सोमवार, 19 अप्रैल 2021

👉 हे श्री राम तुम कब आओगे


आज रावण फिर शीश उठाता, सीता का दामन बच न पाता,
हर मन का असुर फिर पाँव बढ़ाता, घड़ा पाप का भरता ही जाता,
पापी का समूल नाश कर, क्या धर्म ध्वजा ना फहराओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

आज धरा फिर अकुलाती है, पाप का बोझ सह ना पाती है,
दंभ, लोभ तो सह भी जाती, पर अधर्म ना सह पाती है,
हे मर्यादा पुरूषोत्तम क्या तुम, धर्म हेतु भी ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

देखो मंथरा की कुटिल चाल से, कैकेयी का प्रेम फिर हारा है,
मां के प्रेम बिना बच्चों को, किसका यहां सहारा है,
बचपन खोने के द्वार खड़ी है, क्या इसे नही बचाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

फिर मित्रता की पड़ी परीक्षा, कौन करेगा पूरी इच्छा,
सच्चा मित्र, हितैषी कैसा हो, कौन देगा फिर इसकी शिक्षा,
क्या केंवट और सुग्रीव की, नैय्या पार ना लगवाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

भाई बन बैठा शत्रु भाई का, खुद का ही वंश मिटाता है,
अपनों से ही छल करता वो, भ्रातृ प्रेम समझ न पाता है,
भरत, लखन की त्याग कथा को, क्या फिर से नही सुनाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मात-पिता की हालत ना पूछो, वृद्धाश्रम में शोभा पाते हैं,
पुत्रों के सक्षम होते ही, मात-पिता बोझ हो जाते हैं,
हे मात-पिता के प्रिय पुत्र तुम, क्या पुत्र धर्म ना बतलाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मानव पतन की गर्त में जा रहा, एक दूजे को न कोई भा रहा,
प्रेम, समर्पण और त्याग की, जैसे कोई लंका जला रहा,
क्या मानव उत्थान के लिए, अब भी तुम ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

- डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 भक्तिगाथा (भाग ७)

पराम्बा के प्रति परमप्रेमरूपा है भक्ति

देवर्षि के शब्दों ने न केवल उनकी बल्कि सभी सप्तऋषियों की स्मृतियों को कुरेद दिया। आखिर वे भी तो पार्वती के प्रेममय स्वरूप के साक्षी थे। महर्षि अंगिरा ने उन पुरानी स्मृतियों के सूत्रों को सुलझाते हुए कहा- ‘‘यह सच है देवर्षि! हम सबमें सबसे पहले आप ने ही उन्हें माँ के रूप में पहचाना था और उनको शिवप्रेम के महातप में तपने की सलाह दी थी और फिर चली थी उनकी कठिन कठोर और दारुण तपश्चर्या। गंगाद्वार (हरिद्वार) का विल्व वन, विल्वकेश्वर मंदिर आज भी उन जगदम्बा के उस महातप का साक्षी है।’’
    
महर्षि अंगिरा के कथन से सहमति व्यक्त करते हुए देवर्षि ने कहा- ‘‘महर्षिगणों! यह सच सभी को, आज के प्रत्येक मानव को समझना होगा कि तप की आग के बिना प्रेम शुद्ध नहीं होता है। जहाँ तप नहीं है वहाँ प्रेम पनप नहीं सकता। वहाँ तो प्रेम के नाम पर वासनाएँ ही नर्तन करती हैं। जिसे प्रेम का अनुभव करना है, प्रेम का स्वाद चखना है उसे तप करना चाहिए। प्रेममयी माँ ने यही किया।’’ ‘‘हाँ, देवर्षि!’’ महामुनि वेदशिरा कहने लगे, ‘‘मैं भी साक्षी था माँ के उस तप का।’’
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गँवाए॥
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किये कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भवउ अपरना॥
    
देवर्षि नारद आगे बोले- ‘‘तप में माँ ऐसी रमीं कि देह की सुध-बुध भूल गयीं। दैहिक कामनाएँ विसर्जित होती गयीं और अन्तर की भक्ति प्रगाढ़ होती गयी। उस समय साक्षात् सघन सौदामिनी की भाँति प्रचण्ड तेजस्विता थी माँ की।’’ नारद के इन स्वरों में साम्य बिठाते हुए महामुनि वेदशिरा बोले- ‘‘देवर्षि! उन्हीं दिनों देवाधिदेव भगवान महादेव ने काम-दहन किया था। उसे देवराज ने उन परमेश्वर की समाधि में व्याघात डालने के लिए भेजा था। बेचारा काम सर्वथा निष्काम परमेश्वर को सकाम करने चला था। शिव के तृतीय नेत्र की ज्वाला में जलकर राख हो गया। उसके बाद सप्तऋषिगण माँ की परीक्षा लेने के लिए गये थे।’’
    
इस प्रसंग के स्मरण से सप्तर्षियों के मन में भावों के कई उतार-चढ़ाव आये। उनमें से एक ने इस प्राचीन कथा के सूत्र को पकड़ते हुए कहा- ‘‘हम सबने माँ पार्वती को जाकर काम-दहन का संवाद सुनाते हुए कहा था कि जब काम ही नहीं बचा तो विवाह का क्या प्रयोजन और तब उन प्रेममयी ने लगभग फटकारते हुए कहा था-
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म बन बानी॥
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥
    
हे ऋषियों! तुम्हारे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव ने अब काम को जलाया है। अभी तक तो सकाम ही थे। पर मेरे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव सदा से ही योगी हैं। यदि मैंने ऐसे शिव की मन, कर्म, वाणी से भक्ति की  है तो हे मुनिश्वरों! करुणामय भगवान हमारा प्रण अवश्य पूर्ण करेंगे।

महर्षि वेदशिरा सप्त ऋषियों के कथन को आगे बढ़ाते हुए बोले- ‘‘यही हुआ। माँ का प्रण पूरा हुआ। क्योंकि उनकी भक्ति प्रेममयी थी। जिसे उन्होंने तप के साँचे में ढाला था। जिसमें किसी भी कामना की कालिख नहीं थी। जो सभी साँसारिक भावों के भद्देपन से अछूती थी। इस भक्ति के प्रभाव से माँ का अंतस् भगवान शिव से एकाकार हुआ था।’’

ऋषि के इस प्रसंग का सब भावभरा स्मरण कर ही रहे थे कि हिमालय के उस दिव्य परिसर में एक अलौकिक आध्यात्मिक छटा छा गयी। सभी ने सिर उठा कर देखा, यह माँ जगदम्बा का प्राकट्य हुआ। अष्टभुजा भवानी, माँ सिंहवाहिनी की ज्योतिर्मयी छवि हिमालय के आकाश में प्रकाशित हो रही थी। सभी के मुख से स्वतः ही उच्चारित हो उठा-
या देवि सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै! नमस्तस्यै!! नमस्तस्यै नमो नमः!!!

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७)


👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

दार्शनिक विवेचनाओं से देश, काल का उल्लेख होता रहता है। उसे कोई मुल्क या घण्टा मिनट वाला समय नहीं समझ लेना चाहिये। यह पारिभाषिक शब्द है। वस्तुओं की लम्बाई चौड़ाई मोटाई को ‘देश’ कहा जाता है और उनके परिवर्तन को ‘काल’। आमतौर से वस्तुएं देश की अर्थात् लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई के आधार पर ही देखी जाती है जब कि उनकी व्याख्या विवेचना करते हुये काल का चौथा ‘आयाम’ भी सम्मिलित किया जाना चाहिये। किन्तु गतियां और दिशाएं अनिश्चित भी हैं और भ्रामक भी। काल तो उन्हीं पर आश्रित है यदि आधार ही गड़बड़ा रहा है तो काल का परिमाण कैसे निश्चित हो। अस्तु वस्तुओं को तीन आयाम की अपेक्षा चार आयाम वाली भी कहा जाय तो भी बात बनेगी नहीं। वस्तुएं क्या हैं? उनका रूप, गुण, कर्म स्वभाव क्या है? यह कहते नहीं बनता क्योंकि उनके परमाणु जिस द्रुतगति से भ्रमण शील रहते हैं उस अस्थिरता को देखते हुये एक क्षण की गई व्याख्या दूसरे ही क्षण परिवर्तित हो जायगी।

कौन बड़ा कौन छोटा इसका निश्चय भी निःसंकोच नहीं किया जा सकता है। पांच फुट की लकड़ी छह फुट वाली की तुलना में छोटी है और चार फुट वाली की तुलना में बड़ी। एक फुट मोटाई वाले तने की तुलना में दो फुट वाला मोटा ‘अधिक’ है और दो फुट वाले की तुलना में एक फुट वाला पतला। वह वस्तुतः मोटा है या पतला ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता। तुलना बदलते ही यह छोटा और बड़ा होता—पतला और मोटा होता सहज ही बदल जायेगा।

