मंगलवार, 21 अगस्त 2018

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (अन्तिम भाग)

🔶 इसके विपरीत हम जितना अधिक स्वार्थ त्याग और पर उपकार के विचारों का केन्द्र अपने अन्दर बनाते जायेंगे, उतना ही अधिक हम आनन्द और शाँति को प्राप्त होंगे। जो लोग हमसे किसी प्रकार का फायदा उठाते हैं वह ही गुप्त और प्रकट रूप से हमारा कल्याण करने वाले होते हैं। हमें ऐसी तैयारी कर लेनी चाहिये कि हम मन, कर्म, वचन से हर समय दूसरों का भला ही सोचते रहें-ऐसा करने से निश्चय हमारे बुरा चाहने वालों की संख्या कम होकर हमारा भला चाहने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी और हम अपने चारों ओर सुखद और शान्तिपूर्ण वातावरण बना सकेंगे। जब मनुष्य का मन क्रोध ईर्ष्यादि बुरे विचारों से रहित हो जाता है तो वह असीम दैवी शक्ति को धारण कर लेता है- उस समय अनेक शत्रु होने पर भी वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

🔷 इस प्रकार का अद्भुत शान्तिपूर्ण जीवन बनाने में हमें उन घड़ियों में विशेष सतर्कता पूर्वक धैर्य से काम लेने की जरूरत है। जब कि किसी प्राणी द्वारा हमें हानि पहुँचाई जा रही हो। आध्यात्मिक जीवन में यह समय ही-परीक्षा का समय होता है। भरपूर साहस और दृढ़ता से हमें-ऐसे विचारों को हटाने में असीम शक्ति से काम लेना चाहिये जो उस समय में दूसरों का अकल्याण चाहने को हमारे मन में आते हैं। ऐसे समय में हम मन से उनका अकल्याण न चाहें, पर हाँ! कर्तव्य द्वारा उसका उत्तर देना कोई बुरा नहीं है।

🔶 वास्तव में निष्कपट और सरल हृदय वाले व्यक्ति उत्तम लौकिक और पारलौकिक सुखों के स्वामी होते हैं। दगा फरेब, झूठ, ईर्ष्यादि बुरे विचारों से काम चलाने वाले अल्पकालीन तुच्छ सुखों को प्राप्त होते हैं।

🔷 अतएव मन, कार्य, वाणी से सदैव दूसरों का हित ही विचारना और करना चाहिये और प्रातःकाल बिस्तर त्यागते समय प्रभु का नाम स्मरण करने के बाद इस मन्त्र को भी एक बार अवश्य उच्चारण कीजिये कि- “हे प्रभु! संसार के सभी प्राणियों का कल्याण हो।”

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/February/v1.8

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Aug 2018


👉 अहंकार सत्कर्म का भी बुरा।

🔶 एक बार एक स्त्री पहाड़ पर धान काट रही थी। इतने में एक दुष्ट मनुष्य उधर आया और उसके साथ दुष्टता करने पर उतारू हो गया। पहले तो स्त्री ने आत्मा रक्षा के लिए लड़ाई झगड़ा किया पर शरीर से दुर्बल होने के कारण जब उसे विपत्ति आती दिखी तो पहाड़ से नीचे कूद पड़ी। ईश्वर ने उसकी रक्षा की। उसे जरा भी चोट न लगी और प्रसन्नता पूर्वक घर चली गई।

🔷 अब उसे अपने पतिव्रत का अभिमान हो गया। हर किसी से शेखी मारती कि मैं ऐसी सतवन्ती हूँ कि पहाड़ से गिरने पर भी मेरे चोट नहीं लगती। पड़ोसी इस बात पर अविश्वास करने लगे और कहा ऐसा ही है तो चल हमें आँखों के सामने पहाड़ पर से कूद कर दिखा। दूसरे दिन उस स्त्री ने सारे नगर में मुनादी करा दी कि आज मैं पहाड़ पर से कूदकर अपने सतवन्ती होने को परिचय दूँगी। सभी गाँव इकट्ठा हो गया और उसके साथ चल पड़ा। वह पहाड़ पर से कूदी तो उसकी एक टाँग टूट गई। मरते मरते मुश्किल से बची।

🔵 उस असफलता पर उसे बड़ा दुःख हुआ। और दिन रात खिन्न रहने लगी। उधर से एक ज्ञानी पुरुष निकले तो स्त्री ने अपनी इस असफलता का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि पहली बार तू धर्म की रक्षा के लिए कूदी थी, इसलिए धर्म ने तेरी रक्षा की। दूसरी बार तू अपनी प्रशंसा दिखाने और अभिमान प्रकट करने के उद्देश्य से कूदी तो उस यश कामना और अभिमान ने तेरा पैर तोड़ दिया।

🔶 स्त्री की अपनी भूल मालूम हुई और उसने पश्चाताप करके अपनी मानसिक दुर्बलता को छोड़ दिया।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1961 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/May/v1.25

सोमवार, 20 अगस्त 2018

👉 आत्म निरीक्षण

🔷 “परमात्मा ने हमें बुद्धि दी है सोचने के लिये; इन्द्रियाँ दी है निरीक्षण के लिये। हमें भली प्रकार निरीक्षण कर वस्तुओं के गुण-दोष समझकर तर्क द्वारा ही सच्चाई की खोज करनी चाहिये। यही हमारा ब्रह्मास्त्र है। देशकाल के अनुसार परिस्थितियाँ बदल जाती है, नई बातें पुरानी हो जाती है। कोई बात नई या पुरानी होने से लाभदायक नहीं होती, बुद्धि से सिद्ध किया हुआ उसका उपयोग ही उसे व्यवहार के योग्य बनाता है।”

सन्त सुकरात

👉 देने वाला कौन?

🔷 एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

🔶 कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।

🔷 समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।

🔶 अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।

🔷 लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।

🔶 कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।

🔷 साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।

🔶 कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!

🔷 दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं तो कहते हैं मैंने दिलाया। वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निहित मात्र बनाया हैं उन तक उनकी जरूरतों तक पहुचाने के लिये तो निहित होने का घमंड कैसा ??

🔶 दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप, प्रभु आकर द्वार पे, दूर करें संताप!!

👉 आज का सद्चिंतन 20 Aug 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 32)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 अर्जुन ने पाताल से गंगा उभारकर भीष्म को ताजा जल पिलाया था। भीष्म भी कुछ कम न थे। शर शैया पर पड़े हुए असह्य वेदना सहते हुए भी उन्होंने मौत से कह दिया था कि अभी मरने की फुरसत नहीं है। वह लौट गई और तब आई जब उत्तरायण सूर्य में उन्होंने चलने का मुहूर्त निश्चित किया था। मनस्वी के आगे नियति भी पानी भरती है। सावित्री ने यमराज के हाथों से अपने मृत पति को जीवित करा, वापस लौटा लिया था। दमयंती के नेत्र तेज से व्याध का जल जाना प्रसिद्ध है।

🔶 गौतम ऋषि के शाप से सगर पुत्रों की क्या दुर्गति हुई थी, यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। राणा सांगा अस्सी गहरे घावों से आहत हुए भी मृत्युपर्यंत शत्रु से लड़ते रहे थे। वाल्टेयर ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही इतने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे थे कि उनके पुरुषार्थ को देखते हुए आश्चर्यचकित हुए बिना रहा नहीं जाता। संसार के इतिहास में ऐसे अनेकों करोड़पतियों का उल्लेख है, जिनकी निजी योग्यता और पूँजी नहीं के बराबर थी फिर नियति ने उन्हें अदम्य उत्साह, सूझ-बूझ के सहारे धन कुबेर बनने का अवसर प्रदान किया। बाटा से लेकर टाटा एवं हेनरी फोर्ड, रॉकफेलर तक की बड़ी नामावली इसी पंक्ति में खड़ी दीख पड़ती हैं।
  
🔷 सरदार पटेल द्वारा बागी रियासतों को भी भारत में विलय के लिए सहमत कर लिया जाना ऐसा कार्य है, जिसमें उनके महान व्यक्तित्व की झलक झाँकी मिलती है। बारडोली सत्याग्रह में भी वे अपना कमाल दिखा चुके थे। जापान के गाँधी कागबा ने एक गंदे मुहल्ले में सेवा कार्य आरंभ करते हुए अंतत: जापान के पतितोद्धारक के रूप में अद्भुत प्रतिष्ठा अर्जित की थी। बिहार का हजारी किसान अपनी लगन के बल पर उस क्षेत्र में हजार आम्र उद्यान लगाने में सफल हुआ था।
  
