शनिवार, 11 जनवरी 2020
👉 भारत माता
भारत माता का आँचल हिमालय के श्वेत शिखरों से लेकर केरल की हरियाली तक फैला हुआ है। कन्याकुमारी के महासागर की तरंगों में इसकी तिरंगी आभा लहराती है। माता अपने आँचल में अपनी सभी एक सौ तीस करोड़ संतानों को समेटे हुए हैं। सभी जातियाँ, सभी वंश इसी की कोख से उपजे हैं। अपनी छाती चीरकर सभी के लिए पोषण की व्यवस्था जुटाती है। संतानों का सुख ही इस माँ का सुख है, संतानों का दुःख ही इसकी पीड़ा।
इस प्रेममयी जननी ने अपने पुत्रों के लिए, पुत्रियों के लिए बहुत कुछ सहा है। परायों के आघातों ने इसे कष्ट तो दिया, पर इसके धैर्य को डिगा नहीं पाये। गोरी, गजनी जैसे आक्रान्ताओं की मर्मान्तक चोटों को इसने न केवल सहा, बल्कि उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा भी किया। तैमूरलंग, चंगेजखान की क्रूरताओं को इसने बिना विचलित हुए बर्दाश्त किया। यहाँ तक कि इन सभी के वंशजों को अपनी संतान समझकर अपने आँचल की छाँव दी।
यह क्षमामयी माता बिलखी तो तब, तड़पी तो तब, जब अपनों ने ही मीरजाफर, जयचन्द बनकर इस पर वार किये। माँ की ममता को छला, इसकी भावनाओं को आहत किया, कोख को लजाया। आज भी जब इसके अपने बच्चे परायों के बहकावे में आकर अपनों को आतंकित करते हैं, क्रूरता के कुकृत्य करते हैं, तो इस धैर्यमयी का धीरज रो पड़ता है। समझ में नहीं आता कि यह किससे कहें, कैसे कहें अपनी पीड़ा? कहाँ बाँटें अपना दर्द।
हालाँकि भारत माता के सत्पुत्रों, सत्पुत्रियों की भी कमी नहीं है। वीर शिवाजी, महाप्रतापी राणाप्रताप, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इसके यश को दिगन्तव्यापी बनाने वाले विवेकानन्द, इस पर अपने सुखों को न्यौछावर करने वाले सुभाष, गाँधी, इसके दुःखों को मिटाने के लिए सदा-सर्वदा तप में रत युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा-इन मातृभक्तों ने ही तो इसे गुलामी से मुक्त कर गौरान्वित किया। आज माता ने फिर से अपनी संतानों की संवेदना को पुकारा है, जो इसकी कोख का मान रखें, इसके आँचल की अखण्डता बनाये रखें।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५८
इस प्रेममयी जननी ने अपने पुत्रों के लिए, पुत्रियों के लिए बहुत कुछ सहा है। परायों के आघातों ने इसे कष्ट तो दिया, पर इसके धैर्य को डिगा नहीं पाये। गोरी, गजनी जैसे आक्रान्ताओं की मर्मान्तक चोटों को इसने न केवल सहा, बल्कि उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा भी किया। तैमूरलंग, चंगेजखान की क्रूरताओं को इसने बिना विचलित हुए बर्दाश्त किया। यहाँ तक कि इन सभी के वंशजों को अपनी संतान समझकर अपने आँचल की छाँव दी।
यह क्षमामयी माता बिलखी तो तब, तड़पी तो तब, जब अपनों ने ही मीरजाफर, जयचन्द बनकर इस पर वार किये। माँ की ममता को छला, इसकी भावनाओं को आहत किया, कोख को लजाया। आज भी जब इसके अपने बच्चे परायों के बहकावे में आकर अपनों को आतंकित करते हैं, क्रूरता के कुकृत्य करते हैं, तो इस धैर्यमयी का धीरज रो पड़ता है। समझ में नहीं आता कि यह किससे कहें, कैसे कहें अपनी पीड़ा? कहाँ बाँटें अपना दर्द।
हालाँकि भारत माता के सत्पुत्रों, सत्पुत्रियों की भी कमी नहीं है। वीर शिवाजी, महाप्रतापी राणाप्रताप, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इसके यश को दिगन्तव्यापी बनाने वाले विवेकानन्द, इस पर अपने सुखों को न्यौछावर करने वाले सुभाष, गाँधी, इसके दुःखों को मिटाने के लिए सदा-सर्वदा तप में रत युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा-इन मातृभक्तों ने ही तो इसे गुलामी से मुक्त कर गौरान्वित किया। आज माता ने फिर से अपनी संतानों की संवेदना को पुकारा है, जो इसकी कोख का मान रखें, इसके आँचल की अखण्डता बनाये रखें।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५८
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 4)
Q.4. I have already taken Diksha (initiation) from a Guru. Will it be proper for me to seek another Guru?
