मंगलवार, 7 सितंबर 2021

👉 सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी (अंतिम भाग)

अनीति को मिटाने के लिए-अनाचार से जूझने के लिए-कोई शूरवीर ही खड़ा हो सकता है। असुरता- अवाँछनीय मार्ग पर चलकर आक्रमणकारी साधनों से सम्पन्न हो जाती है। उसके प्रहार बड़े क्रूर होते हैं। वह किसी पर भी- किसी भी बहाने कितना ही बड़ा अत्याचार कर सकती है। उससे सर्वत्र भय और आतंक छाया रहता है। जो विरोध के लिये उठता है वही पिसता है। ऐसे समय में अग्रणी बनकर अनाचार का प्रतिरोध करना सहज नहीं होता। उसके लिए सच्चा साहस चाहिए। आत्म रक्षा और आक्रमण के समुचित साधन पास में रहने पर लड़ सकना सरल है क्योंकि उसमें सुरक्षा और विजय की आशा बनी रहती है। पर जहाँ अपने साधन स्वल्प और विरोधी अति समर्थ हों, वहाँ तो संकट ही संकट सामने रहता है। इन विभीषिकाओं के बीच भी जो साहसपूर्वक आगे बढ़ सकता है। अनीति की चुनौती स्वीकार कर सकता है, उसे वीरता की कसौटी पर सही उतरा समझना चाहिए।

भारत के हजार वर्ष लम्बे स्वतंत्रता संग्राम में अगणित शूरवीरों ने अपने प्राण दिये। वे विजयी नहीं हुए- पराजित रहे पर उनकी वीरता को विजयी ही माना जाता- और कोई कोई विजेताओं पर निछावर किया जाता रहेगा। रावण की असुर सेना से लड़ने की हिम्मत जिन रीछ, वानरों ने दिखाई उन्हें संसार के अग्रगामी योद्धाओं की पंक्ति में रखते हुए अनन्त काल तक अभिनंदनीय माना जायेगा। प्रहलाद की तरह जिन्होंने सत्य को सर्वोत्तम शस्त्र माना उन्हीं की वीरता खरी है।

योद्धा का काम मात्र लड़ना-तोड़ना-बिगाड़ना ही नहीं, निर्माण करना भी है। तोड़ना सरल है बनाना कठिन है। एक लोहे की कील से किसी के प्राण लिये जा सकते हैं पर एक सुविकसित और सुसंस्कृत मनुष्य का निर्माण करना कठिन है। किसी बड़ी इमारत को थोड़े समय में स्वल्प प्रयत्नों से गिराया जा सकता है पर उसका निर्माण करने के साधन जुटाना कठिन है। कपास के गोदाम को एक दियासलाई जला सकती है पर उतनी कपास उगाने के लिए कितना श्रम और कितने साधन की आवश्यकता पड़ेगी ? किसी को कुमार्ग पर लटका देना सरल है पर कुमार्गगामी को सन्मार्ग की ओर उन्मुख करना कठिन है। पानी ऊपर से नीचे की ओर सहज ही बहता है पर नीचे से ऊपर चढ़ाने के लिए कितने साधन जुटाने पड़ते हैं। ध्वंस में नहीं सृजन में मनुष्य का शौर्य परखा जाता है।

उत्कर्ष के अभियान में जिसका जितना बड़ा योगदान है उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जायेगा। लड़ाई, क्रोध और आवेश में लड़ी जा सकती है। उत्तेजना तो नशे से भी पैदा हो सकती है। किसी का अहंकार भड़काकर अथवा विजय के बड़े लाभ का प्रलोभन देकर किसी को लड़ने के लिये आसानी से तैयार किया जा सकता है। पर सृजन के लिए बड़ी सूझ-बूझ की, सन्तुलित एवं निष्ठा सम्पन्न परिपक्व मनोभूमि की जरूरत पड़ती है। उस महत्ता की पौध पहले भीतर उगानी पड़ती है और जब वह जम जाती है तब उसे कार्यक्षेत्र में आरोपित किया जाता है। ऐसी निष्ठा शूरवीर में ही पाई जाती है। मित्रों के बीच विग्रह पैदा कर देना किसी भी धूर्त, चुगलखोर या षड्यंत्रकारी के लिए बाएं हाथ का खेल हो सकता है, पर शत्रुता मित्रता में परिणत कर देना किसी शालीन सज्जन और विवेकवान के लिए ही सम्भव हो सकता है।

बहादुर वह है जिसने अपनी अहन्ता, स्वार्थपरता और संकीर्णता पर विजय प्राप्त कर ली। जिसने संकीर्णता के सीमित दायरे को तोड़कर विशालता को वरण कर लिया। अपने ऊपर विजय प्राप्त करना विश्व विजय से बढ़कर है। जो वासना और तृष्णा की कीचड़ से निकल कर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की गतिविधि अपनाने में सफल हो गया उसे दिग्विजय का श्रेय दिया जायेगा जो अपने ऊपर शासन कर सकता है वह चक्रवर्ती शासक से बढ़कर है और जिसने नीति का समर्थन- अनीति का विरोध करने में कुछ भी कष्ट सहने का संकल्प कर लिया उसे शूरवीरों का शिरोमणि कहा जायेगा। ऐसे शूरवीरों का यश गान करते हुए ही इतिहास अपने को धन्य बनाता रहा है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ ३१

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६०)

हम विश्वात्मा के घटक

पृथ्वी का मात्र सूर्य से अथवा अपने ही उपग्रह चन्द्र से ही अन्तर्सम्बन्ध नहीं है। प्रोफेसर ब्राउन ने मंगल, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रहों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया है कि इनकी गतियों और स्थितियों के परिवर्तन से पृथ्वी भी प्रभावित होती है। ये सभी सूर्य सन्तति ही तो हैं और जुड़वां बच्चों वाला सिद्धान्त यहां भी घटित होता है, तो आश्चर्य ही क्या?
रूसी वैज्ञानिक चीजेवस्की ने 1920 में ही यह सिद्ध कर दिया था कि सूर्य पर प्रति ग्यारहवें वर्ष होने वाले आणविक विस्फोट से पृथ्वी पर युद्ध एवं क्रान्तियों का उद्भव-विकास होता है। उनका कहना था कि पृथ्वी पर घटित होने वाले प्रत्येक प्रमुख परिवर्तन का सम्बन्ध सूर्य से होता है।

ऐसे ही निष्कर्षों के विस्तृत अध्ययन व इस दिशा में व्यापक अनुसन्धान प्रयासों के लिए 1950 में वैज्ञानिक जियोजारजी गिआर्डी ने ब्रह्माण्ड रसायन को जन्म दिया। गिआर्डी के अनुसार समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और इसके सभी अंग इससे सम्पूर्णतः एकात्म हैं। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक नक्षत्र पिण्ड फिर वह कितनी भी दूरी पर क्यों न हो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता है।

भारत में इसी तत्वदर्शन के अनुरूप अतीत में ज्योतिर्विज्ञान का विकास हुआ था। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रिया पाद, गोलपाद, और सूर्य सिद्धान्त, फिर नारदेव, ब्रह्मगुप्त आदि द्वारा उन सिद्धान्तों का संशोधन-परिवर्धन, भाष्कराचार्य का महाभाष्करीय आदि ग्रन्थ उस महत् प्रयास के कुछ सुलभ अवशिष्ट परिणाम हैं। बाद में इस विशुद्ध विज्ञान का जो दुरुपयोग हुआ, उसे जातीय-जीवन क्रम के ह्रास-काल की अराजकता समझते हुए उसके मूल सिद्धान्त सूत्रों तथा संकेतों के आधार पर इस दिशा में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

भारतीय तत्व मनीषी हजारों वर्ष पूर्व इस तथ्य से परिचित थे कि जड़ता वस्तुतः कहीं है नहीं। वह हमारी स्थूल दृष्टि की ‘एपियरेन्स’ या आभास मात्र है। यथार्थतः सर्वत्र आत्मचेतना ही विद्यमान है। यह सर्वव्यापी चैतन्यसत्ता ही विश्वात्मा है। विश्वात्मा के साथ आत्मा की जितनी समीपता घनिष्ठता होती है उसी अनुपात से उसे विशिष्ट अनुदान प्राप्त होते हैं।
भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में एक मूल द्रव्य हिरण्यगर्भ था। उसी के विस्फोट से आकाश गंगायें विनिर्मित हुईं। इस विस्फोट की तेजी कुछ तो धीमी हुई है पर अभी भी उस छिटकाव की चाल बहुत तीव्र है। अनन्त आकाश में यों आकाश गंगाएं अपनी अपनी दिशा में द्रुतगति से दौड़ती जा रही हैं। इस संदर्भ में अपनी आकाश गंगा की चाल 24,300 मील प्रति सैकिंड नापी गयी है।

