गुरुवार, 16 अगस्त 2018

👉 दुष्टों से प्रेम, दुष्टता से युद्ध

🔷 बीमारी और बीमार एक ही वस्तु नहीं हैं। यदि डॉक्टर बीमारी के साथ बीमार को भी मार डाले, तो उसकी बुद्धि को क्या कहें?

🔶 आप दुष्टता और दुष्ट के बीच अंतर करना सीखिए। कोई भी प्राणी नीच, पतित या पापी नहीं है, तत्वतः वह पवित्र ही है। भर्म, अज्ञान और बीमारी के कारण वह कुछ का कुछ समझने लगता है। इस बुद्धिभ्रम का ही इलाज करना है। बीमारी को मारना है, बीमार को बचाना है।

🔷 आप तो दुष्टता से लड़ने को तैयार रहिए, फिर वह चाहे दूसरों में हो या अपने अंदर। आप पापी व्यक्तियों को निष्पाप करने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद चारों उपाय कीजिए, पर उन पापियों से किसी प्रकार का निजी राग-द्वेष मत रखिए।

👉 Affection with the wicked, Struggle with the wickedness

🔷 Sick and sickness are two different things. What to say about the doctor who kills the patient along with the ailment!

🔶 Try to distinguish between the wicked and the wickedness. Not even a single creature is mean, fallen and sinner, he is sacred at the core. Misinterpretation, ignorance and illusion make him understand things wrongfully. We've to kill this ill-mindedness and save that ill person.

🔷 Be ready to battle with the wickedness, whether it is inside others or in ourselves. Do use all the possible ways to curb the wickedness and make the sinners sacred, but never rear any kind of personal jealousy or hatred for them.

👉 तोड़ो नहीं जोड़ो

🔶 मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था। इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था। अंगुलिमाल एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगो को मारकर उनकी उँगलियाँ काट लेता था और फिर उनकी माला बना`कर उसे गले में पहनता था। इसलिए लोगो ने उसका नाम यही रख दिया। लोगो को लूट लेना और उनकी जान ले लेना उसके और उसके आदमियों का बाएं हाथ का खेल था। लोग उस से डरते थे और उसका नाम लेने से लोगो को प्राण सूख जाते थे।

🔷 एक बार भगवान् बुद्ध उधर से होकर निकले उपदेश देते हुए वो लोगो के पास पहुंचे तो उन्हें लोगो ने कहा आप यंहा से चले जाएँ क्योंकि आप यंहा सुरक्षित नहीं है यंहा एक डाकू है जो किसी के आगे नहीं झुकता तो इस पर भी भगवान् बुद्ध ने अपना इरादा नहीं बदला और वो बेफिक्री से इधर उधर घूमने लगे। डाकू को इसका पता चला तो वो झुंझलाकर उनके पास आया।

🔶 बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को  पकड़ नहीं पा रहा था।

🔷 थक हार कर उसने कहा- “रुको” बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कब का रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे।

🔶 अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ।

🔷 बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा।

🔶 अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”।

🔷 बुद्ध ने उस से कहा क्यों भाई सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड लाओगे। उसके लिए यह काम कोन सा मुश्किल था वह भाग कर गया और चार पत्ते तोड़ लाया तो बुद्ध ने उस से कहा कि क्या अब तुम इन्हें जहाँ से तोड़ कर लाये हो क्या उसी जगह इन्हें वापिस लगा सकते हो इस पर डाकू ने कहा यह तो संभव ही नहीं है।

🔶 तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए ?

🔷 बुद्ध ने कहा ” भैया जब जानते हो कि टूटा हुआ जुड़ता नहीं है तो फिर तोड़ने का काम ही क्यों करते हो, यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मृत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है।

🔶 बुद्ध की ये बात सुनते ही उसकी बोध हो गया और वह ये गलत धंधा छोड़ कर बुद्ध की शरण में आ गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 August 2018


👉 The Art of Sadhana

🔷 The essence of sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own covert indwelling divine attributes. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine nature is awakened and activated, we realize that we are repositories of supernormal energies (riddhi and siddhi). The sole aim of sadhana is to activate these dormant attributes through a focused and dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔶 A farmer understands the significance of sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day in and day out throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he nurtures it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting.

