शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

👉 गुरुगीता (भाग 38)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध

🔶गुरुगीता में बताया गया यह सत्य किसी भी तरह से बुद्धिगम्य नहीं है। बुद्धिपरायण, तर्कशील लोग इसे समझ नहीं सकते; किन्तु क्यों और कैसे? के प्रश्न कुहाँसे से इसे अनुभव नहीं किया जा सकता। इसे वही जान सकते हैं, समझ सकते हैं और आत्मसात् कर सकते हैं- जो साधना की डगर पर काफी दूर तक चल चुके हैं। ऐसे साधना परायण जनों के लिए ही यह गुरुदेव की महिमा नित्य अनुभव की वस्तु बन जाती है। महान् अघोर संत बाबा कीनाराम के साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता। वह अघोर तंत्र के महान् सिद्ध थे। उनके चमत्कारों, अति प्राकृतिक रहस्यों के बारे में ढेरों किंवदंतियाँ कही-सुनी जाती हैं।
  
🔷 बाबा कीनाराम उत्तरप्रदेश-राज्य के गाजीपुर के रहने वाले थे। उनमें जन्म-जन्मान्तर के साधना संस्कार थे। विवेकसार ग्रन्थ में उनकी जीवनकथा विस्तार से वर्णित है। इसमें लिखा है कि जब वह जूनागढ़ के परम सिद्धपीठ गिरनार गए, तो उन्हें स्वयं भगवान् दत्तात्रेय ने दर्शन दिए और उन्होंने कीनाराम को एक कुबड़ी देते हुए कहा- जहाँ यह कुबड़ी तुमसे कोई ले ले, वहीं तुम स्थायी रूप से रहना तथा उन्हीं को अपना अघोर गुरु बनाना। इसी के साथ भगवान् दत्तात्रेय ने उन्हें गुरुगीता में वर्णित उपर्युक्त महामंत्रों के रहस्य को समझाते हुए उनको गुरु महिमा के बारे में बताया।
  
🔶कीनाराम जब काशी पहुँचे, तो वहाँ हरिश्चन्द्र घाट पर बाबा कालूराम से उनकी भेंट हुई। पहली भेंट में कालूराम ने उनकी तरह-तरह से अनेकों परीक्षाएँ लीं। बड़ी कठिन और रहस्यमयी परीक्षाओं के बाद वह उन्हें अपना शिष्य बनाने के लिए तैयार हो गए। शिष्य बनने के बाद तंत्र साधना का एक परम दुर्लभ एवं अति रहस्यमय अनुष्ठान किया जाना था। इस अनुष्ठान के लिए कई तरह की सामग्री आवश्यक थी। जिन्हें साधना का थोड़ा सा भी ज्ञान है- वे जानते हैं कि तंत्र साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था। एक साथ यह सब कैसे हो?
  
🔷 इन प्रश्नों ने बाबा कीनाराम को आकुल कर दिया। शिष्य की चिन्ता से शिष्यवत्सल बाबा कालूराम द्रवित हो उठे। उन्होंने कहा- चिन्ता किस बात की रे! मैं हूँ न, तू मेरी ओर देख, मुझ में देख! उनके इस तरह कहने पर बाबा कीनाराम ने अपने गुरु की ओर देखा। आश्चर्य! परमाश्चर्य!! तंत्र साधना की सभी अधिष्ठात्री देव शक्तियाँ महासिद्ध कालूराम में विद्यमान थीं। सभी तंत्रपीठ उनमें समाहित थे। सद्गुरु चेतना में तंत्र साधना के समस्त तत्त्व दिखाई दे रहे थे। शिष्यवत्सल बाबा कालूराम की यह अद्भुत कृपा देखकर कीनाराम भक्ति विह्वल हो गए और ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। अपने सद्गुरु के पूजन से ही उन्हें तंत्र की समस्त शक्तियाँ, सारी सिद्धियाँ मिल गयीं। गुरु कृपा ने उन्हें अघोरतंत्र का महासिद्ध बना दिया। सद्गुरु पूजन में सबका यजन है। सभी शिष्य साधक इस साधना रहस्य को भलीप्रकार जान लें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 63

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 2)

🔷 रंगरेज कपड़ा रंगने की प्रक्रिया उसकी धुलाई से आरम्भ करता है। यदि मैला कपड़ा रंगने के लिए दिया जाये तो पहले उसे धोवेगा। धुले हुए कपड़े पर ही रंग चढ़ना या चढ़ाया जाना सम्भव होता है। उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ-बूझ भी भोंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया हुआ श्रम भी सार्थक न रहेगा।

🔶 आत्मिक प्रगति के पथिक आमतौर से यही भूल करते रहते हैं और असफलता का दोष उस पुण्य प्रक्रिया को देते हैं जिसे सही ढंग से अपनाने वाले सदा कृतकृत्य होते हैं। वस्तुतः यह भूल पथिकों की नहीं उनके मार्ग-दर्शकों की है जिन्होंने बहुमूल्य महंगी वस्तु को सस्ती बताकर लोगों को आकर्षित करने भर का ध्यान रखा और यह भूल गये कि अभीष्ट प्रतिफल न मिलने पर जो निराशा और अविश्वास भरी प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी उसका क्या परिणाम होगा। सस्ते प्रलोभनों से भ्रमाया व्यक्ति आरम्भ में अति उत्साही हो सकता है पर उसकी निराशाजनक प्रतिक्रिया नास्तिकता के रूप में ही परिणत होकर रहेगी।

🔷 अध्यात्म तत्वज्ञान के मूल आधार से अपरिचित किन्तु उसकी ध्वजा उड़ाने वाले तथाकथित गुरु लोग औंधी सीधी पुस्तकें रचकर यह मिथ्या मान्यता फैलाते रहे हैं कि अमुक पूजा अर्चा करने से उन्हें पाप फल के दण्ड भुगतने की छूट मिल जायेगी। यह प्रतिपादन लोगों को बहुत ही आकर्षक लगता है। क्योंकि अनाचार अपनाने वाले प्रत्यक्षतः सदाचार परायण लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक भौतिक सुख सुविधायें प्राप्त कर लेते हैं। छल-छद्म का परिणाम अन्ततः बुरा ही क्यों न हो पर तत्काल तो उन हथकण्डों से लाभ मिल ही जाता है। पाप-पथ अपनाने वाले असुर-देवताओं से अधिक बलिष्ठ रहे हैं यह स्पष्ट है। पीछे भले ही उनकी दुर्गति हुई हो पर आरम्भिक लाभ तो उन्हें ही मिलता है। देवत्व प्राप्ति का आरम्भिक कार्य तप साधना की कष्टकर प्रक्रिया से आरम्भ होता है। लम्बी दूर तक उस मार्ग पर चलने के बाद ही देव पुरुष आनन्द उल्लास प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में तात्कालिक लाभ को प्रधानता देने वाले-अदूरदर्शी लोग कुमार्गगामिता के सहारे तुरन्त लाभान्वित होने की रीति-नीति अपनाते हैं, पर उन्हें यह खुटका बना रहता है कि कभी न कभी इन कुकर्मों का कष्टकारक प्रतिफल भोगना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.7

👉 श्रद्धा और अहंकार

🔷 ये बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवो ने अश्मेघ यज्ञ किया! भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा :- ये यज्ञ तब पूरा माना जायेगा जब इस धरा के सभी ऋषि यहाँ भोजन ग्रहण करेंगे और आसमान में घंटा बजेगा!

🔶 तब पांडवो ने सभी ऋषियों को भोजन करवाया परन्तु घंटा नहीं बजा, तब उन्होंने "भगवान् श्रीकृष्ण" जी से पूछा की कहाँ कमी रह गई! तब "भगवान् श्रीकृष्ण" जी ने अंतर्ध्यान हो कर देखाऔर कहा की:-

🔷 दूर एक जंगल में सुपच नाम के महामुनि बैठे है वो रह गए है इसलिये घंटा नहीं बजा! पांडवो ने दूत भेज कर महामुनि को भोजन के लिए निमंत्रण भेजा ऋषि सुपच ने दूत को कहा की उनको स्वयं आना चाहिए था और दूत को वापिस भेज दिया!

🔶 तब पांडवो ने स्वयं महामुन को भोजन के लिए निमंत्रण दिया! परन्तु ऋषि सुपच ने शर्त रखी की वे तब ही जायेंगे जब उन्हें १०० अश्वमेघ यज्ञो का फल मिलेगा पांडव परेशान हो कर वापिस आ गए सारी बात "भगवान् श्रीकृष्ण" जी को बताई!

🔷 जब ये बात द्रौपदी को पता लगी तो द्रौपदी ने कहा ये मेरे ऊपर छोड दो! तब द्रौपदी ने नंगे पैर कुए से पानी लाकर खाना पकाया और नंगे पैर चल कर ऋषि सुपच को बुलाने के लिए गई वहा ऋषि सुपच ने फिर वही शर्त बताई तो द्रौपदी ने कहा की मैंने आप जैसे किसी साधू से सुना है की..

🔶 जब कोई नंगे पैर आप जैसे किसी महान संत के दर्शन करने जाता है तो उसका एक एक कदम एक एक अश्वमेघ यज्ञ के बराबर है इस तरह आप अपने १०० अश्वमेघ यज्ञ का फल लेकर बाकि मुझे दे दे!

🔷 इस तरह मुनि सुपच जी द्रौपदी की बात सुनकर द्रोपदी के साथ आ गए जब उनको खाना परोसा गया तो उन्होंने पांडवो और सारी रानियों द्वारा बनाये गए खाने को मिला लिया और खाना शुरू कर दिया, ये सब देखकर द्रौपदी के मन आया की अगर एक एक करके खाते तो द्रौपदी द्वारा बनाये गए खाने के स्वाद का भी पता लगता की कितना स्वादिष्ट बना है!

🔶 इस दोरान ऋषि ने खाना समाप्त कर दिया परन्तु घंटा फिर भी नहीं बजा! तो पांडवो ने "भगवान् श्रीकृष्ण" जी से पूछा की अब क्या कमी रह गई?

🔷 "भगवान् श्रीकृष्ण" ने कहा की ये तो सुपच जी ही बतायेगे! इस पर ऋषिसुपच ने उन्हे जवाब दिया की ये तो द्रौपदी से पूछ लो की घंटा क्यों नहीं बजा!

🔶 इस तरह जब द्रौपदी को इस बात का अहसास हुआ तो उन्होंने सुपच जी से अपने अहंकार के लिए माफ़ी मांगी तो असमान में घंटा बजा और उनका यज्ञ पूरा हुआ!

🔷 इस वृतांत के ज़रिये संतो द्वारा बताया गया है की संत महात्मा स्वाद को महत्व न देकर श्रधा को देखते है और प्रभु से आत्मा के मिलाप में अहंकार सबसे बड़ा रोड़ा है....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 Feb 2018


👉 हे मनुष्य! तुम महान हो!

