रविवार, 27 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 Aug 2023

आज दहेज का असुर भाषण-लेखों और प्रस्तावों की मार खाकर भी दहेज का असुर मरता नहीं। रक्तबीज की तरह वह चोट खाकर और भी अधिक विकराल बनता चला जा रहा है। इसका अंत ऐसे होगा कि युग निर्माण योजना के सदस्य बच्चे यह प्रतिज्ञा करेंगे कि वे विचारशील साथी से ही विवह करेंगे। दहेज और विवाहोन्माद में होने वाले भारी अपव्यय को हटाकर बिना खर्च की विधि से विवाह करेंगे। यदि अभिभावक इस निश्चय को मान्यता न देंगे तो वे आजीवन कुमार या कुमारी ही रहकर पवित्र जीवन व्यतीत करेंगे।

हम गायत्री उपासक भगवान् की सर्वश्रेष्ठ सजीव प्रतिमा नारी के रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान् की अनन्त करुणा, पवित्रता और सदाशयता का दर्शन करना हमारी भक्ति-भावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकाण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें, वासना की दृष्टि से न उसे सोचें, न उसे देखें और न उसे छुएँ।

नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है जैसे किसी देव मंदिर की प्रतिमा को चुराकर पत्थर को अपनी किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निन्दनीय और घृणित है उतनी ही हानिकारक और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। जिस की एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 26 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Aug 2023

🔶 परमार्थ के लिए स्वार्थ को छोड़ना आवश्यक है। आत्म-कल्याण के लिए भौतिक  श्री-समृद्धि की कामनाओं से मुँह मोड़ना पड़ता है। दोनों हाथ लड्डू मिलने वाली उक्ति उस क्षेत्र में चरितार्थ नहीं हो सकती। उन बाल बुद्धि लोगों से हमें कुछ नहीं कहना जो थोड़ा सा पूजा-पाठ करके विपुल सुख-साधन और स्वर्ग-मुक्ति दोनों ही पाने की कल्पनाएँ करते रहते हैं।

🔷 साधु-ब्राह्मणों का यह एक परम पवित्र कर्त्तव्य है कि इस समय जिस धर्म के आश्रय में वे अपनी आजीविका चलाते हैं और पूजा-सम्मान प्राप्त करते हैं उस धर्म रक्षा के लिए उन्हें कुछ काम भी करना चाहिए-कष्ट भी उठाना चाहिए। आज जबकि धर्म संकट में है, देश की सुरक्षा एवं प्रगति का प्रश्न है तब तो उन्हें उन आदर्शों को परिपुष्ट करने के लिए अपना समय लगाना ही चाहिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी दक्षिणा बटोरने और पैर पुजाने का ही धंधा करते रहे, कर्त्तव्य की तिलांजलि दिये बैठे रहे तो आगामी पीढ़ियँ उन्हें क्षमा न करेंगी।

🔶 ईश्वर और धर्म की मान्यताएँ केवल इसीलिए है कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों-इन दोनों कसौटियों पर वास्तविकता सिद्ध न होती हो तो यही कहना पड़ेगा कि यह तथाकथित ईश्वर भक्ति और धर्मात्मापन दम्भ मात्र था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "विचार कर के देखें"

एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए पानी मांगा उस व्यक्ति ने उन्हें पानी पिलाया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने उसे एक डायरी देकर कहा तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है इसमें तुम जो भी लिखोगे वही होगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट। उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लाॅटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है। उसने वहाँ लिख दिया कि पड़ोसी की लाॅटरी ना निकले।

अगले पेज पर लिखा था उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है उसने लिख दिया कि वह चुनाव हार जाये। इसी तरह वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया। जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पैन उठाया यमराज ने उसके हाथों से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा 5 मिनट का समय पूरा हुआ अब कुछ नहीं हो सकता।

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में निकाल दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया अतः तुम्हारा अन्त निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा समय निकल चुका था।

यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचो न करो। दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है।

