रविवार, 16 अप्रैल 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 83)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 यह दैवी उपलब्धि किस प्रकार सम्भव हुई। इसका एक ही उत्तर है पात्रता का अभिवर्धन। उसी का नाम जीवन साधना है। उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है, गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है, जब वह साफ-सुथरा हो। मल, मूत्र सना हो तो पहले उसे धोएगी, पोछेगी। इसके बाद ही गोदी में लेने और दूध पिलाने की बात करेगी। भगवान की समीपता के लिए शुद्ध चरित्र आवश्यक है। कई व्यक्ति पिछले जीवन में तो मलीन रहे हैं, पर जिस दिन से भक्ति की साधना अपनाई, उस दिन से अपना कायाकल्प कर लिया। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्वमंगल, अजामिल आदि पिछले जीवन में कैसे ही क्यों न रहे हों, जिस दिन से भगवान की शरण में आए, उस दिन से सच्चे अर्थों में संत बन गए। हम लोग ‘‘राम-नाम जपना पराया माल अपना’’ की नीति अपनाते हैं। कुकर्म भी करते रहते हैं, पर साथ ही भजन-पूजन के सहारे उनके दण्ड से छूट मिल जाएगी, ऐसा सोचते रहते हैं, यह कैसी विडम्बना है?

🔵 कपड़े को रंगने से पूर्व धोना पड़ता है। बीज बोने से पूर्व जमीन जोतनी पड़ती है। भगवान का अनुग्रह अर्जित करने के लिए शुद्ध जीवन की आवश्यकता है। साधक ही सच्चे अर्थों में उपासक हो सकता है। जिससे जीवन साधना नहीं बन पड़ी, उसका चिंतन, चरित्र, आहार, विहार, मस्तिष्क अवांछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएँ और तृष्णाएँ जिनके मन को हर घड़ी उद्विग्न किए रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आएगी। कर्मकाण्ड की चिह्न पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है। जहाँ भावनाएँ होंगी, वहाँ मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विकता का समावेश अवश्य करेगा।

🔴 सम्भ्रान्त मेहमान घर में आते हैं, कोई उत्सव होते हैं, तो घर की सफाई पुताई करनी पड़ती है। जिस हृदय में भगवान को स्थान देना है, उसे कषाय-कल्मषों से स्वच्छ किया जाना चाहिए। इसके लिए आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों ही दिशा धाराओं में बढ़ना आवश्यक है। इन तथ्यों को हमें भली-भाँति समझाया गया। सच्चे मन से उसे हृदयंगम भी किया गया। सोचा गया कि आखिर गर्हित जीवन बनता क्यों है? निष्कर्ष निकाला कि इन सभी के उद्गम केंद्र तीन हैं-लोभ, मोह, अहंकार। जिसमें इनकी जितनी ज्यादा मात्रा होगी, वह उतना ही अवगति की ओर घिसटता चला जाएगा।

🔵 क्रियाएँ वृत्तियों से उत्पन्न होती है। शरीर मन के द्वारा संचालित होता है। मन में जैसी उमंगें उठती हैं, शरीर वैसी ही गतिविधियाँ अपनाने लगता है। इसलिए अवांछनीय कृत्यों-दुष्कृत्यों के लिए शरीर को नहीं मन को उत्तरदायी समझा जाना चाहिए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विष वृक्ष की जड़ काटना उपयुक्त समझा गया है और जीवन साधना को आधार भूत क्षेत्र मन से ही आरम्भ किया गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 84)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्म- ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा- पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा नहीं। जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया- हमें चैन नहीं, वह करूणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा वेदना अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।             

🔵 बस इतना ही अनुदान वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करूणा की अनन्त सम्वेदनाओं से ओत- प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया ?? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा -वेदना ही रोम- रोम में समाई रही यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। जो पाया उसका एक- एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और सन्तोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।  

🔴 हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं, कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख- बिलख कर, फूट- फूटकर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता हैं ?? लोग हमें सन्त, सिद्ध, ज्ञाने मानते हैं कोई लेखक, विद्वान्, वक्ता, नेता    समझते हैं, पर किसने हमारा अन्त:करण खोलकर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता, तो मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करूण, कराह से हा- हाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हडिडयों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती। कहाँ तथाकथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके। हमसे बहुत दूर है शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में जो भगवान की झाँकी होती है। पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब चैन अनुभव होता हो, तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि को प्राप्त करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नही। जिसकी इच्छा ही नहीं, वह मिला भी किसे है ?? 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 37)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो?
🔵 निजी जीवन में आन-बान-शान पर मर मिटने वालों की लंबी कहानी है। जयचंद, मीरजाफर के उदाहरण ऐसे ही लोगों में सम्मिलित हैं। शत्रु से बदला चुकाने के नाम पर न जाने-क्या-क्या अनर्थ होते रहे हैं। ईर्ष्या ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने में कमी नहीं रखी-ऐसे बहुत हैं, जो भयंकर अग्निकाण्ड रचने की ललक में अपने को भी घास-फूस की तरह जला बैठे। युद्धों की कथा-गाथाओं के पीछे भी इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों की भूमिका काम करती रही है। कहने को तो उन्हें भी दुस्साहस ही कह सकते हैं। अनाचारी, आतंकवादी और षड्यंत्रकारी ऐसा ही ताना-बाना बुनते रहते हैं।  

🔴 प्रश्न इन दिनों सर्वथा दूसरी प्रकार का है-सृजन और उन्नयन के लिए किसकी सद्भावना किस हद तक उभरती है? देखा जाना है-स्वार्थ के मुकाबले में परमार्थ सुहाता किसे है? ध्वंस करने वाले जिस प्रकार मूँछों पर ताव देेते हैं और शेखी बघारते हैं, वैसा सृजनकर्मियों को नहीं सुहाता है। निर्माणकर्ताओं की मंद गंध चंदन जैसी होती है, जो बहुत समीप से ही सूँघी जा सकती है, पर ध्वंस की दुर्गंध तो अपने समूचे क्षेत्र को ही कुरुचि से भर देती है और अपनी उपस्थिति का दूर-दूर तक परिचय देती है। दुष्टता भरी दुर्घटनाएँ दूर-दूर तक चर्चा का विषय बन जाती हैं, पर सेवा-सद्भावना भरे कार्य कुछेक लोगों की जानकारी में ही आते हैं। इतने पर भी उन्हें वैसा विज्ञापित होने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसी कि दुष्ट-दुराचारी अपने नाम की चर्चा दूर-दूर तक होती सुन लेते हैं और अहंकार को फलितार्थ हुआ देखते हैं।                         