यह विश्व अनन्त है और उसके सम्बन्ध में जानकारियां प्राप्त करने का क्षेत्र भी असीम है। इस असीम और अनन्त की खोज के लिए बिना निराश हुए मनुष्य की असीमता किस उत्साह के साथ अग्रगामी हो रही है यह देख कर विश्वास होता है कि मानवी महत्ता अद्भुत है और यदि वह सही राह पर चले तो न केवल प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करने में वरन् उन्हें करतलगत करने में भी समर्थ हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६०)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

नारद के इस कथन पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कहने लगे- ‘‘जब मैं महर्षि मतंग के आश्रम में पहुँचा था, तब वह शबरकन्या मुझे प्रणाम करने आयी थी। वह कितनी भोली, सरल, निश्छल व निर्दोष थी यह उससे मिलकर ही जाना जा सकता था। भक्ति का साकार विग्रह थी वह। महर्षि मतंग ने मुझे उसके बारे में बताया- यह एक वनवासी शबर की कन्या है। इसके पिता अपने कबीले के सरदार हैं। यह कन्या बचपन से ही सरल सात्त्विक थी। वनवासियों की प्रथा के मुताबिक इसकी शादी शीघ्र ही तय होगी। प्रथा के मुताबिक उसके विवाह में अनेकों पशुओं की बलि दी जानी थी। अनेकों पशुओं को मारकर उनके मांस के भोज्य पदार्थ बनने थे।
    
मेरे कारण इतने निर्दोष पशु मारे जाएँगे, यह सोचकर यह शबर कन्या घर से भाग आयी और मेरे आश्रम के पास आकर रहने लगी। यहाँ रहते हुए यह नित्य प्रति आश्रम से सरोवर तक का मार्ग साफ करती। चुपचाप आश्रम में आकर समिधा के लिए लकड़ी रख जाती। एक दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में सरोवर जाते समय मैंने इसे मार्ग बुहारते हुए देखा। मेरे पुकारने पर वह भय से सहमकर मेरे पास खड़ी हो गयी और बहुत आग्रह करने पर उसने मुझे अपनी आपबीती सुनायी। उसकी बातें सुनकर मैं इसे अपने साथ आश्रम ले आया। अब वह मेरी पुत्री भी है और शिष्या भी।’’
    
इतना कहकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ रुक गए। काफी देर चुप रहकर वह शून्य की ओर ताकते रहे फिर बोले- ‘‘आगे की कथा मुझे वत्स लक्ष्मण ने सुनायी थी। इस बीच कई घटनाएँ घट चुकी थीं और महर्षि मतंग ने शरीर छोड़ दिया था। शरीर छोड़ते समय उन्होंने शबरी से कहा था कि तुम्हें यहीं रहकर भगवान् को पुकारना है, वे स्वयं चलकर तुम्हारे पास आएँगे। महर्षि मतंग के जाने के बाद, वहाँ पास रहने वाले लोगों ने उसे बहुत सताया। इनमें से कई ऐसे भी थे, जो स्वयं को ज्ञानी, योगी और कर्मकुशल कहते थे परन्तु शबरी अविचल भाव से अपने राम को पुकारती रही। वह नियमित उनके लिए मार्ग बुहारती, उनके लिए मीठे फल लाती। उसकी पुकार गहरी होती गयी।
    
और एक दिन वत्स रामभद्र के रूप में भगवान् साकार रूप धर कर अपनी इस प्रिय भक्त को खोजने चल दिए। शबरी की पुकार, उसके आँसू, उसका रुदन उसकी साधना बन गया। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, मेरे वत्स रामभद्र, वत्स लक्ष्मण के साथ पहुँच गए- अपनी इस प्रिय भक्त के पास। वत्स लक्ष्मण ने मुझे बताया कि भ्राता राम उसके पास जाते समय कितने भावविह्वल थे, इसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। वह विकल और व्याकुल थे- भक्त शबरी को मिलने के लिए। उन्होंने शबरी के आश्रम जाकर उसके झूठे बेर खाये। अपने को ज्ञानी, योगी एवं कर्म-परायण कहने वालों की ओर उन्होंने देखा भी नहीं। जबकि शबरी उन्हीं के सामने समाधि लीन हुई। उसका अन्तिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने किया। अपने मुख से श्रीराम ने अनेकों बार उसकी महिमा गायी। और यह प्रमाणित कर दिया कि भक्ति ज्ञान से, कर्मयोग से और योगसिद्धि से श्रेष्ठतर है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०७

सोमवार, 6 सितंबर 2021

👉 सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी (भाग २)

भय सामने आते हैं और बच निकलने के लिये अनीति मूलक रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। ऊँचे ऑफिसर दबाते हैं कि हमारी इच्छानुसार गलत काम करो अन्यथा तुम्हें तंग किया जायेगा। आतंकवादी गुण्डा तत्व धमकाते हैं कि उनका सहयोग करो-विरोध में मुँह न खोलो अन्यथा खतरा उठाओगे। अमुक अवाँछनीय अवसर छोड़ देने पर लाभ से वञ्चित रहने पर स्वजन सम्बन्धी रुष्ट होंगे। कन्या के विवाह आदि में कठिनाई आयेगी आदि अनेक भय सामने रहते हैं और वे विवश करते हैं कि झंझट में पड़ने की अपेक्षा अनीति के साथ समझौता कर लेना ठीक है। इस आतंकवादी दबाव को मानने से जो इनकार कर देता है, आत्म गौरव को-आदर्श को-गँवाने गिराने की अपेक्षा संकट को शिरोधार्य करता है वह बहादुर है। योद्धा वे हैं जो नम्र रहते हैं, उदारता और सज्जनता से भरे होते हैं पर अनीति के आगे झुकते नहीं, भय के दबाव से नरम नहीं पड़ते भले ही उन्हें टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाना पड़े।

जो अपने चरित्र रूपी दुर्ग को भय और प्रलोभन की आक्रमणकारी असुरता से बचाये रहता है, उस प्रहरी को सचमुच शूरवीर कहा जायेगा। जिसने आदर्शों की रक्षा की, जिसने कर्त्तव्य को प्रधानता दी-जिसने सच्चाई को ही स्वीकार किया उसी को योद्धा का सम्मान दिया जाना चाहिए। हथियारों की सहायता से एक आदमी दूसरे आदमी की जान ले ले यह कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि औचित्य की राज-सभा में मनुष्य अंगद की तरह पैर जमा दे और फिर कोई भी न उखाड़ सके भले ही वह रावण जैसा साधन सम्पन्न क्यों न हो।

अनीतिपूर्वक देश पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का प्राण हथेली पर रखकर सामना करने वाले सैनिक इसलिए सराहे जाते हैं कि वे आदर्श के लिए देश रक्षा के लिए लड़े। उनका युद्ध पराक्रम इसलिए सम्मानित हुआ कि उसमें आदर्श प्रधान था। उसी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित होकर कोई समूह कहीं अनीति पूर्वक चढ़ दौड़े और कितनों को ही मार गिराये तो बंगाल देश में बरती गई बर्बरता की तरह उस शस्त्र संचालन को भी निन्दनीय ही ठहराया जायेगा, डाकू भी तो शस्त्र ही चलाते हैं- साहस तो वे भी दिखाते हैं पर उस क्रिया के पीछे निष्कृष्ट स्वार्थपरता सन्निहित रहने के कारण सब और से धिक्कारा ही जाता है। उत्पीड़ित वर्ग, समाज, शासन, अन्तःकरण सभी ओर से उन पर लानत बरसती है। उसे योद्धा कौन कहेगा जिसके उद्देश्य को घृणित ठहराया जाय।

पानी के बहाव में हाथी बहते चले जाते हैं पर मछली उस तेज प्रवाह को चीरकर उलटी चल सकने में समर्थ होती है। लोक मान्यता और परम्परा में विवेक कम और रूढ़िवादिता के तत्व अधिक रहते हैं। इसमें से हंस की तरह नीर क्षीर का विवेक कौन करता रहता है। ‘सब धान बाईस पसेरी’ बिकते रहते हैं। भला-बुरा सब कुछ लोक प्रवाह में बहता रहता है। उसमें काट-छाँट करने का कष्ट कौन उठाता है। फिर जो अनुचित है उसका विरोध कौन करता है। लोक प्रवाह के विपरीत जाने में विरोध, उपहास, तिरस्कार का भय रहता है। ऐसी दशा में अवाँछनीय परम्पराओं का विरोध करने की हिम्मत कौन करता है। यह शूरवीरों का काम है जो सत्य की ध्वजा थामे अकेले ही खड़े रहे। शंकराचार्य, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानन्द, महात्मा गाँधी सरीखे साहसी कोई विरले ही निकलते हैं जो परम्पराओं और प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देकर केवल न्याय और औचित्य अपनाने का आग्रह करते हैं। ऐसे लोगों को ईसा, सुकरात, देवी, जॉन अब्राहम लिंकन आदि की तरह अपनी जाने भी गँवानी पड़ती हैं पर शूरवीर इसकी परवा कहाँ करते हैं। सत्य की वेदी पर प्राणों की श्रद्धाञ्जली समर्पित करते हुए उन्हें डर नहीं लगता वरन् प्रसन्नता ही होती है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ ३०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५९)

