शुक्रवार, 18 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 113)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-

🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥

🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥

🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170

गुरुवार, 17 मई 2018

👉 त्याग करो-और मिलेगा

🔷 सारपत नगर में एक विधवा स्त्री रहती थी। उसके केवल एक ही पुत्र था। एक बार उस नगर में भारी दुर्भिक्ष पड़ा। गाँव के गाँव उजड़ने लगे। भूख के मारे लोग काल के गाल में समा रहे थे।

🔶 एक दिन इलियाह नामक एक धर्मी पुरुष परमेश्वर की ओर से इस स्त्री के पास भेजा गया। इलियाह ने जाकर उससे रोटी माँगी। स्त्री ने उत्तर दिया कि उसके पास घड़े में केवल एक मुट्ठी आटा तथा कुप्पी में थोड़ा सा तेल है जिससे रोटी बनाकर एक ही बार भोजन करके वे दोनों माता-पुत्र मर जायेंगे, क्योंकि दूसरी बार के लिये एक दाना तक शेष नहीं है। इलियाह ने कहा- “जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही कर”, क्योंकि परमेश्वर कहता है कि “न तेरे घड़े का आटा और न तेरी कुप्पी में का तेल चुकेगा।” इसलिये परमेश्वर पर विश्वास करके अपनी चिन्ता उसी पर डाल और पहिले मुझे भोजन बनाकर खिला।

🔷 यह बड़ा ही टेढ़ा सवाल था। स्त्री ने सोचा कि यहाँ तो खुद भूखे मरने की नौबत है, अब क्या करूं। इतने ही में उसके हृदय से आवाज आई कि त्याग का प्रतिफल अवश्य ही मिलता है। उसने तुरन्त ही भोजन बनाया और उसे खिला दिया।

🔶 आश्चर्य की बात है कि वह जितना आटा निकालती थी उतना ही बढ़ता जाता था। उस दिन से उस स्त्री को मालूम हो गया कि भगवान हमारी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमारा विश्वास बढ़ाता है। क्या हम भी इस विधवा स्त्री के सदृश्य त्याग करते हैं? और परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं?

📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1943 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.14

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 May 2018


👉 कष्टों का निवारण (भाग 2)

🔷 सामयिक परिस्थितियों में भी अधिकाँश का कारण अपना स्वभाव ही होता है। मुहल्ले वाले तुम्हें बुरा बताते हैं, झगड़े लगाते हैं और दुर्व्यवहार करते हैं। उन सब से अलग-अलग लड़ोगे तो भी शायद इच्छित शाँति को प्राप्त न कर सकोगे। सोचना चाहिए कि मेरे अंदर वास्तव में वे दुर्गुण कौन से हैं जो इतने लोगों को मेरा विरोधी बनाये हुए है। तुम्हारे अंदर यदि कड़ुआ बोलने, अनुचित हस्तक्षेप करने, लोक विरोधी काम करने की आदतें हैं तो उन्हें सुधारो, बस, सारे शत्रु मिट जायेंगे। तुम्हें कोई नौकर नहीं रखता। तो मालिकों को मत कोसो। अपने अंदर वह योग्यता प्राप्त करो जिसके होने पर हर जगह से आमंत्रण मिलता है।

🔶 सद्गुण मनुष्य की वह सम्पत्ति हैं जिनके होने पर उसका हर जगह आदर होना चाहिए। हर किसी का प्रेम और सहानुभूति प्राप्त होनी चाहिए। जब साधु स्वभाव काले पुरुष भी तुम्हारा विरोध कर रहे हों तो देखो कि हमारे अंदर कौन-कौन से दुर्गुण आ छिपे हैं। कई लोगों में यह कमी होती है कि जन साधारण में फैले हुए झूठे भ्रम को दूर नहीं कर सकते और अकारण लोगों के कोप का भाजन बनते हैं। उन्हें चाहिए कि सत्य बात को लोगों के सामने प्रकट करके अपनी निर्दोषिता साबित करें।

🔷 भय करने डरने और घबरा जाने के दुर्गुण ऐसे हैं जो दूसरों को अपने ऊपर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जिनका स्वभाव निर्भय रहने का, हर प्रकार की कठिनाइयों का मुकाबला करने का होता है उन पर ज्यादती करने वाले झिझकते हैं। कहते हैं कि हिम्मत के सामने तलवार की धार भी मुड़ जाती है। धनाभाव के बारे में भी यही बात है जिसका पूरा ध्यान और मनोयोग धन संचय के साधनों में लगा हुआ नहीं है वह धनपति नहीं हो सकता। स्वास्थ्य को बढ़ाने की जिसकी प्रबल मनोकामना नहीं है वह पहलवान कैसे बन सकेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 2

👉 Awakening Divinity in Man (Part 4)

Our folly!
🔷 Man is an intelligent being but at times displays his foolishness more than his intelligence. Don’t know from where he has developed the notion that Gods fulfil all desires; they bestow the boons of wealth, son, job, victory… and what not. Unfortunately, this misconception has entered in the field of spirituality too. This single illusion has caused so great a loss and harm that the enormous benefits and bright possibilities of spirituality that would have beatified man with unlimited joy have been ruined completely.

🔶 Deities have given only one thing in the ancient times and will give only one thing in the future too. As long as deities survive, devotion (to God) is sustained and the regularity of worship is maintained, one thing will be granted – divine virtues. If you are endowed with the virtues of divinity, then you will acquire hundreds and thousands times more glorious success than what you dream and desire now.

🔷 What do you want from the blessings of a deity or a great saint or from the power of a mantra? A job of few thousand rupees in lieu of the invaluable treasure of divinity? If any deity bestows divinity upon you, then it will raise the worth of your job so much that you will be grateful forever. Vivekanand had gone to Swami Ramkrishna to ask for a job but he got what a great soul like him indeed deserved –divinity, true devotion (bhakti), strength (ïakti) and peace (ï³nti). What are these? These are divine virtues. When saints bless their kindness upon you, they inspire unique enthusiasm and optimism in your inner self, which pulls you towards enlightened values of morality.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 1)

🔷 भगवान की व्यक्तिगत सूरतों को ईश्वर, अल्लाह, हरि, जेंहोवाह, स्वर्गीय-पिता, विष्णु, शिव आदि कहा जाता है।

🔶 वेदान्ती- लोग उन्हें ब्रह्म कहते हैं। हर्वट-स्पेन्सर उन्हें “जो न जाना जा सके” ऐसा कहते हैं। सकोपेन हेनर उन्हें ‘इच्छा’ के नाम से पुकारते हैं। ‘पूर्ण’, ‘पुरुषोत्तम’ आदि नामों से भी कुछ लोग उन्हें पुकारते हैं और स्पिनोजा उन्हें ‘तत्व’ कहकर सम्बोधन करते हैं।

🔷 भगवान को पहचानने में, धर्म में, विश्वास और उनकी पूजा में निष्ठा होनी चाहिये। यह विषय किसी गोष्ठी या क्लब में बैठ कर बहस करने का नहीं है। यह तो सत्य-आत्म की प्राप्ति का विषय है। यह मानव की सबसे गहरी आवश्यकता की पूर्ति है।

🔶 अतः अपने जीवन को उच्च बनाने के लिये धर्म की शरण लो। उसकी प्राप्ति के लिये प्रति-क्षण उद्योग करो और प्रत्येक पल धार्मिक बनने के लिये जीवित रहो। बिना धर्म के जीवन से मृत्यु बहुत अच्छी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 112)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 गुरूगीता गुरूभक्त शिष्यों के लिए कल्पतरू है। इसकी छाँव तले सांसारिक सुख- सम्पदाएँ, आध्यात्मिक ऐश्वर्य, मोक्ष सभी कुछ मिलता है। गुरूगीता के सविधि अनुष्ठान से बड़े से बड़े दुस्तर संकट कटते हैं। असहनीय पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। श्रद्धा हो, शिष्यत्व हो, सद्गुरू का आश्रय हो, तो गुरूगीता से असम्भव- सम्भव बन पड़ते हैं। विन्घ- बाधाएँ सांसारिक हों या आध्यात्मिक गुरूगीता से सभी का निराकरण ,समाधान सम्भव है। इसी कारण सभी महासिद्धों, सत्पुरूषों ने इसे चमत्कारों का सारभूत पुंज कहा है। जो इसका आश्रय लेते हैं, उनके जीवन में निराशाएँ हटती हैं एवं आशाओं की किरणें झिलमिलाती हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी सत्य की सार प्रस्तुति की गयी है। भगवान् सदाशिव ने गुरूगीता के मर्म को बताने के साथ भगवती जगदम्बा को अनुष्ठान में आसन की महिमा से अवगत कराया है। शिव वचनों के अनुसार वस्त्रासन पर साधना करने से दरिद्रता आती है। पत्थर पर साधना करने से रोग होते हैं। धरती पर बैठकर साधना करने से दुःख होते हैं, काष्ठासन पर की गयी साधना निष्फल होती है। जबकि काले हरिण के चर्म पर साधना करने से ज्ञान मिलता है, व्याघ्र चर्म पर की गयी साधना मोक्षदायक है। कुश का आसन ज्ञान को सिद्ध करता है, जबकि कम्बल पर बैठकर साधना करने से सर्वसिद्धियाँ मिलती हैं। इस कथन के साथ ही भगवान् भोलेनाथ का उपदेश यह है- अपना कल्याण चाहने वाले साधक को गुरूगीता का अनुष्ठान कुश, दूर्वा अथवा श्वेत कम्बल के आसन पर बैठकर करना उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 169

