रविवार, 14 अक्टूबर 2018

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 1)

🔶 डॉ. बारमस रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) की बीमारी पर एक शोध−कार्य चला रहे थे। अनेक रोगियों का अध्ययन करते समय उन्होंने जो एक सामान्य बात पाई वह यह थी कि रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) के अधिकाँश बीमार लोग माँसाहारी थे। उनके मस्तिष्क में एक विचार उठा कि कहीं माँसाहार ही तो रक्तचाप का कारण नहीं है, यदि है तो किन परिस्थितियों में? इस प्रश्न के समाधान के लिये उन्होंने प्रयोग की दिशायें ही बदल दीं। अब वे माँसाहार से होने वाले शरीर पर प्रभाव का अध्ययन करने लगे। उनके प्रयोग और निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुये दूसरे वैज्ञानिकों ने भी माना कि माँसाहार केवल शरीर ही नहीं, मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। दोनों पर उसकी प्रतिक्रिया दूषित और अस्वाभाविक होती है।

🔷 कई माँसाहारी जीवों को कुछ दिन के लिये माँस देना बिलकुल बन्द कर दिया गया। इस अवधि में निर्वाह के लिये उन्हें घास, सब्जी और फल खाने को दिये गये। देखा गया कि ऐसा करने से कुछ दिन में ही इन जानवरों का उतावलापन मन्द पड़ गया, वे काफी शान्त रहने लगे, कम हिंसक हो चले।

🔶 एक दूसरे कमरे में कुछ शाकाहारी जीवों को रखकर उन्हें माँसाहार के लिये विवश किया गया। उनमें से कुछ ऐसे थे, जिन्होंने तो आमरण अनशन ही कर दिया, उन्होंने माँस को सूँघा तक नहीं। अन्त में परीक्षण के लिये उन्हें अम्लीय (एसिडिक) आहार दिया गया। इससे उन पर बड़े दूषित प्रभाव दिखाई दिये, उनकी पाचन क्रिया अवरुद्ध हो गई और कई तरह के रोगों ने घेर लिया। उनमें अधिक स्वार्थपरता आ गई, उनका सौम्य स्वभाव नष्ट हो गया, वे गुर्राने और काटने तक लगे। पहले उनके पास जाने में उन्हें कोई भय नहीं लगता था। वे सकरुण आँखों से देखते रहते थे। पर इस तरह के प्रयोग के बाद उनमें संशयशीलता की मात्रा एकाएक बहुत अधिक हो गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.26

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

देवताओं के गायत्री मन्त्र

🔷 अनेक कष्टो से मनुष्य की रक्षा करती है गायत्री मंत्र।
भूत प्रेत, चोर डाकू, राज कोप, आशंका, भय, अकाल मृत्यु, रोग और अनेक प्रकार की बाधाओं का निवारण करके मनुष्य को सदैव तेजश्वी बनाय रखता है।
इन मंत्रों को प्रतिदिन जपकर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य प्राप्ति की जा शक्ति है।

🔶 १. गणेश गायत्री:- यह समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण करने में सक्षम है
ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।

🔷 २. नृसिंह गायत्री:- यह मंत्र पुरषार्थ एवं पराक्रम की बृद्धि होती है।
ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।

🔶 ३. विष्णु गायत्री:- यह पारिवारिक कलह को समाप्त करता है।
ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।

🔷 ४. शिव गायत्री:- यह कल्याण करने में अदूतीय है।
ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

🔶 ५. कृष्ण गायत्री:- यह मंत्र कर्म क्षेत्र की सफलता हेतु इसका जप आवश्यक है।
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।

🔷 ६. राधा गायत्री:- यह मंत्र प्रेम का अभाव दूर होकर, पूर्णता को पहुचता है।
ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।

🔶 ७. लक्ष्मी गायत्री:- यह मंत्र पद प्रतिष्ठा, यश ऐश्वर्य और धन Sसम्पति की प्राप्ति होती है।
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

🔷 ८. अग्नि गायत्री:- यह मंत्र इंद्रियों की तेजस्विता बढ़ती है।
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।

🔶 ९. इन्द्र गायत्री:- यह मंत्र दुश्मनों है हमले से बचाता है।
ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १०. सरस्वती गायत्री:- यह मंत्र ज्ञान बुद्धि की वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।
ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।

🔶 ११. दुर्गा गायत्री:- यह मंत्र से दुखः और पीड़ानही रहती है।शत्रु नाश, विघ्नों पर विजय मिलती है।
ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

🔷 १२. हनुमान गायत्री:- यह मंत्र कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत होती हैं।
ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।  तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।

🔶 १३. पृथ्वी गायत्री:- यह मंत्र दृढ़ता, धैर्य और सहिष्णुता की वृद्धि होती है।
ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।

🔷 १४. सूर्य गायत्री:- यह मंत्र शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि। तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।

🔶 १५. राम गायत्री:- यह मंत्र इससे मान प्रतिष्ठा बढती है।
ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात्।

🔷 १६. सीता गायत्री:- यह मंत्र तप की शक्ति में वृद्धि होती है।
ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्।

🔶 १७. चन्द्र गायत्री:- यह मंत्र निराशा से मुक्ति मिलती है और मानसिकता प्रवल होती है।
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १८. यम गायत्री:- यह मंत्र इससे मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि। तन्नो यम: प्रचोदयात्।

🔶 १९. ब्रह्मा गायत्री:- यह मंत्र व्यापारिक संकटो को दूर करता है।
ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

🔷 २०. वरुण गायत्री:- यह मंत्र प्रेम भावना जागृत होती है, भावनाओ का उदय होता हैं।
ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात्।

🔶 २१. नारायण गायत्री:- यह मंत्र प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता है।
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो नारायण: प्रचोदयात्।

🔷 २२. हयग्रीव गायत्री:- यह मंत्र समस्त भयो का नाश होता है।
ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात्।

🔶 २३. हंस गायत्री:- यह मंत्र विवेक शक्ति का विकाश होता है,बुद्धि प्रखर होती है।
ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।

🔷 २४. तुलसी गायत्री:- परमार्थ भावना की उत्त्पति होती है।
ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।

🔶 गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल प्राप्त होता है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है। इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है।

🔷 गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में क्या कहा जाए। ब्रह्म की जितनी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं। वेदमाता गायत्री से यही विनम्र प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करें।

आज का सद्चिंतन 13 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 24)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 किन्तु जो काम बन पड़ा है, उसकी तुलना में हजार-लाख गुना और करने के लिए पड़ा है। वह अदृश्य जगत से सम्बन्धित एवं सूक्ष्म स्तर का भी है। उसकी जड़ें चेतना क्षेत्र के सूक्ष्म जगत में असाधारण गहराई में घुसी हुई हैं। प्रस्तुत विकृतियाँ भी अभूतपूर्व हैं। जो बदलाव, परिष्कार प्रस्तुत किया जाना है, वह भी ऐसा है जिसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।
  
🔶 भूतकाल में भी अनीति का उन्मूलन और नीति का संस्थापन बराबर होता रहा है, पर वह परिवर्तन रहे क्षेत्र स्तर के ही हैं। भूतकाल में साधनों और वाहनों के अभाव में दुनियाँ इतनी निकट नहीं आई थी कि समस्त संसार को एक गाँव-कस्बे की तरह आँका जा सके और प्रगति और अवगति की समस्याएँ समस्त विश्व को थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ एक ही स्तर पर प्रभावित करें। इसलिए अपने समय का व्यापक परिवर्तन इतने स्तर का, इतना उलझा हुआ एवं इतना विस्तृत है कि उसे अब तक के सुधार-परिवर्तनों की तुलना में अद्भुत, अनुपम एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। इसके लिए प्रयत्न भी हल्के-फुल्के करने से काम नहीं चलेगा, वरन वह इतने प्रबल, इतने प्रचण्ड, इतने सशक्त और इतने व्यापक होने चाहिए; जिन्हें असाधारण ही कहा जा सके।
  
🔷 विज्ञान के पक्षधरों ने दुनियाँ को अधिक सुखद बनाने के लिए परिकल्पनाएँ कम नहीं की हैं। उन्होंने असाधारण ढाँचे खड़े करने और अद्भुत प्रयोग करने, साधन जुटाने के लिए कम माथा-पच्ची नहीं की है, पर उन सबमें एक ही कमी रही है कि वे भौतिक परिप्रेक्ष्य में भौतिक उपचारों से ही सुधार लाने की बात पर विश्वास करते हैं। आकाश पर कब्जा कर लेने, समुद्र क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेने, प्रकृति-सम्पदाओं में से और भी अधिक छीन लेने, अनुपयुक्त को नष्ट करने वाले उपकरण ढूँढ़ने, सम्पदा-संवर्धन के नए स्रोत खोज निकालने जैसी योजनाएँ ही बन रही हैं, जिन्हें इक्कीसवीं सदी की समुन्नत योजनाएँ कहा जाता है। लोग कुछ स्तर तक विश्वास भी करते हैं कि भौतिक विज्ञान अति समर्थ है। उसने अब तक एक से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्रस्तुत की हैं और अपने आविष्कारों से जादू लोक जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं तो भविष्य के लिए उसकी जो योजनाएँ हैं, अवधारणाएँ हैं, वे क्यों पूर्ण न होंगी?