🔶 ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। वे भूतकाल में भी असंख्य थे और अब भी जहाँ-तहाँ एक-से-एक बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ अर्जित कर रहे हैं। इसमें व्यक्ति विशेष का नहीं, वरन् उसकी परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। यह हर किसी के लिए संभव है। आवश्यकता इतनी भर है कि लगन सच्ची हो और उसके लिए योजनाबद्ध रूप से पुरुषार्थ करने में कुछ उठा न रखा जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 41

👉 Vedmurti Taponishtha Pandit Shriram Sharma Acharya

🔷 It is indeed rare in the history of mankind that great souls like Bhagirath and Dadhichi graced the Earth with the nectar of the holy Ganges and nurtured the roots of divinity by their tapa and self-sacrifice. Pandit Sriram Sharma Acharya undoubtedly belongs to this category of divine rishis. His life and work represent a marvellous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius. Rev. Pt. Sriram Sharma was a rishi of the present age whose heart pulsated with compassion for all beings.

🔶 Every moment of his life was devoted to the welfare of people and the refinement of the moral and cultural environment. He also pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion relevant in the challenging circumstances of the present times. His personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. It would require several volumes to record the attainmens of his life. Here we are only giving a glimpse of his superhuman personality. Acharya Sriram Sharma (revered as "Gurudev" by his disciples) was a great devotee of Goddess Gayatri and had attained perfection in realising its utmost potential.

🔷 He successfully practised and mastered the highest kinds of sadhanas described in Hinduism. He also deciphered the hidden science of Tantras. He attained the supreme knowledge of the philosophy and science of the Gayatri Mantra and yoga. In essence, he perfected a vast range of spiritual disciplines. He pioneered experiments on simple sadhanas, which could be easily pursued by the common masses. He initiated programmes of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status. He propagated this knowledge for the enlightenment of people across the globe.

🔶 The early years: Sriram Sharma was born on the 20th September 1911 as the son of Pt. Roopkishor Sharma and Mata Dankunvari Devi in Anvalkheda (Dist. Agra, India). That his saintly heart was concerned for the welfare of common masses was clearly expressed since his childhood when, as a small boy, he took a brave step of nursing an old "untouchable" woman suffering from leprosy against the strong disapproval and displeasure of his family.

🔷 The eminent patriot, scholar and founder of the Banaras Hindu University Pt. Madan Mohan Malaviya initiated Sriram in the worship of Gayatri mantra when he was nine years old. On the auspicious day of Vasant Panchami festival, January 18, 1926, a guru by the name of Swami Sarveshvaranandji "a great Himalayan yogi" appeared before him in astral body from the flame of the dipaka (lamp)1 during his Gayatri worship. This sparked the revelation of the divine origin and purpose of his life and bestowed upon him with the grace and guidance of his guru...

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 2)

🔷 आये दिन जो अज्ञात विपत्तियाँ सामने आती रहती हैं, उनकी भयंकरता भी कम नहीं। राजनैतिक संघर्षों के कारण जनता के कष्टों में वृद्धि होती है, कोई उपद्रव करता है दण्ड किसी को सहना पड़ता है। निर्दोष व्यक्ति का भी कलेजा काँपता रहता है कि कही अकारण ही कोई चपेट मुझे न लग जाये। देवी प्रकोप का भी पूरा जोर है। इस साल नदियों में बड़ी भारी बाढ़ें आईं, जिससे हजारों गाँव का नुकसान हुआ लाखों बीघा कृषि नष्ट हो गई, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूचाल, तूफान, अंधड़ के कारण बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी। गुँडे बदमाशों का जोर बढ़ने से आये दिन अपराध बढ़ते रहते हैं। आज का दिन किसी प्रकार कट गया हो कल के लिए आशंका बनी रहती है कि कही कोई नई विपत्ति न टूट पड़े। शान्ति, स्थिरता, संतोष में कमी होती जाती है और बेचैनी बढ़ती जाती है।

🔶 यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

🔷 वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है।

🔶 इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (भाग 1)

🔷 जीवन है? और उसको धारण करने का क्या प्रयोजन है? एक परिपूर्ण सफल जीवन क्या होता हैं? उसके क्या साधन हो सकते हैं? इस प्रकार के अन्य और बहुत से विचार कुछ स्वभावतः ही मनुष्य के मन में उठा करते हैं।

🔶 वास्तव में मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है वह तो एक ही है केवल ईश्वर प्राप्ति परन्तु यह तो सर्व श्रेष्ठ और घोर अन्तिम श्रेणी की बात है। जहाँ पर पहुँचने का सौभाग्य, महान् पुण्यात्मा योगी जनों को ही प्राप्त होता है।

🔷 सर्व साधारण हम आप जैसे मनुष्यों का तो जीवन उद्देश्य कर्त्तव्य पालन ही है-अर्थात् कुशलता, निष्कपटता एवं सरलता पूर्वक सहज स्वभाव से अपना-2 कार्य करना और परिणाम स्वरूप संसार से जाते समय अधिक से अधिक खुशी का भण्डार संसार में छोड़ते हुए विशेष आनन्द और शान्ति को साथ ले जाना। यह है साँसारिक साधारण जीवन की सफल झाँकी।

🔶 हमें ऐसा कर्त्तव्यनिष्ठ सरल जीवन बनाने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिये। इस प्रकार के जीवन का मूलाधार हमारे विचार ही होते हैं। एक आदर्श जीवन विचारों का ही तो संग्रह होता है।

🔷 दूसरों की उन्नति अथवा पतन देखकर जब हम अशुद्ध मन से ईर्ष्या आदि बुरे भावों के शिकार होते हैं तो इस प्रकार दूसरों के कल्याण चाहने वाले बुरे विचारों का संग्रह होकर हमारा मन घोर कलुषित हो जाता है जिस कारण हम स्वयमेव दुःख सागर में डुबकियाँ लेने लगते हैं इस प्रकार हमारा आध्यात्मिक पतन होना शुरू हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8

रविवार, 19 अगस्त 2018

👉 पति और पत्नी कैसे रहने चाहिए---

🔶 कबीर जी रोज सत्संग किया करते थे, लोग आते और चले जाते। एक आदमी सत्संग खत्म हो गया फिर भी बैठा रहा। कबीर जी बोले क्या बात है वो इन्सान बोला मैं तो काफी दूर से आया हूँ मुझे आपसे कुछ पूछना है। क्या पूछना है? कबीर बोले।

🔷 वो कहने लगा मैं गृहस्थी हूँ मेरा घर में झगड़ा होता रहता है। उसके बारे में जानना चाहता हूँ की झगड़ा कैसे दूर हो तो कबीर जी चुप रहे थोड़ी देर में कबीर जी ने अपनी पत्नी से कहा लालटेन जला के लाओ। कबीर की पत्नी लालटेन जला कर ले आई। कबीर जी के पास रख दी वो आदमी भी वही बैठा था सोच रहा था इतनी दोपहर है और लालटेन माँगा ली। खैर! मुझे इससे क्या।

🔶 फिर कबीर जी बोले कुछ मीठा दे जाना। तों उनकी स्त्री नमकीन देकर चली गयी। उस आदमी ने फिर सोचा यह तो शायद पागलो का घर है मीठे के बदले नमकीन, दिन में लालटेन, वो आदमी बोला कबीर जी मैं चलता हूँ। मन में सोचने लगा कहाँ फँस गया।

🔷 कबीर जी समझ गए बोले आपको आपके झगड़े का हल मिला की नहीं। वो बोला क्या मिला? कुछ नहीं। कबीर जी ने कहा जैसे मैंने लालटेन मंगवाई घर वाली कह सकती थी की तुम क्या सठीया गए हो इतनी दोपहर में क्या करोगे।

🔶 उसने सोचा होगा किसी काम के लिये लालटेन मंगवाई होगी । मीठा मंगवाया तों नमकीन देकर चली गयी, हो सकता है घर में न हो पर में भी चुप रहा। इसमे तकरार क्या?

