मंगलवार, 18 मई 2021

👉 दानवीर कर्ण

एक बार की बात है, कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण जी, से पूछा कि हे प्रभु! एक जिज्ञासा है, मेरे मन में, यदि आज्ञा हो तो पूछूँ? श्री कृष्ण जी ने कहा, पूछो अर्जुन। तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है। कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परन्तु सभी लोग कर्ण को ही सब से बड़ा दानी क्यों कहते हैं?

यह प्रश्न सुन कर श्री कृष्ण जी मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शान्त करूंगा। श्री कृष्ण जी ने पास की ही दो स्थित पहाड़ियों को सोने का बना दिया। इस के पश्चात् वह अर्जुन से बोले कि "हे अर्जुन" इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस-पास के गाँव वालों में बाँट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरन्त ही यह काम करने के लिए चल दिया। उस ने सभी गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें। अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना आरम्भ कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की बहुत प्रशंसा की। अर्जुन सोने को पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए। लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बाँटते रहे।

उन मे अब तक अहंकार आ चुका था। गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। इतने समय पश्चात अर्जुन बहुत थक चुके थे। जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में कुछ भी कमी नहीं आई थी।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझ से यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए, प्रभु ने कहा कि ठीक है! तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण को बुला लिया।

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बाँट दो। कर्ण तुरन्त सोना बाँटने चल दिये। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उन से कहा यह सोना आप लोगों का है, जिस को जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये। ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

अर्जुन बोले कि ऐसा विचार मेरे मन में क्यों नही आया?

इस पर श्री कृष्ण जी ने उत्तर दिया, कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम स्वयं यह निर्णय कर रहे थे, कि किस गाँव वाले की कितनी आवश्यकता है। उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था, दूसरी ओर कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उन की जय जय-कार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं, उस से उनको कोई अन्तर नहीं पड़ता।

यह उस व्यक्ति की निशानी है, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो चुका है। इस प्रकार श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की इच्छा करना  उपहार नहीं सौदा कहलाता है।

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं। तो हमे यह कार्य बिना किसी अपेक्षा या आशा के करना चाहिए। ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, ना कि हमारा अहंकार।

बड़ा दानी वही है जो बिना किसी इच्छा के दान देता है और जब वह दान देता है। तो यह नहीं चाहता, कि कोई मेरी जय जयकार करें। वह तो केवल दान देता है, बदले में उसे और कुछ नहीं चाहिए होता। जो दान देने में ऐसा भाव रखता है, वही असली दान देने वाला कहलाता है।

👉 भक्तिगाथा (भाग १९)

विकारों से मुक्त, भक्तों के आदर्श शुकदेव
    
महर्षि पुलह के आग्रह से देवर्षि भी उत्साहित हुए और कहने लगे कि ‘‘शुकदेव तो गोलोक की अधिष्ठातृशक्ति पराम्बा भगवती श्रीराधा के लीला शुक थे। इसे प्रभु की आह्लादिनी शक्ति मां राधा की भक्तिलीला कहें कि उन्होंने अपने प्रिय शुक को धराधाम भेज दिया। धराधाम में शुकदेव शुक पक्षी के रूप में पर्याप्त समय तक विचरण करते रहे और अपनी इस विचरण यात्रा में वह जा पहुँचे अमरनाथ, जहाँ भगवान् भोलेनाथ, पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। जिज्ञासा पर्वततनया पार्वती की ही थी। उन्होंने पूछा था कि देवाधिदेव आप अजर अमर हैं- जबकि मुझे जन्म लेना और शरीर छोड़ना पड़ता है। इस प्रश्न पर भगवान् भोलेनाथ बोले- प्रिये! मैं आत्मा की अमरता का तत्त्व जानता हूँ। यदि तुम भी यह अमृतमय अमरकथा जान लो तो तुम्हें भी मेरी स्थिति मिल जाएगी। पार्वती के हाँ कहने पर कथा प्रारम्भ हो गयी। परन्तु लीलामयी की लीला- उन्हें बीच में ही निद्रा आ गयी और यह सम्पूर्ण कथा-लीला शुक सुनते रहे।
    
कथा की समाप्ति पर जब भोलेबाबा की भावसमाधि टूटी तो उन्होंने पार्वती को सोते देखा। तब यह कथा किसने सुनी? इस सवाल के उत्तर में उन्होंने शुकदेव को निहारा। पहले तो भोलेनाथ कुपित हुए पर जब शुकदेव जी अपना पक्षी शरीर त्यागकर चेतनअंश से महर्षि व्यास की पत्नी वाटिका के गर्भ में प्रवेश कर गए तो कृपालु भोलेनाथ ने उन्हें अनेकों वरदान दे डाले। गर्भकाल में शुकदेव को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा मिली और समयानुसार उनका अवतरण हुआ।
    
आत्मा के अमृततत्त्व के ज्ञाता शुकदेव सदा से नित्य-शुद्ध-बुद्ध एवं मुक्त थे। उनमें किसी भी तरह का कोई कलुष न था। सहज ही उनका चित्त निरोध अवस्था में प्रतिष्ठित था। न्यास उनके स्वभाव में था। आसक्ति उन्हें छू भी नहीं गयी। कर्मों का कीचड़ भला उनमें कैसे लिपटता। उनमें तो भगवान् की भक्ति सहज ही व्याप्त थी। अपने भक्ति संवेदनों से संवेदित होकर शुकदेव वन की ओर तप हेतु चल पड़े। महर्षि व्यास अपने पुत्र को लौकिक एवं वैदिक कर्मों के लिए शिक्षित करना चाहते थे। सो वे भी उनके पीछे-पीछे चल पड़े। पिता-पुत्र में बड़ा रोचक संवाद हुआ। महर्षि व्यास ने उन्हें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास का आश्रम धर्म समझाने की चेष्टा की।
    
नित्यज्ञानी शुकदेव पिता के इस कथन पर बोले- हे पिता यदि स्त्री

त्याग का व्रत लेने वाले ब्रह्मचारी मुक्त हो सकते तो सृष्टि के सभी नपुंसक मुक्त हो जाते, क्योंकि वे सभी स्त्री त्यागी हैं। यदि मुक्ति गृहस्थी करने वाले- सन्तान को जन्म देने वालों को मिलती तो पेट-प्रजनन में जुटे सभी मनुष्य एवं पशु मुक्त होते। और यदि मुक्ति वन में रहने वाले वानप्रस्थों को मिलती तो वन में विचरण करने वाले वन पशु नित्य मुक्त होते। यदि संन्यास लेने और भिक्षा मांगने वाले मुक्त हो पाते तो संसार के समस्त भिक्षुक मुक्त होते। पर ऐसा नहीं है, मुक्ति तो ऋत् के ज्ञान  में है- ‘‘ऋतम् ज्ञानेन मुक्ति’’।
    
यह चर्चा हो रही थी और शुकदेव आगे बढ़ते जा रहे थे। एक स्थान पर पर्वतीय नदी में कुछ नवयुवतियाँ, स्वर्ग की अप्सराएँ स्नान कर रही थीं। शुकदेव उनके पास से निकले-परन्तु उनमें कोई परिवर्तन न आया। वे यथावत स्नान करती रहीं। परन्तु जब महर्षि व्यास उधर से निकले तो उन्होंने अपने वस्त्र सम्हाले। उनके मुख पर लाज की रेखाएँ चमक उठीं। इस अनोखे प्रसंग पर महर्षि व्यास चकित हुए और उनसे बोले कि यह कैसी विचित्र बात है कि मुझ वृद्ध को देखकर तो तुम्हें लाज आती है परन्तु मेरे युवा पुत्र को देखकर तुम तनिक भी लज्जित नहीं हुईं। वैसे ही निर्वस्त्र स्नान करती रहीं।
    
महर्षि के इस कथन के उत्तर में इन देवस्त्रियों ने  कहा- महर्षि आपके पुत्र आयु से युवा हैं- परन्तु उनका चित्त सहज निरुद्ध अवस्था में है। वे लोक और वेद का न्यास कर चुके हैं। उनकी भावना में भावमय भगवान् प्रतिष्ठित हैं। वे साक्षात् भक्ति हैं। जबकि आप के साथ ऐसा नहीं है। आप में तप है, ज्ञान है परन्तु भक्ति की सम्पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हो पायी है। आप का चित्त मोह से चंचल है। उसे निरोध अवस्था में प्रतिष्ठित करने के लिए अभी आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा। देवस्त्रियों की इस दो टूक बात से महर्षि को चेत हुआ। उन्हें शुकदेव की उच्चतम अवस्था का भान हुआ।’’ इस कथा को सुनाते हुए देवर्षि बोले- ‘‘हे महर्षियों, शुकदेव का जीवन सभी भक्तों के लिए आदर्श है। उनकी भावनाएँ भगवान् में ही विहार करती है।’’ महर्षि पुलह ने सिर हिलाकर देवर्षि का अनुमोदन किया। भक्तिगाथा की अगली कड़ी की सभी को प्रतीक्षा थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४२

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १९)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

अपनी आंखें सघन रात्रि में घोर अन्धकार का अनुभव करती हैं, कुछ भी देख नहीं सकतीं। पर उसी स्थिति में उल्लू, चमगादड़, बिल्ली, चीता आदि प्राणी भली प्रकार से देखते हैं। विज्ञान कहता है कि जगत में प्रकाश सर्वदा और सर्वत्र विद्यमान है। अन्धकार नाम की कोई चीज इस दुनिया में नहीं है। मनुष्य की आंखें एक सीमा तक के ही प्रकाश कम्पनों को देख पाती हैं जब प्रकाश की गति मनुष्य की नेत्र शक्ति की सीमा से कम होती है तो उसे अन्धकार प्रतीत होता है।