🔵 इन परिस्थितियों में सत्प्रवृत्ति-संवर्धन जैसे सत्प्रयोजनों के लिए किन्हीं दूरदर्शी और सद्भावना-संपन्नों के कदम ही उठते हैं। अनुकरण के प्रत्यक्ष उदाहरण सामने न होने पर अपना उत्साह भी ठण्डा होता रहता है। संचित कुसंस्कारों से लेकर वर्तमान प्रचलनों के अनेक अवरोध इस मार्ग में अड़ते हैं कि फूटे खंडहरों जैसी व्यवस्थाओं को किस प्रकार नये सिरे से भव्यभवन का विशाल रूप देने की योजना बनाई जाए तथा इसके लिये निरंतर कार्यरत और आवश्यक साधन जुटाने की हिम्मत कैसे जुटाई जाए?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 9)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 स्वास्थ्य और धनोपार्जन के अतिरिक्त जो वक्त शेष रहता है उसका सदुपयोग समाज कल्याण के लिये करना चाहिये। वक्त का अभाव किसी के पास नहीं पर अधिकांश व्यक्ति उसे बेकार के कार्यों में व्यतीत किया करते हैं। ताश, चौपड़, शतरंज, मटरगस्ती आदि में वक्त बर्बाद करने से शरीर और मन की शक्ति का पतन होता है। इस वक्त का सदुपयोग सामाजिक उत्थान के कार्यों में करना हमारा धर्म है।

🔵 समय का महत्त्व अमूल्य है। उसके समुचित सदुपयोग की शिक्षा ग्रहण करें तो इस मनुष्य जीवन में स्वर्ग का-सा सुखोपभोग प्राप्त किया जा सकता है। आवश्यक है कि अपने वक्त को उचित प्रकार से दिन भर के कार्यों में बांट लें जिससे जीवन के सब काम सुचारु रूप से होते चले जायं। हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि वक्त ही जीवन है। यदि हमें अपने जीवन से प्रेम है तो अपने वक्त का सदुपयोग भी करना चाहिए।

🔴 हम अपना वक्त आलस्य और निरर्थक कार्यों में खर्च न करें। आलस्य दुनिया की सबसे भयंकर बीमारी है। आलस्य समस्त रोगों की जड़ है। उसे साक्षात् मृत्यु कहें तो इसमें अत्युक्ति न होगी। अन्य बीमारियों से तो शरीर सारे मनुष्य जीवन को ही खा डालता है। आलस्य में पड़कर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुण्ठित होने लगती है जिससे न केवल शरीर शिथिल पड़ता है वरन् आर्थिक आय के साधन भी शिथिल पड़ जाते हैं।

🔵 हमारी जीवन व्यवस्था के लिए समय रूपी बहुमूल्य उपहार परमात्मा ने दिया। इसका एक-एक क्षण एक-एक मोती के समान कीमती है जो इन्हें बटोरकर रखता है सदुपयोग करता है वह यहां सुख प्राप्त करता है। गंवाने वाले व्यक्ति के लिए वक्त ही मृत्यु है। वक्त के दुरुपयोग से जीवनी शक्ति का दुरुपयोग होता है और मनुष्य जल्दी ही काल के गाल में समा जाता है। इसलिये हमें चाहिए कि समय का उपयोग सदैव सुन्दर कार्यों में करें और इस स्वर्ग तुल्य संसार में सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जियें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भाग्य विधाता है मनुष्य अपने आपका

🔵 ‘‘मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।’’ यह उक्ति एक ही तथ्य को इंगित करती है कि मनुष्य चाहे तो कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य इस दुनिया में किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। वह उसके जीवट के बलबूते सम्भव है। प्रारब्ध, संचित, क्रियमाण के सिद्धान्त अपनी जगह सही होते हुए भी एक तथ्य अपनी जगह सुनिश्चित एवं अटल है कि मनुष्य अपनी संकल्प-शक्ति के सहारे अपने भाग्य को बदल पाने में समर्थ है। ऐसा बहुतों ने किया है, वर्तमान में भी अनेकानेक उसी दिशा में संलग्न है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।

🔴 मनुष्य को ईश्वर का श्रेष्ठतम एवं वरिष्ठ पुत्र युवराज कहकर सम्बोधित किया गया है। उससे यह भी अपेक्षा रखी गयी है कि वह अपने कर्मों के सहारे इस सृष्टि रूपी बगिया को सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाये रखे। यह मनुष्य का सौभाग्य है कि वह इस सुरदुर्लभ मानव तन को पाकर इस धरती पर आया है। उसे एक अवसर दिया गया है कि वह श्रेष्ठ कर्म करता हुआ भव-बन्धनों से मुक्त होता चले। जो अवसर किसी को भी प्राप्त नहीं है वह देवताओं को व अन्यान्य योनियों में रहने वाले प्राणियों को उस परम पिता परमात्मा ने मनुष्य को अपना युवराज होने के नाते प्रदान किया है। अब वह उस पर निर्भर है कि वह दिये गये दायित्व का निर्वाह कर रहा है अथवा अपने दुष्कर्मों द्वारा इस विश्व-वसुधा रूपी अपने कार्य-क्षेत्र में अव्यवस्था पैदा कर रहा है।

🔵 स्वर्ग-नरक जो कुछ भी हैं, सब इसी धरती पर मौजूद हैं। परिष्कृत उदात्त मनःस्थिति का नाम ही स्वर्ग है। यही ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है कि चारों ओर स्वर्गोपम परिस्थितियाँ स्वतः बनने लगती हैं। मनुष्य यदि चाहे तो निषेधात्मक चिंतन, ईर्ष्या-द्वेष का भाव रखते हुए अथवा नर-पशु, नर-पिशाच का जीवन जीते हुए नारकीय मनःस्थिति में भी रह सकता है। इस धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर-ऐश्वर्ययुक्त बनाये रखना ही ईश्वर को मनुष्य से अभीष्ट है। इसीलिए उसे पूरी छूट दी गई है कि वह अपने मानव शरीर वाली इस योनि में जितना भी कुछ श्रेष्ठतम सम्भव हो सकता है, वह दी हुई अवधि में कर दिखाये। इसी को कहते हैं-‘‘अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करना।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 29
 
