शनिवार, 17 दिसंबर 2016
👉 सतयुग की वापसी (भाग 13) 18 Dec
🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें
🔴 संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता इन दिनों ऐसे उन्माद के रूप में लोकमानस पर छाई हुई है कि उसके कारण धन ही स्वार्थ सिद्धि का आधार प्रतीत होता है। ऐसी दशा में यदि उलटा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?
🔵 मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीरचर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरान्त, प्रकृति के सुझाए उन कार्यों में लग जाते हैं जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो, पर विश्व व्यवस्था के सुनियोजन में कुछ तो योगदान मिलता ही है। संग्रह किसी को भी अभीष्ट नहीं, उपभोग में अति कोई नहीं बरतता। सिंह, व्याघ्र तक जब भरे पेट होते हैं तो समीप में ही चरने वाले छोटे जानवरों के साथ भी छेड़खानी नहीं करते।
🔴 मनुष्य का दरजा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे। उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं। उसे संयम साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़े।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता इन दिनों ऐसे उन्माद के रूप में लोकमानस पर छाई हुई है कि उसके कारण धन ही स्वार्थ सिद्धि का आधार प्रतीत होता है। ऐसी दशा में यदि उलटा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?
🔵 मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीरचर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरान्त, प्रकृति के सुझाए उन कार्यों में लग जाते हैं जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो, पर विश्व व्यवस्था के सुनियोजन में कुछ तो योगदान मिलता ही है। संग्रह किसी को भी अभीष्ट नहीं, उपभोग में अति कोई नहीं बरतता। सिंह, व्याघ्र तक जब भरे पेट होते हैं तो समीप में ही चरने वाले छोटे जानवरों के साथ भी छेड़खानी नहीं करते।
🔴 मनुष्य का दरजा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे। उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं। उसे संयम साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़े।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 37)
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 कुछ लोग बोझिल मन से परेशान रहते हैं, ऐसे लोगों को प्रसन्न रहने की कला सीखनी चाहिए। यह अभ्यास करने के लिए आज और अभी से तैयार हुआ जा सकता है। दैनिक जीवन में जिससे भेंट हो उससे यदि मुस्कराते हुए मिला जाय तो बदले में सामने वाला भी मुस्कराहट भेंट करेगा। उसे हल्की-फुल्की बात करने में झिझक नहीं महसूस होगी और इस तरह अपने मन का भारीपन काफी दूर होगा।
🔴 अगर कोई चेहरे पर चौबीसों घण्टे गमगीनी लादे रहे तो धीरे-धीरे उसके सहयोगियों की संख्या घटती चली जाती है। यदि प्रतिक्षण प्रसन्नता बांटते रहने का न्यूनतम संकल्प शुरू किया जाय तो थोड़े दिनों के प्रयास से ही आशातीत परिणाम मिलने लगेंगे।
🔵 डेल कार्नेगी कहते थे कि भूतकाल पर विचार मत करो, क्योंकि अब वह फिर कभी लौटकर आने वाला नहीं है। इसी प्रकार भविष्य के बारे में साधारण अनुमान लगाने के अतिरिक्त बहुत चिन्तित एवं आवेशग्रस्त होना व्यर्थ है। क्योंकि कोई नहीं जानता कि परिस्थितियों के कारण वह न जाने किस ओर करवट ले। हमें सिर्फ वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए और वही करना चाहिए जो आज की परिस्थितियों में सर्वोत्तम ढंग से किया जा सकता है। हमारी आशा कुछ भी क्यों न हो प्रसन्नता के केन्द्र वर्तमान के प्रति जागरूकता बरतना और सर्वोत्तम ढंग से निर्वाह करना ही होना चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 कुछ लोग बोझिल मन से परेशान रहते हैं, ऐसे लोगों को प्रसन्न रहने की कला सीखनी चाहिए। यह अभ्यास करने के लिए आज और अभी से तैयार हुआ जा सकता है। दैनिक जीवन में जिससे भेंट हो उससे यदि मुस्कराते हुए मिला जाय तो बदले में सामने वाला भी मुस्कराहट भेंट करेगा। उसे हल्की-फुल्की बात करने में झिझक नहीं महसूस होगी और इस तरह अपने मन का भारीपन काफी दूर होगा।
🔴 अगर कोई चेहरे पर चौबीसों घण्टे गमगीनी लादे रहे तो धीरे-धीरे उसके सहयोगियों की संख्या घटती चली जाती है। यदि प्रतिक्षण प्रसन्नता बांटते रहने का न्यूनतम संकल्प शुरू किया जाय तो थोड़े दिनों के प्रयास से ही आशातीत परिणाम मिलने लगेंगे।
🔵 डेल कार्नेगी कहते थे कि भूतकाल पर विचार मत करो, क्योंकि अब वह फिर कभी लौटकर आने वाला नहीं है। इसी प्रकार भविष्य के बारे में साधारण अनुमान लगाने के अतिरिक्त बहुत चिन्तित एवं आवेशग्रस्त होना व्यर्थ है। क्योंकि कोई नहीं जानता कि परिस्थितियों के कारण वह न जाने किस ओर करवट ले। हमें सिर्फ वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए और वही करना चाहिए जो आज की परिस्थितियों में सर्वोत्तम ढंग से किया जा सकता है। हमारी आशा कुछ भी क्यों न हो प्रसन्नता के केन्द्र वर्तमान के प्रति जागरूकता बरतना और सर्वोत्तम ढंग से निर्वाह करना ही होना चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गृहस्थ-योग (भाग 37) 18 Dec
🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 परमार्थ का यह कार्य अनेक रीतियों से किया जाता है। उन रीतियों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रीति यह भी है कि मनुष्यों में सत् तत्व की वृद्धि की जाय। यही रीति सर्वोपरि है। किसी को अन्न जल वस्त्र आदि दान देने की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों को उत्तम बना देना अनेक गुना पुण्य है। कारण यह है कि जो व्यक्ति सद्गुणी, सदाचारी और सद्भावी बन जाता है वह सुगन्धित पुष्प की भांति जीवन भर हर घड़ी समीपवर्ती लोगों को शांति प्रदान किया जाता है।
🔴 सज्जन पुरुष एक प्रकार का जीवित और चलता फिरता सदावर्त है जो प्रति दिन प्रचुर परिणाम के आत्मिक भोजन देकर अनेक व्यक्तियों को सच्चा प्राण दान देता है। दस हजार सदावर्त या जलाशय स्थापित करने की अपेक्षा एक पुण्यात्मा मनुष्य तैयार कर देना अधिक सुफल प्रदान करने वाला है।
🔵 अपने परिवार में यदि अच्छी भावना और विचारधारा ओत प्रोत कर दी जाय तो कुटुम्बियों के स्वभाव और चरित्र में सात्विकता की वृद्धि होगी और फिर उसके द्वारा अनेक लोगों को पथ-प्रदर्शन मिलेगा। एक पेड़ के बीज अनेकों नये पौधे उत्पन्न करते हैं और फिर उन नये पौधों को बीज और नये नये पेड़ उपजाते हैं, एक से दस, दस से सौ, सौ से हजार, इस प्रकार यह श्रृंखला फैलती है और आगे निरन्तर बढ़ती ही रहती है। इस प्रकार यदि सत स्वभाव के चार मनुष्य बना दिये गये तो उनका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हजारों लाखों मनुष्यों पर पड़ता है।
🔴 हरिश्चन्द्र, शिव, दधीचि, शिवाजी, राणाप्रताप आदि की तरह कोई कोई तो ऐसे निकल आते हैं, जिनका शरीर मर जाने पर भी ‘यश शरीर’ जीवित रहता है और लाखों करोड़ों वर्ष तक वह यश शरीर संसार में धर्म भावना का संचार करता रहता है। मनुष्य को सात्विक, उच्च, महान बनाना इतना महान् पुण्य कार्य है जिसकी ईंट पत्थर से बनने वाले छोटे छोटे कार्यों से कोई तुलना नहीं की जा सकती।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
🔵 परमार्थ का यह कार्य अनेक रीतियों से किया जाता है। उन रीतियों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रीति यह भी है कि मनुष्यों में सत् तत्व की वृद्धि की जाय। यही रीति सर्वोपरि है। किसी को अन्न जल वस्त्र आदि दान देने की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों को उत्तम बना देना अनेक गुना पुण्य है। कारण यह है कि जो व्यक्ति सद्गुणी, सदाचारी और सद्भावी बन जाता है वह सुगन्धित पुष्प की भांति जीवन भर हर घड़ी समीपवर्ती लोगों को शांति प्रदान किया जाता है।
