बुधवार, 15 अप्रैल 2026

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

👉 पाप से सावधान! (अंतिम भाग)

व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। यह पाप समाज से चोरी चोरी किया जाता है अतः मन छल कपट, धूर्तता, मायाचार, प्रपञ्च आदि से भर जाता है। ये कुवासनाएँ कुछ समय लगातार मन में प्रविष्ट होने से अंतर्मन में गहरी मानसिक ग्रन्थियों की सृष्टि कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति मौन सम्बन्धी बातों में निरन्तर दिलचस्पी, गन्दे शब्दों का प्रयोग, बात बात में गाली देना, गुह्य अंगों का पुनःपुनः स्पर्श, पराई स्त्रियों को वासनामय कुदृष्टि से देखना, मन में गन्दे विचारों—पापमयी कल्पनाओं के कारण खींचतान अस्थिरता, आकर्षण−निकर्षण आदि मनः संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं। यही कारण है कि विकारी पुरुष प्रायः चोर निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं, अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय समय पर अपनी इस कुप्रवृत्ति का परिचय देते रहते हैं। लोगों के मन में उनके लिए विश्वास, प्रतिष्ठा, आदर की भावना नहीं रहती, समाज से उन्हें सच्चा सहयोग प्राप्त नहीं होता और फलस्वरूप जीवन−विकास के महत्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।

व्यभिचार की मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुःख पूर्ण होती है। उसमें द्वन्द्व चलता रहता है, अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता स्वयं अपनी ही नजरों में कम हो जाती है प्रत्येक क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। ये सब मानसिक दुःख नर्क की दारुण यातना के समान कष्टकर हैं। व्यभिचारी को निज कुकर्म का दुष्परिणाम रोग−व्याधि सामाजिक बहिष्कार के रूप से इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।

मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, चिन्ता आदि वे दुष्ट मनोभाव हैं, जो मनुष्य का प्रत्यक्ष नाश करने वाले हैं!

महर्षि जैमिनी के अनुसार जो द्विज लोभ से मोहित हो पावन ब्राह्मणत्व का परित्याग कर कुकर्म से जीविका चलाते हैं, वे नर्कगामी होते हैं।

जो नास्तिक हैं, जिन्होंने धर्म की मर्यादा भंग की है, जो काम भोग के लिए उत्कण्ठित, दाम्भिक और कृतघ्न हैं, जो ब्राह्मणों को धन देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, चुगली खाते, अभिमान रखते और झूठ बोलते हैं, जिनकी बातें परस्पर विरुद्ध होती हैं, जो दूसरों का धन हड़प लेते हैं, दूसरों पर कलंक लगाने के लिए उत्सुक रहते हैं और पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं, वे नर्क में जाते हैं।

जो मनुष्य सदा प्राणियों के प्राण लेने में लगे रहते हैं, पराई निन्दा के प्रवृत्त होते हैं, कुँए, बगीचे, पोखर आदि को दूषित करते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।

वाणी से कुशब्दों, गाली, अपमान जनक, कटु वचन उच्चारण करना भी पाप है। आपको चाहिए कि शरीर मन वाणी को सहज सात्विक कार्यों में लीन रखें, शुभ सोचें, शुभ उच्चारण करें।

*.....समाप्त*
📖 *अखण्ड ज्योति मार्च 1955*

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग २)

जो लोग अभी इतनी मानसिक उन्नति नहीं कर सके हैं कि दूसरों की मूर्खतापूर्ण भूलों को क्षमा कर दें, उनको कम से कम क्रोध और असत्य के बदले तुरंत वैसा ही व्यवहार करने के बजाय कुछ देर ठहर कर समस्त परिस्थिति पर शाँतचित्त से विचार करना चाहिए। ऐसा होने से वे कम से कम वैसी मूर्खता से बच जायेंगे जैसी पहला व्यक्ति कर चुका है।

दूसरों के उद्देश्य के विषय में शंका करना अच्छा कार्य नहीं है। केवल उसकी अन्तरात्मा ही उसके विचारों को जानती है। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे उद्देश्यों से प्रेरित होकर कोई कार्य कर रहा हो जो तुम्हारे मस्तिष्क में आ ही नहीं सकते। यदि तुम किसी के विरुद्ध कोई बात सुनते हो, तो तुम इसको दोहराओ मत। संभव है वह सत्य न हो और यदि हो भी, तो उसके विषय में मौन रहना ही अधिक दयालुता होगी।

