बुधवार, 5 अगस्त 2026

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग करना पड़ता है जिससे उनकी बुद्धि कलुषित और आत्मा पतित होती है। साथ ही धन सम्पत्ति पा जाने पर उसकी रक्षा करने और बढ़ाने की इच्छा चिन्ता बनकर साथ लग जाती है। तब ऐसी दशा में सुख कहाँ? अभाव के प्रति यदि इस प्रकार सोच लिया जाये कि यह ईश्वर की एक कृपापूर्ण प्रसन्नता है, जिसके कारण वह सम्पत्ति एवं धन दौलत के कारण उत्पन्न होने वाले झंझटों से बच जाता है। संपत्ति को बढ़ाने उसकी रक्षा करने आदि की चिन्ता उसके पास नहीं फटकती। वह निश्चिन्त एवं निर्द्वन्द्व जीवन व्यतीत करता है। सम्पत्ति एवं सम्पन्नता जन्य दोषों से वह सहज ही बचा रहता है। जिससे उसका मन मस्तिष्क तथा शरीर अधिकतर स्वस्थ ही रहता है, और उसके पास दुखी अथवा व्यग्र होने का कोई कारण नहीं रह जाता! सम्पन्नता अथवा विपन्नता मनुष्य के सुख-दुःख का हेतु नहीं होती, हेतु है उसका दृष्टिकोण, सोचने का ढंग और मानसिक स्तर।

जीवन में निश्चिन्त एवं निर्द्वन्द्व रहने के लिए मनुष्य को सुख साधन जुटाने से पूर्व अपनी मनोभूमि को स्वच्छ एवं समुन्नत बनाना चाहिए। इसके बिना वह किसी भी परिस्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। हर समय उसे दुखंद भावनाएं ही घेरे रहेंगी।

मनुष्य का यह हठ कि वह जिस प्रकार की अवस्थायें एवं परिस्थितियां अपने लिये चाहता है उसके विपरीत स्थिति उसके सामने न आवे—उसके दुःखों का एक विशेष कारण है। संसार का निर्माण किसी एक व्यक्ति के लिये तो हुआ नहीं, जिससे वह उसकी इच्छा के अनुसार ही गतिशील रहे। केवल वे ही परिस्थितियाँ सामने लावे जिन्हें वह चाहता है। संसार का निर्माण तो जीवमात्र के लिये हुआ है। सभी प्राणी समान रूप से सुख के अधिकारी हैं। आज की जो परिस्थिति हमारे लिये सुखदायक है, वह किसी अन्य के लिये दुःखदायक हो सकती है। ऐसी अवस्था में उसका बदलना अनिवार्य है। क्योंकि जब तक वह बदलेगी नहीं, दुःखी रहने वाला व्यक्ति सुखी न हो सकेगा। हो सकता है कि जिस परिस्थिति में हमें दुःख का अनुभव होता है वह किसी दूसरे के लिये सुख देने वाली हो। ऐसी दशा में उसका आना बहुत आवश्यक है। सुख-दुःख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 सामयिक चेतावनी (अंतिम भाग)

हम शरीर नहीं आत्मा हैं। शरीर कल नहीं तो परसों नष्ट होने वाला हैं। वह हमें एक साधन, औजार, उपकरण एवं वाहन के रूप  में मिला हैं। क्या इस वाहन के लिए ही अपनी सारी शक्ति लगा दी जाय और अपना गन्तव्य लक्ष भुला दिया जाय? यह विचारणीय प्रश्न हैं, और इस पर विचार किया ही जाना चाहिए। शरीर की सुरक्षा रखी जानी उचित हैं। उससे सम्बन्धित आजीविका उपार्जन, परिवार का पोषण, एवं लौकिक कर्तव्यों का पालन भी उचित है। आजीविका उपार्जन, परिवार का पोषण, एवं लौकिक कर्तव्यों का पालन भी उचित हैं। अपने घोड़े को कौन भूखा मार डालता हैं? कौन उसकी सार संभाल नहीं करता? पर इसी प्रक्रिया में अपनी सारी शक्ति नहीं लगनी चाहिए। घोड़ा जिस यात्रा के लिए खरीदा गया था उस मंजिल का स्मरण ही भुला देना कहाँ की बुद्धिमानी हैं?