आकाश में अनेक रंगों के भिन्न-भिन्न गति वाले प्रकाश कम्पन चलते रहते हैं। मनुष्य के नेत्र उनमें से केवल सात रंगों की स्वल्प जितनी प्रकाश तरंगों को ही अनुभव कर पाते हैं और शेष को देखने में असमर्थ रहते हैं। पीलिया रोग हो जाने पर हर वस्तु पीली दीखती है। ‘रैटिनाइटिस पिग मैन्टोजा’ रोग हो जाने पर एक सीधी रेखा धब्बे या बिन्दुओं के रूप में दिखाई देती है। आकाश को ही लीजिये वह हमें नीली चादर वाला गोलाकार पर्दे जैसा लगा दीखता है और लगता है उसमें समतल तारे टके हुए हैं। पर क्या वह ज्ञान सही है? क्या आकाश की सीमा उतनी ही है जितनी आंखों से दीखता है? क्या तारे उतने ही छोटे हैं जितने कि आंखों को प्रतीत होते हैं? क्या वे सब समतल बिछे हैं? क्या आकाश का रंग वस्तुतः नीला है? इन प्रश्नों का उत्तर खगोल शास्त्र के अनुसार नहीं हो सकता है। पर इन आंखों को क्या कहा जाय जो हमें यथार्थता से सर्वत्र भिन्न प्रकार की जानकारी देती हैं और भ्रम में डालती हैं।

यही हाल नासिका का है। हमें कितनी ही वस्तुएं गन्ध हीन लगती हैं। पर वस्तुतः उनमें गन्ध रहती है और उनके स्तर अगणित प्रकार के होते हैं। कुत्तों की नाक इस गन्ध स्तर की भिन्नता को समझती है और बिछुड़ जाने पर अपने घर तक उसे पहुंचा देती है। प्रशिक्षित कुत्ते इसी गन्ध के आधार पर चोरी हत्या आदि अपराध करने वालों को ढूंढ़ निकालते हैं। यही बात सुगन्ध दुर्गन्ध के भेद भाव से सम्बन्धित है। प्याज लहसुन आदि की गन्ध कितनों को बड़ी अरुचिकर लगती है, भोजन में थोड़ी सी भी पड़ जाने से मितली आती हैं पर कितनों को इनके बिना भोजन में जायका ही नहीं आता। यही बात सिगरेट शराब आदि की गन्ध के बारे में भी है। इन परिस्थितियों में नासिका के आधार पर यथार्थता का निर्णय कैसे किया जाय?

जिह्वा स्वादों की जो अनुभूति कराती है वह भी वस्तुस्थिति नहीं है। खाद्य पदार्थ के साथ मुख के स्राव मिलकर एक विशेष प्रकार का सम्मिश्रण बनाते हैं उसी को मस्तिष्क स्वाद के रूप में अनुभव करता है। यदि वही वास्तविकता होती तो नीम के पत्ते मनुष्य की तरह ऊंट को भी कड़ुए लगते और वह भी उन्हें न खाता। ऊंट को नीम की पत्तियों का स्वाद मनुष्य की जिह्वा अनुभूतियों से सर्वथा भिन्न प्रकार का होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पदार्थों का वास्तविक स्वाद जीभ पकड़ नहीं पाती। भिन्न-भिन्न प्राणी अपनी जीभ बनावट के अनुसार उसका स्वाद अनुभव करते हैं। कच्चा मांस मनुष्य के लिए अरुचिकर होता है यह इसी को मांसभोजी पशु बड़ी रुचि पूर्वक खाते हैं। मलीन वस्तुओं को मनुष्य की जीभ सहज स्वीकार नहीं कर सकती पर शूकर को उसमें प्रिय स्वाद की अनुभूति होती है। मुंह में छाले हो जाने पर बुखार या अपच रहने पर अथवा ‘गुड़ मार बूटी’ खाकर रसना मूर्छित कर देने पर वस्तु के स्वाद का अनुभव नहीं होता। इस अधूरी जानकारी वाली जिह्वा इन्द्रिय को सत्य की साक्षी के रूप में कैसे प्रामाणिक माना जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी*

सोमवार, 17 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १८)

विकारों से मुक्त, भक्तों के आदर्श शुकदेव

‘निरोधस्तु लोक वेदव्यापार न्यासः॥ ८॥’
लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों का त्याग निरोध है।
    
देवर्षि ने बड़े मधुर स्वरों में यह सूत्र उच्चारित किया। उनकी वाणी ने हिमवान् के आंगन में बैठे सभी देवों और ऋषियों की हृदय वीणा झंकृत कर दी। सभी के अन्तस में बड़े अलौकिक भक्तिसंगीत की गूंज उठी। निरोध और न्यास इन दो बिन्दुओं के बीच सभी की चेतना आ सिमटी। अन्तर्गगन में विहार करने वाले देवर्षि से उपस्थित जनों की यह चैतन्य दशा छुपी न रही। उन्होंने कहा- ‘‘निरोध त्याग नहीं है। यह तो चित्त के चैतन्य की उन्नत भाव दशा है। इसमें चित्त स्वभावतः ही शान्त, एकाग्र, स्थिर और विकल्प-विक्षेप विहीन हो जाता है। चित्त ज्यों-ज्यों इस भावदशा की ओर आगे बढ़ता है, त्यों-त्यों लौकिक एवं वैदिक कर्म छूटते जाते हैं।’’
    
देवर्षि की अमृतवाणी हिमालय के मीठे जल प्रपात की भांति झर रही थी। इसमें ध्वनि तो थी पर आध्यात्मिक संगीत की तरह। वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों एवं देवों के चित्त स्वाभाविक ही इसमें स्वरित हो रहे थे। बाह्य प्रकृति के ऊर्जाकणों में ये भक्ति संवेदन घुल रहे थे। सूर्यदेव की प्रकाश किरणें, हिमालय के महागगन में विहार करने वाले पक्षी, वहाँ विचरण करने वाले पशु- सभी में यह भक्ति चेतना तरंगित हो रही थी। संवेदना के संवेदन सहचर्य को जन्म देते हैं। यह सत्य यहाँ प्रत्यक्ष हो रहा था। और जब यह संवेदना भक्ति की हो तो सहचर्य स्वयं ही बड़ा भावमय हो जाता है। कुछ ऐसे ही अन्तर्मिलन एवं भावमिलन का भावपूर्ण संयोग यहाँ घटित हो रहा था।
    
देवर्षि कह रहे थे कि ‘‘चित्त चेतना के विमल होने के साथ न्यास स्वभावतः प्रतिष्ठित होता है और जब न्यास प्रतिष्ठित होता है तो स्वाभाविक ही निरोध की अवस्था आ जाती है। इसका उलटा भी सच है कि यदि चित्त में निरोध की अवस्था आ जाय तो न्यास अपने आप ही घटित हो जाता है। इसे मैंने युवा शुकदेव में स्वयं देखा है।’’ देवर्षि के मुख से महामुनि शुकदेव का नाम सुनते ही सभी को व्यासपुत्र शुकदेव का स्मरण हो आया। व्यासपुत्र शुकदेव! नित्यज्ञानी शुकदेव!!  परमभक्त शुकदेव!!!  भागवत के परम आचार्य शुकदेव!!!!

ऐसे भक्त के पावन प्रसंग को सुनने के लिए सभी उत्कंठित हो उठे। महर्षि पुलह तो अपनी उत्कण्ठा को क्षणभर भी न छुपा सके। वह तुरन्त बोल पड़े- ‘‘देवर्षि! जिनमें विकार का लेश भी नहीं है। जिन्हें कभी कामनाओं की कीचड़ ने नहीं छुआ- ऐसे शुकदेव की भक्तिकथा को हम सभी अवश्य सुनना चाहते हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४१

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १८)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

जीवन यापन करने के लिए हमें नौ उपकरण प्राप्त हैं। (1) नेत्र (2) जिह्वा (3) नासिका (4) कान (5) त्वचा (6) मन (7) बुद्धि (8) चित्त (9) अहंकार, इन्हीं के माध्यम से हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इस ज्ञान को ही यथार्थ मानते हैं। पर थोड़ी गहराई के साथ देखा जाय तो प्रतीत होगा कि यह सभी उपकरण एक सीमित और सापेक्ष जानकारी देते हैं, इनके माध्यम से मिली जानकारी न तो यथार्थ होती है और न पूर्ण। इसलिए उन अपूर्ण साधनों से मिली जानकारी को सही मान बैठना ‘भूल’ ही कही जायगी। वेदान्त की भाषा में इस अपूर्ण जानकारी को ‘स्वप्न’ मिथ्या कहकर उसका वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

संसार में अनेक कारणों से अनेक शब्द कम्पन उत्पन्न होते रहते हैं, इन ध्वनि तरंगों की गति भिन्न-भिन्न होती है। मनुष्य के कान केवल उतने ही ध्वनि कम्पन पकड़ सुन सकते हैं जिनकी गति 33 प्रति सेकिंड से लेकर 40 प्रति सेकिंड के बीच में होती है। इससे कम या ज्यादा गति वाले कम्पन अपने कानों की पकड़ में नहीं आते। इस परिधि के बाहर विचरण करने वाला प्रवाह इतना अधिक है जिसकी तुलना में सुनाई देने वाले शब्दों को लाख करोड़वां हिस्सा कह सकते हैं। इतनी स्वल्प ध्वनि को सुन सकने वाले कानों को शब्द सागर की कुछ बूंदों का ही अनुभव होता है। शेष के बारे में वे सर्वथा अनजान ही बने रहते हैं। इस अपूर्ण उपकरण के माध्यम से ध्वनि के माध्यम से विचरण करने वाले ज्ञान को सर्वथा स्वल्प ही कहा जा सकता है और उतने से साधन से मिलने वाली जानकारी के आधार पर वस्तु स्थिति समझने का दावा नहीं कर सकते।