बोलने से पहले सोच लो अन्याय असत्य भाषण से दोष-भागी बनोगे। कार्यों में भी सत्य का पालन करो, अपना मिथ्या प्रदर्शन मत करो, क्योंकि प्रत्येक दल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिये जैसे सिर्फ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, https://youtu.be/vSKChpugH14?si=M9jnwKP58NH40az5

आचरण और व्यवहार में सत्य का पालन वास्तव में कठिन है, इसका अर्थ यह है कि दूसरों के सामने कोई कार्य इस उद्देश्य से न करना चाहिए कि उसके मन में हमारे लिये उच्च-धारणा बैठ जाये। साथ ही जिस कार्य के करने में दूसरों के सामने लज्जित ना होना पड़े ऐसा कार्य छुपकर भी नहीं करना चाहिए। लोगों को आप अपना सच्चा स्वरूप देखने दीजिये और जो कुछ आप नहीं हैं वैसा बनने का ढोंग मत कीजिये। बहुत लोगों का ऐसा उद्देश्य रहता है कि हमारे प्रति दूसरों की धारणा हमारी रुचि के अनुकूल ही होनी चाहिये। फलतः ऐसी अनेक प्रकार की छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम एकान्त में तो कर लें, परन्तु दूसरों के सामने नहीं करेंगे, क्योंकि हम सोचते हैं कि लोग हम से ऐसी बातों के करने की आशा नहीं करते।

यह बात सत्य है कि हमें कभी अपना झूठा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक प्रकार का झूठा प्रदर्शन पतनकारी होता है। परन्तु यह भी ध्यान रखिये कि उस झूठे प्रदर्शन को टालने के लिये कहीं आप उसकी प्रतिकूल पराकाष्ठा तक न पहुँच जायें लोग कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि “मैं तो अपने प्राकृतिक रूप में ही लोगों के सामने अपने को प्रकट करना चाहता हूँ।” और ऐसा कहकर वे अपना अत्यन्त निकृष्ट, अशिष्ट और असभ्य रूप लोगों को दिखलाना आरम्भ करते हैं। किन्तु ऐसा करके वे अपना प्राकृतिक स्वरूप जैसा होना चाहिये वह नहीं दिखलाते, वरन् इसके विपरीत अपने हीन, तुच्छ और निकृष्ट रूप का प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि मनुष्य में जो कुछ उच्चतम, सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ गुण हैं, वे ही आत्मा से निकट सम्बन्ध रखते हैं, अतः अपने-आत्मा के प्राकृतिक स्वरूप को प्रकट करने के लिये हमें यथाशक्ति सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

*धार्मिक पाखण्ड भी असत्य का ही एक रूप है। यदि कोई मनुष्य अपने आपको आध्यात्मज्ञानी प्रकट करता है, साथ ही अपनी उन्नति एवं सिद्धियों का वर्णन करके पाखंडी लोगों की तरह भोले-भाले व्यक्ति यों की प्रशंसा प्राप्त करने का यत्न करता है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह सत्य का वास्तविक अनुयायी नहीं है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 पाप से सावधान! (भाग 3)

आपका जीवन सदा सबके लिए हितकारी हो, सेवा करें, आस पास के सब व्यक्ति आपसे प्रेरणा और बल प्राप्त करें, आप मृदु वचनों का उच्चारण करें, तो आपके लिए सुखदायिनी मुक्ति दूर नहीं है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती रिश्वत, आदि तो स्थूल रूप में चोरी हैं ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना, भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, सहायता या वस्तु देने का आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। फलतः अनिष्टकारी एवं त्याज्य है।

व्यभिचार मानवता का सबसे घिनौना निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य पाप−पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। आये दिन समाज में इस पाप की शर्माने वाली गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनाएँ सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान दुःख होता है। मनुष्य आत्म ग्लानि का रोगी बन जाता है, जिससे आत्म हत्या तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक साँख्य, बाल बच्चों, पत्नी का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है।