👉 कष्टों का निवारण (भाग 1)

🔶 ‘अखंड ज्योति’ के पाठकों में से अनेकों को कई प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक कष्ट होंगे। बाहरी परिस्थितियाँ विपरीत होने या दूसरों के आक्रमण से चिन्तित होंगे। कइयों को भाग्य और ईश्वर से शिकायत होगी। कुछ घर वालों, मित्रों और अफसरों के व्यवहार से असंतुष्ट होंगे। वे यथा साध्य इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए प्रयत्न किया करते हैं। परन्तु फल कोई संतोषजनक नहीं होता। कठिनाइयाँ ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।

🔷 इस समस्या पर विचार करने के लिए कुछ गहरा उतरना होगा। गहरा अन्वेषण करने पर पता चलता है कि बाह्य परिस्थितियों की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वे आन्तरिक परिस्थितियों की छाया मात्र हैं। मनुष्य का बीज रूप वास्तविक जीवन, उसका आन्तरिक जीवन है। जैसा बीज होगा वैसा पौधा उगेगा, जैसी इच्छा होगी वैसा फल मिलेगा। विचार बीज है और परिस्थितियाँ उनके फल। पत्ते-पत्ते को सींचने पर भी जिस प्रकार सूखा हुआ पेड़ हरा नहीं होता उसी प्रकार बाहरी दुख शोकों को दूर करने के तात्कालिक उपाय करने पर भी उनकी जड़ नहीं कटती। तात्कालिक सहायता के बल पर क्षणिक शाँति मिल सकती है परन्तु जो रोग की पूरी चिकित्सा चाहते हैं उन्हें मूल कारण को तलाश करना पड़ेगा। मुरझाये हुए वृक्ष को हरा करने के लिए उसकी जड़ों का निरीक्षण करना होगा और खाद पानी द्वारा वहीं सिंचन करना पड़ेगा।

🔶 मानस तत्व वेत्ता जानते है कि कर्म भोग को छोड़ कर परिस्थितियाँ अपने आप नहीं आती वरन् वे जान-बूझ कर बुलाई जाती हैं। इसमें आश्चर्य की कुछ भी बात नहीं है। आप के कपड़ों पर गंदगी लगी होगी तो मक्खियाँ भिनभिनाएंगी, साफ होंगे तो वे पास भी नहीं फटकेंगी। नाली में यदि कीचड़ सड़ेगी तो कीड़े पैदा होंगे अन्यथा कुछ भी खराबी न होगी। मन की इच्छाओं की जब पूर्ति नहीं होती तभी दुख होता है। यदि जरूरतें ही कम रखी जायें तो दुख किस बात का? मन बहुत-सी चीजें माँगता है और वह नहीं मिल पातीं तो क्षोभ उत्पन्न होता है। उस अभाव की पूर्ति के लिए पाप कर्म किये जाते हैं। और पापों का निश्चित परिणाम दुख है। दूसरी बात यह भी है कि विचार अपने अनुकूल परिस्थितियों को ही आकर्षित करते हैं। जो भिखारी दो सेर आटा पाने की ही अन्तिम इच्छा करता है वह राजा नहीं हो सकता। महत्वाकाँक्षी ही महत्व को प्राप्त करते हैं। सेनापति होने का स्वप्न देखने वाला नेपोलियन ही एक महान विजेता हो सका था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 2

👉 Awakening Divinity in Man (Part 3)

🔶 The cultivation of these noble qualities has allowed great people to accomplish what sounds impossible for a normal human being. With the growth of divinity in personality, anybody can reach great heights of glory in the worldly as well as spiritual domains. It is only the adept usage of your virtues that is important; it does not matter whether they are used in the spiritual or material field. Your qualities, deeds and nature are sources of power in themselves. Where and how use them depends entirely upon your will.

🔷 Success is earned by determined courage. Courageous temper is a spiritual quality. A yogi accomplishes devout endeavours with its support; tantriks and great personalities also achieve grand successes because of their extraordinary courage. Everyone needs it for attempting and succeeding in something (significant), even if he is a dacoit or a terrorist. If you are a yogi, you will be able to perform difficult yoga practices with the backing of your inner valour. If you are a leader, a reformer, then also you will progress as per your courageous zeal. It is a divine quality by origin.

🔶 You may use it the way you want, it is up to you. What is noteworthy or specific in a person is the effect of his inner qualities. If deities bestow something upon someone, it will always be the wealth of virtuous qualities, virtuous potentials. Goddess Gayatri, whom you pray and worship through anusthanas , will also endow you with divine qualities. What will happen with the virtues (you acquire)? Well, virtuous qualities and potentials can bring you all that you want. Whether materialistic or spiritual, whenever someone has gained success it has been based on his virtuous potentials and talents only. Without the qualities of character and efficiency one cannot gain anything worthwhile – neither worldly nor spiritual.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 शक्ति संचय के पथ पर (अन्तिम भाग)

🔶 क्षमा वीरों का धर्म है, अशक्तों का नहीं। जो पूर्ण स्वस्थ है उसके लिए खीर, पुआ मोहनभोग, घी, रबड़ी का सेवन लाभदायक है पर जो रोग से चारपाई पे रहा है, उठकर खड़े होने की शक्ति जिसमें नहीं, उसके लिए वे पौष्टिक पदार्थ लाभदायक नहीं है, उसके लिए तो वे अहित कर परिणाम ही उपस्थित करेंगे। वे निर्बल जो अपने न्यायोचित अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते, अपनी आत्म रक्षा में सफल नहीं होते, यदि शान्ति और क्षमा की रट लगाते हैं तो समझना चाहिए कि अपनी निर्बलता और कायरता छिपाने का एक थोथा बहाना ढूँढ़ते हैं। मुकाबला करने को धर्म ग्रन्थों और राजकीय कानूनों का समर्थन प्राप्त है।

🔷 हमें अपनी दुर्गति को रोकना है तो बकरी की स्थिति से ऊँचा उठना होगा। किसी पर आक्रमण करने का किसी को सताने का उद्देश्य कदापि न रखते हुए भी आत्मरक्षा के लिए हमें शक्ति सम्पन्न बनना चाहिए आतताइयों के आक्रमण का मुँह तोड़ उत्तर देने की क्षमता हमारे अन्दर जैसे उत्पन्न होती जायगी वैसे ही वैसे अकारण सिर के ऊपर टूटते रहने वाले अनर्थों से छुटकारा मिलने लगेगा।

🔶 अंग्रेजी की एक कहावत है कि शक्ति का प्रदर्शन, शक्ति के प्रयोग को रोकता है। जिसके पास शक्ति होती है उसको उसका प्रयोग बहुत कम करना पड़ता है उसका परिचय पाकर ही दुष्ट लोग दहल जाते हैं और दुष्टता का दुस्साहस करने की हिम्मत नहीं पड़ती। पर जहाँ वह निधड़क होते हैं कि न तो हमारे आक्रमण का मुकाबला किया जायगा और न पीछे कोई दण्ड मिलेंगे वहाँ उनकी दुष्टता नंगे रूप में नाचने लगती है। ऐसी विषम स्थिति से बचने का एक मात्र उपाय शक्ति का परिचय देना ही है। बकरे की माँ कब तक दुआ माँगती रहेगी निर्बल की रक्षा बातूनी जमा खर्च से नहीं हो सकती।

🔷 धन कमाने और धर्म चर्चा करने की ओर आज हमारे समाज की प्रवृत्तियाँ विशेष रूप से हैं पर यह दोनों कार्य भी तब तक ठीक प्रकार नहीं हो सकते, जब तक अमन चैन का वातावरण न हो। अशान्त वातावरण का कारण शक्ति सन्तुलन का बिगड़ जाना है। इसे ठीक किये बिना जीवन की कोई दिशा स्थिर नहीं रह सकती, आज समय का तकाजा है कि हम अपनी निर्बलता और कायरता को निकाल फेंके। संगठन करें, शारीरिक बल बढ़ावें, आत्मरक्षा के लिए लाठी आदि की शिक्षा प्राप्त करें और मुसीबत के समय एक दूसरे की सहायता करते हुए आततायियों के आक्रमण को विफल बनाने की तैयारी करें। हम आत्मरक्षा के साधनों से जब सुसज्जित हो जायेंगे तभी बकरी की स्थिति से छुटकारा पा सकेंगे। बाहर से और भीतर से होने वाले आक्रमण से बचने के लिए शक्ति संचय के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। शक्ति से ही शान्ति स्थापित होती है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/November/v1.4