🔷 तुम भी समझो, तकरार करना छोड़ो। एक-दुसरे की बात को समझो। आपसी विश्वास बनाओ। वो आदमी हैरान था यह सब इन्होंने मेरे लिये किया। उसको समझ आने लगी गृहस्थी हो या दोस्ती में तालमेल आपसी विश्वास बहुत जरुरी है।

🔶 किसी से वैर व तकरार न रखो..... आवश्यक होने पर एक दूसरे की सहमति में इज़हार करो ।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 31)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 उच्चस्तरीय प्रतिभा ही ब्रह्मतेजस् है। उसी को ब्रह्मवर्चस भी कहते हैं। उसे जिसने भी पर्याप्त मात्रा में अर्जित कर लिया है, वह शरीर से सामान्य होते हुए भी अपनी चेतनात्मक प्रखरता के सहारे ऐसे पुण्य प्रयोजन संपन्न कराने में समर्थ रहा है कि उसे अनुकरणीय भी माना जाए और अभिनंदनीय भी। भगवान बुद्ध का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उन्होंने अपने जीवनकाल में एक लाख भिक्षु-भिक्षुणी परिव्राजक बनाकर विश्व के कोने-कोने में धर्म-चक्र-प्रवर्तन के लिए भेजे थे और वे सभी एक-से-एक बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियाँ पाने में सफल हुए थे। अशोक और हर्षवर्धन ने उनके प्रतिपादन से प्रभावित होकर अपना विपुल-वैभव उनके आदेशों पर निछावर कर दिया था। आम्बपाली और अंगुलिमाल जैसों ने निकृष्टता का परित्याग कर, उत्कृष्ट स्तर का अपना कायाकल्प कर लिया था।
  
🔷 चाणक्य की एकाकी योजना ने भारत पर आक्रमण करते रहने वाले आक्रांताओं, आतंकवादियों को उनके बिलों में वापस लौटने के लिए बाधित कर दिया था। अनेक अनुभवी उनके सहायक बने थे। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करने से लेकर उसके संचालन तक की जिम्मेदारी का निर्वाह उनकी प्रतिभा ही करती रही थी। चुंबक अपने समकक्षों को खींचता, जुटाता तो अनायास ही रहता है।
  
🔶 महामना मालवीय जी आरंभ में सामान्य वकील और संपादक थे, पर जब उन्होंने हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का संकल्प लिया तो प्राय: पचास करोड़ की संपत्ति उन लोगों से जुटाई, जिनके साथ उनकी कोई पूर्व की जान-पहचान तक न थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 40

👉 Materialism and Spirituality: Two ways of Living (Last Part)

🔶 The mind is different from the rest of the senses in that it is always unsatisfied and ambitious. New hopes and ambitions arise once the old ones are fulfilled. Suppose a person desires to buy a house. He would remain preoccupied with that thought because there is an attraction in it. Once a house is bought, the attraction fades. If a person does not have children, he would yearn for them; once he has children, they appear burdensome. A similar principle applies to other things, such as household items, clothes, etc and to attachment towards people. Therefore greed and attachment are attractive only until they are fulfilled. Egoism also follows a similar principle.

🔷 A secretary in a company feels his job status is low and aims for a higher status so that he can elevate his standing in the society. It is possible that several persons within the company may be trying for the same position. Therefore he becomes an enemy for them, since now he is an extra competitor in the race. In case he does succeed in fulfilling his egoistic desire in progressing towards his dream position, mental peace would elude him because there would be several people scheming to dislodge him. His ego thus becomes his own dangerous adversary. The worth and importance of a well-mannered, disciplined person is obviously more than that of an egoistic person.

🔶 No circumstances or individuals can challenge a gentleman, whereas examples of egoistic people suffering ruin can be seen all around us. A gentleman is respected while an egoistic person is ignored....

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 1)

🔶 आज हम चारों ओर भयंकर दावानल सुलगती हुई देखते हैं। महायुद्ध का दानव लाखों मनुष्यों को अपनी कराल दाढ़ों के नीचे कुचल कुचल कर चबाते जा रहा है। खून से पृथ्वी लाल हो रही है। आकाश से ऐसी अग्नि वर्षा हो रही है जिससे सहस्रों निरपराध प्राणी अकारण ही चबाने की तरह जल-भुन रहे हैं। कराह और चीत्कारों से सारा आकाश मण्डल गुँजित हो उठा है। नन्हें नन्हें बालक अपने माता पिताओं के लिए बिलख रहे हैं। माताएं अपने पुत्रों के लिए और पत्नियाँ अपने पतियों के लिए, अश्रुपात कर रहीं हैं। कितने घरों में, किस प्रकार करुण क्रन्दन हो रहें हैं, इन मर्म कथाओं को यदि प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किया जाये तो वज्र का भी कलेजा फटने लगेगा।

🔷 अकेला युद्ध ही क्यों महामारियों का प्रचंड प्रकोप आप देखिए। अनेक प्रकार के नये-नये अश्रुत पूर्व रोग उठ खड़े हुए हैं। चिकित्सा करने वाले परेशान हैं, उपचार हतवीर्य साबित होते हैं, अर्धमृत या मृत लाशों के ढेर घर एवं मरघटों में आसानी से देखे जा सकते हैं। रोगी और उनकी परिचर्या करने वाले सभी की बेचैनी बढ़ती चली जा रही है। जीवन भर बने हुए हैं, जो साँसें बीत रही हैं वह भारी और कष्टकर प्रतीत होती हैं। दवा के लिए पैसा नहीं, पथ्य के लिए पैसा नहीं, असहायवस्था में पड़े हुए लोग बेबसी आँसू घूँट रहे हैं।

🔶 महंगी का तो कुछ कहना ही नहीं, हर चीज पर चौगुने आठ गुने दाम बढ़ते जा रहे हैं। पैसा खर्च करने पर भी वस्तुएं प्राप्त होती नहीं। अच्छा अब नसीब नहीं, खाद्य पदार्थों का लोप होता जाता है। व्यापार चौपट हो रहे हैं, उद्योग धंधे बढ़ते नहीं, बेकारी में कमी नहीं होती खर्च बढ़ रहे हैं पर आमदनी नहीं बढ़ती आधे पेट खाने वालों और आधे अंग ढकने वालो की संख्या बढ़ती जा रही है। जी तोड़ परिश्रम करने पर भी भोजन वस्त्र की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। कुछ अमीरों या युद्ध सम्बन्धी कोई व्यवसाय प्राप्त कर लेने वाले भाग्यवानों की बात अलग है, किन्तु साधारण जनता की जीवन निर्वाह समस्या दिन-दिन गिरती चली जा रही है, तिल तिल करके अभावों की ज्वाला में लोगों को झुलसना पड़ रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 स्वार्थी जीवन मृत्यु से बुरा है।

🔶 यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।

🔷 संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।

🔶 उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए।
1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना,
2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।

🔷 सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा- ”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”

🔷 संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा- ”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.8

शनिवार, 18 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 30)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 गरमी संघर्ष से उत्पन्न होती है। हलचल और प्रगति भी उसी के सहारे बन पड़ती है। प्रतिभा परिष्कार के लिए भी वही करना पड़ता है। अखाड़े में कड़ी मेहनत किए बिना कोई पहलवान कैसे बने? सैनिकों को अनेक प्रकार के कठिन अभ्यास आए दिन करने पड़ते हैं। नदियों का प्रवाह अनेक चट्टानों को उलटना हुआ आगे बढ़ता है। मोरचा जीतने के लिए रणक्षेत्र में अपने कौशल का परिचय देना होता है। भँवरों वाली तेजधार को चीरते हुए नाव को पार ले जाने वाले साहस का परिचय ही किसी नाविक को विशिष्टता का गौरव प्रदान करता है।
  
🔶 प्रतिभा परिष्कार की आरंभिक शर्त है— अपने आपसे जूझना, इस हेतु आलस्य और प्रमाद से सर्वप्रथम लड़ना पड़ता है। उसके स्थान पर चुस्त-दुरुस्त रहने की जागरूकता को धारण करना पड़ता है। निराशा, अनुत्साह, चिंता, खिन्नता जैसे मानसिक दुर्गुणों के साथ तब तक संघर्ष करना पड़ता है, जब तक कि उनके स्थान पर आशा, प्रसन्नता, उमंग, निश्चिंतता, निर्भयता और शिष्टता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपने आपको प्रतिष्ठित न कर लें। यह नित्य ध्यान रखने और निरंतर अभ्यास करने का विषय है, जिसे बिना रुके, बिना हारे, अनवरत रूप से क्रियान्वित ही किए रखना चाहिए।
  