हम विश्वात्मा के घटक

अमेरिका के पागलखानों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगी अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं, जबकि अमावस के दिन यह दौर सर्वाधिक कम होता है। विक्षिप्त ही नहीं, सामान्य मनुष्यों की चित्त-दशा पर भी चन्द्रकलाओं के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ना सामूहिक मनश्चेतना का ही द्योतक है।

वनस्पति विज्ञानी वृक्षों के तनों में बनने वाले वर्तुलों द्वारा वृक्षों के जीवन का अध्ययन करते हैं। देखा गया है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृन्त बनता है, जोकि उसके द्वारा छोड़ी गई छाल से विनिर्मित होता है। हर ग्यारहवें वर्ष यह वृन्त सामान्य वृन्तों की अपेक्षा बड़ा बनता है। अमेरिका के रिसर्च सेन्टर आफ ट्री रिंग ने पता लगाया कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण वृन्त बड़ा बनता है। स्पष्ट है कि सूर्य और चन्द्र के परिवर्तनों से मनुष्यों एवं पशु-पक्षी तथा पेड़ पौधे भी प्रभावित होते हैं। तब क्या मात्र मनुष्यों में ही सामूहिक मनश्चेतना न होकर सम्पूर्ण सृष्टि में ही कोई एक समष्टि चेतना विद्यमान है, यह प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने खड़ा उन्हें आकर्षित कर रहा है।

डा. हेराल्ड श्वाइत्जर के नेतृत्व में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के प्रभावों का निरीक्षण-परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सामान्य कीट-पतंग भी विचित्र आचरण करने लगते हैं।

अनेक पक्षी सूर्यग्रहण के चौबीस घण्टे पूर्व ही चहचहाना बन्द कर देते हैं। चींटियां सूर्यग्रहण के आधा घण्टे पूर्व से भोजन की खोजबीन बन्द कर देती हैं और व्यर्थ ही भटकती रहती है। सदा चंचल बंदर वृक्षों को छोड़कर जमीन पर आ बैठता है। वुड लाइस, बीटल्स, मिली पीड्स आदि ऐसे कीट-पतंग जो सामान्यतः रात्रि में ही बाहर निकलते हैं, वे भी सूर्यग्रहण के दिन बाहर निकले देखे जाते हैं। दिशा-विज्ञान में दक्ष चिड़ियां चहकना भी भूल-सी जाती हैं।

जापान के प्रख्यात जैविकीविद् तोनातो के अनुसार हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य पर होने वाले आणविक विस्फोटों के समय पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में अम्ल तत्व बढ़ जाते हैं और उनका रक्त पतला पड़ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५९)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

देवर्षि के इन स्वरों में वीणा की झंकृति थी। यह झंकृति कुछ ऐसी थी कि उपस्थित सभी लोगों की हृदय वीणा अपने आप ही झंकृत हो उठी। सभी के भाव अपने आप ही समस्वरित हो गए। जो वहाँ थे सबके सब विभूति सम्पन्न थे। महान् कर्मयोगी, महाज्ञानी, योगसिद्ध महामानव उस समागम में उपस्थित थे। ब्रह्मा जी के मानसपुत्र नारद की बातों ने सबको चौंकाया, चकित किया, पर सब चुप रहे। हाँ, देवर्षि अवश्य अपनी रौ में कहे जा रहे थे- ‘‘भक्ति की श्रेष्ठता यही है कि यह भगवान् के द्वारा भक्त की खोज है। सुरसरि सागर की तरफ जाय तो कर्म, योग और ज्ञान, पर जब सागर सुरसरि की ओर दौड़ा चला आए तो भक्ति। भक्ति कुछ ऐसी है कि छोटा बच्चा पुकारता, रोता है, तो माँ दौड़ी चली आती है। भक्ति तो बस भक्त का रुदन है। भक्त के हृदय से उठी आह है।
    
भक्ति जीवन की सारी साधना, सारे प्रयास-प्रयत्नों की व्यर्थता को स्वीकार है। भक्ति तो बस भक्त के आँसू है, जो अपने भगवान् को पुकारते हुए बहाता है। कर्मयोग कहता है- तुम गलत कर रहे हो, ठीक करने लगो तो पहुँच जाओगे। ज्ञान योग कहता है कि तुम गलत जानते हो, सही जान लो तो पहुँच जाओगे। योगशास्त्र कहता है तुम्हें विधियों का ज्ञान नहीं है, राहें मालूम नहीं है, विधियाँ सीख लो, उनका अभ्यास करो तो पहुँच जाओगे। भक्ति कहती है- तुम ही गलत हो- न ज्ञान से पहुँचोगे, न कर्म से और न योग से। बस तुम अपने अहं से छूटकर अपने भगवान के हो जाओ। अब न रहे तुम्हारा परिचय, बस केवल तुम्हारे प्रभु ही तुम्हारा परिचय बन जायें तो पहुँच जाओगे। भला छोटा सा बच्चा कैसे ढूँढे अपनी माँ को, वह तो रोएगा, माँ अपने आप ही उसे ढूँढ लेगी। भक्त बस रो-रो कर पुकारेगा अपने भगवान को, वे स्वयं ही उसे ढूँढ लेंगे। यही तो भक्ति है।’’
    
देवर्षि नारद की बातों में भावों का अपूर्व आवेग था। इस आवेग ने सबको अपने में समेट लिया। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की भी आँखें भीग गयीं। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोले- ‘‘शबरी ऐसी ही भक्त थी। मैंने एक बार उस भोली बालिका को तब देखा था, जब वह महर्षि मतंग के आश्रम में आयी थी। बाद में बहुत समय के बाद युगावतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने प्रिय भ्राता लक्ष्मण के साथ उससे मिलने गए थे। इस मिलन की कथा वत्स लक्ष्मण ने मुझे अयोध्या वापस आने पर सुनायी थी।’’ ब्रह्मर्षि की ये बातें सुनकर समूची सभा ने समवेत स्वर में कहा- ‘‘उन महान भक्त की कथा सुनाकर हमें भी अनुग्रहीत करें देवर्षि!’’ इस निवेदन के उत्तर में वशिष्ठ ने नारद की ओर देखा। उन्हें अपनी ओर देखकर नारद ने गद्गद् कण्ठ से कहा- ‘‘आपके मुख से शबरी की कथा सुनकर हम सभी धन्य होंगे।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०६

रविवार, 5 सितंबर 2021

👉 सच्चा शूरवीर कौन?

वीरता की परीक्षा-साहस की कसौटी पर होती है और साहस का स्तर आदर्श की आग में परखा जाता है। आदर्श रहित साहस तो अभिशाप है। उसी को असुरता या दानवी प्रवृत्ति कहते हैं। ऐसा साहस जो आदर्शों का परित्याग कर उद्धत उच्छृंखलता अपनाये, केवल आतंक ही उत्पन्न कर सकता है। उससे क्षोभ और विनाश ही उत्पन्न हो सकता है। ऐसे दुस्साहस से तो भीरुता अच्छी भीरु व्यक्ति अपने को ही कष्ट देता है पर दुष्ट दुस्साहसी अनेकों को त्रास देता है और भ्रष्ट परम्परा स्थापित करके अपने जैसे अन्य अनेक असुर पैदा करता है।

साहस की सराहना तब है जब वह आदर्शों के लिये प्रयुक्त हो। अवाँछनीयता को निरस्त करने के काम आये और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान दे। इस प्रकार की गतिविधियाँ अपनाने वाले सत्साहसी लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा जा सकता है।

भय और प्रलोभन जिसे कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकते वह सचमुच बहादुर है। जीवन में पग-पग पर ऐसा अवसर आते हैं जिनमें अनीति अपनाकर प्रलोभन पूरा करने को गुंजाइश रहती है। आकर्षण कितनों के ही पैर फिसला देता है। रूप यौवन को देखकर शील सदाचार से पैर उखड़ने लगते हैं। मर्यादायें डगमगाने लगती हैं। पैसे का प्रलोभन समाने आने पर अनीति बरतने में संकोच नहीं होता। कोई देख नहीं रहा हो- भेद खुलने की आशंका न हो तो कोई विरले हो कुकर्म करने से मिलने वाला लाभ उठाने से चूकते हैं। आदर्शों के प्रति यह शिथिलता अन्तरात्मा की सबसे बड़ी दुर्बलता है। लोकलाज के कारण दण्ड भय का ध्यान न रखते हुए अनीति मूलक प्रलोभन से बचे रहना- यह तो संयोग की बात हुई। रोटी न मिली तो उपवास। विवशता ने दुष्कर्म का अवसर नहीं दिया, यह भी अच्छा ही हुआ। प्रतिष्ठा गँवाने की तुलना में लालच छोड़ देना ठीक समझा गया, यह बुद्धिमता और दूरदर्शिता रही, क्षणिक और तुच्छ लाभ के लिये प्रतिष्ठा से सम्बन्धित दूरगामी सत्परिणामों से वंचित होना व्यवहार बुद्धि को सहन न हुआ यह अच्छा ही रहा। पर इसे वीरता नहीं कह सकते।