कौन धनी है और कौन निर्धन, कौन सुखी है कौन दुःखी, कौन सन्त है, कौन ज्ञानी है कौन अज्ञानी, कौन सदाचारी है कौन दुराचारी, इसका निर्णय अनायास ही कर सकना असम्भव है। इस प्रकार का निर्धारण करने से पूर्व यह देखना होगा कि किस की तुलना में निर्णय किया जाय। नितान्त निर्धन की तुलना में वह धनी है जिसके पास पेट भरने के साधन हैं। किन्तु लक्षाधीश की तुलना में वह निर्धन ही है। जिसे दस कष्ट हैं उसकी तुलना में तीन कष्ट वाला सुखी है, पर एक कष्ट वाले की तुलना में वह भी दुःखी है। वस्तुतः कौन सुखी और कौन दुःखी हैं यह नहीं कहा जा सकता। डाकू की तुलना में चोर सहृदय है किन्तु उठाईगीरे की तुलना में वह भी अधिक दुष्ट है। एक सामान्य नागरिक की तुलना में उठाईगीरा भी दुष्ट है, जबकि वह सामान्य नागरिक भी सन्त की तुलना में पिछड़ा हुआ और गया-गुजरा है। सन्त भी किसी महा सन्त आत्मत्यागी शहीद की तुलना में हलका बैठेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६)

पराम्बा के प्रति परमप्रेमरूपा है भक्ति
    
‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’- चौबीस अक्षरों वाले इस गायत्री महामंत्र के समवेत उच्चारण से हिमालय का कण-कण गूँज उठा। सप्त ऋषियों सहित सभी महर्षियों एवं देवशक्तियों ने सन्ध्या वन्दन के पश्चात भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य अर्पित किया। अद्भुत छटा हो रही थी हिमशिखरों में उदित हो रहे सूर्य की। पहले अरुण आभा उदित होकर फैली और फिर भगवान सविता देव हिमाद्रि तुंग शृंगों से प्रकट हुए। सभी ने हाथ जोड़कर उनकी अभ्यर्थना करते हुए सिर नवाया। भगवान अंशुमाली ने भी अपनी सहस्र किरणों से सभी पर अपनी कृपादृष्टि की। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से सभी रोमांचित हो उठे। प्रत्येक के अन्तस् में आह्लाद की हिलोर उठी और भक्ति की पुलकन से सात्विक रोमांच हो आया।
    
सभी की दृष्टि, भक्ति के परमाचार्य देवर्षि की ओर उठी। परम भागवत देवर्षि नारद निर्निमेष भाव से हिमशिखरों को निहारे जा रहे थे। उनके हृदय की प्रगाढ़ भावनाएँ आँखों में अश्रुबूँदों के रूप में चमक रही थीं। इस भावविह्वलता ने उनकी वाणी को जड़ीभूत कर दिया था। ब्रह्मर्षि वामदेव ने उन्हें टोका- ‘‘किस चिंतन ने आज आपको विह्वल कर दिया है-देवर्षि?’’ वामदेव के इस प्रश्न से देवर्षि की अंतर्मुखी चेतना बाह्य जगत् की ओर मुड़ी। शनैः-शनैः वह प्रकृतिस्थ हुए। उनके होठों पर हल्का स्मित झलका एवं मुखमण्डल पर भक्ति की सात्विक आभा छलकने लगी। उन्होंने सभी महर्षियों की ओर मुड़ते हुए कहा- ‘‘आज राजा हिमवान् के आँगन में युगों पुरानी स्मृतियाँ ताजी हो आयीं। बस माँ की याद हो आयी।’’
    
‘‘हाँ, देवर्षि!’’- महर्षि वशिष्ठ एवं अंगिरा लगभग एक साथ बोले- ‘‘आपकी पिछले जन्मों की माता ने ही तो आपको भक्ति की जन्मघुट्टी पिलायी थी, उन्हीं की प्रकाश किरण का अनुदान पाकर आज आप स्व-प्रकाशित हो रहे हैं।’’ ‘‘सो तो है महर्षिगण! भला उनकी कोख के संस्कारों को कैसे भुलाया जा सकता है। पर आज मेरी स्मृति व चिंतन का केन्द्र वे ममतामयी नहीं, बल्कि अहैतुक कृपामयी पराम्बा भगवती हैं, जो जन-जन की, सृष्टि के कण-कण की, हम सबकी, तिर्यक योनि वाले निम्न प्राणियों से लेकर देवों एवं महर्षियों की माँ हैं। जिनके एक अंश को धारण कर जननी माँ बनती है, जिनके परम प्रेम को  अनुभव कर जीव कृतार्थ एवं कृत्कृत्य हो जाता है।’’

‘‘उन्हीं के परम प्रेम की अनुभूति करते हुए मैंने भक्तिदर्शन का दूसरा सूत्र कहा है-
‘सा त्वस्मिन् परम प्रेम रूपा’॥ २॥
उनके प्रति परम प्रेमरूपा है-भक्ति।

हृदय में आदिशक्ति माँ जगदम्बा का स्मरण करते हुए देवर्षि का कण्ठ रूँध आया था। उन्होंने बड़ी श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़े और ‘‘माँ! माँ!! परम प्रेममयी माँ!!!’’ कहकर सब ओर माथा नवाते हुए प्रणाम किया और भावविह्वल स्वर में बोले- ‘‘धन्य है देवात्मा हिमालय, जिन्हें जगदम्बा ने अपने पिता होने का गौरव दिया। धन्य है इनके राज्य में रहने वाले लोग जो उनके भाई-बहिन बने।’’ भावों का तीव्र वेग बह रहा था और देवर्षि नारद कह रहे थे- ‘‘माता सती ने जब दक्ष यज्ञ में स्वयं की देह विसर्जित की थी, तब से सभी के मन में जिज्ञासा थी कि वे लीलामयी कब, कहाँ, किस रूप में अवतरित होंगी। और वे प्रेममयी आयीं, पर्वतकन्या पार्वती बनकर।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

चन्द्रमा हमसे ऊंचा है पर यदि चन्द्रतल पर जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पृथ्वी ऊपर आकाश में उदय होती है। सौर मण्डल से बाहर निकल कर कहीं आकाश में हम जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ऊपर नीचे जैसे कोई दिशा नहीं है। दिशाज्ञान सर्वथा अपेक्षाकृत है। दिल्ली, लखनऊ से पश्चिम में बम्बई से पूर्व में, मद्रास से उत्तर में और हरिद्वार से दक्षिण में है। दिल्ली किस दिशा में है यह कहना किसी की तुलना अपेक्षा से ही सम्भव हो सकता है वस्तुतः वह दिशा विहीन है।

समय की इकाई लोक व्यवहार में एक तथ्य है। घण्टा मिनट के सहारे ही दफ्तरों का खुलना बन्द होना रेलगाड़ियों का चलना रुकना—सम्भव होता है। अपनी सारी दिनचर्या समय के आधार पर ही बनती है। पर समय की मान्यता भी असंदिग्ध नहीं है। सूर्योदय या सूर्यास्त का समय वही नहीं होता जो हम देखते या जानते हैं। जब हमें सूर्य उदय होते दीखता है उससे प्रायः 8।। मिनट पहले ही उग चुका होता है। उसकी किरणें पृथ्वी तक आने में इतना समय लग जाता है। अस्त होता जब दीखता है, उससे 8।। मिनट पूर्व ही वह डूब चुका होता है। आकाश में कितने ही तारे ऐसे हैं जो हजारों वर्ष पूर्व अस्त हो चुके पर वे अभी तक हमें चमकते दीखते हैं। यह भ्रम इसलिये रहता है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। जब वे वस्तुतः अस्त हुये हैं उसकी जानकारी अब कहीं इतनी लम्बी अवधि के पश्चात हमें मिल रही है। सौर मण्डल के अपने ग्रहों के बारे में भी यही बात है, वे पंचांगों में लिखे समय से बहुत पहले या बाद में उदय तथा अस्त होते हैं।

जो तारा हमें सीध में दीखता है आवश्यक नहीं कि वह उसी स्थिति में है। प्रकाश की गति सर्वथा सीधी नहीं है। प्रकाश भी एक पदार्थ है और उसकी भी तोल है। एक मिनट में एक वर्ग मील जमीन पर सूर्य का जितना प्रकाश गिरता है उसका वजन प्रायः एक ओंस होता है। पदार्थ पर आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। तारों का प्रकाश सौर मण्डल में प्रवेश करता है तो सूर्य तथा अन्य ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से लड़खड़ाता हुआ टेढ़ा तिरछा होकर पृथ्वी तक पहुंचता है। पर हमारी आंखें उसे सीधी धारा में आता हुआ ही अनुभव करती हैं। हो सकता है कि कोई तारा सूर्य या किसी अन्य ग्रह की ओट में छिपा बैठा हो पर उसका प्रकाश हमें आंखों की सीध में दीख रहा हो। इसी प्रकार ठीक सिर के ऊपर चमकने वाला तार वस्तुतः उस स्थान से बहुत नीचा या तिरछा भी हो सकता है। इस प्रकाश दिशा ही नहीं समय सम्बन्धी मान्यताएं भी निर्भ्रान्त नहीं हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५)

