शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 30)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 रात्रि को सोने से पूर्व दिन भर के कार्यों पर विचार करना चाहिए।
(1) आज परिवार से सम्बन्ध रखने वाले क्या क्या कार्य किये?
(2) उसमें क्या भूल हुई?
(3) स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया?
(4) भूल के कारण क्या अनुचित कार्य हुआ
(5) क्या क्या कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप हुए?

🔴 इन पांच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यों का विभाजन करना चाहिए और आगे से त्रुटियों के सुधार का उपाय सोचना चाहिए।

(1) भूल की तलाश करना
(2) उसे स्वीकार करना,
(3) गलती के लिए लज्जित होना और
(4) उसे सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना

🔵 यह चार बातें जिसे पसन्द हैं, जो इस मार्ग पर चलता है, उसकी गलतियां दिन दिन कम होती जाती हैं और वह शीघ्र ही दोषों से छुटकारा पा लेता है।

🔴 गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित नई कठिनाइयां आती रहती हैं। कभी अपनी भूल से, कभी दूसरों की भूल से, ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिनका नियत सिद्धान्त से मेल नहीं खाता। इच्छा रहती है कि अपना हर एक आचरण ठीक रहे, हर प्रक्रिया सिद्धान्तानुकूल हो, परन्तु अक्सर भूलें होती रहती हैं, साधक कुछ दिन तक सोचता है कि दस बीस दिन में या महीने में यह दूर हो जायेगी और मेरी सम्पूर्ण क्रियायें सिद्धान्ताकूल होने लगेंगी, पर जब काफी समय बीत जाता है और तब भी भूलें समाप्त नहीं होती तो चिन्ता, निराशा और पराजय की भावनाएं मन में घूमने लगती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 43)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 60. भूत-पलीत और बलि प्रथा— भूत-पलीतों का मानसिक विभ्रम पैदा करके सयाने दिवाने और ओझा लोग भोली जनता का मानसिक और आर्थिक शोषण बुरी तरह करते हैं। मानसिक रोगों, शारीरिक कष्टों एवं दैनिक जीवन में आती रहने वाली साधारण-सी बातों को भूत की करतूत बना कर व्यर्थ ही भोले लोग भ्रमित होते हैं। उस भ्रम का इतना घातक प्रभाव पड़ता है कि कई बार तो उस प्रकार के विश्वास से जीवन-संकट तक उपस्थित हो जाते हैं।

🔴 धर्म-ग्रन्थों में जिन देवी देवताओं का वर्णन है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है। पर उतने से भी सन्तोष न करके लोगों ने जाति-जाति के, वंश-वंश के, गांव-गांव के, इतने अधिक देवता गढ़ लिए हैं कि आश्चर्य होता है। उन पर मुर्गे, अण्डे, भैंसे, बकरे, सुअर आदि चढ़ाते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि दया और प्रेम लिए बने हुए देवता अपने ही पुत्र—पशु-पक्षियों का खून पीवें।

🔵 हमें एक परमात्मा की ही उपासना करनी चाहिए और इन भूत-पलीतों के भ्रम जंजाल से सर्वथा दूर रहना चाहिए। जन-समाज को भी इससे बचाना चाहिए।

🔴 और भी अनेकों कुरीतियां विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाई जाती हैं। हानिकारक और अनैतिक बुराइयों का उन्मूलन करना ही श्रेयस्कर है। सभ्य समाज को विवेकशील ही होना चाहिए और इन उपहासास्पद विडम्बनाओं से जल्दी ही अपने को मुक्त कर लेना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 13)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (1) दैविक, (2) दैहिक, (3) भौतिक। दैविक दुःख वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं, जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। दैहिक दुःख होते हैं, जो शरीर को होते हैं, जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। भौतिक दुःख वे होते हैं, जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं, जैसे भूकंप, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी, युद्ध आदि। इन्हीं तीन प्रकार के दुःखों की वेदना से मनुष्यों को तड़पता हुआ देखा जाता है। यह तीनों दुःख हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्मों के फल हैं। मानसिक पापों के परिणाम से दैविक दुःख आते हैं, शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक और सामाजिक पापों के कारण भौतिक दुःख उत्पन्न होते हैं।
         
🔴 दैविक दुःख-  मानसिक कष्ट, उत्पन्न होने के कारण वे मानसिक पाप हैं, जो स्वेच्छापूर्वक तीव्र, भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं, जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दंभ, घमण्ड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि। इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है, उससे अंतःचेतना पर उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है, जिस प्रकार के धुएँ के कारण दीवार काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गंदा हो जाता है। आत्मा स्वभावतः पवित्र है, वह अपने ऊपर इन पाप-मूलक कुविचारों, प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गंदगी को साफ करूँ?

🔵 पेट में हानिकारक वस्तुएँ जमा हो जाने पर पेट उसे कै या दस्त में निकाल बाहर करता है। इसी प्रकार तीव्र इच्छा से, जानबूझ कर किए गए पापों को निकाल बाहर करने के लिए आत्मा आतुर हो उठती है। हम उसे जरा भी जान नहीं पाते, किंतु आत्मा भीतर ही भीतर उसके भार को हटाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो जाती है। बाहरी मन, स्थूल बुद्धि को अदृष्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता, पर अंर्तमन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है, जिससे वह भार हट जाय। अपमान, असफलता, विछोह, शोक, दुःख आदि यदि प्राप्त होते हों, ऐसे अवसरों को मनुष्य कहीं से एक न एक दिन, किसी प्रकार खींच लाता है, ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/theen.1

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 5) 10 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 वैभव को कमाया तो असीम मात्रा में भी जा सकता है, पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता। मनुष्य के पेट का विस्तार थोड़ा-सा ही है। यदि बहुत कमा लिया गया है तो उस सब को उदरस्थ कर जाने की ललक-लिप्सा कितनी ही प्रबल क्यों न हो, पर वह सम्भव हो नहीं सकेगी। नियत मात्रा से अधिक जो भी खाया गया है, वह दस्त, उलटी, उदरशूल जैसे संकट खड़े करेगा, भले ही वह कितना ही स्वादिष्ट क्यों न लगे।

🔵 शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्र, भौतिक पदार्थ संरचना के आधार पर विनिर्मित हुए हैं। उनकी भी अन्य पदार्थों की तरह एक सीमा और परिधि है। जीवित रहने और अभीष्ट कृत्यों में निरत रहने के लिए सीमित ऊर्जा, सक्रियता एवं साधन सामग्री ही अभीष्ट है। इसका उल्लंघन करने की ललक तटबन्धों को तोड़कर बहने वाली बाढ़ की तरह अपनी उच्छृंखलता के कारण अनर्थ ही अनर्थ करेगी। उस उन्माद के कारण पानी तो व्यर्थ जाएगा ही, खेत खलिहानों, बस्तियों आदि को भी भारी हानि उठानी पड़ेगी। यों चाहे तो नदी इसे अपने स्वेच्छाचार और अहंकार दर्प-प्रदर्शन के रूप में भी बखान सकती है, पर जहाँ कहीं, जब कभी इस उन्माद की चर्चा चलेगी तब उसकी भर्त्सना ही की जाएगी।

🔴 उपयोग की दृष्टि से थोड़े साधनों में भी भली प्रकार काम चल सकता है, पर अपव्यय की कोई सीमा मर्यादा नहीं। कोई चाहे तो लाखों के नोट इकट्ठे करके उनमें माचिस लगाकर, होली जलाने जैसा कौतूहल करते हुए प्रसन्नता भी व्यक्त कर सकता है, पर इस अपव्यय को कोई भी समझदार न तो सराहेगा और न उसका समर्थन करेगा। बेहद चाटुकार तो कुल्हाड़ियों से अपना पैर काटने के लिए उद्यत अतिवादी की भी हाँ में हाँ मिला सकते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 29)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 किन्तु आतुर व्यक्ति उतावला होता है, इच्छा पूर्ति न होने पर किसी न किसी को दोषी ठहराता है। यह नहीं सोचता कि इसमें अपनी गलती भी हो सकती है और उसे सुधारने के लिए दूसरे उपाय अपनाये जा सकते हैं।

🔴 इच्छा से करने का हर किसी को अधिकार है, पर उसे उतना उतावला नहीं होना चाहिए कि जो चाहा गया है वह नियत अवधि के अन्दर या नियत तरीके से ही पूरा होना चाहिए। अनुकूल अवसर पर इच्छा पूरी या अधूरी मात्रा में पूरी हो सके—इसके लिए धैर्य रखने और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है। परिस्थितियां नहीं बदलतीं तो मनःस्थिति को बदल लेना भी एक उपाय है। संसार में अनेक इच्छित वस्तुयें या परिस्थितियां हैं वे सभी पूरी नहीं होती हैं तो अधीर होने की अपेक्षा यही अच्छा है कि जितना उपलब्ध है उससे ही सन्तोष करें। हर किसी की हर इच्छा तुर्त-फुर्त पूरी होनी ही चाहिए—यह संसार का नियम नहीं है।

🔵 किसी जमाने में तानाशाह ऐसे होते थे जो न्याय या परिस्थितियों पर विचार करने की अपेक्षा अपनी हविश पूरी न होने को ही बढ़ा-चढ़ा अपराध मानते थे और उसके बदले मृत्युदण्ड सुना देते थे। सहकारियों में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि उस निर्देश के सम्बन्ध में ननुनच कर सके। ऐसी पूछताछ करने में भी उस अहंकारी का अपमान होता था, वह समय अब नहीं रहा। जिस पर आरोप लगाया गया है उसे अपनी बात कहने, सफाई देने का अवसर दिया जाता है किन्तु अव्यवस्थित व्यक्ति को इतना भी अवसर देने की गुंजाइश नहीं रहती। प्रतिपक्षी को अपराधी ही निश्चित करता है और अपराध के बदले में मृत्युदण्ड से हल्की सजा भी हो सकती? यह वह नहीं सोच पाता कि ऐसा घातक निर्णय कर गुजरने पर अपने ऊपर क्या बीतेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 29) 10 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 उपरोक्त मंत्र हर गृहस्थ योगी को भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिये। दिन में कई बार इस मन्त्र को दुहराना चाहिए। एक छोटे कार्ड पर सुन्दर अक्षरों में लिखकर इस मन्त्र को अपने पास रख लेना चाहिये और जब भी अवकाश मिले एक एक शब्द का मनन करते हुए इस मन्त्र को पढ़ना चाहिये। हो सके तो अक्षरों में लिख कर सुन्दर चित्र की भांति इसे अपने कमरे में लगा लेना चाहिए।