आत्मा का जीवन चिरस्थायी हैं। शरीर उसका एक वस्त्र मात्र हैं। वस्त्र को रंगीन बनाने के लिए अपना रक्त निकाल कर उसकी रंगाई कौन करेगा? पर हम हैं जो इसी खिलवाड़ में लगे हुए हैं। कुछ दिन के मनोरंजन में व्यस्त रहकर आत्मा के भविष्य को लाखों-लाख करोड़ों वर्ष के लिए अन्धकारमय बना रहे हैं।

अपनी आज की मनोदशा पर हमें विचार करना हैं। अपनी अब तक की गतिविधि पर हमें शान्त चित्त से ध्यान देना हैं। क्या हमारे कदम सही दिशा में चल रहे हैं? यदि नहीं तो क्या यह उचित न होगा कि हम ठहरे, रुक, सोचें, और यदि रास्ता भूल गये हैं तो, पीछे लौटकर सही रास्ते पर चले। इस विचार मंथन की बेला में आज हमें यही करना चाहिए। यहाँ सामयिक चेतावनी और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का तकाजा हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 Aug 2026


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 Aug 2026



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मंगलवार, 4 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026



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सोमवार, 3 अगस्त 2026

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा जाये तो जो जितना साधन सम्पन्न और सुविधाओं से भरा-पूरा है वह उतना ही व्यग्र चिन्तित और विकल दिखाई देगा। इसके विपरीत कम साधनों और अभाव वाले व्यक्ति मस्त और मनमौजी दिखाई देंगे।

जो साधन सम्पन्न है, सुविधाओं से भरा पूरा है उसके अधिक चिन्तित रहने का कारण यह रहता है कि वह व्यक्ति अपनी सम्पन्नता के अभिमान में संसार के सारे सुख अपने लिए चाहता रहता है। वह हर समय प्रसन्न रहने और हँसी खुशी पाने के लिए लालायित रहा करता है। बहुत कुछ सम्पन्नता के बावजूद भी जब वह अप्रिय परिस्थिति के बीच पहुँचता है तो उसका रोम-रोम दुखी हो उठता है। वह सोचने लगता है कि इतना सब कुछ सम्पन्न होने पर भी वह जो दुखी है, वह उसके भाग्य का ही दोष है। उसका सारा ध्यान पूर्व जन्म के पापों का काल्पनिक चिन्तन करने में लग जाता है। इससे उसका पूरा जीवन दुःखी की क्रीड़ास्थली बन जाता है।

दूसरा व्यक्ति अभावग्रस्त होने पर भी बहुत कुछ निश्चिन्त एवं प्रसन्न दीखता है। न उसे अभाव सताता है और न सम्पन्नता की कामना ही क्लेश दे पाती है! भोजन, वस्त्र और निवास की घोर समस्या होने पर भी उसके प्रसन्न रहने का एक कारण उसका सन्तोष है। इसके साथ अनेकों व्यक्ति अभाव और विपन्नता का रोना रोते देखे जाते हैं। उन्हें भोजन, वस्त्र और निवास आदि की समस्याएं घुलाया करती हैं।

एक-सी परिस्थिति के दो व्यक्तियों में से एक को दुखी और एक को प्रसन्न देखकर यही समझ में आता है कि परिस्थितियाँ मात्र ही दुःख-सुख का कारण नहीं हैं। यह मनुष्य का अपना दृष्टिकोण तथा मनोभूमि का स्तर है जो उन्हें दुखी किया करता है।