🔶 तुम्हारा वास्तविक स्वरूप- तुम्हारे हिस्से में स्वर्ग की अगणित विभूतियाँ आई हैं न कि नर्क की कुत्सित। तुमको वही लेना चाहिये, जो तुम्हारे हिस्से में आया है। स्वर्ग तुम्हारी ही सम्पत्ति है। शक्ति तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तुमको केवल स्वर्ग में प्रवेश करना है तथा शक्ति का अर्जन करना है। स्वर्ग में सुख ही सुख है। वहाँ आत्मा को न तो किसी बात की चिन्ता रहती है और न किसी प्रकार की इच्छा। तूफान मचाने वाले विकारों की आसुरी लीला या भय के भूतों का लेश भी वहाँ नहीं है। वह ‘स्वर्ग’ इस संसार में ही है। वह तुम्हारे भीतर है। उसे खोजने का प्रयत्न करो, अवश्य तुम्हें प्राप्त हो जायगा।
  
🔷 संसार में फैले हुए पाप, निकृष्टता, भय, शोक तुम्हारे हिस्से में नहीं आये हैं। मोह, शंका, क्षोभ की तरंगें तुम्हारे मानस-सरोवर में नहीं उठ सकतीं क्योंकि विक्षोभ उत्पन्न करने वाली आसुरी प्रवृत्तियों से तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं। संशय तथा शंकाओं से दबकर तुम्हें इधर-उधर मारा नहीं फिरना है। क्षण-क्षण उद्विग्र तथा उत्तेजित नहीं होना है। शान्त तथा पवित्र आत्मा में क्लेश, भय, दु:ख शंका का स्पर्श कैसे हो सकता है? यदि तुम इन कुत्सित वस्तुओं को अपनाओगे तो अवश्य ही ये तुम्हारे गले पड़ेगें और तुम्हारे जीवन की, तुम्हारी महत्वाकांक्षा की इति श्री कर देंगे।
  
🔶 तुम्हारा मनुष्य होना ही इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारी शक्ति अपरिमित है। संसार की ओर आँख उठाकर देखो! प्रकृति पर मनुष्य का आधिपत्य है, बड़े से बड़े पशु उसके इङ्गित पर नृत्य करते हैं। ऊँची से ऊँची वस्तु पर उसका पूर्ण आधिपत्य है। उससे शक्तिशाली प्राणी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।
  
🔷 तुझमें शारीरिक शक्ति का भण्डार है, तेरे हाथ, पाँव, छाती, पट्ठों में शक्ति इसीलिए दी गई है कि कोई तुझे दबा न सके, तेरी बराबरी न कर सके। मनुष्य में असीम सामथ्र्य विद्यमान है, शक्ति का वृहत् पुञ्ज भरा पड़ा है। तुझे किसी के आगे हाथ पसार कर माँगने की आवश्यकता नहीं है। तू ईश्वर का महान पुत्र है। ईश्वर की शक्ति का ही तेरे अन्दर प्रकाश है। तू ईश्वर को ही अपने भीतर से कार्य करने दे। ईश्वर को स्वयं प्रकाशित होने दे। ईश्वर जैसा ही बन कर रह। ईश्वर होकर खा, पी, और ईश्वर होकर ही साँस ले, तभी तू अपनी महान् पैतृक सम्पत्ति का स्वामी बन सकेगा।
  
🔶 मनुष्य जीवन दिव्य सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास किया जाता है। मनुष्य के साथ यह पक्षपात नहीं है वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिए यह प्रयोग परीक्षण है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कत्र्तव्य और उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता है। यदि पेट प्रजनन तक, लोभ, मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें तो उसे नर-पशु के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?

🔷 लोभ-मोह के साथ अहंकार जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उभरी अहमन्यता अनेकों प्रकार के कुचक्र रचतीं और पतन पराभव के गर्त गिरती हैं। अहंता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता है और आक्रामक भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भंयकर हो जाता है। दुष्ट दुरात्मा एवं नर पिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ-सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता है। इसी को कहते हैं वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशाएँ हर किसी के लिए खुली हैं। जो इनमेें से जिसे चाहता है उसे चुन लेता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो है।   

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 3)

🔶 ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

🔷 मन मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना अपने पैर का अँगूठा अपने मुख से चूसना, इस प्रकार का प्रलय चित्र बाज़ार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु , हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता।

🔶 अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुम्बकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जितना गहरा होगा उतना ही परस्पर लय होने की-सम्भावना बढ़ेगी इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव के ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय समर्पण पर एकात्म भाव पर निर्भर रहता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.50

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 3)

🔷 अनगढ़ दुराग्रहियों के प्रति वैसा भाव रखा जाय जैसा रोगियों के प्रति रखा जाता है। मनोविकारग्रस्त या चरित्रभ्रष्ट व्यक्ति वस्तुतः एक प्रकार के रोगी ही हैं। उनके प्रति दृष्टिकोण ठीक उसी प्रकार का अपनाना चाहिए। बीमारियों या पागलों का इलाज तो कुशल चिकित्सक करते हैं पर उनके प्रति विद्वेष नहीं रखते। आवश्यकता पड़ने पर पागलों के हाथ-पैर भी बाँध देते हैं और सड़े फोड़ों में गहरा नश्तर भी लगाते हैं। उपदंश प्रायः वेश्यागमन से होता है। जिगर खराब करने में मद्यपान प्रधान कारण देखा गया है। कैन्सर की धूम्रपान से संगति बैठती है। डाकू भी किसी मुठभेड़ में घायल होते हैं। सेंध लगाते समय हाथ पैर तुड़वा लेने वाले चोरों की भी अस्पताल में भर्ती होती है। डाक्टर को इतनी फुरसत कहाँ जो इन कुकर्मियों का लेखा-जोखा रखे और घृणा-तिरस्कार के झंझट में पड़कर अपना सन्तुलन बिगाड़े। उसे उतना ही ध्यान रहता है कि व्याधिमुक्त करने के उत्तरदायित्व का निर्वाह किया जाय। क्षमा करने या दण्ड देने की बात वह शासन तन्त्र के जिम्मे छोड़ देता है।

🔶 अनगढ़ों के प्रति विज्ञजनों को चिकित्सक जैसा व्यवहार करना चाहिए। न तो उतना क्षमाशील बना जाय जिसमें पानी में बहने वाले बिच्छू को बार-बार निकालने और डंक-त्रास सहने जैसा अतिवाद अपनाया गया हो। साँप को दूध पिलाने पर हानि ही हानि है। दुष्टता की छूट मिलने पर वह चौगुनी उद्दण्डता बरतने पर उतारू होती है। इसलिए उपचार से विमुख नहीं होना चाहिए। न्यायाधीश यदि क्षमा करने की नीति अपनाये तो दुष्ट-दुरात्माओं से किसी सज्जन को जीवित बचा सकना कठिन है।

🔷 कर्तव्य के नाते सत्परामर्श तो हर किसी को हर स्थिति में देना चाहिए, किन्तु यह नहीं सोचना चाहिए कि कहना मान ही लिया जायेगा। हो सकता है कि श्रेष्ठ जनों की श्रेष्ठता हमसे ऊँचे स्तर की हो और अपने परामर्श व्यावहारिकता और सुविधा को ध्यान में रखकर दिये गये हों, जबकि आदर्शवादिता की कसौटी लाभ-हानि से कहीं ऊँची उठी होती है और उसमें उच्चस्तरीय निर्धारण एवं अनुकरणीय परम्परा का परिपोषण ही प्रधान होता है। इसके लिए आवश्यकतानुसार अपना विनम्र परामर्श इन्हें इस आशा से दिया जा सकता है कि कदाचित् इसका कोई भाग उन्हें अनुकूल पड़े। सूझबूझ की दृष्टि से कई बार बालक भी कोई ऐसी बात कह सकते हैं जो बड़ों के ध्यान में न आई हो, इसलिए परामर्श देने में और कुछ न सही, अपना मन तो हलका होता ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to live our life? (Part 1)

🔷 We all are here in this world for the purpose of fulfilling our duties. We are expected to live happily and in good manner but mean time not to be so busy in it that objectives of life are neglected for we will die if we allow this world to trap us.
                                           
🔶 You would have heard the story of SIMBUN, a monkey found in Africa.  It is said that hunters succeed in killing that monkey in exchange of just a handful of gram. Grams are kept in metal-pitchers which appeal SIMBUN monkey. SIMBUN comes to eat that gram and in attempt to it gets his hands into the pitcher but cannot draw out his hands for he had grabbed grams in his fist. He desires to take out his fist, also cries and apply force but could not take out. He even does not dare to leave the gram so that he could take out his hand, this situation invites the hunter to come and kill the monkey in order to obtain the skin of monkey for commercial use. I and you are almost in same situation as that of African monkey SIMBUN.
                                             
🔷 We are seen trapped like those monkeys with grips of fulfilling avarices, longings and egos just to destroy the wealth of life which we are not expected to do. We should do something to save our life. We have to get rid of our timidity because by doing so we do not loose but earn even more.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 18)

🔶 मित्रो! हमें छोटे-बड़े सभी आयोजनों में बहुत सफलतायें मिलती रही हैं, जन सहयोग मिलता रहा है। एक बार एक सहस्रकुण्डीय यज्ञ में हमने तीस-चालीस हजार रुपया खर्च कर डाला। हमारे पास कानी-कौड़ी भी नहीं थी, पर न जाने कहाँ से सब कुछ आता हुआ चला गया। न जाने कहाँ से व्यवस्था होती चली गयी। हमको यकीन था कि कोई महाशक्ति हमारे पीछे बैठी है। इसी तरह जब हमको विदेश जाना पड़ा तो किराये-भाड़े में चालीस-पचास हजार रुपये खर्च हो गये। उस समय हमारे पास रुपये-पैसों की दिक्कत थी और दूसरी बहुत सी दिक्कतें थीं, लेकिन हम जानते थे कि हम अकेले नहीं हैं और हमारे पास बहुत जबरदस्त बैंकिंग है।

🔷 मित्रो! आप यकीन रखना कि यह सब आपके लिए भी सुरक्षित है, लेकिन शर्त केवल यही है कि आपको अपने को स्वयं सही सिद्ध करना होगा। अगर आप स्वयं सही सिद्ध न हो सके, तो ये जो बैंकिंग है, फिर आपको उसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। फिर आपको यह आशा नहीं करनी चाहिए कि कहीं से कोई ऐसा समर्थन, बैंकिंग और सहायता आपको मिलेगी। अगर आप सही व्यक्ति होंगे और पूरी ईमानदारी से काम करते हुए चले जायेंगे, तो हम आपको यह आशीर्वाद दे करके विदा करते हैं कि आप यह पायेंगे कि आप समर्थ हो करके गये हैं। फिर आपके क्रियाकलापों का कोई सहयोगी न हो, ऐसी बात नहीं है। हम यहाँ से आपकी सहायता करेंगे और यहाँ से आपका समर्थन करेंगे और हम आपको आगे बढ़ायेंगे।