🔴  प्रातः निद्रा त्यागने पर पलंग पर पड़े-पड़े ही कई बार इस मन्त्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज दिन भर इन भावनाओं को अधिक से अधिक मात्रा में सतर्कता पूर्वक ध्यान रखूंगा। इस निश्चय के साथ शय्या त्याग करने का अवसर दिन भर रहता है प्रातःकाल जो आदेश अन्तर्मन को दिये हैं अधिक गहरे उतर जाते हैं, वे जल्दी विस्मरण नहीं होते और यथा अवसर वे ठीक समय पर स्मरण हो आते हैं। इसलिए प्रातःकाल इस मन्त्र का नियमित रूप से अवश्य ही दुहराना चाहिए—

🔵 ‘‘मैं गृहस्थ योगी हूं। मेरा जीवन साधनामय है। दूसरे कैसे हैं क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, इसकी मैं तनिक भी परवाह नहीं करता। अपने आप में सन्तुष्ट रहता हूं, मेरी कर्तव्य पालन की सच्ची साधना इतनी महान है, इतनी शांतिदायिनी, इतनी तृप्तिकारक है कि उसमें मेरी आत्मा आनन्द में सराबोर हो जाती है। मैं अपनी आनन्दमयी साधना को निरन्तर जारी रखूंगा गृह क्षेत्र में परमार्थ भावनाओं के साथ ही काम करूंगा।’’ यह संकल्प दृढ़तापूर्वक मन में जमा रहना चाहिए। जब भी मन विचलित होने लगे, जब भी पैर पीछे डिगने की संभावना प्रतीत हो तभी इस संकल्प को मनोयोग पूर्वक दृढ़ करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 42)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 58. मृत्यु-भोज की व्यर्थता— किसी के मरने के बाद उस घर में दो सप्ताह के भीतर विवाह शादियों जैसी दावत का आयोजन होना दिवंगत व्यक्ति के प्रति अपमान है। दावतें तो खुशी में उड़ाई जाती हैं। मृत्यु को शोक का चिन्ह मानते हैं तो फिर दावतों का आयोजन किस उद्देश्य से? मृतक के मित्रों और सम्बन्धियों के लिये भी यही उचित है कि इस क्षति-ग्रस्त परिवार की कोई सहायता न कर सकते हों तो कम-से-कम दावतों की सलाह देकर उसका आर्थिक अहित तो न करें।

🔴 मृतक की आत्मा को शान्ति देने के लिए धार्मिक कृत्य कराये जांय, सहानुभूति प्रकट करने वाले लोग यदि दूर से आये हैं तो वे भी ठहरें, घर, परिवार और सम्बन्धी लोग श्राद्ध के दिन एक चौके में खायें। यहां तक तो बात समझ में आती है। पर बड़े-बड़े मृत्यु भोज सर्वथा असंगत हैं। उनकी न कोई उपयोगिता है और न आवश्यकता। यदि हो सके तो ऐसे शुभ कार्यों में जिनसे मानवता की कोई सेवा होती हो, श्राद्ध के उपलक्ष्य में कितना ही बड़ा दान किया जा सकता है। वही सच्ची श्रद्धा का प्रतीक होने से सच्चा श्राद्ध कहा जा सकता है।

🔵 59. जेवरों में धन की बर्बादी— जेवरों में धन की बर्बादी प्रत्यक्ष है, जो पैसा किसी कारोबार में या ब्याज पर लगने से बढ़ सकता था वह जेवरों में कैद होने पर दिन-दिन घिसता और कैद पड़ा रहता है। टूट-फूट, मजूरी, टांका-बट्टा में काफी हानि सहनी पड़ती है। पहनने वाले का अहंकार बढ़ता है। दूसरों में ईर्ष्या जगती है। चोर लुटेरों को अवसर मिलता है। जिस अंग में उन्हें पहनते हैं वहां दबाव और अस्वच्छता बढ़ने से स्वास्थ्य को हानि पहुंचती है। चमड़ी कड़ी पड़ जाती है और पसीने के छेद बन्द होते हैं। नाक के जेवरों से तो सफाई में भी अड़चन पड़ती है। विवाह शादियों के अवसर पर तो वह एक समस्या बन जाते हैं। दहेज जैसी हानिकारक प्रथा का मूल भी जेवरों में रहता है। लड़की वाले जब तक जेवरों की आवश्यकता अनुभव करेंगे, तब तक लड़के वाले दहेज भी मांगते रहेंगे। जेवरों का शौक हर दृष्टि से हानिकारक है, इसे छोड़ने में ही लाभ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 12)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 पिछले पृष्ठों में बताया जा चुका है कि आकस्मिक सुख-दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इनसे सुर-मुनि, देव-दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म-गति से छूट न सके। सूरदास ने ठीक कहा है-
कर्मगति टारे नाहि टरे।
गुरु वशिष्ट पण्डित बड़ ज्ञानी, रचि पचि लगन धरै ।
पिता मरण और हरण सिया को, वन में विपति परै।।

          
🔴 वशिष्ट जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करनी पड़ीं। यह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात् टूट पड़ती हैं या ईश्वर नाराज होकर दुःख-दण्ड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। ‘पंचाध्यायी’ का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुःख अपने ही बुलाने से आते हैं। रामायण का मत भी इस सम्बन्ध में यही है-
काहु न कोउ दुःख सुखकर दाता।
निज-निज कर्म भोग सब भ्राता।।


🔵 दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुःख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते, चिल्लाते रहते हैं। जीव की पीछे से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई है, जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है, उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे-पीछे एक रेखा-सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती है, जो काम हम करते हैं, उनके संस्कार बनते जाते हैं। बुरे कर्मों के संस्कार स्वयं बोई हुई कँटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुःखदायी बन जाते हैं।

🔴 अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के स्वभाव एवं तीन तरह के फल की चर्चा आरम्भ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है, इसलिए सुख प्राप्त करना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुःख में होता है। दुःख से ही लोग डरते-घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुःखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्धक शास्त्र और चिकित्सा-शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख-वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुःख निवृत्ति के लिए, रोग का निवारण करने के लिए उसका निदान और चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्त करने से दुःखों का मर्म समझ में आता है। दुःखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुःखों से निवृत्ति हो जाती है। आइए, अब हम दुःखों का स्वरूप आपके सामने रखने का प्रयत्न करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/theen

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 9 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 4)

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं? 

🔴 आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है एवं कैसे हो रहा है? इसे कौन करा रहा है? आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी। पहुँचना तो उसे प्रकृति विजय के लक्ष्य तक था, पर यह हुआ क्या कि तीनों लोक तीन डगों में नाप लेने की दावेदारी, करारी मोच लगने पर सिहरकर बीच रास्ते में ही पसर गई। उसे भी आगे कुआँ पीछे खाई की स्थिति में आगे पग बढ़ाते नहीं बन रहा है। साँप-छछून्दर की इस स्थिति से कैसे उबरा जाए, जिसमें न निगलते बन रहा है और न उगलते।  

🔵 फूटे घड़े में पानी भरने पर वह देर तक ठहरता नहीं है। चलनी में दूध दुहने पर दुधारू गाय पालने वाला भी खिन्न-विपन्न रहता है। ऐसी ही कुछ भूल मनुष्य से भी बन पड़ी है, जिसके कारण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक जुटाई गई उपलब्धियों को हस्तगत करने पर भी, लेने के देने पड़ रहे हैं, परन्तु स्मरण रहे कि असमंजस की स्थिति लम्बे समय तक टिकती नहीं है। मनुष्य की बुद्धि इतनी कमजोर नहीं है कि वह उत्पन्न संकटों का कारण न खोज सके और शान्तचित्त होने पर उनके समाधान न खोज सके।  

🔴 बड़प्पन को कमाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे सुस्थिर रखने और सदुपयोग द्वारा लाभान्वित होने के लिए और समझदारी, सतर्कता और सूझबूझ चाहिए। भाव-संवेदनाओं से भरे-पूरे व्यक्ति ही उस रीति-नीति को समझते हैं, जिनके आधार पर सम्पदाओं का सदुपयोग करते बन पड़ता है। अपने समय के लोग इन्हीं भाव-संवेदनाओं का महत्त्व भूल बैठे और उन्हें गिराते-गँवाते चले जा रहे हैं। यही है वह कारण, जो उपलब्धियों को भी विपत्तियों में परिणत करके रख देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेम, पवित्रता, क्षमा और सद्भावना

🔵 हजरत मोहम्मद जब भी नमाज पढ़ने मस्जिद जाते तो उन्हें नित्य ही एक वृद्धा के घर के सामने से निकलना पड़ता था। वह वृद्धा अशिष्ट, कर्कश और क्रोधी स्वभाव की थी। जब भी मोहम्मद साहब उधर से निकलते, वह उन पर कूड़ा-करकट फेंक दिया करती थी। मोहम्मद साहब बगैर कुछ कहे अपने कपड़ों से कूड़ा झाड़कर आगे बढ़ जाते। प्रतिदिन की तरह जब वे एक दिन उधर से गुजरे तो उन पर कूड़ा आकर नहीं गिरा। उन्हें कुछ हैरानी हुई, किंतु वे आगे बढ़ गए।

🔴 अगले दिन फिर ऐसा ही हुआ तो मोहम्मद साहब से रहा नहीं गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी। वृद्धा ने दरवाजा खोला। दो ही दिन में बीमारी के कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गई थी। मोहम्मद साहब उसकी बीमारी की बात सुनकर हकीम को बुलाकर लाए और उसकी दवा आदि की व्यवस्था की। उनकी सेवा और देखभाल से वृद्धा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई।

🔵 अंतिम दिन जब वह अपने बिस्तर से उठ बैठी तो मोहम्मद साहब ने कहा- अपनी दवाएं लेती रहना और मेरी जरूरत हो तो मुझे बुला लेना। वृद्धा रोने लगी। मोहम्मद साहब ने उससे रोने का कारण पूछा तो वह बोली, मेरे र्दुव्‍यवहार के लिए मुझे माफ कर दोगे? वे हंसते हुए कहने लगे- भूल जाओ सब कुछ और अपनी तबीयत सुधारो। वृद्धा बोली- मैं क्या सुधारूंगी तबीयत? तुमने तबीयत के साथ-साथ मुझे भी सुधार दिया है। तुमने अपने प्रेम और पवित्रता से मुझे सही मार्ग दिखाया है। मैं आजीवन तुम्हारी अहसानमंद रहूंगी।

