शुक्रवार, 24 जून 2022

👉 अनुशासन सीखिये

एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।

ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक  से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 1

👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

(1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।

(2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।

(3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।

(4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।

(5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

अखण्ड ज्योति अप्रैल 1973 पृष्ठ 1

👉 आदतों के गुलाम न बनें (भाग 1)

जिन कार्यों या बातों को मनुष्य दुहराता रहता है, वे स्वभाव में सम्मिलित हो जाती हैं और आदतों के रूप में प्रकट होती हैं। कई मनुष्य आलसी प्रवृत्ति के होते हैं। यों जन्मजात दुर्गुण किसी में नहीं हैं। अपनी गतिविधियों में इस प्रवृत्ति को सम्मिलित कर लेने और उसे समय कुसमय बार बार दुहराते रहने से वैसा अभ्यास बन जाता है। यह समग्र क्रिया−कलाप ही अभ्यास बन कर इस प्रकार आदत बन जाते हैं मानो वह जन्मजात ही हो। या किसी देव दानव ने उस पर थोप दिया हो। पर वस्तुतः यह अपना ही कर्तृत्व होता है जो कुछ ही दिन में बार-बार प्रयोग से ऐसा मजबूत हो जाता है मानो वह अपने ही व्यक्तित्व का अंग हो और वह किसी अन्य द्वारा ऊपर से लाद दिया गया हो।

जिस प्रकार बुरी आदतें अभ्यास में आते रहने के कारण स्वभाव बन जाती है और फिर छुड़ायें नहीं छूटती, वैसी ही बात अच्छी आदतों के सम्बन्ध में है।

अच्छी आदतों के संबंध में भी यही बात है। हँसते मुस्कराते रहने की आदत ऐसी ही है। उसके लिए कोई महत्वपूर्ण कारण होना आवश्यक नहीं। आमतौर से सफलता या प्रसन्नता के कोई कारण उपलब्ध होने पर ही चेहरे पर मुसकान उभरती है। किन्तु कुछ दिनों बिना किसी विशेष कारण के भी मुसकराते रहने की स्वाभाविक पुनरावृत्ति करते रहने पर वैसी आदत बन जाती हैं फिर उनके लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती है और लगता है कि व्यक्ति कोई विशेष सफलता प्राप्त कर चुका है। साधारण मुसकान से भी सफलता मिलकर रहती है।

क्रोधी स्वभाव के बारे में भी यही बात है। कोई व्यक्ति अनायास ही चिड़चिड़ाते रहते देखे गये हैं। अपमान, विद्वेष या आशंका जैसे कारण रहने पर तो खीजते रहने की बात समय में आती है, पर तब आश्चर्य होता है कि कोई प्रतिकूल परिस्थिति न होने पर भी लोग खीचते झल्लाते चिड़चिड़ाते देखे जाते हैं। यह और कुछ नहीं उसके कुछ दिन के अभ्यास का प्रतिफल है।

शेष कल
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर पृष्ठ 38

👉 आदतों के गुलाम न बनें (भाग 2)

आदतों को आरम्भ करने में तो कुछ भी नहीं करना पड़ता है। पर पीछे वे बिना किसी कारण के भी क्रियान्वित होती रहती हैं। इतना ही नहीं कई बार तो ऐसा भी होता है कि मनुष्य आदतों का गुलाम हो जाता है और कोई विशेष कारण न होने पर भी उपयुक्त अनुपयुक्त आचरण करने लगता है। बाद में स्थिति ऐसी बन जाती है कि उस आदत के बिना काम ही नहीं चलता।

आलसियों और गंदगी पसन्द लोगों के कुटेवों को लोग नापसन्द भी करते हैं और इनके लिए टीका टिप्पणी भी करते हैं। पर अभ्यस्त व्यक्ति को यह प्रतीत ही नहीं होता कि उसने कोई ऐसी आदत पाल रखी है जिन्हें लोग नापसन्द करते हैं और बुरा मानते है। अच्छी आदतों के संबंध में यह बात है। साफ सुथरे रहना, किफायत बरतना और किसी न किसी उपयोगी कामों में लगे रहना, न होने पर प्रयत्न पूर्वक सौंपा हुआ काम कर लेना, एक प्रकार की अच्छी आदत ही है जो अपने व्यक्तित्व का वजन बढ़ाती है। कुछ न कुछ उपयोगी प्रक्रिया बन पड़ने पर अनायास ही सहज श्रेय प्राप्त करते हैं।

🔵 तिनके-तिनके इकट्ठे करने पर मोटा या मजबूत रस्सा बन जाता है। अच्छी या बुरी आदतों के संबन्ध में भी ऐसी बात है। आरम्भ में वे अनायास ही आरम्भ हो जाती है और थोड़ा सा प्रयत्न करने कुछ बार दुहरा देने भर से मनःस्थिति अनुकूल बन जाती है। स्वभाव का अंग बन जाने पर समूचे व्यक्तित्व को ही उस ढाँचे में ढाल लेती है। अच्छी आदतों का अभ्यास किया जाय तो व्यक्तित्व सद्गुणी स्तर का बन जाता है। दूसरों के मन में अपने लिए सम्मान जनक स्थान बना लेता है। उसे सभ्य या शिष्ट माना जाता है। उसके संबंध में लोग और भी अच्छे सद्गुणों की मान्यता बना लेते है। उसके कार्यों में सहयोग करने लगते हैं या अवसर मिलते ही उन्हें अपना सहयोगी बना लेते हैं। सहयोग या असहयोग ही किसी की उन्नति या अवनति का प्रमुख कारण है। अच्छी आदतें फलतः अपना हित साधन करती हैं। इनका देर-सबेर में उपयोगी लाभ मिलता है। इसके विपरीत बुरी आदतों से प्रत्यक्षतः और परोक्षतः निकट भविष्य में हानि ही उठाने का अवसर आता रहता है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति नवम्बर 1990 पृष्ठ 238

👉 झूठा वैराग्य

कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्भय, निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों से, मुसीबतों से, बच जाते हैं, किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती, लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैं? जो वज्र वत कठोर हृदय होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन है? वैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम को पूरा कर, सब की सेवा कर, सबसे प्रेम कर, फिर भी सबसे अलग रहता है।

हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैं, जो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।

अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 5

मंगलवार, 21 जून 2022

👉 देने से ही मिलेगा

किसी को कुछ दीजिए या उसका किसी प्रकार का उपकार कीजिए तो बदले में उस व्यक्ति से किसी प्रकार की आशा न कीजिए। आपको जो कुछ देना हो दे दीजिए। वह हजार गुणा अधिक होकर आपके पास लौट आवेगा। परन्तु आपको उसके लौटने या न लौटने की चिन्ता ही न करनी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए, देते रहिए। देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। यह बात सीख लीजिए कि सारा जीवन दे रहा है। प्रकृति देने के लिए आप को बाध्य करेगी। इसलिए प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। आज हो या कल, आपको किसी न किसी दिन त्याग करना पड़ेगा ही।

जीवन में आप संचय करने के लिए आते हैं परन्तु प्रकृति आपका गला दबाकर मुट्ठी खुलवा लेती है। जो कुछ आपने ग्रहण किया है वह देना ही पड़ेगा, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो। जैसे ही आपके मुँह से निकला कि ‘नहीं, मैं न दूँगा।’ उसी क्षण जोर का धक्का आता है। आप घायल हो जाते हैं। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जीवन की लम्बी दौड़ में प्रत्येक वस्तु देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस नियम के प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करता है वह अपने आपको उतना ही दुखी अनुभव करता है।

हमारी शोचनीय अवस्था का कारण यह है कि परित्याग करने का साहस हम नहीं करते इसी से हम दुखी हैं। ईंधन चला गया उसके बदले में हमें गर्मी मिलती है। सूर्य भगवान समुद्र से जल ग्रहण किया करते हैं उसे वर्षा के रूप में लौटाने के लिए आप ग्रहण करने और देने के यन्त्र हैं। आप ग्रहण करते हैं देने के लिए। इसलिए बदले में कुछ माँगिए नहीं। आप जितना भी देंगे, उतना ही लौटकर आपके पास आवेगा।

~ स्वामी विवेकानन्द
~ अखण्ड ज्योति फरवरी 1964 पृष्ठ 1

👉 जीवन के हर प्रभात का स्वागत करिये

जीवन का हर प्रभात एक सच्चे मित्र की तरह नित्य अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप वे उपहार ग्रहण करें और उनसे अपने उस शुभ दिन का शृंगार करें। उसकी इच्छा रहती है कि जब दूसरे दिन वह आये तो आपका एक बढ़ा हुआ कदम देखे और उसके दिये हुए उपहारों के ठीक उपयोग के साथ नये उपहार लेने के लिए प्रस्तुत पाये! किन्तु जब आदर-पूर्वक उठकर उत्साह से उसका स्वागत नहीं किया जाता है तो वह निराशा होकर द्वार से लौट जाता है और दूसरे दिन आने में न उसको वह उत्साह रहता है और न उसके उपहारों में वह सौंदर्य! बार-बार निराश होने पर वह आता और अपरिचित राही की तरह द्वार के सामने से निकल जाता है।

ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकठ्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापिस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करो जिससे तुम्हें नित्य नए क्षण मिलते रहें।

पास ही क्षितिज तट पर तुम्हारा लक्ष्य जगमगा रहा है। किन्तु उसको तुम स्पष्ट नहीं देख पाते, क्योंकि उस पर तुम्हारी कमजोरियों के बादल छाये हुए हैं।

~रवीन्द्रनाथ टैगोर
~अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ 1*

मंगलवार, 7 जून 2022

👉 मानव अभ्युदय का सच्चा अर्थ

बुद्ध ने उपनिषद् की शिक्षाओं को जीवन में कार्यान्वित करने की कला का अभ्यास करने के बाद अपना संदेश दिया था। वह संदेश था कि भूमि या आकाश में, दूर या पास में, दृश्य या अदृश्य में, जो कुछ भी है उसमें असीम प्रेम की भावना रखो, हृदय में द्वेष या हिंसा की कल्पना भी जाग्रत न होने दो। जीवन की ही चेष्टा में उठते-बैठो, सोते-जागते, प्रतिक्षण इसी प्रेमभावना में ओतप्रोत रहना ही ब्रह्म-विहार है, दूसरे शब्दों में जीवन की यही गतिविधि है जिससे ब्रह्म का आत्मा में विचार किया जाता है।

यह ब्रह्म की आत्मा क्या है? उपनिषद् के शब्दों में जो आकाश में तेजोमय और अमृतमय है और जो विश्वचेतना है वही ब्रह्म है और उपनिषद् का कहना है कि आकाश में ही नहीं बल्कि जो हमारे अन्तःकरणों में भी तेजोमय और अमृतमय पुरुष है और जो विश्वचेतना का स्रोत है वह ब्रह्म है। इस विराट विश्व के रिक्त स्थान में उस को चेतनता प्राप्त है और हमारी अंतर-आत्मा में भी उसी की चेतनता है।

इस लिये इस व्यापक चेतना की प्राप्ति के लिए हमें अपने अन्तर की चेतना से विश्व की असीम चेतनता का समभाव स्थापित करना है। वस्तुतः मानव के अभ्युदय का सच्चा अर्थ इसी चेतना के उदय और विस्तार में है। वही हमारे-सारे ज्ञान-विज्ञान का ध्येय रहा है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 1

👉 जीवन की सार्थकता और निरर्थकता

शरीर की दृष्टि से मनुष्य की सत्ता नगण्य है। इस तुलना में तो वह पशु-पक्षियों से भी पिछड़ा हुआ है। अन्य जीवों में कितनी ही विशेषतायें ऐसी हैं जिन्हें मनुष्य ललचाई दृष्टि से ही देखता रह सकता है।

मानवीय महत्ता उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता में सन्निहित है। जिसकी आस्थाओं का स्तर ऊंचा है, जो दूरदर्शिता और विवेकशीलता के साथ हर समस्या को सोचता और समझता है वही सच्चे अर्थों में मनुष्य है। गुण, कर्म, स्वभाव की महानता ही व्यक्तित्व को ऊंचा उठाती है और उसी के आधार पर किसी को सफल एवं सार्थक जीवन व्यतीत करने का अवसर मिलता है।

जीवन उसी का धन्य है जिसने अपनी आस्थाओं को ऊंचा उठाया और सत्कर्मों में समय लगाया। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य इसीलिए बड़ा है कि वह अपने आन्तरिक बड़प्पन का परिचय दें। जो इस दृष्टि से पिछड़ा रहा-उसने नर-तन के सौभाग्य को निरर्थक ही गंवा दिया।

