंसा। उसके भोजन, और श्रृंगार की प्रशंसा कीजिये और प्रशंसा की आँखों से ही उसे देखिये। इससे उसको बड़ी पुलक और सुख की सिरहन प्राप्त होती है। उसे यह विश्वास रहता है कि पति को मैं और मेरे काम पसन्द हैं। यह पसन्दगी की भावना हर नारी की एक साथ होती है। इस पर वह अपना आराम और सुख-सुविधा तक निछावर करने को तैयार रहती है।

पत्नी के सेवा करते समय कभी भी उदास, उदासीन व तटस्थ मत रहिये। उससे हँसते-मुस्काते और एकाग्र होकर बात करने का प्रयत्न करिये। इससे उसको यह बड़ा संतोष रहता है कि पति उसको देखकर खिल उठता है, मेरी साधारण-सी बात में भी उसे रस आता है और शीघ्र ही मुझमें खो जाता है। वह इसे नारीत्व की विजय समझती है और नारी होने का अभिमान करने लगती है, जिसको प्रेम रूप में वह आभार स्वरूप समर्पित कर देती है।

बाजार से जब भी आइये कुछ न कुछ उसकी पसन्द की वस्तु अवश्य लेकर आइये। स्त्रियों का स्वभाव भी कुछ बच्चों जैसा होता है, अपनी पसन्द की छोटी-सी वस्तु भी पाकर बहुत अधिक प्रसन्न हो जाती हैं। यह और इस प्रकार के अन्य बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करने वाले पतियों की पत्नियाँ सदा प्रसन्न रहती हैं और किसी भी स्थिति में गृह-कलह उपस्थित नहीं कर पाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 27

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गुरुवार, 13 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 July 2023

इन दिनों आपत्तिकालीन स्थिति है, सामान्य समय नहीं। इन संकट के क्षणों में मानव जाति को अंधकारमय भविष्य के गर्त में गिराने से बचाने के लिए यदि सारा समय लगा दिया जाय और यह मान लिया जाय कि भौतिक जीवन जितना जी लिया उतना ही पर्याप्त है, तो यह अधिक दूरदर्शिता की, अधिक सराहनीय साहसिकता की बात होगी, पर न्यूनतम दो घण्टे तो लगाते ही रहना चाहिए।

इस युग के हर भावनाशील और जीवित व्यक्ति को गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, समर्थ गुरऊ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रामतीर्थ, गाँधी, दयानंद आदि की तरह भरी जवानी में ही कर्मक्षेत्र में ही कूद पड़ना चाहिए, बुढ़ापे का इंतजार नहीं देखना चाहिए, पर इतना साहस न हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि पके फल की तरह पेड़ में चिपके रहने की धृष्टता न करें। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके हैं वे घर-गृहस्थी की छोटी सीमा में ही आबद्ध न रहकर विशाल कर्मक्षेत्र में उतरें और जनजागृति का शंख बजाएँ, युग परिवर्तन की कमान सँभालें।

युग निर्माण परिवार के स्त्री सदस्यों को यह विशेष कर्त्तव्य सौंपा गया है कि अपने पददलित वर्ग को ऊँचा उठाने में अपना ध्यान केन्द्रित करें और अपने वर्ग में सघन संपर्क बनाकर उसे ऊँचा उठाने के लिए आगे, आगे बढ़ाने  के लिए अधिकाधिक योगदान करें। सुख-सुविधाओं को लात मारकर वे नारी जाति के उत्कर्ष के लिए बढ़-चढ़ कर बलिदान प्रस्तुत करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 3)