🔴 सज्जन पुरुष एक प्रकार का जीवित और चलता फिरता सदावर्त है जो प्रति दिन प्रचुर परिणाम के आत्मिक भोजन देकर अनेक व्यक्तियों को सच्चा प्राण दान देता है। दस हजार सदावर्त या जलाशय स्थापित करने की अपेक्षा एक पुण्यात्मा मनुष्य तैयार कर देना अधिक सुफल प्रदान करने वाला है।
🔵 अपने परिवार में यदि अच्छी भावना और विचारधारा ओत प्रोत कर दी जाय तो कुटुम्बियों के स्वभाव और चरित्र में सात्विकता की वृद्धि होगी और फिर उसके द्वारा अनेक लोगों को पथ-प्रदर्शन मिलेगा। एक पेड़ के बीज अनेकों नये पौधे उत्पन्न करते हैं और फिर उन नये पौधों को बीज और नये नये पेड़ उपजाते हैं, एक से दस, दस से सौ, सौ से हजार, इस प्रकार यह श्रृंखला फैलती है और आगे निरन्तर बढ़ती ही रहती है। इस प्रकार यदि सत स्वभाव के चार मनुष्य बना दिये गये तो उनका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हजारों लाखों मनुष्यों पर पड़ता है।
🔴 हरिश्चन्द्र, शिव, दधीचि, शिवाजी, राणाप्रताप आदि की तरह कोई कोई तो ऐसे निकल आते हैं, जिनका शरीर मर जाने पर भी ‘यश शरीर’ जीवित रहता है और लाखों करोड़ों वर्ष तक वह यश शरीर संसार में धर्म भावना का संचार करता रहता है। मनुष्य को सात्विक, उच्च, महान बनाना इतना महान् पुण्य कार्य है जिसकी ईंट पत्थर से बनने वाले छोटे छोटे कार्यों से कोई तुलना नहीं की जा सकती।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 50)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 72. चित्रकला का उपयोग— सजावट की दृष्टि से चित्रों का प्रचलन अब बहुत बढ़ गया है। कमरों में, पुस्तकों में, पत्र पत्रिकाओं में, दुकानों पर, कलेण्डरों में, विज्ञापनों में सर्वत्र चित्रों का बाहुल्य रहता है। इनमें से अधिकांश कुरुचिपूर्ण, गन्दे, अश्लील, किम्वदन्तियों पर आधारित, निरर्थक एवं प्रेरणाहीन पाये जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि महापुरुषों, त्यागियों, लोग सेवियों और आदर्श चरित्र व्यक्तियों के तथा प्रेरणाप्रद घटनाओं के चित्रों का बाहुल्य हो और उन्हें देखकर मन पर श्रेष्ठता जागृत करने वाले संस्कार पड़ें।
🔵 इस परिवर्तन में ऐसे चित्रकारों का सहयोग अभीष्ट होगा जो अपनी कला से जन-मानस में ऊर्ध्वगामी भावनाओं का संचार कर सकें। ऐसे भावपूर्ण चित्र तथा प्रेरणाप्रद आदर्श वाक्यों, सूक्तियों तथा अभिवचनों के अक्षर भी कलापूर्ण ढंग से चित्र जैसे सुन्दर बनाये जा सकते हैं। अनीति के विरोध में व्यंग चित्रों की बड़ी उपयोगिता है। कलाकारों को ऐसे ही चित्र बनाने चाहिए और जन मानस को बदल डालने में महत्वपूर्ण योग-दान देना चाहिए।
🔴 उपरोक्त प्रकार के चित्रों का प्रकाशन व्यवसाय बड़े पैमाने पर आरम्भ करके और उन्हें अधिक सस्ता एवं अधिक सुन्दर बनाकर समाज की बड़ी सेवा की जा सकती है। चित्र प्रकाशन जहां एक लाभदायक व्यवसाय है, वहां वह प्रभावोत्पादक भी है। चित्रकारों से चित्र बनवाने, उन्हें छापने, विक्रेताओं के पास पहुंचाने, बेचने के काम में अनेक व्यक्तियों को रोटी भी मिल सकती है। इस व्यवसाय के आरम्भ करने वाले कितने ही आदमियों को रोटी देने, समाज में भावनाएं जागृत करने एवं अपना लाभ कमाने का श्रेयस्कर व्यापार कर सकते हैं। साहित्य की ही भांति जन भावनाओं के जागृत करने में चित्रकला भी उपयोगी है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 72. चित्रकला का उपयोग— सजावट की दृष्टि से चित्रों का प्रचलन अब बहुत बढ़ गया है। कमरों में, पुस्तकों में, पत्र पत्रिकाओं में, दुकानों पर, कलेण्डरों में, विज्ञापनों में सर्वत्र चित्रों का बाहुल्य रहता है। इनमें से अधिकांश कुरुचिपूर्ण, गन्दे, अश्लील, किम्वदन्तियों पर आधारित, निरर्थक एवं प्रेरणाहीन पाये जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि महापुरुषों, त्यागियों, लोग सेवियों और आदर्श चरित्र व्यक्तियों के तथा प्रेरणाप्रद घटनाओं के चित्रों का बाहुल्य हो और उन्हें देखकर मन पर श्रेष्ठता जागृत करने वाले संस्कार पड़ें।
🔵 इस परिवर्तन में ऐसे चित्रकारों का सहयोग अभीष्ट होगा जो अपनी कला से जन-मानस में ऊर्ध्वगामी भावनाओं का संचार कर सकें। ऐसे भावपूर्ण चित्र तथा प्रेरणाप्रद आदर्श वाक्यों, सूक्तियों तथा अभिवचनों के अक्षर भी कलापूर्ण ढंग से चित्र जैसे सुन्दर बनाये जा सकते हैं। अनीति के विरोध में व्यंग चित्रों की बड़ी उपयोगिता है। कलाकारों को ऐसे ही चित्र बनाने चाहिए और जन मानस को बदल डालने में महत्वपूर्ण योग-दान देना चाहिए।
🔴 उपरोक्त प्रकार के चित्रों का प्रकाशन व्यवसाय बड़े पैमाने पर आरम्भ करके और उन्हें अधिक सस्ता एवं अधिक सुन्दर बनाकर समाज की बड़ी सेवा की जा सकती है। चित्र प्रकाशन जहां एक लाभदायक व्यवसाय है, वहां वह प्रभावोत्पादक भी है। चित्रकारों से चित्र बनवाने, उन्हें छापने, विक्रेताओं के पास पहुंचाने, बेचने के काम में अनेक व्यक्तियों को रोटी भी मिल सकती है। इस व्यवसाय के आरम्भ करने वाले कितने ही आदमियों को रोटी देने, समाज में भावनाएं जागृत करने एवं अपना लाभ कमाने का श्रेयस्कर व्यापार कर सकते हैं। साहित्य की ही भांति जन भावनाओं के जागृत करने में चित्रकला भी उपयोगी है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 19)
🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ
🔵 आप दुःखों से डरिए मत, घबराइए मत, काँपिए मत, उन्हें देखकर चिंतित या व्याकुल मत हूजिए वरन् उन्हें सहन करने को तैयार रहिए। कटुभाषी किंतु सच्चे सहृदय मित्र की तरह उससे भुजा पसारकर मिलिए। वह कटु शब्द बोलता है, अप्रिय समालोचना करता है, तो भी जब जाता है तो बहुत सा माल खजाना उपहार स्वरूप दे जाता है। बहादुर सिपाही की तरह सीना खोलकर खड़े हो जाइए और कहिए कि ‘ऐ आने वाले दुःखो! आओ!! ऐ मेरे बालकों, चले आओ!! मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है, मैं ही तुम्हें अपनी छाती से लगाऊँगा।
🔴 दुराचारिणी वेश्या की तरह तुम्हें जार पुत्र समझकर छिपाना या भगाना नहीं चाहता वरन् सती साध्वी के धर्मपुत्र की तरह तुम मेरे आँचल में सहर्ष क्रीड़ा करो। मैं कायर नहीं हूँ, जो तुम्हें देखकर रोऊँ, मैं नपुंसक नहीं हूँ, जो तुम्हारा भार उठाने से गिड़गिड़ाऊँ, मैं मिथ्याचारी नहीं हूँ, जो अपने किए हुए कर्म फल भोगने से मुँह छिपाता फिरूँ। मैं सत्य हूँ, शिव हूँ, सुंदर हूँ, आओ मेरे अज्ञान के कुरूप मानस पुत्रो! चले आओ! मेरी कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है। मैं शूरवीर हूँ, इसलिए हे कष्टो! तुम्हें स्वीकार करने से मुँह नहीं छिपाता और न तुमसे बचने के लिए किसी से सहायता चाहता हूँ। तुम मेरे साहस की परीक्षा लेने आए हो, मैं तैयार हूँ, देखो गिड़गिड़ाता नहीं हूँ, साहसपूर्वक तुम्हें स्वीकार करने के लिए छाती खोले खड़ा हूँ।
🔵 खबरदार! ऐसा मत कहना कि ‘यह संसार बुरा है, दुष्ट है, पापी है, दुःखमय है, ईश्वर की पुण्य कृति, जिसके कण-कण में उसने कारीगरी भर दी है, कदापि बुरी नहीं हो सकती। सृष्टि पर दोषारोपण करना, तो उसके कर्त्ता पर आक्षेप करना होगा। ‘‘यह घड़ा बहुत बुरा बना है’’ इसका अर्थ है कुम्हार को नालायक बताना। आपका पिता इतना नालायक नहीं है, जितना कि आप ‘‘दुनियाँ दुःखमय है’’ यह शब्द कहकर उसकी प्रतिष्ठा पर लाँछान लगाते हैं। ईश्वर की पुण्य भूमि में दुःख का एक अणु भी नहीं है। हमारा अज्ञान ही हमारे लिए दुःख है। आइए, अपने अंदर के समस्त कुविचारों और दुर्गुणों को धोकर अंतःकरण को पवित्र कर लें, जिससे दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति हो जाए और हम परम पद को प्राप्त कर सकें।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.3