वासनाओं के भावनाओं में रूपांतरण की कथा

महर्षि पुलह एवं क्रतु के इस कथन ने देवर्षि को किन्हीं स्मृतियों से भिगो दिया। उनकी आँखें छलक उठीं। वे विह्वल स्वर में बोले- ‘‘हे महर्षिजन! मुझे आप सबका आदेश शिरोधार्य है। मैं अब भक्ति की व्याख्या करूँगा-
    ‘अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः’॥ १॥

‘‘अब भक्ति की व्याख्या यही मेरे द्वारा रचित भक्ति दर्शन का पहला सूत्र है। मैंने इस क्रम में ८४ सूत्र रचे हैं। इन ८४ सूत्रों में ८४ लाख योनियों की भटकन से उबरने का उपाय है। भक्ति की इस अमृतधारा से अखण्ड ज्योति को प्रकाशित करने से मानव जीवन प्रकाशित होगा। आज परम पवित्र घड़ी है। हिमालय के इस आँगन में भक्ति के नवस्रोत का उद्गम हो, इसी में हमारे तप एवं ज्ञान की सार्थकता है।’’
    
देवर्षि के इस कथन से महर्षियों को अपना यह मिलन सार्थक लगने लगा। उन्हें अनुभव हुआ कि देवर्षि के ये वचन मनुष्य को उसकी भटकन से अवश्य बचायेंगे। सभी महर्षियों की इन मानसिक तरंगों को अनुभव करते हुए परम भागवत नारद ने कहा- ‘‘हे महर्षिजन! आज मैं अपनी अनुभवकथा कहता हूँ कि मैंने अपनी वासनाओं को भावनाओं में कैसे बदला। मेरी यह अनुभवगाथा ही भक्ति के इस प्रथम सूत्र की व्याख्या है।’’ देवर्षि नारद के इस कथन ने सब की उत्सुकता जाग्रत कर दी। कथाश्रवण की लालसा में सभी के मन निस्पन्द हो गये और साथ ही भक्ति की अमृत गंगा बहने लगी।
    
देवर्षि कह रहे थे, ‘‘हे ऋषिगण! पूर्वकल्प में मैं उपबर्हण नाम का गंधर्व था। मेरा शरीर जितना सुन्दर था, अंतस् उतना ही कुरूप। वासनाओं को ही भावना समझता था। प्रेम का अर्थ मेरे लिए कामुकता के सिवा और कुछ भी न था। अनेकों स्त्रियों से मेरे वासनात्मक सम्बन्ध थे। शृंगार एवं वासना भरी चेष्टाओं में मेरा जीवन बीत रहा था। इस क्रम में मेरी उन्मुत्तता यहाँ तक थी कि कथा-कीर्तन के अवसर पर भी मैं वासनाओं में मग्न रहता था। एक अवसर पर तो मैंने ब्रह्मा जी की उपस्थिति में भी भगवान के कीर्तन के समय जब अपनी वासना भरी चेष्टाएँ जारी रखी तो उन्होंने मुझे शाप दिया, जा तू शूद्र हो जा।
    
यह ब्रह्मकोप ही मेरे लिए कृपा बन गया। मैंने दासी माता की कोख से जन्म लिया। मेरी माँ दासी होते हुए भी सदाचारी, संयमी एवं भगवान की सच्ची भक्त थी। संतों एवं भक्तों की सेवा में उसका जीवन व्यतीत होता था। माँ के साथ साधुसंग के अवसर मुझे भी मिले। साधु सेवा एवं सत्संगति ने मुझे साधना सिखाई, और प्रारम्भ  हो गयी मेरे रूपान्तरण की प्रक्रिया। अपनी वासना भरी चाहतों पर मुझ ग्लानि होने लगी। साधु सेवा से जब भी मुझे विश्राम मिलता, मैं पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करने लगता। पास के सरोवर के जल का पान और पीपल के नीचे ध्यान। यही मेरी दिनचर्या बन गयी।
    
इसी बीच मेरी माँ चल बसीं। शरीर छोड़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा- ‘‘पुत्र! भक्ति को ही अपनी माँ समझना। माँ के इन प्रेमपूर्ण वचनों ने मुझे भक्ति से भिगो दिया। जैसे-जैसे निर्मल होता गया-प्रभु की झाँकी मिलने लगी। परन्तु पूर्ण निर्मलता के अभाव में उस समय मुझे भगवान का साक्षात्कार न हो सका। परन्तु अगले कल्प में ब्रह्माजी के मन से फिर मेरा प्राकट्य हुआ। भक्ति के प्रभाव से रूपान्तरित हो गया मेरा जीवन। लीलामय प्रभु ने मुझे अपना पार्षद बना लिया। भक्ति ने मुझे भगवान का सान्निध्य एवं प्रेम का वरदान दिया। इस प्रेममय भक्ति की व्याख्या अगले सूत्र में कहेंगे।’’ ऐसा बोलकर नारद जी मौन हो गये। आकाश में अब अरुणोदय होने लगा था। महर्षियों के समुदाय ने भी इस अमृतवेला में नित्य कर्मों के साथ संध्या वन्दन का निश्चय किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

स्थान की भांति गति की मात्रा भी भ्रामक है। दो रेलगाड़ियां समान पटरियों पर साथ-साथ दौड़ रही हों तो वे साथ-साथ हिलती-जुलती भर दिखाई पड़ेंगी दो मोटरें आमने सामने से आ रही हों और दोनों चालीस चालीस मील प्रति घण्टे की चाल से चल रही हों तो जब वे बराबर से गुजरेगी तो 80 मील की चाल का आभास होगा। जब कभी आमने सामने से आती हुई रेल गाड़ियां बराबर से गुजरती हैं तो दूना वेग मालूम पड़ता है, यद्यपि ये दोनों ही अपनी अपनी साधारण चाल से चल रही होती हैं। अपनी पृथ्वी जिस दिशा में जिस चाल से चल रही है वही गति और दिशा अन्य ग्रह नक्षत्रों की रही होती तो आकाश पूर्णतया स्थिर दीखता। सूर्य तारे कभी न उगते न चलते न डूबते। जो जहां हैं वहीं सदा बना रहता। तब पूर्ण स्थिरता की अनुभूति होते हुये भी सब की गतिशीलता यथावत् बनी रहती।

गति सापेक्ष है। अन्तर कितनी ही तरह निकाला जा सकता है। सौ में से नब्बे निकालने पर दस बचते हैं। तीस में से बीस निकालने पर भी—पचास में से चालीस निकालने पर भी दस ही बचेंगे। अन्तर एक ही निकले इसके लिये अनेकों अंकों का अनेक प्रकार से उपयोग हो सकता है। इतनी भिन्नता रहने पर भी परिणाम में अन्तर न पड़ेगा। एक हजार का जोड़ निकालना हो तो कितने ही अंकों का कितनी ही प्रकार से वही जोड़ बन सकता है। गति मापने के बारे में भी यही बात है। भूतकाल के खगोल वेत्ता सूर्य को स्थिर मान कर यह गणित करते हैं। चन्द्र-ग्रहण, सूर्य ग्रहण सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों का उदय-अस्त दिन मान, रात्रि मान आदि इसी आधार पर निकाला जाता रहा है। फिर भी वह बिलकुल सही बैठता रहा है। यद्यपि सूर्य को स्थिर मानकर चलने की मान्यता सर्वथा मिथ्या है। मिथ्या आधार भी जब सत्य परिणाम प्रस्तुतः करते हैं तो फिर सत्य असत्य का भेद किस प्रकार किया जाय, यह सोचने पर बुद्धि थककर बैठ जाती है।

दिशा का निर्धारण भी लोक व्यवहार में आवश्यक है। इसके बिना भूगोल नक्शा, यातायात की कोई व्यवस्था ही न बनेगी। रेखा गणित में आड़ी, सीधी, तिरछी रेखाओं को ही आधार माना गया है। दिशा ज्ञान के बिना वायुयान और जलयानों के लिये निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकना ही सम्भव न होगा। पूर्व, पश्चिम आदि आठ और दो ऊपर नीचे की दशों दिशाएं लोक व्यवहार की दृष्टि से महत्वपूर्ण आधार हैं, पर ‘नितान्त सत्य’ का आश्रय लेने पर यह दिशा मान्यता भी लड़खड़ा कर भूमिसात् हो जाती है।

