रविवार, 26 जुलाई 2020

👉 परिजनों से हमारी अपेक्षा

युग-परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण व्यक्ति अग्रिम भूमिका निभाते हैं, पर उनके पीछे एक दिव्य समुदाय पहले से ही किसी अदृश्य सूत्र शृंखला में बँधा आता है और उसी के समन्वित प्रयासों से महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। राम के साथ रीछ, वानरों की भूमिका रही। कृष्ण के गोवर्धन उठाने में गोप-बालकों का और महाभारत में पाण्डवों का योगदान रहा। बुद्ध की भिक्षु मण्डली में लाखों नर-नारी थे। गाँधी के सत्याग्रहियों की सेना का परिचय सभी को है। समय की महत्वपूर्ण भूमिका पूरी करने के लिए ऐसी ही सामूहिक शक्तियाँ अवतरित होती हैं, भले ही उसके नेतृत्व का श्रेय किसी को भी मिले।

अपना विशिष्ट समय है। इन्हीं क्षणों मानव जाति के भविष्य का भला या बुरा फैसला होने जा रहा है। या तो मनुष्य जाति को युद्ध विभीषिका, बढ़ती जनसंख्या एवं निकट स्तर की आपाधापी में उलझ कर सामूहिक आत्महत्या करनी पड़ेगी या फिर लोक-एकता, समता, ममता, शुचिता जैसे उच्च आदर्शों को अपनाकर मनुष्य में देवत्व के अवतरण और धरती पर स्वर्ग के वातावरण का आनन्द लेंगे। इन निर्णायक घड़ियों में विशिष्ट आत्माओं को विशिष्ट परिश्रम करना पड़ेगा- विशेष कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व निभाना होगा। इतने बड़े कार्य अनायास ही नहीं हो जाते। उसके लिए जन-मानस का प्रखर मार्ग-दर्शन करने के लिए जागृत आत्माओं को वाणी से नहीं अपने अनुकरणीय आचरण प्रस्तुत करने होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें युग-परिवर्तन की इस विशिष्ट वेला में अपनी जीवन नीति इस प्रकार प्रस्तुत करनी चाहिए जो जनसामान्य के लिए अनुकरणीय बन सके।

हम बारीकी से इस सन्दर्भ में तीखी दृष्टि परिजनों पर डालते रहते हैं। कथनी नहीं करनी से ही किसी का मूल्याँकन होता है। इस दृष्टि से अपने परिजन हमारी अपेक्षा, आकाँक्षा के अनुरूप वजनदार नहीं बैठते तो वह हलकापन हमें अखरता है। पेट और प्रजनन में तो नर-कीटक भी लगे रहते हैं। लोभ और मोहग्रसित आपा-धापी में नर-पशुओं को भी प्रवृत्त देखा जा सकता है। वासना, तृष्णा से प्रेरित नर-वानरों के क्रीड़ा-कौतुक तो पिछड़े क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं। हम भी उसी स्तर की इच्छा और क्रिया अपनायें रहें तो फिर विशिष्ट समय में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिए भेजी गई विशेष-आत्माओं का अवतरण ही निरर्थक हो गया। यह कैसी कष्टकर स्थिति है।

परिजनों से हमारी अपेक्षा रही है कि वे वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा के दल-दल से अपने को निकालें। सुविस्तृत परिवार पर जब इस दृष्टि से नजर डालते हैं तो सन्तोष स्वल्प और असन्तोष बड़े परिमाण में सामने आ खड़ा होता है। दूसरों की दृष्टि में युग-निर्माण परिवार के सदस्य नव-निर्माण की मूक साधना में अत्यन्त निष्ठापूर्वक संलग्न रहकर मानवी आदर्शों का अभिवर्धन करने वाले, रचनात्मक कार्यों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए कहे जाते हैं। किसी हद तक यह मूल्याँकन सही भी है। पर इतने से हमें तो सन्तोष नहीं होता। हमें अधिक चाहिए। परिजनों की जीवन विद्या प्रकाशपूर्ण, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद बन सके, यही अपनी अपेक्षा है। इससे कम में युग की पुकार को पूरा कर सकने वाले प्रयास बन ही नहीं पड़ेंगे। ज्यों-ज्यों कुछ आधा-अधूरा, काना-कुबड़ा चलता भी रहा तो उतने से कितनी देर में-क्या कुछ बन पड़ेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 Accept Your Flaws

Whenever one commits a mistake he instantly feels a shock in the inner self. But the next moment his (extrovert) conscious mind comes into action and advices to ignore and hide it because there will insult, penalty or some other unpleasant experience if others come to know about it… This idea further accrues lame excuses, false arguments and triggers him find ways to somehow protect himself and allege someone else for whatever wrong has been done.

But this is the beginning of a vicious cycle. Hiding a flaw even for once induces a tendency to do so again and again. This gradually becomes a habit and one stops caring for what is wrong and what is not. The mist of falsehood darkens and weakens his inner self and cultivates sinful tendencies.

Confessing for own weakness or misdeeds in fact shows one’s spiritual courage and inner purity. So, if one accepts his own flaws or apologizes for whatever wrong he has committed, he would elevate his dignity. This is a brave act. It enhances one’s inner strength. With same strength, one should vow not to repeat such mistakes. Doing this will gradually refine him and accelerate his progress along the righteous path of progress on the worldly as well as spiritual fronts.

📖  Akhand Jyoti, April 1946

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग २)