Ans. There are no restrictions on choosing more than one Guru. It all depends on the type and level of achievement sought for. Ram had Vashistha as his family Guru and Vishwamitra for learning of martial and other branches of knowledge. Dattatreya is known for having twenty four Gurus. Durvasa was family-Guru of Krishna and Brahaspati was his Guru in respect of learning the specific branches of knowledge.
In schools, with the change in class, teachers also change. Village Purohit, Teerth Purohit, Family Purohit, Dikcha Purohit, Sadhana Purohit are all different. They do not contradict but supplement each other.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 48
Ans. There are no restrictions on choosing more than one Guru. It all depends on the type and level of achievement sought for. Ram had Vashistha as his family Guru and Vishwamitra for learning of martial and other branches of knowledge. Dattatreya is known for having twenty four Gurus. Durvasa was family-Guru of Krishna and Brahaspati was his Guru in respect of learning the specific branches of knowledge.
In schools, with the change in class, teachers also change. Village Purohit, Teerth Purohit, Family Purohit, Dikcha Purohit, Sadhana Purohit are all different. They do not contradict but supplement each other.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 48
👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ४)
(४) विज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक हैं। उसने मानवी सुख सुविधाओं में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि की है। पर यह भी सही है कि उसके दुरुपयोग से होने वाली हानियाँ भी कम नहीं उठानी पड़ रही हैं। अस्त्रों के उत्पादन में विशेषतया गैसें, किरणें एवं अणु विस्फोटजन्य अस्त्रों ने तो संसार के अस्तित्व को ही संकट में डालने वाली विभीषिका उत्पन्न कर दी है। यदि यह शोध, आविष्कार सृजनात्मक प्रयोजनों तक ही सीमित रहे, तो उसका प्रतिफल धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाये जा रहे हैं, यदि उन्हें मानवी अभावों और शोक-सन्तापों की निवृत्ति में लगा दिया जाय, तो उसका प्रतिफल इस संसार को स्वर्गोपम बनाने में हो सकता है। समुद्र के खारे पानी से मीठा जल प्राप्त किया जा सकता है। जमीन के नीचे बहने वाली विशाल नदियों का जल धरती पर लाया जा सकता है और सारी दुनियाँ सचमुच शस्यश्यामला बन सकती है। कृषि, पशुपालन, बागवानी, वन सम्पदा, स्वास्थ्य सम्वर्धन और मस्तिष्कीय विकास की दिशा में विज्ञान को अभी बहुत काम करना बाकी है। प्रकृति के प्रकोपों से लोहा लेने के साधन जुटाने में, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, भूकम्प, बाढ़, तूफान, शीत-ताप की असहनीयता का सामना करने योग्य शक्ति का उपार्जन हो सकता है। वाहनों को सरल एवं सस्ता बनाया जा सकता है, संचार साधनों के विस्तार की अभी बहुत गुंजायश है।
(५) शासन सत्ता-राज सत्ता जिनके हाथ में इन दिनों है अथवा अगले दिनों आने वाली है, उन्हें संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र या वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर समस्त विश्व में समान रूप से सुख शान्ति की बात सोचनी होगी और समस्त संसार को एक परिवार बनाने की नीति अपना कर प्रकृति प्रदत्त साधनों एवं मानवी उपार्जन को समान रूप से सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध करना होगा। युद्धों की भाषा में सोचना बन्द कर न्याय का आधार स्वीकार करना होगा। वर्गभेद और वर्णभेद की जड़े उखाड़नी होंगी।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(५) शासन सत्ता-राज सत्ता जिनके हाथ में इन दिनों है अथवा अगले दिनों आने वाली है, उन्हें संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र या वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर समस्त विश्व में समान रूप से सुख शान्ति की बात सोचनी होगी और समस्त संसार को एक परिवार बनाने की नीति अपना कर प्रकृति प्रदत्त साधनों एवं मानवी उपार्जन को समान रूप से सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध करना होगा। युद्धों की भाषा में सोचना बन्द कर न्याय का आधार स्वीकार करना होगा। वर्गभेद और वर्णभेद की जड़े उखाड़नी होंगी।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
शुक्रवार, 10 जनवरी 2020
👉 माँ
गाँव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे।
तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।
सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।
पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।
सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया -
"गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा -
"नहीं,
यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।
सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।
पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।
सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया -
"गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा -
"नहीं,
यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
👉 स्वस्थ मन का रहस्य
जो अपनी जिन्दगी में कुछ करने में असफल रहते हैं, वे प्रायः आलोचक बन जाते हैं। दूसरों की कमियाँ देखना, निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग अपनी कमियों -कमजोरियों का दोष भी दूसरों के सिर मढ़ देते हैं। सच यही है कि जीवन पथ पर चलने में जो असमर्थ हैं, वे राह के किनारे खड़े होकर औरों पर पत्थर फेंकने लगते हैं।
दरअसल यह मन की रोगी दशा है। मानसिक ज्वर या मन की रोगग्रस्त स्थिति में ही मनुष्य ऐसे काम करता है। जब भी किसी की निन्दा का विचार मन में उठे तो जानना कि अब हम भी इसी रोग से पीड़ित हो रहे हैं। ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निन्दा में संलग्न नहीं होता। यहाँ तक कि जब दूसरे उसकी निन्दा कर रहे होते हैं, तो वह उन पर दया ही अनुभव करता है। शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।
लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाएँ होती हैं, लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते। उत्तर में लोकमान्य मुस्कराए और बोले- निन्दा ही क्यों, कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूछने वाले की आँखों में गहराई से झाँका और बोले - यह है तो मेरी जिन्दगी का रहस्य, पर मंै आपका बता देता हूूँ। निन्दा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान् का दर्जा देते हैं। लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह सच यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान्। मैं तो एक इन्सान हूँ जिसमें थोड़ी कमियाँ है और थोड़ी अच्छाईयाँ और मैं अपनी कमियों को दूर करने एवं अच्छाईयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ।
एक बात और भी है- लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढ़ाई। जब अपनी जिन्दगी को मैं ही अभी ठीक से नहीं समझ पाया, तो भला दूसरे क्या समझेंगे। इसलिए जितनी झूठ उनकी निन्दा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है। इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न करके अपने आपको और अधिक सँवारने-सुधारने की क ोशिश करता रहता हूँ। सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया। उसे अनुभव हुआ कि स्वस्थ मन वाला व्यक्ति न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी निन्दा अथवा प्रशंसा से प्रभावित होता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५७
दरअसल यह मन की रोगी दशा है। मानसिक ज्वर या मन की रोगग्रस्त स्थिति में ही मनुष्य ऐसे काम करता है। जब भी किसी की निन्दा का विचार मन में उठे तो जानना कि अब हम भी इसी रोग से पीड़ित हो रहे हैं। ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निन्दा में संलग्न नहीं होता। यहाँ तक कि जब दूसरे उसकी निन्दा कर रहे होते हैं, तो वह उन पर दया ही अनुभव करता है। शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।
लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाएँ होती हैं, लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते। उत्तर में लोकमान्य मुस्कराए और बोले- निन्दा ही क्यों, कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूछने वाले की आँखों में गहराई से झाँका और बोले - यह है तो मेरी जिन्दगी का रहस्य, पर मंै आपका बता देता हूूँ। निन्दा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान् का दर्जा देते हैं। लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह सच यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान्। मैं तो एक इन्सान हूँ जिसमें थोड़ी कमियाँ है और थोड़ी अच्छाईयाँ और मैं अपनी कमियों को दूर करने एवं अच्छाईयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ।
एक बात और भी है- लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढ़ाई। जब अपनी जिन्दगी को मैं ही अभी ठीक से नहीं समझ पाया, तो भला दूसरे क्या समझेंगे। इसलिए जितनी झूठ उनकी निन्दा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है। इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न करके अपने आपको और अधिक सँवारने-सुधारने की क ोशिश करता रहता हूँ। सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया। उसे अनुभव हुआ कि स्वस्थ मन वाला व्यक्ति न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी निन्दा अथवा प्रशंसा से प्रभावित होता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५७
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 3)
Q.3. Is Guru mandatory for Gayatri worship?