🔷 The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipments comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste. He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific period of time to ripen and so he has to wait patiently till then. He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His sadhana of farming continues single-mindedly. He does encounter obstacles but he overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature.

🔶 This is sadhana of a farmer which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no fatigue, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of sadhana from the farmer.

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 28)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 साधारणतया इस विद्युत प्रवाह का एक बहुत छोटा अंश ही काम आता है। उतना, जिससे हलकी-फुलकी दिनचर्या चलती रहे। आजीविका उपार्जन, उसके परिपालन, निद्रा-जागृति तथा छिटपुट काम ही इसके द्वारा संपन्न हो पाते हैं। क्रियाशील उतना ही अंश रहता है जो काम में आता रहता है। उथली साँस लेने वालों के फेफड़ों का थोड़ा ही अंश काम में आता रहता है। फलतः शेष अंश निर्बल-दुर्बल बना, किसी प्रकार अपना अस्तित्व भर बनाए रहता है।

🔶 आरामतलब लोगों के शरीर का अधिकांश भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है और उस दुर्बलता का लाभ उठाकर वहाँ कई प्रकार के रोगविषाणु जड़ जमा लेते हैं। वे काया को जीर्ण बनाकर गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं। यही बात मस्तिष्क के बारे में भी होती है। मनुष्य की इच्छा-आकांक्षाएँ सीमित होती हैं। वह उन्हीं को पूरी करने के लिए कल्पना-जल्पना करता रहता है। मन और बुद्धि का एक छोटा अंश ही इस प्रयोजन के लिए खपता है। जिन क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पाता, वे प्रसुप्त स्थिति में चली जाती हैं और लगभग मूर्च्छित स्थिति में किसी कोने में छिपी पड़ी रहती हैं।
  
🔷 मानवी विद्युत भंडार की असीमितता, उपयोगिता और उसकी महती क्षमता का यदि विज्ञानसम्मत आकलन किया जा सके, तो प्रतीत होगा कि वह इतनी अधिक है कि जिसके सहारे अपना और दूसरों का इतना हितसाधन हो सकता है, जितना कि कभी-कभी मनुष्यकृत ऐतिहासिक चमत्कारों के विवरणों में पढ़कर हतप्रभ हो जाना पड़ता है। प्रचलित भाषा में इन्हें दैवी वरदानों के नाम से पुकारा जाता है, ऋद्धि-सिद्धियों का भंडार कहा जाता है अथवा दिव्य विभूतियों के नाम से उनकी चर्चा होती रहती है। ऐसे संदर्भ भी प्राय: सही ही होते हैं, अतः मानना पड़ता है कि मनुष्य वस्तुतः असीम शक्तियों का भंडार है। इसी बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि वह तप के बल पर देवताओं से उच्चस्तरीय विभूति-वरदान उपलब्ध कर सकता है, किंतु वास्तविकता इतनी ही है कि जो कुछ उभरता है, भीतर से ही उफनकर ऊपर आया हुआ होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 37

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 4)

🔷 जिस साधक में तमोगुण की प्रधानता रहती है उसे अन्य प्रकार की विपत्तियों में फँसना पड़ता है। सबसे पहले साधक के हृदय में ऐसा विचार उठता है कि - “मैं दुर्बल, पापी, घृणित, अज्ञानी, अकर्मण्य हूँ। मैं जिस किसी को देखता हूँ वह सभी मुझ से ऊँचे जान पड़ते हैं। मैं सबसे नीच हूँ। भगवान को हमारे जैसों की आवश्यकता नहीं भगवान मुझे शरण में लेकर क्या करेंगे” आदि आदि। पर कुछ साधन भजन करने से उसे कुछ शांति मिल गई तो वह सोचने लगता है- “चलो सारा झंझट मिट गया, मुझे शांति तो प्राप्त हो गई, अब इससे ज्यादा क्या करना है।” इस प्रकार विचार करके वह सब तरह के कर्मों से मुँह मोड़ कर आनन्द करना ही अपना लक्ष्य बना लेता है।

