सोमवार, 21 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३१)

जो यादों का धुँधलका साफ हो जाए
    
इस महाप्रश्न का उत्तर हमारी अपनी अन्तश्चेतना की गहराइयों में है। जिसकी अनुभूतियों से हम अभी तक अछूते हैं। सामान्य क्रम में हम स्मृति का अर्थ वही यादें समझते हैं, जो बचपन से लेकर अब तक हमारे साथ जुड़ी हैं। लेकिन यादों का यह क्रम यहीं तक सीमित तो नहीं है। इसके दायरे में वह सब भी है, जो इस जीवन के पार और परे है। इसमें वे अनुभव भी आते हैं, जो हमें विगत जन्मों में भी हुए हैं। उनकी यादें भी तो हमारे अपने ही चित्त में संग्रहीत है। भले ही काल क्रम में ये थोड़ा धुँधली पड़ गयी हों। इन्हें पार करते हुए यदि हम अपने अस्तित्व के केन्द्र में झाँके, तो एक मूल्यवान् स्मृति और भी है- और वह  हमारे अपने ही स्वरूप का अनुभव। हमारा वह स्वरूप जिसके लिए बाबा तुलसीदास ने कहा है- ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशी॥’ इस मौलिक अनुभव की स्मृति तो जैसे एकदम ही लुप्त हो गयी है। इस स्मृति पर न जाने कितनी स्मृतियों ने धुँधले आवरण डाल दिए हैं।
    
लेकिन यह हुआ कैसे? गीता माता कहती है कि इसकी एक लम्बी कड़ी है।  ‘संगात् संजायते कामः, कामात् क्रोधोऽभिजायते। क्रोधाद् भवति संमोहः, सम्मोहात् स्मृति विभ्रमः॥’ यानि कि विषयों के संग से उनकी कामना, फिर कामना से क्रोध, फिर क्रोध से सम्मोह और इस सम्मोह से स्मृति भ्रम। यह क्रम यहीं नहीं खत्म होता। आगे की कड़ियाँ और भी हैं- ‘स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।’ अर्थात्- स्मृति भ्रंश से बुद्धि का नाश और बुद्धि के नाश से स्वयं का नाश। आज के इन क्षणों में हमारी अपनी क्या दशा है? यह हम बड़ी अच्छी तरह से जान सकते हैं।
    
इस स्थिति से उबरने का उपाय क्या है? इस सवाल के जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं- उपाय एक ही है- उलटे को उलटकर सीधा करना। अर्थात् आत्मनाश की स्थिति से बचने के लिए पहले हमें आत्मउद्धार का संकल्प लेना होगा। फिर बुद्धिनाश की स्थिति को उलटने के लिए महाप्रज्ञा माता गायत्री का आँचल थामना होगा। वही हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जा सकती है। इसके पश्चात् स्मृति विभ्रम दूर होना शुरू होता है। यानि कि तब हमें गायत्री साधना के बीच में अपने स्वरूप की हल्की झलकियाँ मिलती हैं। लेकिन सम्मोह का जाल अभी भी बना रहता है। यह तब टूटता है, जब क्लिष्ट स्मृति यानि जीवन के ईर्ष्या, द्वेष, वैरभाव या विषयानुभूति की यादों को अपने पास न फटकने दें। इनके स्थान पर याद करें-सत्पुरुषों के संग को, अपने सद्गुरु के संग और उनके वचनों को। इससे न केवल सम्मोह नष्ट होता है, बल्कि क्रोध भी नष्ट होता है। विषयों की कामना भी जाती रहती है। फिर उनके संग की चाहत भी नहीं पैदा होती।
    
उलटे को उलटकर सीधा करने का पूरा क्रम यही है। यह क्रम पूर्ण होते ही अन्तश्चेतना में शुद्ध सत्त्व का उदय होता है। इस शुद्ध सत्त्व का परिणाम है-ध्रुवा स्मृतिः अर्थात् अपने और परम चेतना के शाश्वत सम्बन्धों की दृढ़ भावानुभूति। इस सत्य को प्रकट करते हुए उपनिषदों का कथन है- ‘शुद्ध सत्त्व ध्रुवाःस्मृतिः’  स्मृति की साधना का सार यही है कि हम ईर्ष्या, वैरभाव, विषयभोगों से जुड़ी हुई यादों को हटाकर-भगाकर बार-बार अपनी आत्मचेतना को पवित्र करने वाली यादों को दुहराएँ।
    
सन्तों ने इसी को सुमिरन कहा है। सुमिरन यानि की प्रभु की याद, अपने आत्मस्वरूप का बार-बार चिन्तन। यही स्मृति का सार्थक उपयोग है। मानव चेतना के रहस्य इसी से उजागर होते हैं। अपने स्मृति विभ्रम के कारण हम भूल चुके हैं कि आखिर हम कौन हैं? हमारा अपना ही परिचय हमसे खो गया है। स्वयं की याद का ही विलोप हो गया है। हाँ, दूसरों की भली-बुरी न जाने कितनी ही यादों को हम ढोते फिरते हैं। मर्म को छूती परम पूज्य गुरुदेव की पुस्तक - ‘मैं कौन हूँ?’  में उन सभी विधियों का समावेश है- जिससे हम अपनी खोयी स्मृतियों को पा सकते हैं। इसके साधना सूत्र बड़े ही प्रभावकारी हैं। स्मृति के रहस्य के जिज्ञासु साधकों के लिए यह पुस्तक नित्य पठनीय है। ध्यान रहे- हमारे दैनिक जीवन के सारे दुःखों के मूल में एक मात्र सत्य यही है कि हमने अपनी स्मृति को कष्टकारक बना लिया है। स्थिति को उलटने के लिए हमें इसे ही सुखकारक बनाना होगा। तभी योग की असल मंजिल की तरफ कदम बढ़ते रह सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Yug Nirman Yojana – A Sure Remedy for Present-day Ills

‘Yug Nirman Yojana’ (Campaign for Era - Transformation) through the medium of Gayatri Sadhana is the sure remedy prescribed by the Seer-Sage Swami Sarveswaranandji for all the ills of soul-mind-body by which mankind is afflicted in the present age. His disciple – Acharya Sriram Sharma – made Herculean efforts to implement his Master’s Plan and established the global Gayatri Mission, with its headquarters at Gayatri Teerth Shantikunj Hardwar, for the production of this wonder cure-all drug. The followers of Acharyasri, the Gayatri Parijans, are making an all – out effort to distribute this medicine (of Gayatri Sadhana) to one and all. Acharyasri asserted that Gayatri is for everyone; it is a divinely inspired revolution, which is bound to succeed in spite of all the opposition from dogmatic forces of outmoded traditions and beliefs.

The aim of ‘Yug Nirman’- revolution is to achieve the inner refinement and upliftment of the individual, the family and the society at large; and thus lay a firm foundation for the emergence of the golden era of genuine peace on earth.

The role of Gayatri Sadhana is to bring about a synthesizing transformation of attitudes, feelings and thoughts. If the existing divisive and ego-driven beliefs / traditions of the masses could be transmuted through spiritual awakening, then people, physically remaining the same, will intuitively experience the underlying Unity and Harmony of all that exists and will be rid of their mis-identity with the body.

This process of change of the era has already begun. The visible emergence of the bright future of humanity in the twenty-first century is very much linked with the success of Yug Nirman Yojana. Since its fulfillment is divinely ordained, the one thing that the parijans have to do in this transition period is to contribute their mite by uplifting and transmuting themselves through Gayatri Sadhana and then, by example, inspire others to do so. This will have the needed ripple effect, which will steadily build up the needed critical mass for initiating the process of human transformation, resulting in lasting peace and harmony on earth.

शनिवार, 19 सितंबर 2020

👉 मन की चंचलता दूर करने का रहस्य

एक दिन सत्संग में एक सज्जन ने प्रश्न उठाया कि मन बड़ा चंचल है कैसे वश में किया जाय। बिना न के एकाग्र हुए भजन वृथा है। मन की चाल हवा से भी तेज है। क्षण भर में चौदह लोकों में घूम आता है। जाग्रत में ही नहीं, स्वप्न में भी चुप होकर नहीं बैठता। जन्म भर में कभी देखे सुने न हो, ऐसे-ऐसे अनोखे पदार्थ रच लेता है। यह बड़ा दुष्ट, चंचल प्रबल व ढीठ है।

एक दूसरे सज्जन ने कहा- मन की बात मत छेड़ो। मैं जब भजन करने बैठता हूँ तो और भी भागता है। बहुतेरा रोकता हूँ रुकता नहीं। मंत्र में लगाता हूँ तो बिना सिर पैर के ख्याली पुलाव पकाने लगता है। भगवान का ध्यान करना चाहता हूँ तो भागा-भागा फिरता है। राम-राम जपता हूँ तो ग्राम-ग्राम घूमता है। घर बाहर के, कचहरी दरबार के सब झगड़े भजन में लाकर खड़े कर देता है।

एक तीसरे सज्जन ने अपनी कठिनाई बताई कि-मैं तो इस मन की हरकतों से तंग आ गया हूँ। एक न एक बखेड़ा यह बराबर खड़े किये रहता है। मैं संसार से मुक्त होना चाहता हूँ तो मुझे लौटा-लौटा कर उसी में डालता है। सत्संग में जाना चाहता हूँ तो गप्प, ताश, शतरंज में लगा देता है। मन्दिर में दर्शन करने जाता हूँ तो सिनेमा के सामने ला खड़ा कर देता है। स्वाध्याय करना चाहता हूँ तो उपन्यास सामने जाकर रख देता है। गीता पढ़ने बैठता हूँ तो कहता है घर में दाल नहीं है, घी नहीं, मिर्च मसाला नहीं है, लकड़ी नहीं है, चलो, ले आओ। गीता फिर पढ़ लेना। यह तो रोज का गीत है। पेट पूजा तो प्रधान है। गीता का समरत्व योग भूखे पेट की ज्वाला नहीं शाँत कर सकता। मन की फरमाइशों के मारे तो तबियत परेशान हो गई है।

सबकी सुन लेने पर अन्त में उस सत्संग में उपस्थित एक महात्मा जी ने कहा कि-आप लोग उलटी गंगा बहा रहे हैं। आप लोगों के कहने के अनुसार तो आप कोई और हैं और मन कोई और। मगर बात असल में यह है कि आप ही से मन की सत्ता हैं। मन से आपकी सत्ता नहीं है। आप ही से मन निकला है। जैसे आप हैं वैसा आपका मन है। मन तो सरल, अबल और बेपेंदी का लोटा है। बिना कौड़ी पैसे का गुलाम है। वचन में बंधा हुआ है। इशारे पर काम करता है। जो-जो भोग आप माँगते हैं कि भजन नहीं करने देता। भजन करना आप चाहते ही कब हैं। धन में, स्त्री में, पुत्र में, नाम में, जुए मैं, माँस-मदिरा में, बीड़ी-सिगरेट में, सिनेमा, क्लब में आपकी रुचि है। इनसे आपको फुरसत ही कहाँ है। चौबीस घंटा में 23 घंटा इन्हीं का ध्यान करते हैं फिर एक घंटा राम नाम लेने का आडम्बर करते हैं और उस समय भी साँसारिक कार्यों का ताना बाना बुनते रहते हैं।
भाई! जो खाओगे उसकी डकार आवेगी। ग्रामोफोन में जो राग भरा जायेगा वही बजेगा। जैसे आप बनोगे वैसा मन भी बन जायेगा। आप चाहते हैं कि स्वाद में कमी न आने पावे। खाना-पीना राजसी व तामसी होता रहे। नेत्रों से सिनेमा आदि देखते रहें। कानों से फिल्मी संगीत सुनते रहें। वीर्यपात में भी कोई बन्धन न हो। आहार-विहार अनियमित होता रहे, मगर मन वश में हो जावे यह कैसे मुमकिन है। सभी विषयों पर लगाम लगाइये, मन आपसे आप आपका गुलाम हो जायेगा।