Ans. Gayatri is also known as Guru-Mantra i.e. to achieve a higher level of spiritual accomplishment, one needs an experienced Guru as a spiritual guide and protector. Let us draw an analogy from other fields. Some fields of learning require only books, whereas for others like music, crafts, etc. direct help of an expert is needed. Similarly, though the daily rituals of Gayatri worship are quite simple, for higher levels of achievement when the worshipper, (depending upon his own personal spiritual status acquired through previous births) faces several ups and downs, an experienced Guru is needed just as a doctor is required during treatment of a disease. Thus, though one can take up Gayatri worship without a Guru, initiation by a proper experienced Guru is advisable enlightened spiritul master is necessary for receiving instruction and direction for accelerating one’s spiritual growth. The spiritual evolution of the soul is a prolonged process continuing through countless cycles of births and deaths. Sought in a hurry, an inexperienced person posing as Guru may do more harm than good to the disciple.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
Ans. Gayatri is also known as Guru-Mantra i.e. to achieve a higher level of spiritual accomplishment, one needs an experienced Guru as a spiritual guide and protector. Let us draw an analogy from other fields. Some fields of learning require only books, whereas for others like music, crafts, etc. direct help of an expert is needed. Similarly, though the daily rituals of Gayatri worship are quite simple, for higher levels of achievement when the worshipper, (depending upon his own personal spiritual status acquired through previous births) faces several ups and downs, an experienced Guru is needed just as a doctor is required during treatment of a disease. Thus, though one can take up Gayatri worship without a Guru, initiation by a proper experienced Guru is advisable enlightened spiritul master is necessary for receiving instruction and direction for accelerating one’s spiritual growth. The spiritual evolution of the soul is a prolonged process continuing through countless cycles of births and deaths. Sought in a hurry, an inexperienced person posing as Guru may do more harm than good to the disciple.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
गुरुवार, 9 जनवरी 2020
👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ३)
(३) कला मंच से भाव स्पन्दन-कला मंच में चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत आदि आते हैं। संगीत विद्यालय हर जगह खुलें। ध्वनियाँ सीमित हो, बाजे भी सीमित हो, सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम हो, जो वर्षों में नहीं महीनों में सीखे जा सकें। प्रचण्ड प्रेरणा भरे गीतों का प्रचलन इन विद्यालयों द्वारा हो और हर्षोत्सवों पर प्रेरक गायनों की ही प्रधानता रहे। अग्नि गीतों की पुस्तिकाएँ सर्वत्र उपलब्ध रहें। संगीत सम्मेलन, संगीत गोष्ठियाँ, कीर्तन, प्रवचन, सहगान, क्रिया गान, नाटक, लोकनृत्य जैसे अगणित मंच मण्डप सर्वत्र बनें और वे लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें।
चित्र प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा काम है। कैलेण्डर तथा दूसरे चित्र आजकल खूब छपते, बिकते है उनमें प्रेरक प्रसंगों को जोड़ा जा सके तो उससे जन-मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है। इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए। आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना हो, तो चित्रकार उस तरह की तस्वीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे है जिनमें प्रतिभा, पूँजी, सूझबूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
यंत्रीकरण के साथ कला का समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए, सभी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते है, उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन-मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें, तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
चित्र प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा काम है। कैलेण्डर तथा दूसरे चित्र आजकल खूब छपते, बिकते है उनमें प्रेरक प्रसंगों को जोड़ा जा सके तो उससे जन-मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है। इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए। आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना हो, तो चित्रकार उस तरह की तस्वीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे है जिनमें प्रतिभा, पूँजी, सूझबूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