प्रण लें आज से हम किसी का बुरा नहीं करेंगे।

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 Aug 2023

मनुष्य शरीर में प्रसुप्त देवत्व का जागरण करना ही आज की सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है। युगधर्म इसी के लिए प्रबुद्ध आत्माओं का आवाहन कर रहा है। नवयुग निर्माण की आधारशिला यही है। जिस असुरता की दुष्प्रवृत्तियों ने संसार को दुःख दारिद्रय भरा नरक बनाया, जिस अविवेक ने परमात्मा के पुत्र आत्मा को निकृष्टतम कीड़े से गये गुजरे स्तर पर ला पटका, उसका उन्मूलन देवत्व के अभिवर्धन से ही होना है। अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश उत्पन्न करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

देवत्व का जागरण एवं पोषण करने की तैयारी ही वह प्रयत्न है जिसके फलस्वरूप वर्तमान असुर अंधकार का निराकरण होगा। परिपुष्ट देवत्व से वह व्यापक प्रभाव उत्पन्न होगा जिससे प्रभावित होकर लोग पशुता और पिशाच वृत्ति का दुष्परिणाम समझ सकने योग्य विवेक एवं उन दुष्प्रवृत्तियों को त्याग सकने योग्य साहस कर सकें।

आशा करनी चाहिए कि वह दिन हम लोग अपनी इन्हीं आँखों से इसी जीवन में देखेंगे, जबकि अगणित देव प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने-अपने स्वार्थों को तिलांजलि देकर विश्व के नवनिर्माण में ऐतिहासिक महापुरुषों की तरह प्रवृत्त होंगे और इन दिनों जिस पशुता एवं पैशाचिक प्रवृत्ति ने लोकमानस पर अपनी काली चादर बिछा रखी है उसे तिरोहित करेंगे। अनाचार का अंत होगा और हर व्यक्ति अपने चारों ओर प्रेम, सौजन्य, सद्भाव, न्याय, उल्लास, सुविधा एवं सज्जनता से भरा सुख-शान्तिपूर्ण वातावरण अनुभव करेगा। उस शुभ दिन को लाने का उत्तरदायित्व देव वर्ग का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 22 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 22 Aug 2023

🔶 जीवन जीने की कला, संसार में दृष्टिगोचर होने वाली कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है। जिसको सही रीति से जिन्दगी जीना आ गया उसे अत्यन्त उच्चकोटि का कलाकार कहना चाहिए। वह दूसरों को प्रभावित, आकर्षित करने से लेकर अन्तःकरण को प्रमुदित करने तक के उन समस्त लाभों को कहीं अधिक मात्रा में प्राप्त करता है जो भौतिक विशेषताओं से सम्पन्न कलाकारों में से किसी-किसी को कभी-कभी या कठिनाई से ही उपलब्ध होते हैं।

🔷 बालकों जैसा स्वच्छ हृदय छल, कपट से सर्वथा रिक्त सरल व्यवहार सौम्य सादगी से भरी सरलता-विनम्र सज्जनता-निर्दोष क्रिया-कलाप-मधुरता और ममता से भरे वचन व्यवहार किसी भी व्यक्तित्व को इतना सुकोमल बना देते हैं कि उसका आन्तरिक सौंदर्य देखते-देखते दर्शकों की आंखें ही तृप्त नहीं ऐसे पारिजात पुष्प पर न जाने कितने मधु लोलुप कीट-पतंग मंडराते रहते हैं और उसके पराग से लाभान्वित होकर धन्य बनते रहते हैं।

🔶 संयम की शोभा देखते ही बनती है। इन्द्रिय संयम की महिमा पर जिसे विश्वास है, उसकी आँखों का तेज, वाणी का प्रभाव, चेहरे का ओज, संपर्क में आने वालों को सहज ही प्रभावित करेगा। बुद्धि की प्रखरता और विवेकशील दूरदर्शिता की कमी न रहेगी। वासना और तृष्णा पर नियंत्रण करने वाला व्यक्ति सहज ही इतने साधन और अवसर प्राप्त कर लेता है जिससे महानता के उच्च-शिखर पर चढ़ सकना तनिक भी कष्टकर न रहकर अत्यन्त सरल बन जाय। ऐसे लोग शरीर और मन के दोनों ही क्षेत्रों में समुचित समर्थता से सम्पन्न रहते हैं। न तो वे रुग्ण रहते हैं और न दीन दुर्बल। उन्हें कभी भी कातर स्थिति में नहीं देखा जा सकता है। विपत्तियाँ भी उनके धैर्य और साहस को चुनौती नहीं दे सकतीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न हों

