रविवार, 23 अप्रैल 2017

👉 वह व्यक्तित्व-जिसने सबका हृदय जीता

🔴 महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व में एक विशेषता यह थी कि वह हर स्तर के व्यक्ति को प्रभावित कर लेते थे। बडे लोगों के प्रति लोगों में सम्मान एवं श्रद्धा का भाव तो होता है, किंतु आत्मीयता नहीं होती। इसी प्रकार छोटों की विशेषताओं की प्रशंसा तो करते हैं किंतु उनके प्रति समानता का व्यवहार नहीं कर पाते। गाँधी जी में वह गुण था जिसके कारण वह समाज के हर वर्ग के साथ आत्मीयता का भाव स्थापित कर लेते थे तथा स्नेह एवं सम्मान दोनों समान रूप से प्राप्त कर लेते थे। वह वास्तव में जन नेता कहे जा सकते थे और उनका जादू सर चढ़कर बोलता था। प्रस्तुत घटना से उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष पर प्रकाश पड़ता है।

🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।

🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।

🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।

🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।

🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142

👉 व्रतशील जीवन की महिमा

🔵 उथली और मजबूत किनारों से रहित नदियाँ तनिक-सी वर्षा होने पर सब ओर बिखर पड़ती हैं और बाढ़ का रूप धारण कर पास-पड़ोस के खेतों, गाँवों को नष्ट-भ्रष्ट कर देती हैं। इसके विपरीत वे नदियाँ भी हैं, जिनमें प्रचण्ड वेगयुक्त जलधारा बहती है, किन्तु उफनने की दुर्घटना उत्पन्न नहीं होती। कारण कि वे गहरी होती हैं और उनके किनारे मजबूत व सुदृढ़ होते हैं।

🔴 तनिक-से आकर्षण और भय का अवसर आते ही मनुष्य अपने चरित्र और ईमान को खो बैठता है। थोड़ी-सी प्रतिकूलता, तनिक-सी विरोधी परिस्थितियाँ उसे सहन नहीं होतीं और आवेशग्रस्त स्थिति उत्पन्न कर देती हैं; इसका कारण व्यक्ति का आन्तरिक उथलापन है, व्रतशील जीवन की कमी है। ऐसे लोग तभी तक अच्छे लग सकते हैं, जब तक कि परीक्षा का अवसर नहीं आता। जैसे ही परीक्षा की घड़ी आयी, वैसे ही वे मर्यादाओं को तोड़-फोड़ कर उथले नालों की तरह बिखरते हैं और अपने पड़ोस, समाज व पूरी मनुष्यता के लिए बाढ़ का संकट उत्पन्न करते हैं।
  
🔵 मजबूत किनारों का तात्पर्य है-व्रतशील जीवन। व्रत आदर्शों के प्रति विश्वास है, निष्ठा है। व्रत के द्वारा मनुष्य लक्ष्य तक पहुँचने हेतु आत्मशक्ति सँजोने-अर्जित करने का प्रयत्न करता है। विश्वास जितना सशक्त होता है, निष्ठा जितनी अविचल होती है, संकल्प जितना दृढ़ होता है, व्यक्ति उतनी ही सुगमता से तथा सफलता से जीवन की पूर्णता प्राप्त करता है। शक्ति, शक्ति है। इसका समुचित उपयोग तभी सम्भव है, जबकि यह एकत्रित हो और समुचित दिशा की ओर केन्द्रित हो। व्रत से यही असाधारण कार्य सम्पन्न होता है। इससे मानवीय जीवन की खोती-बिखरती शक्तियाँ एकत्रित-एकाग्र होकर जीवन-लक्ष्य की दिशा में प्रवाहित होने लगती हैं।
  
🔴 हर दिन व्रत है, दिन का हर पल व्रत है। सुख-समृद्धि, सन्तान-स्वास्थ्य आकांक्षा में किया जाने वाला प्रयत्न भी व्रत है; तो सिद्ध-बुद्ध-मुक्त अवस्था प्राप्त करने हेतु साधुता को साधते रहना भी व्रत है। खाना भी व्रत है, नहीं खाना भी व्रत है। जीवन संग्राम में जूझना भी व्रत है, मौन-ध्यानी बनकर एकासन पर बैठे रहना भी व्रत है। जीवन का हर कर्म, जीवन का हर प्रयत्न व्रत हो सकता है, यदि उसमें ईश्वर से एकाग्रता की आकांक्षा और आत्मा की जागरुकता निहित हो। आत्म-बल को जगाने-साधने का प्रयत्न ही व्रत है। व्रत में आत्मा, परमात्मा की ओर उन्मुख होती है, अर्थात् जीवन की परमात्मोन्मुखता ही व्रत है।