 
5th Convocation Ceremony 2017 | 5वां दीक्षान्त समारोह 2017 DSVV 15th April, 2017)

https://youtu.be/nN0Kt7Fiak0

5th Convocation 2017 with Dr. Chinmay Pandya @ DSVV Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/-N9qtRZKq-U
Inauguration of 5th Convocation Ceremony 2017 | DSVV 14th April, 2017

https://youtu.be/aeXj7Om-uQc

5th Convocation Ceremony 2017 | Culture Programme at  Dev Sanskriti Vishwavidyalaya, Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/I-dqq_yNESQ

5th Convocation Ceremony 2017 | Shri Kailash Satyarthi, Nobel Peace Prize winner Speech

https://youtu.be/KB3MYXStQKw
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 April 2017


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 April 2017


👉 तुमहिं पाय कछु रहे न क्लेशा

🔵 बात सन् १९८० की है जब मेरा विवाह नहीं हुआ था। उस समय मैं माता- पिता के साथ मुंगेर, बिहार में रहती थी। मुंगेर जिले में अपने मिशन का एक विद्यालय चलता था। उस विद्यालय का नाम बाल भारती विद्या मंदिर था। मेरा छोटा भाई उसी विद्यालय में पढ़ता था। मैं प्रतिदिन उसे छोड़ने जाया करती थी। धीरे- धीरे मेरा सम्पर्क वहाँ के आचार्यगण से हो गया। सभी आचार्य बड़े ही शिष्ट एवं व्यवहारकुशल थे। वे सभी मुझसे प्रत्येक रविवार के यज्ञ में शामिल होने के लिए कहते।

🔴 मुझे स्कूल का वातावरण बहुत अच्छा लगता था। बिल्कुल शान्त स्वच्छ सुन्दर वातावरण। मुझे वहाँ जाने में शांति मिलती थी। जब आचार्य जी ने मुझसे यज्ञ में आने के लिए कहा तो मुझे लगा जैसे बिन माँगी मुराद पूरी हो गई। हम तीन भाई व दो बहन थे। लेकिन कोई यज्ञ में जाने को तैयार नहीं हुआ। मेरी माता जी धार्मिक स्वभाव की थीं। मैं उनके साथ रविवार के यज्ञ में जाने लगी।

🔵 एक दिन जब मैं रविवार को यज्ञ में गई तो वहाँ पर कुछ विशेष कार्यक्रम चल रहा था, उत्सव जैसा माहौल था। जब मैं आचार्य जी से कौतूहलवश पूछा तो उन्होंने बताया कि आज गुरुपूर्णिमा- व्यास पूर्णिमा का पर्व है। गुरु एवं शिष्य में संबंध जोड़ने का पर्व है। आज के दिन गुरु शिष्य को दीक्षा देता है। आचार्य जी की बातों ने मेरे अन्तःकरण में संजीवनी का काम किया।

🔴 कार्यक्रम शुरू हुआ। इसके बाद जब दीक्षा का क्रम आया तो मंच पर बैठे आचार्य जी ने कहा- ‘‘जिन्हें दीक्षा लेनी है वे इधर आकर बैठ जाएँ’’। ये शब्द मेरे कानों में पड़ते ही मेरे पैर अनायास ही दीक्षा के लिए बढ़ गए। मैंने अपनी माताजी से भी नहीं पूछा। जब माताजी ने मुझे दीक्षा की पंक्ति में बैठे देखा तो मुझे मना करने लगीं। कहने लगीं अभी शादी नहीं हुई है। पता नहीं कैसे घर में शादी हो। तुम्हें आगे नानवेज भी शायद खाना पड़े। अभी मंत्र दीक्षा न लो। बाद में तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। मैं उनकी बातों को अनसुना कर वहीं बैठी रही। दीक्षा शुरू हुई। मैंने दीक्षा का क्रम पूरा किया। उसके पश्चात् गायत्री साधना जैसे मेरी जीवन चर्या बन गई। मैंने शिक्षा के साथ साधना का क्रम बराबर जारी रखा। इस तरह करीब ६ महीने बीत गए।

🔵 अचानक मेरी शादी मुंगेर शहर में ठीक हो गई। मेरी माँ बहुत परेशान थीं। जाने कैसा परिवार होगा। मेरे पूजा पाठ को लेकर वे बहुत चिंतित थीं। जिस दिन ससुराल वाले मुझे देखने आए, उस दिन तो माँ का बुरा हाल था। कहीं खान- पान की वजह से ससुराल वाले मना न कर दें। मुझे तो किसी प्रकार की चिन्ता नहीं हो रही थी। मुझे अपने इष्ट पर पूरा भरोसा था कि मेरे लिए जो अच्छा होगा, वही होगा। जब जेठ जी मुझे देखने आए, तो उन्होंने मुझसे सिर्फ एक ही बात पूछी- बेटा गायत्री मन्त्र जानती हो? ये शब्द सुनते ही मुझे लगा मुझे सब कुछ मिल गया। मैंने गायत्री मन्त्र सुना दिया और इस तरह से मेरी शादी, गायत्री परिवार से जुड़े हुए बहुत पुराने देव परिवार में हो गई।

🔴 मुझे परिवार में बुलाना था, इसीलिए गुरुदेव ने मुझे पहले से ही संस्कारित करने की व्यवस्था बनाई, ताकि नया परिवेश मेरे लिए कष्टदाई न बने। गुरुदेव की कृपा से मुझे अच्छा एवं संस्कारित परिवार मिला, जिसके लिए मैं गुरुदेव की आजीवन ऋणी हूँ। गुरुदेव की कृपा से जो- जो हमने सोचा, सब कुछ मिला। आज भी मैं गुरुकार्य में सक्रिय हूँ, और इसे अपना सौभाग्य मानती हूँ।                     
    
🌹  चित्रा वर्मा आसनसोल (प.बंगाल) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/pay

👉 महामानव बनने में चरित्रबल का योगदान

🔵 मेसीडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र सिकंदर को एक महान् पुरुष के रूप में देखना चाहते थे। उनकी प्रतिभा, शक्ति, सामर्ध्य, क्रियाशीलता, धैर्य, साहस और सूझ-बूझ से वे अच्छी तरह परिचित हो गये थे। अब इस बात की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे कि किस व्यक्ति के पास अपने बच्चे को शिक्षा हेतु भेजा जाए, जो इसकी इन शक्तियों को कुमार्गगामी बनने से रोके और महामानव बनने की प्रबल प्रेरणा उत्पन्न कर सके। सोचते-सोचते उसकी नजर तत्कालीन महान् दार्शनिक अरस्तु पर पडी, जो इस कार्य को कुशलतापूर्वक सपन्न कर सकते थे। सिकंदर उनकी पाठशाला में भेज दिया गया।