जिस व्यक्ति को किसी बात के अन्धेरे पक्ष को ही देखने का अभ्यास हो गया है, वह अच्छी से अच्छी बात में भी दुःख चिन्ता का कारण निकाल लेता है और उसी को लेकर सोच-सोच कर दुखी हुआ करता है। दृष्टि दोष के कारण ही किसी वस्तु में दुःख का दर्शन होता है। संयोग के समय जो चन्द्रमा मनोहर दीखता है, वही वियोग के समय कष्टदायक बन जाता है। यदि वास्तव में सुख या दुःख का जन्म चन्द्रमा से ही होता तो क्या संयोगिन और क्या विरहिणी वह दोनों को एक समान ही सुख या दुःख दायक न होता?

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 सामयिक चेतावनी (भाग 2)

आत्मिक मार्ग की विभूतियाँ महान् हैं। शरीर को सुख देने वाले भौतिक लाभ उन आत्मिक लाभों की तुलना में अत्यन्त ही तुच्छ और अस्थिर हैं। पर आत्मिक लाभों की महानता और श्रेष्ठता की परख केवल विवेक की कसौटी पर हो सकती हैं। अविवेक पूर्ण स्थूल दृष्टि में तो वह घाटे का मैदा ही प्रतीत होता हैं। क्योंकि मौज मजा छोड़ कर, स्वार्थ और कमाई को घटाकर इसमें तप, त्याग, संयम की प्रक्रिया करके मनोनिग्रह का रूखा मार्ग अपनाना पड़ता हैं। ऐसे नीरस देखने वाले और हानिकर लगने वाले मार्ग पर मोटी बुद्धि के लोग चलने को तैयार नहीं होते। यही कारण हैं कि इस संसार के अधिकांश मनुष्य भौतिक दृष्टिकोण के होते हैं। शरीर को, शरीर के लाभों को ही वे सब कुछ समझते है। आत्मा उनके लिए एक उपेक्षित वस्तु हैं। उसके लिए भी कुछ करना चाहिए ऐसा कभी कभी कुछ सोचते तो हैं, कुछ करने की इच्छा भी करते हैं, पर बन कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि लक्ष शरीर सुख जो हैं। तृष्णा और वासना की पूर्ति में ही अपनी हित दिखता हैं। ऐसी दशा में शारीरिक प्रवृत्तियों के घेरे में अपनी सारी विचारधारा और कार्य पद्धति भ्रमण करती रहे तो उसमें आश्चर्य को क्या बात हैं?

वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न हैं। आत्मिक क्षेत्र में जो लाभ, सुख एवं आनन्द हैं उसका मूल्य और मूल्य, वासना एवं तृष्णा के थोड़े, अनिश्चित, अस्थिर तथा जीवन को निस्तेज, निष्प्रभ, निरर्थक बना देने वाले तुच्छ सुखों की अपेक्षा अत्यधिक हैं। पर उसका मूल्यांकन करने के लिए थोड़ी उच्चकोटि की दूरदर्शिता पूर्ण विवेक बुद्धि की आवश्यकता होती हैं। यदि उसका अभाव रहा तो घटिया दृष्टि से सोचने और घटिया काम करने की बार क्रोध में हो बहुमूल्य जाहन की समाप्ति होगी। पर यदि विवेकशीलता जागृत हो गई और सारी वस्तु स्थिति पर विचार करके जीवन यापन जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर कुछ सारगर्भित निर्णय करने की आकांक्षा जगी तो वह विचारधारा धीरे धीरे हमें वहीं पहुँचा देगी जहाँ संसार के सभी महापुरुष पहुँचे हैं।

जब हमारा बच्चा खेलकूद में मस्त रहकर पढ़ना लिखना छोड़ने लगता हैं तब हम उसे डाँटते और रोकते हैं। उसे पढ़ाई के लाभ और मनोरंजन की व्यर्थता समझाते हैं। पर खेद की बात है कि हम अपने ऊपर उस सिद्धान्त को लागू नहीं करते। वासना और तृष्णा ही हमारे लिए सब कुछ बनी हुई हैं। आत्मा की प्रगति से उपलब्ध होने वाले लाभों की हमें चिन्ता ही नहीं हैं। क्या यह उपेक्षा उस बालक की मूर्खता से कम हैं जो खेलकूद के लिए पढ़ाई छोड़ बैठता है?