🔴 जिसने स्वयं को प्रेम, क्षमा व सद्भावना में डुबोकर पवित्र कर लिया, उसने संत-महात्माओं से भी अधिक प्राप्त कर लिया।

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 28)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 मस्तिष्कीय ज्वर की भांति ही आवेश एक ऐसी उत्तेजना है जो पैर पटकने, सिर धुनने की तरह कुछ न कुछ अनर्थ करके ही विराम लेता है। आवेशग्रस्त व्यक्ति परिस्थितियों को अपने अनुकूल-अनुरूप ही देखना चाहता है, पर यह व्यवहार में संभव नहीं। हर व्यक्ति की अपनी स्वतन्त्र प्रकृति और विचारधारायें हैं। इसी प्रकार परिस्थितियां अनेक उलझनों के बीच निकलती हुई अपना ढांचा बनाती हैं, उन पर इतना अधिकार किसी का नहीं कि इच्छा मात्र से अनुकूलन को आमंत्रित कर सके और उसे सदा वशवर्ती बनाये रह सके।

🔴 आतुर व्यक्ति में इतना धैर्य नहीं होता कि वह परिस्थितियों की अनुकूलता के लिए आवश्यक चिंतन या प्रयास कर सके। वह किसी तानाशाह की तरह तुरन्त अपनी इच्छा या आकांक्षा को कार्यान्वित होते देखना चाहते हैं, पर चाहने भर से आकांक्षा की पूर्ति कहां होती है।

🔵 होना यह चाहिए कि व्यक्ति धैर्य रखे और तालमेल बिठाने के उपाय करे। इच्छित परिस्थितियों के बिना काम चलाये अथवा इतना धैर्य रखे कि परिवर्तन में जो समय लगे उसकी प्रतीक्षा बन पड़े। उत्तेजना को यह समझ करके भी शान्त किया जा सकता है कि संसार केवल हमारी ही इच्छा के अनुरूप चलने के लिए नहीं बनाया गया है, उनके साथ और भी कितने ही प्रयोजन जुड़े हुए हैं। उनमें से जितनी सुविधायें जब मिल सकें तब तक के लिए धैर्य रखना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 28)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग के साधक के मन में यह विचारधारा चलती रहनी चाहिये कि— ‘‘यह परिवार मेरा स्थान क्षेत्र है। इस वाटिका को सब प्रकार सुन्दर, सुरभित और पल्लवित बनाने के लिये सच्चे हृदय से सदा शक्ति भर प्रयत्न करते रहना मेरा कर्मकाण्ड है। भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है, उसे ठीक तरह सींचते रहना मेरी ईश्वर परायणता है। घर का कोई भी सदस्य ऐसा हीन दर्जे का नहीं है जिसे मैं तुच्छ समझूं, उपेक्षा करूं या सेवा से जी चुराऊं, मैं मालिक, नेता, मुखिया या कमाऊं होने का अहंकार नहीं करता यह मेरा आत्म निग्रह है।

🔴 हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएं लगाते रहना मेरा परमार्थ है। बदले की जरा सी भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा में तत्पर रहना मेरा आत्म त्याग है। अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करते हुए, औरों को सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न करना मेरा तप है। घर के हर सदस्य को सद्गुणी, सत् स्वभाव का, सदाचारी एवं धर्म परायण बना कर विश्व की सुख शान्ति में वृद्धि करना मेरा यज्ञ है। सबके हृदयों पर जिसका मौन उपदेश हो, अनुकरण से सुसंस्कार बनें, अपना आचरण ऐसा पवित्र एवं आदर्शमय रखना मेरा व्रत है।

🔵  धर्म उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा संयम है। प्रेम उदारता सहानुभूति की भावना से ओत-प्रोत रहना और रखना, प्रसन्नता, आनन्द और एकता की वृद्धि करना मेरी आराधना है। मैं अपने गृह-मन्दिर में भगवान की चलती फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूं। सद्गुण, सत् स्वभाव और सत् आचरण के दिव्य श्रृंगार से इन प्रतिमाओं को सुसज्जित करने का प्रयत्न ही मेरी पूजा है। मेरा साधन सच्चा है, साधना के प्रति मेरी भावना सच्ची है, अपनी आत्मा के सम्मुख मैं सच्चा हूं। सफलता असफलता की जरा भी परवाह न करके सच्चे निष्काम कर्मयोगी की भांति मैं अपने प्रयत्न की सचाई में संतोष अनुभव करता हूं। मैं सत्य हूं, मेरी साधना सत्य है। मैंने सत्य का आश्रय ग्रहण किया है उसे सत्यता पूर्वक निबाहने का प्रयत्न करूंगा।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 41)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 56. बाल विवाह और अनमेल विवाह— बाल विवाहों की भर्त्सना की जाय और उनकी हानियां जनता को समझाई जाय। स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, आगामी पीढ़ी एवं जीवन विकास के प्रत्येक क्षेत्र पर इनका बुरा असर पड़ता है। लड़की-लड़के जब तक गृहस्थ का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर संभालने लायक न हों तब तक उनके विवाह नहीं होने चाहिए। इस संबंध में जल्दी करना अपने बालकों का भारी अहित करना ही है। अशिक्षित और निम्न स्तर के लोगों में अभी भी बाल विवाह का बहुत प्रचलन है। उन्हें समझाने-बुझाने से या कानूनी भय बता कर इस बुराई से विरत करना चाहिए। अनमेल विवाहों को भी रोका जाना और उनके विरुद्ध वातावरण बनाना आवश्यक है।

🔴 57. भिक्षा व्यवसाय की भर्त्सना— समर्थ व्यक्ति के लिये भिक्षा मांगना उसके आत्म गौरव और स्वाभिमान के सर्वथा विरुद्ध है। आत्म गौरव खोकर मनुष्य पतन की ओर ही चलता है। खेद है कि भारतवर्ष में यह वृत्ति बुरी तरह बढ़ी है और उसके कारण असंख्य लोगों का मानसिक स्तर अधोगामी बना है।

🔵 जो लोग सर्वथा अपंग असमर्थ हैं, जिनके परिजन या सहायक नहीं, उनकी आजीविका का प्रबन्ध सरकार को या समाज के दान-संस्थानों को स्वयं करना चाहिए, जिससे इन अपंग लोगों को बार-बार हाथ पसार कर अपना स्वाभिमान न खोना पड़े और बचे हुए समय में कोई उपयोगी कार्य कर सकें। अच्छा हो ऐसी अपंग संस्थाएं जगह-जगह खुल जांय और उदार लोग उन्हीं के माध्यम से वास्तविक दीन-दुखियों की सहायता करें।

🔴 बहानेबाज समर्थ लोगों को भिक्षा नहीं देनी चाहिए। इससे आलस और प्रमाद बढ़ता है, जनता को अनावश्यक भार सहना पड़ता है और आडम्बरी लोग दुर्गुणों से ग्रस्त होकर तरह-तरह से जनता को ठगते एवं परेशान करते हैं। भजन का उद्देश्य लेकर चलने वालों के लिए भी यही उचित है कि वे अपनी आजीविका स्वयं कमायें और बाकी समय में भजन करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 11)

🌹 आकस्मिक सुख-दुःख

🔵 सही बात को न समझने के कारण लोगों के हृदयों में ऐसे ऊटपटाँग विश्वास घर जमा लेते हैं। अनेक व्यक्ति तो भाग्य की वेदी पर कर्तव्य की बलि चढ़ा देते हैं। उनका विश्वास होता है कि इस जीवन में भी हानि-लाभ होगा, वह भाग्य के अनुसार होगा। अब जो कर्म किए जा रहे हैं, उनका फल अगले जन्म में भले मिले, पर यह जीवन तो प्रारब्ध के रस्सों में ही जकड़ा हुआ है। जब उपाय करने, प्रयत्न या उद्योग करने की बात चलती है, तो वे यही कहते हैं कि जो भाग्य में लिखा होगा सो होगा, ब्रह्मा की लकीर को कौन मेट सकता है, जो ईश्वर को करनी होगी वह होकर रहेगी, होनी बड़ी प्रबल है, इन शब्दों का प्रयोग वास्तव में इसलिए है कि जब आकस्मिक दुर्घटना पर अपना वश नहीं चलता और अनहोने प्रसंग सामने आ खड़े होते हैं। तो मनुष्य का मस्तिष्क बड़ा विक्षुब्ध, किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।
          
🔴 सामने कोई दोषी तो दिखाई नहीं पड़ता पर आघात लगने के कारण रोष आता ही है। आवेश में बुद्धि ठिकाने नहीं रहती, सम्भव है कि वह दोष किसी निर्दोष पर बरस पड़े और अनर्थ उपस्थित कर दे इसलिए उस क्षोभ को शांत करके किसी प्रकार संतोष धारण किया जाता है, परंतु हम देखते हैं कि आज अनेक व्यक्ति उस आपत्तिकाल के मन समझाव को कर्तव्य के ऊपर कुल्हाड़ी की तरह चलाते हैं। होते-होते यह लोग उद्योग के विरोधी हो जाती हैं और अजगर और पक्षी की उपमा देकर भाग्य के ऊपर निर्भर रहते हैं, यदि यह सज्जन बड़े-बूढ़े हुए तो अपने प्रभाव से निकटवर्ती अल्पज्ञान वाले तरुणों और किशोरों को भी इसी भाग्यवाद की निराशा के दलदल में डाल देते हैं।

🔵  पाठक समझ गये होंगे कि आकस्मिक घटनाओं के वास्तविक कारण की जानकारी न होने से कैसी-कैसी अनर्थकारक ऊटपटांग धारणाएँ उपजती हैं और वे लोगों के मनों में जब गहरी घुस बैठती हैं, तो जीवन प्रवाह को उलटा, विकृत एवं बेहूदा बना देती हैं। मनुष्य जाति ‘कर्म की गहन गति’ को चिरकाल से जानती है और उसके उन कारणों को जानने के लिए चिरकाल से प्रयत्न करती रही है। उसके कई हल भी अब तक तत्त्वदर्शियों ने खोज निकाले हैं। पंचाध्यायीकार ने उपरोक्त श्लोक में ‘गहना कर्मणोगति’ पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि यह दैविक, दैहिक और भौतिक घटनाएँ, तीन प्रकार के आकस्मिक सुख-दुःख, संचित, प्रारब्ध और क्रियमान कर्मों के आधार पर होते हैं। दूध एक नियत समय में एक विशेष प्रक्रिया द्वारा दही या घी बन जाता है। इसी प्रकार त्रिविध कर्म भी तीन प्रकार के फलों को उत्पन्न करतें हैं। वे आकस्मिक घटनाएँ किस प्रकार उत्पन्न करते हैं, इसका पूरा, विस्तृत एवं वैज्ञानिक विवेचन आगे करेगें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 8 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 3) 8 Dec

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं? 