🔴 अरस्तू सिकंदर की विलक्षण प्रतिभा देखकर फूले न समाये। उनकी यह प्रबल इच्छा हुई कि इस बच्चे की शक्तियों को सन्मार्ग में विकसित करना चाहिए। यदि ऐसा हो सका तो निश्चय ही यह संसार के महान् व्यक्तियों में से एक होगा।

🔵 शिक्षा के साथ-साथ गुरु का ध्यान गुण, स्वभाव और चरित्रबल की तरफ विशेष था। दार्शनिक अरस्तु यह जानते थे कि जीवन के महान् विकास के लिए इन गुणों के विकास की नितांत आवश्यकता है। जिन दुर्गुणों से मनुष्य की शक्तियों का क्षरण होता रहता है, यदि उनका उन्मूलन न हो सका तो फिर शक्ति का स्रोत किसी अन्य मार्ग से निकलकर व्यर्थ हो जायेगा। फिर जीवन विकास के सारे प्रयास निर्बल, निस्तेज और निष्प्राण हो जायेंगे।

🔴 इन्हीं बातों को सोच-सोचकर अरस्तु अन्य विद्यार्थियों के साथ-साथ सिकंदर की हर क्रिया-कलाप पर विशेष ध्यान रखते थे। उन्हें सिकंदर का उतना ही ध्यान रहता था जितना किसी पिता को अपने एक होनहार पुत्र का रहता है।

🔵 एक बार सिकंदर का किसी स्त्री से अनुचित संबंध हो गया। अरस्तु को पता चल गया। उन्होंने सिकंदर को समझाया और डॉटा तथा इस रास्ते को छोडने का आग्रह किया। उस स्त्री को यह पता चला तो सोचने लगी कि यह अरस्तु ही मेरे संबंध में रोडे अटका रहा है, अत: ऐसा करना चाहिए, जिससे गुरु-शिष्य में शत्रुता हो। फिर बुरा काम आसानी से चलता रहेगा, वह कुटिल नारी एक दिन अरस्तु के पास पहुँची और एकांत में मिलने का प्रस्ताव रखा। अरस्तु ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जिस उद्यान में उन्हें मिलने के लिए बुलाया गया था उसमें ठीक समय पर पहुँच गए।

🔴 मनोवैज्ञानिक अरस्तु यह जानते थे कि कोरी शिक्षा की अपेक्षा प्रमाणों का मनोभूमि पर अधिक प्रभाव पडता है। उन्होंने कुटिल चाल से लाभ उठाया। अरस्तु ने अपने अन्य शिष्यों द्वारा इस घटना की सूचना सिकंदर तक भी पहुंचवा दी। साथ ही सूचना अरस्तु ने भिजवाई है, यह भेद न खुलने की कडी मनाही कर दी। सिकंदर आकर एक छिपे स्थान में टोह मे बैठ गया।

🔵 कुछ समय बाद वह तरुणी आई। उसने अरस्तु के गले में बाहुपाश डाले और कहा क्या ही अच्छा होता, थोडी देर तक हम लोग क्रीडा-विनोद का आनंद लेते। अरस्तू की स्वीकृति मिल गई। युवती ने दार्शनिक अरस्तू को घोडा़ बनाया और पीठ पर चडकर उन्हें चलाने लगी। बूढा घोडा़ युवती को अपनी पीठ पर बिठाकर घुटनों के बल चल रहा था। स्वाभिमानी सिकंदर जो जीवन में कभी झुकना नहीं जानता था अपने गुरु की यह स्थिति अधिक देर तक सहन न कर सका और तुरंत सामने आकर कहा- "क्यों गुरुदेव! यह सब क्या हो रहा है ?"

🔴 अरस्तू ने कहा देखते नहीं। मुझे यह माया किस तरह घुटनों के बल चलने को विवश कर रही है, फिर तुमको तो वह पेट के बल रँगने को विवश कर देगी। सिकंदर को वस्तुस्थिति समझ में आ गई। उसने अपना मुँह मोड़कर चरित्र गठन में अपना सारा ध्यान लगा दिया, जिससे वह संसार का एक महान् पुरुष- 'सिकंदर महान्' कहलाया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 135, 136

👉 शारीरिक और बौद्धिक श्रम

🔴 कई व्यक्ति भूखे मरना, तंगी में रहना, बेकारी भुगतान पसंद करते हैं, पर ऐसे कार्य करने को तैयार नहीं होते जो शारीरिक परिश्रम वाले होने के कारण `छोटे’ समझे जाते हैं। यह झिझक मिथ्या, अज्ञानमूलक एवं हानिकारक हैं। ऐसी झूठी प्रतिष्ठा के मोह में पड़े हुए व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय यों ही गॅवाते रहते हैं और अपनी हानि करते रहते हैं। जिन्हें उन्नति के पथ पर चलना है, उन्हें परिश्रम को अपना अभिन्न मित्र बनाना होता है। 

🔵 परिश्रम ही वह दीपक है, जिसके प्रकाश में मनुष्य विकास के मार्ग को प्राप्त करता है। ऐसे सच्चे मित्र से जो व्यक्ति घृणा करता है, उसे साथ रखने में शर्म अनुभव करता है, समझ लीजिए कि ऐसे व्यक्ति न ऊँचे उठ सकेंगे, न आगे बढ़ सकेंगे। बंदूक पकड़ने में शर्म करने वाला सिपाही युद्ध में मोर्चा फतह नहीं कर सकता और न परिश्रम से झिझकने वाला व्यक्ति जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त कर सकता है।   

🔴 परिश्रम ही संपूर्ण वैभवों का पिता है। जो जितना ही अधिक परिश्रमी होगा, वह उतना ही अधिक आनंदित रहेगा। हमारे कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक परिश्रम का समान स्थान होना चाहिए, दोनों की महत्ता को समान रूप में समझना चाहिए। इसीलिए विवेकवान व्यक्ति सदा से ही कर्म की सर्वोपरि महत्ता को स्वीकार करते हैं और उसके अनुसार आचरण करते रहे हैं।  