हमें चाहिए कि हम अपने आप को परिस्थितियों के अनुरूप ढालें और जिस परिस्थिति में हों, उससे असंतोष या घृणा न प्रकट करें। दिन कभी एक से नहीं रहते। हमें चाहिए कि हम दु:ख के विषम पथ पर धैर्य न खो बैठें। प्रत्येक परिस्थिति की अपनी-अपनी हानि होती है और अपना-अपना लाभ। संसार की कोई भी ऐसी परिस्थिति नहीं, जिसका कुछ-न-कुछ लाभ न हो।

हमें लाभ की ओर ही ध्यान देना चाहिए। जिन मजदूरों को मिट्ïटी में कार्य करना पड़ता है, स्वास्थ्य भी तो उन्हीं का बढ़ता है। ज्ञान तो केवल यही है कि हमें प्रतिकूल परिस्थिति में हिम्मत नहीं खो बैठना चाहिए और जब हम देखें कि परिस्थिति में तब्दीली आती ही नहीं, तो हमें उस परिस्थिति से संतोष करना चाहिए। नीच वह नहीं, जिसका कार्य आप नीच बतलाते हैं, बल्कि नीच वह है जो अपने कार्य में, चाहे वह कार्य कितना ही छोटा हो, दिलचस्पी नहीं लेता और केवल काम चलाऊ काम करता है। इस जिंदगी में कभी पक्की सडक़ें आती है और कभी कच्ची।

हमें दोनों प्रकार की सडक़ों को अपनाना है, सहर्ष और एक जैसे उत्साह से। कभी फूलों के बिछौने पर सोना है, तो कभी कंटकों की सेज भी अपनानी है। शांति प्राप्त करने का यही प्रथम साधन है कि हम अपने को प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न होने दें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 21 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 21 Aug 2023

असत्य का त्याग करना जीवन में आनन्द और विकास के बीज बोने के समान है। ‘सत्य शिव सुन्दरम्’ सत्य ही शिव है- कल्याणकारी है और वही सुन्दर है। असत्य का आचरण हर प्रकार से अमाँगलिक होता है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बताया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है जो सूर्य के समान हर स्थल पर समान रूप से चमकता है।

एकाकी रोते-कलपते रहने वाला मनुष्य श्मशान में रहने वाले प्रेत-पिशाच की तरह उद्विग्न रहता है। जिसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं-जिसे सहानुभूति और आश्वासन के शब्द सुनने को नहीं मिलते वह अपनी घुटन में आप घुटता है और अपनी जलन में आप जलता है। यह एकाकीपन उस दुख से भी भारी पड़ता है जिसने कसक और कराह की स्थिति उत्पन्न की। दुख कष्टकर अवश्य होते हैं पर वे तब मधुर भी लगते हैं जब इस बहाने मित्रों की सहानुभूति और संवेदना उस दुखिया पर बरसती है।

हमें ऐसे विश्वासी चरित्रनिष्ठ और परिष्कृत दृष्टिकोण के मित्र तलाश करने चाहिए जो स्वयं गिरने से बचे रह सकें हों ओर दूसरों की गिरी स्थिति से उबारने की सामर्थ्य संग्रह कर सके हों। इस प्रकार के साथी केवल उन्हें ही मिलते हैं जिनने स्वयं आगे बढ़ कर समय-समय पर दूसरों के दुख बंटाये हैं जो कष्टों को बंटाने वाली करुणा से सम्पन्न हैं उनके कष्टों को बंटाने वाले सहज ही उत्पन्न होते हैं और विपत्ति का बोझ हलका करने में कन्धा लगाते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 19 अगस्त 2023

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (अन्तिम भाग)