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 26

👉 सत्य के लिए सर्वस्व त्याग

🔷 यदि मेरी मित्रतायें मेरा साथ नहीं देतीं तो न दें। प्रेम मुझे छोड़ देता है तो छोड़ दे। मेरा तो एक ही आग्रह है कि मैं उस सत्य के प्रति सच्ची रह सकूँ, जिसकी सेवा और परिपालन के लिये, मैंने अपनी इच्छाओं का, वैभव विलास से परिपूर्ण पाश्चात्य जीव−पद्धति तक का बहिष्कार कर दिया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अन्तिम बूँद और अन्तिम श्वास विद्यमान है, मैं एकमेव सत्य की प्राप्ति के हित तिल−तिल जलती रहूँगी। सत्य ही तो मनुष्य जीवन का सार है।

🔶 यदि वह सत्य मुझ से रेगिस्तान में चलने को कहेगा तो मैं उसके पीछे−पीछे जाऊँगी, मुझे उसे प्राप्त करने के लिये पर्वतों पर चढ़ना पड़ा, समुद्र की थाह लेनी पड़ी तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगी। उसने माँग की मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ तो मुझे वह भी स्वीकार होगा पर सत्य का आश्रय मैं छोड़ नहीं सकती। मैं तो सत्य से चिपकी रहूँगी, भले ही मुझे यह दिखाई दे कि मुझे अपना कहने वाला भी कोई नहीं रहा। मेरी हार्दिक कामना है कि जब मैं मरूँ और मेरी समाधि बनाई जाये तो उस पर लिखा जाये—“उसने सब कुछ छोड़कर भी सत्य के पीछे चलने का प्रयत्न किया।”

✍🏻 एनी बेसेंट
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 1

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 23)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 १९५८ के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ के सफल प्रयोग परीक्षण ने अपनी श्रद्धा-विश्वास असंख्य गुना बढ़ा दिया और बाद में निर्देशित हुए कामों का सिलसिला चल पड़ा, जिनका कि उल्लेख पहले भी हो चुका है। साहित्य सृजन, संगठन, केन्द्रों की खर्चीली व्यवस्था, अभावग्रस्तों की सहायता जैसे काम इस प्रकार चलते रहे, मानो वे सभी कार्य किसी दूसरे ने किए हों और अपने सिर पर श्रेय अनायास ही लद गया हो। यह वैयक्तिक सफलता का प्रसंग नहीं माना जाना चाहिए कि यह किसी के पुरुषार्थ का प्रतिफल सामने आया, वरन् यह समझा जाना चाहिए कि भक्ति के साथ शक्ति का भी अविच्छिन्न सामंजस्य हैं। निर्देशक शक्ति अपने संकेतों पर चलने वाले समर्पित व्यक्ति के लिए वैसी ही व्यवस्था भी करती है, जैसी कि मोर्चे पर लड़ने जाने वाले सैनिक के लिए आवश्यक सुविधा सामग्री का प्रबन्ध सेनापति या रक्षा विभाग द्वारा किया जाता है।
  
🔶 वैयक्तिक प्रयास से बन पड़ने में जिन्हें संभव समझा जा सकता है, उन छिटपुट कामों को संपन्न करने के उपरांत निर्देशक ने अपनी कठपुतली में इतनी क्षमता भर दी कि वह संकेतों के इशारे भर से मनमोहक नृत्य अभिनय कर सके। इतना बन पड़ने के उपरान्त वह भारी वजन लादा गया, जिसे सम्पन्न करने की कोई व्यक्ति विशेष कल्पना तक नहीं कर सकता, जिसे वह अदृश्य सत्ता ही कर सकती है, जिसने इतना बड़ा पसारा बनाकर खड़ा किया है और जो मनुष्य को एक सीमा तक नटखटपन बरतने तक की छूट देने के उपरांत जब देखती है कि उद्दण्डता मर्यादा से बाहर जा रही है, तब उसके कान पकड़कर सीधी राह अपनाने के लिए बाधित ही नहीं, प्रताड़ित भी कर सकती है। इसी को युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। यही है इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना, महाक्रान्ति की अभूतपूर्व परियोजना।
  
🔷 प्रस्तुत प्रयोजन के लिए जितना कुछ दृश्य रूप में मानवी प्रयत्नों के अन्तर्गत सम्भव था, उसे युग निर्माण योजना के अन्तर्गत पिछले कई वर्षों से किया जाता रहा है। उसमें जो सफलता मिली है, वह लगभग इसी स्तर की मानी जा सकती है जितनी की मानवी पुरुषार्थ के अंतर्गत आने की परिकल्पना की जा सकती है। मानवी पुरुषार्थ और साधना के समन्वय से संसार के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा बन पड़ा है, जिसे असाधारण भी कहा जा सकता है और आश्चर्यजनक भी। इसी आधार पर मिशन के दृश्य प्रयास जिस प्रकार बन पड़े हैं और उसके प्रतिफल जिस प्रकार के सामने आए, उन्हीं में इन्हें भी एक गिना जा सकता है।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 25

👉 सद्गुरु का स्मरण

🔷 राजगृह नगर प्रायः भगवान् तथागत के श्री चरणों के स्पर्श से पावन होता रहता था। नगरवासियों में भगवान् के प्रति सहज प्रीति थी। वे सब उठते, बैठते एक-दूसरे से मिलने पर ‘नमो बुद्धस्स’ कहकर तथागत का स्मरण कर लेते थे। इस नगर में दो बालकों की मित्रता बड़ी चर्चित थी। सुवीर और सुयश यही नाम थे उनके। किशोरवय के ये दोनों बालक भाँति-भाँति के खेल-खेला करते। अचरज की बात यह थी सुयश हमेशा जीतता था और सुवीर हमेशा हार जाता। इसमें सबसे अचरज तो इस बात का था कि जो सदा जीतता था, वह हारने वाले से सभी दृष्टियों से कमजोर था।

🔶 सुवीर ने अपने जीतने के लिए सभी उपाय किये। खेलने का ज्यादा अभ्यास किया, परन्तु सफलता न मिली। लेकिन परिणाम पहले की ही भाँति बना रहा। सुवीर को इस बात की भारी चिन्ता था कि आखिरकार सुयश के लगातार जीतने का कारण क्या है? हाँ एक बात सुयश में बड़े ही साफ तौर पर नजर आती थी, कि वह आश्चर्यजनक ढंग से शान्त रहता था। उसमें जीत के लिए कभी कोई आतुरता नहीं झलकती थी। उसमें जीतने के लिए कभी कोई आग्रह नहीं था। वह बस खेलता था, सम्पूर्ण मनोयोग से किन्तु अनाग्रह से।

🔷 कोई फलाकाँक्षा नहीं थी उसमें। इसे देखकर ऐसा लगता था, जैसे वह अपने आप में केन्द्रित है, स्वयं में ठहरा हुआ है। उसमें एक अनोखी गहराई थी। वह ओछा नहीं था, न ही उसमें कोई छिछलापन था। उसके अंतस् में जैसे कोई लौ निष्कम्प जलती थी। उसके चारों ओर एक प्रसादपूर्ण प्रभामण्डल था। शायद इसीलिए बार-बार हारने पर भी सुवीर उसका शत्रु न बन पाया था। उसकी मित्रता कायम थी। सुयश चाहे जितनी बार जीतता, परन्तु उसमें कभी कोई अहंता न आती थी। जीतना जैसे उसके लिए कुछ खास था ही नहीं। खेलना ही उसके लिए सब कुछ था, फिर जीतें या हारें, इससे उसको कोई प्रयोजन नहीं था। फिर भी वह जीतता था।

🔶 सुवीर, सुयश के प्रत्येक व्यवहार को बारीकी से देखता था। इस क्रम में उसने देखा कि सुयश प्रत्येक खेल शुरू करने से पहले आँख बन्द करके एक क्षण को निस्तब्ध हो जाता था। कुछ इस तरह जैसे कि सारा संसार रुक गया हो। हाँ वह अपने होठों में जरूर कुछ बुदबुदाता था। जैसे कि वह कोई प्रार्थना कर रहा हो या कि फिर कोई मंत्रोच्चार करता हो अथवा अपने ईष्ट का स्मरण कर रहा हो।

🔷 अन्ततः एक दिन सुवीर ने सुयश से यह रहस्य पूछा- प्रिय मित्र, तुम खेल शुरू करने से पहले यह क्या करते हो? हर खेल शुरू होने से पहले तुम किस दुनिया में खो जाते हो। सुयश ने कहा- प्रिय मित्र! मैं तो बस भगवान् का स्मरण करता हूँ। ‘नमो बुद्धस्स’ का पाठ करता हूँ। शायद इसीलिए मैं जीत जाता हूँ। परन्तु मुझे हर बार-हर समय यही लगता है कि यह जीत मेरी नहीं, भगवान् की है। मैं नहीं जीत रहा, भगवान् जीत रहे हैं।

🔶 सुयश की बातें सुनकर उस दिन से सुवीर ने भी नमो बुद्धस्स का पाठ शुरू कर दिया। हालाँकि उसे पहले से कोई अभ्यास नहीं था, फिर भी उसे इसमें धीरे-धीरे रस आने लगा। शुरुआत तो तोता रटन्त से ही हुई थी, पर मंत्रोच्चार के परिणाम मन पर दिखाई देने लगे। गहराई में न सही पर सतह पर इसके स्पष्ट फल दिखाई देने लगे। वह थोड़ा शान्त होने लगा। उसकी उच्छृंखलता कम होने लगी। थोड़ा छिछलापन कम होने लगा। उसकी हार की पीड़ा कम होने लगी। जीतने की महत्त्वाकाँक्षा भी थम सी गयी। खेल बस खेलने के लिए है, ऐसा भाव उसमें जागने लगा।

🔷 भगवान् के स्मरण में वह अनजाने ही अपनी अन्तश्चेतना में डूबने लगा। शुरू तो किया था इसलिए कि खेल में जीत जाऊँ। लेकिन धीरे-धीरे जीत-हार की बात ही बिसर गयी। अब तो बस स्मरण में आनन्द बरसने लगा। पहले तो खेल के शुरू-शुरू में याद करता था, पर बाद में जब कभी एकान्त मिल जाता तो बैठकर नमो-बुद्धस्स-नमो बुद्धस्स का जाप करने लगता। यहाँ तक कि कुछ दिन बीतने पर खेल गौण हो गया और जाप प्रमुख हो गया। एक मिश्री सी उसके मुँह में घुलने लगी। सुवीर बुद्ध स्मरण में विभोर होने लगा। नमो बुद्धस्स का जप करते हुए उसे एक खुला आकाश दिखाई पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसकी आकाँक्षाएँ खो गयीं। सब समय एक शान्त धारा उसके भीतर बहने लगी।

🔶 एक दिन वह अपने पिता के साथ लकड़ी काटने के लिए जंगल गया। लौटने पर पिता-पुत्र दोनों ही रास्ते में श्मशान के पास बैलों को खोलकर थोड़ी देर विश्राम के लिए रुके। भरी दोपहरी थी और वे थक गए थे, इसलिए सो गए। जगने पर देखा उनके बैल नगर में चले गए हैं। पिता ने सुवीर से कहा, बेटा! तुम यहीं रुककर गाड़ी और लकड़ी की रखवाली करो, मैं बैलों को लेकर आता हूँ। काफी खोज-बीन करने पर बैल तो मिल गए, पर तब तक सूर्य ढल चुका था। सूर्य ढलने के साथ ही नगर द्वार बन्द हो गया। अमावस की अंधेरी रात, इकलौता पुत्र अकेला श्मशान में। पिता को भारी चिन्ता हुई, पर क्या करे, विवशता ने उसे जकड़ दिया।