👉 गुरुगीता (भाग 111)

👉 साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों की रहस्य वाणी उनके लिए अति उपयोगी है, जो साधना विज्ञान पर विशेष अनुसंधान के उत्सुक हैं। इसकी वैज्ञानिकता को वे अपने प्रयोगों से चरितार्थ कर सकते हैं। इस संदर्भ में महाराष्ट्र के संत वामन पण्डित का प्रसंग बड़ा ही मर्मस्पर्शी है। वामन पण्डित समर्थ रामदास के समकालीन थे। इनका जन्म बीजापुर में हुआ था एवं विद्याध्ययन काशी में। काशी में रहते ही भगवान् विश्वनाथ की कृपा से इनकी साधना रूचि तीव्र हुई। परन्तु साधना की तीव्र इच्छा के बावजूद इनका संकल्प बार- बार टूट जाता था। मन भी सदा अशान्त रहता। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? कई बार तो ये अपनी स्थिति से इतना खिन्न हो जाते कि अंतस् हताशा से भर जाता। मन सोचता कि जो जीवन उद्देश्य प्राप्ति में निरर्थक है, उसे रखकर ही क्या करें। इस निराशा के कुहासे में कोई मार्ग न सूझता था। जप तो करते, पर मन न लगता, साधना बार- बार भंग हो जाती। लिए गये संकल्प दीर्धकाल न चल पाते। एक- दो दिन में ही इनकी इतिश्री हो जाती। कुछ प्रारब्ध भी विपरीत था और कुछ निराशा का असर इनका शरीर भी रोगी रहने लगा। आखिर एक दिन इनका धैर्य विचलित हो गया और इन्होंने सोचा कि आज अपने आपको माँ गंगा में समर्पित कर देंगे।

🔷 इस निश्चय के साथ ही वे गंगा के मणिकर्णिका घाट पर आ विराजे। बस, अंधकार की प्रतीक्षा थी कि अँधेरा हो और चुपके से देह का विसर्जन कर दें। अपने इन चिंतन में डूबे वे भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे- हे प्रभो! मैं चाहकर भी इस देह से तप न कर सका। हे प्रभु ! अगले जन्म में ऐसा शरीर देने की कृपा करना, जो साधना करने में समर्थ हो। ऐसा मन देना हे मेरे स्वामी ! जिसकी वृत्तियाँ तप में विध्नकारी न हों। श्री वामन पण्डित अपनी प्रार्थना के इन्हीं भावों में लीन थे। उनकी आँखों से निरन्तर अश्रुपात हो रहा था। सूर्यास्त कब अँधेरे में बदल गया, उन्हें पता ही न चला। उनकी चेत तो तब आया, जब एक वृद्ध संन्यासी ने उन्हें सचेत किया।

🔶 उन संन्यासी महाराज के चेताने से इनकी आँखें खुलीं। आँखें खुलने पर इन्होंने देखा कि उन वयोवृद्ध संन्यासी का दाया हाथ इनके सिर पर था और वे कह रहे थे कि धैर्य रखो वत्स ! साधना में बाधाएँ आना स्वाभाविक है, पर तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें बीजमंत्र का उपदेश देता हूँ। इसका नियमित जप करो। परन्तु यह जप तुम्हें कुश के आसन पर बैठकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना होगा। इस तरह से जप करने से न केवल तुम्हें शान्ति मिलेगी, बल्कि ज्ञान की प्राप्ति भी होगी। श्री वामन पण्डित ने उन संन्यासी महाराज के निर्देश के अनुसार साधना प्रारम्भ की। शीघ्र ही उनकी साधना सिद्धि में बदल गयी। उन्होंने अध्यात्म तत्त्व पर अनेक ग्रंथों का सृजन किया। अंतस् के सभी विक्षेप स्वतः ही गहन शान्ति में बदल गये। उन्हें साधना के उपचार की महत्ता के साथ गुरू के महत्त्व का बोध हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 167

बुधवार, 16 मई 2018

👉 जैसा बीज वैसा फल

🔶 अफ्रीका के दयार नोवा नगर में जगत प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ था। हब्शी परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने तीस रुपयों में अपनी गुलामी करने के लिए लुकमान को खरीद लिया ओर उनसे खेती बाड़ी का काम लेने लगा।

🔷 यह अमीर बड़ा क्रूर और निर्दयी था वह जरा सी बात पर अपने गुलामों को बहुत सताता था। किन्तु बाहर से उसने धर्म का बड़ा आडम्बर रच रखा था। दिखाने के लिए वह ईश्वर की रट लगाता और खूब धर्म शास्त्र सुनता ताकि लोग उसे बड़ा धर्मात्मा समझें। अमीर का ख्याल था कि धार्मिक कर्मकाण्डों को करके ही मैं स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊंगा।

🔶 एक बार मालिक ने हुक्म किया कि अमुक खेत में जाकर जौ बो आओ लुकमान उस खेत में गये और चने बो आये जब खेत उगा और मालिक ने चने के पौधे खड़े देखे तो वह बहुत नाराज हुआ और लुकमान से पूछा कि मैंने तो तुझे जौ बोने के लिये कहा था। तूने चने क्यों बो दिये लुकमान ने शिर झुकाकर नम्रता से कहा मालिक मैंने यह समझ कर चने बोये थे कि इसके बदले जौ उपजेंगे।

🔷 मालिक का पारा बहुत गरम हो गया। उसने गरज कर कहा- ‘मूर्ख कहीं दुनिया भर में आज तक ऐसा हुआ है कि चने बोये जायं और जौ उपजें?’

🔶 लुकमान और नम्र हो गये उन्होंने मन्द स्वर में कहा- ‘मालिक मेरा कसूर माफ हो। मैं देखता हूँ कि आप दया के खेत में हमेशा पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर मुझे अच्छे फल देगा। इसलिए मैंने भी सोचा कि जब ईश्वर के खेतों में पाप बोने पर भी पुण्य फल मिल सकते हैं, तो मेरे चने बोने पर जौ भी पैदा हो सकते हैं।”

🔷 अमीर के दिल में लुकमान की बात तीर की तरह गई उसने निश्चय किया कि अब मैं अपना आचरण करूंगा और शुभ कर्म करने में दत्त चित्त रहूँगा, क्योंकि बिना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता। अमीर को धन के उपदेश से बहुत शिक्षा मिली उसने उन्हें पूर्वक गुलामी से मुक्त कर दिया।

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 May 2018

मंगलवार, 15 मई 2018

👉 सरलता और सान्त्वना चाहिए।

🔷 दुखियों को तुम्हारी सान्त्वना भी आवश्यकता है। परेशान और पीड़ित मनुष्य दूसरों से यह आशा करता है कि उसके कष्ट में कमी करने के लिए कोई सहायक व्यक्ति उससे साधनों से न सही कम से कम वचन और भावना द्वारा उसे आश्वासन प्रदान करेंगे।

🔶 जिन भूलों के कारण उसे दुःख उठाना पड़ा, इनको व्यंग भरे छेदने वाले शब्दों से कहना, ताना देना, उपहास उड़ाना असज्जनता भरा अमानवीय कार्य है। दुःख देने के लिए उसकी परिस्थितियाँ ही पर्याप्त है, कटु शब्दों के डंक मार कर उसकी व्यथा और बढ़ाकर हम उसका क्या उपकार करते है?