त्वचा के माध्यम से मिलने वाली जानकारी भी कानों की तरह ही अपूर्ण होती है साथ ही भ्रान्त भी। हाथ पर एक मिनट तक बर्फ रखे रहें इसके बाद उसी हाथ को साधारण जल में डुबोए। लगेगा पानी गरम है। इसके बाद हाथ पर कुछ देर कोई गरम चीज रखे रहें, इसके बाद हाथ को उसी पानी में डुबाये प्रतीत होगा पानी ठण्डा है। जल एक ही तापमान का था पर बर्फ अथवा गरम चीज रखने के बाद हाथ डुबाने पर अलग अलग तरह के अनुभव हुए। ऐसी त्वचा की गवाही पर क्या भरोसा किया जाय जो कुछ का कुछ बताती है। ठण्ड और गर्मी की न्यूनाधिकता का अन्तर भी त्वचा एक सीमा तक ही बताती है। अत्यधिक गरम या अत्यधिक ठण्डी वस्तु में तापमान या शीतमान का जो अन्तर होता है उसे त्वचा नहीं बता सकती। ऐसी सीमित शक्ति वाली त्वचा इन्द्रिय के माध्यम से हम समग्र सत्य को समझ सकने में कैसे समर्थ हो सकते हैं?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २७
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 14 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १७)

भक्ति से होती है भावों की निर्मलता
    
देवर्षि के इस कथन के साथ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के मुख पर चिंतन की प्रगाढ़ प्रदीप्ति झलकने लगी। इसे वहाँ सभी ने अनुभव किया। देवर्षि के अंतस् में भी स्पन्दित हुआ कि ब्रह्मर्षि कुछ कहना चाहते हैं। उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा कि ‘‘इस सूत्र के मर्म का प्रबोध आप ही कहें ब्रह्मर्षि!’’ वशिष्ठ ने नारद के आग्रह पर स्वीकृति की हामी भरी और बोले- ‘‘मेरी स्मृति में इस समय अयोध्या नरेश महाराज चक्कवेण की छवि उभर रही है। उनके जीवन में मैंने इस सूत्र को चरितार्थ होते देखा है।’’ ‘‘आप ठीक कहते हैं महर्षि!’’ ऋषि पुलस्त्य ने अपनी सहमति जताते हुए कहा- ‘‘चक्कवेण का चरित्र तो चित्त को पवित्र करने वाला है। आप उनके संस्मरण से हम सभी को अनुग्रहीत करें।’’
    
ऋषि पुलस्त्य का आग्रह सुन कर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कथा आरंभ की- ‘‘अयोध्या के विशाल गौरवमय साम्राज्य के अधिपति थे महाराज चक्कवेण। वे जितने रणकुशल थे, उतने ही नीतिकुशल। न्यायनिष्ठ एवं परम उदार थे महाराज। भगवान नारायण की भक्ति एवं सहज निःस्पृहता उनका स्वभाव था। जहाँ राजन्यवर्ग एवं राजपुरुषों की महत्त्वाकांक्षाओं की चर्चा होती है व उनकी विलासिता, ऐश्वर्य एवं वैभव का बखान किया जाता है, वहीं इस युग में महाराज चक्कवेण के तप एवं ज्ञान की कथाएँ कहीं जाती हैं। चर्चा इस बात की होती थी कि इतने महासाम्राज्य का अधिपति झोपड़ी में रहता है और थोड़ी सी खेती करके अपनी गुजर-बसर करता है। सचमुच ऋषियों एवं मुनियों के भी आदर्श थे महाराज चक्कवेण।’’
    
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कह रहे थे और सभी जन सुनने के लिए उत्सुक थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ आगे बोले- ‘‘एक बार उनके महामंत्री ने उनसे अनुरोध किया-राजन! अन्य  राजागण अपने जीवन की प्रत्येक क्रिया में ऐश्वर्य का प्रदर्शन करते हैं। इतना ही नहीं वे आपस की चर्चा में यह व्यंग्य भी करते हैं कि तुम्हारा राजा दरिद्र है। महामंत्री के इस कथन पर महाराज थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले मंत्रीवर! यह सच है कि एक अर्थ में मैं दरिद्र हूँ, पर एक अर्थ में वे महादरिद्र हैं। मैं अपनी सभी लौकिक सम्पदा को अपनी प्रजा की सेवा में लगा चुका हूँ, परन्तु इसी के साथ मैंने सत्कर्म-सद्भाव व सद्ज्ञान की सम्पदा पायी है।
    
कोई इस सत्य पर विचार कर सकता हो तो वह जान सकता है कि सेवा से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। जब हृदयपूर्वक सेवा की जाती है, जब हृदय दूसरों के दुःख से विदीर्ण होना सीख जाता है, तब व्यक्ति के एक नये व्यक्तित्व का जन्म होता है। परदुःख से जब हृदय विदीर्ण होता है, तब व्यक्तित्व की सीमाएँ भी विदीर्ण होती हैं। व्यक्तित्व में पनपती है एक परम व्यापकता। स्वचेतना में परमचेतना समाती है। नारायण का भक्त भी अपने भगवान की तरह व्यापक हो जाता है और ऐसे में निजी लाभ-लोभ की कामनाएँ चित्त से उसी तरह से झड़ जाती हैं जैसे कि पतझड़ आने पर पेड़ से सूखे पत्ते। मेरे अंतःकरण की स्थिति कुछ ऐसी ही हो गयी है।
    
उस समय महाराज चक्कवेण की वाणी अमृत निर्झर की तरह झर रही है। महामंत्री सुन रहे थे। वह कह रहे थे कि जैसे अन्य राजाओं को विलासिता में, ऐश्वर्य में सुख मिलता है, उसी तरह बल्कि उससे कई गुना अधिक सुख मुझे मिलता है-जनजीवन की सेवा में। सेवा में मिलने वाला प्रत्येक कष्ट मुझे गहरी तृप्ति देता है। प्रत्येक दिन मेरे द्वारा जो भावभरे हृदय से सत्कर्म किये जाते हैं, मन से जो जनता की भलाई के लिए योजनाएँ बनायी जाती हैं, इसके लिए सद्चिंतन किया जाता है, वही उस दिन की सार्थकता है।’’
    
महर्षि वशिष्ठ ने महाराज चक्कवेण के इस अमृत प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा- ‘‘हे महर्षियों! मैंने चक्कवेण की इस स्थिति को स्वयं देखा है। सचमुच ही सेवा करते हुए उनका चित्त कामनाशून्य हो गया था और निरुद्ध हो गयी थीं उनकी चित्तवृत्तियाँ। यही वजह थी कि उनके सहज जीवन में स्वाभाविक ही योग की पराकाष्ठा प्रकट होती रहती थी। प्रजावत्सल महाराज इसका भी सदुपयोग अपनी प्रजा की सेवा में करते रहते थे। सचमुच ही भक्ति से वह सब कुछ सहज प्राप्त होता है जो महायोगियों के लिए भी दुर्लभ हैं।’’ अपनी इस चर्चा का समापन करते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने देवर्षि नारद की ओर देखा जो अब सम्भवतः अगला सूत्र बताने वाले थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १७)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

अतीत में अज्ञान ही पिछड़ी हुई परिस्थितियों में मनुष्य में रहा है। आज जिस स्थिति पर हम थोड़ा गर्व सन्तोष कर सकते हैं, वह ज्ञान साधन का ही प्रतिफल है। भविष्य में यदि अधिक सुख शांति की, आनन्द उल्लास की परिस्थितियां अभीष्ट हों तो उसके लिये सद्ज्ञान सम्पदा की दिशा में हमारे प्रयास अधिकाधिक तीव्र होने चाहिये। जिन दिनों भारत का स्वर्णिम काल था उन दिनों यहां की ज्ञान सम्पदा ही मूर्धन्य स्तर पर पहुंची हुई थी। संसार को स्वर्ग और मनुष्य को देवोपम बनाने के लिये, वर्तमान दुर्गति के दल-दल से निकलने के लिये ज्ञान साधना में अनवरत रूप से संलग्न रहने की आवश्यकता है। भूत और वर्तमान की तुलना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं।

इस ज्ञान साधना के सम्बन्ध में उपनिषद्कार ने कहा है—
परा ञ्चि खानि व्यतृणत स्वयम्भू
स्तस्मात्पराङ्ग पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यङ्गात्मानमैक्ष्व—
दावृतचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ।।
—केन 2।1।1

अर्थात्, ‘‘स्वयंभू परमात्मा ने समस्त इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर निर्मित किये हैं इसलिए बाह्य वस्तुएं ही देखी जाती हैं, अन्तरात्मा नहीं देखी जाती। किसी मेधावी ने ही अमृतत्व की कामना कर चक्षु आदि को भीतर की ओर प्रेरित कर अन्तरात्मा के दर्शन (अनुभव) किये हैं।’’

हम बाह्य जीवन के बारे में, सुविस्तृत संसार के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, पर आश्चर्य की बात यह है कि अपने सम्बन्ध में अपनी सत्ता और महत्ता के सम्बन्ध में बहुत ही कम जानते हैं। बहिर्मुखी जीवन व्यस्त रहता है और यथार्थता के समझने की न तो आवश्यकता समझता है और न अवसर पाता है। यदि अपने स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य का ठीक तरह भान हो जाय और संसार के साथ अपने सम्बन्धों को ठीक तरह जान सुधार लिया जाय तो यह साधारण दीखने वाला मानवी अस्तित्व महानता से सहज ही ओत-प्रोत हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २६
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

गुरुवार, 13 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १६)

भक्ति से होती है भावों की निर्मलता

भगवान दत्तात्रेय के अंतर्ध्यान होते ही हिमालय के हिमशिखर मौन में डूब गये। एक गहन नीरव निःस्पन्दता वहाँ व्याप्त हो गयी। जब अंतः-बाह्य पवित्रता हो तो भावसमाधि बड़ी सहज होती है। देवात्मा हिमालय के इस आँगन में उपस्थित ऋषियों-देवों की अंतर्भूमि में सहज निष्कलुषता थी और देवात्मा हिमालय तो स्वयं में पवित्रता का सघन साकार रूप था। इस पर भी वहाँ बह रहा था भक्ति की अविरल स्रोतस्विनी का निर्मल प्रवाह। सभी एक साथ समाधि लीन हो गये। भक्ति-भागीरथी में स्नातचित्त अब समाधि में डूब गया। यह बड़ी अद्भुत स्थिति थी। कितनी देर रही यह भाव अवस्था, कौन जाने?
    