🔷 उधर सुवीर अमावस की अंधेरी रात में मरघट में अकेला था। इतना अकेलापन उसे पहली बार मिला था। पर उसे यहाँ डर लगने के बजाय बड़े आनन्द की अनुभूति हुई। वह भक्ति और प्रीति के साथ ‘नमो बुद्धस्स’ का जप करने लगा। जप करते-करते हृदय के तार जुड़ गए, भक्ति की संगीत जम गया, अन्तश्चेतना की वीणा बजने लगी। पहली दफा उसे ध्यान की झलक मिली। धीरे-धीरे वह ध्यान में डूब गया। यह बड़ी गहरी अनुभूति थी। सब तरफ से सुख बरस रहा था, पर शान्ति उसे भिगो रही थी। शरीर सोया था, अन्तर में जागरण का पर्व था। उजियारा ही उजियारा था। जैसे हजार-हजार सूरज एक साथ जग गए। जीवन सब तरफ से प्रकाशित हो गया। जो घटना किसी के लिए अभिशाप बन सकती थी, उसके लिए वरदान बन गयी।

🔶 अमावस की उस रात्रि में महानिशाकाल होते ही श्मशान जाग्रत् हो उठा। ब्रह्मराक्षस, पिशाच, योगिनियाँ, डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी के यूथ वहाँ नृत्य करने लगे। श्मशान का सम्पूर्ण वातावरण भयावह हो गया। परन्तु सुवीर की आत्मचेतना किसी अलौकिक राज्य में निमग्न थी। एक आध्यात्मिक प्रभामण्डल उसे घेरे था। नृत्य कर रही इन सूक्ष्म सत्ताओं ने जब उसकी यह भावदशा देखी, तो उन्होंने अपने को धन्य माना। वे भागे हुए गए और सम्राट के महल से सोने के बर्तनों में भोजन लेकर आए। उन सबने मिलकर उसे भोजन कराया एवं सेवा की। प्रातः होते ही वे सभी सूक्ष्म सत्ताएँ अदृश्य हो गयीं।

🔷 इधर सम्राट के सिपाहियों ने महल के खोये हुए बर्तनों की खोज की। और खोजते हुए उन्होंने सुवीर को पकड़ लिया। बन्दी सुवीर को सम्राट के सामने लाया गया। उन दिनों बिम्बसार का शासन था। वह स्वयं भगवान् तथागत के भक्त थे। उन्होंने सुवीर से सारी बात जाननी चाही। सुवीर ने भी उत्तर में सम्राट बिम्बसार को प्रारम्भ से सारी कथा कह सुनायी। चकित और हतप्रभ सम्राट उस बालक को लेकर भगवान् के पास पहुँचे। भगवान् इन दिनों राजगृह में ही ठहरे हुए थे। सारी बातें सुनकर भगवान् ने कहा- सम्राट! यह बालक ठीक कह रहा है। बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। जब तुम कहते हो ‘नमो बुद्धस्स’ तो तुम अपने ही परम दशा का स्मरण कर रहे हो।

🔶 यह सतह के द्वारा गहराई की पुकार है। यह परिधि के द्वारा केन्द्र का स्मरण है। यह कहते हुए उन्होंने यह धम्म गाथा कही-

🔷 सुप्पबुद्धं पबुज्झति सदा गोतम सावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति॥

🔶 ‘जिनकी स्मृति दिन-रात सदा बुद्ध में लीन रहती है, वे गौतम के शिष्य सदा सुप्रबोध के साथ सोते और जागते हैं।’ भगवान् की इस बात ने सम्राट बिम्बसार को यह बोध दिया कि सद्गुरु के स्मरण से शिष्य सहज ही परम भावदशा को उपलब्ध हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003

👉 आज का सद्चिंतन 11 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 October 2018


👉 आश्विन नवरात्रि:- शक्ति आराधना की है यह वेला

🔷 नवरात्रि शक्ति साधना का पर्व है। वैसे तो माता का प्रेम अपनी संतान पर सदा ही बरसता रहता है, पर कभी-कभी यह प्रेम छलक पड़ता है, तब वह अपनी संतान को सीने से लगाकर अपने प्यार का अहसास कराती है। संरक्षण का आश्वासन देती है। नवरात्रि की समयावधि भी आद्यशक्ति की स्नेहाभिव्यक्ति का ऐसा ही विशिष्ट काल है। यही शक्ति विश्व के कण-कण में विद्यमान है। इसी तथ्य को इंगित करते हुए कहा गया है-

🔶 तेजोयस्य विराजते स बलवान स्थूले बुकः प्रत्ययः। - देवी भागवत्

🔷 अर्थात्- शक्ति व तेज से प्रत्येक स्थूल पदार्थ में विद्यमान अतुलित बलशाली परमेश्वरी हमारी रक्षा और विकास करे।

🔶 वर्षा अपने साथ-साथ हरियाली की छटा लेकर आता है। ग्रीष्म की तपती दोपहरी में वृक्षों की छाया मन को कितना सुकून पहुँचाती है। पर कितने लोग वृक्षों की हरियाली को बनाये रखने में योगदान देते हैं। मनुष्य की दुर्बुद्धि तो क्षणिक लाभ के लिए छाया देने वाली वृक्ष को भी जड़ से काटने पर जुटी हुई है। यही व्यवहार हम उस आद्यशक्ति जगन्माता के साथ कर रहे हैं। परिणाम में हमें उनके प्यार-दुलार के बदले उनका प्रलयंकारी विध्वंस देखने को मिल रहा है। जब पुत्र बार-बार समझाने पर भी नहीं मानता तो माता को अपना रौद्र रूप दिखाने के लिए विवश होना ही पड़ता है। आद्यशक्ति जगन्माता भी इन दिनों हमें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि अब आत्मसुधार एवं सत्कर्म के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।

🔷 उस परम शक्ति की आशा एवं अपेक्षा के अनुरूप स्वयं को गढ़े बिना हमारा त्राण संभव नहीं है। यह पृथ्वी सदाचार पर ही टिकी हुई है। न्याय को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सारा विश्व गणित के समीकरण जैसा है, इसे चाहे जैसा उलटो-पलटो, वह अपना संतुलन बनाए रखता है।

🔶 मनुष्य पर दैवी और आसुरी दोनों ही चेतनाओं का प्रभाव है, वह जिस ओर उन्मुख होगा वैसा ही उसका स्वरूप बनता जाएगा। जड़ता एवं माया में लिप्त होते चलने पर वह अधोगति का अधिकारी होता है और पाप, पतन और नर्क की दुर्गति में गिर जाता है। परन्तु यदि वह अपनी मूल प्रकृति सदाचार का निर्वाह करे तो बंधन से मुक्ति निश्चित है। फिर उसे पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। आवश्यकता अपना सही स्वरूप जानने भर की है।

🔷 इसके लिए प्रयास करने का सबसे उपयुक्त समय यही है। शास्त्रकारों से लेकर ऋषि-मनीषियों सभी ने एकमत होकर शारदीय नवरात्रि की महिमा का गुणगान किया है। सामान्यतः गायत्री परिवार से जुड़ा प्रत्येक साधक इस समयावधि में गायत्री महामंत्र के 24 हजार का लघु अनुष्ठान अवश्य ही करता है। अनुष्ठान की विधि-व्यवस्था से भी परिजन अपरिचित नहीं हैं। वैसे इसे गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग से पढ़कर भी जाना जा सकता है। जप के लिए गायत्री महामंत्र से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। इसे गुरुमंत्र भी कहा गया है। यह महामंत्र बाह्य परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के साथ-साथ अन्तः चेतना के परिष्कार के लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप में इन थोड़े से अक्षरों में विद्यमान है। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें गायत्री महामंत्र के जप को प्रथम स्थान दिया गया है।

🔶 इस बार हमारी साधना बाह्य जड़ता को दूर करने तक ही सीमित न हो। हम अपनी आँतरिक जड़ता को मिटाने का प्रयास करें। व्यर्थ के ईर्ष्या, द्वेष, प्रपंच में निमग्न मन की गतिविधियों को ‘स्व’ की ओर उन्मुख करें। क्योंकि जो जड़ पदार्थों से अधिक प्रेम करेगा, उसे उनका स्वामित्व, संग्रह, उपभोग भी उतना ही उच्चतर लगेगा। मोह और अहंकार के पाश में वे उतनी ही दृढ़ता से बंधेंगे। निर्जीव जड़ पदार्थों से जड़ता ही बढ़ेगी।

🔷 नवरात्रि के पावन पर्व पर देवता अनुदान-वरदान देने के लिए स्वयं लालायित रहते हैं। ऐसे दुर्लभ समय का उपयोग हम जड़ता में अनुरक्त होकर न बिताएँ, चेतना के करीब जाएँ। ईश्वर चेतन है इसीलिए उसका अंश जीव भी चैतन्य स्वरूप है। साथ ही उसमें वे सब विशेषताएँ मौजूद हैं, जो उसके मूल उद्गम परमात्मा में है। वह अपने उद्गम केन्द्र का सत्गुण अपने में गहराई तक धारण किए हुए है। जब भी वह चेतना अशक्त या अस्त-व्यस्त होती है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय, तो इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। दैवी अनुशासन के अनुरूप जो अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करने में सक्षम होता है वही इस सत्य का साक्षात्कार कर पाता है। इस यात्रा में स्वयं से कठोर संघर्ष करना पड़ता है, पर आत्मबल सम्पन्न साधक लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।

🔶 मनुष्य का जीवन प्रतिक्षण गतिशील है, वह जो कुछ है वह नहीं रहता है। उसे जितना भी हो सके आगे बढ़ना है। अपनी वर्तमान परिधि से निकलकर अधिक विस्तृत सीमाओं में प्रवेश करना है। एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाना है। एक स्तर से चलकर दूसरे स्तर तक पहुँचना है। अपने चेतन होने का प्रमाण देना है। उसे इस महापुरुषार्थ को कर दिखाना होगा कि सुरदुर्लभ मानव जीवन तृष्णा एवं वासनाओं की वेदी पर चढ़ा देने के लिए नहीं है, वरन् उच्च आदर्शों की पवित्र वेदिका पर उत्सर्ग कर देने के लिए है। यदि संकल्पपूर्ण पुरुषार्थ एवं लगन हो तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर श्रेय प्राप्त न कर सकें।