🔶 मित्रो! हम आपकी हर तरह से सहायता करेंगे और हर तरफ सफलता देंगे, शर्त केवल एक ही है कि आप अपने स्थान पर सही बने हुए रहें। अगर आप अपने स्थान पर सही नहीं रहेंगे, तो हमारी सहायता आपसे टक्कर खा करके वापस हमारे पास आती जायेगी। फिर आप वह काम करने में समर्थ न हो सकेंगे, जो हम आपसे कराना चाहते हैं और जिम्मेदारियाँ आप लेकर के जा रहे हैं, उसको भी आप पूरा नहीं कर सकेंगे। आप अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों को ध्यान में रखकर जायें। कहाँ क्या सफलता मिली और कहाँ नहीं मिली, इस पर बहुत धन मत देना। आप अपना स्वयं का कर्तव्य पूरा कर लेना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 37)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध
🔷 गुरुदेव भगवान् के महिमामय स्वरूप के अन्य रहस्यमय आयामों को प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-

तस्यै दिशे सततमञ्जलिरेष आर्ये प्रक्षिप्यते मुखरितो मधुपैर्बुधैश्च।
जागर्ति यत्र भगवान् गुरुचक्रवर्ती विश्वोदयप्रलयनाटकनित्यसाक्षी॥ ५१॥
श्रीनाथादिगुरुत्रयं गणपतिं पीठत्रयं भैरवं सिद्धौघं बटुकत्रयं पदयुगं दूतीक्रमं मण्डलम्।
विरान् द्व्यष्ट-चतुष्क-षष्टि-नवकं-वीरावलीपञ्चकं श्रीमन्मालिनिमंत्रराजसहितं वन्दे गुरोर्मण्डलम्॥ ५२॥

🔶 गुरुतत्त्व के रहस्य को प्रकट करने वाले इन महामंत्रों में अनेक तरह की साधनाओं के रहस्यों का गूढ़ संकेतों में वर्णन है। भगवान् भोलेनाथ की वाणी शिष्यों के समक्ष इस रहस्य को प्रकट करती है कि गुरुदेव भगवान् में साधना, साध्य एवं सिद्धि के सारे मर्म समाए हैं। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के चक्रवर्ती स्वामी हैं। ऐसे गुरुदेव भगवान् जिस दिशा में भी विराज रहे हों, उसी दिशा में विद्वान् शिष्य को मन्त्रोच्चारपूर्वक सुगन्धित पुष्पों की अञ्जलि समर्पित करनी चाहिए॥ ५१॥

🔷 श्री गुरुदेव ही परमगुरु एवं परात्पर गुरु हैं। उनमें तीनों नाथ गुरु आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरक्षनाथ समाये हैं। उन्हीं में भगवान् गणपति का वास है। उन परम प्रभु में तंत्र साधना के तीनों रहस्य-मय पीठ-कामरूप, पूर्णगिरि एवं जालंधर पीठ स्थित हैं। मन्मथ आदि अष्ट भैरव, सभी महासिद्धों के समूह, तंत्र साधना में सर्वोच्च कहा जाने वाला विरंचि चक्र उन्हीं में है। स्कन्दादि बटुकत्रय, योन्याम्बादि दूतीमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल, सोममण्डल आदि मण्डल, प्रकाश व विमर्श के युगल पद के रहस्य उन्हीं में हैं। दशवीर, चौसठ योगिनियाँ, नवमुद्राएँ, पंचवीर तथा अ से क्ष तक सभी मातृकाएँ एवं मालिनीयंत्र गुरुदेव के चेतनामण्डल में ही स्थित हैं। सभी तत्त्वों से युक्त गुरु मण्डल को मेरा बारम्बार प्रणाम है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 61

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 1)

🔷 आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अनेक व्यक्ति एक ही मन्त्र से-एक ही पूजा विधान से-एक जितने समय तक ही उपासना करते हैं पर उनमें से कोई सफल होता है कोई असफल। किसी को तुरन्त परिणाम दिखाई पड़ता है किसी को मुद्दतें बीत जाने पर भी कोई सफलता दृष्टि-गोचर नहीं होती। इसका क्या कारण है? यह मैंने गुरुदेव से और भी स्पष्ट रूप से पूछा। कारण कि इन दिनों मुझे ही डाक का उत्तर देना पड़ता है और उनमें ऐसे पत्र भी कम नहीं होते जो बताये हुए विधान से उपासना करते हुए बहुत दिन हो जाने पर भी कुछ परिणाम न मिलने से असन्तुष्ट है। इस कठिनाई का उत्तर गुरुदेव के मुख से जो निकला उसका साराँश नीचे की पंक्तियों में प्रस्तुत किया जाता है।

🔶 ‘आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान उन कुसंस्कारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो दुर्भावों और दुष्कर्मों के रूप में मनोभूमि पर छाये रहते हैं। आकाश में बादल छाये हों तो फिर मध्याह्न काल का सूर्य यथावत् उदय रहते हुए भी अन्धकार ही छाया रहेगा। जप-तप करते हुए भी आध्यात्मिक सफलता न मिलने कारण एक ही है- मनोभूमि का कुसंस्कारी होना। साधना का थोड़ा-सा गंगाजल इस गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठता है- नाले को शुद्ध कर सकना सम्भव नहीं होता। बेशक तीव्र गंगा प्रवाह में थोड़ी-सी गन्दगी भी शुद्धता में परिणत हो जाती है। पर साथ ही यह भी सच है कि सड़ांद भरी गन्दी गटर को थोड़ा-सा गंगा जल शुद्ध कर सकने में असमर्थ असफल रहेगा।

🔷 सफलता की अपनी महिमा और महत्ता है उसे गंगा-जल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गंगा जल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस शुद्ध नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त का गंगा जल का भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गंगा जल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत बनी रहे इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह उपकरण एवं स्थान की पवित्रता भी अक्षुण्य बनी रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 7

👉 माँ बाप का कर्ज

🔷 एक बेटा पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन गया। पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने हर तरह का काम करके उसे इस काबिल बना दिया था। शादी के बाद पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है। लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता की ये अनपढ़ उनकी सास-माँ है।

🔶 बात बढ़ने पर बेटे ने एक दिन माँ से कहा- " माँ ”_मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल हो गया हूँ कि कोई भी कर्ज अदा कर सकता हूँ। मै और तुम दोनों सुखी रहें इसलिए आज तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे खर्च सूद और व्याज के साथ मिला कर बता दो। मै वो अदा कर दूंगा। फिर हम अलग-अलग सुखी रहेंगे।

🔷 माँ ने सोच कर उत्तर दिया - "बेटा” हिसाब ज़रा लम्बा है, सोच कर बताना पडेगा। मुझे थोडा वक्त चाहिए।"

🔶 बेटे ना कहा - " माँ _कोई ज़ल्दी नहीं है। दो-चार दिनों मे बात देना।"

🔷 रात हुई, सब सो गए। माँ ने एक लोटे मे पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई। बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर पानी डाल दिया। बेटे ने करवट ले ली। माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया। बेटे ने जिस ओर भी करवट ली_माँ उसी ओर पानी डालती रही तब परेशान होकर बेटा उठ कर खीज कर बोला कि माँ ये क्या है? मेरे पूरे बिस्तर को पानी-पानी क्यूँ कर डाला...?

🔶 माँ बोली- " बेटा, तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब बनानें को कहा था। मै अभी ये हिसाब लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे बचपन मे तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते हुए काटीं हैं। ये तो पहली रात है ओर तू अभी से घबरा गया...? मैंने अभी हिसाब तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर पाए।"

🔷 माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़ के रख दिया। फिर वो रात उसने सोचने मे ही गुज़ार दी। उसे ये अहसास हो गया था कि माँ का क़र्ज़ आजीवन नहीं उतरा जा सकता।

🔶 माँ अगर शीतल छाया है पिता बरगद है जिसके नीचे बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है। माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख उठाने को तैयार रहती है तो पिता सारे जीवन उन्हें पीता ही रहता है।

🔷 माँ बाप का कर्ज कभी अदा नहीं किया जा सकता। हम तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे बढ़ा कर अपने हित मे काम कर रहे हैं।

🔶 आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से वही चाहिए ना!!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 Feb 2018


👉 उसे जड़ में नहीं, चेतन में खोजें

🔶 समझा जाता है कि विधाता ही मात्र निर्माता है। ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता। दोनों प्रतिपादनों से भ्रमग्रस्त न होना हो, तो उसके साथ ही इतना और जोडऩा चाहिए कि उस विधाता या ईश्वर से मिलने-निवेदन करने का सबसे निकटवर्ती स्थान अपना अंत:करण ही है। यों ईश्वर सर्वव्यापी है और उसे कहीं भी अवस्थित माना, देखा जा सकता है; पर यदि दूरवर्ती भाग-दौड़ करने से बचना हो और कस्तूरी वाले मृग की तरह निरर्थक न भटकना हो, तो अपना ही अंत:करण टटोलना चाहिए। उसी पर्दे के पीछे बैठे परमात्मा को जी भरकर देखने की, हृदय खोलकर मिलने-लिपटने की अभिलाषा सहज ही पूरी कर लेनी चाहिए।
  
🔷 ईश्वर जड़ नहीं, चेतन है। उसे प्रतिमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता है। चेतना वस्तुत: चेतना के साथ ही, दूध पानी की तरह घुल-मिल सकती है। मानवीय अंत:करण ही ईश्वर का सबसे निकटवर्ती और सुनिश्चित स्थान हो सकता है। ईश्वर  दर्शन, साक्षात्कार, प्रभु सान्निध्य जैसी उच्च स्थिति का रसास्वादन जिन्हें वस्तुत: करना हो, उन्हें बाहरी दुनिया की ओर से आँखें बंद करके अपने ही अंतराल में प्रवेश करना चाहिए और देखना चाहिए कि जिसको पाने, देखने के लिए अत्यंत कष्टï-साध्य और श्रम-साध्य प्रयत्न किये जा रहे थे, वह तो अत्यंत ही निकटवर्ती स्थान पर विराजमान-विद्यमान है। सरलता को कठिन बनाकर रख लेना, यह शीर्षासन लगाना भी तो मनुष्य की इच्छा और चेष्टïा पर निर्भर है। अंतराल में रहने वाला परमेश्वर ही वस्तुत: उस क्षमता से सम्पन्न है, जिससे अभीष्टï वरदान पाना और निहाल बन सकना संभव हो सकता है। बाहर के लोग या देवता, या तो अंत:स्थित चेतना का स्मरण दिला सकते हैं अथवा किसी प्रकार मन को बहलाने के माध्यम बन सकते हैं।
  
🔶 मंदिर बनाने के लिए एक भक्त जन ने सूफी संत से मंदिर की रूपरेखा बना देने के लिए अनुरोध किया। उन्होंने अत्यंत गंभीरता से कहा- इमारत अपनी इच्छानुरूप कारीगरों की सलाह से बजट के अनुरूप बना लो; पर एक बात मेरी मानो, उसमें प्रतिमा के स्थान पर एक विशालकाय दर्पण ही प्रतिष्ठिïत करना, ताकि उसमें अपनी छवि देखकर दर्शकों को वास्तविकता का बोध हो सके।
  