दिन-दहाड़े सरे-बाजार गुण्डागर्दी होती रहती है और यह भले बनने वाले लोग चुपचाप उस तमाशे को देखते रहते हैं। गुण्डों की हिम्मत बढ़ती है और वे आये दिन दूने उत्साह से वैसी ही हरकतें करते हैं। यदि देखने वाली भीड़ ने जोर से एक साथ शोर ही मचा दिया होता तो सरे आम गुण्डागर्दी करने वालों के पैर उखड़ सकते थे और दुर्घटना बच सकती थी। अनाचार की घटनाएँ घटती हैं, पुलिस छानबीन करती है, पर प्रत्यक्षदर्शी भले मानुसों में से गवाही देने एक भी नहीं जाता। झंझट से बचने में ही जिन्हें खैर दीखती है वे अनाचार का सामना करने में जो थोड़ी बहुत कठिनाई उठानी पड़ती है, उसका झंझट क्यों मोल लें? इस भीरुता पर प्रत्यक्ष रूप से गुण्डागर्दी का लाँछन तो नहीं लगाया जा सकता, पर प्रत्यक्ष रूप से अनीति को खाद-पानी देने की जिम्मेदारी उसी की है। अपनी लड़की से कोई गुण्डा छेड़खानी करे तो लोग बदनामी के डर से उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे दुहरी हानि होती है। अगले दिनों लड़की को फिर कोई छेड़े तो वह बेचारी चुपचाप उसे सहन करती रहती है। जानती है अभिभावकों में सामना करने की हिम्मत तो है नहीं। छिपाने का ही उपदेश देंगे ऐसी दशा में उसे छिपाने की बात स्वयं ही करती रहे तो क्या हर्ज है? दूसरी ओर छेड़ने वालों का साहस सौ गुना हो जाता है वे चक्रवर्ती शासक की तरह मूँछें ऐंठते और ताल ठोकते फिरते हैं। मानो इन सज्जन कहलाने वाले कायरों को उन्होंने मक्खी-मच्छर की तरह अपना वशवर्ती बना लिया हो।

छोटे-बड़े प्रत्येक अनाचार के अवसर पर यही दृश्य देखने को मिलता है। विरोध, प्रतिरोध, असहयोग करने के लिए साहस दिखा सकने वाले ढूंढ़े नहीं मिलते वरन् क्षमा का उपदेश देने, गन्दगी पर मिट्टी डालने की बात कहने वाले लोगों की भीड़ सामने आ खड़ी होती है और रोकथाम के लिए जो कुछ किया जा सकता था वह सम्भव ही नहीं हो पाता। स्थिति कितनी दयनीय और कितनी विषम है। लगता है लोगों ने पाप को सुरक्षित रखने और उसे फलने-फूलने देने की ऐसी नीति अपना ली है जो बाहर से निर्दोष लगती है किन्तु वस्तुतः वही अनाचार को बढ़ावा देने में खाद पानी का काम करती है।

भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश का उभय-पक्षीय आश्वासन है। प्रत्येक अवतार के चरित्र में इन दोनों ही तत्वों का समावेश है। अधिक बारीकी से देखने पर प्रतीत होगा कि अवतारों ने धर्मोपदेश तो कम दिये हैं वरन् पाप से जूझने और उसे निरस्त करके छोड़ने की आक्रोश प्रक्रिया में ही अपना अधिक समय लगाया है। रामचरित्र में विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर पंचवटी, दण्ड कारण्य आदि में जूझते हुए अन्ततः लंका युद्ध में जा डटने के ही प्रसंग भरे पड़े हैं। कृष्ण चरित्र में भी उनके जन्मकाल से ही असुरों से जूझने की महाभारत रचाने की और अन्ततः अपने ही वंश वालों को नष्ट होने देने की संरचना में समय बीता। भगवान परशुराम, भगवान नृसिंह, वाराह, भगवती, दुर्गा आदि के अवतार चरित्रों में अनीति से संघर्ष का ही प्रसंग बढ़ा-चढ़ा है। उनके साथी समर्थकों की सेना को धर्म स्थापना का-जप हवन का कितना समय मिला कह नहीं सकते पर स्पष्ट है कि भगवत् भक्तों ने ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अपनी सामर्थ्य झोंक देने का आदर्श उपस्थित किया। रीछ-वानरों ने, ग्वाल-बालों ने पाण्डवों ने, प्रधानतया अनीति विरोधी तप साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

शनिवार, 25 जुलाई 2020

👉 बोलना ही बंधन है

एक राजा के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया। राजकुमार स्वभाव से ही कम बोलते थे। राजकुमार जब युवा हुआ तब भी अपनी उसी आदत के साथ मौन ही रहता था। राजा अपने राजकुमार की चुप्पी से परेशान रहते थे कि आखिर ये बोलता क्यों नहीं है। राजा ने कई ज्योतिषियों,साधु-महात्माओं एवं चिकित्सकों को उन्हें दिखाया परन्तु कोई हल नहीं निकला। संतो ने कहा कि ऐसा लगता है पिछले जन्म में ये राजकुमार कोई साधु थे जिस वजह से इनके संस्कार इस जन्म में भी साधुओं के मौन व्रत जैसे हैं। राजा ऐसी बातों से संतुष्ट नहीं हुए।

एक दिन राजकुमार को राजा के मंत्री बगीचे में टहला रहे थे। उसी समय एक कौवा पेड़ की डाल पर बैठ कर काव - काव करने लगा। मंत्री ने सोचा कि कौवे कि आवाज से राजकुमार परेशान होंगे इसलिए मंत्री ने कौवे को तीर से मार दिया। तीर लगते ही कौवा जमीन पर गिर गया। तब राजकुमार कौवे के पास जा कर बोले कि यदि तुम नहीं बोले होते तो नहीं मारे जाते। इतना सुन कर मंत्री बड़ा खुश हुआ कि राजकुमार आज बोले हैं और तत्काल ही राजा के पास ये खबर पहुंचा दी। राजा भी बहुत खुश हुआ और मंत्री को खूब ढेर - सारा उपहार दिया।

कई दिन बीत जाने के बाद भी राजकुमार चुप ही रहते थे। राजा को मंत्री कि बात पे संदेह हो गया और गुस्सा कर राजा ने मंत्री को फांसी पर लटकाने का हुक्म दिया। इतना सुन कर मंत्री दौड़ते हुए राज कुमार के पास आया और कहा कि उस दिन तो आप बोले थे परन्तु अब नहीं बोलते हैं। मैं तो कुछ देर में राजा के हुक्म से फांसी पर लटका दिया जाऊंगा। मंत्री की बात सुन कर राजकुमार बोले कि यदि तुम भी नहीं बोले होते तो आज तुम्हे भी फांसी का हुक्म नहीं होता। बोलना ही बंधन है। जब भी बोलो उचित और सत्य बोलो अन्यथा मौन रहो। जीवन में बहुत से विवाद का मुख्य कारण अत्यधिक बोलना ही है। एक चुप्पी हजारों कलह का नाश करती है।

राजा छिप कर राजकुमार की ये बातें सुन रहा था,उसे भी इस बात का ज्ञान हुआ और राजकुमार को पुत्र रूप में प्राप्त कर गर्व भी हुआ। उसने मंत्री को फांसी मुक्त कर दिया।