🔵 आप दुःखों से डरिए मत, घबराइए मत, काँपिए मत, उन्हें देखकर चिंतित या व्याकुल मत हूजिए वरन् उन्हें सहन करने को तैयार रहिए। कटुभाषी किंतु सच्चे सहृदय मित्र की तरह उससे भुजा पसारकर मिलिए। वह कटु शब्द बोलता है, अप्रिय समालोचना करता है, तो भी जब जाता है तो बहुत सा माल खजाना उपहार स्वरूप दे जाता है। बहादुर सिपाही की तरह सीना खोलकर खड़े हो जाइए और कहिए कि ‘ऐ आने वाले दुःखो! आओ!! ऐ मेरे बालकों, चले आओ!! मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है, मैं ही तुम्हें अपनी छाती से लगाऊँगा।
🔴 दुराचारिणी वेश्या की तरह तुम्हें जार पुत्र समझकर छिपाना या भगाना नहीं चाहता वरन् सती साध्वी के धर्मपुत्र की तरह तुम मेरे आँचल में सहर्ष क्रीड़ा करो। मैं कायर नहीं हूँ, जो तुम्हें देखकर रोऊँ, मैं नपुंसक नहीं हूँ, जो तुम्हारा भार उठाने से गिड़गिड़ाऊँ, मैं मिथ्याचारी नहीं हूँ, जो अपने किए हुए कर्म फल भोगने से मुँह छिपाता फिरूँ। मैं सत्य हूँ, शिव हूँ, सुंदर हूँ, आओ मेरे अज्ञान के कुरूप मानस पुत्रो! चले आओ! मेरी कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है। मैं शूरवीर हूँ, इसलिए हे कष्टो! तुम्हें स्वीकार करने से मुँह नहीं छिपाता और न तुमसे बचने के लिए किसी से सहायता चाहता हूँ। तुम मेरे साहस की परीक्षा लेने आए हो, मैं तैयार हूँ, देखो गिड़गिड़ाता नहीं हूँ, साहसपूर्वक तुम्हें स्वीकार करने के लिए छाती खोले खड़ा हूँ।
🔵 खबरदार! ऐसा मत कहना कि ‘यह संसार बुरा है, दुष्ट है, पापी है, दुःखमय है, ईश्वर की पुण्य कृति, जिसके कण-कण में उसने कारीगरी भर दी है, कदापि बुरी नहीं हो सकती। सृष्टि पर दोषारोपण करना, तो उसके कर्त्ता पर आक्षेप करना होगा। ‘‘यह घड़ा बहुत बुरा बना है’’ इसका अर्थ है कुम्हार को नालायक बताना। आपका पिता इतना नालायक नहीं है, जितना कि आप ‘‘दुनियाँ दुःखमय है’’ यह शब्द कहकर उसकी प्रतिष्ठा पर लाँछान लगाते हैं। ईश्वर की पुण्य भूमि में दुःख का एक अणु भी नहीं है। हमारा अज्ञान ही हमारे लिए दुःख है। आइए, अपने अंदर के समस्त कुविचारों और दुर्गुणों को धोकर अंतःकरण को पवित्र कर लें, जिससे दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति हो जाए और हम परम पद को प्राप्त कर सकें।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.3
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016
👉 सतयुग की वापसी (भाग 12) 17 Dec
🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें
🔴 शरीर और उनकी शक्तियों के भले-बुरे पराक्रम आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की जय-जयकार होती है, पर साथ ही यह भी मानना ही पड़ेगा कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किए हैं जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है।
🔵 इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है-भाव-संवेदना यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। जब यह अन्त:करण के साथ जुड़ती है तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। वह भौतिक आकर्षणों, प्रलोभनों एवं दबावों से स्वयं को बचा लेने की भी पूरी-पूरी क्षमता रखती है। इस एक के आधार पर ही साधक में अनेकानेक दैवी तत्त्व भरते चले जाते हैं।
🔴 युग परिवर्तन के आधार को यदि एक शब्द में व्यक्त करना हो तो इतना कहने भर से भी काम चल सकता है कि अगले दिनों निष्ठुर स्वार्थपरता को निरस्त करके उसके स्थान पर उदार भाव-संवेदनाओं को अन्त:करण की गहराई में प्रतिष्ठित करने की, उभारने की, खोद निकालने की अथवा बाहर से सराबोर कर देने की आवश्यकता पड़ेगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 शरीर और उनकी शक्तियों के भले-बुरे पराक्रम आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की जय-जयकार होती है, पर साथ ही यह भी मानना ही पड़ेगा कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किए हैं जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है।
🔵 इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है-भाव-संवेदना यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। जब यह अन्त:करण के साथ जुड़ती है तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। वह भौतिक आकर्षणों, प्रलोभनों एवं दबावों से स्वयं को बचा लेने की भी पूरी-पूरी क्षमता रखती है। इस एक के आधार पर ही साधक में अनेकानेक दैवी तत्त्व भरते चले जाते हैं।
🔴 युग परिवर्तन के आधार को यदि एक शब्द में व्यक्त करना हो तो इतना कहने भर से भी काम चल सकता है कि अगले दिनों निष्ठुर स्वार्थपरता को निरस्त करके उसके स्थान पर उदार भाव-संवेदनाओं को अन्त:करण की गहराई में प्रतिष्ठित करने की, उभारने की, खोद निकालने की अथवा बाहर से सराबोर कर देने की आवश्यकता पड़ेगी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 36) 17 Dec
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 यहां शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की अवहेलना करने अथवा उन्हें नगण्य बताने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने का आशय केवल इतना है कि स्वस्थ शरीर का सदुपयोग जिस मनस्विता के आधार पर सम्भव होता है—उसके विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, मनःस्थिति हल्की-फुल्की रहनी चाहिए।
🔴 प्रसन्नचित्त रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। उदासीन रहने वालों की अपेक्षा खुशमिज़ाज लोग अक्सर अधिक स्वस्थ, उत्साही और स्फूर्तिवान् पाये जाते हैं। गीताकार ने प्रसन्नता को महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सद्गुण माना है और कहा है कि प्रसन्न चित्त लोगों को उद्विग्नता नहीं सताती एवं उन्हें जीवन में दुःख भी कभी सताते नहीं।
🔵 अकारण भय, आशंका, क्रोध, दुश्चिन्ता आदि की गणना मानसिक रोगों में की जाती है। जिस प्रकार शारीरिक रुग्णता का लक्षण मुख-मण्डल पर दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार मन की रुग्णता भी चेहरे पर झलकती है। मनोविज्ञानी डा. लिली एलन के अनुसार ‘मुस्कान वह दवा है जो इन रोगों के निशान आपके चेहरे से ही नहीं उड़ा देगी वरन् इन रोगों की जड़ भी आपके अन्तः से निकाल देगी।’
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 यहां शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की अवहेलना करने अथवा उन्हें नगण्य बताने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने का आशय केवल इतना है कि स्वस्थ शरीर का सदुपयोग जिस मनस्विता के आधार पर सम्भव होता है—उसके विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, मनःस्थिति हल्की-फुल्की रहनी चाहिए।
🔴 प्रसन्नचित्त रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। उदासीन रहने वालों की अपेक्षा खुशमिज़ाज लोग अक्सर अधिक स्वस्थ, उत्साही और स्फूर्तिवान् पाये जाते हैं। गीताकार ने प्रसन्नता को महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सद्गुण माना है और कहा है कि प्रसन्न चित्त लोगों को उद्विग्नता नहीं सताती एवं उन्हें जीवन में दुःख भी कभी सताते नहीं।
🔵 अकारण भय, आशंका, क्रोध, दुश्चिन्ता आदि की गणना मानसिक रोगों में की जाती है। जिस प्रकार शारीरिक रुग्णता का लक्षण मुख-मण्डल पर दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार मन की रुग्णता भी चेहरे पर झलकती है। मनोविज्ञानी डा. लिली एलन के अनुसार ‘मुस्कान वह दवा है जो इन रोगों के निशान आपके चेहरे से ही नहीं उड़ा देगी वरन् इन रोगों की जड़ भी आपके अन्तः से निकाल देगी।’
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गृहस्थ-योग (भाग 36) 17 Dec
🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 यह लोग मेरे आत्म त्याग की कद्र करते हैं या नहीं? इन प्रश्नों को मन में कभी प्रवेश न करने देना चाहिए। वरन् सदा यह सोचना चाहिए कि एक ईमानदार माली की तरह मैं अपनी वाटिका को सुरभित बनाने में शक्ति भर प्रयत्न कर रहा हूं या नहीं? अपनी योग्यता और सामर्थ्य में से कुछ चुराता तो नहीं हूं? मेरी निस्वार्थता और निष्पक्षता में किसी प्रकार की कमी तो नहीं आ रही है? कर्तव्य पालन में किसी प्रकार का आलस्य प्रमाद तो नहीं हो रहा है? यदि इन प्रश्नों का सन्तोष जनक, उत्तर मिलता हो तो यह बड़ी ही आनन्ददायक और शान्तिप्रद बात समझी जानी चाहिये।