🔷 भक्त को कुछ का कुछ सुझाने वाली सस्ती भावुकता से छुटकारा मिला। उसने एक बड़ा हाल बनाकर सचमुच ही ऐसे स्थान पर एक बड़ा दर्पण प्रतिष्ठिïत कर दिया, जिसे देखकर दर्शक अपने भीतर के भगवान्ï को देखने और उसे निखारने, उबारने का प्रयत्न करते रह सकें।
  
🔶 मन:शास्त्र के विज्ञानी कहते हैं कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही करता है एवं वैसा ही बन जाता है। किए हुए भले-बुरे कर्म ही संकट एवं सौभाग्य बनकर सामने आते हैं। उन्हीं के आधार पर रोने-हँसने का संयोग आ धमकता है। इसलिए परिस्थितियों की अनुकूलता और बाहरी सहायता प्राप्त करने की फिराक में फिरने की अपेक्षा, यह हजार दर्जे अच्छा है कि भावना, मान्यता, आकांक्षा, विचारणा और गतिविधियों को परिष्कृत किया जाय। नया साहस जुटाकर, नया कार्यक्रम बनाकर प्रयत्नरत हुआ जाय और अपने बोए हुए को काटने के सुनिश्चित तथ्य पर विश्वास किया जाय। बिना भटकाव का, यही एक सुनिश्चित मार्ग है।
  
🔷 अध्यात्मवेत्ता भी तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य अपने स्वरूप को, सत्ता एवं महत्ता को, लक्ष्य एवं मार्ग को भूलकर ही आये दिन असंख्य विपत्तियों में फँसता है। यदि अपने को सुधार ले, तो अपना सुधरा हुआ प्रतिबिम्ब ही व्यक्तियों और परिस्थितियों में झलकता, चमकता दिखाई पडऩे लगेगा। शालीनता सम्पन्नों को, सज्जनों को, उच्चस्तरीय प्रतिभाओं के साथ जुडऩे और महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त कर सकने का समुचित लाभ मिलता है।  

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 2)

🔶 मन मस्तिष्क के बारे में भी यही बात है। उसमें हलचलें चल रही होगी, तरह-तरह के विचार उठ रहे होगे तो जल में उठती हुई हिलोरों की तरह अस्थिरता ही बनी रहेगी। स्थिर जल राशि में चन्द्र, सूर्य तारे आदि का प्रतिबिम्ब ठीक प्रकार दृष्टिगोचर होता है पर हिलते हुए पानी में कोई छवि नहीं देखी जा सकती। विचारों की हड़कम्प यदि मस्तिष्क में उठती रहें-तरह तरह की कल्पनायें घुड़दौड़ मचाती रहें तो फिर ब्रह्म सम्बन्ध की प्रगाढ़ता में निश्चित रूप से अड़चन पड़ेगी। मस्तिष्क जितना अधिक रहित-खाली होगा उतनी ही तन्मयता उत्पन्न होगी और आत्मा परमात्मा का मिलन संयोग अधिक प्रगाढ़ एवं प्रभावशाली बनता चला जाएगा

🔷 आकाश में जब बिजली कड़क रही हो या आँधी-तूफान का मौसम चल रहा हो तो हमारे रेडियो में आवाज साफ नहीं आती कंकड़ जैसे व्यवधान उठते रहते हैं और प्रोग्राम ठीक से सुनाई नहीं पड़ते। अन्तरिक्ष से भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक चेतनाओं का सुदूर क्षेत्र से मनुष्य पर अवतरण होता रहता है। ब्राह्मी चेतना एक प्रकार का ब्रोडकास्ट केन्द्र है जहाँ से मात्र संकेत, निर्देश, सूचनाएँ ही नहीं वरन् विविध प्रकार की सामर्थ्य भी प्रेरित की जाती रहती है। सूक्ष्म जगत में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है जहाँ सही रेडियो यन्त्र लगा है- जहाँ व्यक्ति ने अपने आपको सही अन्तः स्थिति में बना लिया है वहाँ यह सुविधा रहेगी कि ब्रह्म चेतना की विविध सूचनाओं को ग्रहण करके अपनी ज्ञान चेतना को बढ़ा सकें। इतना ही नहीं प्रेरित दिव्य शक्तियों अपने को असाधारण आत्म बल सम्पन्न बना सकें।

🔶 परन्तु यह सम्भव तभी है जब मनुष्य अपने मस्तिष्क को तनाव रहित-शान्त स्थिति में रखे। आँधी-तूफान कड़क और गड़गड़ाहट की उथल-पुथल रेडियो को ठीक से काम नहीं करने देती। मनुष्य का शरीर और मन उत्तेजित-तनाव की स्थिति में रहें तो फिर यह कठिन ही होगा कि वह ब्रह्म चेतना के साथ अपना सम्बन्ध ठीक से जोड़ सके और उस सम्मिलन की उपलब्धियों का लाभ उठा सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 49

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 2)

🔷 कठिनाई वहाँ आती है जहाँ अनगढ़ों से वास्ता पड़ता है। वे मात्र अनजान ही नहीं होते, अहंकार और दुराग्रह भी दृढ़तापूर्वक अपनाये होते हैं। समझाने से समझते नहीं, अनुरोध को मानते नहीं। निजी विवेक के सहारे किसी निर्णय तक पहुँचने की सूझबूझ होती नहीं। ऐसों से पाला पड़े तो क्या नीति अपनाई जाय, यह निर्णय करना टेढ़ी खीर है। आमतौर से ऐसे प्रसंगों पर कलह उत्पन्न होता है और विग्रह तू-तू मैं-मैं से बढ़कर हाथापाई और मार-काट तक जा पहुँचता है। इसी प्रसंग में कई बार गहरा मनोमालिन्य और विद्वेष जड़ पकड़ लेता है। फलतः दोनों ही पक्ष घाटे में रहते हैं। आक्रमण और प्रतिरोध का कुचक्र ऐसा है कि उसका कभी अन्त ही नहीं होता। बारूद और माचिस दोनों को ही साथ-साथ जलाना होगा। वादी और प्रतिवादी में से एक भी नफे में नहीं रहता। प्रताड़ना से सुधार की नीति शासन तन्त्र को ही शोभा देती है। सामान्य सम्पर्क में उसके बिना ही काम चलाया जाना चाहिए।

🔶 आक्रमण प्रत्याक्रमण से लेकर हत्याएँ और आत्महत्याएँ प्रायः ऐसे ही रोष-विद्वेष के वातावरण में होती है, जहाँ तर्क काम नहीं करते और सौजन्य भरे उपाय काम नहीं आते। असमंजस इस बात का है कि सुधार परिवर्तन का सुयोग बनता नहीं दीखता और विग्रह में उभयपक्ष का अहित होता है। प्रतिशोध प्रत्याक्रमण का सिलसिला अहंकार की पृष्ठभूमि पर पनपता है। उसमें कारण और औचित्य समझने और अवरोध को हटाने की दूरदर्शिता बनती नहीं। आक्रोश में मात्र नीचा दिखाने और बदला लेने की बात सूझती है। इस अर्ध विक्षिप्तता के उभरने पर उससे निपटना और भी अधिक कठिन पड़ता है। उस झंझट को खड़ा कर लेने और समाधान में असफल रहने पर कई बार यह सोचना पड़ता है कि अच्छा होता कीचड़ में ईंट डालकर छींटे न पड़ने देने वाली उपेक्षा अपनाकर काम चलाते। खैर उसमें भी नहीं, क्योंकि चुप रहने को भी कायरता माना जाता है और उद्दण्डता का हौसला बढ़ता है।

🔷 इन परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली दुहरी हानि में से एक को आसानी से बचाया जा सकता है। जो आधी बच जाती है उससे निपटने में आधी मेहनत से भी काम चल जाता है। दुर्जनता से उलझने में सर्वप्रथम अपना मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है। इसमें इतनी शक्ति नष्ट हो जाती है जो कदाचित झगड़े-झंझट खड़े होने पर भी न होती। संतुलन गँवा बैठने पर मनुष्य अपंग विक्षिप्त जैसी स्थिति में जा पहुँचता है। आक्रोश में कितना खून जलता है, उसकी जानकारी मनोविज्ञान के ज्ञाता विस्तारपूर्वक बता सकते हैं। एक घण्टे का क्रोध एक दिन के बुखार जितनी हानि पहुँचाता है। उससे विग्रहों द्वारा खड़े किये गये झंझट की तुलना में भी अधिक हानि पहुँचती है। इस स्व-उपार्जित उत्तेजना से बचने की समझदारी दूरदर्शी को अपनानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Last Part)

🔷 A buttering person, a praising person must get all that he needs, is it possible anywhere in the world? No it is not possible. BHAGWAN! You are very cute, sweet and soft-hearted; BHAGWAN you just killed MAHISHASUR, KANS and VRITTASUR, now please fulfill my so & so desire. This is owl-like tendency. Today very this type has become the way of PUJA, UPASNA, DHYAN and JAP- just buttering the BHAGWAN either DURGA or HANUMAN or else to get in exchange something from him.

🔶 The entire world just soaked in dark, trapped in an illusionary network is wasting it time and life besides defaming spirituality. Not only this, the world also keeps complaining that it took the name of BHAGWAN, did PUJA, buttered and offered sweets, rice, incense sticks and did AARTI also but all went in vein. The world keeps complaining of no benefit out of these rituals. But tell how that is possible?
                                              
🔷 Yes, there should be some gain, but for that man should incorporate spirituality practically in his routine-life. Incorporation of spirituality in life means incorporation of essence of PUJA-UPASANA in life.
                                                                
🔶 Finished, today’s session.
                                     
====OM SHANTI====
                            
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 17)

🔶 हम अपने आदमी की निष्ठा की परख पैसे के साथ नहीं, वरन् पसीने के साथ करना चाहते हैं। इसलिए जहाँ कहीं भी जो भी कोई हो, उसमें आप यह प्रयत्न करना कि अधिक से अधिक लोगों का पसीना लग जाय और अधिक से अधिक लोगों की मेहनत लग जाय। मूलभूत सिद्धान्तों को आप ध्यान रखना कि हम विचारों का परिष्कार करने चले हैं और आपने विचारों का परिष्कार करने में किस हद तक सफलता पायी, यही आपकी सफलता की कसौटी है। यही आपकी क्रियाशीलता की कसौटी है। इसके लिए आवश्यक है कि आपकी विचारशीलता, आपकी भावना, आपकी निष्ठा और आपकी कर्तव्य परायणता इस हद तक होनी चाहिए जैसे कि ब्राह्मणों की और संतों की रही है।

🔷 मित्रो! आप ब्राह्मणत्व के प्रतीक है, आप संतत्व के प्रतीक हैं, आप शान्तिकुञ्ज के प्रतीक हैं। आप नवयुग निर्माण योजना के प्रतीक हैं। आप अपनी इन सब जिम्मेदारियों को समझना और इन सब जिम्मेदारियों को धारण करना। अगर आपने इन जिम्मेदारियों को धारण नहीं किया, तो लोग किससे अन्दाज लगायेंगे। हमारे बारे में अन्दाज, हमारे मिशन के बारे में अंदाज और हमारे क्रियाकलापों के बारे में, हमारी क्रियाशीलता के बारे में अंदाज लोग आपकी क्रियाशीलता के द्वारा ही लगायेंगे। आपके चरित्र से लगायेंगे। आपके स्वभाव से लगायेंगे, आपके कर्म से लगायेंगे, आपके गुणों से लगायेंगे।