🔴 यहाँ उपलब्धियों, आविष्कारों के सदुपयोग-दुरुपयोग की विवेचना नहीं की जा रही है, यह स्पष्ट है कि इन दिनों विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति हुई वह असाधारण एवं अभूतपूर्व है। विकास विस्तार तो हर भले-बुरे उपक्रम पर लागू हो सकता है। इन अर्थों में आज की प्रगतिशीलता की दावेदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि यह तथाकथित प्रगति, अपने साथ दुर्गति के असंख्यों बवण्डर क्यों और कैसे घसीटती, बटोरती चली जा रही है?

🔵 प्रदूषण, युद्धोन्माद, खाद्य-संकट अपराधों की वृद्धि आदि समस्याएँ समस्त तटबन्ध तोड़ती चली जा रही हैं। अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह, विग्रह, छल-प्रपञ्च जैसे दोष, व्यवहार तथा चिन्तन को धुआँधार विकृतियों से भरते क्यों चले जा रहे हैं? निकट भविष्य के सम्बन्ध में मूर्द्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे हैं कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटरी पर चलती रही, तो विपन्नता बढ़ते-बढ़ते महाप्रलय जैसी स्थिति में पहुँचा सकती है। वे कहते हैं कि हवा और पानी में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ रही है कि उसे धीमी गति से सर्वभक्षी आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है।
🔴 बढ़ता हुआ तापमान यदि ध्रुवों की बरफ पिघला दे और समुद्र में भयानक बाढ़ ला दे तो उससे थल निवासियों के लिए डूब मरने का संकट उत्पन्न कर सकता है। वनों का कटना, रेगिस्तान का द्रुतगामी विस्तार, भूमि की उर्वरता का ह्रास, खनिजों के बेतरह दोहन से उत्पन्न हुआ धरित्री असन्तुलन, मौसमों में आश्चर्यजनक परिवर्तन, तेजाबी मेघ वर्षण, अणु विकिरण, बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप जीवनसाधन न बढ़ पाने का संकट जैसे अनेकानेक जटिल प्रश्न हैं। इनमें से किसी पर भी विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि तथाकथित प्रगति ही उन समस्त विग्रहों के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। वह प्रगति किस काम की, जिसमें एक रुपया कमाने के बदले सौ का घाटा उठाना पड़े।
 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 27)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. जे. एस्टर ने क्रोध से पीड़ित मनःस्थिति का अध्ययन किया तथा यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि ‘पन्द्रह मिनट के क्रोध से शरीर की जितनी शक्ति नष्ट हो जाती है उससे व्यक्ति नौ घण्टे तक कड़ी मेहनत करने में समर्थ हो सकता है, इसके अतिरिक्त क्रोध शरीर सौष्ठव को भी नष्ट करता है। भरी जवानी में बुढ़ापे का लक्षण, आंखों के नीचे चमड़ी का काला होना, आंखों में लाल रेखाओं का उद्भव तथा शरीर में जहां-तहां नीली नसों का उभरना क्रोध के ही परिणाम है।’

🔴 न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने चूहों के ऊपर एक प्रयोग किया है। उसमें क्रोधी मनुष्य के रक्त को चूहे के शरीर में डाला गया तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया। 22 मिनट के उपरान्त ही चूहे में आक्रोश का भाव देखा गया, वह मनुष्य को काटने दौड़ा। लगभग 35 मिनट बाद उसने स्वयं को ही काटना शुरू किया और अन्ततः एक घण्टे के बाद मर गया।

🔵 वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि क्रोध के कारण विषाक्तता उत्पन्न होती है जो पाचन-शक्ति के लिए अत्यन्त खतरनाक सिद्ध होता है। क्रोधी स्वभाव की माताओं का दूध भी विषाक्त पाया गया है, उससे बच्चे के पेट में मरोड़ की शिकायत उत्पन्न होती है तथा कभी-कभी तो अधिक विषाक्तता के कारण बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। आमतौर से आत्महत्या की घटनायें भी क्रोध से ही अभिप्रेरित होती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 27) 8 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 यदि गृहस्थ बन्धन कारक, नरक मय होता तो उससे पैदा होने वाले बालक पुण्यमय कैसे होते। बड़े बड़े योगी यती इस मार्ग को क्यों अपनाते? निश्चय ही गृहस्थ धर्म एक पवित्र, आत्मोन्नति कारक, जीवन को विकसित करने वाला, धार्मिक अनुष्ठान है, एक सत् समन्वित आध्यात्मिक साधना है। गृहस्थ का पालन करने वाले व्यक्ति को ऐसी हीन भावना मन में लाने की कुछ भी आवश्यकता नहीं हैं कि वह अपेक्षाकृत नीचे स्तर पर है या आत्मिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है या कमजोर है। अविवाहित जीवन और विवाहित जीवन में तत्वतः कोई अन्तर नहीं है।

🔴 यह अपनी-अपनी सुविधा, रुचि और कार्य प्रणाली की बात है, जिसे जिसमें सुविधा पड़ती हो वह वैसा करे। जिसका कार्यक्रम देशाटन का हो उन्हें स्त्री बच्चों का झंझट पालने की आवश्यकता नहीं परन्तु जिन्हें एक स्थान पर रहना हो उसके लिये विवाहित होने में ही सुविधा है। इसमें पिछड़े हुए और बढ़े हुए की कुछ चीज नहीं, दोनों का दर्जा बिल्कुल बराबर है। मानसिक स्थिति और कार्य प्रणाली के आधार पर तुच्छता और महानता होती है। जहां भी ऊंचा दृष्टिकोण होगा वहां ही महानता होगी।

🔵 जीवन का परम लक्ष आत्मा को परमात्मा में मिला लेना है, व्यक्तिगत स्वार्थ को प्रधानता न देते हुए लोकहित की भावना से काम करना, यही आध्यात्मिक साधना है। इस साधना को क्रियात्मक जीवन में लाने के लिए भिन्न भिन्न तरीके हो सकते हैं। इन तरीकों में से एक तरीका गृहस्थ योग भी है। बालक, घर  में से ही आरम्भिक क्रियाएं सीखता है। जीवन के लिये जितने काम चलाऊ ज्ञान की आवश्यकता है उसका आधे से अधिक भाग घर में ही प्राप्त होता है।

🔴 हमारी सात्विक साधना भी घर से ही प्रारंभ होनी चाहिये। जीवन को उच्च, उन्नत, संस्कृत, संयमित, सात्विक, सेवामय एवं परमार्थ पूर्ण बनाने की सबसे अच्छी प्रयोगशाला अपना घर ही हो सकता है। स्वाभाविक प्रेम, उत्तरदायित्व, कर्तव्य पालन, परस्पर अवलम्बन, आश्रय, स्थान, स्थिर क्षेत्र, लोक लाज आदि अनेक कारणों से यह क्षेत्र ऐसा सुविधाजनक हो जाता है कि आत्मत्याग और सेवामय दृष्टिकोण के साथ काम करना इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक सरल होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 40)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 54. अश्लीलता का प्रतिकार— अश्लील साहित्य, अर्ध-नग्न युवतियों के विकारोत्तेजक चित्र, गन्दे उपन्यास, कामुकता भरी फिल्में, गन्दे गीत, वेश्यावृत्ति, अमर्यादित कामचेष्टाएं, नारी के बीच रहने वाली शील संकोच मर्यादा का व्यक्ति-क्रम, दुराचारों की भोंड़े ढंग से चर्चा, आदि अनेक बुराइयां अश्लीलता के अन्तर्गत आती हैं। इनसे दाम्पत्य-जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है और शरीर एवं मस्तिष्क खोखला होता है। शारीरिक व्यभिचार की तरह यह मानसिक व्यभिचार भी मानसिक एवं चारित्रिक संतुलन को बिगाड़ने में दावाग्नि का काम करता है। उसका प्रतिकार किया जाना चाहिए। ऐसे चित्र, कलेण्डर, पुस्तकें, मूर्तियां तथा अन्य उपकरण हमारे घरों में न रहें जो अपरिपक्व मस्तिष्कों में विकार पैदा करें। शाल और शालीनता की रक्षा के लिए उनकी विरोधी बातों को हटाया जाना ही उचित है।

🔴 55. विवाहों में अपव्यय— संसार के सभी देशों और धर्मों के लोग विवाह शादी करते हैं, पर इतनी फिजूलखर्ची कहीं नहीं होती, जितनी हम लोग करते हैं। इससे आर्थिक सन्तुलन नष्ट होता है, अधिक धन की आवश्यकता उचित रीति से पूरी नहीं हो सकती तो अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। इन खर्चों के लिए धन जोड़ने के प्रयत्न में परिवार की आवश्यक प्रगति रुकती है, अहंकार बढ़ता है तथा कन्याएं माता पिता के लिए भार रूप बन जाती हैं। विवाहों का अनावश्यक आडम्बरों से भरा हुआ और खर्चीला शौक बनाये रहना सब दृष्टियों से हानिकारक और असुविधाजनक है।

🔵 दहेज की प्रथा तो अनुचित ही नहीं अनैतिक भी है। कन्या-विक्रय, वर-विक्रय का यह भोंड़ा प्रदर्शन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रथा के कारण कितनी कन्याओं को अपना जीवन नारकीय बनाना पड़ता है और कितने ही अभिभावक इसी चिन्ता में घुल-घुल कर मरते हैं। इस हत्यारी प्रथा का जितना जल्दी काला मुंह हो सके उतना ही अच्छा है।

🔴 विचारशील लोगों का कर्तव्य है कि वे इस दिशा में साहसपूर्ण जन-नेतृत्व करें। उन रूढ़ियों को तिलांजलि देकर अत्यन्त सादगी से विवाह करें। परम्पराओं से डर कर—उपहास के भय से ही अनेक लोग साहस नहीं कर पाते, यद्यपि वे मन से इस फिजूलखर्ची के विरुद्ध होते हैं। ऐसे लोगों का मार्ग-दर्शन उनके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करके ही किया जा सकता है। युग-निर्माण परिवार के लोग अपने ही विचारों के वर कन्या तथा परिवार ढूंढ़ें और सादगी के साथ आदर्श विवाहों का उदाहरण प्रस्तुत करें, इससे हिन्दू समाज की एक भारी समस्या हल हो सकेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 10)