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 Aug 2026


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 Aug 2026


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रविवार, 2 अगस्त 2026

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य की। महात्मा ने कहा- राज्य  आत्मा से बड़ा नहीं हो सकता। उनने राजा से पूछा-यदि तुम रेगिस्तान में घिर जाओ और प्यास से प्राण निकलें और उस समय कोई पानी के बदले आधा राज्य माँगें तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा फिर महात्मा ने पूछा-यदि तुम बीमार हो जाओ और रोग इतना बढ़े कि बचने की कोई आशा न रहे ऐसी दशा में यदि कोई वैध शर्त के साथ इलाज करे और अच्छा करने की कीमत आधा राज्य माँगे तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा

महात्मा जी खिलखिला कर हँस पड़े उनने कहा-जो राज्य एक लोटा पानी और एक शीशी दवा के बदले दिया जा सकता है उसका महत्व आत्मा से बढ़ कर किस प्रकार हो सकता है? जिस जीवन की रक्षा के लिए जब मनुष्य बड़े से बड़ा काम कर सकता है तो उस जीवन के उत्कर्ष के लिए तो उसे राजपाट से भी बड़ी चीज का त्याग करने को उद्धत होना चाहिए।

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👉 सामयिक चेतावनी (भाग 1)

हमारा जीवन आत्मा के लिए या शरीर के लिए-इन दोनों बातों में से किसको प्रधानता देती इसका निर्माण हमें अब कर ही लेना चाहिए। सुर दुर्लभ मानव जीवन का अमूल्य अवसर एक-एक दिन करके यों ही बीतता जा रहा है और मृत्यु की बड़ी तेजी के साथ निकट दौड़ती चली आ रही हैं। कभी समय हैं कि हम कुछ सोच सकते हैं और कुछ कर सकते हैं। समय जीतने जाने पर एक दिन पैसा या जाएगा कि न कुछ सोचना बन पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ रहेगा और बातों करोड़ों वर्ष का चौरासी लाख भ्रमण का अन्धकारमय भविष्य ही सामने उपस्थित होगा।

आज की सामयिक चेतावनी यही हैं कि हम समुचित रहते आगे और जो अवसर बाकी हैं उसका सदुपयोग कर लें। हो सकता हैं कि आज हम इन बातों का महत्व न समझें, उपेक्षा और उपहास के साथ उन्हें व्यर्थ मानें। पर यह आज की लापरवाही एक दिन हमें बहुत दुःख देगी। कीट पतंगों की तरह पेट पालने और बच्चे पैदा करने की तुच्छ प्रकृति को पूरा करते रहने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं मिला हैं, इसका उद्देश्य कुछ ऊँचा होगा, उस ऊँचाई को प्राप्त करने की बात यदि हमारी समझ में नहीं आती तो एक दिन यही ना-समझी हमारे लिए आत्महत्या जैसी दुःखदायक सिद्ध होगी। बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी बात यही हो सकती हैं कि हम जीवन लक्ष को समझें और उसे पूरा करने का प्रयत्न करें।