यंत्रीकरण के साथ कला का समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए, सभी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते है, उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन-मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें, तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 आध्यात्मिक दृष्टि
देह पर जो रुक जाय वह दृष्टि आध्यात्मिक नहीं हो सकती। दृष्टि में आध्यात्मिकता हो तो समझ में आता है कि शरीर कितना पारदर्शी है। सचमुच शरीर कितना ही ठोस क्यों न नजर आए पर आध्यात्मिक आँखों से वह कभी नहीं छिपता जो कि देह के पीछे है, प्राण और चेतना का आधार है।
हाँ आँखें ही न हों तो और बात है। आँखें न होने पर और चीजों की क्या कहें, सूरज तक नहीं दिखाई देता। सब खेल आँखों का है। विचार और तर्क से भला कोई प्रकाश को जानता है? वास्तविकता आँख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती। प्रकाश के अनुभव के लिए आँख चाहिए। आत्मिक तत्त्व के अनुभव के लिए भी आँख चाहिए। चाहिए एक अन्तर्दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, दूर दृष्टि जिसका समावेश आध्यात्मिक दृष्टि में है। यह है तो सब है। अन्यथा न प्रकाश है और न परमात्मा है।
बात अनुभव की है, यदि कोई दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे सबसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के पार झांकना होता है। जहाँ तक और जितना हम स्वयं की गहराई में झांक पाते हैं, वहीं तक अन्य देह, भी पारदर्शी हो पाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि जितनी परिष्कृत होती है, अनुभव भी उतने ही पारदर्शी हो जाते हैं।
जितनी दूर तक हम अपनी जड़ता में चैतन्य का अविष्कार कर पाते हैं, उतनी ही दूर तक हमारे लिए समस्त जड़ जगत् चैतन्य की चेतना से भर जाता है। और तब आता है यह अनुभव कि जो मैं हूँ उसी का विस्तार यह जगत् है। जिस दिन हम सम्पूर्ण समग्रता में अपने चैतन्य को जान लेते हैं, उसी दिन यह जगत् ब्रह्ममय हो जाता है। इस क्षुद्र में कौन विराट् विद्यमान है? कौन है वह चैतन्य, जिसकी चेतना देह और जीवन का आधार है? इन प्रश्नों के हल आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं मिलते। जिस दृष्टि से ‘पर’ देखा जाता है, वही दृष्टि स्वयं को भी देखने में समर्थ है। बस केवल दृष्टि में आध्यात्मिकता का समोवश होना चाहिए। ऐसा होते ही घटित होती है- एक क्रान्ति। फिर जैसे कोई अवरुद्ध झरना फूट पड़े, ऐसे ही आध्यात्मिक अमृत की चैतन्य धारा जीवन से समस्त जड़ता के अंधेरे को बहा ले जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५६
हाँ आँखें ही न हों तो और बात है। आँखें न होने पर और चीजों की क्या कहें, सूरज तक नहीं दिखाई देता। सब खेल आँखों का है। विचार और तर्क से भला कोई प्रकाश को जानता है? वास्तविकता आँख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती। प्रकाश के अनुभव के लिए आँख चाहिए। आत्मिक तत्त्व के अनुभव के लिए भी आँख चाहिए। चाहिए एक अन्तर्दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, दूर दृष्टि जिसका समावेश आध्यात्मिक दृष्टि में है। यह है तो सब है। अन्यथा न प्रकाश है और न परमात्मा है।
बात अनुभव की है, यदि कोई दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे सबसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के पार झांकना होता है। जहाँ तक और जितना हम स्वयं की गहराई में झांक पाते हैं, वहीं तक अन्य देह, भी पारदर्शी हो पाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि जितनी परिष्कृत होती है, अनुभव भी उतने ही पारदर्शी हो जाते हैं।
जितनी दूर तक हम अपनी जड़ता में चैतन्य का अविष्कार कर पाते हैं, उतनी ही दूर तक हमारे लिए समस्त जड़ जगत् चैतन्य की चेतना से भर जाता है। और तब आता है यह अनुभव कि जो मैं हूँ उसी का विस्तार यह जगत् है। जिस दिन हम सम्पूर्ण समग्रता में अपने चैतन्य को जान लेते हैं, उसी दिन यह जगत् ब्रह्ममय हो जाता है। इस क्षुद्र में कौन विराट् विद्यमान है? कौन है वह चैतन्य, जिसकी चेतना देह और जीवन का आधार है? इन प्रश्नों के हल आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं मिलते। जिस दृष्टि से ‘पर’ देखा जाता है, वही दृष्टि स्वयं को भी देखने में समर्थ है। बस केवल दृष्टि में आध्यात्मिकता का समोवश होना चाहिए। ऐसा होते ही घटित होती है- एक क्रान्ति। फिर जैसे कोई अवरुद्ध झरना फूट पड़े, ऐसे ही आध्यात्मिक अमृत की चैतन्य धारा जीवन से समस्त जड़ता के अंधेरे को बहा ले जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५६
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 2)
Q.2. What is the truth in the belief that God Brahma, and rishis Vashistha and Vishwamitra had laid a curse (shaap) that success will elude the practitioner unless he/ she recites certain verses (shlokas)?
