🔶 एक समय की बात है| एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक तालाब था। उस तालाब में नदी से आई हुई बहुत सी मछलियाँ रहती थीं। वह तालाब लम्बी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।
🔷 उसी मे ईना, चिनी तथा मिनी नाम की तीन मछलियों का समूह भी रहता था। वे आपस में मित्र थीं। उनके स्वभाव भिन्न थे। ईना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। चिनी कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने की कोशिश करो। तथा मिनी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता, जो भाग्य में लिखा है, वही होता है।
🔶 एक दिन शाम को कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकडकर घर जा रहे थे। उस दिन उनके जालों में बहुत कम मछलियाँ फँसी थी। इसलिए उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियाँ दबी थी। वे चौंके।
🔷 एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुडा तालाब है, जहां इतनी सारी मछलियाँ पल रही हैं।”
🔶 मछुआरे खुश होकर झाडियों में से होकर तालाब के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।🔴 एक मछुआरा बोला “अहा! इस तालाब में तो मछलियाँ भरी पडी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा। हमें यहाँ ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।
🔷 दूसरे ने कहा “आज तो शाम होने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहाँ जाल डालेंगे।” इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरों की बात सुन ली थी।
🔶 ईना ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई है। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस तालाब को छोडकर नदी में जा रही हूँ।
🔷 चिनी बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहाँ हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं | हो सकता है मछुआरे आयें ही नहीं । उन मछुआरों का यहाँ आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है। हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में फॅंसू ही नहीं।”
🔶 मिनी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने वाला। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे ही। हमें जाल में फँसना है तो हम फँसेंगे ही। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”
🔷 इस तरह ईना तो उसी समय वहाँ से चली गई। जबकि चिनी और मिनी मछली तालाब में ही रही।
🔶 सुबह हुई तो मछुआरे अपने जाल लेकर आ गए और उन्होंने तालाब में अपने जाल डाल दिए। चिनी ने संकट देखा तो जान बचाने के उपाय सोचने लगी । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस तालाब में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सडने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सडती लाश की सडांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में चिनी एक मछुआरे के जाल में फँस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियाँ तो तडपने लगीं, लेकिन चिनी दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पडी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पडी चिनी को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड चुकी हैं।” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने चिनी को तालाब में फेंक दिया।
🔷 चिनी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने नदी की और दौड़ लगा दी ।
🔶 मिनी ने भाग्य के भरोसे रहकर अपनी जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह भी दूसरे मछुआरे के जाल में फँस गई थी और एक टोकरी में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली मिनी अब अपनी सोच पर पछता रही थीं कि अगर वो भी समय रहते नदी में चली गयी होती तो आज उसकी जान बच जाती। वह उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तडप-तडपकर मर गयी।
🔷 इन मछलियों कि तरह ही कुछ कुछ हमारा भी हाल है। हम भी कभी कभी जान बूझकर मुसीबतो को अपने आप बुला लेते हैं या पहले से पता होते हुए भी मुसीबतो से निकलने का प्रयास नहीं करते। और जब हम मुश्किलों से घिर जाते हैं तब पछताते हैं कि अगर हमने पहले से ये काम ना किया होता तो आज मुसीबतों में ना फंसते या अगर हम पहले से मुश्किलों से निकलने का उपाय कर लेते तो आज इतनी मुसीबतों में ना फंसते।
🔶 दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर समय रहते अपनी मुसीबतों , संकटों से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।
🔷 उसी मे ईना, चिनी तथा मिनी नाम की तीन मछलियों का समूह भी रहता था। वे आपस में मित्र थीं। उनके स्वभाव भिन्न थे। ईना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। चिनी कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने की कोशिश करो। तथा मिनी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता, जो भाग्य में लिखा है, वही होता है।
🔶 एक दिन शाम को कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकडकर घर जा रहे थे। उस दिन उनके जालों में बहुत कम मछलियाँ फँसी थी। इसलिए उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियाँ दबी थी। वे चौंके।
🔷 एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुडा तालाब है, जहां इतनी सारी मछलियाँ पल रही हैं।”
🔶 मछुआरे खुश होकर झाडियों में से होकर तालाब के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।🔴 एक मछुआरा बोला “अहा! इस तालाब में तो मछलियाँ भरी पडी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा। हमें यहाँ ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।
🔷 दूसरे ने कहा “आज तो शाम होने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहाँ जाल डालेंगे।” इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरों की बात सुन ली थी।
🔶 ईना ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई है। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस तालाब को छोडकर नदी में जा रही हूँ।
🔷 चिनी बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहाँ हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं | हो सकता है मछुआरे आयें ही नहीं । उन मछुआरों का यहाँ आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है। हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में फॅंसू ही नहीं।”
🔶 मिनी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने वाला। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे ही। हमें जाल में फँसना है तो हम फँसेंगे ही। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”
🔷 इस तरह ईना तो उसी समय वहाँ से चली गई। जबकि चिनी और मिनी मछली तालाब में ही रही।
🔶 सुबह हुई तो मछुआरे अपने जाल लेकर आ गए और उन्होंने तालाब में अपने जाल डाल दिए। चिनी ने संकट देखा तो जान बचाने के उपाय सोचने लगी । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस तालाब में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सडने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सडती लाश की सडांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में चिनी एक मछुआरे के जाल में फँस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियाँ तो तडपने लगीं, लेकिन चिनी दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पडी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पडी चिनी को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड चुकी हैं।” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने चिनी को तालाब में फेंक दिया।
🔷 चिनी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने नदी की और दौड़ लगा दी ।
🔶 मिनी ने भाग्य के भरोसे रहकर अपनी जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह भी दूसरे मछुआरे के जाल में फँस गई थी और एक टोकरी में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली मिनी अब अपनी सोच पर पछता रही थीं कि अगर वो भी समय रहते नदी में चली गयी होती तो आज उसकी जान बच जाती। वह उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तडप-तडपकर मर गयी।
🔷 इन मछलियों कि तरह ही कुछ कुछ हमारा भी हाल है। हम भी कभी कभी जान बूझकर मुसीबतो को अपने आप बुला लेते हैं या पहले से पता होते हुए भी मुसीबतो से निकलने का प्रयास नहीं करते। और जब हम मुश्किलों से घिर जाते हैं तब पछताते हैं कि अगर हमने पहले से ये काम ना किया होता तो आज मुसीबतों में ना फंसते या अगर हम पहले से मुश्किलों से निकलने का उपाय कर लेते तो आज इतनी मुसीबतों में ना फंसते।
🔶 दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर समय रहते अपनी मुसीबतों , संकटों से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।












