गौरव की, प्रतिष्ठा की, बड़प्पन की, सम्मान की सब कोई इच्छा करते है। पर कितने लोग हैं, जिनने यह सीखा हो कि अपना आदर्श एवं दृष्टिकोण महान रखने पर ही सच्ची और स्थिर प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जो भी काम करें उसमें अपने व्यक्तित्व की महानता की छाप छोड़ी जाय जिसके परिणाम में हमें सच्चा गौरव प्राप्त हो, इस बात को कौन सोचता है? आज तो लोग फैशन, श्रृंगार, अकड़, शान और शौकत, शेखी, अपव्यय, बहुसंचय, कोठी, मोटर, दावत, पार्टी जैसी बनावटों के आधार पर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं।

काश, उन्हें कोई यह समझा देता कि यह बाल-क्रीड़ाऐं व्यर्थ हैं। जो भी काम करो उसे आदर्श, स्वच्छ, उत्कृष्ट, पूरा, खरा, तथा शानदार करो। अपनी ईमानदारी और दिलचस्पी को पूरी तरह उसमें जोड़ दो, इस प्रकार किये हुए उत्कृष्ट कार्य ही तुम्हारे गौरव का सच्चा प्रतिष्ठान कर सकने में समर्थ होंगे। अधूरे, अस्त-व्यस्त फूहड़, निकम्मे, गन्दे, नकली, मिलावटी, झूठे और कच्चे काम, किसी भी मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार हो सकते है, यह बात वही जानेगा जिसे जीवन विद्या के तथ्यों का पता होगा।

अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है। जिसे जीवन से प्रेम है वह अपने आपको सुधारता है, अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है। फलस्वरूप उसके सोचने और काम करने के तरीके ऐसे हो जाते है जिनके आधार पर महानता दिन-दिन समीप आती जाती है।

वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।

ऊपर की पंक्तियों में जीवन विद्या के कुछ पहलुओं की थोड़ी चर्चा की गई है। ऐसे कितने ही कोणों से मिलकर एक सन्तुलित जीवन बनता है। यह सन्तुलित जीवन व्यक्ति को स्वस्थ विकास की ओर ले जाता है। और ऐसे ही सुविकसित व्यक्तियों का समाज किसी राष्ट्र को गौरवशाली बनाता है।

आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.7

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 4)

लोग धन कमाने में लगे है अपनी क्षमता के अनुरूप कमाते और खर्चते भी है। पर यह भूलते रहते है कि अन्य मूल्यवान वस्तुऐं, जो धन से भी अधिक उपयोगी है, उपार्जित की जा रही है या नहीं? स्वास्थ्य का मूल्य क्या धन से कम है? ज्ञान वृद्धि क्या व्यर्थ की चीज है? आमोद प्रमोद का क्या जीवन में कोई स्थान नहीं है? पूजा उपासना क्या निरुपयोगी ही है? स्त्री बच्चों को व्यक्तिगत दिलचस्पी से दूर रखकर क्या उन्हें रोटी कपड़ा देते रहना ही पर्याप्त है? जिस समाज में हम जन्मते और पलते है क्या उसके प्रति हमारे कोई कर्तव्य नहीं है?

इन बातों पर यदि विचार किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि धन कमाने की तरह यह सब बातें भी उतनी ही आवश्यक है। केवल एक ही काम में सारा समय और मनोयोग खर्च कर देना उचित नहीं वरन् सर्वतोमुखी उत्कर्ष की आवश्यकता है। जिस प्रकार केवल घी खाने से ही स्वास्थ्य नहीं सध सकता, उसके लिए अन्न, शाक, लवण आदि से सम्मिश्रित सन्तुलित भोजन चाहिए इसी प्रकार हमारे उपार्जन भी सर्वतोमुखी-सन्तुलित होने चाहिए। जीवन विद्या का यह पहला पाठ है।

कितने लोग है जिनने यह पाठ पढ़ा है और व्यवहारिक जीवन में उतारा है? जो इस शिक्षा से विमुख रहे वे भले ही धन या जो अभीष्ट है वह एक वस्तु अधिक मात्रा में कमा लें पर इतने मात्र से उन्हें जीवन का सर्वतोमुखी आनन्द कदापि प्राप्त न हो सकेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 6