शरीर को सर्वस्व मानने वालों को आत्मा की अपेक्षा करनी पड़ती है? क्योंकि भौतिक जीवन में प्रत्यक्षवाद का आकर्षण बहुत हैं। आत्मिक लाभ समय बाध्य हैं। बालबुद्धि में प्रतीक्षा के लिए गुँजाइश नहीं रहती, बच्चों को धैर्य कहाँ होता हैं। वे आम की गुठली बोते है और क्षण भर बाद उसमें से पौधा उगने की आशा में उलट पलट करते हैं। दो चार घंटे बीत जाने पर भी जब उनके सपने का आम्र वृक्ष नहीं उगता तो वे निराश हो जाते हैं और गुठली को उखाड़ कर फेंक देते हैं। यदि यही दृष्टिकोण आत्मिक जीवन के बारे में भी रहा तो मनुष्य भौतिक लाभों को ही सब कुछ मान लेता हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष हैं। इन्द्रिय सुखों की वासना और धन, सत्ता एवं वैभव की तृष्णा की पूर्ति के लिए किये प्रयत्नों का फल इतना आकर्षण होता हैं कि वह छोड़ते नहीं बनता ।इस आकर्षण के मिठास में चाशनी चाटने वाली मक्खी की तरह जीव के पंख ऐसे चिपक जाते हैं कि फड़फड़ा ने पर भी उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं मिलता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 02 Aug 2026




शनिवार, 1 अगस्त 2026

👉 परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)

जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारता पूर्ण व्यवहार होगा। झूठे और लाचार व्यक्ति जहाँ जायेंगे वहीं देखेंगे कि उनके ऊपर अविश्वास एवं निन्दा की बौछार हो रही है व्यभिचारी व्यक्ति को भले घरों में प्रवेश नहीं होने दिया जाता चुगलखोर और यहाँ की बात वहाँ करने वालों के सामने लोग अपने मन की बात नहीं करते। बेईमान आदमी के कार्यों को लोग अविश्वास के साथ देखते हैं और जब तक अनेक प्रकार जाँच-पड़ताल नहीं कर लेते, तब तक भरोसा नहीं करते। इस प्रकार के अपमानजनक व्यवहार दूसरों की ओर से होते देखकर आम तौर से लोग मन ही मन कुड़कुड़ाते हैं और जमाने को, युग को, लोगों को, दुनिया को दोष देते हैं। परन्तु वे अपने निजी दोषों को देखना भूल जाते हैं। 

वास्तव में अपनी निजी दोष असुखकर, अप्रिय, अपमानजनक, संघर्षमय वातावरण उत्पन्न करते हैं। यदि अपने हृदय में सात्विकता की पर्याप्त मात्रा विद्यमान हो तो दुनिया की ओर से अधिकाँश आक्रमण तो अपने आप ही बन्द हो जाते हैं। जो थोड़े बहुत आक्रमण नितान्त दुष्टों की ओर से किये जाते हैं वे प्रायः असफल होते हैं। यदि उन आक्रमणों से कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो वह धर्म-प्रतिरोध करता है। इन आक्रमणों या प्रतिरोधों से उसकी मानसिक शान्ति नष्ट नहीं हो पाती।

स्वः लोक का स्वर्ग अपने भीतर है। यदि हम प्रेम, उदारता, ईमानदारी और भलमनसाहत का व्यवहार दूसरों से करें तो दूसरों के हृदयों में से भी वैसी ही आवाज हमारे लिए आवेगी। अपने मन में पवित्रता, निष्कपटता, सत्यता, संयम एवं निस्वार्थता के भाव विद्यमान हों तो वे सद्भाव ही अपने को सदा प्रफुल्लित एवं सन्तुष्ट रख सकते हैं। बारहसिंगा की नाभि में कस्तूरी होती है, वह अपने ही अन्दर नन्दन वन की सुगन्धि का रसास्वादन करता है। जिस सुगन्ध के लिए दूसरे लोग तरसते हैं और प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के उपाय करते हैं वह बारहसिंगा को अपने अन्दर ही मिल जाती है वह अपनी मस्ती में मस्त हुआ उछलता फिरता है। फिर तुम्हीं दिन-रात दूसरों को हानि पहुँचाने के दुष्प्रयत्नों में मग्न रहकर अपने हृदय को अशान्त क्यों रखते हो? चलो, अपने स्वः लोक को पहचानो और उसमें प्रवेश करो।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...