साहस उसका है जो प्रलोभन के अवसर रहने पर भी- भेद न खुलने की निश्चिन्तता मिलने पर भी अनीति मूलक प्रलोभनों को इसलिए अस्वीकार कर देता है कि वह अपनी कर्तव्यनिष्ठा और आदर्शवादिता को किसी भी मूल्य पर नहीं बेचेगा। जो अमीरी का अवसर गँवा सकता है और गरीबी के दिन काट सकता है पर ईमान गँवाने को तैयार नहीं, वही बहादुरी की कसौटी पर खरा सोना सिद्ध हुआ समझा जायेगा।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ 29

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५८)

हम विश्वात्मा के घटक

मनुष्य अपने को एकाकी अनुभव करके स्वार्थान्ध रहने की भूल भले ही करता रहे, पर वस्तुतः इस विराट् ब्रह्म का-विशाल विश्व का—एक अकिंचन सा घटक मात्र है। समुद्र की लहरों की तरह उसका अस्तित्व अलग से दीखता भले ही हो, पर वस्तुतः वह समिष्टि सत्ता का एक तुच्छ सा परमाणु भर है। ऐसा परमाणु जिसे अपनी सत्ता और हलचल बनाये रहने के लिए दूसरी महा शक्तियों के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।

अपनी पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है और उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता फिर भी वह पूरी तरह सूर्य पर आश्रित है। सर्दी, गर्मी, वर्षा, दिन, रात्रि जैसी घटनाओं से लेकर प्राणियों में पाया जाने वाला उत्साह और अवसाद भी सूर्य सम्पर्क से सम्बन्धित रहता है। वनस्पतियों का उत्पादन और प्राणियों की हलचल में जो जीवन तत्व काम करता है उसे भौतिक परीक्षण से नापा जाय तो उसे सूर्य का ही अनुदान कहा जायेगा। असंख्य जीव कोशाओं से मिलकर एक शरीर बनता है, उन सबके समन्वित सहयोग भरे प्रयास से जीवन की गाड़ी चलती है। प्राण तत्व से इन सभी कोशाओं को अपनी स्थिति बनाये रहने की सामर्थ्य मिलती है। इसी प्रकार इस संसार के समस्त जड़ चेतन घटकों को सूर्य से अभीष्ट विकास के लिए आवश्यक अनुदान सन्तुलित और समुचित मात्रा में मिलता है।

यह सूर्य भी अपने अस्तित्व के लिए महासूर्य के अनुग्रह पर आश्रित है और महा सूर्यों को भी अतिसूर्य का कृपाकांक्षी रहना पड़ता है। अन्ततः सभी को उस महाकेन्द्र पर निर्भर रहना पड़ता है जो ज्ञान एवं शक्ति का केन्द्र है वह ब्रह्म है, सविता है। अति सूर्य, महासूर्य और सूर्य सब उसी पर आश्रित हैं।

प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थों की गतिविधियों पर सूर्य के प्रभाव का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनकी स्वावलम्बी हलचलें वस्तुतः परावलम्बी हैं।
(1) संसार अन्योन्याश्रित
(2) सूर्य चन्द मनुष्य वृक्ष जीवों को प्रभावित करते हैं। सूर्य की उंगलियों में बंधे हुए धागे ही बाजीगर द्वारा कठपुतली नचाने की तरह विभिन्न गतिविधियों की चित्र-विचित्र भूमिकाएं प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्राणियों का, मनुष्यों का चिन्तन और चरित्र तक इस शक्ति प्रवाह पर आश्रित रहता है।  केवल सूर्य वरन् न्यूनाधिक मात्रा में सौर मण्डल के ग्रह, उपग्रह तथा ब्रह्माण्ड क्षेत्र के सूर्य तारक भी हमारी सत्ता-स्थिरता एवं प्रगति को प्रभावित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५८)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति
    
भक्तिसरिता की लहरों में भाव भीगते रहे। सप्तर्षियों के साथ अन्य ऋषियों, देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय भक्ति के सरस भावों में अपने को निमज्जित करता रहा। किसी को भी समय का चेत न रहा। बस उनकी चेतना के चैतन्य में भक्ति के अनेकों बिम्ब बनते और घुलते रहे। बड़ी अपूर्व स्थिति थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सभी काल की सीमा से दूर चले गए हों अथवा यदि काल का स्पर्श हो भी रहा हो तो यहाँ यह काल अतीत-वर्तमान व भविष्य में खण्डित न था। यहाँ तो काल अखण्ड-अविराम हो अविरल अपनी स्वयं की सत्ता में, स्वयं ही भूला हुआ था। यह अनुभूति अद्भुत थी। महाकाल की महिमा भक्ति के इस महाभाव में झलक रही थी- छलक रही थी।
    
देर तक यह स्थिति बनी रही। धीरे-धीरे अखण्ड महाकाल के महाप्रवाह से अतीत, वर्तमान व भविष्य के काल खण्ड प्रकट होना प्रारम्भ हुए। इसके वर्तमान कालखण्ड से दिवस, रात्रि, घटी, क्षण व पल का बोध चेतना के चैतन्य में प्रकट हुआ। यह कालबोध सबसे पहले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की चेतना में उभरा। उन्हें चेत होने पर उनको बाह्य जगत् की स्थिति का बोध हुआ। उन्होंने देखा कि भक्ति समागम में उपस्थित सबके सब भक्ति की गहनता में खोए हुए हैं। उन्होंने निराकार ब्रह्म से एकाकार होकर ब्रह्मसंकल्प किया और फिर प्रभु के सगुण-साकार रूप का ध्यान धर सभी की चेतना के चैतन्य को बहिर्मुख किया। सचमुच ही यह बड़ी गहरी समाधि थी। अगर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ यह महत्कार्य न सम्पन्न करते तो पता नहीं कब तक सब की यह भावदशा बनी रहती।
    
परन्तु अब स्थिति भिन्न थी। अब भी सब के सब भाव विह्वल तो थे परन्तु उन्हें बाह्य जगत् का बोध था। देवर्षि को अभी भी अपनी सुधि नहीं थी। हाँ! उनके मुख से प्रभु नाम के अस्फुट स्वर अवश्य निकल रहे थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनकी ओर बड़ी भावपूर्ण दृष्टि से देखा और मीठे स्वर में बोले- ‘‘हे देवर्षि! अब आप ही हम सबको भक्ति के नवीन आयाम की ओर ले चलें, अपने नवीन सूत्र का सत्य उच्चारें।’’ ब्रह्मर्षि के इस कथन पर देवर्षि नारद ने सभी को निहारा। सभी के मुख पर जिज्ञासा की चमक थी। सब को प्रतीक्षा थी कि ब्रह्मपुत्र नारद कुछ नया कहेंगे। स्थिति को देखकर नारद ने भी बिना पल की देर लगाए कहा-
‘सा तु कर्मज्ञान योगेभ्योऽप्यधिकतरा’॥ २५॥
वह (भक्ति) कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०५

शनिवार, 4 सितंबर 2021

👉 सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ

मई 1984 से हमने अपने स्थूल शरीर से संभव हो सकने वाला स्थूल स्तर का क्रियाकलाप बन्द कर दिया। इसका अर्थ हुआ- भेंट, मिलन वार्तालाप, विचार विनिमय, परामर्श का अब तक चलने वाला सिलसिला एक प्रकार से समाप्त ही हो जाना। कोई विशेष अपवाद हो, तब ही इस प्रक्रिया का व्यक्तिक्रम करेंगे। जड़ नियम जड़ पदार्थों पर लागू होते हैं। चेतना की अपनी विशेष स्थिति है वह जीवित रहते हुए भी मृतक और मृत होते हुए भी जीवितों जैसे आचरण करती पायी जाती है।