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

क्रान्तियों में आँधी जैसा वेग चाहिये। अक्सर उखाड़ फेंकने वाले आन्दोलनों को ही क्रान्ति कहा जाता है। पर जिसका लक्ष्य सृजन हो, उत्पादन हो, अभिवर्धन हो, काया-कल्प जैसा परिवर्तन हो वह देवत्व की पक्षधर क्रान्ति तो और भी कठिन होती है। एक मशाल लेकर समूचे  गाँव को एक घंटे में जलाया जा सकता है, फिर उस गाँव में लगे क्षेत्र में सिंचाई का प्रबन्ध करके हरीतिमा की मखमली चादर बिछाना कितना श्रम साध्य और समय साध्य होता है, इसे सभी जानते हैं। अग्निकाण्ड के लिये एक पागल का उद्धत आचरण भी पर्याप्त है, पर लह-लहाती फसल उगाने या भव्य भवन बनाने के लिये तो कुशल कारीगरों की सुविकसित योग्यता और अगाध श्रम निष्ठा चाहिये।

प्रज्ञा परिवार सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों सैनिकों का स्तर ऊंचा चाहिये। ऐसा ऊंचा इतना अनुशासित कि उसके कर्तृत्व को देखकर अनेकों की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया- वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को सम्पन्न करने के लिये कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिये। लोभ, मोह और अहंकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिये। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकेंगे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के सन्देश को और भी व्यापक बनाया जाय। इसके लिये जन-जन से संपर्क साधा जाय। घर-घर अलख जगाया जाय। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाय। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़े उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जांय। भले ही वे जन्म मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना पड़ता, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन सम्पन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिये जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके। जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिये इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊंचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिये। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसा चरित्र भी चाहिये और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९८५

👉 Throw Away All Fears from Your Mind

Getting scared is not a natural tendency of human self. Your soul is absolutely free. It is only our mind, which has created all sorts of fears, worries, sorrows and what not. It is up to you whether to make your inner world ghostly and abominable by such negative tendencies or transform it into a living paradise pervaded with fearlessness, vivid zest, and illumined faith. No one can harm or help you if you awakened yourself. If you want, you can really be strong and free from all worries and fears. Remember again and again that it is your own good or bad thoughts, virtuous or evil tendencies and discerning or confused intellect that ‘create’ your auspicious or ill omen.

Even a slightest instinct of fear or worry disturbs your mental peace. Your thoughts then tend to revolve around its imaginary causes. It expands with greater intensity unless you awaken, firmly decide and uproot and throw it out from your mental field. Better do it now itself and keep away from all such negative feelings. Fight out and eradicate the demons of all fears and worries by the might of inner strength and self-confidence. Think of yourself as the immortal soul, the smog of all weaknesses and apprehensions will disappear with the dawn of self-recognition.

📖  Akhand Jyoti, Mar. 1946

👉 सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ

धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग १)

संसार में अवाँछनीयता कम और उत्कृष्टता अधिक है। तभी तो यह संसार अब तक जीवित है। यदि पाप अधिक और पुण्य स्वल्प रहा होता तो अब तक यह दुनिया श्मशान बन गई होती। यहाँ सत्य, शिव और सुन्दर इन तीनों में से एक का भी अस्तित्व जीवित न रहा होता। आग दुनिया में बहुत है, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी हम देखते हैं कि अनाचार घटता नहीं, बढ़ता ही जाता है। सरकारी प्रयत्न रोकथाम के लिए काफी बढ़ाये गये हैं, पर उनकी पकड़ में दुष्टता की पूँछ भर आती है। सारा कलेवर जो जहाँ का तहाँ जमा बैठा रहता और अपना विस्तार करने में संलग्न रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि सज्जनता का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी दुष्टता क्यों पनपती और फलती-फूलती चली जाती है? रोकथाम की सर्वजनीन आकाँक्षा क्यों फलवती नहीं होती? असुरता की शक्ति क्यों अजेय बनती जा रही है? देवत्व उसके आगे पराजित होता और हारता, झक मारता क्यों दिखाई देता है?

विचार करने पर स्पष्ट होता है कि पाप-शक्ति स्वल्प है। बलवान चोर घर में घुसे और घर मालिकों में से कुछ स्त्री, बच्चे जग पड़ें-कुत्ते भौंकने लगें तो उन्हें तत्काल उलटे पैरों भागना पड़ता है। स्पष्ट है पाप अत्यन्त दुर्बल होता है प्रकारान्तर से दुर्बलता ही निकृष्टता के रूप में परिणत होती है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल बताया गया हैं। परन्तु उसके हारने और असत्य के मजबूती से पैर जमाये रहने का कुछ तो कारण होना ही चाहिए। वह यह है कि जन-मानस में से उस रोष-आक्रोश का-शौर्य-साहस का अस्तित्व मिटा नहीं तो घट अवश्य गया है, जिसमें अनीति की चुनौती स्वीकार करने की तेजस्विता विद्यमान रहती है। इस कसौटी पर औसत आदमी बड़ा डरपोक, कायर, दब्बू, संकोची, पलायनवादी और कुछ-कुछ वैसा ही बन जाता है जैसा कि गीता का विवादग्रस्त अर्जुन था। उसमें रोष-आक्रोश उत्पन्न करने के लिए ही भगवान को गीता सुनानी पड़ी और अपने प्राण प्रिय मित्र को क्लीव, क्षुद्र, दुर्बल, अनार्य आदि एक से एक कड़वी गालियों की झड़ी लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई।

अर्जुन समझौतावादी, संतोषी प्रकृति का और सज्जन दीखता है। वह क्षमा करने, सन्तोष रखने की नीति अपनाना चाहता है और भीख आदि के सहारे संतुष्ट रहना चाहता है। युद्ध का कटु प्रसंग उसे अच्छा नहीं लगा। आज हम सब की मनःस्थिति ऐसी ही हो गई है कि झगड़े में न पड़ने, किसी तरह झंझट काट लेने, अनाचार से निगाह चुरा लेने की बात में ही भलाई देखते हैं। यह भलाई दिखाने वाली सज्जनता का आवरण ओढ़े हुए क्षमाशीलता वस्तुतः परले सिरे की कायरता होती है। इससे अपने को झंझट में न पड़ने से बचाने के अतिरिक्त किसी से दुश्मनी मोल न लेने और बदनामी से बचने जैसे ऐसे तत्व भी मिले रहते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से अनीति समर्थक और परिपोषक ही कहा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति १९७६ नवम्बर ६४

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

👉 The World is a Reflection of Our Minds

The state and activities of the mind affect the body and those of the latter influence the mind in return. This cycle continues throughout the life. For example, if there is an ailment or pain somewhere in the body, mind also will be disturbed and worried. If mind is depressed, the body will also become inactive and so on. According to Vedanta, your mind is the architect of what you are and what the nature of your world is.