🔷 प्रतिभा त्रिवेणी की तरह है, जिसमें शारीरिक ओजस्, मानसिक तेजस् और अंतराल में सन्निहित वर्चस् को जगाना, उभारना और प्रखरता संपन्न बनाने के स्तर तक उठाना पड़ता है। संयम सध सके तो स्वस्थ रहने की गारंटी मिल जाती है। उपयुक्त काम का चुनाव करके, उसमें अभिरुचि, एकाग्रता और तत्परता का नियोजन किए रखा जाए, तो साधारण काम-काज भी इस अभ्यास के सहारे अधिकाधिक बुद्धिमत्ता और कुशलता प्रदान करते चलते हैं। इसी आधार पर शारीरिक ओजस् और मानसिक तेजस् की उतनी मात्रा उपलब्ध हो सकती है, जिस पर संतोष और गर्व अनुभव किया जा सके। सदाशयता पर सघन श्रद्धा के होने का नाम ही वर्चस् है। आदर्शवादिता इसी अवलंबन को अपनाती है और उत्कृष्टता को इससे कम में चैन नहीं पड़ता। वर्चस् जिसके भी अंतराल में उभरता है उसमें शालीनता की, सदाशयता की, सज्जनता की कमी नहीं रहती। इस दिव्यता का जितना अंश जिसके हाथ लग जाता है, वह उतने ही अंशों में धन्य हो जाता है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 39

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (अन्तिम भाग)

🔷 सात्विक अहंकार वाला साधक अपनी बुद्धि के अनुसार किसी एक तरफ झुक पड़ता है। वह किसी एक निर्दिष्ट साधन पद्धति को अंगीकार करके उसकी सिद्धि में तन्मय हो जाता है। दया या परोपकार आदि किसी एक सिद्धि के मार्ग को ग्रहण करके अपने चित्त की प्रवृत्ति के अनुसार उसकी साधना में जो संतोष उसे मिलता है उसी से वह संतुष्ट रहने लगता है। साधक का सात्विक-अहंकार जिसे श्रेयस्कर बतलाता है उसी को वह ग्रहण करता है और दूसरी तरफ निगाह उठाकर भी नहीं देखता।

🔶 हमको सदा यह बात मन में समझते रहना चाहिये कि साधन का अभिप्राय अपने व्यक्तिगत जीवन को लाभ पहुँचाना नहीं है। ये वस्तुएँ यद्यपि सिद्धि के अंग है, तथापि से पूर्ण सिद्धि नहीं है। पूर्ण योग का साधक पहले से ही अपने मन में यह निश्चय कर लेता है कि मैं किसी वस्तु के लिये भगवान से प्रार्थना नहीं करूँगा जो कुछ वह देगा उसे ही हृदय में बिना किसी प्रकार का दुर्भाव लाये स्वीकार कर लूँगा। यदि आप आनन्द की बात पूछे, तो मैं कहता हूँ कि इससे बढ़कर आनन्ददायक बात और कौन सी हो सकती है कि हमने अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है। जब हम इस बात को स्वीकार करते है कि भगवान की प्रत्येक लीला आनन्दयुक्त है, तो हमको आधार बनाकर वह जो लीला करता है उसी में हमें आनन्द मानना चाहिये।

🔷 सात्विक अहंकार के रहते हुए भी साधना पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिये योगों को पूर्णता प्राप्त करने के निमित्त उसका भी परित्याग करना होगा। सब धर्मों में मुक्ति, निर्वाण आदि को साधना का अन्तिम लक्ष्य बतलाया है, पर पूर्ण योग के साधक को इस लक्ष्य को भी त्याग देना होगा। साधक को बिना किसी भी भली बुरी अभिलाषा के केवल भगवान के रूप और उसकी लीला का ही ध्यान करना होगा इसी से वह सच्चे आनन्द का अधिकारी बन सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 10

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 August 2018


👉 चालाक बगुला और केकड़ा

🔷 एक बार समुन्द्री जीव जब सुबह की धूप सेकने किनारे पर आए तो अपने शत्रु बगुले को एक टांग पर खड़े प्रार्थना करते देखा। आज उसने उन पर आक्रमण भी नहीं किया था।

🔶 सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस बगुले को क्या हुआ। कुछ साहसी मछलियां, कछुए और केकड़े इकट्टे होकर उसके पास पहुंचे और पूछा- ”क्या बात है बगुले दादा। आज किस चिंता में हो?“

🔷 ”भाई लोगो! मैंने आज से भगताई शुरू कर दी है। कल ही मुझे स्वप्न आया कि दुनिया खत्म होने वाली है, इसलिए क्यों न भगवान का नाम लिया जाए और सुनो, यह तालाब भी सूखने वाला है। तुम लोग जल्दी ही किसी दूसरी जगह चले जाओ।“

🔶 ”क्या तुम सच कह रहे हो।“ ”हां भाई! मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा। तुम देख ही रहे हो कि अब मैं तुम लोगों का शिकार भी नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैंने मांस खाना भी छोड़ दिया है। राम…राम…राम….।“

🔷 बगुले का साधुपन देखकर सबको भरोसा आ गया कि बगुला भगत जो कह रहे हैं, सच है। ”बगुला भगत जी! अगर यह तालाब सूख गया तो हमारे बाल बच्चे तो तड़प-तड़पकर मर जाएंगे।“ मेंढक ने कहा- ”कोई उपाय करो।“

🔶 ”भाई मैं आज रात ईश्वर से बात करता हूं, फिर जैसा वह कहेंगे तुम्हें बता दूंगा। मानना न मानना तुम्हारी मर्जी।“ सभी लोग बगुला भगत के पांव छूकर चले गए। दूसरे दिन बगुला भगत ने बताया कि भगवान ने कहा है कि अगर आप सब बगल वाले जंगल के तालाब में चले जाओ तो बच जाओगे।

🔷 ”मगर हम वहां जाएंगे कैसे?“ सबने चिन्ता जाहिर की। ”यदि यहां से वहां तक एक सुरंग खोद ली जाए तो…।“ एक कछुआ बोला। ”अरे भाई ये क्या आसान काम है?“ केकड़ा बोला- ”और फिर इतनी लम्बी सुरंग कौन खोदेगा।“

🔶 तभी एक मछली बोली- ”एक और भी उपाय है। बगुला भगत जी हमें अपनी पीठ पर बैठाकर वहां छोड़ आएं।“ यह सुनते ही बगुला भगत बोला- ”मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूं। इतना बोझा भला….।“

🔷 ”भगत जी! आप हमें एक-एक करके वहां ले जाओ। आप तो अब साधु हो गए हैं और साधु का काम है दूसरों की रक्षा करना।“ सबने गुहार लगाई। ”अब जब आप इतना कह रहे हैं तो ठीक है। आओ, ये शुभ काम मैं आज से ही शुरू कर दूं। आओ, तुममें से एक मछली मेरी पीठ पर बैठ जाए।“

🔶 एक चतुर मछली फौरन उछलकर उसकी पीठ पर बैठ गई। बगुला भगत उसे लेकर फौरन उड़ गया।

🔷 इसी प्रकार कई दिन गुजर गए। बगुला रोज दो-तीन मछलियों, मेंढकों, कछुओं आदि को ले जाता रहा। एक दिन केकड़े की बारी आई। केकड़ा उसकी पीठ पर सवार था। बगुला भगत सोच रहा था, आज तो मजा आ जाएगा। केकड़े का बढि़या मांस खाने को मिलेगा।

🔶 उधर, एक पहाड़ी पर से गुजरते हुए केकड़े को ढेर सारी मछलियों की हडिृयां, कछुओं के खोल और मेंढकों के पिंजर पड़े दिखाई दिए तो वह बगुले भगत की सारी चालाकी समझ गया और बिना एक पल गंवाए उसने बगुले की गरदन दबोच ली।