🔶 यह सब चीजें आपको प्रतीक मानकर लगायेंगे। इसलिए आप जहाँ कहीं भी जायँ, फूँक-फूँक कर कदम रखें। आप अपने खान-पान के सम्बन्ध में, उठने-बैठने के संबंध में, चलने-फिरने के संबंध में, बोलचाल के संबंध में, व्यवहार के संबंध में, निर्लोभता के संबंध में, आपकी प्रयत्नशीलता और क्रियाशीलता के सम्बन्ध में, लोगों से मिलने-जुलने के सम्बन्ध में और लोगों से आत्मीयता बनाने के सम्बन्ध में, लोगों के अंदर श्रमशीलता पैदा करने के सम्बन्ध में, लोगों की भावनाओं को उभारने के सम्बन्ध में जो जिम्मेदारियाँ ले करके जा रहे हैं, उन्हें निभाने की कोशिश करना। बेटे, हम आपकी सहायता करेंगे। हमारा मिशन आपके साथ है। हम आपके साथ हैं और हमारा गुरु आपके साथ है। सफलता आपको जरूरत मिलेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 36)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध

🔷 गुरुगीता के महामन्त्रों में अध्यात्मविद्या के गूढ़तम रहस्य सँजोये हैं। योग, तन्त्र एवं वेदान्त आदि सभी तरह की साधनाओं का सार इनमें है। महाकठिन साधनाएँ इन महामंत्रों के आश्रय में अति सुगम हो जाती हैं। ऐसा होते हुए भी सभी लोग इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं। जिनके पास गुरुभक्ति से मिली दिव्य दृष्टि है, उन्हीं की अन्तश्चेतना में यह तत्त्व उजागर होता है। गुरुदेव भगवान् के प्रति श्रद्धा अति गहन हो, तो फिर साधक को इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है कि विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कहीं कुछ भी है, तो वह अपने गुरुदेव में है। इन्हीं के आश्रय में सभी तरह की साधनाएँ सिद्धिदायी होती हैं।
    
🔶 गुरु श्रद्धा की तत्त्वकथा के उपर्युक्त मंत्र में यह ज्ञान कराया गया है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। वे परात्पर प्रभु त्रिगुणमय कलेवर को धारण करके भी सर्वथा गुणातीत  हैं। अपने वास्तविक रूप में निर्गुण व निराकार गुरुदेव की महिमा अनन्त है। वे ही सदाशिव सर्वव्यापी विष्णु एवं सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा हैं। ऐसे दयामय गुरुदेव को प्रणाम करने से जीवों को संसार से मुक्ति मिलती है। इस सत्य को विरले विवेकवान् ही समझ पाते हैं। विवेक न होने पर यह सच्चाई प्रकट होते हुए भी समझ में नहीं आती। परम कृपालु सद्गुरु के चरण जिस दिशा में विराजते हैं, उधर भक्तिपूर्वक प्रणाम करने से शिष्य का सर्वविध कल्याण होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 60

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

👉 सबसे समर्थ और सबसे सच्चा साथी

🔶 एक छोटे से गाँव मे श्रीधर नाम का एक व्यक्ति रहता था स्वभाव से थोड़ा कमजोर और डरपोक किस्म का इंसान था!

🔷 एक बार वो एक महात्माजी के दरबार मे गया और उन्हे अपनी कमजोरी बताई और उनसे प्रार्थना करने लगा की हॆ देव मुझे कोई ऐसा साथी मिल जायें जो सबसे शक्तिशाली हो और विश्वासपात्र भी जिस पर मैं आँखे बँद करके विश्वास कर सकु जिससे मैं मित्रता करके अपनी कमजोरी को दुर कर सकु! हॆ देव भले ही एक ही साथी मिले पर ऐसा मिले की वो मेरा साथ कभी न छोड़े!

🔶 तो महात्मा जी ने कहा पुर्व दिशा मे जाना और तब तक चलते रहना जब तक तुम्हारी तलाश पुरी न हो जायें! और हाँ तुम्हे ऐसा साथी अवश्य मिलेगा जो तुम्हारा साथ कभी नही छोडेंगा बशर्ते की तुम उसका साथ न छोड़ो!

🔷 श्रीधर - बस एक बार वो मुझे मिल जायें तो फिर मैं उसका साथ कभी न छोडूंगा पर हॆ देव मॆरी तलाश तो पुरी होगी ना?

🔶 महात्माजी - हॆ वत्स यदि तुम सच्चे दिल से उसे पाना चाहते हो तो वो बहुत सुलभता से तुम्हे मिल जायेगा नही तो वो बहुत दुर्लभ है!

🔷 फिर उसने महात्माजी को प्रणाम किया आशीर्वाद लिया और चल पड़ा अपनी राह पर चल पड़ा!

🔶 सबसे पहले उसे एक इंसान मिला जो शक्तिशाली घोड़े को काबू मे कर रहा था तो उसने देखा यही है वो जैसै ही उसके पास जाने लगा तो उस इंसान ने एक सैनिक को प्रणाम किया और घोड़ा देकर चला गया श्रीधर ने सोचा सैनिक ही है वो तो वो मित्रता के लिये आगे बड़ा पर इतने मे सैनापति आ गया सैनिक ने प्रणाम किया और घोड़ा आगे किया सैनापति घोड़ा लेकर चला गया श्रीधर भी खुब दौड़ा और अन्ततः वो सैनापति तक पहुँचा पर सैनापति ने राजाजी को प्रणाम किया और घोड़ा देकर चला गया तो श्रीधर ने राजा को मित्रता के लिये चुना और उसने मित्रता करनी चाही पर राजा घोड़े पर बैठकर शिकार के लिये वन को निकले श्रीधर भी भागा और घनघोर जंगल मे श्रीधर पहुँचा पर राजा कही न दिखे!

🔷 प्यास से उसका गला सुख रहा था थोड़ी दुर गया तो एक नदी बह रही थी वो पानी पीकर आया और एक वृक्ष की छाँव मे गया तो वहाँ एक राहगीर जमीन पे सोया था और उसके मुख से राम राम की ध्वनि सुनाई दे रही थी और एक काला नाग उस राहगीर के चारों तरफ चक्कर लगा रहा था श्रीधर ने बहुत देर तक उस दृश्य को देखा और फिर वृक्ष की एक डाल टूटकर नीचे गिरी तो साँप वहाँ से चला गया और इतने मे उस राहगीर की नींद टूट गई और वो उठा और राम राम का सुमिरन करते हुये अपनी राह पे चला गया!

🔶 श्रीधर पुनः महात्माजी के आश्रम पहुँचा और सारा किस्सा कह सुनाया और उनसे पुछा हॆ नाथ मुझे तो बस इतना बताओ की वो कालानाग उस राहगीर के चारों और चक्कर काट रहा था पर वो उस राहगीर को डँस क्यों नही पा रहा था!

🔷 लगता है देव की कोई अद्रश्य सत्ता उसकी रक्षा कर रही थी! महात्माजी ने कहा उसका सबसे सच्चा साथी ही उसकी रक्षा कर रहा था जो उसके साथ था तो श्रीधर ने कहा वहाँ तो कोई भी न था देव बस संयोगवश हवा चली वृक्ष से एक डाली टूटकर नाग के पास गिरी और नाग चला गया!

🔶 महात्माजी ने कहा नही वत्स उसका जो सबसे अहम साथी था वही उसकी रक्षा कर रहा था जो दिखाई तो नही दे रहा था पर हर पल उसे बचा रहा था और उस साथी का नाम है "धर्म" हॆ वत्स धर्म से समर्थ और सच्चा साथी जगत मे और कोई नही है केवल एक धर्म ही है जो सोने के बाद भी तुम्हारी रक्षा करता है और मरने के बाद भी तुम्हारा साथ देता है! हॆ वत्स पाप का कोई रखवाला नही हो सकता और धर्म कभी असहाय नही है महाभारत के युध्द मे भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों का साथ सिर्फ इसिलिये दिया था क्योंकि धर्म उनके पक्ष मे था!

🔷 हॆ वत्स तुम भी केवल धर्म को ही अपना सच्चा साथी मानना और इसे मजबुत बनाना क्योंकि यदि धर्म तुम्हारे पक्ष मे है तो स्वयं नारायण और सद्गुरु तुम्हारे साथ है नही तो एक दिन तुम्हारे साथ कोई न होगा और कोई तुम्हारा साथ न देगा और यदि धर्म मजबुत है तो वो तुम्हे बचा लेगा इसलिये धर्म को मजबुत बनाओ!

🔶 हॆ वत्स एक बात हमेशा याद रखना की इस संसार मे समय बदलने पर अच्छे से अच्छे साथ छोड़कर चले जाते है केवल एक धर्म ही है जो घनघोर बीहड़ और गहरे अन्धकार मे भी तुम्हारा साथ नही छोडेंगा कदाचित तुम्हारी परछाई भी तुम्हारा साथ छोड़ दे परन्तु धर्म तुम्हारा साथ कभी नही छोडेंगा बशर्ते की तुम उसका साथ न छोड़ो इसलिये धर्म को मजबुत बनाना क्योंकि केवल यही है हमारा सच्चा साथी!

🔷 श्रीधर ने फिर धर्म को ही अपना सच्चा साथी माना!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 Feb 2018


👉 सदगुरु की आवश्यकता

🔶 अनेक महत्त्वपूर्ण विधाएँ गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं और तंत्र विद्या का प्रवेश द्वार तो अनुभवी मार्गदर्शक के द्वारा ही खुलता है। अक्षराम्भ यद्यपि हमारी दृष्टि में सामान्य सी बात है, पर छोटा बालक उस कार्य को अध्यापक के बिना अकेला ही पूर्ण करना चाहे, तो नहीं कर सकता, भले ही वह कितना ही मेधावी क्यों न हो। गणित, शिल्प, सर्जरी, साइन्स, यन्त्र निर्माण आदि सभी महत्त्वपूर्ण कार्य अनुभवी अध्यापक ही सिखाते हैं। कोई छात्र शिक्षक की आवश्यकता न समझे और स्वयं ही यह सब सीखना चाहे, तो उसे कदाचित्ï ही सफलता मिले। रोगी को अपनी चिकित्सा कराने के लिए किसी अनुभवी चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है, यदि वह अपने आप ही इलाज करने लगे, तो उसमें भूल होने की सम्भावना रहेगी, क्योंकि अपने संबंध में निर्णय करना हर व्यक्ति के लिए कठिन होता है।
  