बहुत से स्वार्थी लोग बड़प्पन और अधिकार के अहंकार में हर वस्तु में अपना लाइन्स-शेयर (सिंह भाग) रखते हैं। वे नाश्ते और भोजन की सबसे अच्छी चीजें सबसे अधिक मात्रा में स्वयं उपभोग करते हैं। जो कुछ उल्टा-सीधा, थोड़ा बहुत बचता है, वह प्रसाद रूप में पत्नी बेचारी को मिलता है। यही हाल बाजार से लाये फल, मेवा, मिठाई आदि में भी होता है। यह बहुत ही हेय, तुच्छ  और क्रूर स्वार्थ है। इस व्यवहार की अधिक पुनरावृत्ति होने और यह समझ लेने पर कि पति का इसमें केवल स्वार्थ ही नहीं अहंकार भावना और कमाई का अधिकार भी शामिल है, यदि पत्नी का मन उससे फिर जाता है तो उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसे स्वार्थी पशुओं से पत्नी ही नहीं पूरे संसार को घृणा करनी चाहिये। वे इसी योग्य होते हैं।

अच्छे और भले पति हर अच्छी वस्तु को प्रेमपूर्वक अपनी प्रियतमा को ही अधिक से अधिक खिलाने-पिलाने में संतोष और सुख अनुभव करते हैं। चूँकि वे कमाई करते हैं इसलिये उन्हें अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह याद रहता है कि कही संकोच-वंश पत्नी किन्हीं वस्तुओं को जी भर कर न खाने का अभ्यास न कर ले अथवा खाने में संकोच करे। वे अपने आप अपने सामने अथवा अपने साथ बिठा कर खिलाने का ही यथा सम्भव प्रयत्न करते हैं। ऐसे पतियों की पत्नी कितनी प्रसन्न और सुखदायक रहती हैं इसका अनुमान सहज नहीं।

पहनने, पहनाने में भी यह विषमता अच्छी नहीं। अनेक पति अपने लिए तो जब तब अच्छे से अच्छे और नये कपड़े बनवाते रहते हैं, तब भी कमी महसूस करते रहते हैं। किन्तु पत्नी की वर्षों पहले खरीदी दो-चार साड़ियाँ उन्हें शीघ्र ही खरीदीं जैसी मालूम होती है। जैसे सुन्दर कपड़े अपने लिये बनवाते हैं, वैसे पत्नी के लिए नहीं। ऐसे ‘फैलसूफ’ पति अपनी पत्नी का पूरा प्यार कभी नहीं पा सकते। उचित यह है कि पुरुष होने के नाते पति मोटे, सस्ते और सादे कपड़े पहने और पत्नी को अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाये। वह सुन्दर है सुकुमार है, वस्त्र उसकी शोभा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 27

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बुधवार, 12 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 July 2023

युग परिवर्तन के प्राचीन इतिहास के साथ एक महायुद्ध जुड़ा हुआ है। इस बार भी उसकी पुनरावृत्ति होगी, पर यह पूर्वकालिक शस्त्र युद्धों से भिन्न होगा। यह क्षेत्रीय नहीं, व्यापक होगा। इसमें विचारों के अस्त्र प्रयुक्त होंगे और घर-घर में इसका मोर्चा खुला रहेगा। भाई-भाई से, मित्र-मित्र से और स्वजन-स्वजन से लड़ेगा। अपनी दुर्बलताओं से हर किसी को स्वयं लड़ना पड़ेगा।

जहाँ कहीं अखण्ड ज्योति, युग निर्माण पत्रिकाएँ पहुँचती हैं, वहाँ यह कर्त्तव्य भी साथ ही जा पहुँचता है कि इन्हें अखबार, पुस्तक न समझा जाय, वरन् प्रकाश पुञ्ज मानकर इससे दूसरों को भी लाभान्वित होने दिया जाय। सज्जन लोग अपने कुएँ से दूसरों की प्यास बुझाते, अपने द्वार की बत्ती से दूसरों को रास्ता पाते देखते हैं तो प्रसन्नता अनुभव करते हैं। यह प्रसन्नता हममें से हर एक को अनुभव करनी चाहिए।