एक भेद की बात जान लीजिये कि वीर्य, प्राण व मन एक ही स्तर की वस्तुएं है। एक को रोक लेने पर दूसरी दोनों स्वयमेव रुक जाती है। मन को रोकिये प्राण व वीर्य वश में हो जाते हैं। वीर्य की गति ऊर्ध्वरत कीजिये तो मन व वीर्य पर आधिपत्य मिल जाता है। इन तीनों को वश में करने का एक भी साधन है और अलग-अलग भी। वीर्य पर विजय पाने के लिए मनसा वाचा कर्मण ब्रह्मचारी बनना पड़ेगा। सात्विक आहार व सात्विक विहार रखना पड़ेगा। आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्राओं द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करना पड़ेगा। इसी तरह प्राण को रोकने के लिए हठयोग, अष्टाँग योग, विशेष प्राणायामों आदि का साधन करना पड़ेगा। मगर यह सब क्रियाएं बड़ी कठिन व कष्ट साध्य हैं। सबसे सरल उपाय यह है कि आप लोग ध्यान सहित गायत्री का जप कीजिये और देखिये कि कितनी जल्दी आप मन को अपना चाकर बना लेते हैं। श्रद्धापूर्वक स्वर, ताल व लय से गायत्री मंत्र का जप करने से अभीष्ट की पूर्ति हो जाती है। भगवान ने कहा कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ। इसका मुख्य कारण है कि अन्य यज्ञों में जो बाहरी तैयारी, सहायता आदि की आवश्यकता पड़ती है। वे सब झंझटें जप यज्ञ में नहीं होती। जप यज्ञ में केवल सात्विक भाव, प्रेम साधना, तन्मयता, एकाग्रता की ही आवश्यकता पड़ती है। प्रेम भाव से किसी स्थान, अवस्था, समय व परिस्थिति में जप किया जा सकता है। गायत्री जप से जो मन की एकाग्रता होती है उसका वैज्ञानिक आधार भी है।

गायत्री मंत्र के अक्षरों व शब्दों का गुन्थन कुछ इस प्रकार का है कि उसके जप से स्वर यंत्रों में जो कंपन उत्पन्न होता है उसका प्रभाव पृष्ठ वंश में स्थित नस नाड़ियों में पड़ता रहता है। उन्हीं शब्दों के बार-बार दुहराने से कंपन के झटके चक्रों में लगा करते हैं और कुछ दिनों के अभ्यास के बाद वे चक्र खुलने लगते हैं। कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है। यह क्रियाएं अनजाने हुआ करती हैं।

गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं और तीन पद। ओउम् व व्याहृतियों का एक पद है। इस तरह चार पद हो जाते हैं। इन पदों व शब्दों का उच्चारण कुछ इस प्रकार किया जाता है कि ध्वनि में ताल, स्वर व लय का समावेश हो जाता है। एक स्वर में तालयुक्त लय के साथ जब जप किया जाता है तब ध्वनि का माधुर्य इतना बढ़ जाता है कि मन सब तरफ से खिंच कर इन्द्रियों सहित एक ओर लग जाता है। जप का यह तरीका गुरु मुख से ही जानने योग्य है। जैसे किसी एक योग को सीखने के लिए बार-बार अभ्यास करना पड़ता है उसी तरह गायत्री मंत्र के तालयुक्त जप का ढंग गुरु के पास रह कर अभ्यास द्वारा सीखा जाता है। जब जप ठीक ढंग से होने लगता है तब मन नहीं भागता है बल्कि उसी में आनन्द प्राप्त करने लगता है।

संगीत के जानकार जानते हैं कि विभिन्न राग-रागनियों के विभिन्न रूप होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसका पता लगा लिया था। पश्चिमी विद्वानों ने भी विज्ञान द्वारा यह प्रमाणित कर दिया है कि खास तरह के राग छेड़ने पर एक खास तरह की आकृति बन जाती है। फ्राँस में दो बार इस विषय को लेकर प्रदर्शन व परीक्षण किये गये हैं। एक में मेडम लैंग ने एक राग छेड़ा तो फलस्वरूप देवी मेरी की आकृति शिशु जिजस क्राइष्ट को गोद में लिये हुई प्रकट होती दीख पड़ी। दूसरी बार एक भारतीय गायक ने भैरव राग छेड़ा था जिसके फलस्वरूप भैरव की भीषण आकृति प्रकट हुई थी।

इसी प्रकार इटली में एक युवती ने एक भारतीय से सामवेद की एक ऋचा को सितार पर बजाना सीखा। खूब अभ्यास कर लेने के अनन्तर उसने एक बार नदी के किनारे रेत में सितार रख कर उसी राग को छेड़ा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ रेत पर एक चित्र सा बन गया। उसने अन्य कोई विद्वानों को यह बात बतलाई। उन्होंने उस चित्र का फोटो लिया। चित्र वाणी पुस्तक धारिणी सरस्वती का निकला। जब वह युवती तन्मय होकर उस राग को छेड़ती तब वही चित्र बन जाता।

इस प्रकार जब गायत्री मंत्र का जप ताल स्वर व लय के साथ किया जाता है तो राग से पुस्तक, पुष्प, कमण्डल, माला लिये हुए हंस पर आरुढ़ एक देवी का चित्र बन जाता है। उसको हमारे ऋषियों ने वेदमाता गायत्री की संज्ञा दी है। लय की विभिन्नता होने पर किसी को एक मुख वाली, किसी को पाँच मुख वाली गायत्री माता के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार प्रातः ध्यान में दूसरा रूप रहता है, मध्याह्न ध्यान में दूसरा और सायंकालीन ध्यान में दूसरा रूप रहता है। मूल तत्व में माता का ही चित्र विभिन्न रूपों व कलाओं में भासित होता है। हर मनुष्य की प्रकृति पृथक-पृथक होती है। उसी के अनुसार और समय के भेद से जप के समय गायत्री माता का ध्यान विभिन्न रूपों में किया जाता है जब अभ्यास आगे बढ़ता है तब साधक माता के ध्यान में इतना तन्मय हो जाता है कि उसकी आत्मा उसी रूप में अवस्थित हो जाती है। उस समय जप ध्यान में लीन हो जाता है।

वैज्ञानिक बता रहे हैं कि जिन विचारों का उदय मस्तिष्क में बार-बार होता है वे वहाँ चित्रित हो जाते हैं। उसी प्रकार के भाव मस्तिष्क में घर बना लेते हैं। उनसे मन का इतना लगाव हो जाता है कि उन्हीं में वह आनन्द प्राप्त करने लगता है। उन्हीं में मग्न रहता है। इसी प्रकार जब गायत्री का जप ध्यान सहित किया जाता है तब वही संस्कार घर बनाने लगते हैं। दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होने लगता है और पूर्व संस्कार और आसुरी वृत्तियाँ मिटने लगती हैं।

एक पात्र में जल भरा है। उसमें पिघला हुआ शीशा उड़ेला जाता है। जैसे-जैसे शीशे की धार पात्र की तरह धंसती जाती है वैसे ही वैसे पानी का अंश पात्र के ऊपर से बाहर बहकर निकलता जाता है। अन्त में शीशे की तह पात्र के मुँह तक आ जाती है तब पानी का कुल भाग पात्र से बाहर निकल जाता है। पात्र में शीशा ही शीशा दिखाई पड़ता है ।
इसी तरह जब साधक ध्यान सहित गायत्री का जप करता है तब मस्तिष्क रूपी पात्र मैं दैवी गुणों की धारा उड़ेलने लगता है और जल रूपी गंदे विचार बाहर गिरने लगते हैं। शुद्ध सात्विक भाव आने लगते हैं। काम, क्रोध, लोभ, सात्विक भाव आने लगते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मद, मत्सर दूर होने लगते हैं। मन शुद्ध-निर्मल होने से एकाग्र होने लगता है। वह भागा-भागा नहीं फिरता। आपका खरीदा गुलाम बन जाता है। जो चाहिए काम लीजिये।

मन की चंचलता दूर करने के लिए गायत्री जप यज्ञ से बढ़कर और कोई तरीका इतना सरल सुसाध्य व शीघ्र फल देने वाला नहीं है।

👉 साधना एवं सिद्धि

महर्षि अरविन्द ने अपनी पूर्ण योग रूपी सर्वांगपूर्ण पद्धति में बताया है कि जगत् और जीवन से बाहर निकलकर स्वर्ग या निर्वाण योग का लक्ष्य नहीं है, जीवन एवं जगत् को परिवर्तित करना ही पूर्ण योग है।
  
सर्वांगपूर्ण योग पद्धति के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति। साधना की प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है-शुद्धि। विभिन्न उपदिष्ट साधना प्रणालियों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसका क्षेत्र अति विशाल है। अंतः और बाह्य दोनों के परिशोधन का एक प्रयास है। इससे जीवन को एक काल तक परिवर्तित भी कर लेते हैं। पूर्ण योग में शरीर ही नहीं मन, प्राण, अंतःकरण अर्थात् सत्ता के समस्त अंगों का परिष्कार होता है।
  
शुद्धि की शुरुआत होती है, समता के दिग्दर्शन से। साधक निम्न प्रकृति की सभी क्रियाओं, विभिन्न द्वन्द्वों, अविद्या के आक्रमण और अपने अज्ञान को इस दृष्टि से देखता है और उसे दूर करने हेतु प्रयत्न करता है। इस शुद्धि के फलस्वरूप मन की शांति, चित्त की स्थिरता, प्राण की एकाग्रता, हृदय की तन्मयता और विकारों से निष्कृति प्राप्त होती है, जो पूर्ण योग की आधार भूमि है। ऐसे शुद्ध, शांत, चंचल और नीरव आधार पर ही तो भागवत आनन्द, प्रेम, ज्ञान का अवरोहण संभव है।
  
इसका दूसरा अंग है- मुक्ति। इसका तात्पर्य कहीं अन्य लोक-लोकान्तर में न पलायन है, न ही समस्त स्थूल क्रिया-कलापों अथवा प्रकृतिगत चेष्टाओं का परित्याग कर निर्वाण प्राप्त करना। यह आत्मा का, विभिन्न वासनाओं, शरीर बंधन एवं आकर्षणों से पहले हो जाना है। ससीम से असीम की अमरता में अभुक्त होना। इसके दो पद हैं-त्याग और ग्रहण। इसमें एक है निषेधात्मक और दूसरा विधेयात्मक। प्रथम का अर्थ है, सत्ता की निम्न प्रकृति के बंधनों, आकर्षणों से छुटकारा। द्वितीय भावनात्मक पक्ष का- तात्पर्य है उच्च स्तर आध्यात्मिक सत्ता में समाहित होना, उसकी दिव्य अनुभूतियों में रमण करना।
  