🔷 ”अरे केकड़े भाई, क्या करते हो?“ बगुला चिल्लाया। ”पाखण्डी बगुले। फौरन मुझे मेरे तालाब पर वापस लेकर चल वरना बेमौत मारा जाएगा। मैं तेरी सारी चालाकी समझ गया। अब चूंकि तू बूढ़ा हो चुका है, इसलिए तुझसे शिकार नहीं होता। इसीलिए तूने यह चाल चली और भोली-भाली मछलियों को यहां लाकर खा गया। अब अगर जिंदगी चाहता है तो वापस चल वरना तेरी कब्र भी यहीं बन जाएगी।“

🔶 बगुला मरता क्या न करता। वह वापस पलटा और उसी तालाब पर आ गया। उसका ख्याल था कि केकड़ा उसे छोड़ देगा, मगर केकड़े ने उसे छोड़ा नहीं। उसने उसकी गरदन काट दी और तालाब में जाकर सबको उसकी हकीकत बता दी।

🔷 मौत के मुंह से बच गए सभी जीव केकड़े का धन्यवाद करने लगे।

शिक्षा – जिसका स्वभाव धूर्तता का हो, उस पर भरोसा करने से धोखा ही मिलेगा।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

👉 अलविदा युगपुरुष अटल बिहारी

वह अटल अजातशत्रु वह राजनीति का वैभव जा रहा है
हवाओं रास्ता दो
मेरा भारत रत्न मेरा जननायक जा रहा है
वो जब बोलता था तब लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे।

साथ उसके वाणी का सम्मोहक जा रहा है।
पोखरण में जिसकी धमक को दुनिया ने देखा
वो जिसने खींची राष्ट्र में स्वर्णिम चतुर्भुज की रेखा
हवाओं रास्ता दो
मेरा राष्ट्र रत्न मेरा देश नायक जा रहा है।

राजनीति की काली कोठरी में जो सदा बेदाग रहा
सत्य को सदा सत्य कहने वाला अपने विचारों पर अटल रहने वाला
कवि ह्रदय विचारक जा रहा है।
हवाओं रास्ता दो
मेरा राष्ट्र भक्त मेरा राष्ट्र नायक जा रहा है।

कृतज्ञ राष्ट्र,कृतज्ञ राजनीति, कृतज्ञ जनमानस निःशब्द खड़े देखते हैं।
हम इंसानों के बीच से वह देवतुल्य महामानव जा रहा है
हवाओं रास्ता दो
मेरा विश्व रत्न मेरा गणनायक जा रहा है।

अलविदा युगपुरुष

👉 कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना:

🔶 सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें-- आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण-- जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा-- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं।

🔷 जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो , तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं।

🔶 किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं तो वह वास्तविकता में बदल जाती है। अगर तुम कल्पना करते हो कि तुम बीमार पड़ोगे तो तुम बीमार पड़ जाते हो। अगर तुम सोचते हो कि कोई तुमसे कठोरता से बात करेगा तो वह करेगा ही। तुम्हारी कल्पना उसे साकार कर देगी।

🔷 तो जब भी कोई नकारात्मक विचार आए तो उसे एकदम सकारात्मक सोच में बदल दें। उसे नकार दें, छोड़ दें उसे,फेंक दें उसे।

🔶 एक सप्ताह के भीतर तुम्हें अनुभव होने लगेगा कि तुम बिना किसी कारण के प्रसन्न रहने लगे हो— बिना किसी कारण के।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 29)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 जिन्हें पेट-प्रजनन की ही गरज है, जो लोभ, मोह और अहंकार से ऊँचे उठ सकने की आवश्यकता ही नहीं समझते, उनके संबंध में तो कहा ही क्या जाए? किंतु जिन्हें कोई महत्त्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करना है, उनके लिए एक ही उपाय है कि प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करके, उन्हें उस स्तर का अभ्यास कराए, जिसके बलबूते बड़े काम किए जाते हैं-बड़े लाभ अर्जित किए जाते हैं। दूसरों की सहायता पाने की बात को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। अपना पुरुषार्थ जगे, तो यह स्वाभाविक है कि खिले हुए फूल को देखकर उस पर तितलियाँ मँडराते और भौंरे यश गीत गाने की झड़ी लगाएँ।
  
🔷 अध्यात्म दर्शन का सार निष्कर्ष इतना भर है कि अपने को जानों, ‘आत्मानं विद्धि’। अपने को विकसित करो और ऐसी राह पर चलो जो कहीं ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचाती हो। यह शिक्षा अपने आपके लिए है। इसे स्वीकार-अंगीकार करने के उपरांत ही वह प्रयोजन सधता है, जिसमें दूसरों से कुछ समर्थन, सहायता, अनुदान पाने की आशा की जाए। देवता भी तपस्वियों को ही वरदान देते हैं, बाकी तो फूल प्रसाद के दोने लिए, देव स्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं। भिखारी कितना कुछ कमा पाते हैं, इसे सभी जानते हैं। उन्हें जीवन भर अभावों की, उपेक्षा की शिकायत ही बनी रहती है।
  
🔶 वस्तुस्थिति समझने के उपरांत उसी निमित्त उन्मुख होना चाहिए कि अपने को अधिक प्रामाणिक और अधिक प्रखर बनाने में जुट पड़ा जाए। मनौती मानते रहने की अपेक्षा यही अवलंबन सही और सच्चा है। इस हेतु कुछ कदम बढ़ाने से पूर्व यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि अपने भीतर सामर्थ्य का अजस्र भंडार भरा पड़ा है। स्रष्टा ने मनुष्य को असाधारण सफलताएँ उपलब्ध कर सकने की संभावनाओं से भरा-पूरा बनाया है। आवश्यकता मात्र इतनी है कि अवरोध की झीनी दीवार को गिराने के लिये साहस जुटाया जाये। अंडों में जब चूजा समर्थ हो जाता है तो भीतर से जोर लगाता है और छिलके को तोड़कर बाहर आता है। इसके बाद तो उसकी माता ही सहायता करने लगती है। प्रसव वेदना का कारण एक ही है कि गर्भस्थ बालक बाहर निकलने के लिए अपनी शक्ति प्रयोग करता है। यदि भ्रूण अति दुर्बल और मृत-मूर्च्छित हो, तो प्रसव की संभावना अतीव दुष्कर हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 38

👉 Materialism and Spirituality: Two ways of Living ( Part 1)

🔶 There are two aspects of human life: one that relates to the physical body materialism; and the other that relates to the inner self (the soul) spirituality. Materialism means an inclination towards acquiring material possessions and comforts; in short, it is a tendency to lead a life in which pleasures of the body are given preference above anything else. Spirituality means, centred and established on the soul, that is, activities in life are decided keeping in mind the awakening of the soul. Normally a persons needs are fulfilled with limited materials such as food to satisfy hunger, few clothes to cover the body, a bed for rest, a house for shelter, etc.; anything over and above the basic needs either remains unused or is misused.

🔷 For example, if a person who can eat four chapattis for lunch were given eight chapattis, it would be beyond his capacity to eat the extra four chapattis. A single bed is enough for a person to sleep on; any more bed space would remain unused. Considering this, a few hours work is sufficient to satisfy bodys requirements. The same is true for senses also. There are five physical senses: touch, smell, taste, hearing and vision. No matter how beautiful a view may be, the eyes will tire of seeing it after a few minutes. The ears will not be able to listen to melodious music indefinitely.

🔶 A person will be able to eat only a certain quantity of food of his liking. Thus the senses have limited requirements, beyond which they become saturated. But senses are never satisfied they always crave for more. The mind is considered to be the sixth sense. Its attributes are greed, attachment (moha) towards worldly objects and people, and egoism. The mind experiences joy when these three attributes are attended to. Man generally engages his time and effort in satisfying the requirements of the body and the mind. The mind propels him to fulfill the three attributes and also employs the body in its schemes. This is not surprising, since satisfaction of the senses is a bodily requirement, and the mind is one of the senses.