एक लम्बी नाली लगातार खोदते चले जायें तो प्रतीत होगा कि वह सीधी समतल जा रही है, पर वस्तुतः यह गोलाई में ही खुद रही है और वह क्रम चलता रहने पर खुदाई उसी स्थान पर आ पहुंचेगी जहां से वह आरम्भ हुई थी। रबड़ की गेंद पर बिलकुल सीधी रेखा खींचने पर भी वस्तुतः वह गोलाई में ही खिंच रही है, सीधी रेखा खींचने का मतलब उसके दोनों सिरों का अन्तर सदा बना रहना ही होना चाहिये, पर जब वे अन्ततः एक में आ मिलें तो फिर सीधी लकीर कहां हुई? कागज पर जमीन पर, या कहीं भी छोटी बड़ी सीधी लकीर खींची जाय वह कभी भी सीधी नहीं हो सकती। स्वल्प गोलाई अपने नाप साधनों से भले ही पकड़ में न आये, पर वस्तुतः वह गोल ही बन रही होगी। जिस भूमि को हम समतल समझते हैं वस्तुतः वह भी गोल है। समुद्र समतल दीखता है, पर उस पर चलने वाले जहाजों का मस्तूल ही पहले दीखता है इससे प्रतीत होता है कि पानी समतल प्रतीत होते हुये भी पृथ्वी के अनुपात में गोलाई लिये हुये है। जमीन पर खड़े होकर जमीन और आसमान मिलने वाला क्षितिज प्रायः 3 मील पर दिखाई पड़ता है पर यदि दो सौ फुट ऊंचाई पर चढ़ कर देखें तो वह बीस मील दूरी पर मिलता दिखाई देगा। यह बातें पृथ्वी की गोलाई सिद्ध करती हैं। फिर भी मोटी बुद्धि से उसे गोल देख पाने का कोई प्रत्यक्ष साधन अपने पास नहीं हैं। वह समतल या ऊंची नीची दीखती है गोल नहीं। ऐसी दशा में हमारा दिशाज्ञान भी अविश्वस्त ही ठहरता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

👉 डॉ.भीम राव आंबेडकर


संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
दीन, दुःखी, दलितों, पतितों को, समता का अधिकार दिया।
जय भीम राव की जय हो, जय बाबासाब की जय हो।
जय आंबेडकर की जय हो, जय बाबासाब की जय हो।।
 
बचपन  से  ही थे तेजस्वी, कार्य  तुम्हारे परम ओजस्वी।
प्रतिभा के तो धनी रहे तुम,प्रखर विचारक,महामनस्वी।।
सभ्य समाज  के  सभ्य  मनुज हों, समदर्शी संसार दिया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
छुआ - छूत और उंच - नीच से, जीवन भर एतराज जताया।
भूख और भय से मुक्त राष्ट्र कर,अछूतों को भी ताज दिलाया।।
सुदृढ़  संविधान  बनाया  जो,  हर वासी  ने  स्वीकार किया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
सामाजिक  दुर्भाव  हटाने, बृहद  अभियान  चलाया  था ।
दलितों  के  उत्थान  के  लिए,  पूरा  जन्म  लगाया  था।।
ज्ञान,शील,स्वाभिमान जगाकर, पतितों का उद्धार किया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
भारत  के  तुम  अमूल्य  रत्न  हो, कानून के निर्माता हो।
सत्य,अहिंसा,न्याय,प्रेम से,  सबके  भाग्य  विधाता  हो।।
न्याय सभी के लिए बराबर, यह सबको  अधिकार दिया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।

-उमेश यादव

👉 भक्तिगाथा (भाग ४)

वासनाओं के भावनाओं में रूपांतरण की कथा

आह्वान के स्वरों की गूँज हिमशिखरों में संव्याप्त होती हुई परा प्रकृति की सूक्ष्मता को स्पन्दित करने लगी। ये स्पन्दन क्रमिक रूप से तीव्र होते गये और फिर सहसा निरभ्र आकाश में एक नया चन्द्रोदय हुआ। इस चन्द्रमा का प्रकाश, आभा, सौन्दर्य स्वयं में सम्पूर्ण था। आकाश में दो चन्द्रमाओं की उपस्थिति ने एक बारगी सभी को अचरज में डाल दिया। परन्तु दूसरे ही क्षण ऋषि मण्डल ने आश्वस्ति की साँस ली। उन्होंने देखा कि यह नवोदित चन्द्रमा शनैः-शनैः हिमालय की उस दिव्य घाटी में अवतरित हो रहा था। उसके प्रकाश ने हिमालय के कण-कण को आच्छादित और आह्लादित कर दिया। वहाँ उपस्थित देवों एवं महर्षियों के अंतस् में भी पुलकन की पूर्णिमा चमक उठी।
    
उन्होंने अनुभव कर लिया था कि यह नवोदित चन्द्रोदय और कुछ नहीं स्वयं देवर्षि नारद का आगमन है। उनके इस हिमधरा पार आगमन के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण प्रभुनाम से सम्पूरित सामगान के स्वरों से गूँज उठा। बड़ी मधुर और अलौकिक थी यह स्वर लहरी। इसकी यथार्थ अनुभूति तो वही कर सकते हैं, जो वहाँ स्वयं प्रत्यक्ष अथवा सूक्ष्म शरीर से उपस्थित थे। परन्तु जिन्हें अपनी भावनाओं में भी इसका अहसास हो सका वे भी देवर्षि का कृपाप्रसाद पाये बिना नहीं रह सके। देवर्षि की इस उपस्थिति का आभास पाते ही समूचा ऋषि मण्डल उनकी अभ्यर्थना के लिए खड़ा हो गया। उस दिव्य घाटी में पुनः एक बार फिर सुमधुर अनुगूँज उठी-
     अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्ति शाङ्र्गध्रन्वतः।
     गायन्माद्यन्निदं तन्भया रमयत्यातुरं जगत्॥
‘अहो! देवर्षि नारद आप धन्य हैं, जो वीणा बजाते, हरिगुण गाते और आनन्दित होते हुए इस दुःखी संसार को आनन्दित करते रहते हैं।’
    
पीत वस्त्र पहने, हाथों में वीणा थामे देवर्षि का यह स्वरूप बड़ा मनोहर था। उन्होंने ऋषियों की अभ्यर्थना का उत्तर एक पवित्र मुस्कान के साथ दिया। ‘‘आज आप सब महर्षियों ने मुझे क्यों स्मरण किया’’- देवर्षि के इन स्वरों में बड़ा सुमधुर आध्यात्मिक संगीत था। इसका उत्तर वेदव्यास ने दिया- ‘‘हे देवर्षि! आपने सदा ही मानव एवं मानवता का मार्गदर्शन किया है। जब भी कोई कहीं भटका, आपने उसे राह दिखाई। मनुष्य की भावनात्मक भटकन आपने ही दूर की है। आपके संसर्ग एवं संस्पर्श से कितने ही भटके हुए मनुष्य महर्षि बने हैं। आज कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि समूचा समुदाय ही भटक गया है।’’
    
‘‘महर्षि व्यास का कथन सर्वथा उचित है देवर्षि’’, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपनी बात कहना प्रारम्भ की। उनकी वाणी में स्वाभाविक प्रखरता थी। वह कह रहे थे कि ‘‘आज भावनाओं की सार्थकता ही खो गयी है। त्याग एवं तप के स्थान पर स्वार्थ एवं वासना इसका पर्याय बन गये हैं। प्रेम के ढाई अक्षरों की पवित्रता आज लुप्त है। यह तो बस दैहिक वासनाओं की तृप्ति का पर्याय है। वासनाओं में डूबे हुए लोग स्वयं को प्रेम पुजारी मानते हैं। कथाएँ प्यार की कही जाती हैं-कर्म नफरत भरे किये जाते हैं। भावनाओं में घुली वासनाओं की इस कालिख ने लगभग सभी की अंतर्चेतना को ग्रंथियों से भर दिया है। सभी अर्थ खो गये हैं, बस अनर्थ ही अनर्थ है।’’
    
‘‘भगवती गायत्री कल्याण करेंगी ब्रह्मर्षि! जगन्माता अपनी संतानों को सम्हालेंगी अवश्य। हाँ! यह सच है कि अभी स्थिति विकट है।’’ देवर्षि ने ब्रह्मर्षि को उत्तर देने के साथ ही सभी को समझाते हुए कहा- ‘‘भक्ति के बिना वासनाओं का भावनाओं में परिवर्तन सम्भव नहीं। माँ गायत्री भी भक्ति का अर्घ्य चढ़ाने पर ही वरदायी होती हैं। गायत्री के चौबीस अक्षरों में समायी चौबीस महाशक्तियाँ भक्ति से ही जाग्रत होती हैं।’’ देवर्षि के इस कथन पर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपनी सहमति प्रदान की। महर्षि पुलह एवं क्रतु ने भी उनका अनुमोदन करते हुए कहा- ‘‘देवर्षि आप भक्ति तत्त्व की व्याख्या करें। इस तत्त्व का मर्मज्ञ भला आपसे अधिक और कौन हो सकता है। जिस तरह से ब्रह्मर्षि विश्वामित्र गायत्री महाविद्या के आचार्य हैं, ठीक उसी भाँति आप भक्ति के आचार्य हैं। मानव कल्याण के लिए आज दोनों का सुखमय संयोग आवश्यक है।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४)