 ~ स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति 1967 मार्च पृष्ठ 1

सोमवार, 30 मई 2022

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग ५)

चिन्तन क्रम व्यवस्थित हो

‘जो होगा सो देखा जायेगा’, किसान यह नीति अपनाकर फसलों की देखरेख करना छोड़ दे, निराई-गुड़ाई करने की व्यवस्था न बनाये, खाद-पानी देना बन्द कर दे तो फसल के चौपट होते देर न लगेगी। व्यवसाय में व्यापारी बाजार भाव के उतार-चढ़ाव के प्रति सतर्क न रहे तो उसकी पूंजी के डूबते देरी न लगेगी। सीमा प्रहरी रातों-दिन पूरी मुस्तैदी के साथ सीमा पर डटे चहल-कदमी करते रहते हैं। सुरक्षा की चिन्ता वे न करें तो दुश्मन-घुसपैठियों से देश को खतरा उत्पन्न हो सकता है। मनीषी, विचारक, समाज सुधारक, देशभक्त, महापुरुष का अधिकांश समय विधेयात्मक चिंतन में व्यतीत होता है। उन्हें देश, समाज, संस्कृति ही नहीं समस्त मानव जाति के उत्थान की चिन्ता होती है। सार्वजनीन तथा सर्वतोमुखी प्रगति के लिए वे योजना बनाते और चलाते हैं। यह विधेयात्मक चिन्ता ही है, जिसकी परिणति रचनात्मक उपलब्धियों के रूप में होती है।

मानव जीवन वस्तुतः अनगढ़ है। पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार उसे पतन की ओर ढकेलने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। उनकी अभिप्रेरणा से प्रभावित होकर इन्द्रियों को मनमानी बरतने की खुली छूट दे दी जाय तो सचमुच ही मनुष्य पशुओं की श्रेणी में जा बैठेंगे, पर यह आत्म गरिमा को सुरक्षित रखने की चिन्ता ही है जो मनुष्य को पतन के प्रवाह में बहने से रोकती है। मानवी काया में नरपशु भी होते हैं जिनका कुछ भी आदर्श नहीं होता, परन्तु जिनमें भी महानता के बीज होते हैं, वे उस प्रवाह में बहने से इन्कार कर देते हैं। सुरक्षा प्रहरी की तरह वह स्वयं की प्रवृत्तियों के प्रति विशेष जागरूक होते हैं। हर विचार का, मन में आये संवेगों का वे बारीकी से परीक्षण करते हैं तथा सदैव उपयोगी चिन्तन में अपने को नियोजित करते हैं।

चिन्ता करना मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। एक सीमा तक वह मानवी विकास में सहायक भी है। पशुओं का जीवन तो प्रवृत्ति तथा प्रकृति प्रेरणा से संचालित होता है। शिश्नोदर जीवन वे जीते तथा उसी में आनन्द अनुभव करते हैं किन्तु मनुष्य की स्थिति भिन्न है। मात्र इन्द्रियों की परितृप्ति से उसे सन्तोष नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए क्योंकि उसके ध्येय उच्च हैं। उनकी प्राप्ति के लिए उसे स्वेच्छापूर्वक संघर्ष का मार्ग वरण करना पड़ता है। यह मनुष्य के लिए गौरवमय बात भी है कि वह अपनी यथास्थिति पर सन्तुष्ट न रहे।

.... क्रमशः जारी
📖 विचारों की सृजनात्मक शक्ति पृष्ठ ७
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १३५)

अनन्य भक्ति ही श्रेष्ठतम है

महर्षि पुलह ने कथा के सूत्र को अपनी स्मृति के सूत्र से जोड़ते हुए फिर से बरसाने की गोपी मृणालिनी की भक्तिकथा कहनी शुरू की। उन्होंने बताया कि श्रीराधा जी ने मृणालिनी से कहा- ‘‘भक्ति सांसारिक लगाव से भिन्न है। इसमें सांसारिक विसंगतियों के लिए कोई भी स्थान नहीं है। न तो यहाँ वासना है और न आसक्ति। ईर्ष्या या फिर किसी अन्य छल-कपट अथवा अधिकार की कोई मांग नहीं है। भक्त वही है जो न केवल अपने आराध्य को ईश्वर माने, बल्कि स्वयं भी ईश्वरीय गुणों से युक्त हो। जो ईश्वर से सांसारिक सम्बन्ध रखता है अथवा फिर अपने मन में सांसारिक भाव या सांसारिक कामनाएँ संजोये हुए है वह किसी भी तरह से भक्त नहीं हो सकता है।

श्रीराधा जी की ये बातें मृणालिनी के मन-अन्तःकरण में सात्त्विक भाव का सम्प्रेषण कर रही थीं। उसके मन में सर्वत्र एक प्रेरक प्रकाश छाने लगा था। वह बड़े ध्यान से श्रीराधा जी की बातें सुन रही थी। श्रीराधा जी उससे कह रही थीं- भक्त के लिए भगवान नरदेह धारण करने के बावजूद सामान्य मानव नहीं होते। श्रीकृष्ण ने भले ही लीला से नरदेह धारण कर ली हो, पर वह सदा ही दिव्य, लोकोत्तर और षडऐश्वर्य से पूर्ण ईश्वर हैं। यहाँ तक कि उनकी देह मृण्मय होते हुए भी चिन्मय है। मैंने उन्हें इसी रूप में देखा-जाना और अनुभव किया है। श्रीराधा जी की अनुभूति मृणालिनी को बड़ी प्रेरक लगी। लेकिन अभी तक उसका मूल प्रश्न अनुत्तरित था।

दरअसल उसे तो यह जानना था कि श्रीकृष्ण को जब वे पूरी तरह से चाहती हैं, उनकी ही पूरी तरह से हो जाना चाहती है, ऐसे में भला वे श्री कृष्ण उसके कैसे पूर्णरूपेण हो सकते हैं? श्रीराधा जी मृणालिनी के मन की यह बात जान गयीं और मन्द स्मित के साथ बोलीं- यही तो मानवीय भाव एवं ईश्वरीय भाव के बीच का भेद है। मानव, ईश्वरीय संस्पर्श एवं संयोग के बिना कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता परन्तु ईश्वर सदा ही पूर्ण है। उनमें कुछ घटाने पर अथवा कुछ बढ़ाने पर भी वे पहले ही की भाँति पूर्ण रहते हैं। उनका हर एक भक्त उन्हें पूर्ण रूप में ही पाता है। बस इसमें महत्त्वपूर्ण बात इतनी ही है कि उन्हें पूर्ण रूप से पाने के लिए स्वयं का पूर्ण रूप से विसर्जन करना पड़ता है। समर्पण व विसर्जन जितना बढ़ता जाता है, उन परमात्मा की प्राप्ति भी उतनी ही होती जाती है।