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष भी प्रदूषित

🔶 मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है, सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता है। विकृत चिन्तन और भ्रष्टचरित्र, सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ दुष्काल, भूकम्प जैसी विपत्तियां बढ़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है। इन सब के कारण वर्तमान जटिल और भविष्य धूमिल बनता जा रहा है। अनेक विसंगतियाँ जड़ें जमा रही है। जो लोग इन परिस्थितियों में सुधार करने की स्थिति में हैं, उनमें भी इन कर्त्तव्यों के प्रति आवश्यक उत्साह नहीं हैं। सदुपयोग से वही शक्तियाँ सुख सुविधा सम्पन्न स्वर्गीय वातावरण बना सकती हैं। दुरुपयोग तो नरक के अलावा और कुछ बना ही नहीं सकता।

🔷 प्रवाह यदि उल्टा न गया तो स्थिति ऐसी भी आ सकती है जिसे प्रलय कि समतुल्य कहा जा सकता है। अंतरिक्ष का बढ़ता हुआ तापमान ध्रुव प्रदेशों की बर्फ गलाकर जल प्रलय जैसी स्थिति बना सकता है। असंतुलन के दूसरे पक्ष के कारण हिम प्रलय की संभावनाएँ विज्ञजनों द्वारा व्यक्त की जा रही है। धरती कि अंतरिक्ष कवच -ओजोन की पर्त क्षीण होकर फट गयी तो ब्रह्मांडीय किरणें धरती के जीवन को भूतकाल का विषय बना सकती है। यह सब और कुछ नहीं, मनुष्य की उन करतूतों की प्रक्रिया है, जो पिछली दो शताब्दियों में उन्मादी उपक्रम अपनाकर महाविनाश को आमन्त्रण दे रही है।

🔶 परन्तु सृष्टा ऐसा होने नहीं देगा। उसने इस बरती को, उसकी प्रकृति सम्पदा को, मानवी सत्ता को अलग मनोयोग पूर्वक सँजोया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनेक बार, अनेकों की विकट परिस्थितियाँ आयी है। उन्हें टालने वाले ने समय रहते टाला है और उलटी दिशा में बहते प्रवाह को उलट कर सीधा किया है। “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला वचन समय समय पर पूरा होता रहा है। अब भी वह पूरा होकर रहेगा। वही होने की आवश्यकता में सन्देह नहीं, पर बरतते हुए भी निराश होने कर आवश्यकता नहीं है। विनाश की विभीषिकाओं में सन्देह नहीं है वर यह भी निश्चित है कि समय चक्र पूर्व स्थिति की ओर घूम गया है। पुरातन सतयुगी वातावरण का पुनर्निर्माण होकर रहेगा। इसके लिए उपयुक्त समय यही है।

🔷 रात्रि जब समाप्त है, तो एक बार सघन अंधियारा छाता हैं। बुझते दीपक की लौ तेज हो जाती है। संव्याप्त असुरता भी यदि अपने विनाश की वेला आश्चर्य नहीं। प्राचीन काल में असुरों को जब अपनी दुष्टता का समापन होता दिखा तो उन्होंने देवत्व पर सारी शक्ति झोंक कर आक्रमण किया। हारा जुआरी एक बार साहस बटोर कर सब कुछ दाँव पर लगा देता है। भले ही उसे वह सब गँवाना पड़ें। युगसंधि में ऐसा ही हो तो आश्चर्य।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1988 पृष्ठ 60

http://awgpskj.blogspot.com/2016/07/blog-post_40.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 August 2018

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

👉 दुष्टों से प्रेम, दुष्टता से युद्ध

🔷 बीमारी और बीमार एक ही वस्तु नहीं हैं। यदि डॉक्टर बीमारी के साथ बीमार को भी मार डाले, तो उसकी बुद्धि को क्या कहें?

🔶 आप दुष्टता और दुष्ट के बीच अंतर करना सीखिए। कोई भी प्राणी नीच, पतित या पापी नहीं है, तत्वतः वह पवित्र ही है। भर्म, अज्ञान और बीमारी के कारण वह कुछ का कुछ समझने लगता है। इस बुद्धिभ्रम का ही इलाज करना है। बीमारी को मारना है, बीमार को बचाना है।

🔷 आप तो दुष्टता से लड़ने को तैयार रहिए, फिर वह चाहे दूसरों में हो या अपने अंदर। आप पापी व्यक्तियों को निष्पाप करने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद चारों उपाय कीजिए, पर उन पापियों से किसी प्रकार का निजी राग-द्वेष मत रखिए।

👉 Affection with the wicked, Struggle with the wickedness

🔷 Sick and sickness are two different things. What to say about the doctor who kills the patient along with the ailment!

🔶 Try to distinguish between the wicked and the wickedness. Not even a single creature is mean, fallen and sinner, he is sacred at the core. Misinterpretation, ignorance and illusion make him understand things wrongfully. We've to kill this ill-mindedness and save that ill person.

🔷 Be ready to battle with the wickedness, whether it is inside others or in ourselves. Do use all the possible ways to curb the wickedness and make the sinners sacred, but never rear any kind of personal jealousy or hatred for them.

👉 तोड़ो नहीं जोड़ो

🔶 मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था। इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था। अंगुलिमाल एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगो को मारकर उनकी उँगलियाँ काट लेता था और फिर उनकी माला बना`कर उसे गले में पहनता था। इसलिए लोगो ने उसका नाम यही रख दिया। लोगो को लूट लेना और उनकी जान ले लेना उसके और उसके आदमियों का बाएं हाथ का खेल था। लोग उस से डरते थे और उसका नाम लेने से लोगो को प्राण सूख जाते थे।

🔷 एक बार भगवान् बुद्ध उधर से होकर निकले उपदेश देते हुए वो लोगो के पास पहुंचे तो उन्हें लोगो ने कहा आप यंहा से चले जाएँ क्योंकि आप यंहा सुरक्षित नहीं है यंहा एक डाकू है जो किसी के आगे नहीं झुकता तो इस पर भी भगवान् बुद्ध ने अपना इरादा नहीं बदला और वो बेफिक्री से इधर उधर घूमने लगे। डाकू को इसका पता चला तो वो झुंझलाकर उनके पास आया।

🔶 बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को  पकड़ नहीं पा रहा था।

🔷 थक हार कर उसने कहा- “रुको” बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कब का रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे।

🔶 अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ।

🔷 बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा।

🔶 अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”।

🔷 बुद्ध ने उस से कहा क्यों भाई सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड लाओगे। उसके लिए यह काम कोन सा मुश्किल था वह भाग कर गया और चार पत्ते तोड़ लाया तो बुद्ध ने उस से कहा कि क्या अब तुम इन्हें जहाँ से तोड़ कर लाये हो क्या उसी जगह इन्हें वापिस लगा सकते हो इस पर डाकू ने कहा यह तो संभव ही नहीं है।

🔶 तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए ?

🔷 बुद्ध ने कहा ” भैया जब जानते हो कि टूटा हुआ जुड़ता नहीं है तो फिर तोड़ने का काम ही क्यों करते हो, यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मृत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है।

🔶 बुद्ध की ये बात सुनते ही उसकी बोध हो गया और वह ये गलत धंधा छोड़ कर बुद्ध की शरण में आ गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 August 2018


👉 The Art of Sadhana

🔷 The essence of sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own covert indwelling divine attributes. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine nature is awakened and activated, we realize that we are repositories of supernormal energies (riddhi and siddhi). The sole aim of sadhana is to activate these dormant attributes through a focused and dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔶 A farmer understands the significance of sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day in and day out throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he nurtures it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting.

🔷 The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipments comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste. He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific period of time to ripen and so he has to wait patiently till then. He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His sadhana of farming continues single-mindedly. He does encounter obstacles but he overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature.

🔶 This is sadhana of a farmer which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no fatigue, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of sadhana from the farmer.