🌹 आकस्मिक सुख-दुःख

दैविकं दैहिकं चापि भौतिकं च तथैव हि।
आयाति स्वयमाहूतो दुःखानामेष संचयः।।   
            
-पंचाध्यायी
(दैविकं) दैविक (अपि च) और (दैहिकं) दैहिक (तथैव च) उसी प्रकार (च) और (भौतिकं) भौतिक (दुखानां) दुःखों का (एष) यह (संचयः) समूह (स्वयमाहूतः) अपने आप बुलाया हुआ (आयाति) आता है।

🔵 अनेक बार ऐसे अवसर आ उपस्थित होते हैं जो प्राकृतिक नियमों के बिल्कुल विपरीत दिखाई देते हैं। एक मनुष्य उत्तम जीवन बिताता है, पर अकस्मात् उसके ऊपर ऐसी विपत्ति आ जाती है मानो ईश्वर किसी घोर दुष्कर्म का दण्ड दे रहा हो। एक मनुष्य बुरे से बुरे कर्म करता है, पर वह चैन की वंशी बजाता है, सब प्रकार के सुख-सौभाग्य उसे प्राप्त होते हैं। एक निठल्ले को लॉटरी में, जुआ में या कहीं गढ़ा हुआ धन मिल जाता है, किंतु दूसरा अत्यंत परिश्रमी और बुद्धिमान मनुष्य अभाव में ही ग्रसित रहता है। एक व्यक्ति स्वल्प परिश्रम में ही बड़ी सफलता प्राप्त कर लेता है, दूसरा घोर प्रयत्न करने और अत्यंत सही तरीका पकड़ने पर भी असफल रहता है। ऐसे अवसरों पर ‘प्रारब्ध’, ‘भाग्य’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार महामारी, बीमारी, अकाल मृत्यु, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बिजली गिरना, भूकंप, बाढ़ आदि दैवी प्रकोप भी भाग्य, प्रारब्ध कहे जाते हैं। आकस्मिक दुर्घटनाएँ, मानसिक आपदा, वियोग आदि वे प्रसंग जो टल नहीं सकते, इसी श्रेणी में आ जाते हैं।
          
🔴  यह ठीक है कि ऐसे प्रसंग कम आते हैं, प्रयत्न से उलटा फल होने को आकस्मित घटना घटित हो जाने के अपवाद चाहे कितने ही कम क्यों न हों, पर होते जरूर हैं और वे कभी-कभी ऐसे कठोर होते हैं कि उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे अवसरों पर हम में से साधारण श्रेणी के ज्ञान रखने वाले बहुत ही भ्रमित हो जाते हैं और ऐसी-ऐसी धारणा बना लेते हैं, जो जीवन के लिए बहुत ही घातक सिद्ध होती है। कुछ लोग तो ईश्वर पर अत्यंत कुपित होते हैं। उसे दोषी ठहराते हैं और भरपूर गालियाँ देते हैं, कई तो नास्तिक हो जाते हैं, कहते हैं कि हमने ईश्वर का इतना भजन-पूजन किया पर उसने हमारी कुछ भी सहायता नहीं की, ऐसे ईश्वर को पूजना व्यर्थ है, कई महामानव लाभ की इच्छा से साधु-संत, देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। यदि संयोगवश इसी बीच में कुछ हानिकर प्रसंग आ गए, तो उस पूजा के स्थान पर निंदा करने लगते हैं।

🔵 ऐसा भी देखा गया है कि ऐसे आकस्मिक प्रसंग आने के समय ही यदि घर में कोई नया प्राणी आया हो, कोई पशु खरीदा हो, बालक उत्पन्न हुआ हो, नई बहू आई हो, तो उस घटना का दोष या श्रेय उस नवागंतुक प्राणी पर थोप दिया जाता है। यह नया बालक बड़ा भाग्यवान् हुआ जो जन्मते ही इतना लाभ हुआ, यह बहू बड़ी अभागी आई कि आते ही सत्यानाश कर दिया, इस श्रेयदान या दोषारोपण के कारण कभी-कभी घर में ऐसे दुःखदायी क्लेश-कलह उठ खड़े होते हैं कि उनका स्मरण होते ही रोमांच हो जाता है। हमारे परिचित एक सज्जन के घर में नई बहू आई, उन्हीं दिनों घर का एक जवान लड़का मर गया। इस मृत्यु का दोष बेचारी नई बहू पर पड़ा, सारा घर यही तानाकसी करता-‘यह बड़ी अभागी आई है, आते ही एक बलि ले ली।’ कुछ दिन तो इस अपमान को बेचारी निर्दोष लड़की विष के घूँट की तरह पीती रही, पर जब हर वक्त का अपमान, घरवालों का नित्यप्रति का दुर्व्यवहार सहन न कर सकी, तो मिट्टी का तेल छिड़क कर जल मरी। बेचारी निरपराध विधवाओं को अभागी, कलमुँही, डायन की उपाधि मिलने का एक आम रिवाज है। इसका कारण भाग्यवाद के सम्बन्ध में मन में जमी हुई अनर्थमूलक धारणा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aakas

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 9)

🌹 चित्रगुप्त का परिचय

🔵 इस सम्बन्ध में एक और महत्त्वपूर्ण बात जान लेने की है कि हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कानून व्यवस्था है। रिश्वत के मामले में एक चपरासी, एक क्लर्क, एक मजिस्ट्रेट तीन आदमी पकड़े जाएँ, तो तीनों को अलग-अलग तरह की सजा मिलेगी। सम्भव है चपरासी को डाँट-डपट सुना कर ही छुटकारा मिल जाय, पर मजिस्ट्रेट बर्खास्त हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि उसकी बड़ी जिम्मेदारी है। एक असभ्य भील शिकार मारकर पेट पालता है, अपराध उसका भी है, परंतु अहिंसा का उपदेश करने वाला पंडित यदि चुपचाप बूचर दुकान में जाता है, तो पंडित को उस भील की अपेक्षा अनेक गुणा पाप लगेगा। कारण यह है कि ज्ञान वृद्धि करता हुआ जीव जैसे-जैसे आगे बढ़ता चलता है, वैसे ही वैसे उसकी अंतःचेतना अधिक स्वच्छ हो जाती है।
          
🔴 मैले कपड़े पर थोड़ी-सी धूल पड़ जाय, तो उसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु दूध के समान स्वच्छ धुले हुए कपड़े पर जरा सा धब्बा लग जाए, तो वह दूर से ही चमकता है और बहुत बुरा मालूम पड़ता है। छोटा बच्चा कपड़ों पर टट्टी फिर देता है, पर उसे कोई बुरा नहीं कहता और न बच्चे को कुछ शर्म आती है, किंतु यदि कोई जवान आदमी ऐसा कर डाले, तो उसे बुरा कहा जाएगा और वह खुद भी लज्जित होगा। बच्चे और बड़े ने आचरण एक-सा किया, पर उसके मानसिक विकास में अंतर होने के कारण बुराई की गिनती कम-ज्यादा की गई। इसी प्रकार अशिक्षित, अज्ञानी, असभ्य व्यक्ति को कम पाप लगता है। ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ भला-बुरा समझने की योग्यता बढ़ती जाती है, सत्-असत् का कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक प्रबल होता जाता है, अंतःकरण की पुकार जोरदार भी बनती है, इस प्रकार आत्मोन्नति के साथ-साथ सदाचरण की जिम्मेदारी भी बढ़ती जाती है।

🔵 हुकुम-उदली करने पर मामूली चपरासी को सौ रुपया जुर्माना हो जाता है, परंतु फौजी अफसर हुक्म-अदूली करे, तो कोर्ट मार्शल द्वारा गोली से शूट कर दिया जाएगा। ज्ञानवान, विचारवान और भावनाशील हृदय वाले व्यक्ति जब दुष्कर्म करते हैं, तो उनका चित्रगुप्त उस करतूत को बहुत भारी पाप की श्रेणी में दर्ज कर देता है। गौदान से लोग वैतरणी पार कर जाते हैं। पर राजा नृप जैसा विवेकवान थोड़ी गलती करने पर ही नरक में जा पहुँचा। अज्ञानी व्यक्ति अपराध करे तो यह उतना महत्त्व नहीं रखता, किंतु कर्तव्यच्युत ब्राह्मण तो घोर दण्ड का भागी बनता है। राजा बनना सब दृष्टियों में अच्छा है, पर राजा की जिम्मेदारी भी सबसे ऊँची है। ज्ञानवानों का यह कठोर उत्तरदायित्व है कि सदाचार पर दृढ़ रहें, अन्यथा सात मंजिल ऊँची छत पर से गिरने वाले को जो कष्ट होता है, उन्हें भी वही दुःख होगा।

कर्मों का फल किस प्रकार मिलता है? पाठकों को यह रहस्य भी आगे के लेखों में समझाया जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 39)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 53. नर-नारी का भेदभाव— जातियों के बीच बरती जाने वाली ऊंच-नीच की तरह पुरुष और स्त्री के बीच रहने वाली ऊंच-नीच की भावना निन्दनीय है। ईश्वर के दाहिने बांये अंगों की तरह नर-नारी की रचना हुई है। दोनों का स्तर और अधिकार एक है। इसलिए सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकार भी दोनों से एक होने चाहिए। प्राचीन काल में था भी ऐसा ही। तब नारी भी नर के समान ही प्रबुद्ध और विकसित होती थी। नई पीढ़ियों की श्रेष्ठता कायम रखने तथा सामाजिक स्तर की उत्कृष्टता बनाये रखने में उसका पुरुष के समान ही योगदान था।

🔴 आज नारी की जो स्थिति है वह अमानवीय और अन्यायपूर्ण है। उसके ऊपर पशुओं जैसे प्रतिबन्धों का रहना और सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाना भारतीय धर्म की उदारता, महानता और श्रेष्ठता को कलंकित करने के समान है। पुरुषों के लिए भिन्न प्रकार की और स्त्रियों के लिए भिन्न प्रकार की न्याय-व्यवस्था रहना अनुचित है। दाम्पत्य-जीवन में सदाचार का दोनों पर समान प्रतिबन्ध होना चाहिए। शिक्षा और स्वावलम्बन के लिए दोनों को समान अवसर मिलने चाहिए।