भक्त अपने भगवान के सिवा अन्य किसी ओर नहीं देखता। उसे इस बात की कोई चिन्ता, फिक्र या परवाह नहीं होती कि उसके भगवान कितने लोगों से किस तरह से और कैसे प्यार करते हैं। उनके प्रति किसका समर्पण कैसा है? भक्त तो बस अपने प्रेम, अनुराग, भक्ति, समर्पण, विसर्जन को बढ़ाना चाहता है। यहाँ तक वह स्वयं को उनमें पूरी तरह से विसर्जित एवं विलीन कर देना चाहता है। यह चाहत ही उसे भक्त बनाती है। यही उसे अपने भगवान् के पूरा पाने का अहसास दिलाती है। अरे मृणालिनी! श्रीकृष्ण तो परमात्मा हैं, उन्ही का एक अंश सृष्टि के समस्त जीवों में है। उनसे मिलने की चाहत तो सभी में नैसर्गिक रूप से है और होनी भी चाहिए।

श्रीराधा की इन बातों को मृणालिनी सुन रही थी। सुनते हुए वह उनकी ओर एकटक देख रही थी। श्रीराधा जी उसे मानव देह में ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साक्षात ईश्वर लग रही थीं। उनमें भला ईर्ष्या की छुद्रता कैसे हो सकती थी। वह बड़ी अनुरक्ति से उनकी ओर देखती रही। इस तरह से उनको देखते हुए वह अपने मन में सोच रही थी कि सचमुच ही श्रीराधा और श्रीकृष्ण में कोई भेद नहीं है। श्रीराधा कृष्ण हैं और श्रीकृष्ण ही राधा हैं। सम्भवतः यही एकान्त भक्ति का निहितार्थ है। यही भक्ति का चरम व परम है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६३

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग ४)

चिन्तन क्रम व्यवस्थित हो

जीवन एक लम्बा पथ है जिसमें कितने ही प्रकार के झंझावात आते रहते हैं। कभी संसार की प्रतिकूल परिस्थितियां अवरोध खड़ा करती हैं तो कभी स्वयं की आकांक्षायें। ऐसे में सन्तुलित दृष्टि न हो तो भटकाव ही हाथ लगता है। असफलताओं के प्रस्तुत होते ही असन्तोष बढ़ता जाता है तथा मनुष्य अनावश्यक रूप से भी चिन्तित रहने लगता है। सन्तुलन के अभाव में चिन्ता- आदत में शुमार होकर अनेकों प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है। अधिकांश कारण इनके निराधार ही होते हैं।

चिन्ता किस प्रकार उत्पन्न होती है? इस सम्बन्ध में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक मैकडूगल लिखते है कि ‘मनुष्य की इच्छाओं की आपूर्ति में जब अड़चनें आती है तो उसका विश्वास, आशंका और निराशा में परिवर्तित हो जाता है, पर वह आयी अड़चनों तथा विफलताओं से पूर्णतः निराश नहीं हो जाता, इसलिए उसकी विभिन्न प्रवृत्तियां अपनी पूर्ति और अभिव्यक्ति का प्रयास करती रहती हैं। सामाजिक परिस्थितियां तथा मर्यादायें मनुष्य के लिए सबसे बड़ी अवरोध बनकर सामने आती हैं तथा इच्छाओं की पूर्ति में बाधक बनती हैं, जिससे उसके मन में आंतरिक संघर्षों के लिए मंच तैयार हो जाता है। इसी में से असन्तोष और चिन्ता का सूत्रपात होता है, अनावश्यक चिंता उत्पत्ति के अधिकांश कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं।’

एक सीमा तक चिंता की प्रवृत्ति भी उपयोगी है, पर जब वह मर्यादा सीमा का उल्लंघन कर जाती है तो मानसिक संतुलन के लिए संकट पैदा करती है। व्यक्तिगत पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन से जुड़े कर्तव्यों के निर्वाह की चिन्ता हर व्यक्ति को होनी चाहिए। बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षण एवं विकास की, उन्हें आवश्यक सुविधायें जुटाने की चिन्ता अभिभावक न करें, अपनी मस्ती में डूबे रहें, भविष्य की उपेक्षा करके वर्तमान में तैयारी न करें तो भला उनके उज्ज्वल भविष्य की आशा कैसे की जा सकती है। विद्यार्थी खेलकूद में ही समय गंवाता रहे—आने वाली परीक्षा की तैयारी न करे तो उसके भविष्य का अन्धकारमय होना सुनिश्चित है।

.... क्रमशः जारी
📖 विचारों की सृजनात्मक शक्ति पृष्ठ ६
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १३४)

अनन्य भक्ति ही श्रेष्ठतम है

‘‘श्रीराधा की बात मृणालिनी को अच्छी तो बहुत लगी, पर किंचित आश्चर्य भी हुआ। उसे एक ही समय में दो अनुभवों ने घेर लिया। पहला अनुभव इस खुशी का था कि स्वयं श्रीराधा उसे श्रीकृष्ण के प्रेम का रहस्य समझा रही हैं। इससे अधिक सौभाग्य उसका और क्या हो सकता है? क्योंकि यह सच तो ब्रज धरा के नर-नारी, बालक-वृद्ध सभी जानते थे कि श्रीकृष्ण के हृदय का सम्पूर्ण रहस्य वृषभानु की लाडली के अलावा कोई नहीं जानता। यह बात ब्रज के मानवों को ही नहीं, वहाँ के पशु-पक्षियों, वृक्ष-वनस्पतियों को भी मालूम थी कि बरसाने की राधा नन्दगाँव के कृष्ण के रहस्य के सर्वस्व को जानती हैं। और वही राधा इस रहस्य को मृणालिनी को कहें, समझाएँ, बताएँ इससे अधिक सुखकर-सौभाग्यप्रद भला और क्या होगा?