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 कर्तव्य की जिम्मेदारी

🔷 प्राचीन समय में रात्रि के समय समुद्री जहाजों के पथ-प्रदर्शन करने के लिए छोटे-छोटे टापुओं पर प्रकाश-स्तम्भ खड़े किये जाते हैं। उन पर रोशनी ठीक रखने के लिए चौकीदार नियुक्त किये जाते थे। इन चौकीदारों का कर्तव्य बड़ा कठोर होता था। यदि किसी कारणवश रोशनी न हो तो पानी के जहाज टापू से टकरा कर उलट सकते थे और सैकड़ों आदमियों की जानें जा सकती थीं।

🔶 अमेरिका के एक टापू में ऐसा ही प्रकाश-स्तंभ था, एक दिन रोशनी करने वाला चौकीदार हृदय की गति रुक जाने से अचानक संध्या-समय मर गया। स्त्री को बड़ा दुःख हुआ। उस टापू पर वहाँ यह तीन व्यक्ति थे, चौकीदार,उसकी स्त्री और दो वर्ष का बालक। स्त्री विपत्ति और वियोग के दुःख से आर्त्त होकर रोने लगी।

🔷 दस मिनट भी न हो पाये थे कि स्त्री को अपने महान कर्तव्य का ध्यान आया। आँखों से बहते हुए पानी को उसने रोका, पति की लाश को एक कोठरी में बन्द किया और उसी में अपने छोटे बच्चे को सुलाकर बाहर से किवाड़ बन्द कर दिये। स्त्री प्रकाश-दीपक के पास स्तंभ पर चढ़कर पहुँची और उसे जलाने लगी। दीपक तो उसने जला दिया, पर काँच की चिमनी यथा-स्थान न लगा सकी। उसे इसका कुछ अनुभव थोड़े ही था।

🔶 स्त्री ने सोचा चिमनी ठीक न लगने पर हवा से दीपक बुझ जाएगा। इसलिए उसने निश्चय किया कि हाथ से चिमनी पकड़े हुए रात भर वहीं खड़ी रहेगी। कर्तव्य का उत्तरदायित्व जो उसे पूरा करना था। वह फौजी कप्तान की तरह अपने कर्तव्य के मोर्चे पर डटी रही। रात को इतनी अधिक सर्दी पड़ी और ऐसा बर्फीला तूफान आया कि सवेरा होते-होते वह स्त्री भी ठंड के मारे गिरकर मर गई।

🔷 दूसरे दिन प्रातः काल एक जहाज उधर से निकला। उसने देखा कि प्रकाश स्तम्भ सुनसान पड़ा हुआ है। नाविक उतर कर वहाँ गया। स्त्री की लाश चिमनी हाथ में लिये हुए पड़ी थी। कोठरी खोली गई तो चौकीदार का मृत शरीर रखा हुआ था। कोठरी में बन्द हुआ बच्चा रो-रो कर अम्मा को पुकार रहा था।

🔶 जहाज के अधिकारियों को सारी घटना समझने में देर न लगी। उनने बालक को गोदी में उठा लिया और पुचकारते हुए उससे कहा—बच्चे, तुम भूलते हो, वह तुम्हारी ही अम्मा नहीं थी, वह तो अनेक स्त्री-पुरुषों की माता थी, जिनकी जानों को उसने अपनी जान देकर बचाया।”

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 May 2018


👉 Awakening Divinity in Man (Part 2)

What else do the deities give?

🔷 What (else) do the deities give? Well they give you the capacity to digest and handle success. To wisely handle worldly possessions, powers and comforts, which appear to you as treasures of joy, you should have appropriate qualities. This ability – the key to the real joy – is what could be described as an offshoot of divinity. If divinity is awakened in you, then you could accomplish big goals from small or insignificant tasks; if you have greater opportunities and resources then well and good, but you would be happy and successful even without them. However if you desire something you do not deserve, or you are eager to acquire success without caring to improve yourself, then, well, what can I say!

🔶 Vigour and might of human body is good but if it is not controlled by wisdom, it could only aggravate terror or misuses, resulting in effects similar to that of adding fuel to the fire. Deities never commit the mistake of showering wealth or worldly resources. If they do, then they are risking total destruction and a disastrous end of humanity. Dear children! Humanity is the power which elevates and excels our thinking, attitude, ambitions and activities. It is a great attribute.

🔷 Attempting to fulfil your aspirations is not bad but is subject to one scrutiny – what is being desired and what for? If they are for a worldly (materialistic) purpose then it is necessary to know whether you deserve them, how would you digest this possession, and how will you use it. Man makes mistakes but not the Gods. Deities can’t bless you with things you often imagine or expect. Great people who made contacts with deities did not benefit materialistically. What did they receive? The virtues of humanity, the seeds of divinity. The virtuous talents and powers thus acquired enabled man to progress.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 शक्ति संचय के पथ पर (भाग 2)

🔷 आज साम्प्रदायिक दंगों का वातावरण गरम है। जगह-जगह से साम्प्रदायिक दंगों के दिल दहला देने वाले समाचार प्राप्त होते रहते हैं। जिनसे प्रतीत होता है कि थोड़े से गुंडे उबल पड़ते हैं और हजारों नर नारियों को गाजर मूली की तरह काट कर रख देते हैं। अपार धन जन की हानि कर देना उनके बायें हाथ का खेल है। हम अनाथ बालकों की तरह रोते चिल्लाते और इधर-उधर भागते हैं अखबारों में लेख छापते हैं प्रस्ताव पास करते हैं, और अन्त में माथा पीट कर चुप हो बैठते हैं। गुण्डों का हौसला बढ़ाते हैं, वे एक के बाद दूसरा आक्रमण अधिक जोर से करते हैं और अधिक उत्पात मचाते हैं। हर उत्पात के साथ उनकी पशुवृत्ति तृप्त होती है और लूट का माल हाथ लगता है। इस घटनाक्रम की बार-बार पुनरावृत्ति होती रहती है।

🔶 इस दुखद स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम या तो अशक्त हो गये हैं या हमने अपने को इस रूप में रखा है कि दूसरों द्वारा अशक्त समझे जाने लगे हैं। जरूरत से ज्यादा जो सीधे होते हैं वे बकरी की भाँति सताये जाते हैं। इसी कारण हिन्दू जाति को अनेकों प्रकार के संकटों का आये दिन सामना करना पड़ता है। हिन्दू धर्म, दया, शान्ति, क्षमा और सहिष्णुता का धर्म है। हमारी धार्मिक शिक्षाएं शान्ति का उपदेश देती हैं। यह शिक्षा बहुत ही उच्च एवं महान हैं। यह जितनी उच्च हैं, उतने ही उच्चकोटि के व्यक्तियों द्वारा प्रयोग में लाये जाने योग्य हैं।

🔷 जिस समय आर्य जाति सब प्रकार उन्नत अवस्था में थी चक्रवर्ती साम्राज्य उसके हाथ में था उस समय वह इन शिक्षाओं को चरितार्थ करने की स्थिति में थी, जिसमें बल है, जो दंड देने की योग्यता से सम्पन्न है उसी वीर को क्षमा शोभा देती है। पैर मैं चींटी काट ले तो मनुष्य चाहे तो उसे क्षणभर में मसल कर रख दे सकता है, ऐसी स्थिति में यदि वह उस चींटी के प्रति क्रोध न लावे और दया पूर्वक उसे क्षमा कर दे तो यह क्षमा उसके लिए शोभनीय है, प्रशंसा के योग्य है। परन्तु यदि कोई भयंकर भेड़िया आक्रमण कर और नृशंसता पूर्वक अपने बालकों को खाने लगे तो उसका प्रतिरोध न करना ‘क्षमा’ नहीं कही जा सकती, यह कायरता या अशक्यता ही ठहरेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 3

👉 गुरुगीता (भाग 110)

👉 साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व

🔷 इन तांत्रिक शक्तियों की प्राप्ति में आसन एवं उपयुक्त दिशा के चुनाव का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। भगवान् सदाशिव इस सत्य को चेताते हुए माता भवानी से कहते हैं-

🔶 वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसम्भवः। मेदिप्यां दुःखमाप्रोति काष्ठे भवति निष्फलम्॥ १३७ ॥
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिर्मोक्षश्रीव्याघ्रचर्मणि। कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले॥१३८॥
कुशैर्वा दूर्वया देवि आसने शुभ्रकम्बले। उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः॥ १३९॥
ध्येयं शुक्लं च शान्त्यर्थं वश्ये रक्तासनं प्रिये। अभिचारं कृष्णवर्णं पीतवर्णं धनागमे ॥ १४०॥
उत्तरे शान्तिकामस्तु वश्ये पूर्वमुखो जपेत्। दक्षिणे मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः॥ १४१॥

🔷 वस्त्रासन पर साधना करने से दरिद्रता आती है ; पत्थर पर साधना करने से रोग होते हैं। धरती पर बैठकर साधना करने से दुःख मिलता है और काष्ठासन पर की गई साधना निष्फल होती है॥ १३७॥ काले हरिण के चर्म पर साधना करने से ज्ञान की प्राप्ति होती हैं, व्याघ्रचर्म पर साधना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, कुश के आसन पर साधना करने से ज्ञान सिद्ध होता है, जबकि कम्बल पर बैठकर साधना करने से सर्वसिद्धियाँ मिलती है॥१३८॥ भगवान् शिव कहते हैं- हे देवि ! इस गुरूगीता का स्वाध्याय कुश के आसन पर, दूब के आसन पर अथवा श्वेत कम्बल के आसन पर बैठकर करना उचित है ॥ १३९॥ शान्ति प्राप्ति के लिए श्वेत आसन पर वशीकरण के लिए रक्तवर्ण के आसन पर ,सम्मोहन के लिए काले आसन पर एवं धन प्राप्ति के लिए पीले आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए॥१४०॥ इस क्रम में उत्तर दिशा शान्ति कार्यों के लिए, पूर्व दिशा वशीकरण के लिए ,, मारण कर्म के लिए दक्षिण दिशा एवं धन प्राप्ति के लिए पश्चिम दिशा उपयुक्त मानी गयी है॥१४१॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 166