विज्ञान और धन की वृद्धि ने संसार को जितना सुख पहुँचाया है, उससे अधिक विपत्ति उत्पन्न की है। आर्थिक प्रगति यदि रावण के बराबर भी हर आदमी कर ले तो भी इस संसार में रत्ती भर भी खुशहाली नहीं बढ़ेगी। उस बढ़ी हुई सम्पदा के साथ जुड़ी दुर्बुद्धि ६० लाख यादवों की परस्पर लड़ कटकर मर जाने का ही पथ प्रशस्त करेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 2)

किसी प्रकार यदि बेचारी को थोड़ा-सा आराम का अवसर मिल भी जाता है तो फिर उनकी ऐसी गप्प और हा-हा-ही-ही चलती हैं कि उसके आराम का सारा समय पलक उठने, गिरने, जम्हाने और अलसाने में ही निकल जाता है और वह फिर थकी-थकी उठ कर दूसरे समय के काम में लग जाती है। यदि सौभाग्य ही कहिये, उनकी पत्नी कलाकार अर्थात् संगीत या वाद्य की जानकार हुई तब तो गारंटी के साथ उसके दिन का ही नहीं रात का भी आराम का समय बहुत-सा बेकार चला जाता है। खा-पीकर आराम से पड़कर पति देवता को संगीत लहरी की इच्छा होती है और वह पत्नी को महफिल लगाने के लिये मजबूर कर देते हैं।

जब संगीतज्ञ पत्नी से विवाह किया है तो फिर उसका लाभ क्यों न उठाया जाये? काम के बाद ही तो वह समय मिलता है, जिसमें उनकी कला का रस लिया जा सकता है। अनेक महानुभाव तो आप आराम से पड़ कर यदि उससे पैर नहीं दबवाते तो आधी-आधी रात तक उपन्यास सुना करते हैं। उनका तो कार्य दस बजे दिन से आरम्भ होता है, पत्नी का यदि चार पाँच बजे से आरम्भ होता है तो इससे क्या। वह तो अपनी जानते हैं पत्नी अपना मरे भुगते।

कपड़े जब घर में ही धुल जाते हैं तो क्या आवश्यक कपड़े इस परवाह से ना पहने जायें कि कम से कम चार पाँच दिन तक साफ रह सकें? हर दूसरे, तीसरे दिन कपड़ों का एक ढेर उसके लिये तैयार रहता है। बच्चों के कपड़ों के साथ वह दोपहर को पति देवता के कपड़े धोती, सुखाती और लोहा करती है। इस प्रकार बहुधा पत्नियों से इतना काम लिया जाता है कि जरा आराम करने का अवसर नहीं मिलता, जिसका फल यह होता है कि उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और वह बात-बात पर झल्लाने, रोने लगती है। गृह-कलह आरम्भ हो जाता है।

वे बुद्धिमान गृहस्थ जिन्हें पारस्परिक प्रेम सद्भावना और सुख-शाँति वाँछित है, पत्नी से उतना ही काम लें जितना उचित और आवश्यक है। जो उनके अपने काम हों वे सब स्वयं ही करें। पारिवारिक जीवन में आलस्यपूर्ण नवाबी चलाना ठीक नहीं। पत्नी के पास घर गृहस्थी और बच्चों का पहले से ही इतना काम होता है कि उसे समय नहीं रहता। इस पर अपना काम सौंप कर काम की इतनी अति न कर दीजिये कि उसका शरीर टूट जाये। पत्नी जितनी अधिक स्वस्थ और प्रसन्न रहेगी उतनी ही मधुर और सरस होती चली जायेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 26

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मंगलवार, 11 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 July 2023