हाँ! जब समाधि से व्युत्थान हुआ तो निरभ्र आकाश में भगवान भुवन भास्कर के सारथि अरुण बड़े धीमे से आ रहे थे। आकाश में छायी अरुणिमा हिमशिखरों पर भी झरने लगी थी। इसी के साथ बड़े धीमे से सूर्यदेव अपनी सौम्यता के साथ प्रकट हुए। सहस्रांश सूर्यदेव ने अपनी सहस्रों किरणों से हिमालय के हिमशिखरों पर सुवर्ण वृष्टि सी शुरु कर दी। बड़ी मोहक प्रातः बेला थी यह। श्वेत हिमशिखर स्वर्णिम आभा से भर गये। हिम प्रपातों के स्वरों में भी आश्चर्यकारी मधुरता झर रही थी। प्रातः की इस मोहकता से सभी मुग्ध हो गये। सब तरफ से अनूठी अलौकिकता बरस रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पर्वतपुत्री माता पार्वती ने सभी को अपनी गोद में बिठा रखा हो।
    
तभी महर्षि क्रतु ने आकाश की ओर निहारा और भगवान सूर्यदेव की अभ्यर्थना की। भक्ति की भावसमाधि से उबरकर भक्तिगाथा के श्रवण की ललक सभी में हो आयी थी। ऋषिश्रेष्ठ क्रतु ने देवर्षि नारद की ओर निहारा। उनका अंतर्बाह्य अपने नारायण में डूबा था। कुछ ऐसा था जैसे कि नारद के अस्तित्व से नारायण की वृष्टि हो रही हो। क्रतु ने कहा- ‘‘देवर्षि! भक्ति के नवसत्र एवं नवसूत्र का प्रारम्भ हो। भक्ति के सूत्र मानव चित्त को बींधे, बेंधे एवं बाँधे इसी में कल्याण है। भक्ति की भावना जब थमती है, तभी चित्त में विकृति एवं विक्षोभ होते हैं। तभी इसमें दरकने एवं दरारें पड़ती हैं।’’
    
‘‘आपका कथन सर्वथा उचित है ऋषिश्रेष्ठ! स्वार्थपरता का लोभ ही चित्त कलुषित करता है’’- देवर्षि नारद ने अपनी बात कहना प्रारम्भ की। स्वार्थीपन जितना बढ़ता है, मनुष्य उतना ही निष्ठुर-निर्मम हो जाता है। लोभ एवं लालच के कंटकों से बिंधकर उसका संवेदना स्रोत थम जाता है। कामनाओं की कीचड़ उसके अंतस् को गंदा करती है। कामनाओं की अधिकता ही उसे कुकर्म, कुसंस्कार एवं कुप्रवृत्ति की जंजीरों से जकड़ती है। इस सबसे उबरना तो तभी होता है, जब भक्ति का अंतःस्रोत फूटे। भक्ति से होती है भावों की निर्मलता और तभी गिरती हैं कामनाएँ और निरुद्ध होती हैं कृतियाँ।
    
महर्षिगण! मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है। इस सूत्र में भक्ति के अंकुरण का चित्त में प्रभाव का दर्शन होता है-
‘सा न कामयमाना निरोध रूपत्वात्’॥ ७॥
वह भक्ति कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधरूपा है।
    
भक्ति के इस तत्त्व की समझ कम ही लोगों को हो पाती है अन्यथा ज्यादातर तो भक्ति के बारे में भी भ्रमित रहते हैं। वे तो भक्ति की निर्मलता में भी अपनी कामना की कीचड़ घोलने की चेष्टा करते हैं। भक्ति में सकामता असम्भव है। बल्कि सच तो कुछ यूँ है कि भक्ति के अंकुरण से चित्त से कामनाएँ गिरने लगती है और अंततः प्रकट होती है-एक निरोध की भावदशा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३७

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १६)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

पादरी ने एक युक्ति से काम लिया। उसने थैले में से एक दर्पण निकाला और उसे आदिवासियों के सरदार के सामने कर दिया उसने जैसे ही अपनी आकृति देखी वह डर गया। दर्पण उन लोगों के लिये सर्वथा नई वस्तु थी। एक-एक करके पादरी ने दर्पण सभी को दिखाया। वे सभी बहुत डरे और समझने लगे कि यह आदमी कोई जादूगर है इसे मारने से कोई विपत्ति आ सकती है। अस्तु वे अपने-अपने भाले फेंक कर उसके इर्द-गिर्द आशीर्वाद पाने के लिये सिर झुकाकर बैठ गये। पादरी ने एक और दूसरा चमत्कार प्रकट किया। उसके पोपले मुंह में दोनों जबड़े नकली दांतों के लगे थे। उन बैठे हुए दर्शकों को सम्बोधित कर अब उसने एक नया जादू दिखाया। मुंह में से दांतों की बत्तीसी निकाली, दांत उन्हें दिखाये, पोपला मुंह दिखाया और फिर दांतों को मुंह में ठूंस कर पहले जैसा मुंह बना लिया। आदिवासी इस चमत्कार को देखकर दंग रह गये और उन्होंने पूरा भरोसा कर लिया कि यह कोई जादुई पुरुष है इतनी मान्यता बना देने से पादरी का काम बहुत सरल हो गया और निश्चिंतता पूर्वक अपना काम उस क्षेत्र में करने लगे। काम चलाऊ टूटी-फूटी आदिवासी भाषा तो उन्होंने पहले ही सीख ली थी।

पादरी ने लिखा है कि न्यूगिनी के यह आदिवासी योद्धा, निर्दयी, क्रूर, कष्ट सहिष्णु और भारी अनुदार होते हैं। एक कबीले का अधिकार जिस क्षेत्र पर है, उसमें घुसकर यदि किसी दूसरे कबीले का कोई सदस्य भूल से या जान बूझकर कोई पेड़ काट ले तो इतने से ही वे लोग आग बबूला हो जाते और रात को छिप कर उस पर हमला बोल देते। एक बार के हमले का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि कांगना मन कबीले के लोगों ने अपने पड़ौसी करारन कबीले की झोपड़ियों पर चढ़ाई करके सोते हुए लोगों को पकड़ लिया और उनमें तीस के सिर काट कर ले आये। इस विजयोपहार में से एक सिर भेंट करने के लिए वे पादरी के पास भी आये थे।

कबीले का मुखिया तथा योद्धा बनने के लिये वे लोग पूरी तैयारी करते हैं। प्रायः 16 वर्ष की आयु में उसे इसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिये एक जीवित मनुष्य का सिर काटना पड़ता है। अक्सर इस कार्य के लिये अपने ही कबीले की या किसी अन्य कबीले से खरीदी हुई औरत प्रयुक्त की जाती है। थोड़े पालतू पशु, चमड़ा, पक्षियों के पंख आदि देकर औरतें आसानी से खरीदी भी जा सकती हैं। वध उत्सव पर उस अभागी महिला को देव ग्रह में लाया जाता है, जहां वह नव योद्धा भाले छेद-छेद कर उस स्त्री का काम तमाम कर देता है और फिर उसका सिर काटकर सरदार को भेंट करता है। इतना कर लेने पर उसकी गणना कबीले के योद्धा के रूप में होने लगती है। इन्हीं में से पीछे कोई मुखिया भी चुन लिया जाता है।

एक बार तो पादरी के यहां ठहरे हुए गोरों को घेर लिया और प्रस्ताव किया कि दल की एक गोरी महिला उन्हें वध करने के लिये दे दी जाय इसके बदले बीस आदिवासी युवतियां उन्हें दें देंगे। इस धर्म संकट को भी बड़ी चतुरता पूर्वक ही टाला जा सका।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २४
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 11 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १५)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव
    
देवर्षि ने भगवान दत्त को मन ही मन प्रणाम करते हुए कहा- ‘‘देव! आपके आगमन से मेरा यह सूत्र फलित हो गया है। इसकी व्याख्या आप स्वयं करें।’’ पर प्रकट रूप से वह मौन थे। हालाँकि देवर्षि की इस मनोवाणी को सप्तर्षियों सहित महर्षि लोमश एवं मार्कण्डेय आदि ने भी सुना और फिर सबने उनसे आग्रह किया कि वे देवर्षि के भक्ति सूत्र की व्याख्या करें। सभी के आग्रह पर भगवान दतात्रेय विंहसे और नारद की ओर देखते हुए बोले- ‘‘देवर्षि! आप धन्य हैं, जो इस भक्तिकथा में प्रवृत्त हुए हैं। आपका यह सूत्र यथार्थ है, सार्थक है, इसमें साधना जीवन का सार है।
    
भावों की परिशुद्धि के साथ जब ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता है और यह जीवन का रूपान्तरण करती हुई, परमात्म-ऊर्जा में लय होती है, तभी इस सूत्र का अनुभव होता है। सामान्य भावचेतना तो अपनी अशुद्धियों के कारण परमात्म चेतना की अनुभूति कर ही नहीं सकती। पर रूपान्तरित होने के बावजूद इस अनुभव को सहन कर पाना कठिन है। कुछ ऐसा जैसे कि प्याली में सागर उमड़ आये। जीवात्मा में परमात्मा के उमड़ते ही एक अद्भुत सात्विक-आध्यात्मिक उन्माद छा जाता है, फिर नहीं बचती लोकरीति की लकीरें, नहीं बचती जीवन की क्षुद्रताएँ। होती है तो बस विराट्-व्यापकता में विलीनता। ऐसी मस्ती छाती है कि न मन रुकता है और न तन। जीवन झूम उठता है और गूँजता है भक्ति का भाव संगीत, जो किन्हीं भी सात सुरों का मोहताज नहीं होता, बल्कि इसमें तो सभी सुर-ताल लय हो जाते हैं।’’
    