सोमवार, 14 मई 2018

👉 आगे के लिये बचाओ।

🔶 एक धनवान मनुष्य था। उसे सब प्रकार के सुख, ऐश्वर्य प्राप्त थे। मखमली वस्त्र और सोने के जेवरों से उसकी देह सजी रहती थी। सारे दिन शौक मौज करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई काम न था।

🔷 इलियाजर नामक एक कंगाल उसी धनवान का पड़ौसी था। वृद्धावस्था और बीमारी के कारण बेचारा कुछ कर नहीं सकता था इसलिये अपने धनवान पड़ौसी के द्वार पर जाता और उसकी मेज के नीचे भोजन के जो किनके गिर पड़ते बीन बीन कर पेट में डाल लेता। धनी के पास किसी बात की कमी न थी पर उसने कंगाल की हालत पर न तो कभी तरस खाया और न उसकी कुछ मदद की।

🔶 इलियाजर धर्मात्मा था। गरीबी और अशक्त होने के कारण वह किसी की कुछ सेवा नहीं कर सकता था इससे उसे बड़ा दुख होता। उसके पाँवों में घाव हो गये थे। जब कभी वह कुत्तों को देख पाता तो उन्हें प्यार से बुलाता और अपने घाव उनके चाटने के लिये खोल देता। अपना थोड़ा सा रक्त माँस कुत्तों को दान करके वह अपने दुख को हल्का कर लेता और अपने कष्टों के लिये प्रभु को धन्यवाद देता, जिनके कारण वह ईश्वर को हर घड़ी याद करता रहता है।

🔷 समय आने पर इलियाजर मरा। थोड़े ही दिन बाद उस धनी को भी मरना पड़ा। प्रेत लोक में दोनों ही पहुँचे। धनी को घोर पीड़ाओं से भरे नरक में रखा गया वहाँ वह असहनीय पीड़ायें सहने लगा। ममन्तिक कष्टों से वह तड़प रहा था कि उसकी निगाह दूसरी ओर गई। उसने देखा कि स्वर्ग के देवता इब्राहीम की गोद में इलियाजर बैठा हुआ है और विपुल ऐश्वर्यों का उपभोग कर रहा है।

🔶 धनी का गला भर आया। उसने चीखकर इब्राहीम से कहा-हे पिता! दया कर इलियाजर को मेरे पास भेजिये ताकि वह मेरे जलते हुये गले में कुछ पानी की बूंदें डाल दे मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूँ।

🔷 इब्राहीम ने कहा-पुत्र! प्रभु का न्याय बड़ा कठोर है उसमें पक्षपात को स्थान नहीं है। तू जीते जी अपनी सम्पत्ति पा चुका। अब अधिक तुझे कैसे मिल सकता है? काश, तूने उस समय बचाकर कुछ इस समय के लिये संचित किया होता तो आज इस तरह यहाँ न तड़पता।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1940

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 May 2018


👉 Awakening Divinity in Man (Part 1)

Let us begin with the Gayatri mantra:
“Om bhur bhuva¡ swa¡ tatsaviturvareñyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yona¡ pracodayat”

🔶 You all must have heard of the grace of God. His manifestations are called “devata” (deity) in the Vedas; devata means “one who gives”.  Many of us pray and worship the deities because we either want something or we need help in adverse moments. Let us discuss about deities.

🔷 There is no doubt that deities do bless us enormously; otherwise they would not have been named as “deities” because by definition deities always give something. There is nothing wrong or unnatural if one requests something from someone who always wants to give. But what do deities give? They give only what they themselves possess. Naturally, one can give only what one has. Deities have only one thing – divinity (devatva). Divinity is the most refined and virtuous form of one’s nature, conduct, qualities and deeds. Deities bestow divinity upon the devotees and become relieved, saying that, “we have given you the best we could; now it is up to you to accept and make use of it in the way you find it suitable and succeed accordingly.”

🔶 There is one thing in the world that indeed yields commendable success and that is excellence of personality. It is the minimum requirement to achieve anything worthwhile and fulfilling. If one has somehow gained something despite having an inferior personality and without demonstrating his talents, hard work and essential qualities, then his success will be short lived and incomplete. If your digestive system is weak then an overdose of eatables is sure to create problems and upset your health. Similarly, if you don’t have wisdom and the ability to make proper use of the resources, facilities and prosperities available to you, then these would trouble you in one way or the other. If there is a lack of virtues and saneness then your inherited or inappropriately earned wealth will act as a catalyst for your evils and weaknesses; these would nurture improper addictions, enhance your ego and sooner or later ruin your life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 कर्मयोग का रहस्य (अन्तिम भाग)

🔶 जैसा आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ बर्ताव करें वैसा आप भी उनके साथ करो, इस नीतिवाक्य को याद रखो। नित्य के जीवन−व्यवहार में यह आपका आचार−नियम होना चाहिए, समस्त धर्मों का साराँश यही है, आप कोई अनुचित कर्म नहीं करोगे, आपको अमित आनन्द मिलेगा।

🔷 जब तुम बाजार में जाओ तो हमेशा अपनी जेब में कुछ पैसे डाले रखो और उन्हें गरीबों को बाँट दो। रेलवे प्लेटफार्म पर गरीब कुलियों से झगड़ा मत करो, उदार बनो उन्हें चार आने या आठ आने दो। अनुभव करो कि सारी देहों में आप ही रम रहे हो, आपका हृदय विशाल हो जावेगा, आप एकत्व का अनुभव करने लगोगे, आप और भी उदार बन जाओगे।

🔶 आप दवाइयों की एक पेटी अपने साथ रख सकते हो और गरीब रोगियों की चिकित्सा कर सकते हो, होम्योपैथिक दवाइयों का इलाज कोई हानि नहीं करता है। पुस्तक देख देखकर अप दवाई दे सकते हो। किसी बायोकैमिस्ट से मिलकर अपना सन्देह दूर कर सकते हो। ऐसी सेवा से आपको बहुत आनन्द मिलेगा, इससे चित्त−शुद्धि बहुत होती है।
महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़िए। वह सम्मानित कार्य और तुच्छ नीच सेवा में भेद नहीं समझते थे। उनके लिये झाडू लगाना और टट्टी साफ करना बहुत बड़ा योग है। उन्होंने स्वयं टट्टियाँ साफ की हैं। अनेक प्रकार की सेवाएँ कर करके, उन्होंने इस मोहकारक ‘मैं’ को बिल्कुल ही नष्ट कर रखा है। बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन इनके आश्रम में योग सीखने के लिये आये। वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी जी उनको एकान्त कमरे में या परदे के पीछे विचित्र रीति से प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, कुण्डलिनी, योगादि की शिक्षा देंगे, परन्तु जब उनसे कहा गया कि सबसे पहले टट्टियाँ साफ करो तो उनको बड़ी निराशा हुई और वे एकदम आश्रम छोड़कर चले गये।

🔷 प्रति दिन जितने अधिक सत्कार्य हो सकें करिये, सोते समय अपने दिन भर के कार्यों की परीक्षा कीजिए और नित्य अपनी आध्यात्मिक डायरी नोट कीजिए। सत्कार्य करना ही आध्यात्मिक जीवन का उदय है।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 9

👉 शक्ति संचय के पथ पर (भाग 1)

🔶 अनेक प्रकार की कठिनाइयों विपत्तियों तथा तथा संकटों का प्रधान कारण निर्बलता है। निर्बल के ऊपर रोग, नुकसान, अपमान आक्रमण आदि के पहाड़ आये दिन टूटते रहते हैं। निर्बलता में एक ऐसा आकर्षण है जिससे विपत्तियाँ अपने आप आकर्षित हो जाती हैं। जिसका कुछ नहीं बिगाड़ा है वह भी निर्बल का शत्रु बन जाता है। बकरी की निर्बलता उसके प्राणों को घातक सिद्ध होती है। जंगली जानवर, मनुष्य यहाँ तक कि देवी देवता भी उसी के रक्त के प्यासे रहते हैं। बदला लेने की शक्ति रखने वाले और आसानी से हाथ न आने वाले सिंह व्याघ्र, भेड़िया आदि का माँस लेने की किसी की इच्छा नहीं होती। देवी देवता भी इनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते।