🔴 प्रशंसा होती है या नहीं? कोई अहसान मिलता है या नहीं? सफलता मिलती है या नहीं? ऐसे प्रश्नों का लेखा लेना अपनी साधना को चौपट करना है। इन प्रश्नों का सन्तोषजनक या असन्तोषजनक उत्तर देना दूसरों के हाथ की बात है। साधक को अपनी प्रसन्नता दूसरों के हाथ नहीं बेचनी चाहिए? दूसरों के कुछ देने से प्रसन्नता मिले, यह एक कंगाली की स्थिति है। हमें आनन्द का स्रोत अपनी आत्मा में ढूंढ़ना चाहिये। यदि ठीक प्रकार कर्तव्य का पालन किया गया हो तो इससे अधिक आनन्ददायक दुनियां की और कोई बात नहीं हो सकती।
🔵 संसार की सुख शान्ति में वृद्धि करना यही तो परमार्थ का लक्षण है। प्याऊ, धर्मशाला, कुंआ, तालाब, बावड़ी, बगीचा, सड़क, पाठशाला, औषधालय आदि का निर्माण करने वाले धर्मात्मा लोग इन कार्यों द्वारा दूसरे लोगों के कष्ट निवारण और सुख में वृद्धि करना चाहते हैं। अनेक प्रकार की संस्थाओं के स्थापन और संचालन का भी यही उद्देश्य है। महात्मा, त्यागी, वैरागी, तपस्वी, देशभक्त, लोक सेवक, परोपकारी सत्पुरुषों की साधना भी इसी उद्देश्य के लिये होती है। शास्त्रकारों ने विश्व की सुख शान्ति बढ़ाने वाले कार्यों का करना ही धर्म तथा ईश्वर प्राणिधान बताया है और कहा है कि ऐसे कार्यों से ही मनुष्य को लोक परलोक में पुण्यफल प्राप्त होता है।
🔵 यह लोग मेरे आत्म त्याग की कद्र करते हैं या नहीं? इन प्रश्नों को मन में कभी प्रवेश न करने देना चाहिए। वरन् सदा यह सोचना चाहिए कि एक ईमानदार माली की तरह मैं अपनी वाटिका को सुरभित बनाने में शक्ति भर प्रयत्न कर रहा हूं या नहीं? अपनी योग्यता और सामर्थ्य में से कुछ चुराता तो नहीं हूं? मेरी निस्वार्थता और निष्पक्षता में किसी प्रकार की कमी तो नहीं आ रही है? कर्तव्य पालन में किसी प्रकार का आलस्य प्रमाद तो नहीं हो रहा है? यदि इन प्रश्नों का सन्तोष जनक, उत्तर मिलता हो तो यह बड़ी ही आनन्ददायक और शान्तिप्रद बात समझी जानी चाहिये।
🔴 प्रशंसा होती है या नहीं? कोई अहसान मिलता है या नहीं? सफलता मिलती है या नहीं? ऐसे प्रश्नों का लेखा लेना अपनी साधना को चौपट करना है। इन प्रश्नों का सन्तोषजनक या असन्तोषजनक उत्तर देना दूसरों के हाथ की बात है। साधक को अपनी प्रसन्नता दूसरों के हाथ नहीं बेचनी चाहिए? दूसरों के कुछ देने से प्रसन्नता मिले, यह एक कंगाली की स्थिति है। हमें आनन्द का स्रोत अपनी आत्मा में ढूंढ़ना चाहिये। यदि ठीक प्रकार कर्तव्य का पालन किया गया हो तो इससे अधिक आनन्ददायक दुनियां की और कोई बात नहीं हो सकती।
🔵 संसार की सुख शान्ति में वृद्धि करना यही तो परमार्थ का लक्षण है। प्याऊ, धर्मशाला, कुंआ, तालाब, बावड़ी, बगीचा, सड़क, पाठशाला, औषधालय आदि का निर्माण करने वाले धर्मात्मा लोग इन कार्यों द्वारा दूसरे लोगों के कष्ट निवारण और सुख में वृद्धि करना चाहते हैं। अनेक प्रकार की संस्थाओं के स्थापन और संचालन का भी यही उद्देश्य है। महात्मा, त्यागी, वैरागी, तपस्वी, देशभक्त, लोक सेवक, परोपकारी सत्पुरुषों की साधना भी इसी उद्देश्य के लिये होती है। शास्त्रकारों ने विश्व की सुख शान्ति बढ़ाने वाले कार्यों का करना ही धर्म तथा ईश्वर प्राणिधान बताया है और कहा है कि ऐसे कार्यों से ही मनुष्य को लोक परलोक में पुण्यफल प्राप्त होता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 49)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 70. गायकों का संगठन— भाषण की भांति ही गायन का भी महत्व है। विधिवत् गाया हुआ गायन मनुष्य के हृदय को पुलकित कर देता है। भावनाओं को तरंगित करने की उतनी ही शक्ति गायन में रहती है, जितनी विचारों को बदलने की भाषण में रहती है। गायकों को संगठित करना चाहिए और उन्हें युग-निर्माण भावनाओं के अनुरूप कविताएं सीखने तथा गाने की प्रेरणा देनी चाहिए।
🔵 जहां-तहां भजन मण्डलियां और कीर्तन मण्डलियां अपने बिखरे रूप में पाई जाती हैं, उन्हें संगठित करना अभीष्ट होगा। व्यक्तिगत रूप से जो लोग गाया करते हैं, उन्हें भी अपनी कला द्वारा जन-समूह को लाभ पहुंचाने की प्रेरणा करनी चाहिए। सामूहिक संगीत कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर होता रहे और उनमें उत्कर्ष की भावनाओं की प्रधानता रहे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
🔴 71. संगीत शिक्षा का प्रबन्ध— गाने बजाने के क्रमबद्ध शिक्षण की व्यवस्था न होने से ऐसे लोगों की कला अविकसित ही पड़ी रहती है, जिनके गले मधुर हैं और लोगों को प्रभावित करने की प्रतिभा विद्यमान है। साधारण गायन और मामूली बाजे बजाने का शिक्षण कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। उसे मामूली जानकार भी कर सकते हैं। खंजरी, करताल, मजीरा, ढोलक, चिमटा, इकतारा जैसे बाजे लोग बिना किसी के सिखाये—देखा-देखी ही सीख जाते हैं। यदि उनकी व्यवस्थित शिक्षण व्यवस्था हो तो उसका लाभ अनेकों को आसानी से मिल सकता है और नये गायक तथा बजाने वाले पैदा हो सकते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 70. गायकों का संगठन— भाषण की भांति ही गायन का भी महत्व है। विधिवत् गाया हुआ गायन मनुष्य के हृदय को पुलकित कर देता है। भावनाओं को तरंगित करने की उतनी ही शक्ति गायन में रहती है, जितनी विचारों को बदलने की भाषण में रहती है। गायकों को संगठित करना चाहिए और उन्हें युग-निर्माण भावनाओं के अनुरूप कविताएं सीखने तथा गाने की प्रेरणा देनी चाहिए।
🔵 जहां-तहां भजन मण्डलियां और कीर्तन मण्डलियां अपने बिखरे रूप में पाई जाती हैं, उन्हें संगठित करना अभीष्ट होगा। व्यक्तिगत रूप से जो लोग गाया करते हैं, उन्हें भी अपनी कला द्वारा जन-समूह को लाभ पहुंचाने की प्रेरणा करनी चाहिए। सामूहिक संगीत कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर होता रहे और उनमें उत्कर्ष की भावनाओं की प्रधानता रहे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
🔴 71. संगीत शिक्षा का प्रबन्ध— गाने बजाने के क्रमबद्ध शिक्षण की व्यवस्था न होने से ऐसे लोगों की कला अविकसित ही पड़ी रहती है, जिनके गले मधुर हैं और लोगों को प्रभावित करने की प्रतिभा विद्यमान है। साधारण गायन और मामूली बाजे बजाने का शिक्षण कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। उसे मामूली जानकार भी कर सकते हैं। खंजरी, करताल, मजीरा, ढोलक, चिमटा, इकतारा जैसे बाजे लोग बिना किसी के सिखाये—देखा-देखी ही सीख जाते हैं। यदि उनकी व्यवस्थित शिक्षण व्यवस्था हो तो उसका लाभ अनेकों को आसानी से मिल सकता है और नये गायक तथा बजाने वाले पैदा हो सकते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 18)
🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ
(3) क्रियमाणः
🔵 कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया। विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदला मिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहार-विहार करने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है। मजदूर परिश्रम करता है, बदले में उसे पैसे मिल जाते हैं। जिन शारीरिक कर्मों के पीछे कोई मानसिक गुत्थी नहीं होती केवल शरीर द्वारा शरीर के लिए किए जाते हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं। पाठक समझ गए होंगे कि संचित कर्मों का फल मिलना संदिग्ध है यदि अवसर मिलता है, तो वे फलवान होते हैं। नहीं तो विरोधी परिस्थितियों से टकरा कर नष्ट हो जाते हैं।