भगवान दत्त कह रहे थे और सभी सुन रहे थे। अग-जग में, हिमालय के कण-कण में उनकी वाणी व्याप्त हो रही थी। सभी को यह बात ठीक लग रही थी कि छोटी सी प्याली में सागर समा जाय तो फिर प्याली का पागल होना स्वाभाविक है। बूँद में सागर उतर जाए तो भला बूँदों की दुनिया के नियम कैसे बचेंगे। कुछ वैसे ही जब भक्त के जीवन में सम्पूर्ण भगवत्ता अवतरित होने लगे तो एक आँधी तो आयेगी ही, एक तूफान तो उठेगा ही और फिर जो दृश्य उभरेंगे, जो कुछ घटेगा उससे भक्त स्तब्ध तो होगा ही। ऐसे में वह होता है जो कि कभी हुआ ही नहीं, जिसके बारे में न तो कभी सोचा और न ही कभी जाना। ऐसा बहुत कुछ, बल्कि कहें तो सब कुछ होने लगता है भक्त के जीवन में, जो उसे स्तब्ध करता है। वह हो जाता है अवाक्। उसकी गति रुक जाती है। पहले की सारी गतियाँ थम जाती हैं। अब तक जो भी जाना था, वह व्यर्थ हो जाता है। अब तक जिसे पहचाना था, वह बेगाना हो जाता है।
    
पहले मत्त, फिर स्तब्ध। ये घटनाएँ एक के बाद एक घटती हैं, फिर जब यह स्तब्धता थमती है तो अंतस् में बहती है एक अलौकिक धारा-आत्मरमण की धारा। बड़ा अद्भुत होता है यह सब। इसे जो जानता है वही जानता है। भगवान दत्त के शब्दों की लय में सभी के मन विलीन हो रहे थे। छायी हुई थी आत्मलीनता। देवर्षि स्वयं भी सुन रहे थे और अनुभव कर रहे थे कि उनके अंतर्यामी नारायण ही आज बाह्य रूप से दत्त भगवान बनकर पधारे हैं। आज भगवान स्वयं अपनी भक्ति की व्याख्या कर रहे हैं। उनकी यह भावनाएँ मौन में ही मुखर थीं। प्रकट में तो वह केवल प्रभु की दिव्यलीला के साक्षी थे।
    
मन ही मन उन्होंने कहा- ‘‘कुछ और कहें प्रभु!’’ देवर्षि की चेतना में उठे इन स्पन्दनों ने दत्तात्रेय को स्पन्दित किया और वह बोले- ‘‘जो भक्ति पथ पर चलना चाहते हैं, उनसे मेरा यही कहना है कि इस पथ पर पहले तो पीड़ा होगी बहुत, विरह भी होगा। मार्ग में काँटें भी चुभेंगे, आँसू भी बहेंगे, पर भक्त को बिना घबराये आगे बढ़ना है, क्योंकि जो मिलने वाला है वह अनमोल है। जिस दिन मिलेगा उस दिन भक्त उन्मत्त हुए, स्तब्ध हुए, आत्माराम हुए बिना न रहेगा। उसकी एक-एक आस पर हजार-हजार फूल खिलेंगे। उसकी एक-एक पीड़ा, हजार-हजार वरदान लेकर आयेगी।’’ इतना कहते हुए भगवान दत्तात्रेय ने सभी से विदा ली और अंतर्ध्यान हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १५)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

प्रगति वस्तुओं का बाहुल्य के, इन्द्रिय भोगों के अथवा प्रिय परिस्थितियों की उपलब्धि के साथ जुड़ी हुई नहीं है, वरन् ज्ञान के विस्तार से सम्बन्धित है। जिनका ज्ञान जितना सीमित है वह उतना ही पिछड़ा हुआ है। सम्भव है जिनकी ज्ञान सम्पदा बढ़ी-चढ़ी है, उसकी शक्ति और अशक्ति का लेखा जोखा भी ज्ञान सम्पदा की न्यूनाधिकता के साथ जुड़ा हुआ है।

मनुष्य का नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर उसकी सुसंस्कृत ज्ञान चेतना के साथ जुड़ा हुआ है। भौतिक शक्तियों के उपार्जन और उपभोग को भी मानसिक विकास से पृथक नहीं रखा जा सकता। आदिकाल में मनुष्य शारीरिक दृष्ट से अब की अपेक्षा अधिक बलिष्ठ रहा होगा, पर उसकी चेतना पशु स्तर से कुछ ही ऊंची होने के कारण सुविकसित लोगों की तुलना में गया गुजरा ही सिद्ध होता रहा है। अतीत के पिछड़ेपन पर जब एक दृष्टि डालते है तो प्रतीत होता है कि चिन्तन क्षेत्र में अज्ञान की स्थिति कितनी कष्टकर और कितनी लज्जास्पद परिस्थितियों में मनुष्य को डाले रही है।

अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री के पक्षी विभाग ऐसोसियेट क्यूरेटर द्वारा प्रकाशित विवरणों से पता चलता है कि न्यूगिनी के आदिम और आदिवासी किस तरह अपने क्षेत्र में जा भटकने वाले लोगों को भून-भूनकर खा जाते थे। उस क्षेत्र में पक्षियों की खोज में एक खोजी दल जा पहुंचा। पापुआन क्षेत्र के मियाओं कबीले के बड़े निर्दय क्रूर कर्मों के लिये प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र में किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बिना किसी को जाने देने की इजाजत नहीं है, पर वह खोजी दल किसी प्रकार उस क्षेत्र में जा ही पहुंचा और उसके सभी सदस्यों का रोमांचकारी वध हो गया।

पादरी आइवोस्केफर उस क्षेत्र में 45 वर्ष से इन नर भक्षियों के बीच प्रभु ईसा का सन्देश सुनाने के लिये रहते थे। उन्होंने इन नर भक्षियों को अपने प्रेम एवं सेवा कार्य से प्रभावित कर रखा था। शिक्षा चिकित्सा आदि उपायों से उन्होंने इस क्षेत्र के निवासियों का मन जीत लिया था। उन्हें वे पवित्र आत्मा समझते थे और किसी प्रकार की हानि पहुंचाने के स्थान पर सम्मान प्रदान करते थे।

आरम्भ में उस निष्ठावान, धर्मात्मा किन्तु क्रिया कुशल पादरी ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ इन लोगों के बीच अपना स्थान बनाया था स्केफर ने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि—पहली बार जब वे इस इलाके में अपने एक साथी के साथ गये तो उन्हें नर भक्षियों के द्वारा घेर लिया गया। उन्हें देखने वालों ने शोर मचाकर 40-50 योद्धाओं को बुला लिया—वे भाले ले लेकर आ गये और हम लोगों को चारों ओर से घेरे में लेकर हर्ष नृत्य करने लगे। उन्हें दो मनुष्य का—उसमें भी गोरों का ताजा मांस खाने को मिलेगा। इस कार्य का श्रेय वे लेंगे इस खुशी में उन्मत्तों जैसी उछल कूद कर रहे थे। घेरे में आये शिकार अब भाग तो सकते नहीं थे।

इस सम्बन्ध में वे निश्चित होकर देवता के बलिदान के उद्देश्य से गीत गा रहे थे और हर्ष मना रहे थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २३
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

रविवार, 9 मई 2021

👉 उम्मीद का दिया

एक घर मे पांच दिए जल रहे थे।

एक दिन पहले एक दिए ने कहा -

इतना जलकर भी मेरी रोशनी की लोगो को कोई कदर नही है...

तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं।

वह दिया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया।

जानते है वह दिया कौन था?

वह दिया था उत्साह का प्रतीक।

यह देख दूसरा दिया जो शांति का प्रतीक था, कहने लगा -

मुझे भी बुझ जाना चाहिए।

निरंतर शांति की रोशनी देने के बावजूद भी लोग हिंसा कर रहे है।

और शांति का दिया बुझ गया।
उत्साह और शांति के दिये के बुझने के बाद, जो तीसरा दिया हिम्मत का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया।

उत्साह, शांति और अब हिम्मत के न रहने पर चौथे दिए ने बुझना ही उचित समझा।

चौथा दिया समृद्धि का प्रतीक था।

सभी दिए बुझने के बाद केवल पांचवां दिया अकेला ही जल रहा था।

हालांकि पांचवां दिया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह निरंतर जल रहा था।

तब उस घर मे एक लड़के ने प्रवेश किया।

उसने देखा कि उस घर में सिर्फ एक ही दिया जल रहा है।
वह खुशी से झूम उठा।
चार दिए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ।
यह सोचकर कि कम से कम एक दिया तो जल रहा है।

उसने तुरंत पांचवां दिया उठाया और बाकी के चार दिए फिर से जला दिए।

जानते है वह पांचवां अनोखा दिया कौन सा था?

वह था उम्मीद का दिया...

इसलिए अपने घर में अपने मन में हमेशा उम्मीद का दिया जलाए रखिये।

चाहे सब दिए बुझ जाए लेकिन उम्मीद का दिया नही बुझना चाहिए।

ये एक ही दिया काफी है बाकी सब दियों को जलाने के लिए....
        
ख़ुशियाँ आएँगी, कुछ समय बाद सब सामान्य होगा, उम्मीद का दिया जलाए रखें।

शनिवार, 8 मई 2021

👉 चाफेकर बन्धु

8 मई, 1859 बलिदान दिवस
                    
चाफेकर बन्धु तीन भाई थे, तीनों सगे भाई थे और तीनों को ही फाँसी की सज़ा हुई. उनके नाम थे दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर.
                   
फाँसी लगने के पश्चात् स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता चाफेकर बन्धुओं की माँ को सांत्वना देने के लिए उनके परिवार में पहुँची. उनकी माँ को देखकर वह स्तब्ध रह गयीं.
                  
उनकी कल्पना के विपरीत वह माँ बिलकुल शान्त, अविचल, मुख मण्डल पर वेदना की एक भी रेखा नहीं बल्कि गर्व से माथा उन्नत. सांत्वना के कोई भी शब्द कहे बिना केवल चरणस्पर्श करके वह वापस आ गयीं.
                   
सन् 1857 में पूना में प्लेग की महामारी फैली. लोग चूहों की तरह फटाफट मरने लगे. सरकार ने उसकी रोकथाम के लिए चार्ल्स रैंड को लगाया. उसके सिपाही रोकथाम के नाम पर हर घर में घुस जाते. जूता पहनकर पूजा गृह तथा रसोईघर में घुस जाते.
                    
महिलाओं द्वारा विरोध करने पर उनसे अशिष्ट एवं अभद्र व्यवहार करते. यहाँ तक घर का सामान उठाकर चले जाते. रैंड की कठोरता के विरुद्ध चाफेकर बन्धुओं ने उसे सबक सिखाने का निश्चय किया.
                   