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.6


गुरुवार, 17 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 Aug 2023

हम जिन्दगी जीने की कला सीखें। अपने दृष्टिकोण, चिन्तन, व्यवहार को कलात्मक बनायें। व्यवस्था का प्रत्येक क्रिया-कलाप में समावेश करें। सौंदर्यवान अपने प्रत्येक संबद्ध पदार्थ को स्वच्छ बनाये। अपने वचन और व्यवहार जीवन जिया जा सकता है। कलाकारिता का यह अति महत्वपूर्ण क्षेत्र हर किसी के सामने खुला पड़ा है-इस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए हममें से कोई भी सर्वोत्कृष्ट कलाकारिता की उपलब्धि का रसास्वादन कर सकता है।

जो करना है उसके गुण, दोषों पर-भली बुरी सम्भावनाओं पर हजार बार विचार करना चाहिए। उजेले ओर अँधेरे पक्षों की गम्भीरतापूर्वक विवेचना करनी चाहिए। इसमें थोड़ी देर लगती हो तो हर्ज नहीं। आवेशग्रस्त उतावली, मनःस्थिति में बढ़े-चढ़े निर्णय कर डालना और फिर प्रस्तुत कठिनाइयों को देखकर निराश हो बैठना बचकाना तरीका है। इससे अपनी हिम्मत टूटती है और जग हँसाई होती है। एक पक्षीय विचार करने की दुर्बलता ही अक्सर ऐसे कदम उठा देती है जो वर्तमान परिस्थितियोँ में नहीं उठाये जाने चाहिए थे। 

जो करना है उसके गुण, दोषों पर-भली बुरी सम्भावनाओं पर हजार बार विचार करना चाहिए। उजेले ओर अँधेरे पक्षों की गम्भीरतापूर्वक विवेचना करनी चाहिए। इसमें थोड़ी देर लगती हो तो हर्ज नहीं। आवेशग्रस्त उतावली, मनःस्थिति में बढ़े-चढ़े निर्णय कर डालना और फिर प्रस्तुत कठिनाइयों को देखकर निराश हो बैठना बचकाना तरीका है। इससे अपनी हिम्मत टूटती है और जग हँसाई होती है। एक पक्षीय विचार करने की दुर्बलता ही अक्सर ऐसे कदम उठा देती है जो वर्तमान परिस्थितियोँ में नहीं उठाये जाने चाहिए थे। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 3)

यह संसार एक कर्म भूमि है, व्यायामशाला है, विद्यालय है जिसमें प्रविष्ट होकर प्राणी अपनी आन्तरिक प्रतिभा को विकसित करता है और यह विकास ही अन्ततः आत्म कल्याण के रूप में परिणत हो जाता है। यह दुनियाँ भव बन्धन भी है, माया पाश भी है, नरक भी है, पर है उन्हीं के लिए जिनकी मनोभूमि अस्त-व्यस्त है जिनको जिन्दगी जीने की कला का ज्ञान नहीं है। सब के लिए यह दुनियाँ कुरूप नहीं है। दर्पण की तरह यह केवल उन्हें ही कुरूप दिखाई देती है जिनका अपना चेहरा बिगड़ा हुआ है।

महात्मा इमर्सन कहा करते थे, “मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” वे जानते थे कि दुनियाँ में चाहे कितनी ही बुराई और कमी क्यों न हो यदि मनुष्य स्वयं अपने आपको सुसंस्कृत बना ले तो उन बुराइयों की प्रतिक्रिया से बच सकता है। मोटर की कमानी-स्प्रिंग-बढ़िया हो तो सड़क के खड्डे उसको बहुत दचके नहीं देते। कमानी के आधार पर वह उन खड्डों की प्रतिक्रिया को पचा जाता है। सज्जनता में भी ऐसी ही विशेषता है, वह दुर्जनों को नंगे रूप में प्रकट होने का अवसर बहुत कम ही आने देती है। गीली लकड़ी को एक छोटा अंगारा जला नहीं पाता वरन् बुझ जाता है, दुष्टता भी सज्जनता के सामने जाकर हार जाती है।