🔷 हिन्दू जाति बहुत समय से बकरी बनी हुई है। उस पर भीतर और बाहर से लगातार आक्रमण होते रहते हैं। पिछली शताब्दियों की ओर दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि उसे बहुत समय से आक्रमणों का शिकार होना पड़ रहा है। यूनानियों ने हिन्दुस्तान पर हमला किया, सिकन्दर ने चढ़ाई करके काफी धन जन की हानि पहुँचाई। इसके बाद मुसलमानों के हमले शुरू हुए, एक के बाद एक हमला हुआ। नये-नये वंश आते रहे और मन चाही लूट खसोट करते रहे। धर्म विस्तार के लिए उन्होंने जो ज्यादतियाँ कीं, हिन्दू अबलाओं जिस प्रकार इज्जत लूटी वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद अंग्रेज, फ्राँसीसी पोर्तगीज आदि के आक्रमण हुए उन्होंने भी अपने ढंग से हुकूमत चलाई और हुकूमत से मिलने वाले लाभों को खूब लूटा।

🔶 इतने बड़े देश पर, इतनी बहु संख्यक जाति पर थोड़े से लोगों ने इस प्रकार आक्रमण किये और ऐसी लूट खसोट मचाई इसे देखकर हैरत होती है। बड़ी संख्या को देखकर छोटी संख्या वाले खुद डर जाते हैं और दुर्व्यवहार करने का दुस्साहस नहीं करते, पर यहाँ तो बिल्कुल उलटा हुआ। मुट्ठी-मुट्ठी भर हमलावरों को तनिक से प्रयत्न में सफलता मिल गई। और वे काफी लंबे समय तक निधड़क होकर कब्जा किये बैठे रहें, यह सचमुच ही एक आश्चर्य की बात है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 3


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/November/v1.3

👉 गुरुगीता (भाग 109)

👉 साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व

🔶 गुरूगीता में साधना जीवन के रहस्यों का विपुल भण्डार है। यौगिक रहस्य, मांत्रिक रहस्य एवं यांत्रिक रहस्य इसमें अलौकिक रूप से गुँथे हुए हैं। अनुभव सम्पन्न साधक जानते हैं कि साधना, साधक की अपने साध्य के साथ गहरे सामंजस्य, लय और अंततोगत्वा सम्पूर्ण विलय एवं विसर्जित होने का सत्य है। यह लय मूलतः विचारों एवं भावों की होती है। इसकी प्रगाढ़ता एवं परिपक्वता पर ही साधना की सफलता निर्भर है। परन्तु यह कार्य इतना आसान नहीं है। इसमें अनेकों विध्नों, विक्षेपों एवं अंतरायों का सामना करना पड़ता है। इनमें से कई परिस्थितिजन्य होते हैं, तो कई प्रारब्धजन्य। परिस्थितियों मे स्थान, काल, परिवेश एवं घटनाचक्रों की गणना की जा सकती है, तो प्रारब्ध का पूरा दारोमदार सूक्ष्म संस्कारो एवं कर्मबीजों पर निर्भर करता है। प्रकारान्तर से यह प्रारब्ध ही परिस्थितियों का जन्मदाता है। जिनका सदुपयोग अपने विवेक एवं पुरूषार्थ पर निर्भर है।

🔷 विवेक एवं पुरूषार्थ सजग रहे, तो साधना के विध्न शमित हो सकते हैं। किसी दुष्कर प्रारब्धवश इनकी सम्पूर्ण समाप्ति नहीं हो सके, तो भी इन्हें समाप्तप्राय तो किया ही जा सकता है। बस जरूरत सही साधना उपक्रमों के चयन एवं उनके उपयोग की है। इन साधना उपक्रमों में काल, मुहुर्त, मंत्र ,पूजा उपचार के साथ दिशा एवं आसान का चयन भी महत्त्वपूर्ण है। कतिपय ,बुद्धिवादी इस कथन पर संदेह कर सकते हैं। पर जिनकी बुद्धि सूक्ष्मग्राही है, सृष्टि के विभिन्न ऊर्जा प्रवाहों, चुम्बकत्व एवं जैव विद्युत की सामर्थ्य से जो परिचित हैं, उन्हें इस कथन के मर्म तक पहुँचने में समय न लगेगा। पूजा उपचार एवं तत्सम्बन्धी उपक्रम इन्हीं के संतुलित सदुपयोग के लिए है।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में भगवान् सदाशिव के वचनों को प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि गुरूगीता का विधिवत् अनुष्ठान स्वयं में एक समर्थ उपचार है। यह काल एवं म़त्यु के भय का हरण करने वाला है। सभी संकट इस अनुष्ठान से नष्ट होते हैं। साथ ही इससे यक्ष, राक्षस ,भूत ,चोर एवं व्याघ्र के भय का हरण भी होता है। इसके जप से न केवल व्याधियाँ दूर होती हैं, बल्कि सभी सिद्धियों एवं अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती है। यहाँ तक कि इसके जप से सम्मोहन- वशीकरण आदि की तांत्रिक शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 165

रविवार, 13 मई 2018

👉 स्वार्थ-त्याग द्वारा सुधार

🔷 काकेशश के प्रान्त में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई ईश्वर भक्त और शुद्ध आचरण था। उसने अपना कर्त्तव्य जान कर यह निश्चय किया कि शिक्षा द्वारा छोटे भाई का जीवन एक आदर्श जीवन बनाये, परन्तु छोटा भाई उसके विचारों से बिलकुल ही विपरीत था। स्कूल से कह भाग आता था और पतंग, जुआ वालो की टोली में अपना समय गंवाता था।

🔶 बड़े भाई ने उसको अन्य और कई कामों में लगाया, पर स्वयं व्यर्थ गया। धीरे-धीरे वह शराबी, जुआरी और चोर बन गया और आधी-2 रात शराब के नशे में चूर वह घर आता था, बड़ा भाई उसको खूब समझाता था। यहाँ तक रो-रो कर प्रार्थना भी करता था कि भाई तू मेरा और अपना जीवन क्यों नष्ट कर रहा है, लेकिन सब समझाना व्यर्थ जाता था,

🔷 एक दिन रात को छोटा भाई दीवार लाँघ कर घर के भीतर आया, उसने बड़े भाई को सोते से जगाया। बड़े भाई ने देखा कि छोटे भाई के सब कपड़े हाथ पाँव खून से तर है। और वह बहुत घबराया हुआ है, कारण पूछा, छोटे भाई ने कहा मुझे कहीं छिपा दे मुझसे एक खून हो गया है पुलिस मेरा पीछा कर रही है।

🔶 कुछ क्षण चुप रह कर बड़ा भाई बोला, यहाँ कहाँ छिपोगे? अच्छा इधर आओ-हाथ मुँह धोओ और खून के सब कपड़े उतार दो और तो यह मेरे साफ कपड़े पहन लो-बड़े भाई ने छोटे भाई के खून से तर सब कपड़े खुद पहन लिए और छोटे भाई को एक अलमारी में बन्द कर लिया और घर का दरवाजा खोल दिया, पुलिस अन्दर आ गई-बड़े भाई के कपड़े खून में रंगे देख कर पुलिस ने उसे ख्नी ठहराया और गिरफ्तार करके जेल भेज दिया।

🔷 सुबह को मजिस्ट्रेट के सामने उसे पेश किया गया, जज ने पूछा-”तुमने खून किया? उसने उत्तर दिया हजूर इस जुर्म की सजा मुझे भोगनी ही पड़ेगी। इसके अलावा मैं और कुछ नहीं कहना चाहता। मजदूर होकर मजिस्ट्रेट ने उसे फाँसी की सजा का हुक्म दिया। फाँसी पर लटकने से पहिले बड़े भाई ने छोटे भाई को एक पत्र लिखने की स्वीकृति माँगी साथ-साथ यह भी प्रार्थना की कि उसके भाई के सिवाय और कोई पत्र को बीच में न खोले, यह सब स्वीकार कर लिया गया- तत्पश्चात् बड़े भाई ने भगवान को स्मरण करके छोटे भाई के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया।

🔶 चपरासी लिफाफा लेकर नगर में पहुँचा और छोटे भाई ने लिफाफा खोलकर पढ़ा। लिखा था-प्यारे भाई! कल सुबह फाँसी होगी, मैं बड़ी ख़ुशी और प्रेम से तुम्हारे लिए स्वार्थ त्याग कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पूर्ण आशा है की तुम मेरे पीछे ऐसा पवित्र जीवन व्यतीत करोगे की जिससे बड़ो की और हमारी इज्जत होगी और मेरे प्रेम को स्वीकार करते हुए अपने सब दोषों को छोड़कर पवित्र जीवन व्यतीत करोगे।

🔷 पत्र पढ़कर छोटा भाई पृथ्वी पर बड़े से गिर पड़ा और फूट-2 कर रोने लगा ओर अपने को धिक्कारते हुए बोला, हाथ अफसोस! मेरे लिए भाई ने अपनी जान दी- उसी क्षण से उसके जीवन में अद्भुत परिवर्तन होना शुरू हो गया और शनैः शनैः अन्त में वह एक महान् व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ।

🔶 इस प्रकार देव पुरुष हमें सुधार का मार्ग सिखाकर ऐसे लोकों को चले जाते वह जहाँ सदैव आनन्द ही रहता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 May 2018


👉 Dharmaraj Yudhisthir

🔷 Once a Yadava kin ashed Sri Krishna why he called Yudhisthir “Dharmaraj”. Bhagwan narrated an anecdote. During the Mahabharata war, Yudhisthir used to leave for some place incognito every evening after  the day’s battle was over. The Pandavas were curious and followed him one day. They found that Yudhisthir nursed the wounded soldiers of both the warring sides lying on the battle field.