शास्त्र, समाज, धर्म और व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समानता की समान सुविधाएँ उत्पन्न करें। हर व्यक्ति अपनी योग्यता और सामर्थ्य का पूरा-पूरा लाभ देने के लिए बाध्य रहे। यह कर्त्तव्य निष्ठा भले ही भावनात्मक स्तर पर अध्यात्म द्वारा उत्पन्न की जाय, भले ही शासन उसके लिए कठोर प्रतिबंध लगाये। तरीका जो भी हो, हर मानव प्राणी को पूरा श्रम करने और उपलब्ध साधनों के उपभोग करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

अपने नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्यों की गहरी अनुभूति तभी हो सकती है, जब आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण की दिशा में कुछ व्यावहारिक कदम उठाये जाएँ, कुछ कष्ट सहा जाय, कुछ त्याग किया जाय और कुछ ऐसा शौर्य, साहस प्रदर्शित किया जाय जिससे विकृत मान्यताओं को उखाड़ने और परिष्कृत आस्थाओं की जड़ जमाने का अवसर मिले। इसी प्रयोजन के लिए रचनात्मक कार्य पद्धति युग निर्माण योजना बना हुआ है।

वस्तुतः पारिश्रमिक लेकर तो किसी से कुछ भी कराया जा सकता है, लेकिन सेवा वृत्ति का विकास तब होता है, जब उसी प्रकार के कार्य निःस्वार्थ भावना से किये जायें। रचनात्मक कार्य पद्धति इसी का नाम है। जिसके अनुसार विभिन्न स्तर के व्यक्तियों को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए समय, श्रम, बुद्धि, प्रतिभा या साधनों का अनुदान देने के लिए बाध्य होना पड़ता हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 1)

पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होना चाहिये। यह शोभनीय भी नहीं है और कल्याणकारी भी नहीं है। पति-पत्नी के झगड़े का मतलब है पूरे परिवार का नाश और उनके प्रगाढ़ प्रेम का अर्थ है, सुन्दर परिवार, सुखदायी गृहस्थ। पति-पत्नी के पारिवारिक लड़ाई-झगड़े के कुछ बाह्य और कुछ मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। उनमें से अकर्तव्यशीलता भी एक विशेष कारण है। यदि पति-पत्नी परस्पर अपने बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों को सावधानीपूर्वक पूरा करते रहें तो उन दोनों में कभी कोई लड़ाई-झगड़ा न हो।

बाह्य कर्तव्यों में पति का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य का अपनी ओर से पूरा ध्यान रखे। बहुत स्वार्थी पति अपनी सेवा लेने के साथ-साथ पत्नी को हर समय किसी न किसी काम में लगाये रखते हैं। उनका विचार रहता है कि पत्नी से जितना ज्यादा से ज्यादा काम लिया जा सके, लिया जाना चाहिये। वह तो काम करने और सेवा करने के लिये आई ही है। जगह पर पानी, जगह पर खाना, यहां तक कि कपड़े-लत्ते और किताब, कागज, स्याही, दवात, तक जगह पर ही लेते हैं।

किसी वस्तु अथवा किसी काम के लिए जगह से उठना जानते ही नहीं। यहाँ तक कि कलम पेंसिल तक उसी से बनवाते और फाउंटेनपेन में रोशनाई तक उससे हीं भरवाया करते हैं। इतना ही नहीं इन तुच्छ कामों के लिए भी उन्हें आराम करती हुई अथवा कोई और आवश्यक काम करती हुई पत्नी को उठा देने में जरा भी दया या संकोच नहीं करते। बहुत से बाबू साहबों को तो पत्नी ही कोट-पतलून और टाई-जूते पहनाती है और हर रोज जूते पर पालिश किया करती है।