🔷 नवरात्रि की बेला शक्ति आराधना की बेला है। माता के विशेष अनुदानों से लाभान्वित होने की बेला है। अपनी साधना तपस्या द्वारा हम स्वयं ही अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। अन्यथा जगन्माता को यह कार्य बलपूर्वक करना पड़ेगा। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है। आत्मसुधार कर हम भी उसके उद्देश्य में सहयोगी बनें, यही इस नवरात्रि का संदेश है।

📖 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2003/September/v1.37

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

👉 आत्मिक प्रगति का स्वर्णिम अवसरः प्रस्तुत नवरात्रि पर्व

🔶 साधना तत्वदर्शन को जानने की इच्छा रखने वाले हर जिज्ञासु को इस अटल तथ्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि जीवन साधना– ईश्वराधना हेतु किसी मुहूर्त्त की प्रतीक्षा नहीं की जाती। इन सिद्धान्तों को तो जितना शीघ्र जीवन में उतारा जाय उतना ही उत्तम है, परन्तु क्रमबद्ध रूप से उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने वालों को प्रकृति समय विशेषों की महत्ता जानना जरूरी है। उन दिनों आरम्भ किये गये प्रयास संकल्पबल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारो को दृष्टिगत रख ही ऋतुओं के मिलन काल की संधिबेला को आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों को महत्ता दी है।

🔷 इन दिनों सूक्ष्म जगत से दैवी प्रेरणाएँ अनुदान रूप में बरसती हैं और सुसंस्कारी जागृत आत्माएँ अपने भीतर समुद्र-मन्थन जैसी हलचलें इन दिनों उभरती देखते हैं। इन उमंगों का सुनियोजन का सकने वाली बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध करते हैं और कृतकृत्य होते हैं। यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सर्वदा ही बरसता है, पर ऐसे अवसरों पर बिना अधिक पुरुषार्थ के अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है। इसी कारण नवरात्रि पर्वों को अध्यात्म विज्ञान में अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

🔶 रात्रि और दिन का मिलन प्रातःकालीन और सायंकालीन ‘संध्या’ नाम से प्रख्यात है। मिलन की बेला हर क्षेत्र में उल्लास से भरी होती हैं। मित्रों का मिलन, प्रणय मिलन, आकाँक्षाओं और सफलताओं का मिलन कितना सुखद होता है, सभी जानते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना तृप्तिदायक–आनन्द देने वाला होगा। जैसे ही पुराना वर्ष बीतता है, व नया आता है–नये उल्लास से नव वर्ष मनाया जाता है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के परिवर्तन के दो दिन अमावस्या एवं पूर्णिमा पर्वों के नाम से जाने जाते हैं। अधिकाँश पर्व इसी सन्धि बेला में मनाये जाते हैं। दीपावली, होली, गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, हरियाली अमावस्या, शरदपूर्णिमा जैसे प्रधान-प्रधान पर्व इन्हीं ऋतु संध्याओं में आते हैं।

🔷 जब भी ऋतु परिवर्तन होता है–चैत्र में मौसम ठण्डक से बदलकर गर्मी का रूप ले लेता है और आश्विन में गर्मी से ठण्ड का। वैसे इस परिवर्तन में समय तो क्रमिक गति से अधिक लगता है, परन्तु इन नौ दिन विशेषों में प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल व मानवी काया का सूक्ष्म कलेवर एक विशिष्ट परिवर्तन क्रिया से गुजरता है। शरीर में ज्वार-भाटे जैसी हलचलें उत्पन्न होती हैं और जीवनीशक्ति पूरी प्रबलता से देह में जमी विकृतियों को हटाने के लिये तूफानी संघर्ष करती हैं। वैद्यगण इसे लाक्षणिक उभार काल कहते हैं। बहुधा बीमारियाँ इन्हीं समयों पर अधिक होती हैं और शरीर शोधन-विरेचन के उपचार इन दिनों करायें जाने पर विशेष सफल होते हैं। काया-कल्प के विभिन्न प्रयोगों के लिये भी सन्धिकाल की इसी अवधि की प्रतीक्षा करते हैं।

🔶 नवरात्रियों को देवत्व के धरती पर उतरने का, जागृतात्माओं में देवी प्रेरणा फूँकने वाला समय माना गया है। इन अवसरों पर देव प्रकृति की साधना परायण आत्माएँ अदृश्य प्रेरणा शक्ति से बरबस प्रेरित हो आत्मकल्याण व लोक-मंगल के क्रिया-कलापों में नियोजित हो जाती हैं। इन दिनों न केवल मानवी चेतना को प्रभावित करने वाली वरन् अनुकूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बन जाती हैं। अन्य जीवधारियों में प्रजनन की उत्तेजना इस समय ही सताती है और वे गर्भाधान की क्रिया सम्पन्न करते हैं। सूत्र–संचालन तो कोई अदृश्य सत्ता ही करती है, प्राणीमात्र कठपुतली की भूमिका निभाते हैं। इन दिनों वातावरण प्रकृति इस प्रकार का बनता है कि आत्मिक प्रगति के लिये अन्तःप्रेरणा सहज ही उठने लगती है।

🔷 इस प्रकृति के दो ही गुण माने गये हैं–तम् और सत्। तम् अर्थात् जड़, सत् अर्थात् चेतन। दोनों अपनी स्थिति में पूर्ण हैं। पर जब इन दोनों का मिलन होता है, एक नई हलचल उठ खड़ी होती है जिसे रज कहते हैं। मनुष्य के अन्दर इच्छा, आकाँक्षा, भोग, तृप्ति, अहंता, संग्रह, हर्ष, स्पर्धा आदि चित्त को उद्विग्न किये रहने वाले और विविध बहिर्मुखी क्रिया कलापों में उलझाने वाले प्रवाह ‘रज’ की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। साधना की आवश्यकता इस ‘रज’ के निविड़ बन्धनों से शरीर चेतना को मुक्त करने के लिये ही पड़ती है। तम से बना जड़ शरीर तो समय समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है और उसे जलाकर उसके स्थूल स्वरूप की इतिश्री कर ली जाती है। चेतन आत्मा सत् का अंश है–ईश्वर का अंश होने से निर्मल है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी जड़ चेतन मिश्रित जीव चेतना ही हर घड़ी अशान्त बनी रहती है। इसी के परिमार्जन परिशोधन हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिये संध्याकाल की नवरात्रि बेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।

🔶 रज वस्तुतः सत् और तम् का सम्मिश्रण ही है जिसमें उत्पादन की अद्भुत शक्ति है। नारी का नारीत्व उसकी ‘रज’ चेतना पर ही टिका हुआ है। यही गर्भधारण और सृष्टि विस्तार का मूल आधार है। रज प्रधान ऋतुमती मार्दा ही गर्भधारण करती है। प्रकृति जगत में भी ऋतुएँ वर्ष में दो बार ऋतुमती होती हैं। सर्दी-गर्मी प्रधानतः दो ही ऋतुएँ हैं। वर्षा इनके बीच आँख-मिचौनी खेलती रहती हैं। दोनों प्रधान ऋतुओं का ऋतुकाल नौ-नौ दिन का होता है, इसी को नवरात्रि कहते हैं। इसी समय प्रकृति का रज तत्व भी अपने पूरे यौवन पर होता है।

🔷 उमँगें मनुष्य की स्व उपार्जित सम्पदा नहीं है। वे इन नवरात्रि के समय विशेषों में तो अविज्ञात उभार के दौर के रूप में विशेषतः सक्रिय पायी जाती हैं। इन दिनों चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में बढ़ने लगते हैं जिसकी किसी को कभी सम्भावना नहीं होती। युग सन्धि की बेला और उस पर भी नवरात्रि एक अप्रत्याशित अवसर–अपवाद के रूप में ही मानी जानी चाहिये। जो अवसर को पहचानते हैं, वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाने व अन्तः की प्रगति हेतु आत्मिक पुरुषार्थ के लिए इस वर्ष की नवरात्रियाँ एक असामान्य अवसर के रूप में आयी हैं। इन दिनों वस्तुतः अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसने व उससे व्यापक जन समूह के उससे लाभान्वित होने की आशा की जा सकती है, आवश्यकता मात्र यही है कि इस पुरुषार्थ से कोई भी नैष्ठिक साधक छूटने न पाये।

🔶 यों तो सारा समय ही भगवान का है, सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने के लिये हर घड़ी शुभमुहूर्त्त है और अशुभ कर्म के लिये अनेकानेक बन्धन बताये जा सकते हैं। सामान्य या विशेष किसी भी कालचक्र की प्रतिक्रिया से लाभ उठाना बुद्धिमत्ता ही माना जायेगा। बसन्त के दिनों में उस उत्सव के अनुरूप ही सूक्ष्म प्रवाह वातावरण में बह रहे होते हैं, अस्तु उनकी सहायता से यह पर्व मानने के लिये सभी की उल्लास मय मनःस्थिति अनायास ही बन जाती हैं।

🔷 मध्यकाल में तन्त्र प्रयोजनों की मान्यता अत्यधिक थी। अधिकाँश कर्मकाण्डों को–मन्त्र सफल बनाने की साधनाओं को तंत्रवेत्ता इन नवरात्रियों में ही सम्पन्न करते थे। वाममार्गी साधक अभी भी अभीष्ट इच्छापूर्ति हेतु इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। सतोगुणी साधनाओं को अपनाने वाले–आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को तो इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में ही मानकर अपनी तप साधना का सुयोग बिठाना चाहिये। गायत्री साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी कारण लिये सर्व श्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करते रहने के लिये सुदृढ़ मनोबल चाहिये। संकल्प किसी बहाने से टूटे या उपेक्षापूर्वक चिन्ह पूजा की जाय इस से उत्तम यही है कि छोटे संकल्प लिए जायें। नियम यही ठीक है मनोभूमि में जितनी दृढ़ता हो उतना ही बड़ा संकल्प लिया जाय।