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹~अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 1

👉 सच्चे शिष्य की पहचान

🔵 जिस व्यक्ति की आत्मा से सतत शक्ति प्रवाहित होती रहती है, उसे सद्गुरु कहते हैं और जिसकी आत्मा इस शक्ति को अपने में धारण करने योग्य है वह शिष्य कहलाता है। बीज भी उम्दा और सजीव हो और जमीन भी अच्छी तरह जोती हुई हो। जहाँ ये दोनों बातें मिल जायें तो वहाँ प्रकृति धर्म का अलौकिक विकास होता है। सद्गुरु और शिष्य जब दोनों ही अद्भुत और असाधारण होते हैं, तभी अपूर्व आध्यात्मिक जागृति होती है, अन्यथा नहीं। जहाँ यह सुयोग न हो उन लोगों के लिए तो आध्यात्मिकता बस एक खिलवाड़ भर है। हो सकता है उनमें थोड़ा बहुत बौद्धिक कौतूहल जगा हो अथवा थोड़ी सी बौद्धिक स्पृहा पैदा हो गयी हो। पर अभी वे धर्म साम्राज्य की बाहरी सीमा पर ही खड़े हैं। 

🔴 जब तक उनका यह कौतूहल सच्ची धर्म पिपासा में परिवर्तित न हो जाय, इसका कुछ खास महत्त्व नहीं। हाँ प्रकृति का एक बड़ा अद्भुत नियम है कि ज्यों ही भूमि की तैयारी पूरी हो जाती है, त्यों ही बीज बोने वाला आना चाहिए और वह आता भी है। ज्यों ही आत्मा की धर्म पिपासा प्रबल होती है, त्यों ही अपनी आत्मा से धर्म शक्ति का संचार करने वाले पुरुष को उस आत्मा की सहायता के लिए आना चाहिए और वे आते भी हैं।

🔵 हम चाहें तो खुद के जीवन में इसका परीक्षण कर लें। अपनी जिन्दगी में कई बार ऐसा होता है कि हमारे किसी प्रियजन की मौत हो जाती है। उससे हमें भारी सदमा पहुँचता है। उस समय हमें ऐसा लगता है कि हम जिसे पकड़ने चले थे वही हमारे हाथों में निकला जा रहा है। यकायक पैरों तले से जमीन खिसकती हुई मालूम पड़ती है, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगता है। हमें किसी मजबूत और ऊँचे सहारे की जरूरत महसूस होती है। इस समय हमें लगता है कि अब हमें धार्मिक हो जाना चाहिए। थोड़े ही दिनों में वह भाव-तरंग नष्ट हो जाती है और हम जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।

🔴 हममें से प्रायः च्यादातर ऐसी ही भाव-तरंगों को धर्म-पिपासा समझ लेते हैं; लेकिन जब तक हम इन क्षणिक आवेशों के धोखे में रहेंगे, तब तक धर्म के लिए सच्ची और स्थायी आकुलता पैदा नहीं होगी और इसके बिना हमारी आत्मा सद्गुरु की शक्ति को अपने में धारण करने के लिए तैयार नहीं होगी। अतएव जब कभी हममें यह भावना पैदा हो कि सद्गुरु मिले, फिर भी कुछ न हुआ तो उस समय ऐसी शिकायत करने के बदले हमारा पहला कर्त्तव्य यह होगा कि हम अपने आप से ही पूछें, अपने हृदय को टटोलें और देखें कि हमारी धर्म-पिपासा यथार्थ है अथवा नहीं, हम अभी तक शिष्य बन सके अथवा नहीं।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 28

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 8)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 सारांश यह है कि वक्त का विभाजन करते वक्त आप स्वास्थ्य की बात को भी ध्यान में रखिये और उसके प्रति बेपरवाह मत हो जाइये। आप चाहें तो वक्त के सदुपयोग और व्यवस्थित कार्य प्रणाली द्वारा स्वयं ही स्वस्थ बने रह सकते हैं, कार्यों में इनका दुरुपयोग करके उसे आलस्य में भी खो सकते हैं, पर याद रखिये इस बात का ध्यान जितनी देर बाद में आयेगा अपने आपको उतना ही पिछड़ा हुआ अनुभव करेंगे।

🔵 यही बात उपार्जन के बारे में भी लागू होती है। शुभ और सुखी जीवन के लिये धन बहुत आवश्यक है। आर्थिक विषमता होने से दूसरे दैनिक कार्य भी कठिनाई से चल पाते हैं इसलिये धनोपार्जन के लिये भी समय का उपयोग कीजिये। समय के गर्भ में लक्ष्मी का अक्षय भण्डार भरा पड़ा है पर उसे पाते वही हैं जो उसका सदुपयोग करते हैं।

🔴 आपको जितना समय कार्यालय में काम करना पड़ता है उतने से ही सन्तोष नहीं हो जाना चाहिये। अपने लिए कोई अन्य रुचिकर घरेलू उद्योग चुनकर भी अपनी आय बढ़ाने का प्रयत्न होना चाहिये। जापान के नागरिक ऐसा ही करते हैं। वे छोटी मशीनों या खिलौनों के पुर्जे लाकर रख लेते हैं और अपने व्यावसायिक कार्य से फुरसत मिलने पर नियमित रूप से कुछ वक्त उसमें भी लगाते हैं। इन कार्यों में वे अपने परिवार वालों का भी सहयोग लेते हैं और इस तरह वे अपनी बंधी आय के लगभग बराबर आय पार्ट टाइम में कर लेते हैं। उनकी खुशहाली को सबसे बड़ा कारण वक्त का समुचित सदुपयोग ही कहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 36)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो? 