संसार भगवान् का लीला क्षेत्र है। वे इसके अणु-अणु में विद्यमान हैं। इसका पलायन करके कोई भी यथार्थ में इस  योग का योगी नहीं बन सकता है। वासना और अहंता ही हैं अज्ञान की पिटारियाँ। इनसे ही छुटकारा पाना है। सचमुच निष्काम और निरहंकारी हो अपनी आत्मा को विश्वात्मा के साथ एक करके, उच्चतम दिव्यता को धारण करना। दूसरे शब्दों में, भगवान् के समान बनना ही मुक्ति का सम्पूर्ण एवं समग्र आशय है।
  
शुद्धि एवं मुक्ति दोनों  ‘सिद्धि’  की पहले की अवस्थाएँ हैं। पूर्णयोग में सिद्धि का अर्थ है भागवत् सत्ता की प्रकृति के साथ एकत्व की प्राप्ति। अन्यान्य दर्शनों में सिद्धि की मान्यता के संदर्भ में मतभेद है। मायावादी सत्ता के सर्वोच्च सत्य निर्विकार निर्गुण एवं आत्म सचेतन ब्रह्म है। अतएव आत्मा की शुद्ध, निर्विकार शान्ति एवं चेतनता में विकसित एकाकार होना ही उसकी सिद्धि है। बौद्ध उच्चतम सत्य- सत्ता को अस्वीकृत करते हैं। उनके लिए सत्ता की क्षणिकता, कामना की विनाशकारी निस्सारता का बोध, अहंता तथा तत्संबंधी विचारों, संस्कारों एवं कर्म शृंखलाओं का विलय ही सर्वांगपूर्ण मार्ग है। पर सर्वांगपूर्ण योग में सिद्धि का तात्पर्य है-एक ऐसी दिव्य आत्मा और दिव्य कर्म को प्राप्त करना, जो विश्व में दिव्य संबंध एवं दिव्य कर्म का खुला क्षेत्र प्रदान करे। इसका समग्र अर्थ है- सम्पूर्ण प्रकृति को दिव्य बनाना तथा उसके अस्तित्व और कर्म की समस्त असत्य गुत्थियों का परित्याग।
  
भुक्ति का तात्पर्य श्री अरविन्द की दृष्टि में है-तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा अर्थात् अनासक्त भाव से उपभोग। जीवन में दिव्य पूर्णता का अवतरण करना, सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक शक्ति का क्षेत्र मानकर दिव्य भोग करना ही भुक्ति का आंतरिक सार है। तभी सिद्धि संभव हो सकेगी, देव-मानव अतिमानव बन सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३०)

जो यादों का धुँधलका साफ हो जाए

जो जग गया, उसमें साधना के लिए तीव्र लगन और गहरा समर्पण उपजेगा ही, वही इस योगकथा के सत्य को समझने के लिए सुपात्र भी हैं। महर्षि पतंजलि केवल सुपात्रों और सत्पात्रों को ही जिन्दगी के रहस्य एवं विभूतियाँ सौंपने के इच्छुक हैं। जो सत्पात्र नहीं है, जिनकी साधना नियमित और सघन नहीं है, वे इस अन्तर्यात्रा विज्ञान के शब्दों कों तो हथिया सकते हैं, पर इनका सत्य उनसे सदा दूर रहेगा। एक महान् वैज्ञानिक की भाँति महर्षि पतंजलि ने अपने अन्तर्यात्रा विज्ञान में ऐसी व्यवस्था कर रखी है। जो अनाधिकारी हैं, वे सदा वंचित रहेंगे। अन्तर्यात्रा विज्ञान का सत्य एक ही है, अधिकारी बनें और प्राप्त करें।
  
यह योगकथा आपको श्रेष्ठतम अधिकारी बनाने के लिए ही है। अपने जीवन को रूपान्तरित करके आप वह पा सकते हैं, जो महर्षि पतंजलि आपको सौंपने के लिए इच्छुक हैं, परम पूज्य गुरुदेव ने जिसे खास आपको देने के लिए सम्हाल कर रखा हुआ है। महर्षि कहते हैं कि वृत्तियों के फेर में हमारा जीवन भले ही कितना ही क्लिष्ट क्यों न हो, पर यह योग विधि से अक्लिष्ट या सुखकर हो सकता है। इसी क्रम में महर्षि पाँचवी और अन्तिम वृत्ति के रहस्य को उजागर करते हैं ः-
  
अनुभूतविषया सम्प्रमोषः स्मृतिः॥ १/११॥
  
शब्दार्थ- अनुभूत= अनुभव किए हुए, जाने हुए; विषय= (किसी) विषय का; असम्प्रमोषः = जो खोया हुआ न हो- यानि कि चित्त में संग्रहित हो, उसका ज्ञान होना; स्मृतिः= स्मृति है। संक्षेप में, किन्तु स्पष्ट स्वरों में- स्मृति पिछले अनुभवों को स्मरण करना है।
  
मन की इस पाँचवी वृत्ति के रूप में स्मृति की शक्ति का थोड़ा-बहुत अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक सभी अपनी-अपनी स्मृति का उपयोग करते रहते हैं। विद्यार्थियों के लिए तो यह स्मृति क्षमता वरदान ही है। इसी आधार पर उन्हें श्रेष्ठता का गौरव मिलता है। स्मृति के निरन्तर और अविराम उपयोग के बावजूद इसके गहन रहस्यों के बारे में बहुसंख्यक जन अनजान ही हैं। ज्यादातर लोगों के लिए तो  बस यह स्मृति कभी दुःख देती है, तो कभी सुख। कभी वे इस वृत्ति के क्लिष्ट रूप का अनुभव करते हैं, तो कभी अक्लिष्ट रूप का अहसास करते हैं। यादों के झोंके कभी तो उन्हें रुला जाते हैं, तो कभी अचानक इनका स्पर्श उन्हें हँसा देता है। स्मृति के इन्हीं रूपों एवं पर्यायों से हम परिचित हैं। पर क्या सत्य इतना ही है?

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

👉 साधु की सीख

किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था, वो जब भी नाचता तो बारिस होती थी। अतः गाव के लोगों को जब भी बारिस की जरूरत होती थी, तो वे लोग साधु के पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे नाचे, और जब वो नाचने लगता तो बारिस ज़रूर होती।

कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई की किसी साधू के नाचने से बारिस होती है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ।

शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दे दी कि हम भी नाचेंगे तो बारिस होगी और अगर हमारे नाचने से नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से भी नहीं होगी.फिर क्या था अगले दिन सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर साधु की कुटिया पर पहुंचे।

साधु को सारी बात बताई गयी , फिर लड़कों ने नाचना शुरू किया , आधे घंटे बीते और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे, कुछ देर में दूसरे ने भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई।

अब साधु की बारी थी, उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई, साधु नाचता रहा …दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई…. पर साधु तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था, धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी। लड़के दंग रह गए।
और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा-

”बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिस नहीं हुई और आपके नाचने से हो गयी?”

साधु ने उत्तर दिया – ”जब मैं नाचता हूँ तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ, पहली बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिस को होना ही पड़ेगा और दूसरी ये कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक कि बारिस न हो जाये।”

सफलता पाने वालों में यही गुण विद्यमान होता है वो जिस चीज को करते हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा यकीन होता है और वे तब तक उस चीज को करते है जब तक सफल नहीं हो जाते है।

👉 साधन और साध्य

गीताकार ने साधना क्रिया पर जोर देते हुए कहा है- ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।’  (गीता १८/४६) जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।
  
साध्य कितना ही पवित्र, उत्कृष्ट, महान् क्यों न हो, यदि उस तक पहुँचने का साधन गलत है, दोषयुक्त है, तो साध्य की उपलब्धि भी असंभव है। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधनों का होना आवश्यक हे, अनिवार्य है। ठीक इसी तरह उत्कृष्ट साध्य-लक्ष्य का बोध न हो, तो उत्तम साधन भी हानिकारक सिद्ध हो जाते हैं।
  
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में  सबसे बड़ी भूल हमारी यह होती है कि हम साध्य तो उत्तम चुन लेते हैं, महान् उत्कृष्ट लक्ष्य भी निर्धारित कर लेते हैं, लेकिन उसके अनुकूल साधनों के स्वरूप, उसकी उत्कृष्टता पर समुचित ध्यान नहीं देते। फलस्वरूप हमारे निज एवं सार्वजनिक सामाजिक जीवन में गतिरोध पैदा हो जाता है। हम अपने लक्ष्य को किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश करते  हैं तथा कई बार हम भ्रम में भटक कर गलत साधनों का उपयोग कर बैठते हैं।  परिणामतः लक्ष्य के प्राप्त होने का जो संतोष एवं प्रसन्नता मिलनी चाहिए, उससे हम वंचित रह जाते हैं।
  
चाहे सामाजिक क्रांति हो या व्यक्तिगत साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव होगी, जब साधन और साध्य को जोड़कर मनुष्य साधन निष्ठ बनेगा।
  
उच्च पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य के सामने विस्तृत संसार पड़ा हुआ है, पुरुषार्थ और प्रयत्न के साथ मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है। लेकिन वह इस राजमार्ग को न अपना कर दूसरों को  नुकसान पहुँचाता है, बढ़ते हुओं की टाँग खींचता है, व्यर्थ ही संघर्ष पैदा करता है अथवा किसी की खुशामद-मिन्नतें करता है। ये दोनों ही साधन गलत हैं। इसके लिए व्यक्तिगत प्रयत्न आवश्यक है। अपने पुरुषार्थ के बल पर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता है?
  