रसोई और नाश्ते के सम्बन्ध में तो उसे जितना हैरान किया जा सकता है किया जाता है। और यह मुसीबत छुट्टी के दिन तो और भी बढ़ जाती है। जरा यह बनाना, थोड़ा वह भी बना लेना, आज सुबह इसकी चाय है, शाम को उसका भोजन है, बहुत दिन से यह नहीं बना, वह चीज खाये तो कई दिन हो गये- की ऐसी रेल लग जाती है कि बेचारी पत्नी को दिन भर दम मारने और चूल्हें, अंगीठी के पास से उठने की फुरसत नहीं मिलती। आप तो कोच, कुरसी या चारपाई पर पड़ गये और मिनट-मिनट पर तरह-तरह की फरमाइशें चलाने लगे। अपनी इस नवाबी में उन्हें इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहता है कि उनकी इस फैल-सूफी से बेचारी पत्नी की हड्डी-हड्डी टूट जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 26

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सोमवार, 10 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 July 2023

सज्जनोचित परम्परा यही रही है कि यदि किसी के पास अतिरिक्त आय के स्रोत हैं तो उसमें से उपयोग, उपभोग उतना ही करे जितना कि उस समाज के औसत आदमी को उपलब्ध है। शेष को दान के रूप में समाज को वापिस लौटा देना चाहिए। यह प्रथा जब से बंद हुई, लोग लालचवश अधिक संग्रह करने और उसका विलासिता में अधिक उपयोग करने लगे तो समाज अनेक प्रकार के विप्लव, उपद्रव खड़े हो गये।

चाहे साम्यवादी पद्धति से मनुष्य को बलात् विवश किया जाय कि वह आवश्यकतानुसार लेने और सामर्थ्यानुसार काम करने की सर्वोपयोगी विधि व्यवस्था का पालन करे, चाहे आध्यात्मवादी अपरिग्रही आदर्श स्वेच्छा पूर्वक अपनाने की सादगी का देश के सामान्य नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए जो बचे उसे बिना किसी अहंकार या विज्ञापन के विशुद्ध कर्त्तव्य बुद्धि से समाज को दान रूप में लौटा दे-पद्धति कोई भी क्यों न हो दोनों का निष्कर्ष एक है।

ब्राह्मण-ब्राह्मण के बीच ऊँच-नीच है और अछूट-अछूत के के बीच छूआछात है। आदमी-आदमी के बीच छोटाई-बड़ाई हो सकती है, पर उसका आधार गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा, सदाचार, परमार्थ जैसी उत्कृष्टताएँ होनी चाहिए। किसी को नीच तो माना जा सकता है, पर उसका कारण उसकी दुष्टता, दुबुर्दि ही होनी चाहिए। जन्म, जाति, वंश के रूप में सभी ब्रह्माजी के पुत्र, मनु की संतान हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहयोग और सहिष्णुता (अन्तिम भाग)

यह आवश्यक नहीं कि हमारे सभी विचार ठीक ही हों, हमारी मान्यता, धारणा, एवं आकांक्षा हमारे लिए ठीक हो सकती है पर यह आवश्यक नहीं कि दूसरों को भी उन्हें मानने के लिए बाध्य किया जाय। अनेक दार्शनिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मतभेद प्रायः ऐसे होते हैं जिनमें दोनों ही पथ भ्रान्त पाये जाते है। इनके सम्बन्ध में हमें अधिक सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए। कुछ विरोध ऐसे हैं जिन्हें अपराध कहते हैं, जिनके लिए राजदंड की व्यवस्था है। चोरी, हत्या, लूट, छल, दुराचार आदि अनैतिक कर्मों के लिए अवश्य ही प्रबल विरोध किया जाना चाहिए, उसमें जरा भी सहिष्णुता की जरूरत नहीं है परन्तु स्मरण रहे वह ‘प्रबल विरोध’ ऐसा नहीं जो उलटे हमें ही अपराधी बना दे। दण्ड देने योग्य विवेक हर एक में नहीं होता, खास तौर से जिसका अपराध किया है उसमें तो बिलकुल ही नहीं होता, इसलिए दण्ड के लिए उदार, विवेकवान न्यायप्रिय एवं निष्पक्ष व्यक्ति को ही पंच चुनना चाहिए। न्यायालयों और न्यायाधीशों की स्थापना इसी आधार पर हुई है।