🔵 पुत्र और पुत्रियों के बीच बरते जाने वाले भेद-भाव को समाप्त करना चाहिए। दोनों को समान स्नेह, सुविधा और सम्मान मिले। पिछले दिनों जो अनीति नारी के साथ बरती गई है उसका प्रायश्चित यही हो सकता है कि नारी को शिक्षित और स्वावलम्बी बन सकने में उचित योग्यता प्राप्त करने का अधिकाधिक अवसर प्रदान किया जाय। सरकार ने पिछड़े वर्गों को संविधान में कुछ विशेष सुविधाएं दी है, ताकि वे अपने पिछड़ेपन से जल्दी छुटकारा प्राप्त कर सकें। सामाजिक न्याय के अनुसार नारी को शिक्षा और स्वावलम्बन की दिशा में ऐसी ही विशेष सुविधा मिलनी चाहिए ताकि उनका पिछड़ापन अपेक्षाकृत जल्दी ही प्रगति में बदल सके।

🔴 पर्दा प्रथा उस समय चली जब यवन लोग बहू-बेटियों पर कुदृष्टि डालते और उनका अपहरण करते थे। अब वैसी परिस्थितियां नहीं रहीं तो पर्दा भी अनावश्यक हो गया। यदि उसे जरूरी ही समझा जाय तो स्त्रियों की तरह पुरुष भी घूंघट किया करें! क्योंकि चारित्रिक पतन के सम्बन्ध में नारी की अपेक्षा नर ही अधिक दोषी पाये जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 26) 7 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 पिछले पृष्ठों पर बताया जा चुका है कि परमार्थ और स्वार्थ, पुण्य और पाप, धर्म, अधर्म यह किसी कार्य विशेष पर निर्भर नहीं, वरन् दृष्टिकोण पर अवलम्बित है। दुनिया का स्थूल बुद्धि-कार्यों का रूप देखकर उसकी अच्छाई-बुराई का निर्णय करती हैं परन्तु परमात्मा के दरबार में काम के बाहरी रूप का कुछ महत्व नहीं वहां तो भावना ही प्रधान है। भावना का आरोपण मनुष्य की आन्तरिक पवित्रता से सम्बन्धित है। बनावट, धोखेबाज और प्रवंचना बाहर तो चल सकती है पर अपनी आत्मा के सामने नहीं चल सकती।

🔴 अन्तःकरण स्वयमेव जान लेता है कि अमुक कार्य किस दृष्टिकोण से किया जा रहा है, वहां कोई छिपाव या दुराव काम नहीं दे सकता। वरन् जो बात सत्य है वह ही मनोभूमि में स्वच्छ पट्टिका पर स्पष्ट रूप से अंकित होती है। जिस कार्य प्रणाली के द्वारा अन्तःकरण में आत्म-त्याग, सेवा, प्रेम एवं सद्भाव का संचार होता हो वह कार्य सच्चा और पक्का परमार्थ है। वह कार्य निस्संदेह स्वर्ग और मुक्ति की ओर ले जाने वाला होगा, चाहे उस कार्य का बाह्य रूप कैसा ही साधारण या असाधारण, सीधा या विचित्र, छोटा या बड़ा क्यों न हो।

🔵 गृहस्थ संचालन के सम्बन्ध में भी दो दृष्टिकोण हैं। एक तो ममता, मालिकी, अहंकार और स्वार्थ का, दूसरा आत्म-त्याग, सेवा, प्रेम और परमार्थ का। पहला दृष्टिकोण बन्धन, पतन, पाप और नरक की ओर ले जाने वाला है। दूसरा दृष्टिकोण मुक्ति, उत्थान, पुण्य और स्वर्ग को प्रदान करता है। शास्त्रकारों ने, सन्त पुरुषों ने, जिस गृहस्थ की निन्दा की है, बन्धन बताया है और छोड़ देने का आदेश दिया है वह आदेश स्वर्ग मय दृष्टिकोण के सम्बन्ध में है। परमार्थ मय दृष्टिकोण का गृहस्थ तो अत्यन्त उच्चकोटि का आध्यात्मिक साधना है। उसे तो प्रायः सभी ऋषि, मुनि, महात्मा, योगी, यती, तथा देवताओं ने अपनाया है और उसकी सहायता से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया है। इस मार्ग को अपनाने से उनमें से न तो किसी को बन्धन में पड़ना पड़ा और न नरक में जाना पड़ा

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 26) 7 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 जिसके साथ मतभेद हुआ या विवाद चला है, उसके ऊपर एकाएक बरस पड़ने से गुत्थी सुलझती नहीं वरन् और भी अधिक उलझ जाती है। लड़ पड़ना किसी को अपना प्रत्यक्ष शत्रु बना लेना है और इस बात के लिए उत्तेजित करना है कि वह भी बदले में वैसा ही अपमानजनक व्यवहार करे। आक्रोश और प्रतिशोध का एक कुचक्र है जो सहज ही टूटता नहीं।

🔴 क्रोध करके हम दूसरे को कितनी क्षति पहुंचा सके, दबाव देकर अपनी मनमर्जी किस हद तक पूरी कर सके—यह कहना कठिन है, पर इतना निश्चित है कि उससे अपना रक्त-मांस जलने से लेकर मानसिक संतुलन गड़बड़ाने जैसी कितनी ही हानियां तत्काल होती हैं। गलती किसी की कुछ भी क्यों न हो, पर जब दर्शक किसी को आप से बाहर होते देखते हैं तो उसी को दोषी मानते हैं। जो अपनी शालीनता गंवा चुका उसके साथ किसी को सहानुभूति नहीं हो सकती। इस प्रकार क्रोधी कारण विशेष पर उत्तेजित होते हुए भी अपने आपको अकारण अपराधी बना लेता है।

🔵 दार्शनिक सोना का मत है कि ‘‘क्रोध शराब की तरह मनुष्य को विचार शून्य और लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह यह जिसके पीछे पड़ता है उसका सर्वनाश ही करके छोड़ता है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 7 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 3) 6 Dec

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं?   

🔴 अपने समय को अभूतपूर्व प्रगतिशीलता का युग कहा और गर्वोक्तियों के साथ बखाना जाता है। इस अर्थ में बात सही भी है कि जितने सुविधा साधन इन दिनों उपलब्ध हैं, इतने इससे पहले कभी भी हस्तगत नहीं हो सके। जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार साधन, इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे। कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी-अङ्ग प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं? कहा जा सकता है कि विज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

🔵 बुद्धिवाद की प्रगति भी कम नहीं हुई है। ज्ञान, पुरातन एकाकी धर्मशास्त्र की तुलना में अब अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञानशास्त्र जैसे अनेकानेक कलेवरों में असाधारण रूप से बढ़ा और भविष्य में और भी अधिक खोज लेने का दावा कर रहा है। शोध संस्थानों की, प्रयोगशालाओं की उपलब्धियाँ घोषणा कर रही हैं कि निकट भविष्य में मनुष्य इतना अधिक ज्ञान-विज्ञान खोज लेगा कि पुरातन काल की समस्त उपलब्धियों को उसके सामने बौना ठहराया जा सके।

🔴 इस तथाकथित प्रगति ने इतना तक कहना शुरू कर दिया है कि ईश्वर मर गया है या उसे मार दिया जाना चाहिए। धर्म के सम्बन्ध में नई व्याख्या विवेचना यह है कि वह अन्धविश्वासों का जमघट मात्र है। उसे यथास्थिति स्वीकार करने के लिए गले के नीचे उतारी जाने वाली अफीम की गोली भर कहा जाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 8)

🌹 चित्रगुप्त का परिचय

🔵 🔴 अर्जुन का उद्देश्य पवित्र था, वह पाप को नष्ट करके धर्म की स्थापना करना चाहता था। बस वही इच्छा खुफिया रजिस्टर में दर्ज हो गई, आदमीयों के मारे जाने की संख्या का कोई हिसाब नहीं लिखा गया। दुनियाँ में करोड़पति की बड़ी प्रतिष्ठा है, पर यदि उसका दिल छोटा है, तो चित्रगुप्त के दरबार में भिखमंगा शुमार किया जाएगा। दुनियाँ का भिखमंगा यदि दिल का धनी है, तो उसे हजार बादशाहों का बादशाह गिना जाएगा। इस प्रकार मनुष्य जो भी काम कर रहा है, वह किस नीयत से कर रहा है, वह नीयत, भलाई या बुराई जिस दर्जे में जाती होगी, उसी में दर्ज कर दी जाएगी।
          
🔴 सद्भाव से फाँसी लगाने वाला एक जल्लाद भी एक पुण्यात्मा गिना जा सकता है और एक धर्मध्वजी तिलकधारी पंडित भी गुप्त रूप से दुराचार करने पर पापी माना जा सकता है। बाहरी आडम्बर का कुछ मूल्य नहीं है, कीमत भीतरी चीज की है। बाहर से कोई काम भला या बुरा दिखाई दे, तो उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। असली तत्त्व तो उस इच्छा और भावना में है, जिससे प्रेरित होकर वह काम किया गया है। पाप-पुण्य की जड़ कार्य और प्रर्दशन में नहीं, वरन् निश्चित रूप से इच्छा और भावना में है।

🔵   उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि हमारे प्राणों के साथ घुलमिल कर रहने वाला चित्रगुप्त देवता, बिना किसी पक्षपात के बुरे-भले कर्मों का लेखा अंतःचेतना के परमाणुओं पर लिखा करता है, उस अदृश्य लिपि को बोलचाल की भाषा में कर्म रेखा कहते हैं। साथ ही यह भी बताया चुका है कि पाप-पुण्य का निर्णय काम के बाहरी रूप से नहीं वरन् कर्ता की इच्छा और भावना के अनुरूप होता है। यह इच्छा जितनी तीव्र होगी, उतना ही पाप-पुण्य भी अधिक एवं बलवान होगा। जैसे एक व्यक्ति उदास मन से किसी रोगी की सेवा करता है और दूसरा व्यक्ति दूसरे रोगी की सेवा अत्यन्त दया, सहानुभूति, उदारता एवं प्रेमपूर्वक करता है, तो बाहर से देखने में दोनों के काम समान भले ही हों, पर उस पुण्य का परिणाम भावना की उदासीनता एवं प्रेम की तत्परता के अनुसार न्यूनाधिक होगा। इसी प्रकार एक भूखा व्यक्ति लाचार होकर चोरी करता है, दूसरा व्यक्ति मद्यपान के लिए चोरी करता है, तो दोनों के पाप में निस्संदेह न्यूनाधिकता होगी। चोरी दोनों ने की है, पर दुष्टता में न्यूनाधिकता के कारण पाप भी उसी अनुपात से होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 6 Dec 2016





👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 38)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 52. उपजातियों का भेदभाव हटे— चार वर्ण रहें पर उनके भीतर की उपजातियों की भिन्नता ऐसी न रहे, जिसके कारण परस्पर रोटी-बेटी का व्यवहार भी न हो सके। प्रयत्न ऐसा करना चाहिए कि उपजातियों का महत्व गोत्र जैसा स्वल्प रह जाय और एक वर्ण के विवाह शादी पूरे उस वर्ण में होने लगें। ब्राह्मण जाति के अन्तर्गत सनाढ्य, गौड़, गौतम, कान्यकुब्ज, मालवीय, मारवाड़ी, सारस्वत, मैथिल, सरयूपारीण, श्रीमाली, पर्वतीय आदि अनेक उपजातियां हैं। यदि इनमें परस्पर विवाह शादी होने लगें तो इससे उपयुक्त वर-कन्या ढूंढ़ने में बहुत सुविधा रहेगी। अनेकों रूढ़ियां मिटेंगी और दहेज जैसी हत्यारी प्रथाओं का देखते-देखते अन्त हो जायगा। इस दिशा में साहसपूर्ण कदम उठाये जाने चाहिए।

🔴 एक-एक पूरे वर्ण की जातीय सभाएं बनें, और उनका प्रयत्न इस प्रकार का एकीकरण ही हो। जातिगत विशेषताओं को बढ़ाने, बिलगाव की भावनाओं को हटाने तथा उन वर्गों में फैली कुरीतियों का समाधान करने के लिए ये जातीय सभाएं कुछ ठोस काम करने को खड़ी हो जांय तो सामाजिक एकता की दिशा में भारी मदद मिल सकती है। अच्छे लड़के और अच्छी लड़कियों के सम्बन्ध में जानकारियां एकत्रित करना और विवाह सम्बन्धों में सुविधा उत्पन्न करना भी इन सभाओं का काम हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 25) 6 Dec

🌹 गृहस्थ योग से परम पद

🔵 कुछ विशिष्ठ व्यक्तियों को छोड़कर साधारण श्रेणी के सभी पाठकों के लिए हम गृहस्थ योग की साधना को बहुत ही उपयुक्त, उचित, सुलभ एवं सुख साध्य समझते हैं। गृहस्थ योग की साधना भी राजयोग, जपयोग, लययोग, आदि की ही श्रेणी में आती है। उचित रीति से इस महान व्रत का अनुष्ठान करने पर मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जैसे कोलतार पोत देन पर हर वस्तु काली और कलई पोत देने पर सफेद हो जाती है उसी प्रकार योग की, साधना की, परमार्थ की, अनुष्ठान की दृष्टि रखकर कार्य करने से वे कार्य साधनामय परमार्थ प्रद हो जाते हैं।

🔴 अहंकार, तृष्णा, भोग, मोह आदि का भाव रखकर कार्य करने से उत्तम से उत्तम कार्य भी निकृष्ट परिणाम उपस्थित करने वाले होते हैं। घर गृहस्थी के संस्थान को सुव्यवस्थित रूप से चलाने में भावनाएं यदि ऊंची, पवित्र, निस्वार्थ और प्रेममय रखी जावें तो निस्संदेह यह कार्य अतीव सात्विक एवं सद्गति प्रदान करने वाला बन सकता है। अपना आत्मा ही अपने को ऊंचा या नीचा ले जाता है यदि आत्म-निग्रह, आत्म-त्याग, आत्मोत्सर्ग के साथ अपने जीवन-क्रम को चलने दिया जाय तो इस सीधे-साधे तरीके की सहायता से ही मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है।

🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 25) 6 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे, उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया। दोनों एक दूसरे के सामने आ गये, पथ बहुत संकरा था। एक के राह छोड़े बिना, दूसरा जा नहीं सकता था, लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार न हुआ और हठपूर्वक आमने-सामने खड़े रहे। थोड़ी देर खड़े रहने पर उन दोनों ने हटना न हटना, प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया—अजीब स्थिति पैदा हो गयी।।

🔴 यहां पर समस्या का हल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से अधिक सभ्य, शिष्ट और समझदार समझता होता वह हट कर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता। निश्चित था कि प्रचेता कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे, एक साधक थे और आध्यात्मिक उन्नति में लगे थे। कल्याणपाद एक धृष्ट और ढीठ व्यक्ति था, यदि ऐसा न होता तो एक महात्मा को रास्ता तो देता ही, साथ ही नमन भी करता। प्रचेता को यह बात समझ लेनी चाहिए थी, किन्तु क्रोधी स्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया बल्कि उसी के स्तर पर उतर कर अड़ गये। कुछ देर दोनों खड़े रहे, पर फिर प्रचेता को क्रोध हो आया। उन्होंने उसे श्राप दे दिया कि राक्षस हो जाए। श्राप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया। क्रोध से विनष्ट प्रभाव हुए प्रचेता अपनी रक्षा न कर सके।

🔵 वस्तुतः क्रोध एक प्रकार का मानसिक बुखार है। चाहे तो एक विशेष प्रकार का उन्माद कह सकते हैं, जिसके चढ़ने पर यह नहीं सूझ पड़ता कि अनचाही स्थिति से निपटने के लिए क्या करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सतयुग की वापसी (भाग 2) 6 Dec

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं?   

🔴 क्रौंच पक्षी को आहत-विलाप करते देखकर वाल्मीकि की करुणा जिस क्षण उभरी, उसी समय वे आदि कवि के रूप में परिणत हो गए। ऋषियों के अस्थि-पंजरों की पर्वतमाला देखकर राम की करुणा मर्माहत हो गई और उनसे भुजा उठाकर यह प्रण करते ही बन पड़ा कि ‘‘निशिचर हीन करौं महि’’। बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी जैसे आपत्तिकाल में जब असंख्यों को देखा जाता है, तो निष्ठुर भले ही मूकदर्शक बने रहें, सहृदयों को तो अपनी सामर्थ्य भर सहायता के लिए दौडऩा ही पड़ता है। इसके बिना उनकी अन्तरात्मा आत्म-प्रताडऩा से व्याकुल हो उठती है। निष्ठुरों को नर-पिशाच कहते हैं, उनका मनुष्य समुदाय में भी अभाव नहीं है।

🔵 विकास की अन्तिम सीढ़ी भाव-संवेदना को मर्माहत कर देने वाली करुणा के विस्तार में ही है। इसी को आन्तरिक उत्कृष्टता भी कहते हैं। संवेदना उभरने पर ही सेवा साधना बन पड़ती है। धर्म-धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता। तपश्चर्या और योग साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदना जगाकर उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमन्दों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है, उन्हीं को इस धरती पर देवता कहा जाता है। उन्हीं का अनुकरण और अभिनन्दन करते विवेकवान्, भक्तजन् देखे जाते हैं।

🔴 देने की प्रकृति वाली आत्माओं का जहाँ संगठन-समन्वय होता रहता है, उसी क्षेत्र को स्वर्ग के नाम से सम्बोधित किया जाने लगता है। इस प्रकार का लोक या स्थान कहीं भले ही न हो, पर सत्य है कि सहृदय, सेवाभावी, उदारचेता न केवल स्वयं देवमानव होते हैं, वरन् कार्यक्षेत्र को भी ऐसा कुछ बनाए बिना नहीं रहते जिसे स्वर्गोपम अथवा सतयुग का सामयिक संस्करण कहा जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 7)

🌹 चित्रगुप्त का परिचय

🔵 भीतरी दुनियाँ में गुप्त-चित्र या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत दोनों महकमों का काम स्वयं करता है। यदि पुलिस झूठा सबूत दे दे तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता है, परंतु भीतरी दुनियाँ में ऐसी गड़बड़ी की सम्भावना नहीं। अंतःकरण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से, किस परिस्थिति में, क्यों कर किया गया था। वहाँ बाहरी मन को सफाई या बयान देने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि गुप्त मन उस बात के सम्बन्ध में स्वयं ही पूरी-पूरी जानकारी रखता है। हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं, उस इच्छा या भावना से ही पाप-पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तौल-नाप बाहरी दुनियाँ में होती है।
          
🔴  एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है, बाहरी दुनियाँ तो पुण्य की तौल रुपए-पैसों की गिनती के अनुसार करेगी। दो पैसे दान करने वाले की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखेगा, पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जाएगी। भीतरी दुनियाँ में यह तोल-नाप नहीं चलती। अनाज के दाने अँगोछे में बाँधकर गाँव के बनिये की दुकान पर चले जाएँ, तो वह बदले में गुड़ देगा, पर उसी अनाज को इंग्लैड की राजधानी लन्दन में जाकर किसी दुकानदार को दिया जाय, तो वह कहेगा-महाशय! इस शहर में अनाज के बदले सौदा नहीं मिलता, यहाँ तो पौड, शिलिंग, पेंस का सिक्का चलता है।

🔵  ठीक इसी तरह बाहरी दुनियाँ में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा-वार्ता से, तीर्थयात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता है, पर चित्रगुप्त देवता के देश में यह सिक्का नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है। उसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा-खर्च किया जाता है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को उकसा कर लाखों आदमियों को महाभारत के युद्ध में मरवा डाला। लाश से भूमि पट गई, खून की नदियाँ बह गईं, फिर भी अर्जुन को कुछ पाप न लगा, क्योंकि हाड़-माँस से बने हुए कितने खिलौने टूट-फूट गए, इसका लेखा चित्रगुप्त के दरबार में नहीं रखा गया। भला कोई राजा यह हिसाब रखता है कि मेरे भण्डार में से कितने चावल फैल गए। पाँच तत्व से बनी हुई नाशवान् चीजों की कोई पूछ आत्मा के दरबार में नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 37)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 पिछले दो हजार वर्ष के अज्ञान से भरे अन्धकारयुग में हमारी कितनी ही उपयोगी प्रथाएं- रूढ़िवादिता में ग्रस्त होकर अनुपयोगी बन गई हैं। इन विकृतियों को सुधार कर हमें अपनी प्राचीन वैदिक सनातन स्थिति पर पहुंचने का प्रयत्न करना होगा, तभी भारतीय समाज का सुविकसित समाज जैसा रूप बन सकेगा। इस संबन्ध में हमें निम्न प्रयत्न करने चाहिए।