👉 मान्यताओं पर निर्भर निष्कर्ष

हमारा बुद्धि संस्थान केवल अपेक्षाकृत स्तर की जानकारियां दे सकने में ही समर्थ हैं। इतने से ही यदि सन्तोष होता हो तो यह कहा जा सकता है कि हम जो जानते या मानते हैं वह सत्य है। किन्तु अपनी मान्यताओं को ही यदि नितान्त सत्य की कसौटी पर कसने लगें तो प्रतीत होगा कि यह बुद्धि संस्थान ही बेतरह भ्रम ग्रसित हो रहा है फिर उसके सहारे नितान्त सत्य को कैसे प्राप्त किया जाय? यह एक ऐसा विकट प्रश्न है जो सुलझाये नहीं सुलझता।

वजन जिसके आधार पर वस्तुओं का विनिमय चल रहा है एक मान्यता प्राप्त तथ्य है। वजन के बिना व्यापार नहीं चल सकता। पर वजन सम्बन्धी हमारी मान्यताएं क्या सर्वथा सत्य हैं? इस पर विचार करते हैं तो पैरों तले से जमीन खिसकने लगती है। वजन का अपना कोई अस्तित्व नहीं। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का जितना प्रभाव जिस वस्तु पर पड़ रहा है उसे रोकने के लिए जितनी शक्ति लगानी पड़ेगी वही उसका वजन होता। तराजू बाटों के आधार पर हमें इसी बात का पता चलता है और उसी जानकारी को वजन मानते हैं, पर यह वजन तो घटता-बढ़ता रहता है। पृथ्वी पर जो वस्तु एक मन भारी है वह साड़े तीन मील ऊपर आकाश में उठ जाने पर आधी अर्थात् बीस सेर रह जायगी। इससे ऊपर उठने पर वह और हलकी होती चली जायगी। पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच एक जगह ऐसी आती है जहां पहुंचने पर उस वस्तु का वजन कुछ भी नहीं रहेगा। वहां अमर एक विशाल पर्वत भी रख दिया जाय तो वह बिना वजन का होने के कारण जहां का तहां लटका रहेगा। अन्य ग्रहों की गुरुता और आकर्षण शक्ति भिन्न है वहां पहुंचने पर अपनी पृथ्वी का भार माप सर्वथा अमान्य ठहराया जाय। ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि वजन सापेक्ष है। किसी पूर्वमान्यता, स्थिति या तुलना के आधार पर ही उसका निर्धारण हो सकता है।

लोक व्यवहार की दूसरी इकाई है ‘गति’। वजन की तरह ही उसका भी महत्व है। गति ज्ञान के आधार पर ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने के विभिन्न साधनों का मूल्यांकन होता है, पर देखना यह है कि ‘गति’ के सम्बन्ध में हमारे निर्धारण नितान्त सत्य की कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं।

हम अपना कुर्सी पर बैठे लिख रहे हैं और जानते हैं कि स्थिर हैं। पर वस्तुतः एक हजार प्रति घण्टा की चाल से हम एक दिशा में उड़ते चले जा रहे हैं। पृथ्वी की यही चाल है। पृथ्वी पर बैठे होने के कारण हम उसी चाल से उड़ने के लिए विवश हैं। यद्यपि यह तथ्य हमारी इन्द्रियजन्य जानकारी की पकड़ में नहीं आता और निरन्तर स्थ्रिता प्रतीत होती है। पैरों से या सवारी से जितना चला जाता है, उसी को गति मानते हैं।

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, इसलिए इस क्षण जहां हैं वहां वापिस 24 घण्टे बाद हो आ सकेंगे। पर यह सोचना भी व्यर्थ है क्योंकि पृथ्वी 666000 मील प्रति घण्टा की चाल से सूर्य की परिक्रमा के लिए दौड़ी जा रही है। वह आकाश में जिस जगह है वहां लौटकर एक वर्ष बाद ही आ सकती है किन्तु यह मानना भी मिथ्या है क्योंकि सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है और पृथ्वी समेत अपने सौर परिवार के समस्त ग्रह उपग्रहों को लेकर और भी तीव्र गति से दौड़ता चला जा रहा है और वह महासूर्य अन्य किसी अति सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। यह सिलसिला न जाने कितनी असंख्य कड़ियों में जुड़ा होगा। अस्तु एक शब्द में यों कह सकते हैं कि जिस जगह आज हम हैं कम से कम इस जन्म में तो वहां फिर कभी लौटकर आ ही नहीं सकते। अपना आकाश छूटा तो सदा सर्वदा के लिए छूटेगा। इतने पर भी समझते यही रहते हैं कि जहां थे उसी क्षेत्र, देश या आकाश के नीचे कहीं जन्म भर बने रहेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

यथार्थता की तह तक पहुंचने के लिए हमें परख के आधार को अधिक विस्तृत करना पड़ेगा। इन्द्रिय जन्य ज्ञान को ही सब कुछ मान बैठना भूल है। जो भौतिक प्रयोगशाला से प्रत्यक्ष हो सके वह सही है ऐसी बात भी तो नहीं है। ऊपर प्रकाश की आंख मिचौनी से रंगों की गलत अनुभूति होने की चर्चा की गई है। सत्य तक पहुंचने के लिए इन्हीं भोंड़े उपकरणों को परिपूर्ण मानकर चलेंगे तो अन्धकार में ही भटकते रहना पड़ेगा। किम्वदन्तियों और दन्तकथाओं के प्रतिपादनों से मुक्ति पाने के प्रयास में यदि इन्द्रिय ज्ञान की भोंडी भूल भुलैओं में भटक पड़े तो केवल पिंजड़ा बदला भर हुआ। स्थिति ज्यों त्यों बनी रही।

कुछ मोटी बातों को छोड़कर शेष सभी विषयों में हम जो कुछ देखते, जानते और अनुभव करते हैं उसके सम्बन्ध में यही मानते हैं कि वही सत्य है। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। अपने पर, अपनी इन्द्रियों और अनुभूतियों पर विश्वास होने के कारण वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में जो समझते हैं, उसे ही सत्य समझते हैं पर गहराई में उतरते हैं तो प्रतीत होता है कि हमारी मान्यतायें और अनुभूतियां हमें नितांत सत्य का बोध कराने में असमर्थ है। वे केवल पूर्ण मान्यताओं की अपेक्षा से ही कुछ अनुभूतियां करती है। यदि पूर्व मान्यतायें बदल जायें तो फिर अपने सारे निष्कर्ष या अनुभव भी बदलने पड़ेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५

👉 भक्तिगाथा (भाग ३)

👉 देवर्षि नारद का आह्वान
    
इस दिव्य घाटी की एक विशिष्ट शिला पर अचानक सात ज्योतिपुञ्जों का अवतरण हुआ। इन्हें देखते ही सभी ने श्रद्धापूर्वक सिर झुकाया। वे ज्योतिपुञ्ज कुछ पलों में ही मानवाकृतियों में बदल गये। वे मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु एवं वशिष्ठ थे। यह वैवस्वत मनवन्तर का सप्तर्षि मण्डल था, जो दृश्य जगत् की अदृश्य व्यवस्था का सूक्ष्म संचालन करता है। इन्हीं के तप, शक्ति एवं ज्ञान के प्रभाव से संसार पोषित होता है। उनके इस कार्य में सभी तपोधन महर्षि एवं देवगण सहयोग करते हैं परन्तु आज यह सप्तर्षि मण्डल चिंतित था। इन महर्षियों के मुख चिंता एवं पीड़ा की रेखाएँ साफ-साफ झलक रही थीं। उनकी इस पीड़ा ने वहाँ की सघन शान्ति को स्पन्दित कर दिया। एक अपूर्व सात्विक उद्वेलन उस दिव्य परिसर में संव्याप्त हो गया। सभी कारण जानना चाहते थे।
    
सबकी चिंता मिश्रित जिज्ञासा को महर्षि वशिष्ठ ने सम्बोधित किया-‘‘धरती की दशा आप सभी को ज्ञात है। इस दशा के साथ आपको धरती के परम गूढ़ रहस्यों का भी ज्ञान है। एक छोर पर हैं-प्रकृति के असंतुलन से उपजी भीषण एवं भयावह आपदाएँ, दूसरी ओर हैं-मानव की दूषित प्रवृत्तियाँ। आज का मनुष्य जीवन का मर्म ही भूल चुका है। लिप्साओं और लालसाओं के आघातों से उसकी मानवीय गरिमा चोटिल एवं घायल होकर मृतप्रायः है। ऋषियों एवं देवों ने मिलकर धरा पर उज्ज्वल भविष्य लाने का निश्चय किया था, परन्तु .....’’ महर्षि वशिष्ठ बोलते-बोलते बीच में रुक गये। उनकी पीड़ा के स्पन्दन उपस्थित सभी जनों की चेतना में स्पन्दित होने लगे। कुछ पलों के लिए एक महामौन वहाँ छा गया। इस महामौन का अहसास करके चान्दनी से अठखेलियाँ कर रहे पास के सरोवर एवं सुदूर झरनों के जल ने भी चुप्पी साध ली। इस चुप्पी को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपनी वाणी की प्रखरता से भंग किया- ‘‘उज्जवल भविष्य के साकार होने में अवरोध क्या महर्षि? जो संकल्प महाकाल का है, उसे भला साकार होने में कौन रोक सकता है?’’
    