🔶 नियत दिनों में नियत जप संख्या, ब्रह्मचर्य व्रत पालन भोजन में उपवास तत्व का समावेश, जैसी स्थिति जिसमें अपनी शरीर सेवा दूसरों से कम से कम करायी जाय भूमिशयन-कमवस्त्र-चमड़े का परित्याग जैसी तितिक्षाएं, अन्त में हवन की पूर्णाहुति–ये अनुष्ठान की सामान्य मर्यादाएँ हैं। लघु अनुष्ठान, जिसमें 24 हजार जप 9 दिन में पूरा करना होता है–ही सर्वसुलभ साधना विधान है।

🔷 गायत्री अनुष्ठान की महत्ता नवरात्रि में सर्वाधिक मानी जाती है। गायत्री ‘गुरुमन्त्र’ है। देव मन्त्र कितने ही हैं–सम्प्रदाय भेद से कई प्रकार के मन्त्रों के उपासना विधान हैं, पर जहाँ तक ‘गुरुमन्त्र’ शब्द का सम्बन्ध है वह मात्र गायत्री के साथ जुड़ा है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में बपतिस्मा को जो स्थान प्राप्त है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मन्त्र गायत्री को प्राप्त हैं। साधना की दृष्टि से गायत्री को ही सर्वांगपूर्ण माना जाता है। त्रिपदा के रूप में इसकी तीन सिद्धियों अमृत (आनन्द-उल्लास से भरा अन्तःकरण–चिरयौवन), पारस (उत्कृष्टतावादी प्रगतिशील सत्साहस) तथा कल्पवृक्ष (परिष्कृत चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है। यही नहीं, इसमें जिन तथ्यों का समावेश है, उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में इसके मानव जाति का सार्वभौम मंत्र माने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है। देश, धर्म, जाति, समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर इसे सार्वजनीन उपासना कहा जा सकता है। जब भी कभी मानवी एकता के सूत्रों को चुना जायगा तो निश्चिततः गायत्री को ही महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा।

🔶 दैवी आह्वान को सुना जाय और तद्नुसार ही आचरण किया जाय, यही उत्तम है। साधकों को उपासना के चमत्कार देखना हो तो वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों ही आधारों की कसौटी पर नवरात्रि की गायत्री साधनावधि में कसकर देख सकते हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तराल से विभूतियों के रत्नों का निकल पड़ना व विपत्ति बाधाओं का निराकरण ये प्रत्यक्ष प्रति फलों से रूप में मिलते देखे जा सकते हैं।

🔷 इस देव पर्व पर देवत्व की प्रेरणा व दैवी अनुकम्पा निरन्तर बहती है। सतर्क–प्रयत्नशील मनस्वी साधक ऐसे ही शुभ मुहूर्त का लाभ उठाते व अन्यों को भी इसके लिये प्रेरित करते हैं। देवत्व की विभूतियों के जीवनचर्या में समावेश के रूप में इस अनुदान वर्षा को सहज ही देखा जा सकता हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1982 पृष्ठ 45
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1982/March/v1.45

👉 नवरात्रि की साधना

🔶 इस नवरात्रि के दिव्य संक्रमण काल पर अपना आध्यात्मिक उत्थान चाहने वालों को अवश्य ही पूरी पवित्रता और एकाग्रता से साधना में दत्तचित्त हो जाना चाहिये। संख्या पूरी करने की हड़बड़ी छोड़कर प्रेम और एकाग्रता को अपनाना चाहिये। कम से कम दोनों काल (प्रातः सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 27 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। 10 से 12 माला जपने में साधारणतया एक घंटे का समय लगता है। इस भाँति 24000 का लघु अनुष्ठान पूरा करना चाहिये। जो इतना भी अपनी विविध व्यस्तताओं के कारण नहीं कर सकें, उन्हें कम से कम प्रति दिन दोनों सन्ध्या में 11 माला तो अवश्य ही जप कर लेना चाहिये। जो समय नवरात्रि की साधना में लगेगा, वह कदापि निष्फल न होगा।

🔷 साधना के नियम साधारण ही हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये। नियमित जप समाप्त कर सूर्य के सम्मुख जल चढ़ा देना चाहिये।

🔶 जिस भाँति उपयुक्त नक्षत्र, तिथि एवं दिवसों में बोये बीज, अनुकूल वृष्टि, सिंचाई एवं खाद प्राप्त कर एक विशेष रूप में पुष्ट और उन्नत फल प्रदान करते हैं, उसी प्रकार नवरात्रि की उपासना अन्य समयों में की गई उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।

🔷 नवरात्रि उपासना में ब्रह्मचर्य पालन अत्यावश्यक है। जो कर सकें, वे उपवास भी करें, परिमित फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। जिनसे ऐसा नहीं बन पड़े, वे भी सात्विक-परिमित भोजन करें। स्वाद के लिये न खायें, अतः यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। यह भी श्रेष्ठ व्रत ही है। इसके अतिरिक्त, पूरा या नियमित समय तक मौन, भूमि-शयन, चमड़े की बनी वस्तु का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवायें स्वयं करना, अपनी हजामत, वस्त्र धोना, भोजन बनाना आदि सेवायें दूसरे से न लेने का व्रत भी निभाने का प्रयत्न करें। अपनी सुख-सुविधाओं को यथासम्भव त्याग कर उपासना में लीन होना ही तप है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1956 पृष्ठ 47

👉 Some Key-Aspects of Navaratri Sadhana - Amritvani

Sisters and Brothers,

🔶 Your sadhana1 session here in the auspicious period of Navaratri2 is coming to an end. Let us now take stock of what we did in this period and why?  While discussing the answers to these two questions it will also become clear to you what should be the effect of this sadhana and what benefits should be expected from it?

🔷 So let us first have a look at your strict routine here. In your homes most of you, as per the modern routine, prefer or are used to sleeping late in the night and getting up still later next morning. (What to say, if it happens to be a holiday!). And here?  The strict schedules here have compelled you to get up at 3:30 am! Not only getting up early, you also have to take bath quickly. What is that? You have been taught to bring drastic changes in your habits for your own betterment. Now there is no place for laziness in your entire day.

🔶 Other important change is that in the quality and timings of your food. I do not know what you often used to eat at your place. But I suppose usually people like to eat spicy, fried, lavish food; the meals everyday are also full of oily stuffs, and pickles and chatanis, papads and what not. Sweet-dish is also taken quite frequently! But here we have constrained you!  You are to eat austere and almost tasteless (by your standards) food here. Back home you used to eat casually whatever and whenever you feel like.

🔷 Your other activities are also restrained. You see, now you are made to sit at least for about three hours everyday to complete the assigned number (twenty-seven rosaries, i.e., 27X108 times) of japa3 of the sacred Gayatri Mantra.  This is part of the discipline of your Gayatri Anushthan Sadhana. You are told that, if you break the discipline, your sadhana will be disturbed which will amount to annoying the Goddess Gayatri and hence be regarded as a sin. This is part of psychological conditioning of your mind. Your faith together with this warning has alarmed your mind so much that it has suddenly become somewhat obedient these days!          

🔶 Duration of this sadhana session is nine days only.  But this is only a short-term training and exposure to different aspects of sadhana. This is to teach you and give you a first-hand exposure of how you should discipline your life to achieve something worthwhile. I am not quite sure whether you could really learn anything. But you must take note of one thing. What is that? You must understand the definition of ‘Spirituality’ — adhyatma, the Science of Soul.
Generally people think of it as an occult subject matter of spirituality or a ritualistic religious practice of pleasing some deity and fetching Her blessings for worldly gains. This is all baseless. Do you think God is some dumb pleasure-hungry Being that showers blessings upon listening to your devotional chants and prayers in His praise and upon receiving your offerings made for his worship? Or, is He an invisible magician whose idol will be enshrined by you on some silver or gold-made throne in grand temple and then you will decorate it, offer lavish food as ‘puja prasada’, garlands and valuables and ‘pray’ for fulfilling your long list of desires and wishes?

🔷 Do you think of spirituality or spiritual practices of japa etc, as some tool to press your appeals, demands or needs before Him for some special favors?  All this is meaningless.  Don’t make fool of yourself and don’t degrade your religious faith. Do you think the Omniscient is a ‘pigeon’ that will be attracted to eat the ‘grains’ of your offerings of worship rituals, flowers, incense sticks, sweets, alms, etc?  Is the Almighty a ‘fish’ that may be caught in the ‘net’ of your so-called spiritual practices?

🔶 Do you think the principles of our great science of yoga, the purpose of immense life-long ascetic practices (tapashcharya) and devout sadhanas carried out by our divine rishis (Vedic Sages) and their teachings based on self-experiences are so shallow or hypocritical?

🔷 You better get rid of your crazy conceptions and illusory convictions of spirituality and God.  Also wane out your religious prejudices. Otherwise, you will keep wandering in the labyrinth of your own folly and achieve nothing for the whole life.  No amount of your efforts of worship, chanting, or pilgrimage would render you any result. Your superficial ‘religiosity’ and ostentatious devotion may swell your false pride but in reality it will only weaken your inner self and retard your spiritual progress.

🔶 I therefore insist that you must, I repeat, you must, learn at least one thing from this session. And that is – you must now be aware of the true meaning, principles and purpose of spirituality and spiritual sadhanas. So please note! Spirituality is the science of soul. It is the science of purifying and awakening the inner self and orienting the activities of life according to the soul-voice. Do not confuse it with any occult subject of ghosts, etc or, with any kind of magic or astonishing experience. Nor should you dream of attaining supernatural powers or potentials from spiritual endeavors of sadhanas.

🔷 In simplest terms, spirituality is a science of elevation, enlightenment and evolution of human life.  It trains you in the art of carving a fulfilling and praiseworthy life. It teaches you how to be a better person, how to improve your thoughts and actions in the righteous direction so as to make best use of your capabilities and excel your qualities and potentials to the highest levels.

🔶 Savants say that there is no problem that does not have a solution, no hardship that cannot be overcome by a prepared mind.  If you get rid of your shortcomings and learn to manage your resources and abilities efficiently, then you will be able to resolve most of the problems in your life. Thus, spirituality provides you solutions to tackle all problems in your life.

🔷 Let us try to understand how it happens. So let us consider some common problems faced by people today. Suppose you have some physical health problems. I will now explain how the principles and practices of spirituality help you eliminate this problem. Have you ever thought why does a disease attack some persons and not some others living in almost similar environmental conditions?  Once someone asked the ‘diseases’ – “Why do you keep wandering and spreading here and there and troubling the people?  This is not fair”. They (the diseases) responded — “We go only to those who invite us by imbalanced and uncontrolled life-style”.