हमारी सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का प्रयोजन पाँच कोशों पर आधारित सामर्थ्यों को अनेक गुनी कर देना है। दो शरीर मिलकर तो गणना में दो ही होते हैं। पर सूक्ष्म-जगत में स्थूल अंक गणित, रेखा गणित, बीज गणित काम नहीं आती। उस लोक का गणना चक्र अलग ही गुणन क्रम से चलता है। स्कूली गणित में 2+2+2+2=8 होंगे। लेकिन सूक्ष्म जगत में 2×2×2×2=16 हो जायेंगे। सूक्ष्मीकृत शक्तियाँ कई बार तो इससे भी बड़े कदम उठाते देखी गई हैं। मनुष्य में पाँच कोश हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। मोटे तौर से सभी कोशों के जागृत होने पर एक मनुष्य पाँच गुनी सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है। पर दिव्य गणित के हिसाब से 5×5×5×5×5=3125 गुणा हो जाता है। शरीर गत पाँच भौतिक शरीर प्रत्यक्ष गणित के हिसाब से ही कुछ काम कर सकते हैं। चेतना के पाँच प्राण भी शरीर की परिधि में बंधे रहने तक पाँच विज्ञजनों जितना ही होते हैं, पर सूक्ष्मीकृत होने पर गणित की परिपाटी बदल जाती है और एक सूक्ष्म शरीर की प्रखर सत्ता 3125 गुनी हो जाती है।

हनुमान द्वारा रामायण काल में जो अनेकों अद्भुत काम संभव बन पड़े, वे उनके सूक्ष्म शरीर के ही कर्तव्य थे। जब तक वे स्थूल रहे, तब तक उन्हें सुग्रीव का नौकर रहना पड़ा और बातों द्वारा बालि द्वारा सुग्रीव की तरह उन्हें भी अपमानित होना पड़ा। पर सूक्ष्मता का अवलम्बन तो चेतना की सामर्थ्य को कुछ से कुछ बना देता है।

यह कार्य युग परिवर्तन प्रयोजन में भगवान की सहायता करने के लिए मिला है। युग संधि का समय सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि में हमें न बूढ़ा होना है, न मरना। अपनी 3125 गुनी शक्ति के अनुसार काम करना है। कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से सन् 2000 तक चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।

सन् 2000 तक किसी अनाड़ी को ही हमारे मरण की बात सोचनी चाहिए। विज्ञजनों को स्मरण रख लेना चाहिए कि इस दृश्यमान शरीर से भेंट दर्शन, परामर्श, हो या नहीं, हमारे अपने कार्य क्षेत्र में उत्तरदायित्वों की पूर्ति में अनेक गुनी तत्परता से काम होते रहेंगे। सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सन् 2000 तक सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई1984 पृष्ठ 1   

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

👉 छुरे की धार पर नचिकेता चलेगा

आर्य श्रेष्ठ! आचार्य मही ने यम से विनीत निवेदन किया- नचिकेता कुमार ही तो है, उसके साथ इतनी कठोरता मुझसे देखी नहीं जाती। दस माह बीत गये नचिकेता ने गौ-दधि और जौ की सूखी रोटियों के अतिरिक्त कुछ खाया नहीं, अन्य स्नातक और स्वयं मेरे बच्चे भी रस युक्त, स्वाद युक्त भोजन करते हैं फिर नचिकेता के साथ ही यह कठोरता क्यों?

यमाचार्य ने हंसकर कहा- देवी! तुम नहीं जानती आत्मा को, ब्रह्म को प्राप्त करने का उपाय ही यही हैं साधना को ‘समर’ कहते हैं युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो नचिकेता का अन्न संस्कार ही कराया गया है। ब्रह्म विराट् है, अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर समर्थ न होगा तो नचिकेता उसे धारणा कैसे करेगा। छोटी सी लकड़ी दस मन बोझ नहीं उठा सकती टूट जाती है पर तपाई दबाई और पिटी हुई उतनी बड़ी लोहे की छड़ पचास मन भार उठा लेती है। नचिकेता का यह अन्न संस्कार उसके अन्नमय कोश के दूषित मलखरण, रोग और विजातीय द्रव्य निकाल कर उसे आत्मा के साक्षात्कार योग्य शुद्ध और उपयुक्त बना देगा। छुरे की धार पर चलने के समान कठिन है पर नचिकेता साहसी और प्रबल आत्म जिज्ञासु है ऐसा व्यक्ति ही यह साधना कर सकता है।

गुरु माता के विरोध की अपेक्षा भी नचिकेता का अन्न संस्कार यमाचार्य ने एक वर्ष चलाया। और उसके बाद उन्होंने नचिकेता को प्राणायाम के अभ्यास प्रारम्भ कराये। प्राणाकर्षण, लोम-विलोम सूर्य वेधन उज्जयी और नाड़ी शोधन आदि प्राणायाम के अभ्यास कराते हुए कुछ दिन बीते उसके प्रभाव से नचिकेता के मुख मंडल पर कांति तो बढ़ी पर उसका आहार निरन्तर घटता ही चला गया।

गुरुमाता यह देखकर पुनः दुःखी हुई और बोली-स्वामी ऐसा न करो- नचिकेता किसी और का पुत्र है कठोरता अपने बच्चों के साथ बरती जा सकती है औरों के साथ नहीं।

यमाचार्य फिर हँसे और बोले-भद्रे! शिष्य अपने पुत्र से बढ़कर होता है, नचिकेता के हृदय में तीव्र आत्मा जिज्ञासायें हैं वह वीर और साहसी बालक आत्म-कल्याण की, साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है इसीलिये हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो जायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा-अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान् हैं, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है, इसी से उसे हर पौष्टिक आहार मिलते हैं मनोमय कोश के नियन्त्रण के लिये ‘प्राणायाम” कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

एक वर्ष प्राण-साधन में बीता। नचिकेता को अब यमाचार्य ने मन के हर संकल्प को पूरा करने का अभ्यास कराया। नचिकेता सोता तब अचेतन मन की पूर्व जन्मों की स्मृति स्वप्न पटल पर उमड़ती उसमें कई ऐसे पापों की क्रियायें भी होती जिन्हें प्रकट करने में आत्मा-ग्लानि होती है, नचिकेता को वह सारी बातें बतानी पड़ती, गुरुमाता ने उससे भी नचिकेता को बचाने का यत्न किया पर यमाचार्य ने कहा- आत्मा-ग्लानि और कुछ नहीं पूर्व जन्मों के पापों के संस्कार मात्र हैं जब तक मन नितान्त शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आत्म-बेधन का मनोबल कहाँ से आयेगा। मन की गांठें खोलने का इससे अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं है कि साधक अपनी इस जन्म की सारी की सारी गुप्त से गुप्त बातों को प्रकट कर अपने कुसंस्कार धोये स्वप्नों में परिलक्षित होने वालों में पूर्व जन्मों के पापों को भी उसी प्रकार बताये और उनकी शुद्धि का प्रायश्चित करे।

मनोमय कोश की शुद्धि के लिये नचिकेता को कृच्छ चान्द्रायण से लेकर गोमय, गौमूत्र सेवन करने तक की सारी प्रायश्चित साधनायें करनी पड़ीं। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।

तीन वर्ष बीत गये, नचिकेता ने जीवन का कोई भी सुख नहीं जाना शरीर को उसने शुद्ध कर लिया पर शरीर क्षीण हो गया, प्राणों पर नियन्त्रण की विद्या उसने सीख ली, पर उससे मन क्षीण हो गया, मनोमय कोश को उसने जीत लिया पर उससे यश-क्षीण होता जान पड़ा। संकल्प विकल्प मुक्त नचिकेता अब इस स्थिति में था कि अपने मन को ब्रह्मरंध्र में प्रवेश कराकर सूक्ष्म जगत के विज्ञानमय रहस्यों की खोज करे और आत्मा तक पहुँचकर उसे सुभित करे, जगाये और प्राप्त करे। मन को दबाकर क्रमशः आज्ञा चक्र का भेदन करते हुए विद्या रूपिणी महाकाली की हलकी झाँकी होती तो उस विराट् रूप को देखकर नचिकेता का मन काँप जाता। पर दूसरे ही क्षण एक पुकार अन्तः करण से आती, मन और यह भौतिक सुख नचिकेता! यदि मिल भी गये तो इन्द्रियाँ उनका रसास्वादन कितने दिन तक कर सकती हैं तू तो उस अक्षर, अनादि आत्मा का वरण कर। पूर्णमासी का दिन, बसन्त-ऋतु-चार वर्ष से निरन्तर उग्र तप कर रहे नचिकेता का शरीर बिलकुल क्षीण पड़ गया था आज का दिन उसके जीवन में विशेष महत्व रखता है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी को जागृत करने की तिथि आज ही है। एक प्राण को दूसरे प्राण में समेटता हुआ नचिकेता मूलाधार तक जा पहुँचा उसने अपने संकल्प की चोट की उस आद्य शक्ति पर, चिर निद्रा में विलीन कुण्डलिनी पर उसका कुछ असर न हुआ इस पर नचिकेता ने तीव्र पर तीव्र प्रहार किये। चोट खाई हुई काल-रूपिणी महा सर्पिणी फुंसकार मारकर उठीं और उसने नचिकेता के मन को, स्थूल भाव को चबा डाला, जला डाला। नचिकेता आज मन न रहकर आत्मा हो गया, उसकी लौकिक-भौतिक वासनायें पूरी तरह जल गई वह ऋषि हो गया यह संवाद सारे संसार में छा गया। नचिकेता के यश की विमल पताका सारे संसार में लहराने लगी।