🔶 ऐसे साधक को यह समझना चाहिये कि वह भी परब्रह्म का अंश है और आदि शक्ति ही उसके हृदय में अवस्थान करके समस्त कार्यों का संचालन करती है। सर्वशक्तिमान भगवान की लीला तरह-तरह की होती है। किसी एक लीला को ही सब कुछ समझकर उदासीन होकर बैठ जाना साधक के लिये प्रशंसनीय नहीं है। उसे भगवान के इस वचन पर ध्यान देना चाहिये-

🔷 न मे पार्थोऽस्ति कर्तव्यं त्रिषुलोकेषु किंचन।
नानावाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एं च कर्मणि॥

🔶 अर्थात्- “मुझे इस संसार में कोई वस्तु या कार्य अप्राप्त नहीं है तो भी मैं सदा काम में लगा रहता हूँ।” क्योंकि साधारण लोगों को उचित मार्ग दिखलाने के लिये वैसा करना परमावश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.10

👉 उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनें

🔷 आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुंब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा। पहुँचा होगा—पर हमें उससे कुछ अधिक संतोष नहीं हुआ।

🔶 हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें, स्वाध्यायशील बनें, मनन चिंतन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकांश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्म निर्माण पर विश्वास कर सके और न लोक निर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके।

🔷 हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना, समझा। मंत्र का जादू देखने के लिए वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चले जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझकर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1966 पृष्ठ 39-40

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

👉 कंकर से तो शंकर बने

🔷 कंकर से तो शंकर बने और कंकर से ही काबा
     इनका स्वरुप सिर्फ एक जैसे यह मन्नत का धागा

🔶 बरसों से हम बहते आये औ सदियों तक है बहना
     नाहक पाले झूठा भरम नकली निकला ये गहना

🔷 पत्थरों पर यह गहरी धारें संचित संस्कारों की रेखाएं
     जैसे बाँचती हो कर्मफल मुखरित मौन मुस्कुराये

🔶 सिमटे दिखते आस-पास कुटुंब और रिश्ते - नाते
     सांसों के अनूठे मेले को ज्यादातर नहीं निभा पाते

🔷 मौन मनोरथ श्रंखला ज्यों जीवन प्रवाह समझाती
     काल की गहन परतों को है स्वतः खोलती जाती

🔶 रे ! मनुष्य कुछ तो सीख इन बहती लहरों से आज
     सांसों की इस सरगम में बजाना खूब अपना साज

🔷 ना रहना कठोर हमेशा यहाँ पत्थर घिस हैं जाते
     बड़े बड़े सुरमा जहाँ से सिर्फ खाली हाथ जाते

🔶 बनाना तुम सिर्फ धारा जो स्वयं है बहती जाती
     अपने अप्रतिम जोश से पत्थरों को चीरती जाती

🔷 समय सिर्फ धार देखता ना सराहे निरर्थक प्रयास
     रे पत्थर तुम खूब सरकना ना छोड़ना कभी आस 

विचार क्रांति अभियान  शांतिकुंज हरिद्वार

👉 आज का सद्चिंतन 14 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 27)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 कण-कण में निरंतर गतिशील यह प्रक्रिया इतनी द्रुतगामी होती है कि उसकी अनवरत क्रियाशीलता को देखकर-आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इतना बड़ा कायातंत्र इतने छोटे घटकों से मिलकर बना है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है। उससे भी अधिक आश्चर्य इस बात का है कि प्रत्येक जीवकोष छोटे रूप में लगभग उसी क्रियाकलाप का अनुसरण करता रहता है, जो अपने सौर मंडल में गतिशील रहता है। यह सब कैसे होता है? शक्ति कहाँ से आती है?