‘‘रोकेगा तो कोई नहीं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, परन्तु महामहेश्वर की कृपा के इस अवतरण को धरती पर धारण कौन करेगा? प्रदूषित प्रकृति व्यथित एवं क्षुब्ध होकर खण्डप्रलय के जो नित नये दृश्य उपस्थित कर रही है अथवा फिर कलुषित मानवीय प्रवृत्ति जो आतंक और संहार के सरंजाम जुटाती रहती है। भगवती गंगा के अवतरण की गाथा को कौन नहीं जानता। यदि भगवान सदाशिव उनके वेग का शमन न करते तो क्या अवतरण सम्भव था? ठीक इसी तरह धरती एवं मानवता के उज्जवल भविष्य को अवतरण का कोई आधार चाहिए।’’
    
‘‘और वह आधार क्या है?’’ यह स्वर महातपस्वी भृगु का था, जो इस दिव्य सभा में साक्षात् अग्नि की भाँति प्रदीप्त हो रहे थे। ‘‘ऋषि श्रेष्ठ! वह सबल आधार है-मनुष्य की परिष्कृत भावनाएँ, उसकी संवेदनाओं के संवेदन, उसके हृदय को विराट् की पवित्रता के पुलकन से भरती भक्ति।’’- महर्षि अत्रि ने अपने कथन से सभा का समाधान किया। इस समाधान से सभी सहमत थे। सचमुच ही यदि भावनाएँ परिष्कृत हो पाएँ तो ‘मारो और मरो’ की रट लगाने वाला मनुष्य ‘जियो और जीने दो’ की सोच सकता है और तभी लग पायेगा उसकी कुत्सित एवं कलुषित लालसाओं पर अंकुश, जो प्रकृति को कुपित एवं क्षुब्ध किये हैं।
    
‘‘भावनाओं का परिष्कार भक्ति के बिना सम्भव नहीं है।’’ महर्षि वेदव्यास ने बड़े धीर स्वर में यह बात कही। वेदान्त सूत्र एवं श्रीमद्भागवत के रचयिता महर्षि इन क्षणों में प्रज्ञा एवं करुणा का पुञ्जीभूतस्वरूप लग रहे थे। उनका कथन सभी को महामंत्र की भाँति लगा। वह कह रहे थे - ‘‘भक्ति के बिना शक्ति के सदुपयोग की कोई सम्भावना नहीं। भक्ति न हो तो बुद्धि विवेकरहित होती है और बल निरंकुश व दिशाहीन। भक्ति के बिना सृजनात्मक सरंजाम भी संहारक हो जाते हैं।’’
    
महर्षि वेदव्यास की वाणी सभी को प्रीतिकर लगी। उस दिव्य सभा की अध्यक्षता कर रहे सप्तऋषियों ने कहा- ‘‘महर्षि धरती पर भक्ति की भागीरथी के अवतरण के लिए आप ही कोई युक्ति सुझाएँ।’’ इस ऋषि वाणी के प्रत्युत्तर में महर्षि वेदव्यास ने कहा- ‘‘इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त देवर्षि नारद हैं। वे भक्ति सूत्रों के रचनाकार एवं भक्ति के मर्मज्ञ आचार्य हैं। देवों एवं ऋषियों की इस सम्पूर्ण सभा को उनका आह्वान करना चाहिए।’’ वेदव्यास के ये स्वर सभी की चेतना में संप्याप्त होकर देवर्षि के आह्वान में बदल गये। और उस घाटी में एक दिव्य अनुगूँज उठी-
     
तेजसा यशसा बुद्धया नयेन विनयेन च।
भक्तिना तपसा वृद्धं नारदं आह्वायामि वयम्॥
जो तेज, यश, बुद्धि, नय, विनय, भक्ति एवं तप सभी दृष्टि से बड़े हैं, उन नारद का हम सभी आह्वान करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २)

👉 देवर्षि नारद का आह्वान

हिमालय अपने अन्तस् की समूची दिव्यता का वैभव बिखेरने के लिए आज संकल्पित था। जिस पवित्रता, शान्ति एवं सघन आध्यात्मिकता के लिए उसे जाना जाता है। इन क्षणों में वह सब कुछ यहाँ साकार हो रहा था। हिमाच्छादित उत्तुंग शुभ्र धवल शिखर आज वसुधा पर स्वर्गीय भावनाओं के शुभ संदेश के अवतरण का माध्यम बन रहे थे। निरभ्र आकाश के विस्तार में चन्द्रदेव अपनी सम्पूर्ण प्रभा के साथ उदित हो चुके थे। उनकी अमृतवर्षिणी चान्दनी हिमालय के इस दिव्य परिसर की दिव्यता को और भी शतगुणित कर रही थी। चारों ओर हिमशिखरों से घिरी यह घाटी सब भाँति न केवल अद्भुत, बल्कि अगोचर थी।

यहाँ तक पहुँच पाना उनके लिए भी असम्भव है जो पर्वतीय यात्राओं एवं पर्वतारोहण के लिए विशेषज्ञ माने जाते हैं। अपनी दुष्कर पर्वतीय यात्राओं एवं महाकठिन पर्वतारोहण से हिमालय के जिस परिचय का लोग बखान करते हैं; वह तो बस उसके विशाल-व्यापक कलेवर का परिचय है लेकिन काया का परिचय आत्मा का परिचय नहीं है। हिमालय की आत्मा का परिचय तो उन्हें ही मिलता है, जिस पर देवों एवं ऋषियों की कृपा होती है।
    
हिमालय में जलधाराओं के अनेको स्रोत हैं। गंगा, यमुना जैसी महानदियों की पावनता भी इन्हीं पर्वतराज की गोद में खेलकर पल्लवित होती है लेकिन इन सभी जलधाराओं के अतिरिक्त एक अन्य महाधारा का स्रोत हिमालय है। यह महाधारा तप की है, जिसका पावन उद्गम हिमालय की आत्मा है। जिसके सम्मोहक सौन्दर्य के सामने यहाँ का समस्त प्राकृतिक सौन्दर्य फीका है। इस रहस्य को यहाँ निवास करने वाली महाविभूतियों की कृपा के बिना समझा नहीं जा सकता है। इस अतुलनीय सौन्दर्य की एक झलक भी जिन्होंने अपने स्वप्न अथवा समाधि में पायी है, वे इन पंक्तियों के मर्म का स्पर्श सम्भवतः कर सकते हैं। इस शुभ घड़ी में हिमालय का वही अतुलनीय सौन्दर्य साकार हो रहा था। देवों एवं ऋषियों के मिलन के इस दिव्य केन्द्र में आज अलौकिक जागृति थी।
    
युगों-युगों से महातप में संलग्न दिव्य आत्माएँ एकत्र हो रही थीं। दिव्य देहधारी कतिपय विशिष्ट देवगण यहाँ आये हुए थे। महः जनः तपः लोकों के प्रतिनिधि महर्षियों की दिव्यता भी यहाँ आलोकित थी। धरती के महान तपस्वियों का भी हिमालय की आत्मा ने आह्वान किया था, सो वे भी उपस्थित थे। जिनकी गाथाएँ वेदों, पुराणों एवं संसार के विभिन्न धर्मगं्रथों में कही-सुनी जाती हैं, उन सभी का सारभूत तत्त्व यहाँ सघन हो रहा था। हिमालय की शुभ्रता एवं चन्द्रदेव की चाँदनी की धवलता, इन सबके तप की महाप्रभा से मिलकर समूचे वातावरण को ज्योतित कर रही थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

आंखों का काम मुख्यतया प्रकाश के आधार पर वस्तुओं का स्वरूप समझना है। पर देखा जाता है कि उनकी आधी से ज्यादा जानकारी अवास्तविक होती है। कुछ उदाहरण देखिए। कारखानों की चिमनियों से धुओं निकलता रहता है। गौर करके उसका रंग देखिए वह अन्तर कई तरह का दिखाई देता रहता है। जब चिमनी की जड़ में पेड़, मकान आदि अप्रकाशित वस्तुएं हों तो धुआं काला दिखाई देगा पर यदि नीचे सूर्य का प्रकाश चमक रहा होगा तो वही धुआं भूरे रंग का दीखने लगेगा। लकड़ी, कोयला अथवा तेल जलने पर प्रकाश के प्रभाव से यह धुआं पीलापन लिये हुए दीखता है। वस्तुतः धुंए का कोई रंग नहीं होता। वह कार्बन की सूक्ष्म कणिकाओं अथवा तारकोल सदृश्य द्रव पदार्थों की बूंदों से बना होता है। इन से टकरा कर प्रकाश लौट जाता है और वे अंधेरी काले रंग की प्रतीत होती हैं।