अब वह ब्रह्मा प्राप्ति के समीप था, ब्रह्म से वह किसी भी क्षण मिल सकता था तथापि अपने देश, अपने धर्म, अपनी महान् संस्कृति के उत्थान का संकल्प लेकर नचिकेता वहाँ से चल पड़ा और नव निर्माण के महान् कार्य में जुट गया। उसने इन पंचाग्नि विद्या का सारे संसार में प्रसार कर अमर साधक का श्रेय प्राप्त किया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1971

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५७)

असीम को खोजें

सूर्य की दूरी पृथ्वी से सवा नौ करोड़ मील है। इसके बाद का सबसे निकटवर्ती तारा 2,50,00,00,00,00,000 मील दूरी पर है। अन्य तारे तो इससे भी लाखों गुनी दूरी पर हैं। इस दूरी का हिसाब रखने के लिए ‘प्रकाश वर्ष’ का नया पैमाना बनाया गया है। प्रकाश की किरणें एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलती हैं। इस गति से चलते हुए प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूरी तय करले उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जायेगा। इस पैमाने के हिसाब से पृथ्वी से सूर्य की दूरी सिर्फ सवा आठ प्रकाश सैकिण्ड रह जाती है। इसके आगे किसी और तारे की खोज में आगे बढ़ा जाय तो सबसे निकटवर्ती तारा सवा चार प्रकाश वर्ष चल लेने के बाद ही मिलेगा।

ब्रह्माण्ड का 99 प्रतिशत भाग शून्य है। एक प्रतिशत भाग को ही ग्रह नक्षत्र घेरे हुए हैं। अनुमान है कि आकाश में सूर्य जैसे अरबों तारकों का अस्तित्व है। वह तारे आकाश गंगाओं से जुड़े हैं। वे उसी से निकले हैं और उसी से बंधे हैं। मुर्गी अण्डे देती है उन्हें सेती है और जब तक बच्चे समर्थ नहीं हो जाते उन्हें अपने साथ ही लिए फिरती है। आकाश गंगाएं ऐसी ही मुर्गियां हैं जिनके अण्डे बच्चों की गणना करना पूरा सिर दर्द है। हमारी आकाश गंगा एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी और 20 हजार प्रकाश वर्ष मोटी है। सूर्य इसी मुर्गी का एक छोटा चूजा है जो अपनी माता से 33000 प्रकाश वर्ष दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा 170 मील प्रति सैकिण्ड की गति से करता है। आकाश गंगायें भी आकाश में करोड़ों हैं। वे आपस में टकरा न जायें या उनके अण्डे-बच्चे एक-दूसरे से उलझ न पड़ें इसलिए उनने अपने सैर-सपाटे के लिए काफी-काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया है। प्रायः ये आकाशगंगाएं एक-दूसरे से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर रहती हैं।

अब तक खोजे गये तारकों में सबसे बड़ा ‘काला तारा’ है। यह अपने सूर्य से 20 अरब गुना बड़ा है। यहां यह भूलना नहीं चाहिए कि सूर्य अपनी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। उस हिसाब से पृथ्वी की तुलना में काला तारा कितना बड़ा होगा उसे कागज पर जोड़ लेना तो सरल है पर उस विस्तार को मस्तिष्क में यथावत बिठा सकना बहुत ही कठिन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५७)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ
    
ब्रज में जो चैतन्य है,उनमें तो प्रेम चेतना है ही, जिन्होंने जड़ रूप धरा है- पर्वतराज गोवर्धन, भगवती यमुना, वे भी परात्पर प्रेम का साकार स्वरूप हैं। ब्रज में कोई भी अपने लिए कुछ नहीं चाहता- उन्हें शक्ति, सिद्धि, स्वर्ग, मोक्ष कुछ भी नहीं चाहिए। वे तो बस श्रीकृष्ण को अपने सर्वस्व का अर्पण करके प्रसन्न हैं। उनका यह समर्पण इतना प्रगाढ़ है कि वे कृष्ण के लिए कृष्ण का वियोग सहने के लिए भी तत्पर हैं।’’
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की धाराप्रवाह वाणी ने जैसे सबको सम्मोहित कर दिया। सभी स्तब्ध-जड़ीभूत हो गए। देवर्षि तो जैसे भावसमाधि में तिरोहित हो गए। वह यह भी भूल गये कि उन्हें अपने अगले भक्तिसूत्र को उद्घाटित करना है। उन्हें तो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्वयं ही चेताया- ‘‘मेरी अनुभूतियाँ तो उतनी प्रगाढ़ नहीं हैं, देवर्षि तो भक्ति तत्त्व के मर्मज्ञ हैं। उन्हें ब्रजभूमि का व्यापक अनुभव है, अब वह कुछ कहें।’’ विश्वामित्र के इन वचनों से देवर्षि को रोमांच हो आया। उन्होंने कहा- ‘‘ब्रज तो बस ब्रज है। तभी तो स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने सखा उद्धव से कहा था- ‘उद्धव मोहि ब्रज बिसरत नाहीं’ उद्धव मुझे ब्रज कभी नहीं भूलता। वहाँ की हवाओं में भी भक्ति घुली है, वहाँ         अपने लिए कोई कुछ नहीं चाहता। मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है-
‘नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुख सुखित्वम्’॥२४॥
    
उसमें (व्यभिचारी के प्रेम में) प्रियतम के सुख में सुखी होना नहीं है।’’ इस सूत्र के सत्य का उच्चारण करते हुए देवर्षि ने फिर से एक बार ऋषि आपस्तम्ब की ओर देखा। उन्हें अपनी पहली बातों पर संकोच हो रहा था। इस संकोच की धुंधली छाया उनके मुख पर अभी भी बनी हुई थी। उन्होंने संकोच से अपना सिर झुका लिया परन्तु देवर्षि अपने ही भावों में डूबे थे।
    
वे कह रहे थे- ‘‘इस सूत्र के सत्य को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्पष्ट कर दिया है। सच यही है- भक्ति में, प्रेम में, प्रेमी भक्त अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता। उसकी कोई भी इच्छा नहीं होती। वह तो बस अपने प्रियतम का सुख चाहता है। उसकी एकमात्र चिन्ता, चाहत, त्वरा, अभिलाषा, अभीप्सा यही होती है कि मेरे आराध्य किस तरह से मुझसे प्रसन्न होंगे। ब्रज की गोपकन्याएँ इसी सबका साकार स्वरूप थीं। उनका सर्वस्व केवल कृष्ण के लिए था। अरे! वही क्यों? वहाँ के ग्वाल-बाल, बाबा नन्द, मैया यशोदा, पर्वतराज गोवर्धन, भगवती कालिन्दी, वहाँ के कदम्ब आदि वृक्ष सभी तो केवल कृष्ण प्रेम के लिए ही थे। भक्ति का सत्य तो ब्रज के धूलिकणों में है।’’ इतना कहकर देवर्षि फिर से भावों में खोने लगे। उन्हीं के साथ अन्य सभी भी भक्तिसरिता में अवगाहन करने लगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०३

👉 कुवें का मेंढक

एक कुवे मे एक मेंढक रहता था। एक बार समुद्र का एक मेंढक कुवे मे आ पहुंचा तो कुवे के मेंढक ने उसका हालचाल, अता पता पूछा। जब उसे ज्ञात हुआ कि वह मेंढक समुद्र मे रहता हैं और समुद्र बहुत बड़ा होता हैं तो उसने अपने कुवे के पानी मे एक छोटा-सा चक्कर लगाकर उस समुद्र के मेंढक से पूछा कि क्या समुन्द्र इतना बड़ा होता हैं?

कुंवे के मेंढक ने तो कभी समुद्र देखा ही नहीं था। समुद्र के मेंढक ने उसे बताया कि इससे भी बड़ा होता हैं।

कुंवे का मेंढक चक्कर बड़ा करता गया और अंत मे उसने कुंवे की दीवार के सहारे-सहारे आखिरी चक्कर लगाकर पूछा- “क्या इतना बड़ा हैं तेरा समुद्र ?”

इस पर समुद्र के मेंढक ने कहा- “इससे भी बहुत बड़ा?”