लेकिन मृणालिनी के अनुभव का एक दूसरा हिस्सा भी था। इसी हिस्से ने उन्हें अचरज में डाल रखा था। यह आश्चर्य की गुत्थी ऐसी थी, जिसे वह चाहकर भी नहीं सुलझा पा रही थी। यह आश्चर्य भी श्रीराधा से ही जुड़ा था। उसे लग रहा था कि जब श्रीराधा स्वयं कृष्ण से प्रेम करती हैं, तब वह अपने इस प्रेम का दान उसे क्यों करना चाहती हैं। ऐसे में तो उन्हें स्वयं वञ्चित रहना पड़ेगा। कृष्णप्रेम का अधिकार उसे सौंप कर स्वयं ही राधा रिक्त हस्त-खाली हाथ क्यों होना चाहती हैं। मृणालिनी के लिए यह ऐसी एक अबूझ पहेली थी जिसे वह किसी भी तरह से सुलझा नहीं पा रही थी। बस वह ऊहापोह से भरी और घिरी थी। संकोचवश यह पूछ भी नहीं पा रही थी और बिना पूछे उससे रहा भी नहीं जा रहा था।

हाँ! उसके सौम्य-सलोने मुख पर भावों का उतार-चढ़ाव जरूर था, जिसे श्रीराधा ने पढ़ लिया और वह हँस कर बोलीं- अब कह भी दे मृणालिनी, नहीं कहेगी तो तेरी हालत और भी खराब हो जाएगी। श्रीराधा की इस बात से उसका असमञ्जस तो बढ़ा पर संकोच थोड़ा घटा। वह जैसे-तैसे हिचकिचाते हुए लड़खड़ाते शब्दों में बोली- क्या कान्हा से आप रूठ गयी हैं? उसके इस भोले से सवाल पर श्रीराधा ने कहा- नहीं तो। मृणालिनी बोली- तब ऐसे में उन्हें मुझे क्यों देना चाहती हैं? उसकी यह भोली सी बात सुनकर श्रीराधा जी हँस पड़ीं।’’ श्रीराधा की इस हँसी का अहसास ऋषिश्रेष्ठ पुलह के मुख पर भी आ गया। वे ही इस समय भाव भरे मन से उस गोपकन्या मृणालिनी की कथा सुना रहे थे।

लेकिन यह कथा सुनाते-सुनाते उन्हें लगा कि समय कुछ ज्यादा ही हो चला है। अब जैसे भी हो देवर्षि नारद के अगले भक्तिसूत्र को प्रकट होना चाहिए। यही सोचकर उन्होंने मधुर स्वर में कहा- ‘‘मेरी इस कथा का तो अभी कुछ अंश बाकी है। ऐसे में मेरा अनुरोध है कि देवर्षि अपने सूत्र को बता दें। इसके बाद कथा का शेष अंश भी पूरा हो जाएगा।’’ उनकी यह बात सुनकर नारद अपनी वीणा की मधुर झंकृति के स्वरों में हँस दिए और बोले- ‘‘आप का आदेश सर्वदा शिरोधार्य है महर्षि! बस मेरा यह अनुरोध अवश्य स्वीकारें और अपनी पावनकथा का शेष अंश अवश्य पूरा करें।’’ देवर्षि नारद के इस कथन पर ऋषिश्रेष्ठ पुलह ने हँस कर हामी भरी। उनके इस तरह हामी भरते ही देवर्षि ने कहा-
‘भक्ता एकान्तिनोमुख्याः’॥ ६७॥

एकान्त (अनन्य) भक्त ही श्रेष्ठ है।
अपने इस सूत्र को पूरा करके देवर्षि ने कहा- ‘‘हे महर्षि! अब मेरा आपसे भावभरा अनुरोध यही है कि इस सूत्र का विवेचन, इसकी व्याख्या आप अपने द्वारा कही जा रही कथा के सन्दर्भ में करें।’’ नारद का यह कथन सुनकर ऋषिश्रेष्ठ पुलह के होठों पर मुस्कान आ गयी। उन्होंने वहाँ पर उपस्थित जनों की ओर देखा। सभी उनकी इस दृष्टि का अभिप्राय समझ गए और सबने विनीत हो निवेदन किया- ‘‘हे महर्षि! आप कथा के शेष भाग को पूरा करते हुए इस सूत्र का सत्य स्पष्ट करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६२

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग ३)

विधेयात्मक चिन्तन की फलदायी परिणतियां

विचारों का सही विश्लेषण सतही स्तर पर कर सकता संभव नहीं है। घटना अथवा विषय विशेष की परिस्थिति की गहराई में जाये बिना विचारणा के निष्कर्ष भी अधूरे, एकांगी और कभी-कभी गलत होते हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि विचार-विश्लेषण की सही प्रक्रिया अपने ही बलबूते सम्पन्न की जा सकती है, न कि दूसरे के सहयोग से। सामयिक रूप से कोई वैचारिक सहयोग, सुझाव एवं परामर्श दे भी सकता है, पर हर क्षण अपने विचारों का निरीक्षण मात्र मनुष्य स्वयं ही कर सकता है। सही ढंग से उचित-अनुचित का विश्लेषण एवं चयन भी वही कर सकता है। कहा जा चुका है कि विचारणा में पूर्व अनुभवों एवं आदतों की भी पृष्ठभूमि होती है। इस तथ्य से दूसरे व्यक्ति नहीं परिचित होते। अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि हर व्यक्ति थोड़े प्रयत्नों से स्वयं पता लगाकर उसमें आवश्यक हेर-फेर कर सकता है। आत्म विश्लेषण के लिए मन एवं उसकी प्रवृत्तियों को विवेक के नेत्रों से देखना पड़ता है। कठिन होते हुए भी यह कार्य असम्भव नहीं है।

क्या उचित है और क्या अनुचित? कौन-सा कार्य औचित्यपूर्ण है, कौन-सा अनौचित्य से भरा इसका पता लगाना असम्भव नहीं है, हर कोई थोड़े प्रयास से इसमें अपने को दक्ष कर सकता है।