🔶 The puzzled Pandava brothers enquired of Yudhisthir why did he, rather than giving rest to his battle weary- body, spend the time in serving the enemy side instead, and that too in disguise.  Dharmaraj explained: “Among the wounded are both, the Kauravas and the Pandavas.

🔷 Both are human beings. If I had gone under my real identity theb Kauravas would neither had shared their pain with me nor allow me to tend them. The Pandava soldiers, too, would probably not accept any service from me. Lest I be deprived of this privilege of human service, I had to resort to this camouflage”.

🔶 Having recounted this story, Sri Krishna concluded: “ Cultivating the spirit of human service is the mark of true religion (dharma). He who renders such service and steadfastly adheres to the noblest ideals  of conduct is called “ Dharmaraj” and is always accorded the highest place in religious/ spiritual deliberations.”

📖 From Pragya Puran

👉 यौवन की जिम्मेदारी

🔷 युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, उन्माद और क्रिया शीलता का तरंगें प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है। अब तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उसकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई हैं। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने  के कारण उनसे किसी महान् कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है।

🔶 वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पक्ष ताना ही शेष रह जाता है।

🔷 यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहाँ के युवकों आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।

🔶 एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1940 पृष्ठ 16

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 5)

🔷 यदि किसी के शरीर के किसी अंग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अंग को धीरे−धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।

🔶 यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।

🔷 जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 8

👉 गुरुगीता (भाग 108)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता

🔷 साधक समुदाय में बंगाल के तारानाथ भट्टाचार्य की बड़े सम्मान से चर्चा की जाती है। इनकी तांत्रिक शक्तियाँ बड़ी आश्चर्यजनक एवं विस्मयकारी थी। तंत्र साधक होने के बावजूद भट्टाचार्य महाशय पंचमकार के स्थूल प्रयोगों से कोसों दूर थे। उन्होंने सारे जीवन में कभी भी मांस, मद्य एवं मीन को नहीं छुआ। सभी स्त्रियों के प्रति उनका मातृभाव था। वह प्रत्येक स्त्री को जगदम्बा का रूप मानते थे और ब्रह्मचर्य में उनकी सम्पूर्ण निष्ठा थी।

🔶 वह श्मशान भी जाते थे और शवसाधना भी करते थे। किन्तु इन दोनों साधनाओं के प्रति भी उनकी विशेष दृष्टि थी। श्मशान वह इसलिए जाते थे, क्योंकि वहाँ बैठने से उन्हें वैराग्य का स्फुरण होता था। भगवान् महाकाल एवं भगवती महाकाली की लय- लीला का प्रत्यक्ष बोध होता था। वह कहा करते थे- श्मशान से अधिक पावन साधनाभूमि भला और कहाँ होगी- जहाँ दैहिक आकार परमाणुओं में रूपान्तरित होते हैं। सृष्टि के विघटन एवं लय की प्रभु लीला को और कहीं बैठकर सही रीति से नहीं जाना जा सकता।

🔷 शव साधना के बारे में उनका कहना था कि सच्चा साधक वह है, जो अपनी देह को शवपीठ के रूप में अनुभव कर ले। सामान्य जीव की देह में तो चाहत एवं वासनाओं का खेल चलता है। पर साधक तो इन सबसे दूर हो जाता हेै। वह अपनी जीवित देह को भी वैराग्य के महातप से शव के रूप में अनुभव करता है। प्रतिफल उसकी यह अनुभूति रहती है कि वह स्वयं शव है और इसमें चल रही चित् शक्ति की महालीला का वह साक्षी है। तारानाथ भट्टाचार्य की जो साधना स्थिति थी, उसे विरले साधक प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन स्वयं तारानाथ अपनी सारी शक्तियों एवं सिद्धियों का उद्गम गुरूगीता को मानते थे। इसके काम्य एवं तांत्रिक प्रयोगों में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी।

🔶 ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने तंत्रदर्शन के महाचार्य प़ं० गोपीनाथ कविराज को एक घटनाक्रम बताया। उन्होंने बताया कि तंत्र साधनाओं में अलग- अलग मूहूर्तों- नियमों एवं तांत्रिक रात्रियों यथा- कालरात्रि, महारात्रि मोहरात्रि एवं दारूणरात्रि आदि अवसरों पर वह गुरूगीता का अलग- अलग रीति से पाठ करते थे। गुरूगीता के स्थितिक्रम, सृष्टि क्रम एवं संहारक्रम से उन्होंने अनेकों अनुष्ठान किए। इन अनुष्ठानों में वह गुरूगीता को भगवती गायत्री के ब्रह्मास्त्र मंत्र के साथ सभी महाविद्याओं के लोम- विलोम सम्पुटीकरण के विलक्षण प्रयोग किए।

🔷 अपने एक अनुभव में उन्होंने बताया कि प्रारम्भिक दिनों में ब्रह्म पिशाच से पीड़ित एक परिवार उनके पास आया। पिशाच खतरनाक था और शक्तिशाली भी। बड़े- बड़े तंत्र साधकों को उसने हैरान बेहाल कर रखा था। इस सम्बन्ध में अचूक समझे जाने वाले प्रयोगों को उसने विफल कर रखा था। जब यह परिवार उनके पास आया, तो परिवार के आने के पहले ही ब्रह्मपिशाच ने उन्हें कई धमकियाँ दे डाली। इन धमकियों की परवाह न करते हुए जब उन्होंने कई मंत्रों के हवन की व्यवस्था की, तो ठीक समय पर वह आकर हवनीय अग्रि बुझा देता। अन्त में उन्होंने गुरूगीता के साथ गायत्री का ब्रह्मास्त्र प्रयोग करने का निश्चय किया। इसे उन्होंने अलग- अलग एवं सम्मिलित रूप से सिद्ध कर रखा था।

🔶 गुरूगीता के संहारक्रम का ब्रह्मास्त्रपुटित अनुष्ठान के पूर्व उन्होंने स्वयं सहित के कल्याण के लिए स्वयं किया। इस अनुष्ठान के पूर्व उन्होंने स्वयं सहित सम्पूर्ण वातावरण को कीलित कर रखा था। अनुष्ठान के बाद जप- हवन का दिन आया, तो ब्रह्मपिशाच के तेवर ढीले पड़ चुके थे। गुरूगीता के सम्पूर्ण मंत्रों के हवन के साथ ब्रह्मपिशाच का अस्तित्त्व खतरे में पड़ता गया और अन्त में पीड़ित परिवार को उस कू्रर पिशाच से छुटकारा मिल गया। तारानाथ भट्टाचार्य ने यह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि गुरूगीता के ये प्रयोग कष्ट साध्य तो हैं, पर इनसे सभी असम्भव को सम्भव करने की सम्भावना पूरी है। महादुष्कर कार्य भी इनसे सहज साध्य हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 163

👉 हमारा दर्पण

🔶 प्रत्येक व्यक्ति एक दर्पण है सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है. जो मनुष्य इस धूल को जमते ही जाने देते हैं, वे दर्पण नहीं रह जाते. और जैसा स्वयं का दर्पण होता है, वैसा ही ज्ञान होता है. जो जिस मात्रा में दर्पण है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिफलित होता है।

🔷 एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. उस साधु ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने एक मित्र साधु के पास भेजा और उससे कहा, “जाओ और उसकी समग्र जीवन-चर्या ध्यान से देखो. उससे ही तुम्हें मार्ग मिलने को है।”