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 28)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 साधारणतया इस विद्युत प्रवाह का एक बहुत छोटा अंश ही काम आता है। उतना, जिससे हलकी-फुलकी दिनचर्या चलती रहे। आजीविका उपार्जन, उसके परिपालन, निद्रा-जागृति तथा छिटपुट काम ही इसके द्वारा संपन्न हो पाते हैं। क्रियाशील उतना ही अंश रहता है जो काम में आता रहता है। उथली साँस लेने वालों के फेफड़ों का थोड़ा ही अंश काम में आता रहता है। फलतः शेष अंश निर्बल-दुर्बल बना, किसी प्रकार अपना अस्तित्व भर बनाए रहता है।

🔶 आरामतलब लोगों के शरीर का अधिकांश भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है और उस दुर्बलता का लाभ उठाकर वहाँ कई प्रकार के रोगविषाणु जड़ जमा लेते हैं। वे काया को जीर्ण बनाकर गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं। यही बात मस्तिष्क के बारे में भी होती है। मनुष्य की इच्छा-आकांक्षाएँ सीमित होती हैं। वह उन्हीं को पूरी करने के लिए कल्पना-जल्पना करता रहता है। मन और बुद्धि का एक छोटा अंश ही इस प्रयोजन के लिए खपता है। जिन क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पाता, वे प्रसुप्त स्थिति में चली जाती हैं और लगभग मूर्च्छित स्थिति में किसी कोने में छिपी पड़ी रहती हैं।
  
🔷 मानवी विद्युत भंडार की असीमितता, उपयोगिता और उसकी महती क्षमता का यदि विज्ञानसम्मत आकलन किया जा सके, तो प्रतीत होगा कि वह इतनी अधिक है कि जिसके सहारे अपना और दूसरों का इतना हितसाधन हो सकता है, जितना कि कभी-कभी मनुष्यकृत ऐतिहासिक चमत्कारों के विवरणों में पढ़कर हतप्रभ हो जाना पड़ता है। प्रचलित भाषा में इन्हें दैवी वरदानों के नाम से पुकारा जाता है, ऋद्धि-सिद्धियों का भंडार कहा जाता है अथवा दिव्य विभूतियों के नाम से उनकी चर्चा होती रहती है। ऐसे संदर्भ भी प्राय: सही ही होते हैं, अतः मानना पड़ता है कि मनुष्य वस्तुतः असीम शक्तियों का भंडार है। इसी बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि वह तप के बल पर देवताओं से उच्चस्तरीय विभूति-वरदान उपलब्ध कर सकता है, किंतु वास्तविकता इतनी ही है कि जो कुछ उभरता है, भीतर से ही उफनकर ऊपर आया हुआ होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 37

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 4)

🔷 जिस साधक में तमोगुण की प्रधानता रहती है उसे अन्य प्रकार की विपत्तियों में फँसना पड़ता है। सबसे पहले साधक के हृदय में ऐसा विचार उठता है कि - “मैं दुर्बल, पापी, घृणित, अज्ञानी, अकर्मण्य हूँ। मैं जिस किसी को देखता हूँ वह सभी मुझ से ऊँचे जान पड़ते हैं। मैं सबसे नीच हूँ। भगवान को हमारे जैसों की आवश्यकता नहीं भगवान मुझे शरण में लेकर क्या करेंगे” आदि आदि। पर कुछ साधन भजन करने से उसे कुछ शांति मिल गई तो वह सोचने लगता है- “चलो सारा झंझट मिट गया, मुझे शांति तो प्राप्त हो गई, अब इससे ज्यादा क्या करना है।” इस प्रकार विचार करके वह सब तरह के कर्मों से मुँह मोड़ कर आनन्द करना ही अपना लक्ष्य बना लेता है।

🔶 ऐसे साधक को यह समझना चाहिये कि वह भी परब्रह्म का अंश है और आदि शक्ति ही उसके हृदय में अवस्थान करके समस्त कार्यों का संचालन करती है। सर्वशक्तिमान भगवान की लीला तरह-तरह की होती है। किसी एक लीला को ही सब कुछ समझकर उदासीन होकर बैठ जाना साधक के लिये प्रशंसनीय नहीं है। उसे भगवान के इस वचन पर ध्यान देना चाहिये-

🔷 न मे पार्थोऽस्ति कर्तव्यं त्रिषुलोकेषु किंचन।
नानावाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एं च कर्मणि॥

🔶 अर्थात्- “मुझे इस संसार में कोई वस्तु या कार्य अप्राप्त नहीं है तो भी मैं सदा काम में लगा रहता हूँ।” क्योंकि साधारण लोगों को उचित मार्ग दिखलाने के लिये वैसा करना परमावश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.10

👉 उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनें

🔷 आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुंब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा। पहुँचा होगा—पर हमें उससे कुछ अधिक संतोष नहीं हुआ।

🔶 हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें, स्वाध्यायशील बनें, मनन चिंतन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकांश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्म निर्माण पर विश्वास कर सके और न लोक निर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके।

🔷 हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना, समझा। मंत्र का जादू देखने के लिए वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चले जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझकर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1966 पृष्ठ 39-40

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

👉 कंकर से तो शंकर बने

🔷 कंकर से तो शंकर बने और कंकर से ही काबा
     इनका स्वरुप सिर्फ एक जैसे यह मन्नत का धागा

🔶 बरसों से हम बहते आये औ सदियों तक है बहना
     नाहक पाले झूठा भरम नकली निकला ये गहना

🔷 पत्थरों पर यह गहरी धारें संचित संस्कारों की रेखाएं
     जैसे बाँचती हो कर्मफल मुखरित मौन मुस्कुराये

🔶 सिमटे दिखते आस-पास कुटुंब और रिश्ते - नाते
     सांसों के अनूठे मेले को ज्यादातर नहीं निभा पाते

🔷 मौन मनोरथ श्रंखला ज्यों जीवन प्रवाह समझाती
     काल की गहन परतों को है स्वतः खोलती जाती

🔶 रे ! मनुष्य कुछ तो सीख इन बहती लहरों से आज
     सांसों की इस सरगम में बजाना खूब अपना साज

🔷 ना रहना कठोर हमेशा यहाँ पत्थर घिस हैं जाते
     बड़े बड़े सुरमा जहाँ से सिर्फ खाली हाथ जाते

🔶 बनाना तुम सिर्फ धारा जो स्वयं है बहती जाती
     अपने अप्रतिम जोश से पत्थरों को चीरती जाती

🔷 समय सिर्फ धार देखता ना सराहे निरर्थक प्रयास
     रे पत्थर तुम खूब सरकना ना छोड़ना कभी आस 

विचार क्रांति अभियान  शांतिकुंज हरिद्वार

👉 आज का सद्चिंतन 14 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 27)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 कण-कण में निरंतर गतिशील यह प्रक्रिया इतनी द्रुतगामी होती है कि उसकी अनवरत क्रियाशीलता को देखकर-आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इतना बड़ा कायातंत्र इतने छोटे घटकों से मिलकर बना है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है। उससे भी अधिक आश्चर्य इस बात का है कि प्रत्येक जीवकोष छोटे रूप में लगभग उसी क्रियाकलाप का अनुसरण करता रहता है, जो अपने सौर मंडल में गतिशील रहता है। यह सब कैसे होता है? शक्ति कहाँ से आती है?

🔶 साधन कहाँ से जुटते हैं? इन सबका उत्तर काय-कलेवर के कण-कण में संव्याप्त और गतिशील विद्युत प्रवाह की ओर संकेत करके ही दिया जा सकता है। चूँकि घटक अत्यंत छोटे हैं और उनमें काम करने वाली सचेतन स्तर की विद्युत अत्यल्प मात्रा में आँकी जाती है, इसलिए वैसा कुछ अनुभव नहीं होता जैसा कि बिजली की अँगीठी या तारों को छूते समय होता है। फिर भी उनमें उपस्थित शक्ति की प्रचंडता सुनिश्चित है। यदि ऐसा न होता, तो असंख्य लघु घटकों से विनिर्मित काया का प्रत्येक घटक, अपने-अपने कामों को इतनी मुस्तैदी से, इतनी नपी-तुली सही रीति से न कर पाता।
  
🔷 आकलनकर्ताओं ने हिसाब लगाया है कि यदि शरीर के छोटे-बड़े अनेकानेक अंग-प्रत्यंगों की बिजली को एकत्रित किया जा सके, तो उसकी शक्ति किसी विशालकाय बिजलीघर से कम न होगी। इतनी आपूर्ति किए बिना, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत, जो असंख्य क्षेत्रों की अनेकानेक स्तर की गतिविधियाँ बिना रुके अनवरत रूप से काम करती रहती हैं, उनका इस प्रकार क्रियाशील रह सकना संभव न हुआ होता। औसत पाँच फुट छह इंच का यह कलेवर अपने भीतर इतनी शक्ति सामर्थ्य छिपाए हुए है, जिसे यदि वैज्ञानिक द्वारा स्थूल उपकरणों के माध्यम से उत्पन्न किया जाए तो उसके लिए मीलों लंबे विशालकाय बिजली घर की आवश्यकता पड़ेगी। इतना विराट एवं असीम संभावनाओं से भरा है यह काया का विद्युत भंडार।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 36

http://awgpskj.blogspot.com/2018/08/1-27.html

👉 Love is Supreme

🔶 Divine knowledge and selfless love enlighten every dimension of life, destroy all vices and worries; there remains no feeling of hatred, jealously, discrimination, or fear. And then, one is blessed by the divine sight to see the pure love, justice and equality indwelling everywhere.

