हरिकथा का श्रवण भी है भक्ति का ही रूप
भावनाएँ अंतर्लीन-भगवन्लीन थीं, भक्तिरस से भीगे हृदय निस्तब्ध बने रहे। जिसने कहा और जिन्होंने सुना, सभी गहन भावसमाधि में खोये थे। तभी अचानक सभी ने अपने अन्तराकाश में एक साथ दिव्य स्पन्दनों की अनुभूति पायी। बड़े ही अनोखे एवं मधुर थे ये स्पन्दन। हिमवान के आँगन में उपस्थित सभी देवों, ऋषियों, सिद्धों-संतों के अस्तित्व में रोमांच हो आया। इस रोमांच के अतिरेक में सभी की अंतश्चेतना के बहिर्द्वार खुल गये। सभी ने निहारा, बाहर की झाँकी कम सुमनोहर न थी। हिमवान के महाशैलशिखर सजग प्रहरियों की भाँति अडिग थे। वातावरण में हिम पक्षियों की कलरव ध्वनि मंत्रगान की तरह गूँज रही थी। एक दिव्य सुवास वहाँ अनायास ही बिखर रही थी। सभी वहाँ एक अलौकिक अवतरण का संकेत पा रहे थे।
कुछ ही क्षणों में इस दिव्यता का सघन स्वरूप सबके नेत्रों में उद्भासित हो आया। सबने देखा कि महामुनि शुकदेव ज्योतिर्मय साकार भक्तितत्त्व बनकर प्रकट हुए हैं। श्रीमद्भागवत कथा के प्रवक्ता शुकदेव। महर्षि वेदव्यास के वीतराग पुत्र शुकदेव। भक्ति के सघन-साकार विग्रह शुकदेव। उनकी इस उपस्थिति में सभी ने अपनी आध्यात्मिक चेतना में नवांकुरण अनुभव किया। शुकदेव ने भी सप्तर्षियों सहित सभी ऋषियों, सिद्धों, देवों की अभ्यर्थना की। इन सभी ने भी इनकी उपस्थिति से स्वयं को कृतार्थ माना, क्योंकि सभी इस सत्य से अवगत थे कि शुकदेव भक्ति की दुर्लभ विभूति हैं। जो इनके पास है वह अन्य कहीं नहीं है।
इस नयी उपस्थिति के साथ सभी को भक्ति के नवीन सूत्र की जिज्ञासा भी हो आयी। महर्षि मरीचि एवं मेघातिथि ने लगभग एक साथ ही देवर्षि की ओर देखा। हालाँकि देवर्षि स्वयं अभी तक शुकदेव की ओर देख रहे थे। उनकी यह एकटक एकाग्रता इन महर्षियों की दृष्टि से विच्छिन्न हुई। उन्हें आत्मचेत हो आया और उन्होंने ऋषि समुदाय की ओर निहारा। उन्हें इस तरह निहारते देख महर्षियों में श्रेष्ठ पुलह ने कहा-‘‘भक्ति के नवीन सूत्र को प्रकट करें देवर्षि!’’ ‘‘हे महर्षि आपका आदेश शिरोधार्य है। अब मैं भक्ति के विषय में ऋषि गर्ग के मत को प्रकट करता हूँ। यही मेरा अगला सूत्र है-
‘कथादिष्वति गर्गः’॥ १७॥
गर्गाचार्य के मत से भगवान की कथा में अनुराग भक्ति है।
जो भगवान की कथा सुनता है, अहोभाव से सुनता है, विभोर होकर सुनता है, अपने को मिटाकर सुनता है, वह स्वाभाविक भक्ति के तत्त्व को अनुभव कर पाता है।’’
इस सूत्र को कहने के साथ देवर्षि नारद ने फिर से एक बार परम वीतरागी मुनि शुकदेव को देखा और ऋषियों को सम्बोधित करते हुए कहा-‘‘श्रेष्ठ यही होगा कि इस सूत्र की व्याख्या भागवत कथा के परम आचार्य शुकदेव करें।’’ सभी ने देवर्षि के इस कथन को स्वीकारा और शुकदेव के पवित्र आभा से प्रदीप्त मुख की ओर देखा। शुकदेव के होंठों पर बड़ी ही सुख प्रदायी स्मित रेखा झलकी और वे बोले- ‘‘आपका आदेश मुझे शिरोधार्य है।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७४





