22 जून,1857 को महारानी विक्टोरिया के राज्यभिषेक की हीरक जयंती का समारोह किया जाना था. दामोदर और बालकृष्ण ने विचार किया कि उस दिन मौज मस्ती के कारण रैंड असावधान होगा तब उसका काम तमाम किया जा सकता है.
                   
सांयकाल के समय गवर्नमेंट हाऊस के विशाल समारोह में लगभग साढ़े सात बजे चार्ल्स रैंड की बग्घी पहुँची. तीनों भाई उसकी घात लगाए बैठे थे. रात्रि 12 बजे समारोह समाप्त हुआ. धीरे-धीरे बग्घी वापस आने लगी और बालकृष्ण ने बग्घी को पहचान लिया.
                    
उसने 'नारया नारया' की आवाज़ लगाई आवाज सुनते ही दामोदर पायदान पर चढ़ गया, बायें हाथ से पर्दा हटाया और बिलकुल पास से रैंड पर गोली दाग़ दी, रैंड वहीं ढेर हो गया. दामोदर भाग खड़े हुए.
                       
रैंड की बग्घी के बिलकुल पीछे मि. आयरिश की बग्घी आ रही थी और वह शराब के नशे में धुत था. उनकी पत्नी ने उन्हें सावधान किया किन्तु निष्फल. इसी दौरान एक युवक ने उस पर गोली चला दी और वो भी वहीं ढेर हो गया. वह युवक था बालकृष्ण चाफेकर.
                      
दोनों अंग्रेज़ी अफ़सरों के वध का गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष मि. ब्रुइन को सौंपा गया. किन्तु दो महीनों के प्रयास के पश्चात् निराशा ही हाथ लगी. तब उन्हें पकड़वाने के लिए 20 हज़ार रुपये का ईनाम घोषित किया गया. अंत में रामचंद्र द्रविड़ और गणेश शंकर द्रविड़ इस लोभ में आ गये.
                     
उन्होंने ही मि.ब्रुइन को बताया कि यह काम दामोदर चाफेकर और बालकृष्ण चाफेकर का हो सकता है. दामोदर चाफेकर पकड़े गए लेकिन बाल कृष्ण चाफेकर बच निकले.
                    
दामोदर के ख़िलाफ़ कोई सबूत न होते हुए भी न्यायाधीश ने हत्या का मामला बनाकर 18 अप्रैल,1858 को दामोदर हरि चाफेकर को फाँसी की सज़ा दे दी.
                     
अब बालकृष्ण को पकड़ने की बारी थी. उसे पकड़ने के लिए उसके सगे, सम्बन्धियों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही थी. तब बालकृष्ण ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे भी 12 मई,1858 को फाँसी दे दी गयी.
                      
अब गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड़ को सबक सिखाने की बात थी. महादेव रानडे और वासुदेव चाफेकर दोनों ने मिलकर द्रविड़ बन्धुओं को अपनी गोली का शिकार बनाया. गणेश तो वहीं ढेर हो गया, रामचंद्र को अस्पताल ले जाया गया, उसने भी वहाँ पहुँचकर दम तोड़ दिया. 20 हज़ार ईनाम के बदले उन्हें मौत का सामना करना पड़ा.
                     
वासुदेव चाफेकर और महादेव रानडे पकड़े गए. मुकद्दमा चला और फाँसी की सज़ा हुई. वासुदेव चाफेकर को 8 मई और महादेव रानडे को 10 मई को फाँसी दे दी गई.

शुक्रवार, 7 मई 2021

👉 बीतेगा ये बुरा वक्त


अवसादों  के  अब  तमस हटेंगे, आशाओं के दीप जलेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

अंधियारी मिट जाएगी फिर, विश्वासों  का  सूर्य उगेगा।
उमंगों की बगिया में फिर से, हर्ष-हर्ष का फूल खिलेगा।।
नया  सूर्य गगन  में  होगा, अमन  चैन  के  दिन  फिरेंगे।
बीतेगा  ये बुरा   वक्त फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

जीतेंगे ये  जारी  जंग  को, दुःख:  निराशा पास न  होगा।
फिर से सबकुछ अच्छा होगा, अब कोई निराश न होगा।।
कोई  नहीं  अब कष्ट  सहेगा, सभी सुखी  निरोग  रहेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा वक्त  फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

मिट जाएगी महामारी अब, परजीवी  का कोप न  होगा।
बहुत सहे  हैं  परेशानी अब, शांति का  साम्राज्य बढेगा।।
कामयाब मिलकर हम होंगे, सबके सुख सौभाग्य बढ़ेंगे।
बीतेगा  ये   बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के संगीत बजेंगे।।

                                                                   उमेश यादव

👉 भक्तिगाथा (भाग १४)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव

महर्षि के होठों का मन्द हास्य भक्ति-किरणों की तरह सभी की अंतर्भावना में व्याप्त हो गया। सबकी रोमावलि पुलकित हो आयी। दीर्घजीवी महर्षि लोमश का सान्निध्य था ही कुछ ऐसा अनूठा। अपनी भक्ति के प्रभाव से वह भगवन्मय हो गये थे। उनसे कुछ और सुनने की चाहत सभी को थी। सम्भवतः हिमशिखर भी इसी आशा में मौन साधे नीरव खड़े थे। हिमप्रपातों की गूँज मद्धम हो गयी थी। आकाश भी भक्त के अंतःकरण की भाँति निरभ्र और शान्त था। सभी को प्रतीक्षा थी तो बस महर्षि के वचनों की।
    
अंतर्यामी ऋषि कहने लगे- ‘‘महनीय जनों! जीवन की दीर्घता नहीं, लोकसेवापरायणता ही वरेण्य है। कौन कितनी आयु जिया, इसकी गणना करने के बजाय यह महत्त्वपूर्ण है कि कौन उसे किस तरह जिया। भगवान की चेतना का विस्तार ही यह संसार है। जो इस अनुभव को जीता है, वही भक्त है। भावों की शुद्धि, भावों की भगवान में विलीनता, भगवन्मय जीवन यही भक्त के लक्षण हैं। इन्हीं की व्याख्या देवर्षि ने अपने सूत्रों में की है। मेरा आग्रह है कि देवर्षि अपनी भक्ति गाथा का विस्तार करें।’’
    
महर्षि लोमश के इन वचनों के साथ ही सभी के नेत्र देवर्षि के मुख पर जा टिके। देवर्षि के चेहरे पर सात्विक सौम्यता विद्यमान थी। उनके होठों से मन्दगति से नारायण नाम का जप चल रहा था। उनके हृदय की भावनाएँ इस नामजप के साथ प्रभु को अर्पित हो रही थीं। महर्षि लोमश के वचनों को सुनकर उन्होंने एक सूत्र का उच्चारण किया-
‘यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति॥ ६॥’
भक्ति के तत्त्व को जानने वाला उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध हो जाता है और आत्मा में रमण करने वाला हो जाता है।
    
देवर्षि के इस सूत्र में उपस्थित जनों के चिंतन सूत्र गुँथने लगे। उनकी भाव चेतना में कुछ अनोखा स्पन्दित हुआ। वहाँ की सूक्ष्मता में कई लहरें उठीं और भक्ति प्रवाह में विलीन हो गयीं। जिज्ञासाएँ भी सघन हुईं, मस्ती, स्तब्धता और आत्मरमण की यह सघनता कैसी है? यह जहाँ अपने पूर्ण रूप में है, वहाँ कैसी है भक्ति की ज्योत्सना? कैसी है छवि और छटा? ऋषियों एवं देवों के चिंतन की इस लय में प्रकृति ने कुछ घोला, मौन हिमालय के अंतर में भी आह्वान के मूक स्वर उठे और तभी सभी की आँखें उस ज्योतिपुञ्ज की ओर उठीं जो इन्हीं क्षणों में साकार हुआ था। यह दैवी उपस्थिति मुग्ध करने वाली थी। इस उपस्थिति मात्र से ही कुछ भाव घटाएँ घिरीं और अंतस् में बरस गयीं।
    
इस भाववृष्टि के बीच सभी ने उस ओर निहारा जिधर ज्योतिपुञ्ज प्रकट हुआ था। अब उस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय खड़े थे, साथ में थे उनके पार्षद। दत्तात्रेय और उनके पार्षदों की ज्योतिर्मयी उपस्थिति ने देवात्मा हिमालय के इस आँगन में नयी पावनता एवं चेतनता का संचार कर दिया। दत्तात्रेय ने अपनी उपस्थिति के साथ ही सप्तर्षियों को प्रणाम किया। विशेषतया महर्षि अत्रि को जो उनके पिता भी थे। इसके बाद उन्होंने सभी ऋषियों का अभिवादन किया। महर्षि लोमश जैसे परमर्षियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपने पास आसीन किया।

देवर्षि तो दत्तात्रेय के आगमन से गद्गद् हो गये, क्योंकि उन्हें इस सत्य पर पूर्ण आस्था थी कि उनके आराध्य भगवान नारायण ही अपने एक अंश से दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुए हैं। भक्ति की परम पूर्णता सहज ही उनमें वास करती है। जो दत्तात्रेय की विशेषताओं से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि ये अवधूत शिरोमणि साधकों को मार्गदर्शन करने के लिए इस धराधाम में विचरण करते हैं। जूनागढ़ में गिरनार पर्वत इनका स्वाभाविक वास स्थान है। तंत्र, भक्ति एवं योग की अनगिनत साधनाएँ इनसे प्रकट हुई हैं। रसेश्वर तंत्र इन्हीं की देन है। ये परम योगी, महातंत्रेश्वर एवं श्रेष्ठतम भक्त हैं। अपने साधना जीवन में इनकी एक झलक भर मिलना साधकों का विरल सौभाग्य होता है। वाणी जहाँ रुकती है, शब्द जहाँ थकते हैं, मन जहाँ मौन होता है, वहाँ से परम भक्त अवधूत शिरोमणि दत्तात्रेय का चरित्र प्रारम्भ होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३३

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १४)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

अंधेरे में झाड़ी भूत जैसी लगती है—रस्सी का टुकड़ा सांप प्रतीत होता है, मरीचिकाएं थल में जल का और जल में थल का भान कराती हैं। यथार्थता से सर्वथा भिन्न अनुभूतियों का होना कोई अनहोनी बात नहीं है। आकाश में बहुत ऊंचे उड़ने वाले वायुयान छोटे पक्षी जैसे लगते हैं। पृथ्वी की अपेक्षा लाखों गुने बड़े और अपने सूर्य से हजारों गुने अधिक चमकदार तारागण नन्हे से दीपक की तरह टिमटिमाते दीखते हैं। क्या यह सारे दृश्य यथार्थ में वैसे ही हैं जैसे कि आंखें हमें अनुभव कराती हैं? आंखों की तरह ही अन्य इन्द्रियों की बात है। वे एक सीमा तक ही वस्तुस्थिति का ज्ञान कराती हैं और जो बताती जताती हैं उसमें से भी अधिकांश भ्रान्त होता है। बुखार आने पर गर्मी की ऋतु में शीत का और शीत में गर्मी का अनुभव होता है। मुंह का जायका खराब होने पर हर चीज कड़वी लगती है। जुकाम हो जाने पर चारों ओर बदबू का अनुभव होता है। पीलिया रोग होने पर आंखें पीली हो जाती हैं और हर चीज पीले रंग की दिखाई पड़ती है। क्या यह अनुभूतियां सही होती हैं?

