👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी
🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-
🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥
🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥
🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170
🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-
🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥
🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥
🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170
















