संसार में कोई भी दो मनुष्य एक सी आकृति के नहीं मिलते। प्रभु की रचना ऐसी ही है कि हर मनुष्य की आकृति में कुछ न कुछ अन्तर रखा गया है। आकृति की भाँति विचारों, विश्वासों और स्वभावों में भी अन्तर होता है। जैसे विभिन्न आकृतियों के मनुष्य एक साथ प्रेमपूर्वक रह सकते हैं वैसे ही विभिन्न मनोभूमियों के मनुष्यों को भी एक साथ रहने में, प्रेम पूर्वक सुसम्बन्ध बनाये रहने में कोई अड़चन न होनी चाहिए। समाज की सुख-शान्ति, एकता और उन्नति इसी सहिष्णुता पर निर्भर है। असहिष्णुता लोगों का समाज, सदा कलह और संघर्षों से जर्जर होता रहता है वह किसी भी दृष्टि से कोई उन्नति नहीं कर पाता।

गायत्री माता की गोद में चढ़ना, उसका प्रिय पुत्र बनना निश्चय ही हमारे लिए अतीव आनन्ददायक एवं कल्याणकारक सिद्ध होता है। माता उन्हीं लोगों को अपना स्नेह भाजन बनाती है जो उसकी आज्ञा मानते है उसकी व्यवस्था पर आस्था रखते हैं। गायत्री की जो 24 आज्ञाएँ हमारे लिए निर्धारित हैं वे इस महामन्त्र के 24 अक्षरों में सन्निहित है। ‘गो’ शब्द द्वारा माता की आज्ञा यह है कि हम छल की कायरता का परित्याग करें और सहिष्णुता एवं उदारता के साथ जनसमाज में मधुर सम्बन्ध स्थापित करते हुए शान्तिमय जीवन का निर्माण करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 3


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शनिवार, 8 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 July 2023

युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को अपनी उदारता का स्तर और आगे बढ़ाना चाहिए। दस पैसा रोज और एक घंआ समय आरंभिक प्रतीक पूजा थी। अभ्यास के रूप में इतना छोटा ही श्रीगणेश कराया गया था, वह अंतिम नहीं न्यूनतम था। गुजारा भर कर पाने वालों को भी महीने में एक दिन की कमाई देनी चाहिए, ताकि उनके बदले में एक कार्यकर्त्ता उसकी रोटी खोकर सर्वग्राही असुरता से लड़ने के लिए खड़ा रह सके।

वर्ग भेद उत्पन्न करने वाली हर प्रवृत्ति को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। जाति, वर्ण, भाषा, देश, धर्म, संस्कृति आदि के नाम पर इतने विभेद पिछले दिनों खड़े कर दिये गये हैं कि उनने न केवल आदमी-आदमी के बीच खाई खोदी है, वरन् परस्पर एक दूसरे को बिराना, अपरिचित, विरोधी और शत्रु भी बना दिया है। जब तक यह दीवारें गिराई नहीं जायेंगी, प्रथकतावादी संकीर्णता के रक्त-रंजित पंजे मनुष्य की छाती में गढ़े ही रहेंगे।

यदि हमें मानवी एकता का लक्ष्य प्राप्त करना है और ज्ञान की परिधि को विश्वव्यापी बनाना है, तो एक विश्व-भाषा बनाये बिना काम चल ही नहीं सकता। आरंभ में एक क्षेत्रीय भाषा इस प्रकार से भी  रह सकती है पर उन दोनों को ही सीखना अनिवार्य होना चाहिए। पीछे क्षेत्रीय भाषाओं का झंझट मिटाया जा सकता है और दुहरा वजन ढोने से इनकार भी किया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 3)