फिर सज्जनता में एक दूसरा गुण भी तो है कि कोई परेशानी आ ही जाय तो उसे बिना सन्तुलन खोये, एक तुच्छ सी बात मानकर हँसते खेलते सहन कर लिया जाता है। इन विशेषताओं से जिसने अपने आपको अलंकृत कर लिया है उसका यह दावा करना उचित ही है कि “मुझे नरक में भेज दो मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” सज्जनता अपने प्रभाव से दुर्जनों पर भी सज्जनता की छाप छोड़ती ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 6

बुधवार, 16 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 16 Aug 2023

मृत्यु का भय उन्हें ही भयभीत करता है जिन्होंने मरणोत्तर जीवन के लिये सुखद स्थिति प्राप्त करने की कोई पूर्व तैयारी नहीं की है। अनिश्चित अन्धकार में प्रवेश करना ही भयानकता की आशंका बनकर मनुष्य को डराता है। विशेषतया यह डर तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब अगले दिनों अधिक गहरी विपत्ति सामने प्रस्तुत होने की आशंका रहती हो। जिनने संकीर्ण स्वार्थपरता और अनैतिकता का आशय लेकर जिन्दगी के दिन काटे हैं उनकी अन्तरात्मा को अदृश्य चेतना आगाह करती रहती है कि इन आज की दुष्प्रवृत्तियों का परिणाम कल भयानक विपत्ति के रूप में ही सामने आ रहा है। यह आगाही ही मृत्यु भय को सघन बनाती है और मरने का नाम सुनते ही कंपकंपी आती है।

मृत्यु के उपरान्त जीव के कर्मों का लेखा-जोखा परमेश्वर के सामने होता है और न्याय-तुला पर तौलकर दण्ड पुरस्कार का विधान बनता है। अपराधी मनःस्थिति यह जानती है सर्वांतर्यामी न्यायाधीश से कुछ छिपा नहीं है वह कर्म और उसके उद्देश्य को भली प्रकार जानता है और बिना किसी पक्षपात अथवा दया-निर्दयता का आशय लिये परिणाम भुगतने के लिए प्राणी को बाध्य करता है।

जिन्होंने सत्कर्म किये हैं और जीवन की विभूतियों का सदुपयोग किया है उन्हें निश्चिंतता रहती है कि अपना भविष्य उज्ज्वल है। ऊँचे पद पर स्थानान्तर होने वाले कर्मचारी खिन्न नहीं प्रसन्न होते हैं वे जानते हैं कि जहाँ जा रहे हैं वहाँ अधिक सम्मान और सुविधा साधन मिलेंगे। ऐसे लोग पुराना स्थान छोड़ते हुए दुखी नहीं प्रसन्न होते हैं। दुख होता भी है तो वह विदाई बिछोह जैसा क्षणिक होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 2)

प्राचीन काल में हमारे पूर्वज मनीषियों ने जीवन लक्ष्य की पूर्ति के महान विज्ञान का आविष्कार करते हुए इस बात पर बहुत जोर दिया था कि व्यक्ति का लौकिक जीवन पूर्ण रीति से सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत हो। आत्म कल्याण का मार्ग यही आरम्भ होता है। यदि मनुष्य अपने सामान्य जीवन क्रम को सन्तोषजनक रीति से चला न सका तो आध्यात्मिक जीवन में भी, परलोक में भी उसको सफलता अनिश्चित ही रहेगी।

इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए चार आश्रम की क्रमबद्ध व्यवस्था की गई थी। आरंभिक जीवन में शक्ति संचय, मध्य जीवन में कुटुम्ब और समाज की प्रयोगशाला में अपने गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार, ढलते जीवन में लोकहित के लिए परमार्थ की तैयारी और अन्त में जब सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं महानता विकसित हो जाय तो उसका लाभ समस्त संसार को देने के लिए विश्व आत्म परम आत्मा, समष्टि जगत् को आत्म समर्पण करना। यही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की प्रक्रिया है।

लौकिक जीवन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिये बिना ही लोग पारलौकिक जीवन की कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहते है। यह तो स्कूल का बहिष्कार करके सीधे एम. ए. की उत्तीर्ण का आग्रह करने जैसी बात हुई। इस प्रकार व्यतिक्रम से ही आज लाखों साधु संन्यासी समाज के लिए भार बने हुए है। वे लक्ष्य की प्राप्ति क्या करेंगे, शान्ति और संतोष तक से वंचित रहते है। इधर की असफलता उन्हें उधर भी असफल ही रखती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.5