🔴 51. वर्ण व्यवस्था का शुद्ध-स्वरूप— ब्रह्माजी ने अपने चार पुत्रों को चार कार्य-क्रम सौंपकर उन्हें चार वर्णों में विभक्त किया है। ज्ञान, धर्म, बल और श्रम यह चारों ही शक्तियां मानव समाज के लिए आवश्यक थीं। इनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वंशगत प्रयत्न चलता रहे और उसमें कुशलता तथा परिष्कृति बढ़ती रहे, इस दृष्टि से इन चार कामों को चार पुत्रों में बांटा गया था। चारों सगे भाई थे, इसलिए उनमें ऊंच-नीच का कोई प्रश्न न था। किसी का सम्मान, महत्व और स्तर न न्यून था, न अधिक। अधिक त्याग-तप करने के कारण, अपनी आन्तरिक महानता प्रदर्शित करने के कारण ब्राह्मण की श्रेष्ठता तो रही पर अन्य किसी वर्ण को हेय या निम्न स्तर का नहीं माना गया था।

🔵 आज स्थिति कुछ भिन्न ही हैं। चार वर्ण अगणित जातियों-उपजातियों में बांटे गये और इससे समाज में भारी अव्यवस्था एवं फूट फैली। परस्पर एक दूसरे को ऊंचा-नीचा समझा जाने लगा। यहां तक कि एक ही वर्ण के लोग अपनी उपजातियों में ऊंच-नीच की कल्पना करने लगे। यह मानवीय एकता का प्रत्यक्ष अपमान है। व्यवस्थाओं या विशेषताओं के आधार पर वर्ण-जाति रहे, पर ऊंच-नीच की मान्यता को स्थान न मिले। सामाजिक विकास में भारी बाधा पहुंचाने वाले इस अज्ञान को जितना जल्दी हटा दिया जाय उतना ही अच्छा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 24) 5 Dec

🌹 गृहस्थ योग से परम पद

🔵 लोग ऐसा समझते हैं कि धर्म-धारणा के लिए, पुण्यफल प्राप्त करने के लिए, आत्मोन्नति के लिए, ईश्वर प्राप्ति के लिए, स्वर्ग या मुक्ति की उपलब्धि के लिए, किन्हीं विशिष्ट, विचित्र या असाधारण कार्यों का आयोजन करने की आवश्यकता होती है। अमुक  प्रकार की वेश-भूषा, अमुक प्रकार का रहन-सहन, अमुक प्रकार का साधन भक्तिप्रद हैं यह मानना बिल्कुल गलत है। वेश-भूषा, रहन-सहन, साधक की सुविधा के लिए है, जिससे उसे आसानी रहे, इनके द्वारा सिद्धि किसी को नहीं मिलती। यदि वेष या रहन-सहन से ही सिद्धि मिलती होती तो आज के साधु नामधारी लाखों कर्महीन भिखमंगे इधर-उधर मारे मारे फिरते हैं मुक्ति के अधिकारी हो गये होते।

🔴 अनेक प्रकार की आत्मिक साधनाऐं, अनेक प्रकार के मानसिक व्यायाम हैं जिनके द्वारा मनोभूमि को, भावना-क्षेत्र को निर्मल, पवित्र एवं सात्विक बनाया जाता है। आत्मोन्नति की असंख्यों साधनाऐं हैं सभी लाभप्रद हैं; क्योंकि किसी भी रास्ते से सही भावना को उच्च बनाना है, यदि मनोभूमि उच्च न बने तो साधना निरर्थक है। साधना एक औजार मात्र है। उसको विवेकपूर्वक काम में लाने से इच्छित वस्तु का निर्माण हो सकता है। पर यदि विवेकपूर्वक न किया हो तो साधक निरर्थक है। अमुक पुस्तक का पाठ करने, मन्त्र जपने या अभ्यास करने से यदि मनोभूमि निर्मल बनती हो तो आत्मोन्नति होगी पर रूढ़ि की तरह अन्धविश्वासपूर्वक अविवेक के साथ किसी मन्त्र या पुस्तक को रटते रहा जाय, अमुक प्रकार से काया-कष्ट सहते रहा जाय तो उससे कुछ प्रयोग सिद्ध नहीं होता।

🔵 जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करना आत्मिक प्रगति द्वारा ही संभव है। उस पवित्रता के लिये अनेकों असंख्यों साधन हैं। जिनमें से देश, काल, पात्र को देखते हुए बुद्धिमान व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त वस्तु चुन लिया करते हैं। जैसे एक ही कसरत सबके लिए अनिवार्य नहीं है उसी प्रकार एक ही साधन हर ममक्ष के लिये आवश्यक नहीं है। शरीर, ऋतु, खुराक, पेशा आदि को देखकर ही चतुर व्यायाम विशारद अपने शिष्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यायाम कराते हैं, उसी प्रकार आत्म-तत्वदर्शी आचार्य भी असंख्यों योगों में से उपयुक्त योग का अपने अनुयायियों के लिए चुनाव करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 24) 5 Dec

  🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 क्रोध होने पर मनुष्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है। क्रोधाक्रान्त मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि वह क्या कह रहा है और क्या कर रहा है। क्रोध में आकर लोग अधिकतर अपनी ही हानि कर लेते हैं। दो परस्पर विरोधी व्यक्तियों में जो अपेक्षाकृत अधिक शान्त और संतुलित रहता है वही जीतता है। बुद्धिमान लोग अपने शत्रु को क्रोध से नहीं, शांति से नष्ट करते हैं। क्रोधी व्यक्ति जब एक बार किसी एक से क्रुद्ध हो जाता है तब उसका सन्तुलन यहां तक बिगड़ जाता है कि वह अन्य असम्बंधित व्यक्तियों से भी क्रोधपूर्ण व्यवहार एवं वार्ता करने लगता है और इस प्रकार और भी विरोधी बना लिया करता है।

🔴 क्रोधी व्यक्ति जब किसी पर क्रुद्ध होकर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो अपने पर क्रोध करने लगता है, अपने को दण्ड देने और अपनी ही हानि करने लगता है। क्रोध मनुष्य को पागल की स्थिति में पहुंचा देता है। बुद्धिमान और मनीषी व्यक्ति क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध का आक्रमण अपने पर नहीं होने देते। वे विवेक का सहारा लेकर उस अनिष्टकर आवेग पर नियंत्रण कर लेते हैं और इस प्रकार संभावित हानि से बच जाते हैं।

🔵 प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे। स्वयं भी साधन थे, वेद-वेदांग के ज्ञाता थे, संयम और नियम से रहते थे। दिन-अनुदिन तप संचय कर रहे थे किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था, जब-तब इससे हानि भी उठाते थे, किन्तु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे। इसकी उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लम्बी साधना से जो आध्यात्मिक शक्ति प्रचेता संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिए साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथास्थान ही ठहरे रहते थे। होना तो यह चाहिए था कि अपनी प्रगति के इस अवरोध का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयं पर ही इस अप्रगति से क्रुद्ध रहा करते थे। अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से वे जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठते थे।

🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 5 Dec 2016


रविवार, 4 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 1)

🌹 सार-संक्षेप  

🔴 इस सदी की समापन वेला में अब तक हुई प्रगति के बाद एक ही निष्कर्ष निकलता है कि संवेदना का स्रोत तेजी से सूखा है, मानवी अन्तराल खोखला हुआ है। भाव-संवेदना जहाँ जीवन्त-जाग्रत् होती है, वहाँ स्वत: ही सतयुगी वातावरण विनिर्मित होता चला जाता है। भाव-संवेदना से भरे-पूरे व्यक्ति ही उस रीति-नीति को समझ पाते हैं, जिसके आधार पर सम्पदाओं का, सुविधाओं का सदुपयोग बन पाता है।

🔵 समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की आए दिनों जय-जयकार होती देखी जाती है। यह भी सुनिश्चित है कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किए हैं, जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है। इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है— भाव-संवेदना यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। इस एक के आधार पर ही अनेकानेक दैवी तत्त्व उभरते चले जाते हैं।

🔴 सतयुग की वापसी इसी संवेदना के जागरण, करुणा के उभार से होगी। बस एक ही विकल्प इन दिनों है— भाव-संवेदना का जागरण। उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श और उदात्त बनाया जाए। इसी से यह विश्व उद्यान हरा-भरा फला-फूला व सम्पन्न बन सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 36)


🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना
🔵 50. श्रम का सम्मान— श्रम का सम्मान बढ़ाया जाय। बौद्धिक श्रम करने वालों को धन और श्रम अधिक मिलता है और शारीरिक श्रमिकों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। इस दृष्टिकोण में परिवर्तन होना चाहिए। शारीरिक श्रम एवं श्रमिकों को भी उचित सम्मान मिले। राजा जनक ने हल जोतकर अपनी जीविका कमाने का आदर्श रखा था और नसीरुद्दीन बादशाह टोपियां सींकर तथा कुरान लिखकर अपना गुजारा करता था।

🔴 हमारे समाज में सफाई करने वाले, कपड़े बुनने वाले, जूता बनाने वाले, कपड़े धोने वाले, इमारतें चिनने वाले, बोझा ढोने वाले, मजूरी करने वाले लोग इसीलिए नीच और अछूत माने गये कि वे शारीरिक श्रम करते हैं। थोड़ा-सा अपना बोझ ले चलने में बेइज्जती अनुभव करना आज के शिक्षित एवं सम्पन्न कहे जाने वाले लोगों का स्वभाव बन गया है। ऐसे लोगों की स्त्रियां भोजन बनाने, बर्तन मांजने, झाड़ू लगाने, बिस्तर बिछाने जैसे कामों में बेइज्जती समझती और इन छोटे-छोटे कामों के लिए नौकर चाहती हैं। अमीर लोग जूतों और कपड़े पहनने काम तक नौकरों से कराते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्तियां किसी भी समाज के पतन का करण होती हैं।

🔵 श्रम का सम्मान घटने से इस ओर लोगों की अरुचि हो जाती है। आरामतलबी को श्रेय मिले तो सभी वैसा बनना चाहेंगे। प्रगति से सहयोग मिलता है, पर उसको साकार रूप तो श्रम से ही मिलता है। इसलिए श्रमिक को प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए और सम्मान भी। हम में से हर व्यक्ति को शारीरिक दृष्टि से भी श्रमिक जैसी अपनी स्थिति और मनोभूमि बनानी चाहिए। सामाजिक प्रगति का बहुत कुछ आधार ‘श्रम के सम्मान’ पर निर्भर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...