🔵 आशा और विश्वास के बल पर कष्टसाध्य रोगों के रोगी-बीमारियों से लड़ते-लड़ते देर-सबेर चंगे हो जाते हैं; जबकि शंकालु, डरपोक और अशुभ चिंतन करते रहने वाले साधारण रोगों को ही तिल का ताड़ बनाकर मौत के मुँह में जबरदस्ती जा घुसते हैं। देखा गया है कि अशुभ चिंतन के अभ्यासी अपना जीवट और साहस आधी से अधिक मात्रा में अपनी अनुपयुक्त आदतों के कारण ही गँवा बैठते हैं। कठिनाइयाँ और अड़चने हर किसी के जीवन में आती हैं, पर उनमें से एक भी ऐसी न होगी जिसे धैर्य और साहसपूर्वक लड़ते हुए परास्त न किया जा सके। सहनशीलता एक ऐसा गुण है, जिसके साथ धैर्य भी जुड़ा होता है और साहस भी।    

🔴 आजीवन जेल की सजा पाये हुए कैदी भी उस विपत्ति को ध्यान में न रखकर घरेलू जैसी जिंदगी जी लेते हैं और अवधि पूरा करके वापस लौट आते हैं। सुनसान बीहड़ों में खेत या बगीचे रखाने वाले निर्भय होकर चौकीदारी करते हैं; जबकि डरपोकों को घर में चुहिया की खड़बड़ भी भूत-बला के घर में घुस आने जैसी डरावनी प्रतीत होती है। शत्रु किसी का उतना अहित नहीं कर पाते, जितनी उनके द्वारा पहुँचाई जा सकने वाली हानि की कल्पना संत्रस्त करती रहती है।                          

🔵 कुछ लोग गरीबी के रहते हुए भी हँसती-हँसाती जिंदगी जी लेते हैं, जबकि कितनों के पास पर्याप्त साधन होते हुए भी तृष्णा छाई दिखती रहती है। यह मन का खेल है। हर किसी की अपनी एक अलग दुनिया होती है, जो उसकी अपनी निज की संरचना ही होती है; परिस्थितियों और साथियों का इस निर्माण कार्य में यत्किंचित् सहयोग होता है। जीवन गीली मिट्टी की भाँति है, उसे कोई जैसी भी कुछ चाहे, आकृति दे सकता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 83)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 दुर्बुद्धि का कैसा जाल- जंजाल बिखरा पड़ा है और उसमें कितने निरीह प्राणी करुण चीत्कार करते हुए फँसे हुए जकड़े पड़े हैं, यह दयनीय दुर्दशा अपने लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गयी। आत्मवत सर्व भूतेषु की साधना ने विश्व मानव की पीड़ा बना दिया। लगने लगा- मानों अपने ही पाँवों को कोई ऐंठ- मरोड़ और गला रहा हो। ''सब में अपनी आत्मा पिरोई हुई है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए हैं। ''गीता का यह वाक्य जहाँ तक पढ़ने- सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्त:करण में प्रवेश प्राप्त करे तो स्थिति दूसरी हो जाती है। अपने अंग अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित बेचैन करता है, ठीक वैसे ही आत्म- विस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दु:ख अपना दु:ख है और व्यथित पीड़ित की वेदना अपने को नोचती है।           

🔵 पीड़ित मानवता की- विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी। आँख, डाढ़ और पेट के दर्द में बेचैन मनुष्य व्याकुल फिर रहा है कि किस प्रकार, किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाये? क्या किया जाये ?? कहाँ जाया जाये ?? की हल -चल मन में उठती है और जो सम्भव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है। अपना मन भी ठीक ऐसा ही बना रहा। दुर्घटना में हाथ -पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार -जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है। लगभग अपनी मनोदशा ऐसी ही तब से लेकर अद्यावधि- चली आती है। अपने सुख- साधन जुटाने की फुरसत कहाँ है?  

🔴 विलासिता की सामग्री जहर- सी लगती है। विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आयी तो आत्म- ग्लानि ने उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के लिए एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती हैं। भूख से तड़पते प्राण त्यागने की स्थिति में हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे ?? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़कर पिता ताश शतरंज का साज कैसे सजाए ?? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु की सम्वेदना जैसे ही प्रखर हुई, निष्ठुरता उसी क्षण गल जलकर नष्ट हो गयी। जी में केवल करूणा ही शेष रही, वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है। उसमें कमी रत्ती भर नहीं, वरन दिन- दिन बढ़ोत्तरी ही होती गयी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 82)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 बालक की तरह मनुष्य सीमित है। उसे असीम क्षमता उसके सुसम्पन्न सृजेता भगवान से उपलब्ध होती है, पर यह सशर्त है। छोटे बच्चे वस्तुओं का सही उपयोग नहीं जानते, न उनकी सँभाल रख सकते हैं, इसलिए उन्हें दुलार में जो मिलता है, हलके दर्जे का होता है। गुब्बारे, झुनझुने, सीटी, लेमनचूस स्तर की विनोद वाली वस्तुएँ ही माँगी जाती और पाई जाती हैं। प्रौढ़ होने पर लड़का घर की जिम्मेदारियाँ समझता और निबाहता है। फलतः बिना माँगे उत्तराधिकार का हस्तांतरण होता जाता है। इसके लिए प्रार्थना याचना नहीं करनी पड़ती है। न दाँत निपोरने पड़ते हैं और न नाक रगड़नी पड़ती है। जितना हमें माँगने में उत्साह है उससे हजार गुना देने में उत्साह भगवान को और महामानवों को होता है। कठिनाई एक पड़ती है, सदुपयोग कर सकने की पात्रता विकसित हुई या नहीं?

🔵 इस संदर्भ में भविष्य के लिए झूठे वायदे करने से कुछ काम नहीं चलता। प्रमाण यह देना पड़ता है कि अब तक जो हाथ में था उसका उपयोग वैसा होता रहा है। ‘‘हिस्ट्री सीट’’ इसी से बनती है और प्रमोशन में यह पिछला विवरण ही काम आता है। हमें पिछले कई जन्मों तक अपनी पात्रता और प्रामाणिकता सिद्ध करनी पड़ी है। जब बात पक्की हो गई, तो ऊँचे क्षेत्र से अनुग्रह का सिलसिला अपने आप ही चल पड़ा।

🔴 सुग्रीव, विभीषण, सुदामा, अर्जुन आदि ने जो पाया, जो दिखाया यह उनके पराक्रम का फल नहीं था, उसमें ईश्वर की सत्ता और महत्ता काम करती रही है। बड़ी नदी के साथ जुड़ी रहने पर नहरों के साथ जुड़े रजवाहे खेतों को पानी देते रहते हैं। यदि इस सूत्र में कहीं गड़बड़ी उत्पन्न होगी, तो अवरोध खड़ा होगा और सिलसिला टूटेगा। भगवान के साथ मनुष्य अपने सुदृढ़ सम्बन्ध सुनिश्चित आधारों पर ही बनाए रह सकता है। उसमें चापलूसी जैसी कोई गुंजायश नहीं है। भगवान की किसी से निजी मित्रता है, न शत्रुता। वे नियमों से बँधे हैं। समदर्शी हैं।