🔶 साधन कहाँ से जुटते हैं? इन सबका उत्तर काय-कलेवर के कण-कण में संव्याप्त और गतिशील विद्युत प्रवाह की ओर संकेत करके ही दिया जा सकता है। चूँकि घटक अत्यंत छोटे हैं और उनमें काम करने वाली सचेतन स्तर की विद्युत अत्यल्प मात्रा में आँकी जाती है, इसलिए वैसा कुछ अनुभव नहीं होता जैसा कि बिजली की अँगीठी या तारों को छूते समय होता है। फिर भी उनमें उपस्थित शक्ति की प्रचंडता सुनिश्चित है। यदि ऐसा न होता, तो असंख्य लघु घटकों से विनिर्मित काया का प्रत्येक घटक, अपने-अपने कामों को इतनी मुस्तैदी से, इतनी नपी-तुली सही रीति से न कर पाता।
  
🔷 आकलनकर्ताओं ने हिसाब लगाया है कि यदि शरीर के छोटे-बड़े अनेकानेक अंग-प्रत्यंगों की बिजली को एकत्रित किया जा सके, तो उसकी शक्ति किसी विशालकाय बिजलीघर से कम न होगी। इतनी आपूर्ति किए बिना, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत, जो असंख्य क्षेत्रों की अनेकानेक स्तर की गतिविधियाँ बिना रुके अनवरत रूप से काम करती रहती हैं, उनका इस प्रकार क्रियाशील रह सकना संभव न हुआ होता। औसत पाँच फुट छह इंच का यह कलेवर अपने भीतर इतनी शक्ति सामर्थ्य छिपाए हुए है, जिसे यदि वैज्ञानिक द्वारा स्थूल उपकरणों के माध्यम से उत्पन्न किया जाए तो उसके लिए मीलों लंबे विशालकाय बिजली घर की आवश्यकता पड़ेगी। इतना विराट एवं असीम संभावनाओं से भरा है यह काया का विद्युत भंडार।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 36

http://awgpskj.blogspot.com/2018/08/1-27.html

👉 Love is Supreme

🔶 Divine knowledge and selfless love enlighten every dimension of life, destroy all vices and worries; there remains no feeling of hatred, jealously, discrimination, or fear. And then, one is blessed by the divine sight to see the pure love, justice and equality indwelling everywhere.

🔷 If you want to experience the divine joy, make your mind a source of wisdom, firm determination and noble thoughts; let your heart be an auspicious ocean of compassion. Control your tongue, purity and discipline it to speak truth. This will help your self- refinement and inner strengthening and eventually inspire the divine impulse of eternal love.

🔶 If you have integrity of character, authenticity in what you talk and do, people will believe you. You will not have to attempt convincing them. The wise and sincere seekers will themselves reach you. If in addition, you are generous and have an altruistic attitude towards everyone, you will also naturally win people’s heart. The warmth, words and works of truth and love never go in the void. Their positive impact is an absolute certainty.

🔷 There should be no doubt in your minds that pure love is omnipresent and supreme. It contains the power to accomplish the eternal quest of life. It facilitates uprooting the vices and allaying the agility, apprehensions and tensions of mind. Selfless love is a divine virtue, a preeminent source of auspicious peace and joy.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1943

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 3)

🔶 जिन लोगों ने अभी अध्यात्म-मार्ग पर पैर रखा है, और आत्म-समर्पण का केवल संकल्प ही किया है, उनमें इन तीनों में से कोई एक तरह का अहंकार पाया जाता है, और वही उनकी प्रगति के मार्ग में बाधक बन जाता है। जिस साधक में रजोगुण की प्रधानता होती है, वह सोचने लगता है- “हम साधक हैं- हम ने जप, तप, योग के मार्ग को अपनाया है। अन्य लोग सांसारिक माया में ही फँसे पड़े है, हम इतना आगे बढ़ जाये। हम भगवान के हाथ के एक यंत्र हो रहे है।” इस तरह के अनेक मनोभाव साधक को अहंकारी बना देते है। इसका परिणाम होता है कि जो धर्म उसकी वासना और कामना से उत्पन्न होता है उसे वह भगवान का बतलाकर उस पर आचरण करता है और बारबार असफल होकर निराश होता है। तो भी उसके मन में यह धारणा उठती है कि हम धर्माचरण कर रहे हैं और धर्म का मार्ग बाधा, विपत्ति और कंटकाकीर्ण होता ही है, इससे हमको सब कुछ सहन करते हुये परिश्रम से काम करना चाहिये।