लोग चलते हैं, जन सेवा का लक्ष्य लेकर, लेकिन वे जनता से अपनी सेवा कराने लगते हैं। बहुत से ज्ञानी उपदेशक धर्म पर चलने के लिए बड़े लम्बे-चौड़े उपदेश देते हैं, लेकिन उनके स्वयं  के जीवन में अनेकों विकृतियाँ भरी पड़ी रहती हैं। देश सेवा के लिए, राष्ट्र को उन्नति और विकास की ओर अग्रसर करने के लिए लोग राजनीति में आते हैं, लेकिन अफसोस होता है जब वे पार्टीबाजी, सत्ता हथियाने के लिए, गुटबंदी के लिए परस्पर लड़ते-झगड़ते हैं, कूटनीति का गंदा खेल खेलते हैं, अपने घर भरते हैं, जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं।
  
साधनों में इस तरह की भ्रष्टता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर सिद्ध होती है। इससे किसी का भी भला नहीं होता, सिद्धि उनसे बहुत दूर हट जाती है। जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है, उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाय, तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उलटे उससे व्यक्ति और समाज की हानि ही होगी। उत्कृष्ट साधन भी निकृष्ट लक्ष्य की पूर्ति के आधार बन कर समाज में बुराइयाँ पैदा करने लगते हैं। अतः जिनके पास साधन हैं, माध्यम हैं उन्हें आवश्यकता है उत्कृष्ट लक्ष्य के निर्धारण की।
  
सफलता प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट लक्ष्य का चयन एवं उसके अनुकूल ही उत्कृष्ट साधनों का समुचित उपयोग आवश्यक होता है। साध्य और साधन की एकरूपता ही सफलता की आधारशिला होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २९)

नींद, जब आप होते हैं—केवल आप

ये स्वर हैं उन महासाधकों के, जो निद्रा को अपनी साधना बनाने के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ाते हैं। वे जड़ता पूर्ण तमस् और वासनाओं के रजस् को शुद्ध सत्त्व में रूपान्तरित करते हैं। और निद्रा को आलस्य और विलास की शक्ति के रूप में नहीं, जगन्माता भगवती आदि शक्ति के रूप में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहते हैं-
             या देवी सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता।
             नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
                देवी सप्तसती ५/२३-२५
    जो महा देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार उनको बारम्बार नमस्कार है।
    महायोगी आचार्य शंकर अपने अप्रतिम साधना ग्रन्थ योगतारावली में  इसकी समूची साधना विधि को बड़े ही संक्षेप में वर्णित करते हैं-
           विच्छिन्न संकल्प विकल्प मूले
                            निःशेष निर्मूलित कर्मजाले।
          निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा सा
                           जृम्भ्रते योगिनी योग निद्रा॥
          विश्रांतिमासाद्य तुरीय तल्पे
                            विश्वाद्यावस्था त्रितयोपरिस्थे।
         संविन्मयीं कामपि सर्वकालं
                           निद्रां भज निर्विश निर्विकल्पम्॥
                                       -योगतारावली २५-२६
निरन्तर अभ्यास के फल स्वरूप मन के संकल्प-विकल्प शून्य तथा कर्मबन्धन के क्षय हो जाने पर योगी जनों में योग निद्रा का आविर्भाव होता है।
  
त्रिकालातीत विश्व की आद्यावस्था तुरीयवस्था में सर्वकालबादिनी संवित्-स्वरूपिणी निद्रा प्रकाशित होती है, जहाँ योगी विश्रान्ति प्राप्त कर विचरण करते हैं। अतः निर्विकल्प स्वरूपिणी उसी निद्रा की आराधना करो।
  
यह आराधना कैसे हो? इस सवाल के जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि सोना भी एक कला है। सोते तो प्रायः सभी मनुष्य हैं, परन्तु सही कला बहुत कम लोगों को पता है। इसी वजह से वे सही ढंग से आराम भी नहीं कर पाते। ज्यादातर लोग जिन्दगी  की चिंताओं और तनावों का बोझ लिए बिस्तर पर जाते हैं और अपनी परेशानियों की उधेड़बुन में लगे रहते हैं। बिस्तर पर पड़े हुए सोचते-सोचते थक जाते हैं और अर्द्धचेतन अवस्था में सो जाते हैं। इसी वजह से वे सही ढंग से आराम भी नहीं कर पाते। उन्हें खुद भी पता नहीं लगता कि हम सोच रहे हैं या सोने जा रहे हैं। इसी वजह से नींद में मानसिक उलझनें, विभिन्न दृश्यों तथा रूपों में स्वप्न बनकर उभरती है। इस तरह भले ही शरीर कुछ भी नहीं करता हो, फिर भी मानसिक तनावों के कारण शारीरिक थकान दूर नहीं हो पाती। इस स्थिति से उबरने के लिए जरूरी है कि जब हम सोने के लिए बिस्तर में जायें, तो हमारी शारीरिक एवं मानसिक दशा वैसी ही हो, जैसी कि उपासना के आसन पर बैठते समय होती है। यानि कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र भावदशा में बिछौने पर लेटे। आराम से लेटकर गायत्री महामंत्र का मन ही मन उच्चारण करते हुए कम से कम दस बार गहरी श्वाँस लें। फिर मन ही मन अपने गुरु अथवा ईष्ट की छवि को सम्पूर्ण प्रगाढ़ता से चिंतन करें। अपने मन को धीरे-धीरे, किन्तु सम्पूर्ण संकल्प के साथ सद्गुरुदेव अथवा ईष्ट की छवि से भर दें। साथ ही भाव यह रहे कि अपनी सम्पूर्ण चेतना, प्रत्येक वृत्ति गुरुदेव में विलीन हो रही है। यहाँ तक कि समूचा अस्तित्व गुरुदेव में खो रहा है। सोचते समय मन को भटकने न दे। मन जब जहाँ जिधर भटके, उसे सद्गुरु की छवि पर ला टिकाएँ। इस तरह अभ्यास करते हुए सो जाएँ।
  
इस अभ्यास के परिणाम दो चरणों में प्रकट होंगे। इसमें से पहले चरण में आपके स्वप्न बदलेंगे। स्वप्नों के झरोखे से आपको गुरुवर की झाँकी मिलेगी। उनके संदेश आपके अन्तःकरण में उतरेंगे। इसके दूसरे चरण में योग निद्रा की स्थिति बनेगी। क्योंकि अभ्यास की जागरूक अवस्था में जब आप नींद में प्रवेश करेंगे, तो यह जागरूकता नींद में भी रहेगी। आप एक ऐसी निद्रा का अनुभव करेंगे, जिसमें शरीर तो पूरी तरह से विश्राम की अवस्था में होगा, पर मन पूरी तरह से जागरूक बना रहेगा। यही योग निद्रा है। जिसकी उच्चतर अनुभूति समाधि का सुख देती है। इस भावदशा की अनुभूति आप भी अभ्यास की प्रगाढ़ता में कर सकते हैं, बस जरा जाग तो जाएँ।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

👉 अभागा राजा और भाग्यशाली दास:-

एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे।

एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था राजा को बड़ा अहंकार था कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता वहाँ एक दास भी था बहुत ही विनम्र और सज्जन!

एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की दो नावें थी रात का समय था एक नाव मे राजा सवार हुआ और दुजि मे दास सवार हुआ दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!

राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा तो राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा की हाँ और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी पर आप क्यों नही आये!

अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर .....

गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उसपार न पहुँचा? ऐसा क्यों हुआ? जब की उसपार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!

शिष्य - हॆ नाथ मैं तो आपका अबोध सेवक हुं मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव!

ऋषिवर - हॆ वत्स राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!

और इसी तरह लोग जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहते है पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकेंगे आसक्ति की रस्सी को नही काटेंगे तब तक नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!

हॆ वत्स जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा! ये न कहो की ये मैने किया ये न कहो की ये मेरा है ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है मेरा कुछ भी नही है जो कुछ भी है सब उसी का है!

स्वयं को सामने मत रखो समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है , यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा वहाँ तो दास बनकर रहोगे तभी कोई मतलब है!

जो अहंकार से ग्रसित है वो राजा बनकर चलता है और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!

इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २८)

नींद, जब आप होते हैं—केवल आप

सम्भावनाएँ केवल विभु  में ही नहीं, अणु में भी है। पर्वत में ही नहीं, राई में भी बहुत कुछ समाया है। जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं, क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं, उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है, जो बेशकीमती है। जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं। महर्षि कहते हैं कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। चौथी वृत्ति के रूप में इसके स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं-
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १/१०॥
शब्दार्थ-अभाव-प्रत्यय-आलम्बना= अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली; वृत्तिः =वृत्ति; निद्रा=निद्रा है।
  
अर्थात् मन की यह वृत्ति, जो अपने में किसी विषय वस्तु की अनुपस्थिति पर आधारित होती है-निद्रा है। यही निद्रा ही सार्थक और यथार्थ परिभाषा है। नींद के अलावा हर समय मन अनेकों विषय वस्तुओं से भरा रहता है। भारी भीड़ होती है मन में। विचारों की रेल-पेल, अन्तर्द्वन्द्वों की धक्का-मुक्की क्षण-प्रतिक्षण हलचल मचाए रहती है। कभी कोई आकांक्षा अंकुरित होती है, तो कभी कोई स्मृति मन के पटल पर अपना रेखा चित्र खींचती है, यदा-कदा कोई भावी कल्पना अपनी बहुरंगी छटा बिखेरती है। हमेशा ही कुछ न कुछ चलता रहता है। यह सब क्षमता तभी होती है, जब सोये होते हैं गाढ़ी नींद में। मन का स्वरूप और व्यापार मिट जाता है, केवल होते हैंआप—बिना किसी उपाधि और व्याधि के।
  
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-नींद के क्षण बड़े असाधारण और आश्चर्य जनक होते हैं। कोई इन्हें समझ ले और सम्हाल ले, तो बहुत कुछ पाया जा सकता है। ऐसा होने पर साधकों के लिए यह योगनिद्रा बन जाती है, जबकि सिद्धजन इसे समाधि में रूपान्तरित कर लेते हैं। दिन के जागरण में जितनी गहरी साधनाएँ होती हैं, उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
  
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में कुशिक-सौभर व भारद्वाज ऋषि ने रात्रि की महिमा का बड़ा ही तत्त्वचिंतन पूर्ण गायन किया है। इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ ६॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ। मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।’

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Don’t run away from problems: Face them

Very often it is observed that people try to avoid or run away from pressing problems, instead of finding solutions to them. The amount of time that we waste in searching the modes and methods of escaping from a problem is much more than what is required in finding a solution to it. In fact, we should cultivate foresight in anticipating problems, big or small, relating to our home or job and should also search for and keep handy possible solutions. When a problem does crop up, we should develop courage to face it. If your inner-self says ‘I can overcome this problem’, you have already won half the battle.

Every person feels that his / her problem is far more severe than that of others whereas this may not be true. People are often seized by the negative thought ‘What sins have I committed that I am not getting rid of my problems?’ Thus they waste all their time in blaming circumstances or fate for their problems. Have you ever calmly thought: what could be the real cause of these problems? Accept it or not, all your problems have been generated by your own unorganized actions, lack of farsightedness in planning, dearth of practicality and wrong assessment of your own strengths.

Always remember that once you firmly resolve to find a solution to the impending problem, the whole scenario and the concerned people would change. The circumstances or God do not help a person who runs away from the problems instead of facing them boldly and wisely. Therefore, don’t run away from problems; face them.

✍🏻 Pt Shriram Sharma Acharya

बुधवार, 16 सितंबर 2020

👉 माँ तो माँ होती है

आज फिर से साहब का दिमाग उचट गया था ऑफिस में! बाहर बारिश हो रही थी, मन किया कि पास वाले ढाबे पर चलकर कुछ खाया जाए! सो ऑफिस का काम फटाफट निपटा कर पहुँच गए साहब ढाबे में!

रामू दौड़ता हुआ आया, हाथ  में पानी का गिलास मेज पर रखते हुए साहब को नमस्ते की और बोला "क्या बात है साहब काफी दिनों बाद आये हैं आज आप ?"

"हाँ  रामू , मैं शहर से बाहर गया था!" साहब ने जबाब दिया!
"आप बैठो साहब, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूँ!"