🔴 प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना निश्चित है, परंतु उसके अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने में कुछ समय लग जाता है। यह समय कितने दिन का होता है, इस सम्बन्ध में कुछ नियम मर्यादा नहीं है, वह आज का आज भी हो सकता है और कुछ जन्मों के अंतर से भी हो सकता है, किंतु प्रारब्ध फल होते वही हैं, जो अचानक घटित हों और जिसमें मनुष्य का कुछ वश न चले। पुरुषार्थ की अवहेलना से जो असफलता मिलती है उसे कदापि प्रारब्ध फल नहीं कहा जा सकता। क्रियमाण तो प्रत्यक्ष हैं ही उनके बारे में ऊपर बता ही दिया गया है कि निश्चित फल वाले शारीरिक कर्म क्रियमाण हुआ करते हैं। इनके फल मिलने में अधिक समय नहीं लगता। इस प्रकार तीन प्रकार के कर्म और उसके फल मिलने की मर्यादा के सम्बन्ध में ऊपर कुछ प्रकाश डाल दिया गया है।
🔵 कष्टों का स्वरूप अप्रिय है, उनका तात्कालिक अनुभव कड़ुआ होता है, अंततः वे जीव के लिए कल्याणकारी और आनंददायक सिद्ध होते हैं। उनसे दुर्गुणों के शोधन और सद्गुणों की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है। आनंदस्वरूप, आत्म प्रकाशमय जीवन और सुखमय संसार में कष्टों का थोड़ा स्वाद परिवर्तन इसलिए लगाया गया है कि प्रगति में बाधा न पड़ने पाए। घड़ी में चाबी भर देने से उसकी चाल फिर ठीक हो जाती है, हारमोनियम में हवा धोंकते रहने से उसके स्वर ठीक तरह बजते हैं। पैडल चलाने से साइकिल ठीक तरह घूमती है, अग्नि की गर्मी से सूखकर भोजन पक जाते हैं। थोड़ा-सा कष्ट भी जीवन की सुख वृद्धि के लिए आवश्यक है। संसार में जो कष्ट है वह इतना ही है और ऐसा ही है, किंतु स्मरण रखिए जितना भी थोड़ा-बहुत दुःख है, वह हमारे अन्याय का, अधर्म का, अनर्थ का फल है। आत्मा दुःख रूप नहीं है, जीवन दुःखमय नहीं हैं और न संसार में ही दुःख है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.2
(3) क्रियमाणः
🔵 कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया। विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदला मिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहार-विहार करने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है। मजदूर परिश्रम करता है, बदले में उसे पैसे मिल जाते हैं। जिन शारीरिक कर्मों के पीछे कोई मानसिक गुत्थी नहीं होती केवल शरीर द्वारा शरीर के लिए किए जाते हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं। पाठक समझ गए होंगे कि संचित कर्मों का फल मिलना संदिग्ध है यदि अवसर मिलता है, तो वे फलवान होते हैं। नहीं तो विरोधी परिस्थितियों से टकरा कर नष्ट हो जाते हैं।
🔴 प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना निश्चित है, परंतु उसके अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने में कुछ समय लग जाता है। यह समय कितने दिन का होता है, इस सम्बन्ध में कुछ नियम मर्यादा नहीं है, वह आज का आज भी हो सकता है और कुछ जन्मों के अंतर से भी हो सकता है, किंतु प्रारब्ध फल होते वही हैं, जो अचानक घटित हों और जिसमें मनुष्य का कुछ वश न चले। पुरुषार्थ की अवहेलना से जो असफलता मिलती है उसे कदापि प्रारब्ध फल नहीं कहा जा सकता। क्रियमाण तो प्रत्यक्ष हैं ही उनके बारे में ऊपर बता ही दिया गया है कि निश्चित फल वाले शारीरिक कर्म क्रियमाण हुआ करते हैं। इनके फल मिलने में अधिक समय नहीं लगता। इस प्रकार तीन प्रकार के कर्म और उसके फल मिलने की मर्यादा के सम्बन्ध में ऊपर कुछ प्रकाश डाल दिया गया है।
🔵 कष्टों का स्वरूप अप्रिय है, उनका तात्कालिक अनुभव कड़ुआ होता है, अंततः वे जीव के लिए कल्याणकारी और आनंददायक सिद्ध होते हैं। उनसे दुर्गुणों के शोधन और सद्गुणों की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है। आनंदस्वरूप, आत्म प्रकाशमय जीवन और सुखमय संसार में कष्टों का थोड़ा स्वाद परिवर्तन इसलिए लगाया गया है कि प्रगति में बाधा न पड़ने पाए। घड़ी में चाबी भर देने से उसकी चाल फिर ठीक हो जाती है, हारमोनियम में हवा धोंकते रहने से उसके स्वर ठीक तरह बजते हैं। पैडल चलाने से साइकिल ठीक तरह घूमती है, अग्नि की गर्मी से सूखकर भोजन पक जाते हैं। थोड़ा-सा कष्ट भी जीवन की सुख वृद्धि के लिए आवश्यक है। संसार में जो कष्ट है वह इतना ही है और ऐसा ही है, किंतु स्मरण रखिए जितना भी थोड़ा-बहुत दुःख है, वह हमारे अन्याय का, अधर्म का, अनर्थ का फल है। आत्मा दुःख रूप नहीं है, जीवन दुःखमय नहीं हैं और न संसार में ही दुःख है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.2
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 35)
🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 स्वादिष्ट व्यंजन की कल्पना मात्र से मुंह में पानी भर आता है। शोक समाचार पाकर उदासी छा जाती है, चेहरा लटक जाता है। प्रफुल्ल मुखाकृति से आन्तरिक प्रसन्नता का पता चलता है। इस प्रकार अदृश्य होते हुए भी मन की हलचलों का भला और बुरा प्रभाव जीवन में पग-पग पर अनुभव होता है।
🔴 मनुष्य अपने मानस का प्रतिबिम्ब है। मानसिक दशा का स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। नवीनतम शोधों के आधार पर तो यह भी कहा जाने लगा है कि रोग शरीर में नहीं, बल्कि मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। यही कारण है कि उत्तम और समग्र स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है।
🔵 राबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने अंग्रेजी में कई साहसिक उपन्यास लिखे हैं, उन्हें पढ़ने वाले सोचते थे कि लेखक भी योद्धा जैसा दिखने वाला कोई भारी भरकम कद्दावर होगा, जबकि वास्तविकता यह थी कि उनने अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कृतियां रुग्णावस्था में चारपाई पर पड़े हुए लिखीं। शंकराचार्य अपने जीवन के उत्तरार्ध में भगन्दर के मरीज रहे, वैद्य ने उनकी स्थिति को देखते हुए शारीरिक श्रम करने तथा चलने-फिरने की मनाही की थी। परन्तु उस जर्जर काया को लेकर ही उनने चारों धामों की स्थापना, शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय तथा पातंजलि के भाष्य आदि का गुरुत्तर कार्य भी सम्पन्न किया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 स्वादिष्ट व्यंजन की कल्पना मात्र से मुंह में पानी भर आता है। शोक समाचार पाकर उदासी छा जाती है, चेहरा लटक जाता है। प्रफुल्ल मुखाकृति से आन्तरिक प्रसन्नता का पता चलता है। इस प्रकार अदृश्य होते हुए भी मन की हलचलों का भला और बुरा प्रभाव जीवन में पग-पग पर अनुभव होता है।
🔴 मनुष्य अपने मानस का प्रतिबिम्ब है। मानसिक दशा का स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। नवीनतम शोधों के आधार पर तो यह भी कहा जाने लगा है कि रोग शरीर में नहीं, बल्कि मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। यही कारण है कि उत्तम और समग्र स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है।
🔵 राबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने अंग्रेजी में कई साहसिक उपन्यास लिखे हैं, उन्हें पढ़ने वाले सोचते थे कि लेखक भी योद्धा जैसा दिखने वाला कोई भारी भरकम कद्दावर होगा, जबकि वास्तविकता यह थी कि उनने अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कृतियां रुग्णावस्था में चारपाई पर पड़े हुए लिखीं। शंकराचार्य अपने जीवन के उत्तरार्ध में भगन्दर के मरीज रहे, वैद्य ने उनकी स्थिति को देखते हुए शारीरिक श्रम करने तथा चलने-फिरने की मनाही की थी। परन्तु उस जर्जर काया को लेकर ही उनने चारों धामों की स्थापना, शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय तथा पातंजलि के भाष्य आदि का गुरुत्तर कार्य भी सम्पन्न किया।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गृहस्थ-योग (भाग 35) 16 Dec
🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 ऐसी दुखदायी स्थिति उत्पन्न न होने पाये इसके लिये समझौते ही नीति से काम लेना पड़ता है। अपनी मर्जी पर अड़ने, या उसे दूसरों पर बलात् थोपने की अपेक्षा अपने आपको नरम बनना पड़ता है। जिस सीमा तक कोई दुष्परिणाम उपस्थित न होता हो उस सीमा तक समझौता कर लेना चाहिए। यह ठीक है कि घर के लोगों को ठीक मार्ग पर रखना अपना कर्तव्य है। पर यह भी ठीक है कि पूर्ण रूप से किसी को तत्काल इच्छानुवर्ती बना लेना भी सुगम नहीं। थोड़ा झुकने से ही काम चलता है। समझौते की नीति से गुजर होती है।