मंगलवार, 15 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 15 Aug 2023

जीवन का महत्व समझा जाना चाहिए। भगवान के इस धरोहर का उन्हीं प्रयोजनों में उपयोग करना चाहिए जिसके लिए वह मिली है। जीवात्मा की दूरदर्शिता एवं प्रामाणिकता इस आधार पर परखी गई है कि वह इस अनुदान का कितनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ उपयोग कर सका। परीक्षा में उत्तीर्ण होने वालों की पदोन्नति होती है। जीवन सम्पदा के सदुपयोग की कसौटी पर खरे उतरने वालों को महामानव, सिद्ध पुरुष, ऋषि, जीवन मुक्त देवदूत जैसे उच्च बनने का श्रेय सौभाग्य मिलता है।।

जीवन अनगढ़ रूप में सौंपा गया है। उसे परिष्कृत, सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व मनुष्य का है। उसी के निर्वाह को जीवन साधना कहते हैं। जीवन भी अनगढ़ मिला है। उसके साथ जन्म जन्माँतरों के सुसंस्कार चिपके हैं, इन्हें छुड़ाया जाना आवश्यक है। उठने बैठने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है। सामान्य योग्यता से शरीर यात्रा भर निभती है। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की दो प्रक्रियाएँ अपनाने का नाम जीवन साधना है। आकर्षक आभूषण और महत्वपूर्ण उपकरण बनाने वाली भट्टियों में अनगढ़ को गलाने और उपयोगी ढालने का क्रम चलता है। ऐसा ही आँतरिक कायाकल्प करने का प्रचण्ड पुरुषार्थ मनुष्य को भी करना पड़ता है। इसी को जीवन साधना कहते हैं।

दैवी अनुदान प्राप्त करने के लिए पात्रता प्रामाणिकता, पवित्रता एवं प्रखरता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। नेत्र न हो तो इस प्रासाद, वैभव को देखा कैसे जाय ? कान बहरे हों तो मधुर संगीत एवं परामर्श कैसे सुने जायँ ? खिड़कियां बन्द हों तो घर में सूर्य की रोशनी और हवा की ताजगी को प्रवेश कैसे मिले ? उच्चस्तरीय प्रगति के लिए चिन्तन और चरित्र की, गुण कर्म स्वभाव की, विशिष्टता चाहिये ही यह विभूतियाँ अनायास ही किसी को नहीं मिलतीं इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। जीवन साधना का यही स्वरूप है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 1)

जिन्दगी जीना भी एक महत्वपूर्ण विद्या हैं। इसके अभाव में असंख्य लोग रोते-झींकते मौत के दिन तो पूरे कर लेते है पर वह लाभ प्राप्त नहीं कर पाते जिसके लिए यह बहुमूल्य जीवन उपलब्ध हुआ है।

अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में कीमती मोटर दे दी जाय तो उसकी दुर्गति ही होगी। जिन्दगी एक मोटर है, उसे ठीक प्रकार चलाने के लिए उसका चलाना जानना आवश्यक है। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण कार्य है उन्हें आरम्भ करने से पूर्व तत्सम्बन्धी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। कारखानों में, उद्योगों में, सरकारी नौकरियों में हर जगह ट्रेन्ड आदमियों की ही नियुक्ति होती है। खेद है कि जिन्दगी जीने जैसे महान उत्तरदायित्व को हाथ में लेने वाले उस की ट्रेनिंग आवश्यक नहीं समझते।

हम सब किसी प्रकार जिन्दगी काटते तो है पर उसमें अव्यवस्था ही भरी होती है। कहते है कि बेताल नाम का पिशाच अपने बालों को बुरी तरह बिखेरे रहता है जिससे उसकी भयंकरता और भी बढ़ जाती है। बहुधा हमारा जीवन क्रम भी बेताल के बालों की तरह फूहड़पन के साथ अस्त-व्यस्त तथा बिखरा होता है। फलस्वरूप न जीने वाले को आनन्द आता है और न उससे संबंधित लोगों को कोई प्रसन्नता होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 5


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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...