वो एक साधारण सा ढाबा था, मगर पता नहीं इतने बड़े साहब को वंहा आना बड़ा ही अच्छा लगता था! साहब को कुछ भी आर्डर देने की जरुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि उनका  मनपसंद  भोजन अपने आप ही रामू ले आता था! स्वाद भी बहुत भाता था साहब को यहां के खाने का! पता नहीं रामू को कैसे पता लग जाता था की साहब को कब क्या अच्छा लगेगा! और पैसे भी काफी कम लगते थे यहां पर!

साहब बैठे सोच ही रहे थे की चिर-परिचित पकोड़ों की खुशबु से साहब हर्षित हो गए!

"अरे रामू, तू बड़ा जादूगर है रे! इस मौसम में इससे  अच्छा और कुछ हो ही नहीं सकता है!" साहब पकोड़े खाते हुए बोले!

"अरे साहब, पैट भर के खाईयेगा, इसके बाद अदरक वाली चाय भी लाता हूँ!" रामू बोला!

साहब का मूड एकदम फ्रेश हो गया था!

"देखो आज मैं तुम्हारे ढाबे के कुक से मिलकर ही जाऊँगा, बड़ा ही अच्छा खाना बनाता है वो!" साहब ने फिर से अपनी पुरानी जिद्द दोहरा दी!

हर बार रामू टाल देता था, मगर आज साहब ने भी जिद्द पकड़ ली थी कि रसोइये से मिलकर ही रहूँगा, उसका शुक्रिया अदा करूँगा!
साहब जबरदस्ती रसोई में घुस गए! आज रामू की एक ना चल पायी!
अंदर का नजारा साहब ने  देखा की एक बूढी सी औरत चाय बना रही थी, वो बहुत खुश थी!

"माँ" साहब के मुंह से निकला,

"मैने तो आपको वृद्धाश्रम में डाल दिया था.....!"

"हाँ बेटा, मगर जो सुख मेरे को यहाँ तुझे खाना खिला कर मिलता है वो वहां नहीं है!"

आज साहब को पता लग गया कि रामू को उसकी पसंद की डिशेज कैसे पता है और वहां पर पैसे कम क्यों लगते हैं!

👉 चुनौती को कौन स्वीकार करे?

यों इस देश में छप्पन लाख धर्म का व्यवसाय करके अपनी रोटी कमाने वाले पेशेवर धर्मसेवक मौजूद हैं जो दान दक्षिण के ऊपर अपना निर्वाह करते हैं और जिनसे स्वभावतः यह आशा की जानी चाहिए कि वे मनुष्य जाति के भौतिक एवं आत्मिक उत्कर्ष में कुछ योग दें। पर उस ओर तो अन्धेरा ही दीखता है। उजाला हमें अपने हृदय का तेल जलाकर करना पड़ेगा। कार्यव्यस्त गृहस्थ लोगों के द्वारा ही अब तक संसार की बड़ी प्रवृत्तियाँ चली हैं। युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए हम लोग अपने को साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व  भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?

युग-निर्माण के लिए हमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। जिन दुर्बलताओं और बुराइयों ने जन-मानस पर आधिपत्य जमा रखा है उनकी बुराइयों और हानियों को यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले तो उन्हें छोड़ने कि लिए अवश्य उत्सुक होगा। यदि प्रगति और शान्ति का सच्चा मार्ग उसे विश्वासपूर्वक उपलब्ध हो जाय तो अनैतिक, अपराधपूर्ण, खतरे से भरे हुए दुखदायी रास्ते पर वह क्यों चलेगा? संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुई हैं उनमें सर्वप्रथम विचार विस्तार ही हुआ है। ज्ञान ही क्रिया का पूर्व रूप है। कोई तभी दृश्य रूप में आता है जब पहले वैसे विचार मन में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २७)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

काव्य कला सहित विश्व-वसुधा की समस्त कलाएँ प्रायः इसी रीति से जन्मी, पनपी एवं विकसित हुई हैं। विश्व को चमत्कृत कर देने वाली शोध सृष्टि भी कल्पनाओं के तर्कपूर्ण विवेकयुक्त विचार से सम्बद्ध होने से हुई है। अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विचार से कल्पना के जुड़ने से इन दोनों के अलावा एक अन्य सुखद परिणति भी होती है और वह परिणति है- जीवन जीने की कला का विकास। जीवन में एक अपूर्व कलात्मकता,लयबद्धता का  सुखद् जन्म। इस सत्य से प्रायः बहुत कम लोग परिचित हो पाते हैं, लेकिन जो परिचित हो जाते हैं-उनका जीवन सुमधुर काव्य की भाँति सुरीला, संगीत की तरह लययुक्त एवं नवीन शोध की भाँति आश्चर्यजनक उपलब्धियों का भण्डार हो जाता है।

उचित कल्पना का संस्पर्श पाकर जीवन बड़े ही आश्चर्य रीति से बदल जाता है। यह बदलाव ऐसा होता है, जैसे कि पारस लोहे के काले-कलूटे टुकड़े का छूकर सुगन्धित स्वर्ण बना दिया हो। कहानी एमिली जेन की है, जो पहले अपने बचपन में कूड़ा-करकट बीनती थी और बाद में विश्व विख्यात अभिनेत्री बन गयी। उसकी जीवन कथा-‘वन्डर ऑप वर्ड्स’ के लेखक जेम्स एलविन का कहना है कि एमिली जब छोटी थी एक दिन वह कूड़ा-करकट से कुछ बीन रही थी। बीनती-बीनती वह थक गयी। साथ कुछ लड़के-लड़कियाँ और भी थे। मनोरंजन के लिए सब मिलकर नाचने लगे। तभी वहाँ से अनविन रोजर्ट का गुजरना हुआ।
  
रोजर्ट ने बच्चों के बीच नृत्य करती हुई एमिली को देखा। उसे संकेत से पास बुलाया और धीरे से कहा—प्यारी बच्ची! तुम अद्वितीय हो, सौंदर्य और कला का अपूर्व मिश्रण तुममें है। तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकती? सचमुच ही मैं कुछ भी कर सकती हूँ? एमिली ने पूछा। हाँ, तुम कुछ भी कर सकती हो। इस एक कल्पना ने अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण, विवेक-युक्त विचारों से मिलकर एमिली को नया जन्म दिया, वह एमिली जो कला की देवी मानी जाने लगी। तभी तो परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-कल्पना को ख्याली पुलाव मत बनाओ। उसे अपनी शक्ति समझो। अपना ऊर्जा स्रोत बनाओ।
  
कल्पनाओं को यूँ भटकने देना, यूँ ही बहकने देना और उस बहाव में स्वयं भी भटकने व बहने लगना न केवल कल्पना शक्ति की बर्बादी है, बल्कि इससे जीवन भी बर्बाद होता है। ऐसे में विकल्प की यह वृत्ति क्लेश उत्पादक बन जाती है। लेकिन इसका सदुपयोग होने से यह क्लेश निवारक बन जाती है। बस, सब कुछ हम साधकों पर है कि उसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें सांसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले, तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

👉 मानव-जीवन का श्रृंगार

एक बार श्रीरंग अवधूतजी से एक भक्त ने प्रश्न किया: ‘‘महाराज! हमें श्रेय के दर्शन क्यों नहीं होते और अश्रेय के तो बार-बार होते हैं?’’

श्रीरंगजी बोले: ‘‘वेदशास्त्र और सद्गुरु-संतों का सेवन किये बिना ही श्रेय के दर्शन?’’

‘‘हम तो बहुत वर्षों से वेदशास्त्रों की बातें, कथाएँ आदि सुनते आ रहे हैं परंतु हमें कोई लाभ नहीं हो रहा है। अब तो हम थक गये हैं।’’

श्रीरंगजी: ‘‘भाई ! भगवद्भाव अनुभवगम्य वस्तु है। उसका अनुसरण करते हुए पुरुषार्थ करो तो ही उसका भाव मिलता है। सारी पृथ्वी को खोद डालो, उसमें से गुलाब, मोगरे की सुगंध मिलेगी ही नहीं। फिर आप कहोगे कि पृथ्वी में अमाप पुरुषार्थ करके देख लिया परंतु उसमें तो गुलाब, मोगरे की सुगंध है ही नहीं। मूल बात को समझनेवाला यदि कोई व्यक्ति दो गमले लाये और उसमें मिट्टी भरकर मोगरा व गुलाब के पौधे लगाये। उसमें से सुगंधित पुष्प सामने देखोगे तो तुम्हें विश्वास होगा कि सभी प्रकार के तत्त्व पृथ्वी में ही हैं। उन्हें प्रकट करने के लिए पहले उनका रूपक बनाना पड़ता है। जैसे इन मोगरा-गुलाब की सुवास को पृथ्वी से प्रकट करने के लिए उनके पौधे अथवा बीज हों तो तत्त्व द्वारा प्रकट होते हैं, ऐसे ही वेदशास्त्रों और संतों का सेवन अर्थात् वेदशास्त्रों का स्वाध्याय करो और संतों का सान्निध्य-लाभ लो, सेवा करो व उनके उपदेश के अनुसार आचार-व्यवहार करो। इसके द्वारा अपने भीतर के अशुभ संस्कारों को निर्मूल करो। गुरुगम्य जीवन बनाओ। फिर श्रेय के दर्शन की बात करना।’’

एक बार श्रीरंगजी ने अपने शिष्य को आज्ञा की:‘‘सिद्धपुर में नदी के किनारे ऐसी जगह घास की कुटिया बनाओ जहाँ किसी भी दिशा से लोग गाड़ियाँ लेकर नहीं आ सकें। मुझे पता है कि जीवन का सारा समय तो लोक-संग्रह में दे दिया पर अंतिम पलों के तो हमें खुद ही मालिक होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य तो निर्गुण ही होना चाहिए।’’

श्रीरंगजी के मुख से ऐसी बात सुनते ही सारे भक्तों की आँखों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं। तब महाराजजी उन्हें शांत करते हुए बोले: "मैं कहीं आता-जाता नहीं हूँ। पामरता त्यागो, वीरता का अनुभव करो। मानव-जीवन के क्षण बहुत महँगे हैं, फिर भी उनका मूल्य समझ में नहीं आता। कितनी सारी वनस्पतियों का तत्त्वसार शहद है। इससे वह हर प्रकार की मिठासों में प्रधान है और उत्पत्ति की दृष्टि से भी बहुत कीमती है। तो महामूल्यवान शरीर की कीमत कितनी। यदि मानव-देह इतनी ज्यादा कीमती है तो उसे ऐसे-वैसे नष्ट क्यों कर दें?’’

भक्त ने पूछा: ‘‘स्वामीजी! ऐसे मूल्यवान मानव-जीवन का श्रृंगार क्या है?’’