Gayatri Mantra Rules | गायत्री मंत्र जप के आवश्यक नियम शर्तें व अनुशासन | https://youtu.be/xx0vKHJGVOo?si=qT-brDFCt_gUsMIG

शरीर में होने वाले व्यभिचार जनित रोगों की संख्या सर्वाधिक है। अप्राकृतिक तथा अति वीर्यपात सू मूत्र नलिका सम्बन्धी गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं, जिन्हें न डाक्टर ठीक कर सकता है, न रुपया पैसा इत्यादि ही सहायक हो सकता है। वेश्यागमन के पास से मानव−शरीर अशक्त हो जाता है और स्थायी रूप से निर्बलता, सिरदर्द, बदहजमी, रीढ़ का दुखना मिर्गी, नेत्रों की कमजोरी, हृदय की धड़कन, बहुमूत्र पक्षाघात, प्रमेह, नपुंसकता, क्षय और पागलपन आदि शारीरिक रोग उत्पन्न होकर जीवितावस्था में ही नर्क के दर्शन करा देते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


रविवार, 12 अप्रैल 2026

👉 अनैतिक सफलता-नैतिक असफलता

और दूसरा वह वृक्ष है महात्मन्! देखिये न। आस-पास की सारी भूमि पर उसने अधिकार कर लिया है, छोटे-छोटे पौधों को पनपने नहीं दिया इसने। दूसरे के अधिकार को भी अपना हित मानकर शोषण कर लिया और आज सभी वृक्षों से विशाल दिखाई देने लगा। पर आप हैं कि नैतिकता की प्रशंसा के पुल बाँधे जा रहे हैं। महाराज! संसार में शोषक, शक्तिशाली और हिंसक पनपते हैं। नीति और ईमानदारी को पकड़े रहने वाले बेचारे दूसरे वृक्षों को देखो, कितने कोमल और कमजोर दिखाई देते हैं। उगते, फलते, फूलते तो ये भी हैं पर इनकी करोड़ों की शान और इस मद-मस्ती में झूमते विशाल वृक्ष की शान-क्या तुलना हो सकती है।

साधु मुस्कराये और बोले-वत्स! कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनके उत्तर तत्काल नहीं दिये जाते। प्रतीक्षा करो और प्रतिफल देखो। शीघ्र ही समझ में आ जायेगा कि नीति, नीति ही है और अनीति, अनीति ही है। अनीति का अन्त सदैव दुःखद ही होता है।

ग्रीष्म के अन्तिम दिन, वर्षा के पूर्वारम्भ के दिन बड़े बवण्डरी और तूफानी होते हैं। ऐसे ही किसी एक दिन भयंकर तूफान आया। छोटे-छोटे कोमल पौधे झुक-झुक गये, पृथ्वी माता की गोद में लोट-लोट गये। तूफान उन्हें पार करके निकल गया तो जैसे पहले खड़े थे, वैसे ही फिर खड़े होकर अपनी विकास यात्रा में जुट गये।

किन्तु उस महावृक्ष के अभिमान और अहंकार का अब तक भी कोई ठिकाना नहीं था। उसी अकड़ में खड़ा रहा। तूफान अपनी सारी शक्ति समेटकर उस पर टूट पड़ा और लंका में जो स्थिति रावण के दस शीश और बीस भुजाओं की हुई थी, वही स्थिति उस भीमकाय वृक्ष की कर डाली। दनुजाकार डालें, तने सब क्षत-विक्षत लोटने लगे, जड़ें भी संभाल न पाईं। पेड़ पल भर में ढेर हो गया।

प्रातःकाल जो भी ग्रामीण उधर से निकलता, हाहाकारी वृक्ष की यह विनाश-लीला देखकर उधर ही खिंचा चला आता। देखते-देखते ग्राम वासियों की भीड़ एकत्रित हो गई। इतना बड़ा पेड़ ढहकर भूमि पर बिखरा पड़ा है और छोटे-छोटे पौधे आनन्द की हिलोरें ले रहे हैं-यह देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था, तभी साधु भी उधर आ पहुँचे।