एक समय में एक से अधिक विषयों पर चिन्तन करने से भी उथले परिणाम हाथ लगते हैं। एकाग्रता न बन पाने से विषय की गहराई में जाना सम्भव नहीं हो पाता। एक से अधिक विषयों पर एक साथ विचार करने से विचारों में भटकाव आता है, किसी उपयोगी परिणाम की आशा नहीं रहती। कई बातों में विचारों को भटकने देने की खुली छुट देने की अपेक्षा उपयोगी यह है कि एक समय में एक विषय पर सोचा जाय और जितना सोचा जाय पूरे मनोयोगपूर्वक। मनीषी, विचारक, वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार कुछ महत्वपूर्ण समाज को इसीलिए दे पाते हैं कि वे अपने विचारों को भटकने-बिखरने नहीं देते, एक ही विषय के इर्द-गिर्द पूरी तन्मयता के साथ उन्हें घूमने देते हैं, सार्थक परिणति भी इसीलिए होती है।

कर्म—विचारों के गर्भ में ही पकते हैं। जैसे भी विचार होंगे उसी ढंग की गतिविधि मनुष्य अपनायेगा। जो प्रयास को सफल उपयोगी और कल्याणकारी बनाना चाहते हैं, उन्हें सर्वप्रथम अपनी विचारणा की प्रक्रिया से अवगत होना चाहिए। अनुपयोगी निषेधात्मक को सुधारने-बदलने तथा उपयोगी को बिना किसी असमंजस के स्वीकारने के लिए सतत् तैयार रहना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 विचारों की सृजनात्मक शक्ति पृष्ठ ५
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १३३)

जिन प्रेम कियो तिनहिं प्रभु पायो

देवर्षि के इस सूत्र ने ऋषिश्रेष्ठ पुलह को भावविभोर कर दिया। उनके मुख को देखकर लगा जैसे कि वह अतीत की किन्हीं स्मृतियों में खो गए। उनकी इस भावदशा को देखकर देवर्षि नारद ने पूछा- ‘‘हे महर्षि! आप क्या सोचने लगे? क्या किसी भक्त की भक्ति ने आपको विभोर कर दिया है।’’ इस पर ब्रह्मर्षि पुलह ने कहा- ‘‘आपका कथन सत्य है देवर्षि! भक्तिमती मृणालिनी की स्मृतियों ने मुझे भिगो दिया है। आपके सूत्र में जिस सत्य की चर्चा है, वह सभी गुण उस भक्तिमती कन्या में थे।’’ महर्षि पुलह की यह बात सभी को बहुत भायी। देवर्षि तो इससे विशेष रूप से प्रसन्न हुए। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘भगवन्! आप उस पावन कन्या की भक्ति गाथा सुनाकर हम सबको कृतार्थ करें।’’
देवर्षि के इस कथन का सभी ने अनुमोदन किया। सब के सब महर्षि पुलह की ओर आशा भरी नजरों से देखने लगे। इससे ऋषि श्रेष्ठ पुलह के मन में भी उत्साह का संचार हुआ। उन्होंने भाव भीगे स्वर में कहा- ‘‘बात द्वापर युग की है। तब यमुना का नीर नीलमणि की भांति पारदर्शी था और उसकी प्रत्येक जलतरंग में देवी यमुना की चेतना घुली हुई थी। यमुना के इस तीर पर बसे वृन्दावन क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण के साथ ही सम्पूर्ण गोलोक धाम अवतरित हुआ था। गोकुल, नन्दगांव, बरसाना और आस-पास के सभी क्षेत्रों में इस दिव्य गोलोक धाम की पवित्र एवं चमत्कारी चेतना का स्पर्श सहज सम्भव था।

यहीं के बरसाने की कन्या थी मृणालिनी। तप्त काञ्चन जैसा रंग था उसका। उसकी देह के सारे अंग जैसे सांचे में ढले थे। उसकी देह का सौन्दर्य अवर्णनीय था। उसकी इस सुन्दर देह से भी कहीं अधिक सुन्दर था उसका मन, जिसमें सदा-सर्वदा कृष्णप्रेम की सरिता उफनती रहती थी। श्रीकृष्ण उसके सर्वस्व थे। सखी वह राधिका की थी। उसे जिन्होंने भी देखा उन्हें यही अनुभव हुआ जैसे कि श्रीराधा उसमें घुली हुई थी। और वह स्वयं श्रीराधा में घुल चुकी थी। श्रीकृष्णप्रेम का अंकुर तो उसमें जन्म से ही था, परन्तु पहले वह श्रीकृष्ण को अपना स्वामी और स्वयं को उनकी सेविका मानकर मन ही मन नित्य अपने प्रभु की सेवा करती थी। घर के सारे काम करते हुए उसका मन सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण में ही अनुरक्त रहता था। ऐसा करते हुए उसकी मनोलीनता बहुत गहरी हो जाती थी। ऐसे में उसका देह बोध यदा-कदा जाता रहता। उसकी माता इसे उसकी अन्यमनस्कता मानकर झिड़क देती- लाली! तेरा मन जाने कहाँ अटकता-भटकता रहता है। जरा घर के कामों में मन लगाया कर। माता के ऐसा कहने पर वह मीठे स्वर में कहती- मैया जैसा तू कहती है, वैसा ही करूँगी।

उसने जब अपनी इस मनोदशा की चर्चा राधा से की, तो वह मुस्करायीं और बोली- यह अच्छी बात है परन्तु श्रीकृष्ण कोई जमींदार या अधिकारी नहीं हैं। उन्हें सही ढंग से पाने व पहचानने के लिए यह स्वामी, सेवक एवं सेवा के रूपों को भंग करना पड़ेगा। वे तो हमारी आत्मा के ईश्वर हैं। सच कहूँ- सभी जीवात्माओं के सच्चे पति वही हैं। हमें तो विधाता ने नारी रूप प्रदान कर धन्य कर दिया है। अपने इस रूप में हम उनकी प्रिया व कान्ता होने का सहज अनुभव कर सकती हैं।

ऐसा कहकर श्रीराधा ने उसे कान्ता भक्ति व दास्य भक्ति की महिमा बतायी। ९ वर्षीया मृणालिनी को अपनी प्रिय सखी का उपदेश बहुत अच्छा लगा। श्रीराधा ने उससे कहा- देख मृणालिनी कान्ता भक्ति के अनुभव के लिए आवश्यक है जीवचेतना का देहभाव से मुक्त होना क्योंकि इसमें दैहिक वासनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। तुम वासनाशून्य हो, इसलिए इस भाव को सहज आत्मसात कर सकती हो। जो आत्मा के तल पर जीते हैं, वे ही कान्ताभाव से श्रीकृष्ण को पा सकते हैं। इस भक्ति के अनुभव विशिष्ट हैं, जिसे मैं तुझे आगे बताऊँगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६१ 