अब तो कुंवे के मेंढक को गुस्सा आ गया। कुंवे के अलावा उसने बाहर की दुनिया तो देखी ही नहीं थी। उसने कह दिया- “जा तू झूठ बोलता हैं। कुंवे से बड़ा कुछ होता ही नहीं हैं। समुद्र भी कुछ नहीं होता।”

मेंढक वाली ये कथा यह बताती हैं कि; जितना अध्ययन होगा उतना अपने अज्ञान का आभास होगा। आज जीवन मे पग-पग पर हमें ऐसे कुंवे के मेंढक मिल जायेंगे, जो केवल यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं, उसी का नाम ज्ञान हैं, उसके इधर-उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं हैं। लेकिन सत्य तो यह हैं कि सागर कि भांति ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं हैं। अपने ज्ञानी होने के अज्ञानमय भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्ययन करना आवश्यक हैं, जिससे आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ जानना और पढ़ना बाकी हैं।

शुभ प्रभात। आज का दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

बुधवार, 1 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५६)

असीम को खोजें

तारे और नक्षत्र में यह अन्तर है कि तारा अपनी रोशनी से चमकता है जब कि नक्षत्रों में अपनी रोशनी नहीं होती। वे तारकों की धूप के प्रकाश में आते हैं तभी चमकते हैं। अपने सौर मण्डल में केवल एक ही सूर्य है शेष 9 नक्षत्र हैं। ब्रह्माण्ड की तुलना में अपने सूर्य का सीमा क्षेत्र बहुत छोटा है पर पृथ्वी की तुलना में वह बहुत बड़ा है। नक्षत्रों के अपने उपग्रह होते हैं जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा। ग्रह स्थिति के 12 चन्द्रमा हैं।

जिस प्रकार अपने सौर-मण्डल के नव-ग्रह सूर्य-तारक के साथ जुड़े हैं उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के अगणित तारक अपनी-अपनी नीहारिकाएं जो अरबों की संख्या में हैं, जुड़े हैं। उनमें भीतर ऐसी हलचल चलती रहती है जिसके कारण कुछ समय बाद भयंकर विस्फोट होते हैं और अन्तर्भूत पदार्थों में से कुछ टुकड़े बाहर छिटक कर स्वतन्त्र तारक के रूप में विकसित होते हैं। इन्हीं नवोदित तारकों का नाम ‘नोवा और सुपर नोवा’ दिया गया है। जिस प्रकार बिल्ली हर साल कई-कई बच्चे देती है इसी प्रकार से नीहारिकाएं भी थोड़े-थोड़े दिनों बाद प्रसूता होती हैं और विस्फोट जैसी भयानक प्रसव पीड़ा के साथ नव-तारकों को जन्म देती हैं। बच्चों की सारी हरकतें वे सिलसिले होती हैं ऐसा ही कुछ ऊंट-पटांग यह नवोदित तारे भी करते रहते हैं। जब वे घिस-पीट कर ठीक हो जाते हैं। शैशव से आगे बढ़कर किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तब उनकी व्यवस्था क्रमबद्ध हो जाती है। तब तक उनका फुलाव, सिकुड़न, रुदन, उपद्रव शयन सब कुछ अचंभे जैसा ही है। छोटे बच्चे जैसे बार-बार टट्टी कर देते हैं उसी प्रकार इन नवोदित तारकों की गरमा-गरम गैस भी फटती चिटखती रहती है और उससे भी ग्रह, उपग्रह, उल्का धूमकेतु आदि न जाने क्या-क्या अन्तरिक्षीय फुलझड़ियों का सृजन विसर्जन होता रहता है। इसके अतिरिक्त इन बच्चों में लड़-झगड़ और मारपीट भी कम नहीं होती। निश्चित व्यवस्था का कार्यक्षेत्र न बन पाने के कारण उनके टकराव भी होते रहते हैं और कभी-कभी तो यह टकराव ऐसे विचित्र होते हैं कि दोनों पक्ष अपना अस्तित्व गंवा बैठें और फिर उनके ध्वंसावशेष से कुछ-कुछ और नवीन संरचना सामने आये।

आकाश की नापतोल मीलों की संख्या में करना कौड़ियां बिछाकर मुहरों का हिसाब करने बैठने की तरह उपहासास्पद होगा। इस प्रकार तो इतनी विन्दियां प्रयोग करनी पड़ेंगी कि ज्योतिर्विदों को बाध्य विन्दियों से ही भरने पड़ें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५६)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ
    
युग बदला-युग के साथ दृश्य भी बदले। त्रेता-द्वापर में परिवर्तित हुआ। मैं हिमालय की गुहा में तपोलीन हो गया। पर मेरा मन हमेशा ही इस धुन में रहता था कि माता गायत्री जब भी जहाँ जिस भी रूप में अवतीर्ण होंगी, मैं अवश्य उनका आशीष लूँगा। उनके प्रत्यक्ष दर्शन जरूर करूँगा। द्वापर युग में मैंने अनुभव किया- महामाया ने इस बार कई रूप धरे हैं। उन्होंने जन्म भी लिया है और प्रकट भी हुई हैं। रुक्मिणी के रूप में भी वही हैं, वही वृषभानुसुता के रूप में ब्रज में पधारी हैं। वही महामाया-भगवती पूर्णमासी बनकर ब्रजभूमि की रक्षा का भार सम्हालें हैं। वही जगदम्बा गोपकुमारियों एवं गोपबालाओं के रूप में विहार कर रही हैं।
    
मैं धन्य हुआ, अनुग्रहीत हुआ, कृतकृत्य हुआ, वेदमाता को इतने रूपों में निहार कर मेरे मुख से स्तुति महामन्त्र उच्चारित होने लगा-
विद्याः स्मरन्तास्तव देवि भेदाः

स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्य परापरोक्ति॥
    
हे देवी! सम्पूर्ण विद्याएँ, तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी भी स्त्रियाँ हैं वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्बे एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थों से परे एवं परावाणी हो।
    
मेरी स्तुति से भावमयी माता प्रसन्न हुईं और उन्होंने दिखाया कि किस तरह वृषभानुदुलारी राधा में सभी कुछ विलीन हो गया। मुझे भान हुआ कि श्रीराधा ही जगन्माता का प्रधान लीला स्वरूप हैंै। माँं के अन्य स्वरूप उन्हीं से प्रकट होते और उन्हीं में लय होते हैं। श्रीराधा के दर्शन के लिए मैं ब्रज भी गया। वहाँ मैंने प्रेम की उन साकार मूर्ति को परमात्मा के परात्पर पावन प्रेम के साकार सघनस्वरूप देखा। हालांकि! प्रत्यक्ष में तो वह सामान्य गोपकन्या ही दिखती थीं पर उन लीलामयी ने मुझ पर अपूर्व दया करके अपने यथार्थ स्वरूप के दर्शन दिए। उन्होंने यह भी बोध कराया कि ब्रज में गोपबालाएँ और ग्वाल-बाल ही नहीं, वहाँ पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति यहाँ तक कि पर्वत, सरिता, धरती के धूलिकण भी कृष्ण के लिए ही सर्वस्व अर्पित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०२

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

👉 देह और आत्मा:-

जनक ने एक धर्म—सभा बुलाई थी। उसमें बड़े—बड़े पंडित आए। उसमें अष्टावक्र के पिता भी गए।

अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़ा था, इसलिए तो नाम पड़ा अष्टावक्र। दोपहर हो गई। अष्टावक्र की मां ने कहा कि तेरे पिता लौटे नहीं, भूख लगती होगी, तू जाकर उनको बुला ला।

अष्टावक्र गया। धर्म—सभा चल रही थी, विवाद चल रहा था। अष्टावक्र अंदर गया। उसको आठ जगह से टेढ़ा देख कर सारे पंडितजन हंसने लगे। वह तो कार्टून मालूम हो रहा था। इतनी जगह से तिरछा आदमी देखा नहीं था। एक टांग इधर जा रही है, दूसरी टांग उधर जा रही है, एक हाथ इधर जा रहा है, दूसरा हाथ उधर जा रहा है, एक आंख इधर देख रही है, दूसरी आंख उधर देख रही है। उसको जिसने देखा वही हंसने लगा कि यह तो एक चमत्कार है! सब को हंसते देख कर.. .यहां तक कि जनक को भी हंसी आ गई।

मगर एकदम से धक्का लगा, क्योंकि अष्टावक्र बीच दरबार में खड़ा होकर इतने जोर से खिलखिलाया कि जितने लोग हंस रहे थे सब एक सकते में आ गए और चुप हो गए।

जनक ने पूछा कि मेरे भाई, और सब क्यों हंस रहे थे, वह तो मुझे मालूम है, क्योंकि मैं खुद भी हंसा था, मगर तुम क्यों हंसे?