🔵 हमारी व्यक्तिगत क्षमता सर्वथा नगण्य है। प्रायः जनसाधारण के समान ही उसे समझा जा सकता है। जो कुछ अतिरिक्त दीखता है या बन पड़ा है, उसे विशुद्ध दैवी अनुग्रह समझा जाना चाहिए। वह सीधा कम और मार्ग दर्शक के माध्यम से अधिक आता रहा है, पर इससे कुछ अंतर नहीं आता। धन बैंक का है। भले ही वह नकदी के रूप में, चैक, ड्राफ्ट आदि के माध्यम से मिला हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 14 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 April

🔴 प्रकृति में सदैव मौन का साम्राज्य रहता है। पुष्प वाटिका से हमें कोई पुकारता नहीं, पर हम अनायास ही उस ओर खिंचते चले जाते हैं। बड़े से बड़े वृक्षों से लदे सघन वन भी मौन रहकर ही अपनी सुषमा से सारी वसुधा को सुशोभित करते हैं। धरती अपनी धुरी पर शान्त चित्त बैठी सबका भार सम्भाले हुए है। पहाड़ों की ध्वनि किसी ने सुनी नहीं, पर उन्हें अपनी महानता का परिचय देने के लिए उद्घोष नहीं करना पड़ा। पानी जहाँ गहरा होता है, वहाँ अविचल शान्ति संव्याप्त होती है।

🔵 व्यावहारिक जीवन में भी मौन विशेष महत्वपूर्ण है। जीवन मार्ग में आयी बाधाओं को मौन रहकर ही चिन्तन कर टालना सम्भव हो पाता है। ‘‘सौ वक्ताओं को एक चुप हराने’’ वाली बात बिल्कुल सही है। व्यर्थ की बकवाद में अपनी ही शक्ति नष्ट होती है, यह स्पष्ट जानना चाहिए। आध्यात्मिक साधनाओं में मौन का अपना विशेष महत्व है क्योंकि उसके सहारे अंतर्मुखी बनने का अवसर मिलता है।

🔴 श्रद्धा का अर्थ है- आत्म-विश्वास। इस विश्वास के सहारे मनुष्य अभाव में, तंगी में, निर्धनता में कष्ट में, एकान्त में भी घबराता नहीं। जीवन के अन्धकार में श्रद्धा प्रकाश बनकर मार्गदर्शन करती है और मनुष्य को उस शाश्वत लक्ष्य से विलग नहीं होने देती। आत्मदेव के प्रति, ईश्वर के प्रति, जीवन लक्ष्य के प्रति हृदय में कितनी प्रबल जिज्ञासा है, जीवन की इस विशालता को जानना हो तो मनुष्य के अन्तःकरण की श्रद्धा को नापिये। यह वह दैवी मार्गदर्शन है जिसे प्राप्त कर साँसारिक बाधाओं का विरोध कर लेना सहज हो जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 7)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 अपने कार्यों का वर्गीकरण (1) स्वास्थ्य (2) धन और (3) सामाजिक सदाचार की दृष्टि से कीजिये और एक दिन के वक्त को इसी क्रम से बांट कर अपने लिये एक व्यवस्थित दिनचर्या बांध लीजिये और उसी के अनुसार चलते रहिये। इसी में आपको सारी बातों का समावेश किया जाना चाहिये और उसी के अनुरूप जीवन-क्रम चलता रहना चाहिए। इससे आप अधिक सुखमय जीवन जी सकेंगे।

🔵 वैयक्तिक सुखोपभोग और सांसारिक कार्यों में क्षमतावान् होने के लिये आपका स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। स्वास्थ्य सुखी जीवन की प्रमुख शर्त है, अतः उन सभी नियमों को प्राथमिकता दीजिये जिनसे आपका शरीर और मन स्वस्थ व अवृद्ध रहता है। हमेशा सूर्योदय से कम से कम एक घण्टा पहले उठा कीजिये और शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर कुछ टहलने या व्यायाम आदि की व्यवस्था बना लीजिये। प्रातःकाल की मुक्त वायु शरीर को शक्ति और पोषण प्रदान करता है, दिन-भर देह स्फूर्ति और ताजगी से भरी रहती है। इस अवसर को गंवाना रोग और दुर्बलता को निमन्त्रण देने से कम नहीं। जो लोग बिस्तरों में पड़े सोते रहते हैं वे प्रातःकालीन ऊषीय-रश्मियों निर्दोष वायु से वंचित रह जाते हैं और उनका शरीर सुस्त और निस्तेज हो जाता है। वे कोई कार्य आधी रुचि से करते हैं तदनुकूल सफलता भी आधी ही मिलती है।

🔴 दिन-भर के कार्यों का अनुमानित आकार भी आप बिस्तर से उठते ही बना लीजिये और फिर उसमें परिश्रमपूर्वक लग जाया कीजिये। सफलता के लिये खीझ या परेशानी मन में न आने देकर मस्ती पूर्वक सुबह से शाम तक काम में जुटे रहिये। यह क्रियाशीलता आपको रोगों और दुश्चिन्ताओं से दूर रखेगी। यह याद रखिये कि नियमित वक्त पर किया हुआ काम पूर्ण रूप से भली-भांति सम्पन्न होता है और उसके पूरा हो जाने से आन्तरिक उल्लास और प्रसन्नता की वृद्धि होती है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मनोबल तथा आत्मबल भी बढ़ता रहता है। इसी तरह सायंकाल को भी अपने उन सभी कार्यों की समीक्षा करनी चाहिए जो दिन-भर आपने किये हैं उनमें से कोई ऐसा दीखे जिससे आपके शारीरिक अथवा मानसिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता हो तो उसे आगे के लिये रोकने या कम करने का प्रयत्न कीजिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 35)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो?

