शुक्रवार, 2 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 June 2023

🔶अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल लेना जीवित मृतक का चिह्न है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही अनीतिकर्त्ता हैं। स्वयं न करना, किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।

🔷 आत्मा की प्यास बुझाने के लिए,अंतःकरण को पवित्र करने के लिए, आत्म-बल बढ़ाने के लिए प्रेम साधना की अनिवार्य आवश्यकता है। रूखा, नीरस, एकाकी, स्वार्थी मनुष्य कितना ही वैभव संपन्न क्यों न हो, अध्यात्म की दृष्टि से उसे नर-पशु ही कहा जाएगा। जो किसी का नहीं, जिसका कोई नहीं, ऐसा मनुष्य कुछ भी अनर्थ कर सकता है। उसे अपने आपसे डर लगेगा और अपनी जलन में जीवित मृतक की तरह झुलसेगा। प्रेम रहित नीरस जीवन घृणित है, वह मनुष्य जैसे विकासवान् प्राणी के लिए हर दृष्टि से हेय है।

🔶आत्म-विश्वास, श्रम और साहस का प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है, पर वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। नशेबाजों की तरह आवेशग्रस्त स्थिति में कुछ भी पाने और कुछ भी बनने के लिए आतुर सपने देखना व्यर्थ है। बेतुकी छलांगें लगाने वाले अपने हाथ-पैर तोड़ लेते हैं। योग्यता, परिस्थिति, साधन, अनुभव आदि का तालमेल बिठाते हुए जो निर्णय किये जाते हैं और नपे-तुले कदम बढ़ाये जाते हैं, वे ही सफल होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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