Mind is the linkage between successive live. One’s inner desires, convictions, thoughts are constantly inscribed in the inner core of the mind; these influence the intrinsic tendencies of mind and hence the future course of life… Even the kind of life form, the type of body, the circumstances one is born in, are shaped by the intrinsic nature of one’s mind. Thus, the world around us is nothing but a shadow or a reflection of our mind.

The world is neither good nor bad in itself. Little deeper thinking will make it clear to you that you experience the world as per the nature of your own inner self. Good or bad, beauty or ugliness, superiority or inferiority, etc are all creations of your own mind. It is in your hands whether to ruin your life in the poison of evils of jealous, hatred, selfishness or sooth it by the nectar of virtuous
tendencies.

📖  Akhand Jyoti, Feb. 1946

👉 प्रज्ञा परिजनों का स्तर

प्रज्ञा परिजनों का स्तर जन साधारण की दृष्टि से कहीं ऊंचा है। दूसरे लोग पेट-प्रजनन के अतिरिक्त जहाँ दूसरी बात सोचते ही नहीं वहाँ प्रज्ञा पुत्रों ने लोभ, मोह और अहंकार के त्रिविध भव-बंधन तोड़े नहीं तो ढीले अवश्य किये हैं। निजी आवश्यक कार्यों के साथ-साथ उन्होंने जन-जागृति के, युग परिवर्तन के कार्य को भी महत्व दिया है। यह साधारण बात नहीं, असाधारण बात है। अन्यान्य संस्था संगठनों की तुलना में प्रज्ञा परिवार का स्तर ऊंचा नहीं तो नीचा भी नहीं कहा जा सकता। इतने पर भी हमें शिकायत रही कि साधु, ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह करने वाले देव मानव स्तर के लोगों की संख्या विस्तार, आत्मबल, त्याग, बलिदान और पवित्रता, प्रखरता एक दृष्टि से उतनी ऊंची नहीं उठ पायी जितनी कि हम उनसे चाहते थे। जो युग परिवर्तन के हनुमान, अर्जुन जैसे अग्रदूत बनते, उनसे उतना पुरुषार्थ बन नहीं पड़ा।

इसी प्रकार यही कमी हमें खटकती रही कि जिस आन्दोलन के द्वारा 500 करोड़ मनुष्यों का भाग्य, भविष्य और स्वरूप ऊंचा उठाने के लिये प्रज्ञा आलोक का प्रकाश जितना व्यापक होना चाहिये था, उतना नहीं हो सका। मिशन की जानकारी भले ही करोड़ों को हो। पर उसके समर्थक सहयोगी 20 लाख से अधिक नहीं बढ़ पाये। यह संख्या जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कने की तरह है। 500 करोड़ का 2500 वां भाग ही 20 लाख होता है। सभी परिजन यदि मिशन का सन्देश और अधिक जन-जन तक पहुँचाना चाहें तो वर्तमान प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को 25 हजार व्यक्तियों के साथ घनिष्ठ संपर्क साधना होगा। यह मुनादी पीटने की दृष्टि से तो शायद किसी कदर सफल भी हो जाय, पर जहाँ तक चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ वानर तो मोर्चे पर खड़े कर सकेंगे पर वैसा बना नहीं। अन्य संगठनों की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से 20 लाख समर्थक सदस्य होना बड़ी बात हो सकती है। पर काम जितना करने को पड़ा है और समय जितना विषम है, उसे देखते हुये साथियों की संख्या निश्चित रूप से अपर्याप्त है।

समय की विषमता दिन-दिन गम्भीर होती जाती है। सर्वनाश के बादल सभी दिशाओं से घुमड़ते आ रहे हैं। तूफानी विग्रहों की गणना नहीं। प्रदूषण, विकिरण जन संख्या उत्पादन जैसी समस्याएं सामने हैं। जन-जन के मन-मन में पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। दुष्टों को आक्रमण करने का जितना दुस्साहस है उससे अनेक गुना छद्म श्वेत वस्त्रधारी और भले मानुष बनने वाले लोग करते हैं। प्रपंचों, संकीर्णताओं और अवाँछनीयताओं की दृष्टि से सभ्य दिखते हुये भी आदमी आदिम युग के जंगलियों जैसा असभ्य बनता जाता है। महायुद्ध की विभीषिका उन सबसे ऊपर है। किसी भी दिन बारूद के पहाड़ में कहीं से कोई चिनगारी उड़ कर पहुँच सकती है और उसका अन्त, इस सुन्दर धरती के रूप में परमात्मा की जो कलाकृति उभरी है। उस सृजन के देखते-देखते भस्मसात हो सकती है। अब की बार का युद्ध इस धरती को सम्भवतः प्राणियों के रहने योग्य भी न रहने दे।

इस विनाश बेला में सुरक्षा शक्ति की- शान्ति सेना की जितनी बड़ी संख्या चाहिये, उसका हौसला जितना बढ़ा-चढ़ा होना चाहिये। वह प्रयत्न करने पर भी बन नहीं पड़ा। एक अच्छा संगठन खड़ा करने भर से हमें किसी भी प्रकार का सन्तोष नहीं होता। जितना बड़ा संकट है, उसके अनुरूप ही अनर्थ को रोक सकने वाली चतुरंगिणी चाहिये। वह न बन पड़े तो छुटपुट प्रयत्नों का, निर्माणों का महत्व ही क्या रह जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९८५