🔴 सरकस के लिये जानवरों को साधने वाले मास्टर जानते हैं कि उजड़ जंगली जानवरों को रास्ते पर लाने में, इच्छित खेल सिखाने में, कितनी देर लगती है, कितना नरम गरम होना पड़ता है। बिल्कुल कड़ाई और बिल्कुल ढील यह दोनों ही बातें उपयोगी नहीं। बीच के रास्ते से चलना, उदारता और सहनशीलता के आधार पर काम करना ही हितकर होता है इसी आधार पर घर की सुख शान्ति कायम रह सकती है।
🔵 शान्ति, सन्तोष और व्यवस्था कायम रखने का तरीका यह है कि आत्म त्याग की नीति को प्रधानता दी जाय। आप अपना उदाहरण ऐसा रखें, जिसे देखकर घर के अन्य लोगों को भी आत्म-त्याग की प्रेरणा मिले। ‘‘मुझे कम आपको ज्यादा’’ यह भाव जितनी ही प्रधानता प्राप्त करेंगे उतनी ही शान्ति और सुव्यवस्था कायम रहेगी। गृहस्थ योगी को अपने को एक निस्वार्थ, निष्पक्ष एवं सद्भावी सेवक के रूप में घर वालों के सामने उपस्थित करना चाहिए। घर के लोगों से मुझे क्या लाभ मिलता है?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
🔵 ऐसी दुखदायी स्थिति उत्पन्न न होने पाये इसके लिये समझौते ही नीति से काम लेना पड़ता है। अपनी मर्जी पर अड़ने, या उसे दूसरों पर बलात् थोपने की अपेक्षा अपने आपको नरम बनना पड़ता है। जिस सीमा तक कोई दुष्परिणाम उपस्थित न होता हो उस सीमा तक समझौता कर लेना चाहिए। यह ठीक है कि घर के लोगों को ठीक मार्ग पर रखना अपना कर्तव्य है। पर यह भी ठीक है कि पूर्ण रूप से किसी को तत्काल इच्छानुवर्ती बना लेना भी सुगम नहीं। थोड़ा झुकने से ही काम चलता है। समझौते की नीति से गुजर होती है।
🔴 सरकस के लिये जानवरों को साधने वाले मास्टर जानते हैं कि उजड़ जंगली जानवरों को रास्ते पर लाने में, इच्छित खेल सिखाने में, कितनी देर लगती है, कितना नरम गरम होना पड़ता है। बिल्कुल कड़ाई और बिल्कुल ढील यह दोनों ही बातें उपयोगी नहीं। बीच के रास्ते से चलना, उदारता और सहनशीलता के आधार पर काम करना ही हितकर होता है इसी आधार पर घर की सुख शान्ति कायम रह सकती है।
🔵 शान्ति, सन्तोष और व्यवस्था कायम रखने का तरीका यह है कि आत्म त्याग की नीति को प्रधानता दी जाय। आप अपना उदाहरण ऐसा रखें, जिसे देखकर घर के अन्य लोगों को भी आत्म-त्याग की प्रेरणा मिले। ‘‘मुझे कम आपको ज्यादा’’ यह भाव जितनी ही प्रधानता प्राप्त करेंगे उतनी ही शान्ति और सुव्यवस्था कायम रहेगी। गृहस्थ योगी को अपने को एक निस्वार्थ, निष्पक्ष एवं सद्भावी सेवक के रूप में घर वालों के सामने उपस्थित करना चाहिए। घर के लोगों से मुझे क्या लाभ मिलता है?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 48)
🌹 कला और उसका सदुपयोग
🔴 मानव अन्तःकरण को पुलकित एवं भावविभोर करने की क्षमता कला में रहती है। कला का वासना को भड़काने में इन दिनों बड़ा हाथ रहा है। अब इस महान शक्ति को हमें जीवन निर्माण एवं समाज रचना की महान प्रक्रिया में लगाना होगा। कला शाश्वत है। उसमें दोष कुछ नहीं वरन् मानव अन्तःकरण का सीधा स्पर्श करने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण वह आवश्यक है और अभिवन्दनीय है । विरोध का एक मात्र तथ्य है कला का दुरुपयोग, इसे रोका जाना चाहिये और इस सृजनात्मक शक्ति को जन मानस की श्रेष्ठता की ओर प्रेरित करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिए।
इस सन्दर्भ में नीचे आठ सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं—
🔵 69. वक्तृत्व कला विकास— बोलना संसार की सबसे बड़ी कला है। व्यक्तिगत जीवन में जन सहयोग का लाभ प्राप्त करना मुख्यतया मनुष्य के बोलने, बात करने की शैली पर निर्भर है। मीठा बोलने से पराये अपने हो जाते हैं और कटु भाषण से अपने पराये बनते हैं। जीवन की प्रगति में उतनी और कोई बात सहायक नहीं होती जितनी शिष्ट, मधुर, उदार और परिमार्जित वाणी। इसी प्रकार सामाजिक जीवन में सफलता प्राप्त करने का भी बहुत कुछ श्रेय विधिवत् वक्तृता पर ही निर्भर रहता है।
🔴 अपने पक्ष को ठीक प्रतिपादित करने में वही व्यक्ति सफल होता है जिसकी भाषण-शैली परिमार्जित है। युग-निर्माण के लिए प्रधानतया हम सबको इसी शस्त्र का पग-पग पर उपयोग करना पड़ेगा। इसलिए उसका अभ्यस्त भी होना ही चाहिये। व्यक्तिगत वार्तालाप में और जन समूह के सामने भाषण देने में किन तथ्यों का ध्यान रखना और किन बातों का अभ्यास करना आवश्यक है, इसका प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के सदस्यों को विधिवत् मिलना चाहिए। अन्यथा बौद्धिक क्रान्ति का यह विशाल अभियान किस प्रकार व्यापक बन सकेगा?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 मानव अन्तःकरण को पुलकित एवं भावविभोर करने की क्षमता कला में रहती है। कला का वासना को भड़काने में इन दिनों बड़ा हाथ रहा है। अब इस महान शक्ति को हमें जीवन निर्माण एवं समाज रचना की महान प्रक्रिया में लगाना होगा। कला शाश्वत है। उसमें दोष कुछ नहीं वरन् मानव अन्तःकरण का सीधा स्पर्श करने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण वह आवश्यक है और अभिवन्दनीय है । विरोध का एक मात्र तथ्य है कला का दुरुपयोग, इसे रोका जाना चाहिये और इस सृजनात्मक शक्ति को जन मानस की श्रेष्ठता की ओर प्रेरित करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिए।
इस सन्दर्भ में नीचे आठ सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं—
🔵 69. वक्तृत्व कला विकास— बोलना संसार की सबसे बड़ी कला है। व्यक्तिगत जीवन में जन सहयोग का लाभ प्राप्त करना मुख्यतया मनुष्य के बोलने, बात करने की शैली पर निर्भर है। मीठा बोलने से पराये अपने हो जाते हैं और कटु भाषण से अपने पराये बनते हैं। जीवन की प्रगति में उतनी और कोई बात सहायक नहीं होती जितनी शिष्ट, मधुर, उदार और परिमार्जित वाणी। इसी प्रकार सामाजिक जीवन में सफलता प्राप्त करने का भी बहुत कुछ श्रेय विधिवत् वक्तृता पर ही निर्भर रहता है।
🔴 अपने पक्ष को ठीक प्रतिपादित करने में वही व्यक्ति सफल होता है जिसकी भाषण-शैली परिमार्जित है। युग-निर्माण के लिए प्रधानतया हम सबको इसी शस्त्र का पग-पग पर उपयोग करना पड़ेगा। इसलिए उसका अभ्यस्त भी होना ही चाहिये। व्यक्तिगत वार्तालाप में और जन समूह के सामने भाषण देने में किन तथ्यों का ध्यान रखना और किन बातों का अभ्यास करना आवश्यक है, इसका प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के सदस्यों को विधिवत् मिलना चाहिए। अन्यथा बौद्धिक क्रान्ति का यह विशाल अभियान किस प्रकार व्यापक बन सकेगा?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 17)
🌹 कर्मों की तीन श्रेणियाँ
(2) प्रारब्ध
🔵 वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं। इन कार्यों को विशेष मनोयोग के साथ किया जाता है, इसलिए उनका संस्कार भी बहुत बलवान बनता है। हत्या, खून, डकैती, विश्वासघात, चोरी, व्याभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूरकर्मों की प्रतिक्रिया अंतःकरण में बहुत ही तीव्र होती है, उस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता निरंतर व्यग्र बनी रहती है और एक न एक दिन उसे निकाल कर बाहर कर ही देती है।
🔴 हम बता चुके हैं कि हमारी अंतःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता-अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था करती रहती है। चूँकि मानसिक दण्ड अपने आप अंदर ही अंदर पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होती है, दण्ड कार्य को पूरा करने लिए सूक्ष्म लोक में से उसी प्रकार का घटनाक्रम उपस्थित करने के लिए हमारी अंतःचेतना एक वातावरण तैयार करती है। इस तैयारी में कभी बहुत समय भी लग जाता है। जैसे छल स्वभाव के निवारण के लिए शोक रूपी दण्ड की आवश्यकता है। अब यह देखा जाएगा कि छल किस दर्जे का है, उसकी शुद्धि किस दर्जे के शोक से पूरी हो सकती है।