विवाह के समय देवता और पंचों को साक्षी देकर लोग यह धर्म प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस नारी के जीवन का सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेते हैं। जैसे बालक का सारा उत्तरदायित्व उसकी माता पर होता है, माता अपने बच्चे से काम लेती है, डाँटती-फटकारती भी हैं परन्तु उससे भी पहले उसके हृदय में अनन्त करुणा, आत्मीयता, ममता और क्षमा का समुद्र लहराता होता है। जिस माता के हृदय में वात्सल्य, क्षमा, ममता और करुणा की भावना न हो केवल बच्चे से अपना फायदा उठाने की, उसे गुलाम की तरह वशवर्ती रखने की वृत्ति हो वह माता शब्द को अलंकित ही करेगी। इसी प्रकार जो लोग देवताओं और मन्त्रों की साक्षी में अपनी धर्मपत्नी को माता, पिता, भाई बहिन सबसे छुड़ाकर उनके स्नेह एवं उत्तरदायित्वों की पूर्ति अपने ऊपर लेते हैं उन्हें उचित है कि जीवन भर उस विवाह की प्रतिज्ञा को निबाहें, परन्तु देखा जाता है कि स्त्री को थोड़ी सी नासमझी का उसे इतना भारी दण्ड दिया जाता है जिसे देखकर न्याय की आत्मा भी काँप जाती है। पतियों द्वारा पत्नी की हत्या या परित्याग में प्रायः ऐसा ही कायर विश्वासघात भरा होता है।

वासना और धन का लोभी मनुष्य न्याय मार्ग से जब अपनी लोलुपता को पूरा नहीं कर पाता तो अनेक अनैतिक, छल पूर्ण मार्ग अपना कर अपना स्वार्थ साधन करता है। गायत्री माता इस कुमार्ग पर चलने से अपने प्रिय पुत्रों को रोकती है। ‘गो’ अक्षर का संदेश है कि हम विश्वासघाती न बनें। अपने धर्म, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को निबाहें। सचाई के मार्ग पर चलने से यदि कुछ असुविधाएं भी सहनी पड़ें तो उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सहना चाहिए। इस प्रकार जो सत्य के मार्ग पर चलने में असुविधाओं का स्वागत करने को भी तैयार रहते हैं वे ही गायत्री माता के सच्चे प्रेम पात्र बन सकते हैं।

‘गो’ शब्द के अंतर्गत गायत्री माता की दूसरी शिक्षा यह है कि—हम सहिष्णु बनें। किसी की जरा सी गलती पर आग बबूला हो जाना या किसी से थोड़ा सा मतभेद होने पर उसे जानी दुश्मन मान लेना बहुत संकुचित विचार है। संसार में कोई भी पूर्णतया निर्दोष, या निष्पाप नहीं है, हर मनुष्य अपूर्ण है उसमें कुछ न कुछ दोष बुराई या कमी अवश्य रहती है। थोड़ी सी कमी के लिए उसे पूर्ण त्याज्य समझ लेना ठीक नहीं। दूसरों ही अच्छाइयों का समुचित उपयोग करना चाहिए, उन्हें बढ़ाना चाहिए, त्रुटियों को सुधारने या घटाने का प्रयत्न करना चाहिए, परन्तु इसके लिए अधीर नहीं होना चाहिए। सहिष्णुता और धैर्यपूर्वक कामचलाऊ सहयोग का मार्ग निकाल लेना चाहिए और आततायी रीति से नहीं वरन् मधुर, सुव्यवस्थित एवं न्यायोचित मार्ग से प्रतिकूलता को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 3


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शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 2)

संसार में सभी प्रकार के मनुष्य हैं। मूर्ख-विद्वान, रोगी-स्वस्थ, पापी-पुण्यात्मा, कायर-वीर, कटुवादी नम्र, चोर-ईमानदार, निन्दनीय-आदरास्पद, स्वधर्मी-विधर्मी, दया पात्र-दंडनीय, शुष्क-सरस, भोगी-त्यागी आदि परस्पर विरोधी स्थितियों के मनुष्य भरे पड़े हैं। उनकी स्थिति को देखकर तदनुसार उनसे भाषण, व्यवहार एवं सहयोग करें। उनकी स्थिति के आधार पर ही उन के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करें।