👉 मनुष्य−मनुष्य के बीच का अन्तर

आलसी और उत्साही, कायर और वीर, दीन और समृद्ध, दुर्गुणी और सद्गुणी, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश−पाताल जैसा अन्तर मनुष्यों के बीच में दीख पड़ता है उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती हैं पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है। पंचानवे प्रतिशत कारण मानसिक स्थिति ही है। बुरी−से−बुरी परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक विशेषताओं के द्वारा उन बाधाओं को पार करता हुआ, देर−सवेर में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगा। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी−से−बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है, मानवोचित सम्मान और सुविधायें प्राप्त कर सकता है। पर जिसकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायगी।

परमात्मा ने मनुष्य और मनुष्य के बीच में बहुत थोड़ा अन्तर रखा है। सभी के शरीर लगभग एक से हैं। आवश्यकतायें, विशेषताएँ, परिस्थितियाँ भी सभी की लगभग एक−सी हैं। शरीर और मस्तिष्क की बनावट और कार्य प्रणाली में भी कोई बहुत अन्तर नहीं है। यों थोड़ा बहुत अन्तर रहता है, वह इतना ही है जितना एक पेड़ के पत्तों में, या एक जाति के पक्षियों में रहता है। यह इतना अधिक नहीं है कि उसके कारण किसी को विवशता अनुभव करनी पड़े। कुछ थोड़े से रुग्ण अपंग या ऐसे ही असमर्थों को छोड़कर साधारणतया सभी को परमात्मा ने लगभग एक−सा शरीर और मन दिया हुआ होता है और यदि मनुष्य उनका सदुपयोग करे तो ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त कर सकता है और यदि दुरुपयोग करने पर उतर आवे तो पतन, अन्धकार एवं नरक जैसी, अज्ञान दारिद्र एवं असमर्थता जैसी—बुरी परिस्थिति में ग्रसित हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 21

👉 भक्त के लिए ईश्वर का उपहार

ईश्वर अपने हर भक्त को एक प्यार भरी जिम्मेदारी सौंपता है और कहता है इसे हमेशा सम्भाल का रखा जाय। लापरवाही से इधर-उधर न फेंका जाय। भक्तों में से हर एक को मिलने वाली इस अनुकम्पा का नाम है- दुःख। भक्तों को अपनी सच्चाई इसी कसौटी पर खरी साबित करनी होती है।

दूसरे लोग जब जिस-तिस तरीके से पैसा इकट्ठा का लेते हैं और मौज-मजा उड़ाते हैं तब भक्त को अपनी ईमानदारी की रोटी पर गुजारा करना होता है। इस पर बहुत से लोग बेवकूफ बताते हैं न बनायेंगे तो भी उनकी औरों के मुकाबले तंगी की जिन्दगी अपने को अखरती, और यह सुनना पड़ता है कि भक्ति का बदला खुशहाली में क्यों नहीं मिला। यह परिस्थितियाँ सामने आती हैं। इसलिए भक्त को बहुत पहले से ही तंगी और कठिनाई में रहने का अभ्यास करना पड़ता है। जो इससे इनकार करता है उसकी भक्ति सच्ची नहीं हो सकती। जो सौंपी हुई अमानत की जिम्मेदारी सम्भालने से इन्कार करे उसकी सच्चाई पर सहज ही सन्देह होता है।

दुनिया में दुःखियारों की कमी नहीं। इनकी सहायता करने की जिम्मेदारी भगवान भक्त जनों को सौंपते हैं। पिछड़े हुए लोगों को ऊंचा उठाने का काम हर कोई नहीं सम्भाल सकता। इसके लिए भावनाशील और अनुभवी आदमी चाहिए। इतनी योग्यता सच्चे ईश्वर भक्तों में ही होती है। करुणावान के सिवाय और किसी के बस का यह काम नहीं कि दूसरों के कष्टों को अपने कन्धों पर उठाये और जो बोझ से लदे हैं उनको हलका करें। यह रीति-नीति अपनाने वाले को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ईश्वर का सबसे प्यारा बेटा है ‘‘दुःख’’। इसे सम्भाल कर रखने की जिम्मेदारी ईश्वर अपने भक्तों को ही सौंपता है। कष्ट को मजबूरी की तरह कई लोग सहते हैं। किन्तु ऐसे कम हैं जो इसे सुयोग मानते हैं और समझते हैं कि आत्मा की पवित्रता के लिए इसे अपनाया जाना आवश्यक है।

जो सम्पन्न हैं, जिन्हें वैभव का उपयोग करने की आदत है उन्हें भक्ति रस का आनन्द नहीं मिल सकता। उपयोग की तुलना में अनुदान कितना मूल्यवान और आनंददायक होता है, जिसे यह अनुभव हो गया वह देने की बात निरन्तर सोचता है। अपनी सम्पदा, प्रतिभा और सुविधा को किस काम में उपयोग करूं इस प्रश्न का भक्त के पास एक ही सुनिश्चित उत्तर रहता है दुर्बलों को समर्थ बनाने, पिछड़ों को बढ़ाने और गिरों को उठाने के लिए। इस प्रयोजन में अपनी विभूतियाँ खर्च करने के उपरान्त संतोष भी मिलता है और आनन्द भी होता है। यही है भगवान की भक्ति का प्रसाद जो ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के हिसाब से मिलता रहता है।

भक्त की परीक्षा पग-पग पर होती है। सच्चाई परखने के लिए और महानता बढ़ाने के लिए। खरे सोने की कसौटी पर कसने और आग पर तपाने में उस जौहरी को कोई एतराज नहीं होता जो खरा माल बेचने और खरा माल खरीदने का सौदा करता है। भक्त को इसी रास्ते से गुजरता पड़ता है। उसे दुःख प्यारे लगते हैं क्योंकि वे ईश्वर की धरोहर हैं और इसलिए मिलते हैं कि आनन्द, उल्लास, संतोष और उत्साह में क्षण भर के लिए भी कमी न आने पाये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985

👉 Teen Tarh Ke Log तीन तरह के लोग

हम झूठ बोलते हैं क्योंकि सच बोलने पर लोग अक्सर हमारा साथ छोड़ देते हैं। यह विडम्बना है कि झूठ ज्यादा खूबसूरत और मधुर होता है, इसीलिए जल्दी स्वीकार भी हो जाता है... सच कड़वा, तीखा और ज्वलनशील होता है...इसीलिए सच सुनकर वो लोग भी आपसे दूर हो जाते हैं जो कहते फिरते हैं कि "वो आपके साथ हैं".... लोग अकेले पड़ जाने के भय से झूठ बोलते हैं, फिर उसी झूठ को सच मानने लगते हैं, और फिर धीरे - धीरे उसी झूठ में जीने लगते हैं।

ज़िन्दगी में हमें तीन तरह के लोग मिलते हैं,

एक वो जिन्हें आपसे जुड़ने में रुची होती है, आपसे गप्पे मारने में, टाइम पास करने में ...किंतु आपके सच को सुनने में कतई रुचि नहीं होती ... ये लोग मौका पड़ने पर "आपकी ज़िन्दगी आप जानों" कहकर भाग जाते हैं...