उसने कहा मैं इसलिए हंसा कि ये चमार बैठ कर यहां क्या कर रहे हैं! क्योंकि इनको चमड़ी ही दिखाई पड़ती है। मेरा शरीर आठ जगह से टेढ़ा है, इनको शरीर ही दिखाई पड़ता है। ये सब चमार इकट्ठे कर लिए हैं और इनसे धर्म—सभा हो रही है और ब्रह्मज्ञान की चर्चा हो रही है? इनको अभी आत्मा दिखाई नहीं पड़ती। है कोई यहां जिसको मेरी आत्मा दिखाई पड़ती हो? क्योंकि आत्मा तो एक भी जगह से टेढ़ी नहीं है।

वहां एक भी नहीं था। कहते हैं, जनक ने उठ कर अष्टावक्र के पैर छुए। और कहा कि आप मुझे उपदेश दें।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५५)

असीम को खोजें

यह खोज, खबर इसलिए भी उपयोगी है कि ‘एकाकी पन’ नामक कोई तत्व अगले दिनों शेष नहीं रहने वाला है। इस विश्व का कण कण एक-दूसरे से अत्यन्त सघनता और जटिलता के साथ जुड़ा हुआ है, उन्हें प्रथक करने से किसी की सत्ता अक्षुण्य नहीं रह सकती। सब एक दूसरे के साथ इतनी मजबूत जंजीरों से बंधे हुए हैं कि प्रथकता की बात सोचना दूसरे अर्थों में मृत्यु को आमन्त्रण देना ही कहा जा सकता है।

शरीर में कोशिकाओं की स्वतन्त्र सत्ता अवश्य है पर वह अपने आप में पूर्ण नहीं है। एक से दूसरे का पोषण होता है और दूसरे-तीसरे को बल मिलता है। हम सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं। यहां न कोई स्वतन्त्र है न स्वावलम्बी। साधन सामूहिकता ही विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों, अस्तित्वों और तथ्यों की जननी है मानवी प्रगति का यही रहस्य है। प्रकृति प्रदत्त समूह संरचना का उसने अधिक बुद्धिमत्ता पूर्वक लाभ उठाकर समाज व्यवस्था बनाई और सहयोग के आधार पर परिवार निर्माण से लेकर शासन सत्ता तक के बहुमुखी घटक खड़े किये हैं। एक-दूसरे के लिए वे किस प्रकार उपयोगी सिद्ध होंगे। पारस्परिक सहयोग से किस किस प्रकार एक दूसरे की सुख−सुविधा बढ़ाये इसी रीति-नीति के अभिवर्धन को अग्रगामी बनाने के लिए धर्म, अध्यात्म तत्व-ज्ञान की आधारशिला रखी गई। भौतिक विज्ञान की खोज और प्रगति ने प्रकृति गत परमाणुओं की इसी रीति-नीति का परिचय दिया है। जड़ अथवा चेतन किसी भी पक्ष को देखें, इस विश्व के समस्त आधार परस्पर सम्बद्ध प्रतीत होते हैं और उनकी सार्थकता एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए रहने से ही सिद्ध होती है। एकाकी इकाइयां तो इतनी नगण्य है कि वे अपने अस्तित्व का न तो परिचय दे सकती हैं और न उसे रख सकती हैं।

यह सिद्धान्त ग्रह-नक्षत्रों पर भी लागू होता है। विश्व-ब्रह्माण्ड के समस्त ग्रह नक्षत्र अपनी सूत्र संचालक आकाश गंगाओं के साथ जुड़े हैं और आकाश गंगाएं महत्त्व हिरण्य गर्भ की उंगलियों में बंधी हुई कठपुतलियां भरे हैं। अगणित और मण्डल भी एक-दूसरे का परिपोषण करते हुए अपना क्रिया-कलाप चला रहे हैं। सूर्य ही अपने ग्रहों को गुरुत्वाकर्षण में बांधे हो और उन्हें ताप प्रकाश देता हो सो बात नहीं है, बदले में ग्रह परिवार भी अपने शासनाध्यक्ष सूर्य का विविध आधारों से पोषण करता है। सौर परिवार के ग्रह अपनी जगह से छिटक कर किसी अन्तरिक्ष में अपना कोई और पथ बनालें तो फिर सूर्य का सन्तुलन भी बिगड़ जायेगा और वह आज की स्थिति में न रहकर किसी चित्र-विचित्र विभीषिका में उलझ हुआ दिखाई देगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५५)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ

ऋषि आपस्तम्ब विचारमग्न थे और देवर्षि भावमग्न। हिमालय इन दोनों के साथ अपने आंगन में उपस्थित ऋषियों, देवों, सिद्धों व गन्धर्वों के समुदाय को अविचल भाव से निहार रहा था। हालांकि उसका अन्तस् भी भक्ति की भावसरिता से सिक्त हो रहा था। भक्ति है भी तो वह जो भावों को विभोर करे, परिष्कृत करे, ऊर्ध्वमुखी बनाए और अन्त में सदा के लिए भक्त को भगवत् चेतना के साथ एकाकार कर दे। हिमालय के सान्निध्य में हो रहे इस अनूठे भक्ति समागम में यही हो रहा था। देवर्षि नारद ने जो ब्रज की कथा सुनायी थी, उसे श्रवण कर ऋषि आपस्तम्ब की शंकाए धुल गयी थीं। उनकी चेतना भी भक्ति के संस्पर्श से पुलकित थी। अन्य ऋषिगण तो ब्रज की यादों से विह्वल थे। गायत्री महाशक्ति के चैतन्य ऊर्जा के प्रवाह को धरा पर अवतीर्ण करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को तो जैसे समाधि हो आयी थी। उन्हें चेत तो तब हुआ जब ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ ने उन्हें टोकते हुए कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि किस अनुभव में खो गए आप? यदि हम सब सत्पात्र हों तो हमें भी अपने अनुभव का अमृतपान कराएँ।’’ उत्तर में ऋषि विश्वामित्र के नेत्र उन्मीलित हुए और उन्होंने बड़ी श्रद्धा के साथ प्रातः के उदीयमान सूर्य को प्रणाम किया जिसकी स्वर्णिम किरणों ने हिमालय के श्वेत शिखरों को स्वर्णिम बना दिया था।
    
सविता के भर्ग को अपने हृदय में सदा धारण करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! आज से युगों पूर्व त्रेतायुग में जब परात्पर ब्रह्म ने श्रीराम रूप धारण किया था, उस समय मैं, उनके और अनुज लक्ष्मण के साथ मिथिला गया था। वहाँ रंगभूमि में मैंने विदेह कन्या सीता को देखा। मुझे आज भी याद है कि वह किस तरह सुकुमार कलिका की भांति संकुचित व सहमी हुई थी पर यह उनका बाह्य आवरण था।
    
उनके अन्तस् में कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन-पालन एवं लय करने वाली महाऊर्जा का विराट् अनन्त चैतन्य सागर हिलोरें ले रहा था। उन्हें देखते ही मैं पहचान गया कि वेदमाता गायत्री ही सीता का रूप धरे जनक की रंगभूमि में विचरण कर रही हैं। मैंने उन महामाया को भाव भरे मन से प्रणाम करते हुए प्रार्थना की- हे उद्भवस्थिति-संहारकारिणी माँ! अपने इस शिशु पर करूणा करो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०१

👉 मृत्यु से जीवन का अंत नहीं होता

जैसे हम फटे-पुराने या सड़े-गले कपड़ों को छोड़ देते हैं और नए कपड़े धारण करते हैं, वैसे ही पुराने शरीरों को बदलते और नयों को धारण करते रहते हैं। जैसे कपड़ों के उलट फेर का शरीर पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही शरीरों की उलट-पलट का आत्मा पर असर नहीं होता। जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो भी वस्तुत: उसका नाश नहीं होता।

मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके कारण हमें रोने या डरने की आवश्यकता पड़े। शरीर के लिए रोना वृथा है, क्योंकि वह निर्जीव पदार्थों का बना हुआ है, मरने के बाद भी वह ज्यों का त्यों पड़ा रहता है। कोई चाहे तो मसालों में लपेट कर मुद्द तों तक अपने पास रखे रह सकता है, पर सभी जानते हैं कि देह जड़ है। संबंध तो उस आत्मा से होता है जो शरीर छोड़ देने के बाद भी जीवित रहती है। फिर जो जीवित है, मौजूद है, उसके लिए रोने और शोक करने से क्या प्रयोजन?

दो जीवनों को जोड़ने वाली ग्रंथि को मृत्यु कहते हैं। वह एक वाहन है जिस पर चढ़कर आत्माएँ इधर से उधर, आती-जाती रहती हैं। जिन्हें हम प्यार करते हैं, वे मृत्यु द्वारा हमसे छीने नहीं जा सकते। वे अदृश्य बन जाते हैं, तो भी उनकी आत्मा में कोई अंतर नहीं आता। हम न दूसरों को मरा हुआ मानें, न अपनी मृत्यु से डरें, क्योंकि मरना एक विश्राम मात्र है, उसे अंत नहीं कहा जा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 1   

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...