रविवार, 29 मई 2022

👉 कर्त्तव्य पालन का अविरल आनन्द

समराँगण की लीला में तलवार आनन्द पाती है, तीर अपनी उड़ान और सनसनाहट में मजा लेता है। पृथ्वी इस आकाश में अपना अन्धाधुन्ध चक्कर लगाने के आनन्द में विभोर है, सूर्यनारायण अपने जगमगाते वैभव में तथा अपनी सनातन गति में सदा सम्राट्-सदृश आनन्द का भोग कर रहा है, तो फिर सचेतन यन्त्र, तू भी अपने नियत कर्म को करने का आनन्द उठा।

तलवार अपने बनाये जाने की माँग नहीं करती, न अपने उपयोगकर्ता के कार्य में बाधा ही डालती है, और टूट जाने पर विलाप भी नहीं करती। बनाए जाने में एक प्रकार का आनन्द है, प्रयुक्त किए जाने में भी एक आनन्द है। इसी के सम आनन्द की तू खोज कर।

 क्योंकि तूने यन्त्र को कार्यकर्ता और स्वामी समझने की भूल की है और क्योंकि तू अपनी अज्ञानमयी इच्छा के कारण, अपनी निजी उपयोगिता का विचार करना पसंद करता है, तुझे दुःख और यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं, बार-बार लाल दहकती हुई भट्टी के नरक में घुसना पड़ता है, और यह जब तक कि तू अपना मनुष्योचित पाठ पूरा नहीं कर लेगा।

~ योगी अरविन्द
अखण्ड ज्योति 1967 मार्च पृष्ठ 1

शनिवार, 28 मई 2022

👉 मानव जीवन का अनुपम सौभाग्य

मानव-जीवन भगवान् की दी हुई सर्वोत्तम विभूति है। इससे बड़ा वरदान और कुछ हो ही नहीं सकता। सृष्टि के समस्त प्राणियों को जैसे शरीर मिले हैं, जैसे सुविधा साधन प्राप्त हैं। उनकी तुलना में मनुष्य की स्थिति असंख्यों गुनी श्रेष्ठ है। दूसरे जीवों का सारा समय और श्रम केवल शरीर रक्षा में ही लग जाता है। फिर भी वे ठीक तरह उस समस्या को हल नहीं कर पाते इसके विपरीत मनुष्य को ऐसा अद्भुत शरीर मिला है जिसकी प्रत्येक इन्द्रिय आनन्द और उल्लास से भरी पूरी है, उसे ऐसा मन मिला है जो पग-पग पर हर्षोल्लास का लाभ ले सकता है।

उसे ऐसी बुद्धि मिली है जो साधारण पदार्थों से अपनी सुख सुविधा के साधन विनिर्मित कर सकती है। मानव-प्राणी को जैसा परिवार, समाज साहित्य तथा सुख सुविधाओं से भरा पूरा वातावरण मिला है वैसा और किसी जीव का प्राप्त नहीं हो सकता।

इतना बड़ा सौभाग्य उसे अकारण ही नहीं मिला है। भगवान की इच्छा है कि मनुष्य उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुचित बनाने में उसका हाथ बंटाये। अपनी बुद्धि, क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुये जीवों की सुविधा को सृजन करे और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरते जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।

~ संत तिरुवल्लुवर
🌹 अखण्ड ज्योति 1967 मई पृष्ठ 1

मंगलवार, 24 मई 2022

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग २)

विधेयात्मक चिन्तन की फलदायी परिणतियां

सोचने की प्रक्रिया में विषयों पर एकाग्रता ही नहीं स्वस्थ और सही दृष्टिकोण का होना भी आवश्यक है। किसी भी विषय पर दो प्रकार से सोचा जा सकता है—विधेयात्मक भी, निषेधात्मक भी। परस्पर विरोधी दोनों ही दिशाओं में एकाग्रता का अभ्यास किया जा सकता है। इस महत्वपूर्ण तथ्य को हर व्यक्ति जानता है कि निषेधात्मक चिन्तन से मनुष्य की वैचारिक क्षमताओं में ह्रास होता है। विधेयात्मक दृष्टिकोण से ही चिन्तन का सही लाभ लिया जा सकता है।

निषेधात्मक चिन्तन से बचने का तरीका यह भी हो सकता है कि अपनी गरिमा पर विचार करते रहा जाय तथा यह अनुभव किया जाय कि मानव जीवन एक महान् उपलब्धि है जिसका उपयोग श्रेष्ठ कार्यों में होना चाहिए। निकृष्ट चिन्तन मनुष्य को उसकी गरिमामय स्थिति से गिराता है, यह विश्वास जितना सुदृढ़ होता चला जायेगा—विधेय चिन्तन को उतना ही अधिक अवसर मिलेगा।

पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने पर भी सही चिन्तन बन नहीं पड़ता। किसी विचारक का यह कथन शत-प्रतिशत सच है कि ‘जो जितना पूर्वाग्रही हो वह चिन्तन की दृष्टि से उतना ही पिछड़ा होगा।’ परिवर्तनशील इस संसार में मान्यताओं एवं तथ्यों के बदलते देरी नहीं लगती। अतएव मन मस्तिष्क को सदा खुला रखना चाहिए ताकि यथार्थता से वंचित न रहना पड़े। खुले मन से हर औचित्य को बिना किसी ननुनच के स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। तथ्यों की ओर से आंखें बन्द रखने पर कितनी ही जीवनोपयोगी बातों से वंचित रह जाना पड़ता है।

किसी विषय पर एकांगी चिन्तन भी सही निष्कर्षों पर नहीं पहुंचने देता। उस चिन्तन में मनुष्य की पूर्व मान्यताओं का भी योगदान होता है। सही विचारणा के लिए यह भी आवश्यक है कि अपनी पूर्व मान्यताओं, आग्रहों तथा धारणाओं का भी गम्भीरता से पक्षपात रहित होकर विश्लेषण किया जाय। पक्ष और विपक्ष दोनों पर ही सोचा जाय। किसी विषय पर एक तरह से सोचने की अपेक्षा विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर चिन्तन किया जाय। स्वस्थ और यथार्थ चिन्तन तभी बन पड़ता है। एकांगी मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को तोड़ना सम्भव हो सके तो सर्वांगीण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 विचारों की सृजनात्मक शक्ति पृष्ठ ४
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १३२)