जिस वस्तु का जैसा स्वाद प्रतीत होता है वह वास्तविक नहीं है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य को जो नीम के पत्ते कडुए लगते हैं, वे ऊंट को भी वैसे ही क्यों न लगते, वह उन्हें रुचि पूर्वक स्वादिष्ट पदार्थों की तरह क्यों खाता? खाद्य पदार्थों का स्वाद हर प्राणी की जिह्वा से निकलते रहने वाला अलग अलग स्तर के रसों तथा मुख के ज्ञान तन्तुओं की बनावट पर निर्भर है। भोजन मुंह में गया—वहां के रसों का सम्मिश्रण हुआ और उस मिलाप की जैसी कुछ प्रतिक्रिया मस्तिष्क पर हुई उसी का नाम स्वाद की अनुभूति है। खाद्य पदार्थ की वास्तविक रासायनिक स्थिति इस स्वाद अनुभूति से सर्वथा भिन्न है। जो कुछ चखने पर अनुभव होता है वह यथार्थता नहीं है।

शरीर विज्ञानी जानते हैं कि काया का निर्माण अरबों खरबों कोशिकाओं के सम्मिलन से हुआ है। उनमें से प्रतिक्षण लाखों मरती हैं और नई उपजती हैं। यह क्रम बराबर चलता रहता है और थोड़े ही दिनों में, कुछ समय पूर्व वाली समस्त कोशिकाएं मर जाती हैं और उनका स्थान नई ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह एक प्रकार से शरीर का बार-बार काया कल्प होता रहता है। पुरानी वस्तु एक भी नहीं रहती उनका स्थान नये जीव कोष ग्रहण कर लेते हैं। देह के भीतर एक प्रकार श्मशान जलता रहता है और प्रसूति ग्रह में प्रजनन की धूम मची रहती है। इतनी बड़ी हलचल का हमें तनिक भी बोध नहीं होता और लगता है देह जैसी की तैसी रहती है। जिन इन्द्रियों के सहारे हम अपना काम चलाते हैं उनमें इतना भी दम नहीं होता कि बाहरी वस्तुस्थिति बनाना तो दूर अपने भीतर की इतनी महत्वपूर्ण हलचलों का तो आभास दे सकें। ऐसी इन्द्रियों के आधार पर यथार्थ जानकारी का दावा कैसे किया जाय? जिस मस्तिष्क को अपने कार्यक्षेत्र-शरीर के भीतर होने वाले रोगों में क्या स्थिति बनी हुई है, इतना तक ज्ञान नहीं है और घर की बात को बाहर वालों से पूछना पड़ता है वैद्य डाक्टरों का दरवाजा खट-खटाना पड़ता है, उस मस्तिष्क पर यह भरोसा कैसे किया जाय कि वह इस ज्ञान का वस्तुस्थिति में हमें सही रूप में अवगत करा देगा।

ज्ञान जीवन का प्राण है। पर वह होना यथार्थ स्तर का चाहिए। यदि कुछ का कुछ समझा जाय, उलटा देखा और जाना जाय, भ्रम विपर्यय हमारी जानकारियों का आधार बन जाय तो समझना चाहिए यह ज्ञान प्रतीत होने वाली चेतना वस्तुतः अज्ञान ही है। उसमें जकड़े रहने पर हमें विविध विधि त्रास ही उठाने पड़ेंगे, पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ेंगी।* इसी स्थिति को माया कहते हैं। माया कोई बाहरी संकट नहीं, मात्र भीतरी भ्रान्ति भरी मनःस्थिति ही है, यदि उसे सुधार लिया जाय, तो समझना चाहिए माया के बन्धनों से मुक्ति मिल गई वह मुक्ति वस्तुतः हर किसी को मिलना गलत है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २०
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 5 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १३)

जिसे भक्ति मिल जाए, वो और क्या चाहे?
    
‘‘हम सब भी आपके दर्शन से अनुग्रहीत हैं भगवन्!’’ देवर्षि ने लोमश ऋषि के कथन को पूर्णता दी और वहाँ उपस्थित ऋषियों व देवों को सम्बोधित करते हुए बोले- ‘‘मैं भक्ति के जिस सूत्र को कह रहा था, उसके साकार विग्रह ये लोमश ऋषि हैं। आज के सूत्र की व्याख्या में मैं इन्हीं महाभाग के जीवन का एक प्रसंग कहूँगा।’’ ‘अवश्य’ सप्तऋषियों सहित सभी ने अनुमोदन किया और ऋषि लोमश को एक पुष्पासन पर बिठाया। यह पुष्पासन ब्रह्मकमल से बना था। इसमें अनोखी सुगन्ध आ रही थी।
    
इधर देवर्षि कह रहे थे कि ‘‘यह प्रसंग बहुत पूर्व का है। उन दिनों स्वर्गाधिपति इन्द्र ने एक महल निर्मित कराया था। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने अपनी समूची कुशलता उसमें डाल दी थी। इसके कक्ष, झरोखे, उद्यान, वापी सभी अद्भुत थे। सबसे आश्चर्य तो यह था कि इसकी जड़ता भी चैतन्य से आपूरित थी। इसके द्वार, इसमें रखी वस्तुएँ एक खास तरह के मानसिक संदेवनों से संचालित होती थीं। इसमें इच्छानुसार सभी विषय भोग उपस्थित हो जाते थे। अदृश्य देव-सेनायें इस अद्भुत महल की रक्षा के लिए सन्नद्ध थीं। देवशिल्पी अपनी कुशलता पर पुलकित थे। देवराज इन्द्र भी इसको ‘न भूतो न भविष्यति’ मान रहे थे।
    
जो भी स्वर्ग पधारता देवेन्द्र उसे अपना यह महल अवश्य दिखलाते और सबसे पूछते-ऐसा सुन्दर महल भी कहीं किसी ने बनाया है? इस प्रश्न के उत्तर में उच्चरित होने वाली महल की प्रशंसा उन्हें पुलकित कर देती। एक अवसर पर मैं स्वयं भी वहाँ पहुँचा। अपने स्वभाव के अनुसार देवेन्द्र ने अपने महल की चर्चा की और मुझे दिखाने ले गये। उनकी अपेक्षा थी कि मैं उसकी प्रशंसा में कुछ कहूँ, परन्तु मेरे आराध्य का संकेत देवेन्द्र को प्रबोध देने को था, सो मैंने उनसे कहा-देवाधिपति! यह सच है कि मैं लोकान्तरों में भ्रमण करता हूँ। मैंने शिल्प की कई विचित्रताएँ देखी हैं परन्तु अभी भी मुझमें अनुभव की कमी है। सत्य की सही व सटीक व्याख्या तो किसी ऐसे व्यक्ति से सम्भव है जो सबसे दीर्घायु हो। कौन है ऐसा? देवेन्द्र के कथन में त्वरा थी। उत्तर में मैंने इन महाभाग लोमश की चर्चा की।
    
अपनी समृद्धि, वैभव की प्रशंसा सुनने के लिए आतुर देवेन्द्र महर्षि लोमश से मिलने के लिए आकुल हो उठे। मैं उन्हें लेकर सुमेरू शिखर आया, उन दिनों महर्षि वहीं पर तप निरत थे। मेरा मन भी इन पूज्य चरणों के दर्शन का था। देवेन्द्र के साथ मैं सुमेरू शिखर पर पहुँचा। महर्षि आकाश की छाँव में सुमेरू शिखर पर तपोलीन थे। मैंने इन्हें प्रणाम किया। अंतर्यामी महर्षि को मेरे आगमन का हेतु पता चल गया था। फिर भी देवेन्द्र के संतोष के लिए मैंने उन्हें बताया कि ये स्वर्गाधिपति इन्द्र हैं। इन्होंने स्वर्गलोक में एक अनुपम महल का निर्माण किया है। ये जानना चाहते हैं कि क्या पहले भी किसी ने ऐसा महल बनाया था।
    
मेरे इस कथन पर महर्षि लोमश मुस्कराये और बोले-ये कौन से इन्द्र हैं देवर्षि? मैंने अपने सामने पाँच सौ इन्द्र एवं पचास ब्रह्म विनष्ट होते देखे हैं। महर्षि के इस कथन पर देवेन्द्र हैरान थे। उनकी हैरानी को दूर करते हुए मैंने उन्हें बताया-महर्षि लोमश अतिदीर्घायु हैं देवेन्द्र! इन्हें प्रभु का वर है कि एक ब्रह्मा के मरने पर इनके शरीर का एक लोम टूटेगा और जब तक शरीर की सभी लोम नहीं टूटेंगे, ये यूँ ही अमर रहेंगे। देवेन्द्र को मालूम था कि अखिल सृष्टि की आयु ब्रह्मा का एक दिन होती है और प्रलय रात्रि की अवधि उनकी एक रात्रि। ऐसे तीन सौ पैंसठ दिनों का वर्ष और फिर सौ वर्ष ब्रह्मा की आयु। उस पर भी ब्रह्मा के मरने पर इनका केवल लोम एक टूटता है और अभी तो शरीर के सारे लोम टूटेंगे।
    