वृक्ष की ओर देखकर हँसे और बोले-यही है उस दिन के प्रश्न का उत्तर। अनीति और अधर्म से प्रारम्भ में लोग तेजी से बढ़ते हैं, पर अन्त उनका ऐसा ही अनिष्टकारी होता है, जैसे इस वृक्ष का।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग 1)

मनुष्य का कर्तव्य है कि सत्य और असत्य का भेद पहिचानने का प्रयत्न करता रहे। सत्य आध्यात्मिक जगत का सर्वोत्तम रत्न है और भगवान ने उसे पहिचानने की निश्चित योग्यता भी मनुष्य को दी है पर आधुनिक युग के कुतर्कशील लोगों ने उसका स्वरूप ऐसा गँदला कर दिया है कि उसकी पहिचान करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। इसके लिए सबसे पहला उपाय यह है कि हम स्वयं मन, वाणी और कर्म से सदा सत्य का पालन करें। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है वह सत्य और असत्य की पहिचान अपने सहज-ज्ञान से शीघ्र ही कर सकता है।

सत्य और असत्य की पहिचान पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता इसलिये भी है कि संसार में आजकल अनेकों मूर्खतापूर्ण असत्य विचार और अन्धविश्वास भरे पड़े हैं, और जो व्यक्ति इनका दास बना रहता है वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।

इसलिये तुम्हें किसी बात को इसलिये ग्रहण नहीं करना चाहिए कि उसे बहुसंख्यक लोग मानते हैं, या वह शताब्दियों से चली आई है, अथवा उन धर्मग्रंथों में लिखी है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं। तुम्हें उस पर स्वयं भी विचार करके उसके सत्य-असत्य और उचित-अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए। याद रखो कि एक विषय पर चाहे एक हजार मनुष्यों की अनुमति क्यों न हो किन्तु यदि वे लोग उस विषय में कुछ भी नहीं जानते, तो उनके मत का कुछ भी मूल्य नहीं है। जिसे सत्य मार्ग पर चलना है उसे स्वयं विचार करना सीखना चाहिए, क्योंकि अंधविश्वास संसार की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। यह एक ऐसा बंधन है जिससे पूर्ण रूप से मुक्ति होना चाहिए। दूसरों के विषय में तुम्हारा विचार सदा सत्य होना चाहिए। उनके विषय में जो बात तुम नहीं जानते उस पर विचार मत करो।

यह कल्पना भी मत करो कि लोग सदा तुम्हारे ही विषय में सोचा करते हैं। यदि एक मनुष्य कोई ऐसा कार्य करता है जिससे तुम्हारी समझ में तुम्हारी हानि होगी, अथवा वह कोई बात कहता है जो तुम्हारे विचार पर तुम पर घटती है, तो तत्काल ही यह मत सोचो कि “उसका उद्देश्य मुझे हानि पहुँचाना था। “ बहुत सम्भव है कि उसने तुम्हारे विषय में सोचा ही न हो, क्योंकि प्रत्येक जीव के अपने निज के कष्ट होते हैं और उसके विचारों का केन्द्र मुख्यतः वह स्वयं ही रहता है। यदि कोई मनुष्य तुमसे क्रोधित होकर बात करता है तो यह मत सोचो कि वह तुमसे घृणा करता है अथवा तुम्हें व्यथित करना चाहता है। हो सकता है कि उसे किसी अन्य व्यक्ति ने क्रोधित कर दिया हो, और संयोग से उस समय तुम उसे मिल जाते हो, और तब उसका सारा क्रोध तुम्हीं पर उतरता है। यह ठीक है कि वह मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है, क्योंकि क्रोध करना ही मूर्खता है। किंतु तुम्हें उसके विषय में असत्य विचार नहीं करना चाहिये।

लोगों की बहुत सी छोटी-छोटी कठिनाइयाँ इसी प्रकार पैदा हो जाती हैं। किसी व्यक्ति पर यदि परेशानियों का भार बहुत अधिक होता है तो उसके कारण वह लगभग प्रत्येक बात पर क्रोध करने लग जाता है। वास्तव में हम अपने आस-पास रहने वालों के भी सब कष्टों को नहीं जानते, क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को घोषित करता नहीं फिरता। साधारण मर्यादा उसे ऐसा करने से रोकती है। किन्तु यदि हम यह याद रखे कि ऐसी कठिनाइयाँ सबके लिये उपस्थित हैं और उनके प्रति उदार भाव से काम लें, तो हम स्वयं क्रोध से अवश्य बच सकेंगे।