🔶 Did you get the point? Indeed, the root-cause of all infirmities, all diseases, all kinds of physical sicknesses is — unrestrained use, even misuse of the natural power of sense-organs and adoption of irregular, haphazard life-styles. These are the obvious cause of weakening of the sense organs and the associated components inside the body and further disturbing the digestive system. It also shatters the defense mechanism (immune system) of the body]. Have you ever heard or read in any scientific books of wild animals falling ill? No, they only die their natural death or are killed by their predators. Because they live in perfect consonance with what Nature has set for them.  So whatever be the name of the disease and the ‘characterization’ of its cause, the fact is that at the root of all this is your negligence, your indiscipline.

🔷 It is up to what you invite (by your actions). If you invite diseases or associated adversities, you will get them. Now if you want to get rid of these you should uproot this primary cause. You may get ‘cured’ by heavy doses of medication but don’t forget it would only be a suppression of symptoms, a temporary relief. Unless you set your system right and take preventive measures, it will recur or occur in some other form. So, most importantly, you should control the greed of the tongue and also restrain the misuse of other sense organs as well.  Also, set a schedule for everyday to make thoughtful, industrious and productive use of your time. And strictly follow what you have scheduled for the day.  Then see who dares make you sick?

🔶 Mahatma Gandhi was in the early thirties of his age when he had severe problem of constipation. He had so much difficulty, as though his intestines had shrunk; he had to take anima almost every day for excretion. He was in South Africa around that time. He has written in his diary that he used to think he would survive only for four to five years more. If suppose his anima set is stolen or misplaced, or if he were stuck in some forest during a tour, then he would have an untimely death due to this problem, he used to think.  He used to be worried about his health. But, as we all know, nothing of this sort happened. Instead of getting depressed he faced the challenge boldly.

🔷 He took support of naturopathy and followed its principles throughout his life thereafter. He disciplined his diet and routine and gradually healed the problem himself. Though thin, he remained physically strong thereafter. He used to say that he would survive upto the age of hundred and twenty years. I think, he would have certainly, had he not been shot dead at the age of eighty.

🔶 If Gandhiji’s intestines could become healthy, his sickness could be healed, then why not yours? Why can’t it happen with you? Do you know who the nearest enemy of your health is, or what is the biggest barrier that hinders your efforts of disciplining yourself? It is your own tongue that you have let free like a wild cat.

🔷 It may sound bitter but it is true in one way or the other that it is the avarice of your tongue which eats your stamina, maligns your blood, ‘squeezes’ your blood and weakens your crucial body-functions like metabolism and immune response. Germs and viruses might be there, atmospheric environment might be polluted, but these would not have affected you, had your body’s resistance and vitality been strong.  I can vouch on behalf of the diseases that if you restrain your tongue, discipline the other sense organs and make adequate use of your physical labor, diseases dare not assail you.

🔶 There are many examples where people not only got rid of their health problems but also became very stout. They observed the above disciplines to live in consonance with the natural system of human-body and made extra efforts to strengthen their immune system. Chandgiram suffered from tuberculosis in his young age. No medicines could check his disease and his doctors had almost lost the hopes of his ever getting cured. One of his acquaintances, who had come to see this patient, advised him to eat balanced and healthy food at regular timings and go for walk regularly. He also advised the specific type of healthy food intake and some exercises and told – “If you love death then continue your present routine and if you love healthy life, then follow what I have suggested”.  The patient followed the wise advice and continued the disciplined diet and physical exercises even after he was cured. Gradually he gained strength and increased the exercises so much that this thin and weak TB patient eventually became the well known wrestler “Master Chandgiram”. 

🔷 All of you have the hidden potential of gaining and sustaining good health and becoming strong like a wrestler. You can mold the circumstances in your favor; you can be happy and hearty even in this stressful world of today. But what to say friends! You are very good at observing the shortcomings of others, but hardly notice your own weaknesses. You often remain unaware of your bad habits; even if you do, you prefer finding some excuses and don’t make substantial efforts to change or improve them.  You don’t even feel to restrain yourself.  That is why you can’t be the followers or seekers of spirituality. You may only be called weak, helpless slaves of your own habits.

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2010/Sep_Oct/v1.12

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

👉 सच्चा श्राद्ध

🔷 श्राद्ध पक्ष चल रहा था। सन्त एक नाथ ने भी प्रचलित लोकरीति के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने का निश्चय किया और कुछ ब्राह्मणों को नियत समय पर अपने यहाँ भोजन के लिये आमंत्रित किया।

🔶 सुबह से ही घर में श्राद्ध की रसोई बनने लगी। संत एकनाथ तथा उनकी धर्मपत्नी गिरिजा दोनों पवित्रता, स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखते हुए षट्रस व्यंजन बना रहे थे। घी, दूध और मिष्ठानों की सुगन्ध घर से बाहर सड़क तक व्याप रही थी। उसी समय सड़क से कुछ महार परिवार गुजरे। शायद उन्हें कई दिनों से ठीक तरह खाना नहीं मिला था। पकवानों की सौंधी सुगन्ध उनकी नाक में से घुस कर क्षुधा को और भी भड़काने वाली सिद्ध हुई। लेकिन अपने नसीब में न जानकर वयस्क महारों ने तो भूख को दबाया, परन्तु बच्चों से रहा न जा सका। एक बच्चा बोल ही उठा-माँ कैसी मीठी महक आ रही है। अहा! कितने बढ़िया-बढ़िया पकवान बन रहे होंगे। काश ये हमें मिल सकें।”

🔷 “चुप रह मूर्ख! कोई सुन लेगा तो गालियाँ खानी पड़ेंगी कि निगूढ़ों ने हमारे पकवानों को नजर लगा दी।” बाप ने कहा। माँ एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए बोली-बेटा! हम लोगों की किस्मत में तो इन चीजों की गंध भी नहीं है। व्यर्थ में मन के लड्डू बाँधने से क्या लाभ।”

🔶 माता, पिता और बच्चों में चल रही ये चर्चायें संत एकनाथ जी के कानों में पहुँची। उनका हृदय द्रवित हो उठा। संत की साध्वी पत्नी गिरिजा भी इन बातों को सुनकर महार परिवार को घर में न्यौत लायी और उचित आदर सत्कार सहित उन्हें आसन पर बिठा कर तैयार हो रही रसोई परोसने लगी। महार स्त्री, पुरुष और बच्चे कई दिनों के भूखे थे, इधर पकवानों ने उनकी भूख और भी बढ़ा दी, सो सब तैयार रसोई उनके ही उदर में चली गयी। लेकिन खा-पीकर तृप्त हुए महार-परिजनों ने जिस हृदय से संत एकनाथ तथा गिरिजा को दुआयें दी उससे दम्पत्ति का अन्तस् प्रफुल्लित हो उठा। गिरिजा ने भोजन के बाद यथोचित दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।

🔷 नियत समय पर न्यौते गये ब्राह्मण आये। बनायी गयी रसोई तो महारों के काम आ चुकी थी सो अब दुबारा भोजन तैयार करना पड़ रहा था। खाने में विलम्ब होते देखकर ब्राह्मणों से न रहा गया, वे कुड़कुड़ाने लगे।

🔶 संत ने कहा-”नाराज न होइये ब्राह्मण देव। रसोई तो समय से काफी पहले तैयार हो चुकी थी। परन्तु देखा भगवान सड़क पर भूखे ही जा रहे हैं। इसलिये उन्हें भोजन कराने में सारी रसोई चुक गयी।” विस्मित ब्राह्मण संत एकनाथ से पूरी घटना सुनकर आगबबूला हो उठे-”तो जिनके छूने से भी कुम्भीपाक लगता है उन्हें तुम भगवान कर रहे हो।” “वे भगवान ही तो हैं पूज्यवर! कण-कण में उनका वास है, प्राणिमात्र में वे रहते हैं। यदि वे ही भूखे जा रहे हों तो उन्हें तृप्त कर भगवान की सेवा का अवसर हाथ से जाने देने में क्या बुद्धिमानी है?”

🔷 इन वचनों ने पंडितों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और वे बोले-”अरे! एकनाथ तुम्हारी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गयी है। एक तो हमारे लिये बनाया भोजन अन्त्यज जनों को खिला दिया और दूसरे उन्हें भगवान सिद्ध का उनसे अपवित्र हुए घर में चौके-चूल्हे पर बना भोजन खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करने पर तुले हो।”

🔶 संत एकनाथ उसी विनम्रता से अपनी बात कहते रहे परन्तु रूढ़िग्रस्त और दुराग्रही मन मस्तिष्क वाले ब्राह्मणों पर क्या प्रभाव होना था, उठ कर चल दिये। संत एकनाथ ने उन्हें रोका नहीं। माथे पर तिलक लगाये रेशमी वस्त्रधारी उन बहुरूपियों को उन्होंने विनयपूर्वक रवाना किया व सच्चे ब्राह्मण, हृदय से आशीर्वाद देकर गए। उस महार परिवार द्वारा छोड़ा भोजन दोनों पति-पत्नी ने भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया। यही सच्चा श्राद्ध था।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1987

👉 आज का सद्चिंतन 7 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 22)

👉 सच्चे अध्यात्मवाद में निहित विलक्षण शक्ति  
 
🔷 यहाँ इतनी पँक्तियाँ इसलिए लिखनी पड़ी हैं कि शरीर बल, सम्पत्ति बल, बुद्धिबल, पद और सहायकों का बल बहुत समय से श्रेय-चर्चा के अधिकारी रहे हैं, पर भुलाया यह भी नहीं जाना चाहिए कि आध्यात्मिक साधना के सहारे उपजने वाला आत्मबल भी उपेक्षणीय नहीं है। वह न तो अप्रामाणिक है और न छद्म। गड़बड़ी मात्र वहीं पड़ती है जहाँ उसके साथ जुड़े सिद्धान्तों को भुला दिया जाता है और कुछ मंत्र-यंत्रों से ही गगनचुम्बी अपेक्षा की जाने लगती है और उसके सफल न होने पर निराशा एवं नास्तिकता उभरती है।
  