🔵 अंतःचेतना वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा करने में भीतर ही भीतर लगी रहेगी। वह शरीर में ऐसे तत्त्व पैदा करेगी, जिससे पुत्र उत्पन्न हो, उस पुत्र शरीर में ऐसी आत्मा का मेल मिलवाएगी, जिसे अपने कर्मों के अनुसार दस वर्ष ही जीना पर्याप्त हो, दस वर्ष का पुत्र हो जाने पर वही हमारी अंतःचेतना गुप्त रूप से पुत्र पर पिल पड़ेगी और उसे रोगी करके मार डालगी एवं शोक का इच्छित अवसर पैदा कर देगी। ऐसे अवसर तैयार करने में केवल अपना ही कार्य अकेला नहीं होता, वरन् दूसरे पक्ष का भी कार्य होता है। दोनों ओर की चेतनाएँ अपने-अपने लिए अवसर तलाश करती फिरती हैं और फिर जब उन्हें इच्छित जोड़ मिल जाता है, तो एक घटना की ठीक भूमिका बँध जाती है। ऐसे कार्यों में कई बार एक, दो, तीन या कई जन्मों का समय लग जाता है। लड़की के लिए वर और वर के लिए लड़की की तलाश बहुत दिनों तक जारी रहती है, सैकड़ों प्रसंग उठाए जाते हैं, पर कुछ न कुछ कमी होने से वे तय नहीं होते, जब दोनों पक्ष रजामंद हो जाते हैं, तो विवाह जल्द हो जाता है। इसी प्रकार पिता को पुत्र शोक और पुत्र को अल्पायु का संयोग, जब दोनों ही विधान ठीक बैठ जाते हैं, तो वे एकत्रित हो जाते हैं।
🔴 अफ्रीका में वेन्सस नामक एक दस फुट ऊँचा एक झाड़ होता है, इसकी डालियों में से सूत जैसे अंकुर फुटते हैं। यह अंकुर बढते हैं और इधर-उधर हवा में झूलते रहते हैं। दूसरा कोई अंकुर जब उससे छू जाता है, तो वे दोनों आपस में गुँथ जाते हैं और रस्सी की तरह बल डालकर एक हो जाते हैं। जब तक दूसरे अंकुर से भेंट न हो, तब तक सूत बढ़ते ही रहते हैं और कभी न कभी वे किसी न किसी से मिल जाते हैं। कोई सूत तो चार छः अंगुल दूरी पर ही जाकर किसी से मिलकर लिपट जाता है, कोई-कोई चार फुट लंबा होने के बाद सफल होता है। यही हालत कर्मफलों की है। शारीरिक दण्ड एकांगी है विष खाते ही तुरंत मृत्यु हो जाती है, परंतु मानसिक दण्ड में अपवाद है।
🔴 जैसे क्रूरता से प्रेरित होकर किसी की हत्या की गई, वह यदि प्रकट हो गयी तो राज्य द्वारा दण्ड मिल जाएगा, किंतु यदि हत्यारे ने अपना कार्य छिपा लिया तो उसका अंतःकरण तुरंत ही पाप दण्ड न दे बैठेगा, वरन् उसी दिन से वेन्सस पेड़ की तरह अंकुर फोड़कर इस तलाश में फिरेगा कि हिंसा वृत्ति से घृणा कराने के लिए हिंसा में जो दुःख होता है, उसका अनुभव उसे कराऊँ। जब दूसरी ओर का भी कोई अंकुर मिल जाता है, तो दोनों आपस में लिपट कर एक निर्धारित घटना की भूमिका बन जाते हैं। उपरोक्त कारणों से कभी-कभी अचानक सत्कर्म करते हुए भी दुःख उपस्थित हो जाता है और कभी-कभी बुरे काम करते हुए भी दुःख नहीं मिलता, इसका कारण उपयुक्त अवसर तैयार होने में विलम्ब लगना ही होता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.1
(2) प्रारब्ध
🔵 वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं। इन कार्यों को विशेष मनोयोग के साथ किया जाता है, इसलिए उनका संस्कार भी बहुत बलवान बनता है। हत्या, खून, डकैती, विश्वासघात, चोरी, व्याभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूरकर्मों की प्रतिक्रिया अंतःकरण में बहुत ही तीव्र होती है, उस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता निरंतर व्यग्र बनी रहती है और एक न एक दिन उसे निकाल कर बाहर कर ही देती है।
🔴 हम बता चुके हैं कि हमारी अंतःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता-अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था करती रहती है। चूँकि मानसिक दण्ड अपने आप अंदर ही अंदर पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होती है, दण्ड कार्य को पूरा करने लिए सूक्ष्म लोक में से उसी प्रकार का घटनाक्रम उपस्थित करने के लिए हमारी अंतःचेतना एक वातावरण तैयार करती है। इस तैयारी में कभी बहुत समय भी लग जाता है। जैसे छल स्वभाव के निवारण के लिए शोक रूपी दण्ड की आवश्यकता है। अब यह देखा जाएगा कि छल किस दर्जे का है, उसकी शुद्धि किस दर्जे के शोक से पूरी हो सकती है।
🔵 अंतःचेतना वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा करने में भीतर ही भीतर लगी रहेगी। वह शरीर में ऐसे तत्त्व पैदा करेगी, जिससे पुत्र उत्पन्न हो, उस पुत्र शरीर में ऐसी आत्मा का मेल मिलवाएगी, जिसे अपने कर्मों के अनुसार दस वर्ष ही जीना पर्याप्त हो, दस वर्ष का पुत्र हो जाने पर वही हमारी अंतःचेतना गुप्त रूप से पुत्र पर पिल पड़ेगी और उसे रोगी करके मार डालगी एवं शोक का इच्छित अवसर पैदा कर देगी। ऐसे अवसर तैयार करने में केवल अपना ही कार्य अकेला नहीं होता, वरन् दूसरे पक्ष का भी कार्य होता है। दोनों ओर की चेतनाएँ अपने-अपने लिए अवसर तलाश करती फिरती हैं और फिर जब उन्हें इच्छित जोड़ मिल जाता है, तो एक घटना की ठीक भूमिका बँध जाती है। ऐसे कार्यों में कई बार एक, दो, तीन या कई जन्मों का समय लग जाता है। लड़की के लिए वर और वर के लिए लड़की की तलाश बहुत दिनों तक जारी रहती है, सैकड़ों प्रसंग उठाए जाते हैं, पर कुछ न कुछ कमी होने से वे तय नहीं होते, जब दोनों पक्ष रजामंद हो जाते हैं, तो विवाह जल्द हो जाता है। इसी प्रकार पिता को पुत्र शोक और पुत्र को अल्पायु का संयोग, जब दोनों ही विधान ठीक बैठ जाते हैं, तो वे एकत्रित हो जाते हैं।
🔴 अफ्रीका में वेन्सस नामक एक दस फुट ऊँचा एक झाड़ होता है, इसकी डालियों में से सूत जैसे अंकुर फुटते हैं। यह अंकुर बढते हैं और इधर-उधर हवा में झूलते रहते हैं। दूसरा कोई अंकुर जब उससे छू जाता है, तो वे दोनों आपस में गुँथ जाते हैं और रस्सी की तरह बल डालकर एक हो जाते हैं। जब तक दूसरे अंकुर से भेंट न हो, तब तक सूत बढ़ते ही रहते हैं और कभी न कभी वे किसी न किसी से मिल जाते हैं। कोई सूत तो चार छः अंगुल दूरी पर ही जाकर किसी से मिलकर लिपट जाता है, कोई-कोई चार फुट लंबा होने के बाद सफल होता है। यही हालत कर्मफलों की है। शारीरिक दण्ड एकांगी है विष खाते ही तुरंत मृत्यु हो जाती है, परंतु मानसिक दण्ड में अपवाद है।
🔴 जैसे क्रूरता से प्रेरित होकर किसी की हत्या की गई, वह यदि प्रकट हो गयी तो राज्य द्वारा दण्ड मिल जाएगा, किंतु यदि हत्यारे ने अपना कार्य छिपा लिया तो उसका अंतःकरण तुरंत ही पाप दण्ड न दे बैठेगा, वरन् उसी दिन से वेन्सस पेड़ की तरह अंकुर फोड़कर इस तलाश में फिरेगा कि हिंसा वृत्ति से घृणा कराने के लिए हिंसा में जो दुःख होता है, उसका अनुभव उसे कराऊँ। जब दूसरी ओर का भी कोई अंकुर मिल जाता है, तो दोनों आपस में लिपट कर एक निर्धारित घटना की भूमिका बन जाते हैं। उपरोक्त कारणों से कभी-कभी अचानक सत्कर्म करते हुए भी दुःख उपस्थित हो जाता है और कभी-कभी बुरे काम करते हुए भी दुःख नहीं मिलता, इसका कारण उपयुक्त अवसर तैयार होने में विलम्ब लगना ही होता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/karma.1
👉 सतयुग की वापसी (भाग 11) 16 Dec
🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें
🔴 नि:सन्देह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी दुरूह है। पर हमें उस परम सत्ता के सहयोग पर विश्वास करना चाहिए जो इस समूची सृष्टि को उगाने, उभारने, बदलने जैसे क्रियाकलापों को ही अपना मनोविनोद मानती और उसी में निरन्तर निरत रहती है। मनुष्य के लिए छोटे काम भी कठिन हो सकते हैं, पर भगवान् की छत्रछाया में रहते कोई भी काम असम्भव नहीं कहा जा सकता। विषम वेलाओं में अपनी विशेष भूमिका निभाने के लिए तो ‘‘सम्भवामि युगे-युगे के सम्बन्ध में वह वचनबद्ध भी है। फिर इन दिनों समस्त संसार पर छाई हुई विपन्नता की वेला में उसके परिवर्तन, प्रयास गतिशील क्यों न होंगे? जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे को उजाले में बदल देने जैसा प्रभात पर्व लाने में क्यों कुछ कठिनाई होगी?