.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

"Shantikunj Rishi Chintan *शांतिकुंज हरिद्वार का आधिकारिक YouTube चैनल*

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 पाप से सावधान! (भाग 2)

मनुष्य प्रायः तीन अंगों से पाप में प्रवृत्त होता है 
1—शरीर 2—वाणी और 3—मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं, विभिन्न अवस्थाएँ और स्तर हो सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रखें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुए बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाये और पाप पथ पर चले जायं!

शरीर के पापों में वे समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं, जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी भवसागर से पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कञ्चन तुल्य काया में ऐसे विकार उपस्थित हो जाते हैं जिससे जीवितावस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणाएँ प्राप्त करता है।

हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं,तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद, ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना है। हिंसक की अन्तरात्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसके मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष, की अग्नि निकला करती है।

हिंसक पशु की कोटि का व्यक्ति है। उसमें मानवोचित गुण नहीं रहते। बल के मद में वह अपने स्वार्थ, आराम, वासना पूर्ति के लिए काम करता है। उसे पशु की योनि प्राप्त होती है और जीवन अशान्त बना रहता है।

हिंसा का तात्पर्य यह नहीं कि आप किसी के शरीर को चोट पहुँचाएँ, मारें पीटें ही, दूसरे के हृदय को किसी प्रकार का आघात पहुँचाना, कटु वचन का उच्चारण, गाली गलौज आदि भी हिंसा के ही नाना रूप हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 12 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 कर्मयोग का रहस्य (अंतिम भाग)

यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।

जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।

जैसा आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ बर्ताव करें वैसा आप भी उनके साथ करो, इस नीतिवाक्य को याद रखो। नित्य के जीवन−व्यवहार में यह आपका आचार−नियम होना चाहिए, समस्त धर्मों का साराँश यही है, आप कोई अनुचित कर्म नहीं करोगे, आपको अमित आनन्द मिलेगा।

जब तुम बाजार में जाओ तो हमेशा अपनी जेब में कुछ पैसे डाले रखो और उन्हें गरीबों को बाँट दो। रेलवे प्लेटफार्म पर गरीब कुलियों से झगड़ा मत करो, उदार बनो उन्हें चार आने या आठ आने दो। अनुभव करो कि सारी देहों में आप ही रम रहे हो, आपका हृदय विशाल हो जावेगा, आप एकत्व का अनुभव करने लगोगे, आप और भी उदार बन जाओगे।

"जप प्रक्रिया का वैज्ञानिक रहस्य: कैसे काम करती है मंत्र शक्ति?" | https://youtu.be/BO_pDMHTlBI?si=MzQSfXQfSm4xCGst

आप दवाइयों की एक पेटी अपने साथ रख सकते हो और गरीब रोगियों की चिकित्सा कर सकते हो, होम्योपैथिक दवाइयों का इलाज कोई हानि नहीं करता है। पुस्तक देख देखकर अप दवाई दे सकते हो। किसी बायोकैमिस्ट से मिलकर अपना सन्देह दूर कर सकते हो। ऐसी सेवा से आपको बहुत आनन्द मिलेगा, इससे चित्त−शुद्धि बहुत होती है।

महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़िए। वह सम्मानित कार्य और तुच्छ नीच सेवा में भेद नहीं समझते थे। उनके लिये झाडू लगाना और टट्टी साफ करना बहुत बड़ा योग है। उन्होंने स्वयं टट्टियाँ साफ की हैं। अनेक प्रकार की सेवाएँ कर करके, उन्होंने इस मोहकारक ‘मैं’ को बिल्कुल ही नष्ट कर रखा है। बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन इनके आश्रम में योग सीखने के लिये आये। वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी जी उनको एकान्त कमरे में या परदे के पीछे विचित्र रीति से प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, कुण्डलिनी, योगादि की शिक्षा देंगे, परन्तु जब उनसे कहा गया कि सबसे पहले टट्टियाँ साफ करो तो उनको बड़ी निराशा हुई और वे एकदम आश्रम छोड़कर चले गये।