जिन प्रेम कियो तिनहिं प्रभु पायो

सुशान्त शर्मा की अनुभवकथा ने सुनने वालों को रोमांचित कर दिया। सभी की भावनाएँ भक्ति से भीग गयीं। अभी भी उनके मन के आंगन में सुशान्त शर्मा के जीवन की अनुभूतियाँ हीरककणों की तरह चमक रही थीं। यह चमक इन सब के अन्तःकरण के कोने-कोने में प्रकाश बिखेर रही थी। अद्भुत था यह प्रकाश। इसमें सात्त्विकता, सजलता, विमलता का अतुलनीय आनन्द घुला था। इस आनन्द में सबके सब ऐसे निमग्न हुए कि बात करना ही भूल गए। देर तक चहुँ ओर मौन पसरा रहा। हिमालय के शुभ्र शैलशिखर मौन साक्षी बने सभी अन्तः-बाह्य परिस्थितियों को निहार रहे थे। नीरवता जैसे भक्ति की पावन भावनाओं को आत्मसात करने में लगी थी।

देवगण, ऋषिगण, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व एवं सिद्धों का यह समुदाय इन क्षणों में यही सोच रहा था कि भक्ति में ऐसी असाधारण क्षमता है जो अनगढ़ को सुगढ़, अपावन को पावन- बड़ी सहजता से बना देती है। भक्ति रूपान्तरण का रसायन है। अन्य आध्यात्मिक विधियाँ क्षमतावान होते हुए भी इस क्षमता से रहित हैं। तप में ऊर्जा है, योग में बल है, इनसे असम्भव को सम्भव बनाने वाले चमत्कार तो किए जा सकते हैं, परन्तु व्यक्तित्व का रूपान्तरण कर पाना सम्भव नहीं है। कोयले का हीरा बन जाना तो केवल भक्ति से ही सम्भव है।

जो चमत्कार करना व चमत्कारी बनना चाहते हैं, उनके लिए अनेको मार्ग हैं, परन्तु जिन्हें केवल पवित्रता का प्रकाश चाहिए, जिन्हें बस परमात्मा का सान्निध्य, सुपास चाहिए उनके लिए तो भक्ति ही साधना, सिद्धि एवं साध्य है। चिन्तन की ये और ऐसी अनेक कड़ियाँ एक-दूसरे से जुड़ती रहीं। विचारों की इन वीथियों में अनेकों मन भ्रमण करते रहे। लेकिन ऋषिश्रेष्ठ पुलह की आकांक्षा इससे कुछ अधिक थी। वे तो देवर्षि नारद से भक्ति का अगला सूत्र सुनना चाहते थे। एकबारगी उन्होंने सभी की ओर देखा- अभी तक सब मौन थे। तभी अचानक उनके नेत्र ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर जा टिके। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनकी भावनाओं को समझा। वे हल्के से मुस्करा दिए। फिर उन्होंने अपने अन्तर्मन की डोर देवर्षि की भावनाओं से जोड़े।

ऐसा होते ही देवर्षि की दृष्टि ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के मुख की ओर गयी। वशिष्ठ के चेहरे के भावों को उन्होंने देखते ही पढ़ लिया, फिर हल्के से हँस दिए। अपनी इस हँसी को मुस्कराहट में बदलते हुए उन्होंने उपस्थित जनों से कहा- ‘‘यदि आप सभी की अनुमति व सहमति हो तो मैं भक्तिगाथा का अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के ऐसा कहते ही, ब्रह्मर्षि पुलह के गाल पुलकित हो गए। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के मुख पर भी आह्लाद की चन्द्रिका चमक उठी। अन्य जन भी अपने सांकेतिक या प्रकट हाव-भाव से सहमति जताने लगे। इन सबकी सहमति पाकर देवर्षि ने मधुर स्वर में अपने अगले सूत्र को प्रकट करते हुए कहा-

‘त्रिरूपभङ्गपूर्वकं नित्यदास-नित्यकान्ताभजनात्मकं
वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्’॥ ६६॥

तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपों को भङ्ग कर नित्य दासभक्ति या नित्य कान्ताभक्ति से प्रेम ही करना चाहिए, प्रेम ही करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५९

रविवार, 22 मई 2022

👉 क्या हमारे लिए यही उचित है?

केवल अपने लिये ही जीना मानव-जीवन का निकृष्टतम दुरुपयोग है। जो केवल अपने लिये ही पैदा हुआ, अपने लिए ही बढ़ा और आप ही आप खा खेल कर चला गया, ऐसा व्यक्ति अपनी दृष्टि में सफल भले ही बनता रहे वस्तुतः वह असफल ही माना जायेगा।

इस सृष्टि में सफल जीवन उसका है जो दूसरों के काम आ सके। बादल समुद्र से जल ढोकर लाते हैं और प्यासी धरती को परितृप्त करने में लगे रहते हैं। समुद्र की महानता को सुरक्षित रखने के लिये नदियाँ उसमें अपनी आत्म-समर्पण करते रहने की परम्परा को तोड़ती नहीं। फूल खिलते हैं दूसरों को हँसाने के लिये, पौधे उगते हैं दूसरों के प्रयोजन पूर्ण करने के लिये। वायु चँवर ढुलाते रहने की अपनी पुण्य प्रक्रिया से समस्त जड़-चेतन को प्रमुदित करती रहती है। इसमें इनका अपना क्या स्वार्थ? सूर्य चन्द्रमा और नक्षत्र इस जगती को अहिर्निश प्रकाश प्रदान करते हुए भ्रमण करते हैं, यही जीवन की उपयोगिता एवं सार्थकता है।

सृष्टि का प्रत्येक जड़ परमाणु और कीट-पतंग जैसा प्रत्येक जीवधारी अपनी स्थिति से दूसरों का हित साधन करता है। पशु दूध देते और परिश्रम से हमारी सुविधायें बढ़ाते हैं। जब छोटे-छोटे अनियमित जीव-जन्तु तक परोपकार का व्रत लेकर जीवन-यापन करते हैं, तब क्या मनुष्य जैसे बुद्धिमान् और विकसित प्राणी के लिये यही उचित है कि वह अपने लिये ही जिये, अपने लिये ही बढ़े? और अपने लिये ही मर जाए?

हेनरी थोरा
अखण्ड ज्योति 1967 जून पृष्ठ 1*

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...