महर्षि लोमश की आयु क्या होगी, यह सोचकर ही देवेन्द्र का सिर चकरा गया। उन्होंने लगभग काँपते हुए महर्षि से पूछा-भगवन्! आपको कभी अपने आश्रय की चिंता नहीं हुई। आपको किसी चाहत ने नहीं सताया। देवाधिपति के इस बाल कथन पर महर्षि हँसे और बोले-अरे! इस क्षणभंगुर जीवन के बारे में कितनी चिंता करनी इन्द्र! फिर मेरा योग-क्षेम तो प्रभु स्वयं करते हैं। जब से मुझे उनकी भक्ति का स्वाद मिला है, तब से मेरा मन न तो कुछ चाहता है, न सोचता है, न उसे किसी से द्वेष होता है, न कहीं रमता है और विषय भोगों में उसका उत्साह ही कहाँ।’’ नारद की बातों को सभी अनुभव कर रहे थे कि महर्षि सचमुच ही सूत्र का साकार स्वरूप हैं। जबकि स्वयं महर्षि के होठों पर मन्द हास्य था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १३)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

स्पष्ट है सभी दृश्य पदार्थ एक विशेष प्रकार के परमाणुओं का एक विशेष प्रकार का संयोग मात्र हैं। प्रत्येक परमाणु अत्यन्त तीव्र गति से गतिशील है। इस प्रकार हर पदार्थ अपनी मूल स्थिति में आश्चर्यजनक तीव्र गति से हरकत कर रहा है। पर खुली आंखें यह सब कुछ देख नहीं पातीं और वस्तुएं सामने जड़वत् स्थिर खड़ी मालूम पड़ती है। ऐसा ही अपनी पृथ्वी के बारे में भी होता है। भूमण्डल अत्यन्त तीव्र गति से (1) अपनी धुरी पर (2) सूर्य की परिक्रमा के लिए अपनी कक्षा पर (3) सौर मंडल सहित महासूर्य की परिक्रमा के पथ पर (4) घूमता हुआ लट्टू जिस तरह इधर उधर लहकता रहता है उस तरह लहकते रहने के क्रम पर (5) ब्रह्माण्ड के फलते फूलते जाने की प्रक्रिया के कारण अपने यथार्थ आकाश स्थान को छोड़ कर फैलता स्थान पकड़ते जाने की व्यवस्था पर—निरन्तर एक साथ पांच प्रकार की चालें चलती रहती हैं। इस उद्धत नृत्य को हम तनिक भी अनुभव नहीं करते और देखते हैं कि जन्म से लेकर मरण काल तक धरती अपने स्थान पर जड़वत् जहां की तहां पड़ी रही है। आंखों के द्वारा मस्तिष्क को इस सम्बन्ध में जो जानकारी दी जाती है और जैसी कुछ मान्यता आमतौर से बनी रहती है उसका विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि हम भ्रम अज्ञान की स्थिति में पड़े रहते हैं और कुछ का कुछ अनुभव करते रहते हैं, यह माया ग्रस्त स्थिति कही जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

जल में सूर्य चन्द्र के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं और लगता है कि पानी में प्रकाश पिण्ड जगमगा रहे हैं। हल लहर पर प्रतिबिम्ब पड़ने से हर लहर पर एक चन्द्रमा नाचता थिरकता मालूम पड़ता है। रेल में बैठने वाले देखते हैं कि वे अपने स्थान पर स्थिर बैठे हैं केवल बाहर तार के खंभे और पेड़ आदि भाग रहे हैं। क्या यह अनुभूतियां सत्य हैं।

रात्रि को स्वप्न देखते हैं। उस स्वप्नावस्था में दिखाई पड़ने वाला घटना क्रम यथार्थ मालूम पड़ता है। देखते समय दुख-सुख भी होता है। यदि यथार्थ में संदेह होता तो कई बार मुख से कुछ शब्द निकल पड़ना—स्वप्नदोष आदि हो जाने की बात क्यों होती? जागने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो अपना देखा गया था उसमें यथार्थ कुछ भी नहीं था। केवल कल्पनाओं की उड़ान को निद्रित मस्तिष्क ने यथार्थता अनुभव कर लिया। उतने समय की मूर्छित मनःस्थिति अपने को भ्रम जंजाल में फंसाये रह कर बेसिर पैर की उड़ानों में उड़ाती रही।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १९
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 1 मई 2021

👉 गुरु तेग बहादुर


देश धर्म संस्कृति के खातिर, अपना शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

जालिम औरंगजेब ने भारत में, अत्याचार फैलाया था।
कश्मीरी पंडितों को जबरन ही, मुसलमान बनावाया था।।
हिन्दू सिखों पर जुल्मों का जब, क्रूर कहर बरपाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म संस्कृति की रक्षा को, घर घर अलख जगाये थे।
धैर्य त्याग वैराग्य मूर्ति थे, ’हिन्द दी चादर’कहलाये थे।।
इस्लाम नहीं स्वीकारा गुरु ने, हंसकर शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म नहीं वह होता है जो, बल पर ही अभिमान करे।
मानवीय मूल्यों को न समझे,मानव का अपमान करे।।
क्रांतिकारी गुरु ने तब सबको,धर्म का मर्म सिखाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  
 
‘सीस दिया पर सी न किया’था, धर्म हेतु बलिदान था।
शाश्वत मूल्यों की रक्षा को, साहस का अभियान था।।
धर्म विरोधी क्रूर शासक को, निर्भय हो धूल चटाया था।।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  

उमेश यादव

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १२)

जिसे भक्ति मिल जाए, वो और क्या चाहे?

भगवन्नाम कीर्तन का सुरभित संगीत देवात्मा हिमालय के अणु-अणु में व्याप्त होता गया। भक्ति चेतना की सघनता से वहाँ उपस्थित ऋषियों, देवों एवं दिव्य विभूतियों के अंतस् स्पन्दित हो उठे। हिमालय की पावनता, भक्तिगाथा के निरन्तर श्रवण से और भी अधिक पावन हो रही थी। सब ओर विशुद्ध सत्त्व का भावमय उद्रेक हो रहा था। हिमालय के हिमाच्छादित शुभ्र शिखर मौन, नीरव समाधि में डूबे थे। निर्विचार भावमयता का अजस्र-अविरल-अदृश्य प्रवाह और भी कुछ सुनने को प्रेरित कर रहा था। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का महातेजस् भी आज रोमांचित था। उन्होंने भक्तिविह्वल हो सभी जनों को प्रणाम् करते हुए कहा- ‘‘भक्तिगाथा के श्रवण से अधिक और कोई सुख नहीं है। मेरा देवर्षि नारद से अनुरोध है कि हम सभी को अपने अगले सूत्र से अनुग्रहीत करें।’’

सभी ने इस कथन से अपनी समवेत सहमति जताई और कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने हम सभी के हृदयों के उद्गार व्यक्त किये हैं। हम सभी देवर्षि से आग्रह करते हैं-कुछ और कहें।’’ महर्षियों के इस आग्रह से देवर्षि की भावमय तल्लीनता में कुछ नवस्फुरण हुए। वे कहने लगे- ‘‘हे महर्षिजन! हम बड़भागी हैं जो आप सबके पावन सान्निध्य में भक्ति, भक्त एवं भगवान की दिव्य लीला का अवगाहन कर रहे हैं। भक्ति की महिमा ही कुछ ऐसी है कि जो इसे पा लेता है उसे और कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। मेरा आज का सूत्र भी कुछ यही कहता है-
‘यात्प्राप्य न किञ्चद्वाञ्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति’॥ ५॥
    
भक्ति को प्राप्त करने वाला कुछ और नहीं चाहता, कुछ और नहीं सोचता, किसी से द्वेष नहीं करता, कहीं अन्य नहीं रमता, विषय-भोगों के लिए उत्साही नहीं होता।
    
देवर्षि नारद के इस स्वर सूत्र में सभी के मन अनायास गुँथने लगे थे। उनके भावों में एक अनोखी मिठास घुलने लगी थी, तभी एक अनोखी घटना ने सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया। सबने देखा कि दूसरे सूर्य के समान परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज आकाश से अवतरित हो रहा था। हिमालय का यह पावन परिसर इस महासूर्य के प्रकाश से आपूरित हो जा रहा था। कुछ ही क्षणों में यह परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज मानव आकृति में परिवर्तित हो गया। अद्भुत स्वरूप था इन  महाभाग का। इनके सारे शरीर पर सघन रोमावली थी परन्तु प्रत्येक रोम ज्योति किरण की भाँति प्रकाशित था। कुछ ऐसा जैसे कि भगवान भुवन-भास्कर के शरीर को उनकी सहस्र-सहस्र किरणें घेरे हों।
    
एकबारगी सभी चमत्कृत थे, परन्तु सप्तर्षियों, कल्पजीवी महर्षि मार्कण्डेय एवं देवर्षि नारद को उन्हें पहचानने में अधिक देर न लगी। ये भगवान भोलेनाथ एवं माता जगदम्बा के वरद् पुत्र शिवस्वरूप महर्षि लोमश थे। सभी जानते थे कि सृष्टि में इनसे अधिक दीर्घायु और कोई भी नहीं। सबने उन्हें प्रणाम् किया। महर्षि लोमश ने बड़े हर्षित मन से उन्हें आशीष दिया और बोले-‘‘ऋषियों! मैं चिरकाल से समाधिस्थ था। समाधि में ही मुझे भगवान सदाशिव एवं माता पार्वती के दर्शन हुए। उन्होंने मुझे चेताया-लोमश! हिमालय के आँगन में अद्भुत, अपूर्व भक्तिगंगा बह रही है और तू समाधि में खोया है। बस भगवान महादेव का इंगित मुझे यहाँ ले आया और यहाँ आप सभी के दर्शन हुए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २९

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...