🔷 If you want to experience the divine joy, make your mind a source of wisdom, firm determination and noble thoughts; let your heart be an auspicious ocean of compassion. Control your tongue, purity and discipline it to speak truth. This will help your self- refinement and inner strengthening and eventually inspire the divine impulse of eternal love.

🔶 If you have integrity of character, authenticity in what you talk and do, people will believe you. You will not have to attempt convincing them. The wise and sincere seekers will themselves reach you. If in addition, you are generous and have an altruistic attitude towards everyone, you will also naturally win people’s heart. The warmth, words and works of truth and love never go in the void. Their positive impact is an absolute certainty.

🔷 There should be no doubt in your minds that pure love is omnipresent and supreme. It contains the power to accomplish the eternal quest of life. It facilitates uprooting the vices and allaying the agility, apprehensions and tensions of mind. Selfless love is a divine virtue, a preeminent source of auspicious peace and joy.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1943

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 3)

🔶 जिन लोगों ने अभी अध्यात्म-मार्ग पर पैर रखा है, और आत्म-समर्पण का केवल संकल्प ही किया है, उनमें इन तीनों में से कोई एक तरह का अहंकार पाया जाता है, और वही उनकी प्रगति के मार्ग में बाधक बन जाता है। जिस साधक में रजोगुण की प्रधानता होती है, वह सोचने लगता है- “हम साधक हैं- हम ने जप, तप, योग के मार्ग को अपनाया है। अन्य लोग सांसारिक माया में ही फँसे पड़े है, हम इतना आगे बढ़ जाये। हम भगवान के हाथ के एक यंत्र हो रहे है।” इस तरह के अनेक मनोभाव साधक को अहंकारी बना देते है। इसका परिणाम होता है कि जो धर्म उसकी वासना और कामना से उत्पन्न होता है उसे वह भगवान का बतलाकर उस पर आचरण करता है और बारबार असफल होकर निराश होता है। तो भी उसके मन में यह धारणा उठती है कि हम धर्माचरण कर रहे हैं और धर्म का मार्ग बाधा, विपत्ति और कंटकाकीर्ण होता ही है, इससे हमको सब कुछ सहन करते हुये परिश्रम से काम करना चाहिये।

🔷 इस भाव से प्रेरित होकर वह और भी तल्लीनता से काम करने लगाता है। वह जब काम करने लगता है तब सोचता है कि हमारे हृदय में प्रविष्ट होकर भगवान ही यह काम करा रहे है, हमारा इसमें कोई हाथ नहीं पर ये सब उसके ऊपरी मन की बातें होती है। उसके भीतरी मन से उस काम को पूर्ण करने का अनुराग बहुत अधिक रहता है और उसके पूर्ण न होने से उसे बड़ा दुःख भी होता है। इस लिये अध्यात्म और योग के पथिक को अपने मन में सदैव यही भाव धारण करना होगा कि भगवान सब के हृदय में विराजमान है और समस्त अभिलाषाओं को त्याग कर उनकी लीला पर लक्ष्य रखना ही हमारा ध्येय है। जब तक भगवान स्वयं ज्ञान-दीप को जला कर अर्न्तहृदय के सम्पूर्ण तम का नाश न करेंगे तब तक साधक के मोह रूपी अंधकार में फँस जाने की पूर्ण संभावना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.9

👉 राजनीति में हमारी भूमिका (धर्मतन्त्र का सहगमन जरूरी)

🔶 लोग एक प्रश्र अक्सर करते रहते हैं कि ‘‘हम राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश क्यों नहीं करते? और राजतन्त्र को अपने अनुकूल सरकारी स्तर पर वह सब सहज ही क्यों नहीं करा लेते? जिसके लिये इन दिनों इतनी अधिक माथापच्ची कर रहे हैं।’’ इस सुझाव के पीछे अपनी-अपने संगठन की वह क्षमता और व्यापकता है, जिसका वही मूल्यांकन कर सकने वाले लोग अनुभव करते हैं कि इन दिनों अपना तन्त्र-किसी भी राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक तन्त्र से कम प्रखर एवं कम सशक्त नहीं है।

🔷 वर्तमान युग में राजनीति की सर्वोपरि सत्ता और महत्ता को स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। यह स्वीकार करने में हमें कोई अड़चन नहीं है कि सरकारें यदि सही कदम उठा सकें, सूझ-बूझ से काम लें और अपने क्रियातन्त्र को सुव्यवस्थित रख सकने में समर्थ हों, तो वे अपने क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकती हैं। जापान, चीन, रूस, जर्मनी, अरब, इजरायल आदि ने चन्द दिनों के भीतर अपने ढंग से अपनी योजनानुसार अभीष्ट परिवर्तन के प्रकार प्रस्तुत कर लिये, इसके आश्चर्यजनक उदाहरण सामने  हैं। हम उन लोगों में से नहीं हैं जो वास्तविकता की ओर से जान-बूझकर आँखें बन्द किये रहें। धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं, यह दूसरों ने भले कहा हो हमने यह शब्द कभी नहीं कहे हैं। इतिहास ने हमें सिखाया है कि धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं, वरन् घनिष्टता एवं परिपोषण का साधन तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।

🔶 इतिहास साक्षी है कि जनता के सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि का आधार दोनों के बीच साधन सहयोग ही प्रमुख तथ्य रहा है। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन और रघुवंशियों के शासन क्रम ने त्रेता में उस सतयुग की स्थापना की थी, जिसे हम रामराज्य के नाम से आदर के साथ याद करते हैं। चाणक्य के मार्गदर्शन से गुप्त साम्राज्य पनपा, फैला और परिपुष्ट हुआ था। पाण्डवों का मार्गदर्शन कृष्ण ने किया था और दुशासन का उन्मूलन कर सुशासन की स्थापना की थी। राजा मान्धाता का सहयोग शंकराचार्य की दिग्विजय का महत्त्वपूर्ण आधार था। भगवान् बुद्ध के प्रभाव से सम्राट् अशोक का बदलना और अशोक की सत्ता के सहयोग से बुद्ध धर्म का समस्त एशिया में फैल जाना एक ऐसी सच्चाई है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

🔷 समर्थ गुरु रामदास जानते थे कि धर्म प्रवचनों से ही काम चलने वाला नहीं है, सुशासन की स्थापना भी आवश्यक है। अस्तु; उन्होंने शिवाजी जैसे अपने प्रधान शिष्य को इस मार्ग पर अग्रसर किया। अग्रसर ही नहीं किया, अपने स्थापित ७०० महावीर देवालयों के माध्यम से आवश्यक रसद, पैसा तथा सैनिक जुटाने की भी व्यवस्था की। शिवाजी उसी सहयोग के बल पर स्वतन्त्रता संग्राम की ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत कर सके। गुरु नानक का पन्थ एक प्रकार से स्वाधीनता के सैनिकों से ही बदल गया। उनने ‘‘एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला’’ का आदर्श प्रस्तुत करके यह बता दिया कि राजतन्त्र और धर्मतन्त्र को विरुद्ध दिशाओं में नहीं चलने देना चाहिए; वरन् उनके कदम एक ही दिशा में उठने की आवश्यकता हर कीमत पर पूरी की जानी चाहिए। बन्दा वैरागी ने सच्चे अध्यात्मवादी का उदाहरण प्रस्तुत किया और समाधि, साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में अपना सर्वस्व उत्सर्ग कर दिया।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 राजनीति में हमारी भूमिका पृष्ठ-14-17

http://literature.awgp.org/book/rajaneeti_men_hamaree_bhoomika/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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