‘‘ब्रह्मचर्य, मौन-व्रत, सत्य और मीठी वाणी, मित भाषण, मिताहार, सत्य दर्शन, सत्य श्रवण, सत्य विचार और निष्काम कर्म - ये सारे मानव-जीवन के व्रत हैं किंतु ‘भगवत्प्रेम’ ही मानव-जीवन का श्रृंगार है।’’

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २६)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

जीवन जागृति का संदेश देने के पश्चात् समाधिपाद के नवें सूत्र में योग सूत्रकार महर्षि तीसरी वृत्ति का खुलासा करते हुए कहते हैं-
शब्द ज्ञानानुयाती वस्तु शून्यो विकल्पः॥ १/९॥
  
अर्थात् शब्दों के जोड़ से हर एक का परिचय है। हम सभी अपने जीवन के क्षणों को कल्पनाओं से सँवारते रहते हैं। कई बार ये कल्पनाएँ हमारे अतीत से जुड़ी होती हैं और कई बार हम इन कल्पनाओं के धागों से अपने भविष्य का ताना-बाना बुनते हैं। हम में से बहुसंख्यक कल्पना करने के इतने आदी हो चुके हैं कि मन ठहरने का नाम ही नहीं लेता। किसी भी कार्य से उबरते ही कल्पनाओं के हिडोंले में झूलने लगता है। भाँति-भाँति की कल्पनाएँ, रंग-बिरंगी और बहुरंगी कल्पनाएँ, कभी-कभी तो विद्रूप और भयावह कल्पनाएँ चाहे-अनचाहे हमारे मन को घेरे रहती हैं। कभी हम इनकी सम्मोहकता में खो जाते हैं, तो कभी इनकी भयावहता के समक्ष हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्थिति यहाँ तक है कि कल्पना रस हमारा जीवन रस बन चुका है।
  
कल्पना रस में डूबे और विभोर रहने के बावजूद हमने इसे ठीक तरह से पहचाना नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव इस सम्बन्ध में कहा करते थे- कल्पनाएँ सदा ही कोरी और खोखली नहीं होती, इन्हें ऊर्जा व शक्ति के स्रोत के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। जो योगी ऐसा कर पाते हैं, वे ही सही ढंग से मन की विकल्प वृत्ति का सदुपयोग करना जानते हैं। कैसे किया जाय यह सदुपयोग? इस प्रश्न का पहला बिन्दु है कि कल्पना में निहित शक्ति को उसकी सम्भावनाओं को पहचानिये। यह समस्त सृष्टि ब्रह्म की कल्पना ही तो है, हम सब उसके सनातन अंश हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कल्पनाओं में भी सम्भावनाओं के अनन्त बीज छुपे हैं।
  
कल्पना में समायी शक्ति की सम्भावनाओं पर विश्वास करने के बाद दूसरा बिन्दु है-कल्पनाओं की दिशा। गुरुदेव का कहना था हमें सदा ही विधेयात्मक कल्पनाएँ करनी चाहिए, क्योंकि निषेधात्मक कल्पनाएँ हमारी अन्तःऊर्जा को नष्ट करती हैं, जबकि विधेयात्मक कल्पनाएँ हमारे अन्तःकरण को विशद् ब्रह्माण्ड की ऊर्जा  धाराओं से जोड़ती हैं। उसे ऊर्जावान् और शक्तिसम्पन्न बनाती है। इस तकनीक का तीसरा बिन्दु है - कल्पनाओं को अपनी अभिरुचि के अनुसार अन्तः भावनाओं अथवा विवेकपूर्ण विचार से जोड़ना। इस प्रक्रिया के परिणाम बड़े ही सुखद और आश्चर्यजनक होते हैं। अन्तः भावनाओं  से संयुक्त होकर कल्पना कला को जन्म देती है, जबकि विवेकपूर्ण विचार से जुड़कर कल्पना शोध की सृष्टि करती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आज की महानतम आवश्यकता

युग-निर्माण का महान कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें सन्तोष दे सकती है उन्हें ‘जीवित मृत’ ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब—रखने की नीति पसंद है। पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए, विश्व-मानव के उत्कर्ष के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इनकार न करेंगे।

युग-निर्माण जैसी युग की पुकार सर्वथा अनसुनी, नितान्त उपेक्षित पड़ी रहे और उसके लिए कोई अपनी प्रसन्नता, अभिरुचि प्रकट न करे और कोई उसमें कुछ हाथ न बटावे अभी इतने आत्मिक पतन का जमाना नहीं आया है। नष्ट−भ्रष्ट स्वास्थ की पीड़ा से तड़पते हुए रुग्ण मनुष्यों को निरोग और दीर्घजीवी देखने के लिए—क्या किसी की आँखें उत्सुक नहीं? दुर्बुद्धि और दुराचार में डूबे हुए नर-पिशाच की तरह मानसिक अशान्ति की नारकीय ज्वाला में जलते हुए लोगों को सज्जनता, सद्भावना, स्नेह और सत्कर्मों में संलग्न रहकर शान्ति एवं सन्तोष के साथ मुसकराते हुए देखने के लिए क्या किसी का मन न हुलसेगा?

द्वेष, असहयोग, अविवेक, अन्धविश्वास एवं उच्छृंखलता के वातावरण को हटाकर स्नेह, सहयोग, न्याय, विवेक, व्यवस्था एवं अनुशासन से सुसम्पन्न सभ्य-समाज की स्थापना किसे प्रिय न लगेगी? यह तीनों ही बातें उत्तम, महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। किन्तु इनका प्रस्तुत होना तभी संभव है जब इसके लिए हम प्रयत्न करें। स्वार्थ में सिर से पैर तक उलझा हुआ मनुष्य इस प्रकार के निस्वार्थ कामों में तभी रुचि ले सकता है जब उसमें परमार्थ भावना जगे। विश्वास किया जाना चाहिए कि हमारे ऋषि रक्त में अभी परमार्थ भावना बिलकुल निस्वत्व नहीं हुई है। वह मूर्छित पड़ी है, उद्बोधन मिलने पर वह जग सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 Believe in yourself

If you wish that others should believe in you, the easiest and best way is that first you believe in yourself. There are many people who are considered irresponsible and unscrupulous; no one believes them; they are upbraided everywhere. Such people normally don’t have faith in themselves. Their faces, expressions and speech clearly indicate that they don’t believe in themselves.

People in the external world label us the way we present ourselves to them. When misery, poverty, incapability, disappointment, weakness, etc are expressed through our behavior, conduct and character, people consider us to be miserable, poor, incapable, disappointed, weak, etc and treat us accordingly. Those who meet the challenges of life courageously and confidently are surely able to achieve their objectives. God helps those who help themselves.

Whatever task is in your hands, try to accomplish it with full attention. Believe fully in your ability, wisdom and competence. Focus your entire energy and aim at accomplishing your target. Discard inferiority complex and laziness and learn to do the work in hand with seriousness, enthusiasm and confidence. Always keep in mind that only self-confident persons are successful in this world.

✍🏻 Pt Shriram Sharma Acharya

सोमवार, 14 सितंबर 2020

👉 सत्संग: -

एक बार एक युवक पुज्य कबीर साहिब जी के पास आया और कहने लगा,

‘गुरु महाराज! मैंने अपनी शिक्षा से पर्याप्त ज्ञान ग्रहण कर लिया है। मैं विवेकशील हूं और अपना अच्छा-बुरा भली-भांति समझता हूं, किंतु फिर भी मेरे माता-पिता मुझे निरंतर सत्संग की सलाह देते रहते हैं। जब मैं इतना ज्ञानवान और विवेकयुक्त हूं, तो मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है?’

कबीर ने उसके प्रश्न का मौखिक उत्तर न देते हुए एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर मार दी। युवक अनमने भाव से चला गया।

अगले दिन वह फिर कबीर के पास आया और बोला,

 ‘मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने उत्तर नहीं दिया। क्या आज आप उत्तर देंगे?’

कबीर ने पुन: खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी। किंतु बोले कुछ नहीं।

 युवक ने सोचा कि संत पुरुष हैं, शायद आज भी मौन में हैं।

वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया।

कबीर ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चलाई। अब युवक परेशान होकर बोला,

‘आखिर आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं।’

 तब कबीर ने कहा, ‘मैं तो तुम्हें रोज जवाब दे रहा हूं। मैं इस खूंटे पर हर दिन हथौड़ी मारकर जमीन में इसकी पकड़ को मजबूत कर रहा हूं। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो इससे बंधे पशुओं द्वारा खींचतान से या किसी की ठोकर लगने से अथवा जमीन में थोड़ी सी हलचल होने पर यह निकल जाएगा।"

 यही काम सत्संग हमारे लिए करता है। वह हमारे मनरूपी खूंटे पर निरंतर प्रहार करता है, ताकि हमारी पवित्र भावनाएं दृढ़ रहें।

युवक को कबीर ने सही दिशा-बोध करा दिया। सत्संग हर रोज नित्यप्रति हृदय में सत् को दृढ़ कर असत् को मिटाता है, इसलिए सत्संग हमारी दैनिक जीवन चर्या का अनिवार्य अंग होना चाहिए।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २५)

जानें, किस भ्रम में हैं हम

गुरुदेव कहते थे समाज और परिवार परम्पराओं, रूढ़ियों के नाम पर ऐसे असत् ज्ञान का विपर्यय का बोझ ढोए जा रहे हैं। समाज ही क्यों व्यक्ति के रूप में हमारी अपनी जीवन शैली भी विपर्यय से घिरी है। अनगिनत मिथ्या धारणाएँ हमें घेरे हैं। इनके कारण हमारी जीवन ऊर्जा बरबाद हो रही है। रस्सी को साँप समझकर हम डरे हुए हैं। रेगिस्तान की तपती रेत में पानी के भ्रम से भ्रमित होकर लोभ के कारण भाग रहे हैं। कहीं हमें भय सता रहा है, तो कहीं लोभ। जबकि दोनों ही औचित्यहीन हैं। मिथ्या धारणाओं से ग्रसित मन जो प्रक्षेपित करता है, उसी को सच समझ लेते हैं। हमारे पूर्वाग्रह, दुराग्रह से भरी हुई धारणाएँ हमारी जानने की शक्ति को ढके हुए हैं।
  
साधक वही है, जिसकी निगाहों में ताजगी हो। जो क्षण प्रतिक्षण मन-अन्तःकरण पर जमने वाली धूल-मिट्टी को हटाता रहे। अतीत के हर पल को मिटने दे और सच्चा सत्यान्वेषी हो। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार विपर्यय है तो मिथ्या ज्ञान। सामान्यतया इसे साधना के लिए बाधा ही समझा जाता है। पर यदि साधक समझदार हो, तो इसे भी अपनी साधना बना सकता है। भ्रम में समझदारी पैदा हो जाय। भ्रमित करने वाली वस्तु, विषय या विचार के प्रति जागृति हो जाय, तो भ्रम अपने आप ही टूट जाते हैं।
  
साधकों ने यदि गुरुदेव की पुस्तक ‘मैं क्या हूँ?’ पढ़ी होगी, तो इस तत्त्व को और गहराई से समझ सकते हैं। यदि किसी ने यह पुस्तक अब तक न पढ़ी हो, तो उसे अवश्य पढ़ना चाहिए। क्योंकि प्रकारान्तर से इसमें विपर्यय को साधना विधि बनाने की तकनीक है। और वह साधनाविधि विपर्यय के प्रति सचेत होना, जागरूक होना। उसे परत-दर-परत उद्घाटित करना मैं क्या हूँ? इस गहन जिज्ञासा के साथ ही विपर्यय की परतें उघड़ने लगती हैं। इस क्रम में पहले अपने को देह मानने का असत् ज्ञान टूटता है। फिर टूटता है अपने को प्राण मानने का परिचय। इसके बाद मन की मान्यता समाप्त होती है। फिर बुद्धि का तर्कजाल भी समाप्त होता है। अन्त में निदिध्यासन का यह क्रम भाव समाधि का स्वरूप लेता है और पता चलता है- आत्मा का परिचय। होता ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का प्रगाढ़ बोध। जीवन के सारे विपर्यय समाप्त होते हैं। असत् का अँधेरा मिटकर सत् का प्रकाश होता है।
  