कपट और असहिष्णुता यह दो बहुत बड़े पातक हैं। इन दोनों से बचने के लिए गायत्री के ‘गो’ अक्षर में निर्देश किया गया है। धोखा, विश्वासघात, छल, ढोंग, पाखण्ड यह मनुष्यता को कलंकित करने वाली सबसे निकृष्ट कोटि की कायरता एवं कमजोरी है। जिसको हम बुरा समझते हैं उससे लड़ाई रखें तो इतना हर्ज नहीं, परन्तु मित्र बनकर, मिले रहकर, मीठी-मीठी बातों से धोखे में रखकर उसका अनर्थ कर डालने में जो पाप है वह निष्कृष्ट कोटि का है। अनेक व्यक्ति ऊपर से मिले रहते हैं, हितैषी बनते हैं और भीतर ही भीतर छुरी चलाते हैं। बाहर से मित्र बनते हैं भीतर से शत्रु का काम करते हैं। विश्वास देते हैं कि हम तुम्हारे प्रति इस प्रकार का व्यवहार करेंगे परन्तु पीछे अपने वचन को भंग करके उसके विपरीत कार्य कर डालते हैं।

आजकल मनुष्य बड़ा कायर हो गया है। उसकी दुष्टता अब मैदानी लड़ाई में दृष्टिगोचर नहीं होती। प्राचीन काल में लोग जिनसे द्वेष करते थे, जिसका अहित करना चाहते थे, उसे पूर्व चेतावनी देकर मैदान में लड़ते निपटते थे। पर आज तो वीरता का दर्शन दुर्लभ हो रहा है। विश्वास दिलाकर, मित्र बनकर, बहका-फुसलाकर, किसी को अपने चंगुल में फँसा लेना और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उसके प्राणों तक का ग्राहक बन जाना, आज का एक व्यापक रिवाज हो गया है। जिधर दृष्टि उठाकर देखिए उधर ही छल, कपट, धोखा, विश्वासघात का बोल बाला दीखता है। गायत्री कहती है कि यह आत्मिक कायरता, मनुष्यता के पतन का निकृष्टतम चिन्ह है। इससे ऊपर उठे बिना कोई व्यक्ति ‘सच्चा मनुष्य’ नहीं कहला सकता।

किसी की धरोहर मार लेना, विष खिला देना, पहले से कोई वचन देकर समय पर उसे तोड़ देना, असली बताकर नकली चीज देना, मित्र बनकर शत्रुता के काम करना, यह बातें मनुष्यता के नाम पर कलंक हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 2


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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 July 2023

सही को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही युग निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूँजी है, जिसके आधार पर वे युग साधना की वेला में ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व का सही रीति से निर्वाह कर सकेंगे। ऐसी क्षमता पैदा करना हमारे लिए उचित भी है और आवश्यक भी।

युग परिवर्तन का अर्थ है- व्यक्ति परिवर्तन और यह महान् प्रक्रिया अपने से आरंभ होकर दूसरों पर प्रतिध्वनित होती है। यह तथ्य हमें हजार बार मान लेना चाहिए और उसे कूट-कूट कर नस-नस में भर लेना चाहिए कि दुनिया को पलटना जिस उपकरण के माध्यम से किया जा सकता है, वह अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही है।

युग निर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन को निरन्तर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भारत के औसत नागरिक के स्तर से वह अपने ऊपर अधिक खर्च तो नहीं करता? यदि करता है तो आत्मा की, न्याय की, कर्त्तव्य की पुकार सुननी चाहिए और उस अतिरिक्त खर्च को तुरन्त घटना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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