Ans. That this is baseless, is established by the following references from the scriptures:-
a) Gayatri is well known as the inherent creative power of God. She is also at places referred metaphysically as spouse of God Brahma. Scriptures say that with the help of Gayatri, He (Brahma) created the universe and expounded the doctrines of Vedas (the four faces of Brahma symbolize the four streams of Vedic revelation).
b) Vashistha inflicted a crushing defeat on Vishwamitra with the help of Nandini- the symbolical cow which fulfils all wishes and is regarded as the counterpart of Kamdhenu of heaven (Swarg).
c) To Vishwamitra goes the credit of untravelling the mystery of Gayatri. Not only he practised Gayatri for a very long period with strictest of self-discipline, and acquired immense occult powers therefrom, but also developed the expertise and methodology for invocation of divine powers through practice of Gayatri Sadhana.
From the aforesaid, it is evident that the great spiritual personalities of yore had used the power of Gayatri to fulfil their objectives. There is, therefore, no logic in assuming that they had cursed it and deprived other human beings of its fruits.
It appears that the feudal lords of the medieval ages, propounded their independent cults and to establish their own doctrines found it necessary to discredit the traditional practice of Gayatri. The concocted story of ‘curse on Gayatri’ was the easiest and simplest way of striking at the roots of faith and confidence of the masses. This could have been one reason behind this baseless assumption. Otherwise, who in this universe has the capability to put a curse on divine manifestations like the sun, clouds, air, lightening, the earth etc. Gayatri is, in essence, the primordial energy of the Almighty. Hence, all are free to utilize it without any restrictions or apprehensions whatsoever. At the most, the concept of the so-called “curse” may be symbolically indicative of the need for a Guru of the status of Vashistha and Vishwamitra, in absence of whom success eludes the worshipper.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
Ans. That this is baseless, is established by the following references from the scriptures:-
a) Gayatri is well known as the inherent creative power of God. She is also at places referred metaphysically as spouse of God Brahma. Scriptures say that with the help of Gayatri, He (Brahma) created the universe and expounded the doctrines of Vedas (the four faces of Brahma symbolize the four streams of Vedic revelation).
b) Vashistha inflicted a crushing defeat on Vishwamitra with the help of Nandini- the symbolical cow which fulfils all wishes and is regarded as the counterpart of Kamdhenu of heaven (Swarg).
c) To Vishwamitra goes the credit of untravelling the mystery of Gayatri. Not only he practised Gayatri for a very long period with strictest of self-discipline, and acquired immense occult powers therefrom, but also developed the expertise and methodology for invocation of divine powers through practice of Gayatri Sadhana.
From the aforesaid, it is evident that the great spiritual personalities of yore had used the power of Gayatri to fulfil their objectives. There is, therefore, no logic in assuming that they had cursed it and deprived other human beings of its fruits.
It appears that the feudal lords of the medieval ages, propounded their independent cults and to establish their own doctrines found it necessary to discredit the traditional practice of Gayatri. The concocted story of ‘curse on Gayatri’ was the easiest and simplest way of striking at the roots of faith and confidence of the masses. This could have been one reason behind this baseless assumption. Otherwise, who in this universe has the capability to put a curse on divine manifestations like the sun, clouds, air, lightening, the earth etc. Gayatri is, in essence, the primordial energy of the Almighty. Hence, all are free to utilize it without any restrictions or apprehensions whatsoever. At the most, the concept of the so-called “curse” may be symbolically indicative of the need for a Guru of the status of Vashistha and Vishwamitra, in absence of whom success eludes the worshipper.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
मंगलवार, 7 जनवरी 2020
👉 अनुभव और समझ
एक बहुत विशाल पेड़ था। उस पर कई हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कह कर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया।
ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’
एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’
सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’
किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।
एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’
दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’
सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’
सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।
ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’
एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’
सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’
किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।
एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’
दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’
सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’
सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।
👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग २)
(२) शिक्षा एवं साहित्य-व्यक्ति की समस्त गरिमा उसकी मनःस्थिति पर, विचार प्रक्रिया पर निर्भर है। इस जीवन प्राण के मर्म स्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के निर्माण में शिक्षा और साहित्य की महत्ता सर्वविदित है। युग परिवर्तन की इन घड़ियों में दोनों माध्यमों का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए।
सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?
साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?
साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)
सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...


