🔵 युग परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी, पर उसके पीछे अदृश्य सत्ता का असाधारण योगदान रहेगा। कठपुतलियों के दृश्यमान अभिनय के पीछे भी तो बाजीगर की अँगुलियों से बँधे हुए तार ही प्रधान भूमिका निभाते हैं। सर्वव्यापी सत्ता निराकार है, पर घटनाक्रम तो दृश्यमान शरीरों द्वारा ही बन पड़ते हैं। देवदूतों में ऐसा ही उभयपक्षीय समन्वय होता है। शरीर तो मनुष्यों के ही काम करते हैं पर उन श्रेयाधिकारियों का पथ प्रदर्शन, अनुदानों का अभिवर्षण उसी महान् सत्ता द्वारा होता है, उपनिषद् जिसे ‘अणोरणीयान्, महतो महीयान्’ कहकर उसका परिचय देने का प्रयास करता है।
🔴 हवाई जहाज के लिए उपयुक्त हवाई पट्टियाँ पहले से ही विनिर्मित करनी होती हैं। शासनाध्यक्षों के लिए साफ-सुथरे सुरक्षित और उपयुक्त स्थान की पहले से ही व्यवस्था करनी पड़ती है। जिस महान् प्रयोजन में इन दिनों परमेश्वर की महती भूमिका सम्पन्न होने जा रही है, उसका श्रेय तो उन जागरूकों, आदर्शवादियों और प्रतिभा संपन्नों को ही मिलेगा, जिनने अपने व्यक्तित्व को, परम सत्ता के साथ जुड़ सकने जैसी स्थिति को विनिर्मित कर लिया है। इसी आवश्यकता पूर्ति को कोई चाहे तो युगसाधना भी कह सकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 नि:सन्देह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी दुरूह है। पर हमें उस परम सत्ता के सहयोग पर विश्वास करना चाहिए जो इस समूची सृष्टि को उगाने, उभारने, बदलने जैसे क्रियाकलापों को ही अपना मनोविनोद मानती और उसी में निरन्तर निरत रहती है। मनुष्य के लिए छोटे काम भी कठिन हो सकते हैं, पर भगवान् की छत्रछाया में रहते कोई भी काम असम्भव नहीं कहा जा सकता। विषम वेलाओं में अपनी विशेष भूमिका निभाने के लिए तो ‘‘सम्भवामि युगे-युगे के सम्बन्ध में वह वचनबद्ध भी है। फिर इन दिनों समस्त संसार पर छाई हुई विपन्नता की वेला में उसके परिवर्तन, प्रयास गतिशील क्यों न होंगे? जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे को उजाले में बदल देने जैसा प्रभात पर्व लाने में क्यों कुछ कठिनाई होगी?
🔵 युग परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी, पर उसके पीछे अदृश्य सत्ता का असाधारण योगदान रहेगा। कठपुतलियों के दृश्यमान अभिनय के पीछे भी तो बाजीगर की अँगुलियों से बँधे हुए तार ही प्रधान भूमिका निभाते हैं। सर्वव्यापी सत्ता निराकार है, पर घटनाक्रम तो दृश्यमान शरीरों द्वारा ही बन पड़ते हैं। देवदूतों में ऐसा ही उभयपक्षीय समन्वय होता है। शरीर तो मनुष्यों के ही काम करते हैं पर उन श्रेयाधिकारियों का पथ प्रदर्शन, अनुदानों का अभिवर्षण उसी महान् सत्ता द्वारा होता है, उपनिषद् जिसे ‘अणोरणीयान्, महतो महीयान्’ कहकर उसका परिचय देने का प्रयास करता है।
🔴 हवाई जहाज के लिए उपयुक्त हवाई पट्टियाँ पहले से ही विनिर्मित करनी होती हैं। शासनाध्यक्षों के लिए साफ-सुथरे सुरक्षित और उपयुक्त स्थान की पहले से ही व्यवस्था करनी पड़ती है। जिस महान् प्रयोजन में इन दिनों परमेश्वर की महती भूमिका सम्पन्न होने जा रही है, उसका श्रेय तो उन जागरूकों, आदर्शवादियों और प्रतिभा संपन्नों को ही मिलेगा, जिनने अपने व्यक्तित्व को, परम सत्ता के साथ जुड़ सकने जैसी स्थिति को विनिर्मित कर लिया है। इसी आवश्यकता पूर्ति को कोई चाहे तो युगसाधना भी कह सकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
👉 सतयुग की वापसी (भाग 10) 15 Dec
🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें
🔴 निष्ठा भरे पुरुषार्थ में अद्भुत आकर्षण होता है। उनका प्रभाव भले-बुरे दोनों तरह के प्रयोगों में दिखाई देता है। जब चोर-उचक्के लवार-लफंगे दुराचारी, व्यभिचारी, नशेबाज, धोखेबाज मिल-जुलकर अपने-अपने सशक्त गिरोह बना लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि सृजन संकल्प के धनी, प्रामाणिक और प्रतिभाशालियों को अन्त तक एकाकी ही बना रहना पड़े। भगीरथ ने लोकमंगल के लिए सुरसरि को पृथ्वी पर बुलाया तो ब्रह्मा-विष्णु ने गंगा को प्रेरित करके भेजा और धारण करने लिए शिवजी तत्काल तैयार हो गए। नवसृजन में संलग्न व्यक्तियों की कोई सहायता न करे, यह हो ही नहीं सकता। जब हनुमान्, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू योद्धाओं की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती चली न आए?
🔵 विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसे मुँह बनाए खड़ी दीखती हैं आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, भँवर, अँधड़, तूफान अपनी विनाश क्षमता का नग्न प्रदर्शन करने में कोई कसर रहने नहीं दे रहे हैं। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद महामारी की तरह जन-जन को भ्रमित और संत्रस्त कर रहा है। नीति को पीछे धकेलकर अनीति ने उसके स्थान पर कब्जा जमा लिया है। यह विपन्नता संसार व्यापी समूचे जनसमुदाय पर अपने-अपने आकार-प्रकार में बुरी तरह आच्छादित हो रही है। ऐसी स्थिति में ६०० करोड़ मनुष्यों का विचार परिष्कार (ब्रेन वाशिंग) कैसे सम्भव हो? गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले? जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इनसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान् बुलाने जैसी असम्भव दीख पड़ने वाली सृजन प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 निष्ठा भरे पुरुषार्थ में अद्भुत आकर्षण होता है। उनका प्रभाव भले-बुरे दोनों तरह के प्रयोगों में दिखाई देता है। जब चोर-उचक्के लवार-लफंगे दुराचारी, व्यभिचारी, नशेबाज, धोखेबाज मिल-जुलकर अपने-अपने सशक्त गिरोह बना लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि सृजन संकल्प के धनी, प्रामाणिक और प्रतिभाशालियों को अन्त तक एकाकी ही बना रहना पड़े। भगीरथ ने लोकमंगल के लिए सुरसरि को पृथ्वी पर बुलाया तो ब्रह्मा-विष्णु ने गंगा को प्रेरित करके भेजा और धारण करने लिए शिवजी तत्काल तैयार हो गए। नवसृजन में संलग्न व्यक्तियों की कोई सहायता न करे, यह हो ही नहीं सकता। जब हनुमान्, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू योद्धाओं की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती चली न आए?
🔵 विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसे मुँह बनाए खड़ी दीखती हैं आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, भँवर, अँधड़, तूफान अपनी विनाश क्षमता का नग्न प्रदर्शन करने में कोई कसर रहने नहीं दे रहे हैं। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद महामारी की तरह जन-जन को भ्रमित और संत्रस्त कर रहा है। नीति को पीछे धकेलकर अनीति ने उसके स्थान पर कब्जा जमा लिया है। यह विपन्नता संसार व्यापी समूचे जनसमुदाय पर अपने-अपने आकार-प्रकार में बुरी तरह आच्छादित हो रही है। ऐसी स्थिति में ६०० करोड़ मनुष्यों का विचार परिष्कार (ब्रेन वाशिंग) कैसे सम्भव हो? गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले? जब अपना छोटा सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इनसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान् बुलाने जैसी असम्भव दीख पड़ने वाली सृजन प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)
सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...



