🔷 इस भाव से प्रेरित होकर वह और भी तल्लीनता से काम करने लगाता है। वह जब काम करने लगता है तब सोचता है कि हमारे हृदय में प्रविष्ट होकर भगवान ही यह काम करा रहे है, हमारा इसमें कोई हाथ नहीं पर ये सब उसके ऊपरी मन की बातें होती है। उसके भीतरी मन से उस काम को पूर्ण करने का अनुराग बहुत अधिक रहता है और उसके पूर्ण न होने से उसे बड़ा दुःख भी होता है। इस लिये अध्यात्म और योग के पथिक को अपने मन में सदैव यही भाव धारण करना होगा कि भगवान सब के हृदय में विराजमान है और समस्त अभिलाषाओं को त्याग कर उनकी लीला पर लक्ष्य रखना ही हमारा ध्येय है। जब तक भगवान स्वयं ज्ञान-दीप को जला कर अर्न्तहृदय के सम्पूर्ण तम का नाश न करेंगे तब तक साधक के मोह रूपी अंधकार में फँस जाने की पूर्ण संभावना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.9

👉 राजनीति में हमारी भूमिका (धर्मतन्त्र का सहगमन जरूरी)

🔶 लोग एक प्रश्र अक्सर करते रहते हैं कि ‘‘हम राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश क्यों नहीं करते? और राजतन्त्र को अपने अनुकूल सरकारी स्तर पर वह सब सहज ही क्यों नहीं करा लेते? जिसके लिये इन दिनों इतनी अधिक माथापच्ची कर रहे हैं।’’ इस सुझाव के पीछे अपनी-अपने संगठन की वह क्षमता और व्यापकता है, जिसका वही मूल्यांकन कर सकने वाले लोग अनुभव करते हैं कि इन दिनों अपना तन्त्र-किसी भी राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक तन्त्र से कम प्रखर एवं कम सशक्त नहीं है।

🔷 वर्तमान युग में राजनीति की सर्वोपरि सत्ता और महत्ता को स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। यह स्वीकार करने में हमें कोई अड़चन नहीं है कि सरकारें यदि सही कदम उठा सकें, सूझ-बूझ से काम लें और अपने क्रियातन्त्र को सुव्यवस्थित रख सकने में समर्थ हों, तो वे अपने क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकती हैं। जापान, चीन, रूस, जर्मनी, अरब, इजरायल आदि ने चन्द दिनों के भीतर अपने ढंग से अपनी योजनानुसार अभीष्ट परिवर्तन के प्रकार प्रस्तुत कर लिये, इसके आश्चर्यजनक उदाहरण सामने  हैं। हम उन लोगों में से नहीं हैं जो वास्तविकता की ओर से जान-बूझकर आँखें बन्द किये रहें। धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं, यह दूसरों ने भले कहा हो हमने यह शब्द कभी नहीं कहे हैं। इतिहास ने हमें सिखाया है कि धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं, वरन् घनिष्टता एवं परिपोषण का साधन तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।

🔶 इतिहास साक्षी है कि जनता के सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि का आधार दोनों के बीच साधन सहयोग ही प्रमुख तथ्य रहा है। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन और रघुवंशियों के शासन क्रम ने त्रेता में उस सतयुग की स्थापना की थी, जिसे हम रामराज्य के नाम से आदर के साथ याद करते हैं। चाणक्य के मार्गदर्शन से गुप्त साम्राज्य पनपा, फैला और परिपुष्ट हुआ था। पाण्डवों का मार्गदर्शन कृष्ण ने किया था और दुशासन का उन्मूलन कर सुशासन की स्थापना की थी। राजा मान्धाता का सहयोग शंकराचार्य की दिग्विजय का महत्त्वपूर्ण आधार था। भगवान् बुद्ध के प्रभाव से सम्राट् अशोक का बदलना और अशोक की सत्ता के सहयोग से बुद्ध धर्म का समस्त एशिया में फैल जाना एक ऐसी सच्चाई है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