प्रति दिन जितने अधिक सत्कार्य हो सकें करिये, सोते समय अपने दिन भर के कार्यों की परीक्षा कीजिए और नित्य अपनी आध्यात्मिक डायरी नोट कीजिए। सत्कार्य करना ही आध्यात्मिक जीवन का उदय है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 2)

कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।

कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए। वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।

विश्वास की परीक्षा संकट में होती है | Vishwas Ki Pariksha Sankat Me Hoti Hai | https://youtu.be/8jct8C3Nw0I?si=8V3sBHPLdjdh6V3f

पश्चिम में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग बेशुमार दान करते हैं, वे बड़े बड़े अस्पताल और बड़ी बड़ी संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल सहानुभूति और मनुष्य जाति पर दया करने के नाते ही करते हैं, उनके लिए यह सब समाज सेवा है और ईश्वर समाज का आधार है और मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। वे अभिमान रहित होकर कर्त्तापन की बुद्धि को छोड़ कर और फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, उनके लिए यह सेवायोग (कर्मयोग) नहीं है। उनके वास्ते यह सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिए सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य−जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्त शुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य) का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुए कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।

कर्मयोग के अभ्यास के लिए बहुत धन होना आवश्यक नहीं है, आप अपने धन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उसको अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम कर दो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान−शौकत से की हुई सेवा से।

यदि किसी के शरीर के किसी अंग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अंग को धीरे−धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 1)

मनुष्य−समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अन्तःकरण को आत्मज्ञान रूपी दिव्य ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह है कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंभाव के आपको मानव−जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए, आसक्ति को दूर करके सफलता व निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्म−योग है।

जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।

अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।

अमृतवाणी:- ज्ञान योग और कर्म योग | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी, https://youtu.be/NoIeQYYdBzk?si=e0hTBNNEXflBL-K5

कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।

कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।

ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

🙏 गुरुदेव के विचारों को सुनने के लिए चैनल को Subscribe करें और वीडियो को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe 

👉 Official Youtube Channel Shantikunj Rishi Chintan को आज ही Subscribe करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 पाप से सावधान! (भाग 1)

पाप एक ऐसी दुष्प्रवृत्ति है, जो नाना रूप आकृति और अवस्थाओं में मनुष्य पर आकर्षण किया करती हैं। कहते हैं, मनुष्य के मन के किसी अज्ञात कोने में शैतान का भी निवास है। जहाँ पुष्पों से सुरभित कानन का सुन्दर स्थल है, वहाँ कांटों से भरे बीहड़ भी हैं। जहाँ ज्ञान का प्रकाश है, वहीं कहीं कहीं घनघोर अन्धकार भी है। यही अन्धकार पाप की ओर प्रवृत्त कर मनुष्य के अधः पतन का कारण बनता है।

पाप की ओर प्रवृत्त करने वाला मनुष्य का अज्ञान है। अज्ञान के अन्धकार में उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, वह वासना के वशीभूत हो उठता है और किसी न किसी रूप में पतन के ढाल मार्ग पर आरुढ़ हो जाता है।

पाप पशुत्व है, मनुष्य के शरीर मन और आत्मा का नारकीय बन्धन है, दुखदायी नर्क में ले जाने वाला दैत्य है। वास्तव में इनका निर्माण इसलिए किया गया है कि मनुष्य की परीक्षा प्रतिपल प्रतिक्षण होती चले।

ध्यान:- प्रतिकूलताओं का ध्यान | Prtikultaon Ka Dhyan |  https://youtu.be/X2-8zjy15d0?si=Efh_OY2CcF02qc30

काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा— मनुष्य में रहने वाले ये बारह दोष तनिक सा अनुकूल अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।

मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आकर्षण करता है।”

अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चञ्चल और आश्रितों की रक्षा न करने वाले—ये छः प्रकार के मनुष्य पापी हैं। महान् संकट में पड़ने पर भी ये निडर होकर इन पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाला, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी—ये सात और पहले के तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस वर्ग के कहे गए हैं। सावधान रहें!

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...