यह सब होता है विपर्यय के सत्य और तत्त्व को सही तरह से जानने पर। क्षण-प्रतिक्षण अपने ऊपर से मिथ्या धारणाओं के आवरण को हटाने पर। इस तरह क्लिष्ट कही जाने वाली विपर्यय वृत्ति भी अक्लिष्ट हो सकती है। बस इसके लिए साधकों में समझदारी भरी साधना होना चाहिए। उन्हें बस अपने जीवन शैली और जीवन तत्त्व दोनों ही आयामों में छाई हुई विपर्यय घटाओं के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। तो आज और अभी से प्रारम्भ करें अपनी यह जागरूकता की ध्यान साधना।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 12 सितंबर 2020

👉 क्षण में शाश्वत की पहचान

क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता हैं इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे -गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।

जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते है, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते है और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।

जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिन्दु सच्चिदानंद साँगर की ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।

एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण बात कौन सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, “ वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।”

बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २४)

जानें, किस भ्रम में हैं हम
    
प्रमाण वृत्ति के तीनों स्रोतों से साक्षात्कार करने के उपरांत समधिपाद के आठवें सूत्र में महर्षि ने दूसरी वृत्ति का खुलासा किया है। वह कहते हैं-
विपर्ययो मिथ्या ज्ञानमतद्रूप प्रतिष्ठिम्॥ १/८॥

यानि कि विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है, जो विषय से उस तरह मेल नहीं खाती, जैसा वह है। शास्त्रकारों ने विपर्यय को असत् ज्ञान कहा है। यानि कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के बारे में झूठी धारणा है। इसे चित्त की भ्रमित स्थिति भी कह सकते हैं। मजे की बात यह है कि ऐसी स्थिति हममें से किसी एक की नहीं है, बल्कि प्रायः हम सबकी है। जीवन के किसी न किसी कोने में हम सभी भ्रमित हैं। सच यही है कि हम तथ्य को जाने, सत्य को अनुभव करें, उसके पहले ही उस विषय या वस्तु के बारे में ‘अनगिन धारणाएँ’ बना लेते हैं।
  
कई बार तो ये धारणाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। उस धारणा से सम्बन्धित असत् ज्ञान को जिस-किसी तरह निभाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि व्यक्ति अकेला नहीं, परिवार और समाज भी असत् ज्ञान कि विपर्यय के भारी बोझ से लदे हैं। उसे ढोए जा रहे हैं। इस बारे में वह एक बड़ी रोचक कथा सुनाते थे। यह कथा प्रसंग एक ग्रामीण परिवार का था। इस परिवार में एक परम्परा थी कि शादी-विवाह के समय परिवार के लोग एक बिल्ली को पकड़कर एक टोकरी के नीचे ढक देते। शादी-विवाह का आयोजन चलता रहता। इसमें कई दिन बीत जाते। तब तक प्रायः बिल्ली मर जाती। बाद में उसे फेंक दिया जाता। ग्रामीण परिवार में यह प्रथा सालों से नहीं, पीढ़ियों से चल रही थी। कभी किसी ने इस प्रथा से जुड़ी धारणा के बारे में खोज-बीन करने की कोशिश नहीं की।
  
उस परिवार के लोगों का ध्यान ज्यादातर इस बात पर टिका रहता था कि घर में जब भी कोई शादी हो, तब एक बिल्ली को टोकरी के नीचे रख देना है। फिर जब सारा आयोजन समाप्त हो जाय, तो उस मरी हुई बिल्ली को कहीं फेंक देना है। परिवार की नयी पीढ़ी के लोग जिसने भी इस प्रथा के औचित्य को जानने की कोशिश की उसे झिड़क दिया गया। घर के बड़े-बूढ़ों ने उन्हें धमकाया, घर से बाहर निकाल देने की धमकी दी। और कहा कि बुजुर्गों की बातों पर सवाल उठाते हो? बस, इतना जान लो कि शादी के समय ऐसा करना शुभ होता है। बिल्ली को मार देने से भला शुभ का क्या सम्बन्ध है? इस सवाल का उत्तर किसी ने भी न दिया।
  
लेकिन परिवार के एक नवयुवक से रहा न गया। उसने बात की जड़ में जाने की ठान ली। उसने परिवार की पुरानी डायरियों को पलटा। गाँव के बड़े-बुजुर्गों से बात की। अंत में उसे सच्चाई का पता चला। सच्चाई यह थी कि सालों पहले पुरानी पीढ़ी में एक लड़की की शादी थी। सभी लोग शादी के काम में जुटे थे। घर में पालतू बिल्ली थी, जो इधर-उधर दौड़कर जब-तब चीज-सामानों को गिरा रही थी। गृहस्वामिनी उसके इस व्यवहार से परेशान हो गयी। अन्त में उसने उस बिल्ली को एक टोकरी के नीचे ढक दिया। काम-काज की व्यस्तता में वह उसे भूल गयी। शादी के बाद जब याद आयी, तो उसे टोकरी से निकाला, लेकिन तब तक बिल्ली मर चुकी थी। बड़े ही दुःखी मन से उसे बिल्ली को फेंकना पड़ा। इस सत्य ज्ञान को जानते ही असत् ज्ञान अपने आप ही खत्म हो गया। उस घर के लोगों को जब इस सच्चाई का  पता चला, तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

👉 समस्या रूपी बंदर:-

एक बार स्वामी विवेकानंद को बंदरों का सामना करना पड़ा था। वह इस आप बीती को कई अवसरों पर बड़े चाव के साथ सुनाया करते थे। इस अनुभव का लाभ उठाने की बात भी करते थे।

उन दिनों स्वामी जी काशी में थे वह एक तंग गली में गुजर रहे थे। सामने बंदरों का झुंड आ गया। उनसे बचने के लिए स्वामी जी पीछे को भागे। परंतु वे उनके आक्रमण को रोक नहीं पाए। बंदरों ने उनके कपडे तो फाड़े ही शरीर पर बहुत-सी खरोंचें भी आ गईं। दो-तीन जगह दांत भी लगे। शोर सुनकर पास के घर से एक व्यक्ति ने उन्हें खिड़की से देखा तुरंत कहा- “स्वामी जी! रुक जाओ, भागो मत। घूंसा तानकर उनकी तरफ बढ़ो। “स्वामी जी के पांव रुके। घूंसा तानते हुए उन्हें ललकारने लगे। बंदर भी डर गए और इधर-उधर भाग खड़े हुए। स्वामीजी गली को बड़े आराम से पार कर गए।

इस घटना को सुनाते हुए स्वामी जी अपने मित्रों तथा शिष्यों को कहा करते- “मित्रो! हमें चाहिए कि विपरीत हालात में डटे रहें, भागें नहीं। घूंसा तानें। सीधे हो जाएं। आगे बढ़ें। पीछे नहीं हटें। कामयाबी हमारे कदमों में होगी।“वास्तव में समस्या पलायन से नहीं सामना करने से खत्म होती है। भागने वालों का समस्या बंदर की भाँति पीछा करती है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २३)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?
  
पतञ्जलि का कहना है कि सम्यक् ज्ञान के लिए हमें सम्यक् तर्क करना आना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हम इस विराट् सृष्टि को देखें,गौर से निहारें और तर्क का सम्यक् प्रयोग करें, तो ईश्वर के अस्तित्व का अनुमान होता है। यह ठीक है कि ईश्वर की सत्ता इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं है। ईश्वर कहीं दिखाई नहीं देता, नजर नहीं आता। किन्तु यदि सम्यक् तर्क का प्रयोग करें,यह सोचें  कि विश्व ब्रह्माण्ड की व्यवस्था कितनी सुसंगत है,कितनी उद्देश्यपूर्ण है,तो इस निश्चय पर जरूर पहुँचेंगे कि ईश्वर के रूप में इसकी संचालक सत्ता का भी अस्तित्व होगा। इस तरह सम्यक् तर्क से ईश्वरीय सत्ता का बड़ा ही स्पष्ट अनुमान हो सकता है। बाद में योग साधना के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी पायी जा सकती है।
  
अब है सम्यक् ज्ञान का तीसरा स्रोत-आगम। यह सबसे अधिक सौन्दर्यपूर्ण है। आगम को सम्यक् ज्ञान के स्रोत के रूप में स्वीकारना महर्षि पतञ्जलि की अपनी विशिष्टता है। यह आगम क्या है? तो महर्षि कहते हैं कि आगम महायोगियों के वचन हंै। ये ऋषियों की अनुभति की अभिव्यक्ति देने वाले शब्द है। इस बात को थोड़ा और स्पष्ट रीति से कहें, तो आगम-उन महान् विभूतियों के वचन हैं,जो जान चुके हैं। जो लक्ष्य तक पहुँच चुके हैं,जो कैवल्य ज्ञान को पा चुके हैं, जो ईश्वरीय सत्य का साक्षात्कार कर चुके हैं,उनके शब्द भी सम्यक् ज्ञान का स्रोत है।
  
परम्परा में आगम को वेद कहा जाता है। यह ठीक भी है क्योंकि वेद सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। परन्तु रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़ जन वेद के विराट् स्वरूप को केवल कतिपय मंत्र समुच्चय तक ही समेट देते हैं। यह ठीक नहीं है। आगम सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। भले ही संस्कृत में कहा गया हो,अथवा किसी अन्य भाषा में। व्यापक अर्थों में आगम में कबीर की साखी, मीरा के पद, श्रीरामकृष्ण का वचनामृत, महर्षि रमण के वचन, योगीराज अरविन्द का दिव्य जीवन संदेश और स्वयं परम पूज्य गुरुदेव के स्वर सभी कुछ समाहित हो जाता है। इन सत्य द्रष्टा ऋषियों—संतों के वचनों पर श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। योगपथ पर चलने वाले साधकों के लिए सम्यक् ज्ञान का यह तीसरा स्रोत सबसे अधिक  मत्त्वपूर्ण एवं व्यावहारिक है। योग साधना करने वालों के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपने सद्गुरु के वचनों पर परिपूर्ण श्रद्धा-सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। सद्गुरु के वचन कभी-कभी बड़े अटपटे होते हैं। परन्तु वे प्रेम लपेटे होते हैं। उन्हें ठीक-ठीक समझ न पाने पर भी यदि कोई साधक उन पर समग्र श्रद्धा के साथ आचरण करने लगता है,तो उसे अपने आप ही सम्यक् ज्ञान हो जाता है।
    
सद्गुरु के वचनों के सम्बन्ध में तर्क का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि ये चेतना के जिस तल से कहे गए हैं, वहाँ तर्क, बुद्धि की पहुँच ही नहीं है। यदि इस बारे में तर्क किया जाए, तो हम वह सब गवाँ बैठेंगे, जो हमें हमारे सद्गुरु देना चाहते हैं। क्योंकि वे न केवल यह जानते हैं कि उन्हें हम शिष्यों को क्या देना है? बल्कि वे यह भी जानते हैं कि जो हमारे लिए देने योग्य है,वह सब  किस तरह से देना है। इसलिए केवल और केवल भक्ति पूर्ण श्रद्धा ही एकमात्र उपाय है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि सद्गुरु जो कहें,जिस भी तरह कहें,उसे परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करने पर सम्यक् ज्ञान सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं। प्रमाणवृत्ति के ये तीनों स्रोत हमारी अन्तर्यात्रा में सहायक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Prayer: The Nourishment of Soul

If I do not get food I am least worried but it makes me mad if I miss my prayer. Prayer is million times more beneficial than food. One may forego his food but not his prayer. Prayer is the very nourishment of soul. It would be too good, if we could contemplate on God whole day long, but since it is not possible for us all, it is desirable that we should sit at least for a few hours every day in contemplation of God.