दूसरे लोग वो होते हैं जो आपका सच बड़े प्रेम और भावुकता से सुनते हैं, पर मौका पड़ने पर बड़ी धूर्तता से उसे आपके विरुद्ध प्रयोग करते हैं... ऐसे लोगों को जरा सा भी फर्क नहीं पडता कि उनके इस व्यवहार से, कुटिलता से आप किस हद तक टूट सकते हैं।

तीसरा प्रकार उन लोगों का है जो आपकों सुनते हैं, और अपने जीवन अनुभवों से आपकों समझाते हैं, धैर्य रखने की सलाह देते हैं, साथ ही आपके हर निणर्य में आपके नज़रिए को समझने का प्रयास करते हैं, क्योंकि ऐसे लोग वाकई आपको समझते हैं।

तीसरे प्रकार के लोग कम ही मिलते हैं... इसीलिए हम झूठ बोलते हैं, और झूठ ही जीते हैं... क्योंकि वही सरल है, वही सहज है, वही स्वीकार्य भी है। ....इसीलिए तो संत रहीमदास कहते हैं:-

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय l
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय ll

🙏 सुप्रभात 🙏
आपका यह दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

👉 क्रोध पर नियंत्रण:-

एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता। प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी -थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।

वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की और बैठ गया उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।

राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है।

काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिराके वापस सामने बैठ गया।

अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है, मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है अब मैं इसे नही छोड़ूंगा अब ये जब वापस आएगा तो  इसे खत्म कर दूंगा।

इसप्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है। काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द -बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहा से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।

क्योकि उस डाली पर एक भयंकर अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी।

राजा के मन में पश्चॉत्ताप  का समन्दर उठने लगता है की हे प्रभु! मैने यह  क्या कर दिया। जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया।

काश मैने सन्तों  के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता, अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नही जाती। हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया? हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है।

इसीलिये कहते हैं कि..

क्षमा औऱ दया धारण करने वाला सच्चा वीर होता है।
क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ साथ अपने खुद का ही बहुत नुकसान कर देता है।
क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमेशा क्रोध पर नियंत्रण  रखना चाहिए।

👉 नवयुग का आगमन अतिनिकट है।

जो संकट इन दिनों सामने खड़े दृष्टिगोचर हो रहे हैं, विज्ञजनों ने जिन सम्भावनाओं का अनुमान लगाया है, वे काल्पनिक नहीं हैं। विभीषिकाएँ वास्तविक हैं, इतने पर भी विश्वासियों को यह विश्वास करना चाहिए कि समय चक्र को बदला जायेगा और जो संकट सामने खड़े दीखते हैं, उन्हें उलटा जायेगा।

सामान्य स्तर के लोगों की इच्छा शक्ति भी काम करती है। जनमत का भी दबाव पड़ता है। जिन लोगों के हाथ में इन दिनों विश्व की परिस्थितियाँ बिगाड़ने की क्षमता है, उन्हें जागृत लोकमत के सामने झुकना ही पड़ेगा। लोकमत को जागृत करने का अभियान “प्रज्ञा आन्दोलन” द्वारा चल रहा है। यह क्रमशः बढ़ता और सशक्त होता जायेगा। इसका दबाव हर प्रभावशाली क्षेत्र के समर्थ व्यक्तियों पर पड़ेगा और उनका मन बदलेगा कि अपने कौशल, चातुर्य को विनाश की योजनाएं बनाने की अपेक्षा विकास के निमित्त लगाना चाहिए। प्रतिभा एक महान शक्ति है। वह जिधर भी अग्रसर होती है, उधर ही चमत्कार प्रस्तुत करती जाती है।

वर्तमान समस्याएँ एक दूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव, बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएं। एक को सुलझा लिया जाय और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है तो उनके हल निकल कर ही रहेंगे।

शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्र बल-धन-बल। दूसरा बुद्धि बल संगठन बल। पिछले बहुत समय से शस्त्र बल और धन बल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन आया, सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवी शक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठन बल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ कर दिखा सकती हैं, इसकी अनुभूति सबको करानी है।

न्याय की प्रतिष्ठा हो, नीति को सब ओर से मान्यता मिले, सब लोग हिलमिल कर रहें और मिल बांटकर खायें, इस सिद्धांत को जन भावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जायेगा, तो दिशा मिलेगी, उपाय सूझेंगे, नयी योजनाएं बनेंगी, प्रयास चलेंगे और अंततः लक्ष्य तक पहुंचने का उपाय बन ही जायेगा।

‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’’ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ यह दो ही सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें अपना लिये जाने के उपरांत तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किस अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा, किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा। मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और उसे औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके। नव निर्माण का प्रश्न भी ऐसा ही है। मनुष्य कुछ बनाने पर उतारू हो तो वह क्या नहीं बना सकता? मिश्र के पिरामिड, चीन के दीवार, ताजमहल, स्वेज तथा पनामा की नहर, पीसा की मीनार उसी के प्रयासों से ही तो बन पड़े हैं। जलयान, थलयान, नभयान के रूप में उसी की सूझ-बूझ दौड़ती है। नवयुग निर्माण के लिए प्रतिभाशाली लोगों को लोकमत के दबाव से विवश यदि किया जाय तो कोई कारण नहीं कि “मनुष्य में देवत्व” के उदय और “धरती पर स्वर्ग” के अवतरण की प्रक्रिया कुछ ही समय में सरलतापूर्वक सम्पन्न न की जा सके।

अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अन्त समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रम पूर्वक किया भी जायेगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1985

👉 Win Yourself

A life driven by cravings or aimed at sensual joys alone is useless; it is a blot on the glory of human life, a burden on the earth. Despite being endowed with superior powers, immense potentials, such a person lives a life not different from beasts. He has chosen disgraceful decline… It is pathetic to see a fellow human remaining dormant and letting his life be ruined without any effort, and suffering the consequent miseries. He also makes others related to him face adversities, insult and pains in different forms.