🔷 अपनी निज की त्रुटि, अपूर्णता, बुराई, स्थिति एवं प्रगति के बारे में कोई बिरला ही सही अनुमान लगा सकता है। जिस प्रकार अपना मुँह अपनी आँखों से नहीं देखा जा सकता, उसके लिए दर्पण की या किसी दूसरे से पूछने की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार अपने दोष-दुर्गुणों का, मनोभूमि का, आत्मिक स्तर का एवं प्रगति का भी पता अपने आप नहीं चलता, कोई अनुभवी ही इस संबंध में विश्लेषण कर सकता है और उसी के द्वारा उद्धार एवं कल्याण का मार्गदर्शन किया जा सकता है। जिसने कोई रास्ता स्वयं देखा है, कोई मंजिल स्वयं देखी है, कोई मंजिल स्वयं पार की है, वही उस रास्ते की सुविधा-असुविधाओं को जानता है, नये पथिक के लिए उसी की सलाह उपयोगी हो सकती है। बिना किसी से पूछे स्वयं ही अपना रास्ता आप बनाने वाले संभव हैं, मंजिल पार कर लें, निश्चित रूप से उन्हें कठिनाई उठानी पड़ेगी और देर भी बहुत लगेगी। इसलिए जब तक सर्वथा असंभव ही न हो जाय, तब तक मार्गदर्शक की तलाश करना ही उचित है। उसी के सहारे आध्यात्मिक यात्रा सुविधापूर्वक पूर्ण होती है।
  
🔶 प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करने पर भी यही प्रतीत होता है कि जीव शक्ति, ज्ञान और भाव के संबंध में स्वावलम्बी नहीं है, परावलम्बी है। उसे बाह्यï शक्तियों के सहयोग की अपेक्षा रहती है। इसके बिना पंगु ही बना रहता है। जब उसकी आंतरिक शक्ति और बौद्धिक विकास में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है, तब उसे बाह्य शक्तियों की अपेक्षा भले ही न हो, परन्तु फिर भी उसे अन्तस्ï की अचिन्त्य शक्ति का आलम्बन स्वीकार करना ही होगा, तभी वह पूर्ण विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।
  
🔷 भौतिक ज्ञान के शिक्षक अपने विषय की जानकारी देकर अपना  कत्र्तव्य पूरा कर लेते हैं, पर आध्यात्मिक मार्ग में इतने से ही काम नहीं चल सकता। वहाँ शिक्षा ही पर्याप्त नहीं, वरन् गुरु द्वारा दिया हुआ आत्मबल भी दान या प्रसाद रूप में उपलब्ध करना पड़ता है। जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सा की शिक्षा मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी प्राप्त करनी पड़ती है। उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म-कल्याण का मार्ग बताते हैं, वरन्ï उस पर चल सकने योग्य साहस, बल  और उत्साह भी देते हैं। यह देन तभी संभव है, जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-संपदा पर्याप्त मात्रा में हो। इसलिए गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या ही नहीं, आत्मिक स्तर पर तप की संगृहीत पूँजी को भी देखना पड़ता है। यदि वह सभी गुण न हों, तो कोई व्यक्ति अध्यात्म मार्ग का उपदेशक भले ही कहा जा सके, पर गुरु नहीं बन सकता। गुरु के पास साधन, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए।  

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 1)

🔶 शारीरिक और मानसिक उत्तेजनाओं आत्मिक-साधनाओं में अत्यन्त बाधक होती है। उनके कारण महत्त्वपूर्ण साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता रह सकें।

🔷 क्रिया-कलापों की भगदड़ से माँस पेशियों में-नाड़ी संस्थान में तनाव रहता है। बाहर से स्थिर होते हुए भी यदि शरीर के भीतर आवेश छाया रहा, तो उस उफान के कारण मन का स्थिर एवं एकाग्र रह सकना भी सम्भव न होगा। हठयोग में शरीर को जटिल स्थिति में डाले रहने की आवश्यकता हो सकती है पर ध्यानयोग की दृष्टि से वह सर्वथा अवांछनीय है अर्धपद्मासन , शीर्षासन, एक पैर से खड़ा होना, जल में बैठना, धूप में तपना, शीत में काँपना, ठण्ड के दिनों में ठण्डे जल से नहाना, गर्मियों में धूनी तपना जैसे शरीर पर दबाव डालने वाले साधन क्रम हठयोग एवं तान्त्रिक साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान समाधि जैसे लययोग परक, अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस सन्दर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिका पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मन्त्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इस विधि विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता, क्योंकि चित्त वृत्तियाँ इन शरीरगत हलचलों में लगी रहती हैं- एकाग्रता हो तो कैसे हो।

🔶 आरम्भिक साधना प्रयास में केवल आदत डालने नियमितता अपनाने एवं रुचि उत्पन्न करने जितना ही लक्ष्य रहता है इसलिए उपासना में मनोरंजक-चित्त को एक नियत विधि व्यवस्था में लगाये रहने वाली विधियाँ उपयुक्त रहती है। शंकर जी पर बेलपत्र चढ़ाना परि-क्रम करना, धूप, दीप आदि से देव प्रतिमा का पंचोपचार पूजन’ स्तवन, पाठ, जप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनायें इसी स्तर की होती हैं, उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी महत्त्व करना होता है। तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निश्चेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव रहित शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.49

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 1)

🔷 जिनके साथ इच्छा या अनिच्छा से हमें रहना पड़ता है, उनके साथ निर्वाह की रीति-नीति पहले ही निर्धारित कर लेनी चाहिए। सोचना होगा कि उनमें से स्तर की दृष्टि से कुछ श्रेष्ठ, कुछ मध्यम होंगे, साथ ही कुछ अनगढ़, असंस्कृत और उद्धत भी रहेंगे। इच्छित प्रकृति के लोग ही मिलते रहें, अन्य प्रकार वालों के साथ वास्ता ही न पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। सदा सूर्य ही निकला रहे, रात्रि कभी हो नहीं, सदा सर्दी का मौसम रहे, कभी गर्मी फटकने ही न पाये ऐसी अपेक्षा रखना और उस मर्जी के पूरी न होने पर खीजना अनुपयुक्त है। यह संसार हमारे लिए ही नहीं बना है। उसमें अन्यान्य के निर्वाह की भी गुंजायश रखी गई है।

🔶 इस संयुक्त समुदाय के लिए बनाये बड़े रसोईघर में सदा वही सब नहीं पकता जो हम चाहते हैं। इस मुसाफिरखाने में सभी को बैठने की छूट है। अपनी मर्जी तो अपने निजी घर में ही निभ सकती है। समझा जाना चाहिए कि इस सराय में सभी के लिए रैन बसेरे के लिए गुंजायश है। अपनी मर्जी को ही सब कुछ रखने और जैसा चाहा गया है वैसा ही सरंजाम जुटने की बात सोचना, ऐसी गलती है जिसे सुधारे बिना दूसरा रास्ता है नहीं। श्रेष्ठजनों से प्रेरणा लें, उनसे घनिष्ठता साधें और आदान-प्रदान का द्वार खोलें। जो सामान्य हैं, उनके साथ तालमेल बिठाने और बिना टकराये समय गुजारने भर की बात सोचनी चाहिए।

🔷 वे जहाँ तक सहन कर सकें उतना उन्हें सत्परामर्श से लाभान्वित भी करें और वैसी सज्जनता बरतें जैसी कि सामान्य जनों के साथ बरती जानी चाहिए। हर किसी के साथ घनिष्ठता बढ़ाने, अनावश्यक उदारता बरतने और आशा लगाने की भावुकता अन्ततः महँगी ही पड़ती है। इसलिए सम्पर्क क्षेत्र में इस प्रकार का वर्गीकरण और नीति निर्धारण आवश्यक हो जाता है। ऐसा भी होता रहता है कि व्यक्तियों के स्तर बदलें। मध्यम ऊँचे उठें और श्रेष्ठों जैसा स्तर विकसित करें। अपवाद ऐसे भी होते हैं जिनमें ऊँचे लोग भी नीचे की ओर खिसकने लगते हैं। अतएव वर्गीकरण सामयिक होते हैं। जहाँ स्तर में हेर-फेर हो रहा हो, वहाँ अपने निर्धारण में भी तदनुरूप परिवर्तन करना भी उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Part 2)

🔷 GAYATRI mantra means refinements of sentiments that I had been taught by my GURU. Friends! My all heart and soul is soaked in GAYATRI mantra which for me is a mantra that only refines & systemizes human brain. I spend all my brain on how to make my style of thinking, wishes and view-point like that of a devotee of GAYATRI. I continued to test & assess if there is any fault me. In olden days rupees were used to be tested on KASAUTI to short out defective ones and genuine ones. I continued to test my every attitude to see which one is defective and which one is pure? I also simultaneously continued to rectify my defectiveness and further improve genuineness.
                             
🔶 My intercession has never been confined to morning PUJA-PATH only.  My UPASANA has been going on 24 hours. I have been on fire all along 24 hours in order to refine and rectify myself. Every moment I have been testing my mind-tendency to be refined simultaneously if it hasn’t been. I have made my mind such that BHAGWAN having once come within it must not go back distressed & disappointed. He must not go back with hate so is very essential to clean/purify the mind.
                             
🔷 BHAGWAN deeply hates longings and cunningness of human beings. BHAGWAN is not likely to concede to buttering by human beings. There is no need to pronounce the words of name of BHAGWAN.  the BHAGWAN is not of so low-standard that he be grabbed or overpowered when you praise him, butter him or repeatedly chant his name. BHAGWAN is not of so weak heart and nature. We the human beings usually assume BHAGWAN to be so weak that any man can get anything from him just by buttering him. Tell, how that can be our BHAGWAN?
                            
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 16)

🔶 मित्रो! आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, वहाँ आपको शिविरों का संचालन करना पड़ेगा। शुरू के तीन दिन तो आपको वहाँ के लोगों की रूपरेखाओं और व्यवस्थाओं को समझने में लगेगा। कार्यकर्ताओं को तो मालूम नहीं है। उन बेचारों पर तो हवन हावी रहता है। बस साहब! हम तो हवन करेंगे और यहाँ बस हवन होगा। हवन के अलावा उन्हें कोई दूसरी चीज दिखाई नहीं पड़ती। दूसरी चीज उनको समझ में नहीं आती। उनको यह बताना पड़ेगा कि हवन आवश्यक नहीं है। हवन हमारा लक्ष्य नहीं है, हवन हमारा उद्देश्य नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य ज्ञानयज्ञ है। ज्ञान हमारा पूज्य है। हवन के माध्यम से यज्ञ के माध्यम से हम लोगों में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करते हैं। इसलिए हमारे सारे के सारे क्रियाकलापों में उन सब बातों का समन्वय होना चाहिए, जिससे सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन होना संभव हो सके। इसलिए आप लोगों से कहना कि आप अपना श्रम दीजिए, समय दीजिए।

🔷 आप यह कोशिश करना कि यज्ञशालाओं को बनाने के लिए कार्यकर्ता अपना श्रम और समय देना सीखें। परिश्रम करना सीखें, सहयोग देना सीखें। श्रम की कीमत है, समय की कीमत है। पैसों की कीमत नहीं है। पैसे के बिना हमारे कार्य न कभी रुके हैं और न कभी रुकेंगे। इसलिए आप प्रत्येक कार्यकर्ता को श्रमशील और श्रमनिष्ठ होने के लिए कहना, प्रेरित करना। असली कीमत समय की है, श्रम की है। श्रद्धा की है। श्रद्धा जो है, वह समय के साथ जुड़ी हुई है, श्रम के साथ जुड़ी हुई है। इन्हीं के आधार पर हमारे कार्यक्रम चलेंगे। श्रम का जहाँ अभाव दीखेगा, वहाँ हमारा कोई कार्यक्रम नहीं चलेगा, कोई मिशन नहीं चलेगा। कोई भजन नहीं होगा, कोई पूजन नहीं होगा।