🔶 वह व्यक्ति गया. जिस साधु के पास उसे भेजा गया था, वह सराय में रखवाला था. उसने वहां जाकर कुछ दिन तक उसकी चर्या देखी. लेकिन उसे उसमें कोई खास बात सीखने जैसी दिखाई नहीं पड़ी. वह साधु अत्यंत सामान्य और साधारण व्यक्ति था. उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं पड़ते थे. हां, बहुत सरल था और शिशुओं जैसा निर्दोष मालूम होता था, लेकिन उसकी चर्या में तो कुछ भी न था. उस व्यक्ति ने साधु की पूरी दैनिक चर्या देखी थी, केवल रात्रि में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद वह क्या करता था, वही भर उसे ज्ञात नहीं हुआ था. उसने उससे ही पूछा।

🔷 साधु ने कहा, “कुछ भी नहीं. रात्रि को मैं सारे बर्तन मांजता हूं और चूंकि रात्रि भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुन: जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें फिर धोता हूं. बरतन गंदे और धूल भरे न हों, यह ध्यान रखना आवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूं।”

🔶 वह व्यक्ति इस साधु के पास से अत्यंत निराश हो अपने गुरु के पास लौटा. उसने साधु की दैनिक चर्या और उससे हुई बातचीत गुरु को बताई।

🔷 उसके गुरु ने कहा, “जो जानने योग्य था, वह तुम सुन और देख आये हो. लेकिन समझ नहीं सके. रात्रि तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह उसे पुन: धो डालो. धीरे-धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. सराय के रखवाले को इस सबका ध्यान रखना बहुत आवश्यक है।”

🔶 चित्त की नित्य सफाई अत्यंत आवश्यक है. उसके स्वच्छ होने पर ही समग्र जीवन की स्वच्छता या अस्वच्छता निर्भर है. जो उसे विस्मरण कर देते हैं, वे अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 13 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2018


👉 Paranormal Achievements Through Sadhana

🔶 Human life, with myriads of latent physical, mental and spiritual qualities, may be likened to a garden of sweet fruits.  Even if only a few of these qualities are cultivated systematically, one can relish the fruits of joy. But if the baser tendencies and bodily habits are left undisciplined, they run amuck. Such motiveless life leads to the growth of thorny bushes of misery and suffering in the garden of life. Like a Kalpavriksha (a mythological tree supposed to fulfill every desire of a person sitting beneath it), the human life is potentially full of innumerable precious gifts.  One can benefit from these divine gifts only when life’s energies are properly focused, disciplined and directed towards noble deeds.

🔷 The efforts made towards this end have been called sadhana. Many deities are worshiped and it is believed that they grant suitable boons to their devotee. The underlying truth is that while moving along the path of sadhana, an intrinsic faith has to be developed and the wayward propensities and perversities of the lower self have to be identified, curbed, refined and transformed into divine virtues. Natural adoption of virtuous life is a visible sign of divine grace. Once it is accomplished, people can smoothly move ahead in the direction of the ultimate goal of human endeavour – self-realisation.

📖 From Akhand Jyoti

👉 गुरुगीता (भाग 107)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता
🔶 गुरूगीता के इस विस्मयकारी सुफल को भगवान् सदाशिव कहते हैं-

कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनम् ।। यक्षराक्षसभूतानां चौरव्याघ्रभयापहम्॥ १३५॥
महाव्याधिहरं सर्व विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेवं जपेत्सदा॥ १३६॥

🔷 गुरूगीता का जप काल एवं मृत्यु के भय का हरण करने वाला है। इससे सभी संकटों का नाश होता है। इतना ही नहीं, इससे यक्ष, राक्षस, भूत, चोर एवं व्याघ्र आदि के भय का भी हरण होता है॥ १३५॥ इसके जप से सभी व्याधियाँ दूर होती हैं। सभी सिद्धियों एवं अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती हैं। यहाँ तक कि इस गीता को स्वयं जपने से सम्मोहन वशीकरण आदि की शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है॥ १३६॥

🔶 गुरूगीता के दार्शनिक रहस्य, यौगिक रहस्य तो अद्भुत हैं ही इसके काम्य प्रयोग भी विलक्षण हैं। जिनका मूल स्त्रोत है, शिष्य की श्रद्धा, आस्था और उपयुक्त विधि- विधान। शिष्य की श्रद्धा एवं उपयुक्त विधियाँ गुरूगीता के मंत्रों को महासमर्थ बनाती हैं। हालाँकि इसके प्रयोगकर्त्ता विरले एवं विलक्षण ही मिलते हैं। फिर भी इनका सम्पूर्ण अभाव नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 162

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 4)

🔶 पश्चिम में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग बेशुमार दान करते हैं, वे बड़े बड़े अस्पताल और बड़ी बड़ी संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल सहानुभूति और मनुष्य जाति पर दया करने के नाते ही करते हैं, उनके लिए यह सब समाज सेवा है और ईश्वर समाज का आधार है और मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। वे अभिमान रहित होकर कर्त्तापन की बुद्धि को छोड़ कर और फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, उनके लिए यह सेवायोग (कर्मयोग) नहीं है।

🔷 उनके वास्ते यह सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिए सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य−जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्त शुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य) का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुए कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।

🔶 कर्मयोग के अभ्यास के लिए बहुत धन होना आवश्यक नहीं है, आप अपने धन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उसको अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम कर दो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान−शौकत से की हुई सेवा से।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 8

शुक्रवार, 11 मई 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 May 2018

👉 Maharshi Patanjali

🔷 Some people brought a young man to Maharshi Patanjali and said-“Despite the best efforts from  our side, we are not able to teach this man the importance of yoga sadhana in human life. Kindly help us in this regard”. The Maharshi asked the young man to stay back in his Ashram for a few days.
  
🔶 Several days passed. The people who had brought that man to the Ashram came to meet him there. It was indeed a pleasant surprise for them to see him completely transformed. That man, who was addicted to intoxicating drugs and sensual pleasures a few days back, was now living a life of austerity and self control. He was engrossed in deep meditation beneath a huge tree when they reached the Ashram.
  
🔷 “How did this magical change occur?”-they couldn’t help asking Maharshi Patanjali. The latter humbly replied that there was nothing  amazing in this. It was due to healing and soothing influence of the spiritually suffused vibrations of this Ashram, where every inmate is a devoted sadhaka; this acts as an attitudinal therapy. Those people were well aware that the environment also plays an important role in the progress of sadhana but they could not follow what the Maharshi meant by attitudinal therapy.

🔶 Maharshi further explained –“An eye-specialist cures the problems of eyesight but treatment of the mental-sight, he outlook towards the self and the world.., is the job of a rishi. Because of the deep insight awakened by long-term sadhana, a rishi can view the hidden tendencies and nature of a person and diagnose the ailments of his mental and emotional selves. Using their spiritual powers, rishi can heal such ailments and infirmities of the inner selves of a person. The treatment and righteous orientation of one’s mentality is achieved not merely by preaching and teaching but by the impact of the rishi-level sadhana.

📖 From Akhand Jyoti

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 3)

🔷 कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।

🔶 कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए।

🔷 वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7

👉 गुरुगीता (भाग 106)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता

🔷 गुरूगीता शिष्य की हृदयवीणा से निकले भक्ति के स्वरों की गूँज है। यह ऐसी झंकार है, जो शिष्य के भाव विह्वल हृदय से उठकर सीधे अपने सारे सद्गुरू के प्रेम विह्वल को झंकृत कर देती है। शिष्य के हृदय के इस मौन कंपन को भला उसके गुरूदेव के अलावा और सुनेगा भी तो कौन? यह एक ऐसा सच है, जिसे शिष्य हुए बिना गाया नहीं जा सकता। जिनके जीवन में सारे रिश्ते उसके गुरूदेव में ही समा चुके हों, वह भला किसी और की याद कैसे करें और क्यों करें? वह तो अपने जीवन की हर साँस में अपने गुरू का नाम लेता है। वह तारे, चाहे मारे, शिष्य की गति और कहीं नहीं हो सकती।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में शिष्य के जीवन का यह यथार्थ नए- नए प्रसंगों नए- नए संदर्भों में नए- नए ढंग से कहा गया है। पिछले क्रम में भी इन्हीं स्वरों की गूँज उठी थी कि जो शिष्य है, उनके जीवन का परम शास्त्र गुरूगीता के सिवा और कुछ नहीं है। गुरूगीता का भक्तिपूर्ण पठन, श्रवण एवं लिखकर इसका दान करने से सभी सुफल प्राप्त होते हैं। भगवान् सदाशिव ने भगवती जगदम्बा से यही कहा था कि गुरूगीता का जो शुद्धतत्त्व मैंने आपके सामने कहा है, उसके सविधि जप से संसार की सारी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। गुरूगीता स्वयं में मंत्रराज है, इसके जप का अनन्त फल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त किए बिना नहीं रहता। ऐसा करने से उसके पाप एवं दरिद्रता दोनों ही सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 161

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026

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