Sensual passions and luxuries without hard work are worse then ‘death’ whereas self-restrain, awareness and disciplined alacrity are real signs of life. A true winner is the one who transforms the ‘wrought iron’ of ambitions and cravings into the ‘gold’ of enlightened potentials. Such a fellow finds joy in every element of Nature.

The dignity of human life lies in uprooting the beastly tendencies, winning over the passions and rising for higher goals. You should be the master and not a slave of your body and mind. A wise man rules over his sense organs and makes constructive use of them as per the directions of wisdom. It is only such farsighted people who awaken the divine potentials indwelling in the human body and mind. The secret of unalloyed bliss, luminous success lies in chiseled refinement and evolution of the inherited physical and mental abilities.

📖  Akhand Jyoti, Dec. 1945

👉 सफलताओं का मूल आधार

बुद्धिमानों का यह कथन सर्वांश में सत्य है कि धर्म−अर्थ, काम मोक्ष का मूल आधार शरीर है। दुर्बल और रुग्ण शरीर वाला अपनी जीवन यात्रा का भार भी स्वयं वहन नहीं कर पाता, उसे पग−पग पर दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। दूसरे लोग सहायता न करें तो अपना ही काम न चले ऐसे लोग धर्म कार्य कर सकने के लिए श्रम कैसे कर पावेंगे? धन कमाने के योग्य पुरुषार्थ भी उनसे कैसे बन पड़ेगा? कामोपभोग के लिए इन्द्रियों में सक्षमता कैसे स्थिर रहेगा? और फिर मोक्ष के योग्य श्रद्धा, विश्वास, धैर्य, श्रम और संकल्प का बल भी उनमें कहाँ से रहेगा? इसलिए बीमार और कमजोर आदमी इस संसार में कुछ भी प्राप्त कर सकने की स्थिति में नहीं रहता। रोग को पाप का फल माना गया है। वस्तुतः वह प्रत्यक्ष नरक ही है। नरक में पापी लोग जाते हैं।

स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करना भी सदाचार के, धर्म के अन्य नियमों को तोड़ने के समान ही अनुचित है। जब झूठ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि दुष्कर्मों द्वारा सामाजिक एवं नैतिक नियमों का उल्लंघन करने वाले ईश्वरीय और राजकीय दंड भोगते हैं तो स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करने वाले क्यों पापी न माने जायेंगे? क्यों उन्हें प्रकृति दंड न देगी? शरीर में भीतर व्यथा और बाह्य जीवन में असफलता, यह दुहरा दंड उन लोगों के लिए सुनिश्चित है जो पेट पर अत्याचार करके उसे शक्तिहीन बना देते हैं। चटोरेपन की बुरी आदतें ही स्वास्थ्य की बर्बादी का एकमात्र कारण है, इसलिए इन आदतों को भले ही राजकीय दंड विधान में अपराध न माना गया हो पर प्रकृति की दंडसंहिता में अपराध ही गिना गया है और उसके लिए वह दंड सुनिश्चित है जिसे आज सब ही भुगत रहे हैं। भीतर व्यथा और बाहर असफलता के दंड हम में से अधिकाँश को आज सहन करने पड़ रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (अन्तिम भाग)

महामानवों के पास भौतिक सम्पदायें भले ही न रही हो पर उनकी चरित्र निष्ठा, आदर्शवादिता और उदारता की पूँजी इतनी प्रचुर मात्रा में उन्हें विभूतिवान बनाये रही है और वह वैभव इतना बढ़ा रहा है, जिसके ऊपर धन कुबेरों की सम्पन्नता को न्यौछावर किया जा सके। ऋषियों के चरणों में राजमुकुट रखे देखकर यह समझा जा सकता है कि सन्मार्गगामी सर्वथा निर्धन नहीं होते, उनके पास अपने ढंग की ऐसी सम्पदा होती है जिसे पाकर मानव जीवन को सब प्रकार सार्थक एवं धन्य हुआ माना जा सके।
  
भौतिक विज्ञानियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि शारीरिक स्वास्थ्य का आधार मात्र पौष्टिक आहार एवं व्यायाम नहीं है वरन् मनःक्षेत्र की समस्वरता पर आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की नींव रखी हुई है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय रोगों के विशेषज्ञ यह कहते हैं कि अधिक मानसिक श्रम करने आदि के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं होते वरन् छल, प्रपंच, क्रूर दुराचरण जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ ही मनःसंस्थान में अन्तर्द्वन्द्व मचाती हैं और उन्हीं के फलस्वरूप अनिद्रा एवं सनक से लेकर उन्माद जैसे रोग अपने विभिन्न आकार- प्रकार में उठ खड़े होते है। कोई समय था जब वात, पित्त, कफ़, आहार- विहार, कृमि कीटाणु, छूत संक्रमण, ऋतु प्रभाव, गृहदशा, भाग्य प्रारब्ध आदि को विभिन्न रोगों का कारण माना जाता था। वे बातें पुरानी हो गई। मनःशास्त्र के विज्ञानी अब उस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अनैतिक, असामाजिक और अवांछनीय चिन्तन से, इस प्रकार की घुटन से भरा आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुँच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति- नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एक मात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञानवेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल कराते हैं पश्चाताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।
  
भारतीय धर्म शास्त्र आधि और व्याधि का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध मानता रहा है। आधि अर्थात् मनःक्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ जिस व्यक्ति में भरी होंगी वह शरीर और मस्तिष्क के रोगों से ग्रसित होता चला जायेगा और वे रोग मात्र औषधि चिकित्सा से कदापि अच्छे न हो सकेंगे। कष्टसाध्य रोगों की एक श्रेणी कर्मजन्य भी होती है। उन्हें अन्तःक्षेत्र में जमी हुई दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। इन्हें पश्चाताप और प्रायश्चित द्वारा उखाड़ने का विधान है। असाध्य महारोगों के लिए यह प्रायश्चित्त चिकित्सा प्राचीन अध्यात्म विज्ञान और भौतिक मनोविज्ञान के आधार पर समान रूप से उपयुक्त मानी गई है। मन की निर्मलता से बढ़कर शारीरिक रोगों की निवृत्ति का और कोई कारगर उपाय नहीं है।
  