🔷 समर्थ गुरु रामदास जानते थे कि धर्म प्रवचनों से ही काम चलने वाला नहीं है, सुशासन की स्थापना भी आवश्यक है। अस्तु; उन्होंने शिवाजी जैसे अपने प्रधान शिष्य को इस मार्ग पर अग्रसर किया। अग्रसर ही नहीं किया, अपने स्थापित ७०० महावीर देवालयों के माध्यम से आवश्यक रसद, पैसा तथा सैनिक जुटाने की भी व्यवस्था की। शिवाजी उसी सहयोग के बल पर स्वतन्त्रता संग्राम की ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत कर सके। गुरु नानक का पन्थ एक प्रकार से स्वाधीनता के सैनिकों से ही बदल गया। उनने ‘‘एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला’’ का आदर्श प्रस्तुत करके यह बता दिया कि राजतन्त्र और धर्मतन्त्र को विरुद्ध दिशाओं में नहीं चलने देना चाहिए; वरन् उनके कदम एक ही दिशा में उठने की आवश्यकता हर कीमत पर पूरी की जानी चाहिए। बन्दा वैरागी ने सच्चे अध्यात्मवादी का उदाहरण प्रस्तुत किया और समाधि, साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में अपना सर्वस्व उत्सर्ग कर दिया।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 राजनीति में हमारी भूमिका पृष्ठ-14-17

http://literature.awgp.org/book/rajaneeti_men_hamaree_bhoomika/v1.3

सोमवार, 13 अगस्त 2018

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔷 “संसार में विवाह की भिन्न-भिन्न जितनी प्रथाऐं प्रचलित हैं, उनमें वैदिक पद्धति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। वैदिक पद्धति की विशेषता यह है कि इस पद्धति में अन्य पद्धतियों की तरह विवाह कोई व्यापारिक समझौता (कांट्रैक्ट) नहीं है, किन्तु ही एक पवित्र आत्मिक सम्बन्ध है, जो पति-पत्नी के बीच इसलिए होता है कि वे दोनों मिलकर संसार को यथा सम्भव पहले से अधिक सुखी बनाने का यत्न करें। उपनिषद् में एक जगह अलंकार के एंगल से गृहस्थ शरीर को उतना ही बतलाया है जितना स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर होते हैं। जब उसके दो भाग किये गये तो पति और पत्नी हुए। इसका स्पष्ट भाव यह है कि जिस प्रकार एक दाने के दो दल (दालें) अथवा एक सीप के दो अर्द्ध भाग बराबर-बराबर होते हैं, उसी प्रकार पति और पत्नी में समता होनी चाहिए, तभी वे गृहस्थाश्रम को अच्छा और गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बना सकते है।”

✍🏻 नारायण स्वामी
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 वसीयत और नसीहत

🔷 एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा, "बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह इक्छा जरूर पूरी करना। पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी इक्छा बताई।

🔶 पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है। पर बेटे की ज़िद थी कि पिता की आखरी इक्छ पूरी हो। बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

🔷 इसी माहौल में एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी "मेरे प्यारे बेटे" देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुआ मोजा तक नहीं ले जा सकता।

🔶 एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा। लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना।

🔷 क्यूकि अर्थी में सिर्फ तुम्हारे कर्म ही जाएंगे"।

इन्सान फिर भी धन की लालसा नहीं छोड़ता, भाई को भाई नहीं समझता, इस धन के कारण भाई, मां, बाप सबको भूल जाता है अंधा हो जाता है।

👉 बेजुबान पत्थर पे लदे है

🔷 बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में,
उसी देहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।

🔶 सजाया गया था चमचमाते झालर से मस्जिद और चमकते चादर से दरगाह को,
बाहर एक फ़कीर को भूख और ठंड से तड़प के मरते देखा है।

🔷 लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार,
पर बहार एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।

🔶 वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हाल के लिए,
घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई बदलते देखा है।

🔷 सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को,
आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।

🔶 जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन,
आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है।

🔷 जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी,
आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा है।

🔶 दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस बेटी को जबरन बाप ने,
आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है।

🔷 मारा गया वो पंडित बेमौत सड़क दुर्घटना में यारो,
जिसे खुदको काल सर्प, तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है।

🔶 जिस घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों,
आज उसी आँगन में खिंचती दीवार को देखा है।


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Aug 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026

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