🔶 व्यक्तिगत लाभ तक अपने को सीमाबद्ध कर लेने वाला व्यक्ति अपनी संकीर्णता में इतना अधिक लिप्त हो जाता है कि उसकी दूसरी दुष्प्रवृत्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। अध्यात्म क्षेत्र मेें भी जो लोग इसी रीति-नीति को अपनाते हैं, उनकी गरिमा भी एक प्रकार से समाप्त प्राय: हो जाती है। अपने लिए स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि चमत्कार प्रदर्शन, लोगों से पुजापा बटोरना, अपने को देवताओं का एजेण्ट बताकर उनके द्वारा ओछे लोगों की ऐसी मनोकामनाएँ पूरी कराने का आश्वासन देना जो उनकी पात्रता से बाहर है, ऐसी बातें जिनके मनोरथों में सम्मिलित हो जाएँ, समझना चाहिए कि उनका पूजा-पाठ भजन-कर्मकाण्ड ओछे स्तर का है। उससे अध्यात्म पक्ष की गरिमा बढ़ेगी नहीं वरन् घटेगी ही।

🔷 ईश्वर के निकटवर्ती संबंधी बनना, उनको दर्शन देने के लिए बाधित करना, उनकी कचहरी के दरबारी बनकर सामीप्य-सान्निध्य जैसी मुक्ति का मजा लूटना, औरों से अपने को वरिष्ठ होने की मान्यता बनाना-ऐसा ओछापन है जो किसी भी वास्तविक भगवद् भक्त का अनुगामी बनने वाले को तनिक भी शोभा नहीं देता। यह सब लगभग ऐसा ही है जैसा कि सेठ, साहूकार, राजनेता, पंचतारा होटलों में मौज मजा करने वालों की मन:स्थिति होती है। अमीर लोग भी सेवक, चाकर, चारण और चमचों को इनाम-इकराम बाँटते रहते हैं। ईश्वर की हैसियत उन्हीं लोगों के समतुल्य बना देने का मनोरथ न तो किसी के अध्यात्मवादी होने का प्रमाण है और न ऐसे व्यक्ति को साधक-उपासक ही कहा जा सकता है।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 24

👉 4 Tips

🔷 1. Be impeccable with your word: Speak with integrity. Say only what you mean. Avoid using the word to speak against yourself or to gossip about others. Use the power of your word in the direction of truth and love.

🔶 2. Don't take anything personally: Nothing others do is because o you. What others say and do is a projection of their own reality, their own dream. When you are immune to the opinions and actions of others, you won't be the victim of needless suffering.

🔷 3. Don't make assumptions: Find the courage to ask questions and to express what you really want. Communicate with others as clearly as you can to avoid misunderstandings, sadness and drama. With just this one agreement, you can completely transform your life.

🔶 4. Always do your best: Your best is going to change from moment to moment; it will be different when you are healthy as opposed to sick. Under any circumstance, simply do your best and you will avoid self-judgment, self-abuse and regret.

📖 Miguel Ruiz

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 21)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि   
 
🔶 अपनी अपेक्षा पिछड़ों, दु:खियारों, आवश्यकताओं की सहायता करना मानवी कर्तव्य है। गिरों को उठाने, उठों को उछालने में ही सच्चे सामर्थ्यवानों के हाथ खुलते और सहायता देते रहे हैं। इस लम्बे जीवन की अवधि में कितनों की कितनी भौतिक एवं आत्मिक सहायता बन पड़ी, यह प्रसंग तो असाधारण रूप से विस्तृत है, पर उसकी चर्चा पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि देने वाले का अहंकार उभर सकता है और लेने वाला किसी अहसान की अनुभूति में अपनी हेठी समझकर संकोचग्रस्त हो सकता है।
  
🔷 सिद्धियों के और भी किसी प्रत्यक्ष प्रमाण का परिचय प्राप्त करना हो तो उसी गणना में एक कड़ी यह भी है कि इन दिनों अस्सी वर्ष की आयु तक पहुँचने वाले प्राय: जराजीर्ण हो जाते हैं और मौत के घर जाने की तैयारी करने लगते हैं। पर यहाँ दृश्य दूसरा ही है। शरीर, मन, संकल्प और पुरुषार्थ उसी स्तर का परिचय दे रहा है जैसे कि वयोवृद्ध द्रोणाचार्य धनुष संधानने और लक्ष्य बेधने की शिक्षा अंत काल तक देते रहे। बुढ़ापे में भी जवानी जीवंत रह सकती है, इस स्तर का इस प्रयोक्ता का एक सघन स्वरूप यह भी है।
  
🔶 चर्चा को अप्रासंगिक, अनावश्यक और अहंकार स्तर का उद्धत उल्लेख न समझा जाए, इसलिए इस लम्बे प्रसंग को उनके लिए शेष छोड़ दिया है, जो शरीर न रहने पर कुछ और खोजने-बताने के लिए उत्सुक होंगे।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 23

👉 Serve Man as God

🔶 The only way of getting our divine nature manifested is by helping others to do the same. If there is inequality in nature, still there must be equal chance for all – or if greater for some and for some less  - the weaker should be given more chance than the strong. In other words, a Brahmana is not so much in need of education as a Chandala. If the son of a Brahmana needs one teacher, that of a Chandala needs ten. For greater help must be given to him whom nature has not endowed with an acute intellect from birth. It is a madman who carries coals to Newcastle. The poor, the downtrodden, the ignorant - let these be your god.

🔷 This is the gist of all worship - to be pure and to do good to others. He who sees Siva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Siva; and if he sees Siva only in the image, his worship is but preliminary.

🔶 The life of Buddha shows that even a man who has no metaphysics, belongs to no sect, and does not go to any church, or temple, and is a confessed materialist, even he can attain to the highest. …. He was the only man who was ever ready to give up his life for animals, to stop a sacrifice. He once said to a king: ‘If the sacrifice of a lamb helps you to go to heaven, sacrificing a man will help you better; so sacrifice me.’ The king was astonished.

🔷 ‘The good live for others alone. The wise man should sacrifice himself for others.’ I can secure my own good only by doing your good. There is no other way, none whatsoever.

🔶 Go from village to village; do good to humanity and to the world at large. Go to hell yourself to buy salvation for others… ‘When death is so certain, it is better to die for a good cause.’

🔷 Throughout the history of the world, you find great men make great sacrifices and the mass of mankind enjoy the benefit. If you want to give up everything for your own salvation, it is nothing. Do you want to forgo even your own salvation for the good of the world? You are God, think of that.

📖 Swami Vivekananda

👉 नदी बनाम जोहड़ (तालाब)

🔶 एक जल-पूरित नदी कल-कल करती हुई आनन्द और उल्लास के साथ बही जा रही थी । उसके किनारे बड़े-बड़े सुन्दर नगर और उपनगर बसे हुए थे। इन सभी नगरों के निवासी विविध प्रकार से उसके जल का उपयोग करके अपने दैनिक जीवन को सफल बनाते रहते थे।

🔷 पर्वतों से टकराकर नदी का पानी जहाँ ऊपर से नीचे गिरता था वहाँ एक विशाल विद्युत-केन्द्र बनाया गया था जहाँ बिजली का उत्पादन होकर उससे अनेक प्रकार के यान्त्रिक और औद्योगिक कार्यों का संचालन किया जा रहा था।

🔶 आगे चलकर इसी नदी से कुछ नहरें निकाली गई थीं। कहीं नावों से इसमें व्यापार करके अपनी आजीविका चला रहे थे।

🔷 ऐसा था इस नदी का जीवन । आदि से अन्त तक अपने अंग-प्रत्यंग से औरों का भला करती हुई जब इस प्रकार वेग से समुद्राभिमुख बही चली जा रही थी तब एक ठहरी हुई जोहड़ ने, जिसका पानी प्रवाहहीन होने के कारण दुर्गन्धयुक्त हो गया था इस नदी से कहा-

🔶 “बहन, बताओ अपने इस दिन-रात के बहते हुए जीवन में आखिर तुम्हें किस बात का अनुभव होता है, जो तुम निरन्तर कल-कल करती हुई किलोलें में किया करती हो? मुझे क्यों नहीं देखती, जो एक जगह ठहरकर अपने जीवन को प्रगति और प्रवाह से दूर करके स्थिर होकर यहाँ पड़ी-पड़ी आराम के साथ अपने दिन गुजार रही हूँ।”

🔷 नदी ने जोहड़ से कहा-प्रगति और प्रवाह का पन्थ अपनाने से ही मेरा आभ्यन्तर स्वच्छ और निर्मल बना हुआ है और इसीलिए मेरी हर बूँद का सदुपयोग किया जाता है। प्रगति और प्रवाहहीन होने के कारण ही तुम गंदगी का आगार बनी हुई हो। औरों के उपयोग में न आने वाले तुम्हारे जीवन का इस दुनिया में अधिक अस्तित्व नहीं है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.13

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (अन्तिम भाग)

🔶 भारत के नागरिकों की कारों, मोटर साइकिल और यहां तक कि रिक्शों, तांगों में गाते हुए रेडियो सेट तथा ट्रांजिस्टरों को देखकर संसार का कौन-सा देश इस बात पर विश्वास कर लेगा कि भारत एक गरीब देश है और मित्रों की सहायता का अधिकारी है? और यदि वह उसको गरीब समझ कर उसके कारणों पर सोचेगा तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि भारत की गरीबी के प्रमुख हेतुओं में से एक उसके नागरिकों की, फैशनपरस्ती और फिजूलखर्च है। यह एक राष्ट्रीय अपमान है, देश की गौरव गरिमा पर लांछन है। इस पर हम सबको और खासतौर पर भारतीय नौजवानों को गम्भीरता से विचार ही नहीं करना है बल्कि अपनी बालवृत्तियों में सुधार कर कलंक मिटाने का प्रयत्न करना है। यदि हम कपड़ों लत्तों में फैलसूफ हैं तो अपने परिवार वालों अथवा परोक्ष रूप से अपने अनेक देश बन्धुओं को नंगा रहने पर मजबूर करते हैं।

🔷 सुन्दरता, वस्त्रों अथवा वेशविन्यास की विचित्रता अथवा अपव्ययता में नहीं है वह व्यवस्था एवं करीने में है। मोटे तथा सस्ते कपड़े भी यदि ठीक सिले-धुले और पहने गये हैं तो वे मनुष्य के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देंगे। अपनी तथा अपने देश काल के अनुसार ही रहन-सहन रखना बुद्धिमानी, भद्रता तथा सज्जनता है। फैशन के नशे में सब कुछ समझने पर भी पैसा खोना सरासर नादानी है। उस पैसे को बचाकर हम सबको अपने-अपने परिवार तथा राष्ट्र की उन्नति पर खर्च कर जीवन से प्रदर्शन का कलंक धो डालने में ही कल्याण है, शोभा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 112

👉 आज का सद्चिंतन 6 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 October 2018


शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

👉 सफलता का एक मंत्र ये भी है

🔷 दयानन्द नाम का एक बहुत बड़ा व्यापारी था और उसका इकलौता पुत्र सत्यप्रकाश जो पढ़ने से बहुत जी चुराता था और परीक्षा मे भी किसी और के भरोसे रहता और फेल हो जाता! पर एक दिन उसके जीवन मे ऐसी घटना घटी फिर उसने संसार से कोई आशाएं न रखी और फिर पुरी तरह से एकाग्रचित्त होकर चलने लगा!