Eulogy, worship and prayer are not blind faiths, but they are real and true acts like eating, drinking, walking and sitting; nay, if we say that it is the only truth and all the rest are false and unreal, it would be no exaggeration. Offering of prayer does not mean begging, but, in fact, it is the natural voice of soul. When we fully come to realize our incapabilities and leaving all other worldly recourses aside, confide our faith in God, the very outburst of our emotions in such a state is called prayer. The offering of prayer and singing songs in praise of God are not mere utterances of one's tongue but are actually the outpourings of one's heart. This is the reason that even the dumb, the stammerers, and the stupid persons can also offer prayer.

The main purpose of offering prayer is, to seek discourse with God and to gain light for the purification of the soul, so that we could win over our weaknesses. Prayer devoid of emotion is of no use.

What to talk of the other world, even in this world prayer is a source of peace and happiness. So if we really wish to become human, we must make our lives interesting and fruitful through prayer. It is, therefore, advisable for everyone to remain engrossed in prayer with heart and soul. All complicated riddles arising out of national, social and political problems find their easy and quick solutions through prayer than through intellect.

MAHATMA GANDHI

बुधवार, 9 सितंबर 2020

👉 सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया। वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।

अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। 

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया.. अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। 

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।  

ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि, आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे...

ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २२)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?

परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि प्रत्यक्ष को चेतना-प्रत्यक्ष मानने से ही महर्षि पतञ्जलि जैसे महायोगी का भाव प्रकट होगा। यदि हम प्रत्यक्ष को केवल इन्द्रिय-प्रत्यक्ष की सीमा में सिकोड़ दें, तो हम उन्हें चार्वाक जैसे नास्तिक एवं जड़वादी दार्शनिकों की श्रेणी में  खड़ा कर देंगे। क्योंकि चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक बृहस्पति का प्रमुख मत यही तो है कि जो कुछ इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं, जो नजरों के सामने है-वही प्रमाण है। चार्वाक को भारतीय भौतिकवाद का स्रोत माना जाता है। इस दर्शन में बुद्धि चातुर्य तो है,पर चेतना का बोध नहीं है। चार्वाक कोरे बुद्धिवादी हैं, जबकि महर्षि पतञ्जलि सम्यक् बोध प्राप्त महायोगी हैं। उनके भाव को ठीक-ठीक समझने के लिए किसी महायोगी का बोध ही सहायक बन सकता है। परम पूज्य गुरुदेव हमें यही सहायता प्रदान करते हैं।
  
वह कहते हैं कि गहरे ध्यान अथवा समाधि में हमारी अर्न्तचेतना जिस ज्ञान की अनुभूति करती है,वही सत्य है। उसी को प्रमाण माना जा सकता है। इन्द्रियों से हमें जो जानकारी मिलती है,वह प्रायः आधी-अधूरी और दोषग्रस्त होती है। यही कारण है कि इन्द्रियाँ हमें भटकाती और भ्रमित करती हैं। काम-क्रोध,लोभ-मोह की दशाएँ इन्द्रियों को जब- तब आच्छादित करती है और परिणाम में व्यक्ति को कुछ का कुछ समझ में आने लगता है। कभी-कभी यही दशा नशेड़ी व्यक्ति की होती है। इस संबंध में  गुरुदेव अपने गाँव के पास का किस्सा सुनाया करते थे। उनके गाँव के पास के गाँव में एक ठाकुर बच्ची सिंह रहा करते थे। उनकी अफीम खाने की आदत थी। अफीम  खाने के बाद वे नशे में काफी ऊट-पटांग, हरकतें करते थे। एक बार उन्होंने शाम को ज्यादा अफीम खा ली। नशा गहरा होने पर वे कहने लगे,देखो अब मेरे पास उड़ने की ताकत आ गयी है, अब मैं उड़ सकता हूँ। ऐसा कहते हुए वह अपने मकान की छत से हाथ फैलाए हुए उड़ने की मुद्रा में नीचे कूद पड़े। सिर पर गहरी चोट लगने से उनकी मृत्यु हो गयी। बेचारे वह जान भी नहीं सके कि नशे के असर में वह अपनी इन्द्रियों द्वारा धोखा खा गए।
    
इन्द्रियाँ भरोसे काबिल हैं भी नहीं। बिना नशे के वे हमें भटकाती और भ्रमित करती रहती हैं। जो बचपन में समझ में आया, वह किशोरावस्था में बेकार नजर आती है। किशोरावस्था की बातें प्रौढ़ावस्था में बेमानी हो जाती है। यही सिलसिला चलता रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष बोध आखिर है क्या? तो जवाब यह है कि प्रत्यक्ष बोध वह है, जिसे इन्द्रियों के बिना जाना जा सके। इसलिए पहला सम्यक् ज्ञान केवल अपनी आन्तरिक सत्ता का हो सकता है। क्योंकि इसके लिए किसी भी इन्द्रिय सहायता की जरूरत नहीं है। कोई भी गहरे ध्यान अथवा समाधि में उतरकर इसे पा सकता है।
  
प्रमाणवृत्ति अथवा सम्यक् ज्ञान का दूसरा स्रोत अनुमान है। यह उनके लिए है, जो अभी प्रत्यक्ष बोध के लायक नहीं हुए हैं। जिनकी स्थिति अभी ध्यान और समाधि की गहराई में प्रवेश करने की नहीं है। जो सम्यक् ज्ञान पाना चाहते हैं, अनुमान उनके लिए एक सम्भावना है। यह अनुमान क्या है? परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में यह है विवेक युक्त तर्क। तर्क के बारे में गुरुदेव का कहना था कि तर्क दुधारी तलवार की तरह है, इसके इस्तेमाल के लिए गहरे विवेक की जरूरत है। विवेक के अभाव में यह सत्य ज्ञान की प्राप्ति में सहायक बनने की बजाय असत्य ज्ञान का पोषक भी हो सकता है। उदाहरण के लिए तर्क का प्रयोग चार्वाक एवं मार्क्स ने भी किया और आचार्य शंकर एवं महर्षि अरविन्द ने भी। परन्तु एक में विवेक का अभाव है, तो दूसरे में विवेक का प्रभाव। इस स्थिति में इनके दर्शन और दार्शनिकता का पूरा का पूरा ढाँचा बदल गया है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 The key to success and self-fulfillment

Thus the key to a person’s success and fulfillment in life is the intensity and focus of his will and faith in his ability to manifest his indwelling divine potentialities. He works with the available resources and gets results according to the circumstances created by his deeds. One may call it destiny, fortune or the result of karma, but by and large it is the outcome of one’s own will and faith.

That is why it has been said that a man is the maker of his own destiny. Whosoever has achieved success and fulfillment in this world has worked whole heartedly to achieve his set goal. Such people have been ever active, with unwavering will, to achieve their aims. This strong will enabled them to overcome all the obstacles, keep hope and faith alive in the hour of failure and make fresh attempts, leading to ultimate success. Therefore, in one word, a strong will alone may be called the real basis of success.

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

👉 परमात्मा ने जो दिया है

एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं?

चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे? हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वहक्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा, तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।

पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें। उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी। सुना है कि चित्रकार अब तक छातीपीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!

आदमी करीब-करीब इस हालत में है। परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है। और हम मांगे जा रहे हैं–दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात। और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है। जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है। लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २१)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?

पंच वृत्तियों का उल्लेख करने के उपरांत महर्षि पतञ्जलि इनमें पहली वृत्ति प्रमाण के बारे में सुस्पष्टता से समझाते हैं। वह कहते हैं-
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणामि॥ १/७॥

अर्थात् सम्यक् ज्ञान अथवा प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैंः प्रत्यक्ष बोध,अनुमान और योग सिद्ध आप्त पुरुषों के वचन। यही वे तीन विधियाँ हैं, जिनके द्वारा योग साधक को ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इनमें पहली विधि प्रत्यक्ष बोध की है। यह सम्यक् ज्ञान का प्रथम स्रोत है। इसका मतलब है, आमने-सामने का साक्षात्कार। ज्ञाता और ज्ञेय के बीच किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं रहती। सत्य को समझाने-बतलाने के लिए किसी दुभाषिये की आवश्यकता नहीं रह जाती।
  
बात बिल्कुल साफ है,सरल और सीधी है। फिर भी अनेकों अड़चनें हैं—इसे समझने में। प्रायः योग सूत्र के भाष्यकारों, वार्तीककारों ने इस सीधी, सरल और साफ बात की बड़ी गलत व्याख्या की है। उन्होंने प्रत्यक्ष बोध को इन्द्रिय बोध की सँकरी सीमा में समेट दिया है। उदाहरण के लिए कई आचार्यों का कहना है कि प्रत्यक्ष वही है-जो आँखों के सामने है। लेकिन यह ठीक-ठीक आमने-सामने कहाँ हुआ? आँखें तो बीच में हैं ही। इसी तरह यदि कुछ सुना जाता है, तो कान माध्यम बनते हैं और ये आँखें या कान गलत खबर भी तो देख सकते हैं। इन्द्रिय बोध-सत्य बोध ही हो,यह कोई जरूरी तो नहीं । इन्द्रियों में थोड़ा सा भी दोष आ गया, तो सारी खबर गलत मिलती हैं। कुछ का कुछ दिखाई-सुनायी देने लगता है।
  
फिर प्रत्यक्ष बोध क्या  है? इस सवाल के उत्तर में परम पूज्य गुरुदेव का चिंतन सूत्र कहता है ‘चेतना प्रत्यक्ष।’ यानि कि हमारी चेतना बिना किसी इन्द्रिय माध्यम के सब कुछ साफ-साफ आमने-सामने देखे। गहरे ध्यान अथवा समाधि की भाव दशा में ही साधक को यह स्थिति प्राप्त होती है। तब देखने के लिए, जानने के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह जाती। किसी इन्द्रिय की तो बिल्कुल भी नहीं। महात्मा बुद्ध, महर्षि रमण, श्री अरविन्द एवं परम पूज्य गुरुदेव जैसे महायोगी इसी रीति से सत्ता और सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हैं। इससे इन्द्रियों की किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती। ज्ञाता और ज्ञेय एकदम आमने-सामने  होते हैं, उनके बीच कुछ और नहीं होता। केवल प्रत्यक्षता ही सत्य अनुभव बनकर प्रकट होता है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Quintessence of Religion

The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...