🔵 अभावों और संकटों में से कितने ही ऐसे हैं, जिनके कारण मनुष्य को आए दिन बेचैन रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में वह दूसरे संपन्नों से आशा भी करता है कि उसकी कुछ मदद की जाए। करने वाला इसमें कर्तव्यपालन और पुण्यपरमार्थ अनुभव करता है।

🔴 दुर्बलता, रुग्णता, दरिद्रता, शत्रुता, मूर्खता व आशंका जैसे कितने ही कारण ऐसे हैं जो दु:खों को बढ़ाते और त्रास देते रहते हैं, पर इन सबके मूल में एक ही विपत्ति सर्वोपरि है, जिसका नाम है-अदूरदर्शिता अविवेक भी इसी को कहते हैं। दिग्भ्रांत मनुष्य अपने को समझदार मानते हुए भी कुचक्र में फँसते और भटकाव के कारण पग-पग पर ठोकरें खाते हैं। अनाचार भी इस कारण बनते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टता इसी कारण घुस पड़ती है। जड़ में से अनेक टहनियाँ, पत्तियाँ फूटती हैं, इसी प्रकार एक अविवेकशीलता का बाहुल्य रहने पर कारणवश या अकारण ही समस्याओं में उलझना और विपत्तियों में फँसना पड़ता है।                       

🔵 पत्ते सींचने से पेड़ की सुव्यवस्था नहीं बन पड़ती, इसलिए जड़ में खाद-पानी लगाने और उजाड़ करने वालों से रखवाली करनी पड़ती है। इतना प्रबंध किये बिना अच्छी भूमि में बोया गया अच्छा बीज भी फूलने-फलने की स्थिति तक नहीं पहुँचता।

🔴 सद्ज्ञान को समस्त विपत्तियों का निवारक माना गया है। रामायण का कथन है कि ‘जहाँ सुमति तहाँ संपत्ति नाना’ अर्थात् जहाँ विचारशीलता विद्यमान रहेगी वहाँ अनेकानेक सुविधाओं-संपदाओं की शृंखला अनायास ही खिंचती चली आएगी। यही कारण है कि सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री गायत्री को माना गया है। मन:स्थिति परिस्थितियों का निर्माण करती है। परिस्थितियाँ ही दु:ख का, उत्थान-पतन का निमित्त कारण बनकर सामने आती हैं। गीताकार ने सच ही कहा है कि मनुष्य ही अपना शत्रु है और वही चाहे तो अपने को सघन सहयोगी मित्र बना सकता है, इसलिए अपने आपको गिराना नहीं, उठाना चाहिए।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कौन-कौन गुण गाऊँ गुरु तेरे

🔵 मेरे पिता जी सन् १९६४ में ही गुरुदेव के संपर्क में आए। पिताजी के मन में उनके प्रति अनन्य श्रद्धा थी। मुझे याद है जब भी हमारे परिवार में कोई समस्या आती, गुरुदेव से प्रार्थना करते ही पता नहीं, कैसे सारी समस्या सुलझती चली जाती थी। इसलिए हम सभी के मन में उनके प्रति गहरी श्रद्धा का भाव था।
  
🔴 १९७३ में गुरुदेव ने प्राण प्रत्यावर्तन शिविर शुरू किया था। मैं भी शिविर में जाने के लिए तैयार हो गया। मन में शांतिकुंज जाने के लिए उत्साह तो था ही, गुरु देव से मिलने की ललक भी थी; क्योंकि पिताजी से गुरुदेव के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उन्हें प्रत्यक्ष देखने का अवसर पहली बार मिल रहा था।
  
🔵 आखिर वह दिन आ ही गया जब हम शान्तिकुञ्ज पहुँच गए। शान्तिकुञ्ज पहुँचते ही वहाँ के वातावरण को देख हृदय पुलकित हो उठा, जैसा नाम वैसा ही काम शान्तिकुञ्ज को देखते ही मन में साधना की तरंगें उठने लगीं।
  
🔴 मैं जैसे ही गेट के पास पहुँचा। गुरु देव गेट पर ही खड़े मिले। मैंने झुककर प्रणाम किया। वे बोले- मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। उनके इन शब्दों को सुनकर हृदय में ऐसी भाव तरंगे उठीं कि शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। मेरे हृदय में उनके प्रति सम्मान दूना हो गया। भगवान स्वरूप गुरुदेव की मुझ अकिंचन पर ऐसी कृपा!
  
🔵 मैं मन ही मन बहुत प्रसन्न था। दूसरे दिन मिलने के ख्याल से गुरु देव के पास गया। उन्होंने प्यार से अपने पास बैठाया। कुशल समाचार पूछे। इसके बाद बोले-कोई समस्या हो तो बताओ। मैंने कहा- गुरु देव! मैं बोल नहीं सकता। गुरु देव ने मुस्कुराते हुए कहा- क्यों, बोल तो रहा है। मैंने कहा मैं हकलाता हू। उन्होंने कहा मैं भी हकलाता हूँ, मेरा कोई काम रु का है आज तक? तुम्हारा भी काम नहीं रुकेगा। मैंने कहा- नहीं गुरु देव, मैं प्रवचनकर्ता बनना चाहता हू। गुरु देव थोड़ा रु के, फिर बोले- तू बनेगा, जरूर बनेगा। मैं गायत्री माँ से प्रार्थना करूँगा।
  
🔴 करीब एक हफ्ते बाद मेरी आवाज में सुधार होने लगा। मुझे स्वयं पर आश्चर्य होता। धीरे-धीरे एक महीने के अन्दर मेरी हकलाहट पूरी तरह दूर हो गई। गुरुदेव ने मुझसे कहा कि बनेगा तो बना भी दिया। मुझे अच्छी सर्विस भी मिल गई और एक अच्छा वक्ता भी बना दिया, जो बहुत दिनों की मेरी दिली इच्छा रही थी। मैं आज भी गुरुकृपा से अभिभूत हूँ।
  
🔵 जिनने स्वयं की हकलाहट दूर करने के लिए चमत्कारी शक्ति का सहारा नहीं लिया; अपनी सन्तान के लिए माता से प्रार्थना नहीं की, उनने मेरी कमियों को दूर कर मुझे आत्महीनता की ग्रन्थि से उबार लिया; जीवन पथ पर मजबूती से खड़ा होने लायक बना दिया। आज मैं धन्य हू उनकी कृपा पाकर।                   
  
🌹 कृष्ण कुमार विनोद दुर्ग (छत्तीसगढ़)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/kon

👉 13 अप्रैल 1919

🔴 बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में रोलेट एक्ट, अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों व दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे थे। ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी परिस्थिति लग रही थी जिसे न होने देने के लिए और कुचलने के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार थे।

🔵 जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। १० मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहां तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया।

🔴 अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जबकि अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए। इस घटना के प्रतिघात स्वरूप सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ ड्वायर को गोली चला के मार डाला। उन्हें 31 जुलाई 1940 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

🔵 यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था।


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026

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