🔶 एक दिन दयानन्द का बेटा स्कूल से घर लोटा तो वो दहलीज से ठोकर खाके नीचे गिरा जैसै ही उसके माँ बाप ने देखा तो वो भागकर आये और गिरे हुये बेटे को उठाने लगे पर बेटे सत्यप्रकाश ने कहा आप रहने दिजियेगा मैं स्वयं उठ जाऊँगा!

🔷 दयानन्द- ये क्या कह रहे हो पुत्र? सत्यप्रकाश- सत्य ही तो कह रहा हूँ पिताश्री इंसान को सहायता तभी लेनी चाहिये जब उसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो और इंसान को ज्यादा आशाएं नही रखनी चाहिये नही तो एक दिन संसार उसे ऐसा गिराता है की वो फिर शायद कभी उठ ही न पाये!

🔶 दयानन्द- आज ये कैसी बाते कर रह हो पुत्र? बार बार पुछने पर भी पुत्र कुछ न बोला कई दिन गुजर गये फिर एक दिन दयानन्द- आखिर हमारा क्या अपराध है पुत्र, की तुम हमारे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो!

🔷 सत्यप्रकाश- तो सुनिये पिता श्री एक दिन मैं स्कूल से जब घर लौट  रहा था तो एक वृद्ध सज्जन माथे पर फल की टोकरी लेकर फल बेच रहे थे और चलते चलते वो ठोकर लगने से गिर गये जब मैं उन्हे उठाने पहुँचा तो उन्होंने कहा बेटा रहने दो मैं उठ जाऊँगा पर मैं आपको धन्यवाद देता हूँ की आप सहायता के लिये आगे आये!

🔶 फिर उन्होने कहा पुत्र आप एक विद्यार्थी हो आपके सामने एक लक्ष्य भी है और मैं आपको सफलता का एक मंत्र देता हूँ की संसार से ज्यादा आशाएं कभी न रखना! फिर मैंने पूछा बाबा आप ऐसा क्यों कह रहे हो और संसार से न रखुं आशाएं तो किससे रखुं?

🔷 उन्होने कहा मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ पुत्र की जो गलती मैंने की वो गलती आप न करना और आशाएं स्वयं से रखना अपने सद्गुरु और इष्टदेवजी से रखना किसी और से ज्यादा आशाएं रखोगे तो एक दिन आपको असफलताएं ज्यादा और सफलताएं कम मिलेगी!

🔶 मेरा एक इकलौता पुत्र जब उसका जन्म हुआ तो कुछ समय बाद मॆरी पत्नी एक एक्सीडेंट मे चल बसी और वो भी गम्भीर घायल हो गया उसके इलाज मे मैंने अपना सबकुछ लगा दिया वो पूर्ण स्वस्थ हो गया और वो स्कूल जाने लगा और मैं उससे ये आशाएं रखने लगा की एक दिन ये कामयाब इंसान बनेगा और धीरे धीरे मॆरी आशाएं बढ़ने लगी फिर एक दिन वो बहुत बड़ा आदमी बना की उसने मॆरी सारी आशाओं को एक पल मे पूरा कर दिया!

🔷 तो मैंने पूछा की वो कैसे? तो उन्होने कहा की वो ऐसे की जब मैं रात को सोया तो अपने घर मे पर जब उठा तो मैंने अपने आपको एक वृद्धआश्रम मे पाया और जब मैं घर पहुँचा तो वहाँ एक सज्जन पुरूष मिले उन्होने बताया की बाबा अब ये घर मेरा है आपका बेटा मुझे बेचकर चला गया! फिर मैं अपने सद्गुरु के दरबार मे गया क्षमा माँगने!

🔶 फिर मैंने कहा पर बाबा सद्गुरु से क्षमा माँगने क्यों तो उन्होने कहा पुत्र वर्षों पहले उन्होंने मुझसे कहा था की बेटा संसार से ज्यादा आशाएं न रखना नही तो अंततः निराशा ही हाथ आयेगी और फिर मैंने उन्हे प्रणाम करके अपनी आगे की यात्रा शुरू की और आज मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैं इस संसार से नही बस अपने आपसे अपने सद्गुरु से और अपने इष्टदेवजी से आशाएं रखता हूँ!

🔷 और फिर मैं वहाँ से चला आया! दयानन्द- माना की वो बिल्कुल सही कह रहे थे पर बेटा इसमे हमारा क्या दोष है? सत्यप्रकाश- क्योंकि जब उन्होंने अपने पुत्र का नाम बताया तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई! क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र का नाम दयानन्द बताया और वो दयानन्द जी कोई और नही आप ही हो!

🔶 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना हमेशा ऐसी आशाएं रखना जो तुम्हे लक्ष्य तक पहुँचा दे पर संसार से कभी मत रखना अपने आपसे, अपने सद्गुरु से और अपने ईष्ट से रखना क्योंकि जिसने भी संसार से आशाएं रखी अंततः वो निराश ही हुआ और जिसने नही रखी वो लक्ष्य तक पहुँचने मे सफल हुआ!

🔷 मित्रों तो सफलता का एक सूत्र ये भी है की संसार से ज्यादा आशाएं कभी मत रखना क्योंकि ये संसार जब भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की आशाओं पर खरा न उतरा तो भला हम और आप क्या है!

👉 आज का सद्चिंतन 5 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 20)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि   
 
🔷 जिन्होंने विनिर्मित प्रज्ञा पीठों की हजारों की संख्या में भव्य इमारतें देखी हैं, वे एक ही बात सोच सकते हैं कि यह अपने समय का अभिनव सृजन आन्दोलन है। चार धाम बनाने वालों को जितना श्रेय मिला उसकी तुलना में यह सृजन कार्य कितना महँगा और कितना विस्तृत बन पड़ा है, इसे एक आश्चर्य ही कहना चाहिए। प्रचलित कुरीतियों एवं अवांछनीयताओं के साथ टक्कर लेने की मोर्चेबन्दी को दूसरे महाभारत के समतुल्य कहा जा सकता है।
  
🔶 ईर्ष्यालुओं दुर्जनों और विद्वेषियों के आक्रमण सच्चाई को किस प्रकार हराने और तोड़ने में असफल होते हैं, इस तथ्य को मात्र वे लोग ही जानते हैं जो अपने निकट सम्पर्क में रहे और उन हरकतों से परिचित रहे हैं। चूँकि इन प्रसंगों की कभी चर्चा नहीं की गई, प्रतिरोध के लिए एक पतली छड़ी तक नहीं उठाई गई तो वे अनाचार कैसे प्रगट होते, जिन्हें दैवी प्रयोजनों में विश्वामित्र यज्ञ-ध्वंस षड्यन्त्र की ही उपमा दी जा सकती है। भक्त की रक्षा कैसे होती है, इसके प्रमाण में प्रहलाद की, गज की, द्रौपदी आदि की उपमा दी जाती है। एक कड़ी और भी इन्हीं दिनों की यह जुड़ सके तो कोई हर्ज नहीं। इसे भी एक सिद्धि कह सकते हैं।
  
🔷 सहायता के लिए किसी के आगे हाथ न पसारने के पीछे कोई अहंकार प्रदर्शन का भाव नहीं रहा किन्तु यह एक प्रयोग परीक्षण था कि यदि भगवत् प्रयोजन के लिए कहीं से कोई प्रामाणिकता उभरे तो उसकी शक्ति और सम्पदा कितनी बढ़ जाती है? इसके लिए पुरातन उदाहरण हनुमानजी का है। नया उदाहरण अपने समय के इस प्रयोग-परीक्षण को समझा जा सकता है कि गंगा के याचना न करने पर भी हिमालय किस प्रकार कभी न सूखने वाली जलराशि प्रदान करता रहता है? अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है और वह सुदामापुरी को द्वारिका पुरी में बदल जाने का कैसे उदाहरण बनती है? इस दृश्य को कोई एक प्रकार से सिद्ध स्तर की भी गिन सकता है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 22

👉 We can control

🔷 We cannot control the way people interpret our ideas or thoughts, but we can control the words and tones we choose to convey them. Peace is built on understanding, and wars are built on misunderstandings. Never underestimate the power of a single word, and never recklessly throw around words. One wrong word. or misinterpreted word, can change the meaning of an entire sentence - and even start a war. And one right word, or one kind word, can grant you the heavens and open doors.

~ Suzy Kassem

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 3)

🔷 इन जलते राष्ट्रीय सत्यों को भारतीय नौजवान वर्ग नहीं समझ पा रहा और न वह तब तक समझ ही पायेगा जब तक प्रयत्नपूर्वक उसके मस्तिष्क में यह विचार नहीं भरे जायेंगे कि फैशनपरस्ती मानसिक न्यूनता का द्योतक है, आन्तरिक दरिद्रता का विज्ञापन है। उसका यह विचार कि बनाव-शृंगार अथवा प्रदर्शनपूर्ण, वेश-विन्यास से वह अपने व्यक्तित्व को ऊंचा कर रहा है—भ्रमपूर्ण है। बाहरी आडम्बरों से विरचित व्यक्तित्व स्वयं इसका गवाह है कि व्यक्ति व्यक्तित्वहीन है, ओछा और बालवृत्ति वाला है। मनुष्य का व्यक्तित्व आत्मा की उच्चता है जो चेहरे पर आकर्षण बन कर बोलती है वस्त्रों की तड़क-भड़क व्यक्तित्व की छटा नहीं है और न उससे किसी के हीन व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही होता है। उसे यह भ्रान्त धारणा हृदय से निकाल देनी चाहिए कि वेशविन्यास की विलक्षणता उसे विलक्षण सिद्ध कर सकेगी।

🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।

🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111

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