🔶 मित्रो! हमें आप के श्रम की और समय की बहुत आवश्यकता है। अगर हमें आप अपना श्रम और समय देना शुरू करेंगे, तो आपकी निष्ठा में बहुत हेर फेर हो जायेगा। तब फिर आपकी निष्ठाएँ परिपक्व होंगी। जो व्यक्ति मिशन की गंभीरता को समझता है और क्रियाशीलता की गंभीरता को समझता है उसके लिए श्रम और समय देना एक कसौटी है। मित्रो मिशन के कार्यों में परिजनों के परिश्रम का जितना बड़ा योगदान रहा होगा, मैं उतनी ही ज्यादा सफलता मानूँगा। आप लोगों को पसीना बहाना सिखाना और श्रेय उन्हीं लोगों को देना जिन्होंने पसीना बहाना शुरू किया है। आप गरीब हैं तो क्या, छोटे हैं तो क्या और अमीर हैं तो क्या? पसीना किसने लगाया-बहाया, हमको श्रेय पसीने को देना है। हम सम्मान पसीने को देना चाहते हैं, श्रम को देना चाहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 35)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔷 गुरुगीता में वर्णित यह गुरुतत्त्व बुद्धिगम्य ही नहीं, ध्यानगम्य व भक्तिगम्य भी है। जिनकी अंतर्चेतना ने भक्ति का स्वाद चखा है, जो ध्यान की गहराइयों में अंतर्लीन हुए हैं, उन्हें यह सत्य सहज ही समझ में आ जाता है। इस तथ्य को श्रीरामकृष्ण देव के शिष्य लाटू महाराज स्वामी अद्भुतानन्द के उदाहरण से समझा जा सकता है। श्री ठाकुर एवं उनके शिष्य समुदाय की जीवन कथा को पढ़ने वाले सभी जानते हैं  कि लाटू महाराज अनपढ़ ही थे। गुरुभक्ति ही उनकी साधना थी। भक्त समुदाय में बहुप्रचलित श्रीरामकृष्ण देव की समाधिलीन फोटो जब बन कर आयी, तो श्री ठाकुर ने स्वयं उसे प्रणाम किया। लाटू महाराज बोले - ठाकुर यह क्या, अपनी ही फोटो को प्रणाम। इस पर ठाकुर हँसे और बोले - ‘‘नहीं रे! मेरा यह प्रणाम इस हाड़-मांस की देह वाले चित्र को नहीं है, यह तो उस परम वन्दनीय गुरु चेतना को प्रणाम है, जो इस फोटो की भाव मुद्रा से छलक रही है।’’
  
🔶 श्री ठाकुर के इस कथन ने लाटू महाराज को भक्ति के महाभाव में निमग्न कर दिया। इन क्षणों में उन्हें परमहंस का एक और वाक्य याद आया - ‘जे राम जे कृष्ण सेई रामकृष्ण’ अर्थात् जो राम, जो कृष्ण, वही रामकृष्ण। पर इन सब बातों का अनुभव कैसे किया जाए? इस जिज्ञासा के समाधान में  श्री ठाकुर ने कहा - ‘‘भक्ति से, ज्ञान से। इसी से तेरा सब कुछ हो जाएगा। अपने सद्गुरु के वचनों को हृदय में धारण कर।’’ लाटू महाराज गुरुभक्ति को प्रगाढ़ करते हुए ध्यान- साधना में जुट गए।
  
🔷 उनकी यह साधना निरंतर अविराम तीव्र से तीव्रतर एवं तीव्रतम होती गई। इस साधनावस्था में एक दिन उन्होंने देखा कि ठाकुर किसी दिव्य लोक में हैं। बड़ा ही प्रकाश और प्रभापूर्ण उपस्थिति है उनकी। स्वर्ग के देवगण, विभिन्न ग्रहों के स्वामी रवि, शनि, मंगल आदि उनकी स्तुति कर रहे हैं। ध्यान के इन्हीं क्षणों में लाटू महाराज ने देखा कि श्री ठाकुर की परा चेतना ही विष्णु-ब्रह्मा एवं शिव में समायी है। माँ महाकाली भी उनमें एकाकार हैं। ध्यान में एक के बाद अनेक दृश्य बदले और लीलामय ठाकुर के दिव्य चेतना के अनेक रूपों का साक्षात्कार होता गया। अपनी इस समाधि में लाटू महाराज कब तक खोए रहे, पता नहीं चला।
  
🔶 समाधि का समापन होने पर लाटू महाराज पंचवटी से सीधे श्री ठाकुर के कमरे में आए और उन्हें वह सब कह सुनाया, जो उन्होंने अनुभव किया था। अपने अनुगत शिष्य की यह अनुभूति सुनकर परम कृपालु परमहंस देव हँसते हुए बोले - ‘‘अच्छा रे! तू बड़ा भाग्यवान है, माँ ने तुझे सब  कुछ सच-सच दिखा दिया। जो तूने देखा, वह सब ठीक है।’’ फिर थोड़ा गंभीर होकर उन्होंने कहा - ‘‘शिष्य के लिए गुरु से भिन्न तीनों लोकों में और कुछ नहीं है। जो इसे जान लेता है, उसे सब कुछ अपने-आप मिल जाता है।’’ श्री ठाकुर के यह वचन प्रत्येक शिष्य के लिए महामंत्र है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 59

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

👉 "एक बेटा ऐसा भी"

🔷 " माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन 32 साल के, अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

🔶 " बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या ?" माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी। " माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।" सुदीप ने कहा।

🔷 " जैसी तेरी इच्छा।" मरी से आवाज़ में माँ बोली। और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में।

🔶 वृद्धा-आश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर जिन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी। पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धा-आश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।

🔷 एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, " डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"

🔶 तो वहाँ बैठी एक महिला बोली, " प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी। तब सुदीप कुल चार साल का था। पति की मौत के बाद, प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। तब किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"

🔷 वृद्धा-आश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया, और कहा, " सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो ?"

🔶 " माँ, अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ।" सुदीप का जवाब था।

🔷 तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, " मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा।"इस तरह तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धा-आश्रम के लोग भी कहने लगे कि देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया। आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, " मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"

🔶 तभी किसी और बुजुर्ग ने कहा, " मगर वो तो शादी-शुदा भी नहीं था।" अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड, जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"

🔷 दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।

🔶 दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, " इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"

🔷 " इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ । उसे मरे तो तीन साल हो गये।"* शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये। उनमें से एक बोला, " अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था।"

🔶 "वो मोबाईल तो मेरे पास है, जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले। "पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।

🔷 तब शर्मा जी बोले कि करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, "शर्मा जी मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है। और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे। मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"

🔶 यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं। प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया।

🔷 माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था कि कुछ बेटे अपने बूढ़े माँ/बाप को वापस अपने घर ले गये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 Feb 2018


👉 प्रेम या अपनत्व

🔷 अपनों के लिए स्वभावत: उनके दोषों को छिपाने और गुणों को प्रकट करने की आदत होती है। कोई भी पिता अपने प्यारे पुत्र के दोषों को नहीं प्रकट करता है। वह तो उसकी प्रशंसा के पुल ही बाँधता रहता है। दुर्गुणी बालक को न तो कोई मार डालता है और न जेल ही पहँुचा देता है, वरन्ï यह प्रयत्न करता है कि किसी सरल उपाय से उसके दुर्गुण दूर हो जाए या कम हो जाए। यदि यही बात अपने परिजनों के साथ हम रखें, तो उनके अंदर जो बुरे तत्त्व वर्तमान हैं, वे घट जायेंगे। डाकू, हत्यारे, ठग, व्यभिचारी आदि क्रूर कर्मी लोग भी अपने स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन आदि के प्रति मधुर व्यवहार ही करते हैं। सिंह अपने बाल-बच्चों को नहीं फाड़ खाता।
  
🔶 प्रेम एक ऐसा गोंद है, जो टूटे हुए हृदय को जोड़ता है। बिछुड़ों को मिलाता है। यदि किसी के साथ हमारा आत्मभाव सच्चा है और नि:स्वार्थ भाव से हम उसके साथ अपनेपन की भावना रखते हों, तो सच मानिये वह हमारा गुलाम बन जायेगा। दोषों से रहित इस संसार में कोई एक भी व्यक्ति नहीं है। किसी की एक बुराई देखकर उस पर आग बबूला हो जाना, सब बुराई की खान मान लेना उचित नहीं है। यदि हम ध्यान से देखेंगे तो मालूम होगा कि उसमें बुराइयों के साथ कुछ अच्छाइयाँ भी हैं।
  
🔷 आत्मोन्नति यही तो है कि अपनेपन के दायरे को छोटे से बड़ा बनाया जाय। जिनका अपनापन केवल अपने शरीर तक ही है, वे कीट, पतंग जैसे नीच श्रेणी के हैं। जो अपनी संतान तक आत्म भाव को बढ़ाते हैं। वे पशु-पक्षी से कुछ ऊँचे हैं। जिनका अपनापन कुटुम्ब तक सीमित है, वे असुर हैं। जिनका अपनापन अपनी संस्था राष्टï्र तक है, वे मनुष्य हैं। जो समस्त मानव जाति को अपनेपन से ओत-प्रोत देखते हैं, वे देवता हैं। जिनकी आत्मीयता चर-अचर तक फैली है, वे जीवनमुक्त परमसिद्ध हैं। जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है, अधिक लोगों को अपना समझता है, दूसरों की सेवा-सहायता करता है, उनके सुख-दु:ख में अपना सुख-दु:ख मानता है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है। आत्म विस्तार और ईश्वर आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।
  
🔶 एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खर्च  के उतना ही आनन्द प्राप्त कर लेता है, जितना कि बहुत खर्च और कष्टï के साथ अपने बालकों को खिलाने में किया जाता है। अपने हँसते हुए बालकों को देखकर हमारी छाती गुदगुदाने लगती है, पड़ोसी के उससे भी सुन्दर फूल से हँसते हुए बालक को देखकर हमारे दिल की कली नहीं खिलती है? इसका कारण यह है कि हम खुद अपने हाथों अपनी एक निजी दुनिया बसाना चाहते हैं। उसी से संबंध रखना चाहते हैं, उसकी ही उन्नति देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं।
  
🔷 हम सदा यही देखते हैं कि लोग क्या करते हैं? यदि हम क्या करते हैं? यह देखने लगें, तो सदैव सुख ही हमारे सामने होगा, क्योंकि अपने को मनमर्जी बनाना हमारे हाथ में है। इसे कौन रोक सकता है कि हम दूसरों को अपना समझें, उन्हें प्यार करें और उस प्यार और अपनेपन के कारण जो आनन्द उपजे, उसका उपभोग करें। स्वर्ग निर्माण की यही कुंजी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 6)