निश्चित रूप से मनुष्य एक स्वसंचालित यन्त्र है जो कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए परिणाम भोगने की शृंखला में मजबूती के साथ जकड़ा हुआ है। यदि हम सद्भावनाओं का, सत्प्रवृत्तियों का चिन्तन और कर्तृत्व अपनायें तो सहज ही सुख- शान्ति की परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म- दुष्कर्म के प्रतिफल हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शनिवार, 18 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (अंतिम भाग)

मन की सफाई जितनी आवश्यक है, अक्सर उस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। बहिरंग उपचार को ही प्रमुख मानने वाले तथा फिर उपासक, साधक अपना ध्यान शरीर शोधन तक ही नियोजित रखते हैं। जबकि उनका मन तरह-तरह भ्रम-जंजालों में तर्क-वितर्कों में भ्रमण करता रहता है। लिप्सा, वासना से मुक्ति पाना ही वास्तविक मोक्ष है। अपने मन की शुद्धि की जा सके एवं कामनाओं को भावनाओं में परिणित किया जा सके तो साधना की दिशा में कदम बढ़ा सकना संभव है। जीवन के साधना के विभिन्न उपचार जिनमें परोपकार व लोकमंगल की अनेकानेक गतिविधियाँ आती हंै—इस दिशा में सहायक होते हैं। मनोयोग से किसी काम को करना जीवन साधना का ही अंग है। ‘वर्क इज वरशिप’ इसी को कहते हैं। सबसे पहले जीवन को सुव्यवथित एवं सुनियोजित बना लें, फिर साधना क्षेत्र में प्रवेश करें। पारिवारिकता का विस्तार, अपने दायरे का फैलाव, अनुदारता का उदारता में परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य की संपन्नता का परिचायक है। पर यह सबके लिए इतना आसान नहीं है।
   
इस प्रकार के कदम उठा सकना केवल उसी के लिये सम्भव है, जो त्याग-तप की दृष्टि से आवश्यक साहस कर सके। लोगों की निन्दा-स्तुति, प्रसन्नता-अप्रसन्नता का विचार किये बिना विवेक, बुद्धि के निर्णय को शिरोधार्य कर सके। यदि वस्तुतः जीवन के सदुपयोग जैसी कुछ वस्तु पानी हो तो हमें साहस करने का अभ्यास प्रशस्त करते हुए दुस्साहसी सिद्ध होने की सीमा तक आगे बढ़ चलना होगा। मनस्वी और तेजस्वी होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
  
इन्द्रिय निग्रह में, तितिक्षाओं के अभ्यास में, साधनाओं से इसी दुस्साहस की साधना की जाती है। अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य व्रत, उपवास, सर्दी-गर्मी सहना, पैदल यात्रा, दान, पुण्य, मौन आदि क्रियाकलाप इसीलिए हैं कि शरीर यात्रा के प्रचलित ढर्रे को तोड़कर आन्तरिक इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए शरीर तथा मन को विवश किया जाए। मनोबल बढ़ाने के लिए ही तपश्चर्यायें विनिर्मित की गई हैं। मनोबल और साहस एक ही गुण के दो नाम हैं। मन को वश में करना एकाग्रता के अर्थ में नहीं माना जाना चाहिए। एकाग्रता बहुत छोटी चीज है। मन को वश में करने का अर्थ है—आकांक्षाओं को भौतिक प्रवृत्तियों से मोड़कर आत्मिक उद्देश्योंं में नियोजित करना। इसी प्रकार आत्मबल संपन्न होने का अर्थ है—आदर्शवाद के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकने का शौर्य।  हमें मनस्वी और आत्मबल संपन्न होना चाहिये। आदर्शवाद के लिए तप और त्याग कर सकने का साहस अपने भीतर अधिकाधिक मात्रा में जुटाना चाहिए। तभी हमारा कारण शरीर परिपुष्ट होगा और उससे देवत्व के जागरण की सम्भावना बढ़ेगी। कहना न होगा इस लक्ष्य की आपूर्ति की साधना मानसिक परिशोधन के साथ आरंभ करनी है। मलीनताओं के आवरण से ढके मन के परिष्कार के लिए तप और तितिक्षा का मार्ग अपनाना पड़ता है। पवित्र मन को देवता मानकर अभ्यर्थना की गयी है। कुसंस्कारी मन को पतन-पराभव का कारण माना गया है। मनुष्य की प्रगति अथवा अवगति में मन की ही प्रमुख भूमिका होती है। गीताकार इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहता है—
  
अर्थात् मन मनुष्य के बन्धन अथवा मोक्ष का साधन है। यह बन्धन और मुक्ति और कुछ नहीं मानसिक व्यापार की प्रतिक्रियाएँ मात्र हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे अनेकानेक विकारों से ग्रस्त मन ही बन्धन है। जब वह निर्विकार, निस्पृह और आसक्ति के बन्धनों से रहित होता है तो मुक्ति का साधन बन जाता है। अपने जीवन काल में ही मानसिक स्थिति के अनुरूप बन्धन-मुक्ति का अनुभव किया जा सकता है और आन्तरिक विकारों के बन्धनों से निकलने तथा मुक्ति के दिव्य आनन्द का रसास्वादन करने के लिए मानसिक परिशोधन का आध्यात्मिक पुरूषार्थ करने का साहस जुटाना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Immeasurable Power of Truth

You should speak truth, think truthfully and make your character, your actions, your behavior shine with the glow of truth. This will endow you with immense power, which will be stronger than any other force or power of the world. Confucius used to say that ‘truth contains the force of thousand elephants’.

Indeed the force of truth is immeasurable. It can’t be compared with any other force of the world. The wisest, strongest, truly dignified, is the one, who is honest to the soul, whose conduct is pure as per the guidance of the inner self, who has discarded falsehood, show-off, artificialness in all respects. He won’t have any fear, any worries.

On the contrary, those who are dishonest, manipulative or cunning, they remain trapped in some hidden fear and suspicion all the time. Power of wealth, might, power of people’s support, power of intellect, many kinds of powers are there in the world, but none stands before the power of truth. A truthful person is so powerful that even the gods of heavens bow before him.

📖  Akhand Jyoti, Nov. 1945

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026

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