रेल के इंजन में वायलर की निकास नली से निकलने वाली भाप निकलते समय तो नीली होती है पर थोड़ा ऊपर उठते ही संघतित हो जाने पर भाप के कणों का आकार बढ़ जाता है और वह श्वेत दिखाई देने लगती है।

जिन फैक्ट्रियों में घटिया कोयला जलता है उनका धुआं गहरा काला होता है और यदि उसमें से आर पार सूर्य को देखा जाय तो सूर्य गहरे लाल रंग का दिखाई देगा।


पानी के भीतर अगणित जीव-जन्तु विद्यमान रहते हैं पर खुली आंखों से उन्हें देख सकना संभव नहीं, माइक्रोस्कोप की सहायता से ही उन्हें देखा जा सकता है। आकाश में जितने तारे खुली आंखों से दिखाई पड़ते हैं उतने ही नहीं हैं। देखने की क्षमता से आगे भी अगणित तारे हैं जो विद्यमान रहते हुए भी आंखों के लिए अदृश्य ही हैं बढ़िया दूरबीनों से उन्हें देखा जाय तो दृश्य तारागणों की अपेक्षा लगभग दस गुने अदृश्य तारे दृष्टिगोचर होंगे।

परमाणु अणु की सत्ता को दूर सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से भी उसके यथार्थ रूप में देख सकना अभी भी सम्भव नहीं है। उसके अधिक स्थूल कलेवर की गणित के अध्यात्म पर विवेचना करके परमाणु और उसके अंग प्रत्यंगों का स्वरूप निर्धारण किया गया है। अणु संरचना के स्पष्टीकरण में जितनी सहायता उपकरणों ने की है उससे कहीं अधिक निष्कर्ष अनुमान पर निर्धारित गणित परक आधार पर निकाला जाना सम्भव हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १)

👉 भक्ति की अभिव्यक्ति
    
भक्ति गाथा, भक्तों की अनुभव कथा है। रसभीगी, भावभीगी भक्ति की अभिव्यक्ति है यह। देवर्षि नारद के भक्ति सूत्र में इसकी सभी गाथाएँ, कथाएँ व अभिव्यक्तियाँ पिरोयी है। नारद भक्ति सूत्र पर पहले भी प्रचुर लेखन हुआ है। अनेकों ने अपनी कथनी इसके साँचे में ढाल कर कही है। लेकिन इस पुस्तक के लेखन में अनुभव के प्रयोग हैं। यह कहने में न कोई संकोच है, न सन्देह और न कोई संशय कि इस पुस्तक में पहली बार नारद भक्ति सूत्र का कथा भाष्य प्रकाशित किया जा रहा है। प्रत्येक सूत्र का अर्थ, उसका अन्तर्बोध किसी न किसी भक्त की अनुभव कथा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। जिन भक्तों की भक्ति-अभिव्यक्ति इसमें कही गयी है, उसमें एक अपना अस्तित्त्व भी शामिल है।
    
परम पूज्य गुरुदेव के प्रथम दर्शन के साथ ही अपने अन्तस में भक्ति के अंकुर फूटे। दर्शन, मिलन, सान्निध्य, सामीप्य व शिक्षण की निरन्तरता एवं प्रगाढ़ता के साथ अपनी बौद्धिक चेतना भक्ति चेतना में रूपान्तरित होती गयी। गायत्रही महामंत्र के तीनों चरण, वरण, धारण व सन्मार्ग पर अग्रगमन ने समावेशित होकर गुरुभक्ति में ईश्वर भक्ति का अनुभव कराया। और तब बन पड़ा भक्ति गाथा के रूप में नारद भक्ति सूत्र का यह कथा भाष्य। इसमें निहित अन्तर्दृष्टि, सृजन चेतना, वैदुष्य व कथा शैली सबमें इसका लेखक या भाष्यकार सर्वथा अनुपस्थित है। इसमें उपस्थित, प्रतिबिम्बित व विद्यमान है तो बस केवल गुरुदेव भगवान् का दिव्य व्यक्तित्व। युगदेवता, युगाराध्य श्रीराम चन्दन के समान अपने गन्ध रूप गुण से इसमें सर्वत्र व्याप्त हैं। वेदान्त सूत्र के शब्दों में इसे ‘अविरोधश्चंदनवत्’ (२/३/२३) ही समझना चाहिए।
    
इस विशद् भक्ति सिंचित कथा भाष्य का परिचय देते हुए याद आती है छान्दोग्य उपनिषद् की एक सुपरिचित श्रुति- इदं वाव तज्जेष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वान्तेवासिने। इस श्रुति वाक्य के अनुसार इस ब्रह्मविद्या के लिए केवल दो तीर्थ- ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य उपयुक्त ठहराये गये हैं। युगऋषि गुरुदेव ने इस श्रुति को अपने दर्शन में ढालते हुए कहा- मनुष्य परमात्मा का ज्येष्ठ पुत्र है, उसका युवराज है। जहाँ तक शिष्य होने की बात है तो- उन्होंने बिना किसी भेदभाव के सभी को अपना शिष्य बनाया। तो इस तरह भक्ति की यह मधुविद्या सभी के लिए है, मानव कल्याण के लिए है।
    
पूज्य गुरुदेव अपने अन्तिम उपदेशों में कहते थे- संवेदना से सिंचित होकर मानव का भविष्य उज्ज्वल होगा। संवेदना का सिंचन अर्थात् भाव की परिष्कृति। परिष्कृत भाव ही प्रेम है और प्रेम की प्रगाढ़ता, व्यापकता और उसकी ईश्वरोन्मुखता ही भक्ति। सच कहें तो इस भक्ति की अभिव्यक्ति से मानव अपनी अनुभूतियों को साझा करने में समर्थ होगा। वह सुख बांटेगा और दुःख बटाएगा। इसी से उसे शान्ति व आनन्द की प्राप्ति हो सकेगी। स्वयं देवर्षि नारद भी तो अपने भक्ति सूत्र में यही कहते हैं- शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च, भक्ति स्वयं शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है। जीवन की सभी समस्याओं का समाधान व शाश्वत ध्येय भी तो यही है।
    
हां यह सच है कि भाष्य लेखन के लिए वाचस्पति मिश्र, अद्वैतानन्द, चित्सुखाचार्य, श्रीकृष्ण वल्लभ, विज्ञानभिक्षु, मध्व, शंकर व भास्कर की तरह प्रखर पाण्डित्य चाहिए। मौलिक चिन्तन के लिए श्रीकृष्ण, व्यास व वाल्मीकि की भांति अन्तर्दृष्टि-योगदृष्टि चाहिए। अपने में ये दोनों नहीं है। है तो बस सद्गुरु कृपा की अनुभूति। जिन्होंने मुझे बोध कराया है-

परमात्मा के हस्तारक्षर है तुम पर।
रोएं-रोएं पर उसका गीत लिखा है।
रोएं-रोएं पर उसके हाथों के चिह्न है।
क्योंकि उसने ही तुम्हें बनाया है।
वही तुम्हारी धड़कनों में है।
वही तुम्हारी श्वास में है।
    
युगऋषि पूज्य गुरुदेव के द्वारा मुझे सौंपी गयी इस अनुभूति को, भक्ति की इस अभिव्यक्ति को, ‘भक्तिगाथा’ पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति के माध्यम से आप सभी को कृतज्ञ भाव से सौंपते हुए स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

जो कुछ हम देखते, जानते या अनुभव करते हैं—क्या वह सत्य है? इस प्रश्न का मोटा उत्तर हां में ही दिया जा सकता है, क्योंकि जो कुछ सामने है, उसके असत्य होने का कोई कारण नहीं। चूंकि हमें अपने पर, अपनी इन्द्रियों और अनुभूतियों पर विश्वास होता है इसलिए वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में जो समझते हैं, उसे भी सत्य ही मानते हैं। इतने पर भी जब हम गहराई में उतरते हैं तो प्रतीत होता है कि इन्द्रियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे बहुत अधूरे, अपूर्ण और लगभग असत्य ही होते हैं।