🔶 मिर्च-मसालों जैसी स्थिति ही चिकनाई-मिठाई की है। तेल-घी को अलग से निकालकर खाने से वे तत्व अलग हो जाते हैं जो चिकनाई को पचाने में काम आते हैं। तिल, मूँगफली, सोयाबीन आदि को चबा लिया या पीस कर उपयोग किया जाय तो वे उचित मात्रा में होने पर पोषण का प्रयोजन पूरा करेंगे। तेल निकालने पर उसे पचाने वाले तत्व खली में निकल जाते हैं और वह चिकनाई अत्यधिक गरिष्ठ हो जाती है। घी खाने की अपेक्षा दूध दही लेना गनीमत है। वैसे जितनी चिकनाई की शरीर को आवश्यकता है उतनी सन्तुलित आहार में सहज ही मिल जाती है। अन्न, दाल आदि में भी चिकनाई होती है। अलग से उसे लेना आवश्यक नहीं है, पर यदि लेने का मन ही हो तो उसे उन बीजों के रूप में ही लेना चाहिए जिनमें तेल ही नहीं उसको पचाने वाले तत्वों का भी उपयुक्त अनुपात रहता है।

🔷 शक्कर के सम्बन्ध में भी यही बात है। अन्न मुँह में पिसता है तो जीभ से निकलने वाले रस ही उसे ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। पेट में पहुँचते-पहुँचते वह उपयुक्त मात्रा में शक्कर से भरा-पूरा होता है। फिर सामान्य खाद्य पदार्थों में भी शक्कर का समुचित अनुपात रहता है। उसे अलग से खाने की कोई आवश्यकता नहीं। मीठे फलों में उसका अनुपात पर्याप्त होता है। प्रायः सभी फल मीठे होते हैं। खजूर, अंजीर, दाख आदि में तो उसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। शहद की भी प्रशंसा है। यों चीकू से लेकर चुकन्दर तक में उसकी पर्याप्त मात्रा रहती है। मन चले तो गन्ना भी चूसा जा सकता है।

🔶 शक्कर प्राप्त करने की इतनी ही मर्यादा है। चरम सीमा तक पहुँचना हो तो बिना पाउडर के शोधा गया गुड़ या राब तक आगे बढ़ा जा सकता है। सफेद चीनी तो सफेद विष कही गई है। कैल्सियम निकल जाने पर तो वह दाँत, मसूड़े, अस्थि पंजर आदि सभी को गलाती है। मधुमेह, रक्तचाप, यकृत रोग, पेट के कीड़े जैसे रोग उत्पन्न करने में तो उसकी ही करामात काम करती है। यदि सफेद चीनी का उपयोग आहार से हटा दिया जाय तो विष भक्षण, चटोरापन, अपव्यय एवं अधिक खाने जैसे अनेक अभिशापों से सहज छुटकारा मिल सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Part 1)

🔶 If man could not develop his eligibility, no RAM-NAM can work. Man generally has a notion in his mind that repeatedly counting of wooden beads with pronunciation of RAM-NAM through tip of his tongue is essence of worship. He keeps repeating RAM-NAM like a parrot uselessly. I do not know if anyone can be benefitted just by counting GAYATRI-mantra over wooden beads. I know millions of people who come complaining to me that their counting of beads is not working. I too, confirm the same that this way no gain was obtained ever nor will be obtained in future.     
                                                 
🔷 But I can assure you that GAYATRI mantra murmured with sincerity, retained in life with right approach and induced in veins, sentiments and thinking process can do miracle and I am the proof & example of that miracle. There are hundreds of secret pages in my life that I have kept sealed so that they could not be opened before I die. So voluminous is the details of helps & services which I have extended to people that no one would believe that a single person can do all that. A man finds it difficult to complete even his own wishes but here another man is competent to help so many people in a diversified way. Yes! I say, it is so and I am that person.
                                     
🔶 Friends! It is a throne and any person cannot sit over it. Only that man is authorized to sit on it who has not confined his GAYATRI to his tongue only, his fingers only rather he went ahead to imbibe GAYATRI to induce his every particle and conscience of heart with GAYATRI’s ambrosia. Only such man is authorized to see the magic of GAYATRI and assure other persons of some share in his PUNYA (GAYATRI) in order to assuage other persons that GAYATRI is a spiritually performed magic for a sure shot gain.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 15)

🔷 मित्रो हमने वह विशेषताएँ खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी समय दुनिया के चक्रवर्ती शासक कहलाते थे। वह विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी जमाने में स्वर्ण-संपदाओं के मालिक कहलाते थे। वह सब विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर यहाँ का हर नागरिक देवता कहलाता था और यह देवताओं का देश कहलाता था। यहाँ के निवासियों में जो आध्यात्मिक विशेषताएँ थी वे सब खत्म हो गयीं। नष्ट हो गयीं। भौतिक विशेषताएँ बढ़ीं या नहीं बढ़ीं, मुझे नहीं मालूम। भौतिक विशेषताओं के बारे में जो मैं जानता हूँ, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि भौतिक विशेषताएँ यदि आदमी की बढ़ती हुई चली जायें, तो उससे बर्बादी के अलावा और क्या हासिल हो सकता है? मैं कई बार अमेरिका का उदाहरण दिया करता हूँ।

🔶 बढ़ती हुई भौतिकता के कारण वहाँ के लोगों ने अपनी दिमागी सेहत को गँवा दिया है। वहाँ के अधिकांश आदमी ऐसे हैं, जो कि गोली खा करके सोते हैं; ताकि नींद आ जाये। वहाँ के लोगों ने अपना दाम्पत्य जीवन व पारिवारिक जीवन समाप्त कर दिया। अकेला आदमी कितना डरावना होता है, कितना खौफनाक होता है, आप इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि भूत जंगल में अकेला रहता है। उसका कोई खानदान वाला, कोई मित्र, कोई सगा-संबंधी नहीं होता है। सबसे बड़ा कष्ट, सबसे बड़ा त्रास उसकी जिंदगी का यही है कि वह अकेला रहता है। अमेरिका, रूस ब्रिटेन जैसे संपन्न एवं भौतिकवादी देशों का जीवन कुछ ऐसा ही है, जहाँ आदमी अकेला है और वह किसी से जुड़ा हुआ नहीं है। वह किसी का नहीं है और उसका कोई नहीं है। इस तरह का जीवन जी करके आदमी क्लेश में फँसता हुआ चला जा रहा है और दुनिया तबाही की ओर भागती हुई चली जा रही है।

🔷 मित्रो! आप यहाँ से उस स्थान पर चोट करने के लिए जाना जिसने कि हमारे सारे शरीर को, हमारे मन को और हमारी भावनाओं को डगमगा दिया है। जिसने मानव की सारी आस्था को डगमगा दिया है। आपके जिम्मे जो काम सौंपा गया है, वह सामान्य काम नहीं है। वह असामान्य काम है। आप अपने आपको असामान्य व्यक्ति मानकर चलना और यह मानकर चलना कि जो उत्तरदायित्व आपको सौंपा गया है, वह सामान्य उत्तरदायित्व नहीं है। आप असामान्य उत्तरदायित्व ग्रहण करके चले हैं। आप छोटी चीज लेकर के नहीं चले हैं। आप बहुत बड़ी चीज को लेकर के चले हैं। आप उसका ध्यान रखना और उसे पूरा करने के लिए उतनी गहराई, उतनी ईमानदारी और उतनी जिम्मेदारी के साथ कदम बढ़ाना, जिससे कि जो ख्वाब हमने देखे हैं, जो सपने हमने देखे हैं, उसे पूरा किया जा सके। समूची मानव जाति आपसे जो उम्मीद लगाये बैठी है और आशा लगाये बैठी है, उसके बारे में उसे थोड़ा सा भी प्रकाश मिल सके, आपके जिम्मे हम यह बहुत बड़ा काम सौंप रहे हैं। आप से लोग बहुत उम्मीद लगाये बैठे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 34)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔶 गुरु नमन की यह महिमा गुरुतत्त्व के विस्तार की ही भाँति असीम और अनन्त है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव -पराम्बा भवानी से कहते हैं-

गुकारं च गुणातीतं रुकारं रूपवर्जितम्। गुणातीत स्वरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः॥ ४६॥
अ-त्रिनेत्रः सर्वसाक्षी अ-चतुर्बाहुरच्युतः। अ-चतुर्वदनो ब्रह्मा श्री गुरुः कथितः प्रिये॥ ४७॥
अयं मयाञ्जलिर्बद्धो दयासागरवृद्धये। यद् अनुग्रहतो जन्तुŸिवत्र संसार मुक्तिभाक् ॥ ४८॥
श्रीगुरोः परमं रूपं विवेक चक्षुषोऽमृतम्। मन्दभाग्या न पश्यन्ति अन्धाः सूर्योदयं यथा॥ ४९॥
श्रीनाथ चरणद्वन्द्वं यस्यां दिशि विराजते। तस्यै दिशेनमस्कुर्याद् भक्त्या प्रतिदिनं प्रिये॥ ५०॥
  
🔷 गुरुतत्त्व की अनुभूति कराने वाले इन महामंत्रों में आध्यात्मिक जीवन का निष्कर्ष प्रकट है। भगवान् महेश्वर की वाणी शिष्यों के समक्ष इस सत्य को उजागर करती है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। ‘गुरु ’ शब्द का पहला अक्षर ‘गु’ इस सत्य का बोध कराता है कि त्रिगुणमय कलेवर को धारण करने वाले गुरुदेव सर्वथा गुणातीत हैं। दूसरे अक्षर ‘रु’ में यह सत्य निहित है कि शिष्यों के लिए रूप वाले होते हुए भी गुरुदेव भगवान् रूपातीत हैं। यानि कि गुरुवर की चेतना वास्तव में निर्गुण व निराकार है। शिष्य को आत्मा स्वरूप प्रदान करने वाले गुरुदेव की महिमा अनन्त है॥ ४६॥

🔶 भगवान् सदाशिव के वचन हैं कि तीन आँखों वाले न होने पर भी गुरुदेव साक्षात् शिव हैं। चार भुजाएँ न होने पर भी वे सर्वव्यापी विष्णु हैं। चार मुख न होने पर भी वे सृष्टिकर्त्ता  ब्रह्मा हैं॥ ४७॥

🔷 ऐसे दयासागर गुरुदेव को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। उनकी कृपा से ही जीवों को भेद बुद्धि वाले संसार से मुक्ति मिलती है॥ ४८॥

🔶 श्री सद्गुरु का यह परम रूप उनसे विवेक चक्षु मिलने पर ही दृश्य होता है; तभी उनके अमृत तुल्य रूप का स्पर्श मिलता है। इसके अभाव में जिस तरह अन्धा व्यक्ति सूर्योदय के दृश्य को नहीं देख पाता ॥ ४९॥ उन परम स्थायी सद्गुरु के चरणद्वय जिस दिशा में भी विराजते हैं, उस दिशा में प्रतिदिन नमस्कार करने से शिष्यों का-भक्तों का परम कल्याण होता है॥ ५०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 58

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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