शास्त्रों और मनीषियों ने इसीलिए प्रत्यक्ष इन्द्रियों द्वारा अनुभव किये हुए को ही सत्य न मानने तथा तत्वदृष्टि विकसित करने के लिए कहा है। यदि सीधे सीधे जो देखा जाता व अनुभव किया जाता है उसे ही सत्य मान लिया जाय तो कई बार बड़ी दुःस्थिति बन जाती है। इस सम्बन्ध में मृगमरीचिका का उदाहरण बहुत पुराना है। रेगिस्तानी इलाके या ऊसर क्षेत्र में जमीन का नमक उभर कर ऊपर आ जाता है। रात की चांदनी में वह पानी से भरे तालाब जैसा लगता है। प्यासा मृग अपनी तृषा बुझाने के लिये वहां पहुंचता है और अपनी आंखों के भ्रम पर पछताता हुआ निराश वापस लौटता है। इन्द्र धनुष दीखता तो है पर उसे पकड़ने के लिये लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। जल बिन्दुओं पर सूर्य की किरणों की चमक ही आंखों पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालती है और हमें इन्द्र धनुष दिखाई पड़ता है उसका भौतिक अस्तित्व कहीं नहीं होता।

सिनेमा को ही लीजिये। पर्दे पर तस्वीर चलती-फिरती, बोलती, रोती-हंसती दीखती हैं। असम्भव जैसे जादुई दृश्य सामने आते हैं। क्या वह सारा दृश्यमान सत्य है। प्रति सेकेण्ड सोलह की गति से घूमने वाली अलग-अलग तस्वीरें हमारी आंखों की पकड़ परिधि से आगे निकल जाती हैं फलतः दृष्टि भ्रम उत्पन्न हो जाता है। स्थिर तस्वीरें चलती हुई मालूम पड़ती हैं। लाउडस्पीकर से शब्द अलग जगह निकलते हैं और तस्वीरें अलग जगह चलती हैं पर आंख कान इसी धोखे में रहते हैं कि तस्वीरों के मुंह से ही यह उच्चारण या गायन निकल रहे हैं।

प्रातःकालीन ऊषा और सायंकालीन सूर्यास्त के समय आकाश में जो रंग बिरंगा वातावरण छाया रहता है क्या वह यथार्थ है? वस्तुतः वहां कोई रंग नहीं होता यह प्रकाश किरणों के उतार चढ़ाव का दृष्टि संस्थान के साथ आंख मिचौनी ही है। आसमान नीला दीखता है पर वस्तुतः उसका कोई रंग नहीं है। पीला का रंग हो भी कैसे सकता है? आसमान को नीला बता कर हमारी आंखें धोखा खाती हैं और मस्तिष्क को भ्रमित करती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें

दोष दृष्टि रखने से हमें हर वस्तु दोषयुक्त दीख पड़ती है। उससे डर लगता है, घृणा होती है। जिससे घृणा होती है, उसके प्रति मन सदा शंकाशील रहता है, साथ ही अनुदारता के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति या वस्तु से न तो प्रेम रह सकता है और न उसके गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना ही सम्भव रहता है।
दोष दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे हर वस्तु बुरी, हानिकारक और त्रासदायक दीखने लगती है। उसकी दुनियाँ में सभी विराने, सभी शत्रु और सभी दुष्ट होते है। ऐसे व्यक्ति को कहीं शान्ति नहीं मिलती।

दूसरों की बुराइयों को ढूँढ़ने में, चर्चा करने में जिन्हें प्रसन्नता होती है वे वही लोग होते हैं जिन्हें अपने दोषों का पता नहीं है। अपनी ओर दृष्टिपात किया जाय तो हम स्वयं उनसे अधिक बुरे सिद्ध होंगे, जिनकी बुराइयों की चर्चा करते हुये हमें प्रसन्नता होती है। दूसरों के दोषों को जिस पैनी दृष्टि से देखा जाता है। यदि अपने दोषों का उसी बारीकी से पता लगाया जाय तो लज्जा से अपना सिर झुके बिना न रहेगा और किसी दूसरे का छिद्रान्वेषण करने की हिम्मत न पड़ेगी

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

👉 तलवार या प्रेम?

किसी पर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्य के पास दो ही साधन उपलब्ध हो सकते हैं। एक तलवार तथा दूसरा प्रेम।

तलवार से किसी को अपने वश में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय क्षणिक है, इससे किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता है। परास्त मनुष्य तभी तक अपने को परास्त समझता है जब तक वह निर्बल है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने का साधन उपलब्ध नहीं है। वह भीतर ही भीतर ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में रहता है जब वह अपने शत्रु से बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके। और एक न एक दिन उसे ऐसा अवसर मिल ही जाता है।

प्रेम से प्राप्त किया हुआ अधिकार स्थायी होता है। विजयी न अपने को विजयी समझता है और न विजित अपने को विजित। वे सदा के लिये सच्चे मित्र बन जाते है। एक के हृदय पर दूसरे का अटल अधिकार हो जाता है।

शक्तिशाली लोग तलवार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि उनकी शक्ति को अपने काम में ला सके। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम के साथ बानरों की असंख्य सेना, ईसा और बुद्ध के अनगित अनुयायी गान्धी के अनेक सत्याग्रही इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से प्रबल है।

आप दूसरों को अपना सहायक बनाना चाहते हैं, उनकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं, यश या ऐश्वर्य चाहते हैं तो प्रेम शस्त्र को अपनाइये यह तलवार की अपेक्षा सैंकड़ों गुनी शक्ति रखता है।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 16

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

👉 अन्तःकरण की आवाज सुनो और उसका अनुकरण करो

जब मनुष्य अकेला होता है, उसके पास और आस-पास भी जब कोई नहीं होता है, तब कोई पाप करने से उसे जो भय लगता है, एक शंका रहती है, वह किसके कारण होती है? उसे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि कोई उसके पाप को देख रहा है? क्यों उसका शरीर पूरे उत्साह से उस पाप कर्म में उत्साहित नहीं रहता? और क्यों बाद में भी वह एक अपराधी की तरह मलीन रहता है? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब उसके पाप को देखने वाला कोई मौजूद नहीं तब उसे भय किसका है वह किससे डर रहा है? कौन उसे ऐसा करने को निःशब्द रोकता और टोकता रहता है? कौन उसके मन, प्राण और शरीर में कंपन उत्पन्न कर देता है?

निःसंदेह यह उसका अपना अन्तःकरण है, जो उसे उस पाप से हटाने के प्रयत्न में विविध प्रकार की शंकाओं, संदेहों व कम्पनादि भयद्योतक अनुभवों से उसे वैसा न करने के लिए संकेत करता जाता है और जो मनुष्य उसकी अवहेलना करके वैसा करता है, उसका अन्तःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दण्ड का भागी बनाता है। यह हो सकता है कि किसी का पाप कर्म दुनिया से छिपा रहे, किंतु उसके अपने अन्तःकरण से कदापि नहीं छिप सकता।

वह उसकी एक-एक क्रिया और विचार का सबसे प्रबल और सच्चा साक्षी होता है। जब किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड किसी और से नहीं मिल पाता तो समय आने पर उसका अन्तःकरण उसे स्वयं दण्डित करता है। हमारे लिए उचित यही है कि अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की आवाज को सुनें और उसका अनुसरण करें।

महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1965 पृष्ठ 1

👉 मनुष्य की महानता का रहस्य

मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ है। शक्तिमान् होना अथवा शक्तिहीन होना मनुष्य के स्वयं अपने हाथ में है।

अपनी प्रत्येक आदत एवं वासना के ऊपर आप नियंत्रण पा सकते हैं, क्योंकि आप अनंत परमात्मा के एक अंश हैं और परमात्मा के बल के आगे ऐसा कुछ भी नहीं है, जो टिक सके। अनेक मनुष्य हलके प्रकार का जीवन इस तरह बिताते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र होता ही नहीं है। क्या तुम्हें इस संसार में प्रभावशाली बनना है? यदि हाँ, तो आप अपने आप पर निर्भर रहो और स्वतंत्र बनने का प्रयत्न करो। अपने आप को साधारण मनुष्य मत समझो। हम गरीब हैं, हमसे क्या होगा, ऐसा मत कहो।

यदि आप परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर लोगों की आलोचना से नहीं डरोगे, तो प्रभु अवश्य आप को सहायता देगा। यदि लोगों को खुश करने के लिए अपना जीवन बिताएँगे, तो लोगों से आप कदापि खुश नहीं रहेंगे, बल्कि जैसे-जैसे आप उन्हें खुश रखने में लगेंगे, वैसे-वैसे ही आप गुलाम बनते जाऍगे, वैसे-वैसे ही आप से उनकी माँग भी बढ़ती जाएगी।

जो कोई स्वाभाविक रीति से अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है, वह निश्चित रूप से महान् पुरुष है। जिन मनुष्यों को अपनी मूलशक्ति आत्मशक्ति का भान होता है, वे ओछे और बेकार काम करते हुए नहीं दिखाई देते।

📖 अखण्ड ज्योति-मई 1948 पृष्ठ 7

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...