🔵 व्रत के हजारों-हजारों नाम हैं। सातों वारों के व्रत हैं। पन्द्रहों तिथियों के व्रत हैं। बारह मासों के व्रत हैं। विभिन्न धर्म एवं सम्प्रदाय अपने देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरूप इनका औचित्य समझाते हैं, परन्तु ये सभी जहाँ एकत्रित रूप से सम्मिलित हो जाते हैं, वह जीवन व्रत है। जिसके प्रति संकल्पित होने से जीवन में आदर्शों एवं मर्यादाओं की आभा निखर उठती है। जीवनक्रम में ऊर्ध्वगामी प्रेरणाएँ स्वतः उमँगने लगती हैं। जीवन की हर श्वास में परमात्मा की सुवास भर जाती है। इस व्रत सिद्धि के चमत्कार इतने हैं कि जिन्दगी का हर क्षण आश्चर्यजनक सफलता एवं आत्मिक प्रगति से भरापूरा लगने लगता है। इसको जिन्होंने अपनाया है-केवल उन्हीं के लिए सम्भव है कि महामानवों के लिए शोभनीय मार्ग पर अनवरत रूप से बढ़ सकें। व्रतशीलता जीवन का सार-मर्म है-जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट साधन एवं साहस का सुसंचय।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 39

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 17)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 समय बड़ा मूल्यवान् है। उसे बड़ी कंजूसी से खर्च करना चाहिए। जितना अपने समय-धन को बचाकर उसे आवश्यक उपयोगी कार्यों में लगावेंगे उतनी ही अपने व्यक्तित्व की महत्ता एवं कीमत बढ़ती जायगी। नियमित समय पर काम करने का अभ्यास डालें। इसकी आदत पड़ जाने पर आपको स्वयं ही इसमें बड़ा आनन्द आने लगेगा।

🔵 यदि मनुष्य प्रतिदिन किसी काम विशेष में थोड़ा-थोड़ा समय भी लगावें तो वह उससे महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त कर सकता है महामनीषी स्वेटमार्डेन ने कहा है, जीवन भर एक विषय में नियमित रूप से प्रतिदिन एक घण्टा लगाने वाला व्यक्ति उस विषय का उद्भट विद्वान बन सकता है। जरा अनुमान लगाइये कोई भी प्रतिदिन एक घण्टे में बीस पृष्ठ पढ़ता है तो साल में 7300 पृष्ठ पढ़ डालेगा। अर्थ हुआ 100 पृष्ठ की 73 पुस्तकें वह एक साल में पढ़ लेगा। दस वर्ष में 730 पुस्तकें पढ़ने वाले व्यक्ति के ज्ञान का विचार-स्तर कैसे होगा? इसके बारे में पाठक स्वयं ही अन्दाज लगा सकते हैं। अतः समय को मामूली न समझें नियमित रूप से कोई भी काम आप करेंगे तो धीरे-धीरे उसमें बहुत बड़ी योग्यता हासिल कर लेंगे यह निश्चित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

👉 जब बस कण्डक्टर के रूप में सहायता की

🔵 सन् 2009 की बात है। नवम्बर का महीना था। मैं अपने मायके विहरा गाँव, जो बिहार के सासाराम जिले में है, गई थी। मेरी माँ की तबीयत खराब थी। मैं माँ को देखकर वापस टाटानगर में साकची को जा रही थी। मेरे साथ मेरा छोटा लड़का था। जब मैं बस स्टैण्ड आई, कण्डक्टर से टिकट के लिए कहा तो वह बोला कि सभी सीट पहले से बुक है। मैं बहुत गिड़गिड़ाई। बहुत प्रार्थना की कि भैया हमको जाना बहुत जरूरी है। अगर यह बस मुझे नहीं मिली तो इस समय मैं छोटे बच्चे के साथ कहा जाऊँगी? थोड़ी देर में साँझ घिर जाएगी। लेकिन मेरी बात का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कहने लगा एक सप्ताह बाद आइए, तो आपको सीट मिल जायेगी।
     
🔴 मैं बहुत सोच में पड़ गई। और कोई साधन भी नहीं था जिससे मैं चली जाती। अचानक मुझे ट्रेन की बात याद आई कि क्यों न ट्रेन से चलूँ। लेकिन बाद में याद आया कि आज रविवार का दिन है। आज टाटानगर के लिए कोई ट्रेन नहीं थी। मेरा गाँव स्टेशन से बहुत दूर था। दिन का 2 बज गया था। अब मेरा रास्ता हर जगह से बंद हो गया था। न मैं मायके जा सकती थी और न ससुराल।
     
🔵 धीरे- धीरे सूरज ढल रहा था। शाम हो रही थी। उसी क्रम में मेरी चिन्ता भी बढ़ती जा रही थी। मिथिला का नियम है भदवा तिथि में कहीं निकला नहीं जाता है। दुर्भाग्य! आज वही तिथि पड़ी थी। अब तो मेरा मन और घबरा गया। और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मैं फूट- फूट कर रोने लगी। मुझे रोते हुए देखकर मेरा लड़का अभिजीत भी परेशान हो रहा था। लड़का बोला घबराओ मत। एक बार मैं फिर कण्डक्टर से मिलूँ, अगर होगा तो आगे की तारीख का टिकट कटा लूँगा। जैसे ही हम लोग वहाँ पर गए, हमें एक मन्दिर दिखा। जिसमें माताजी- गुरु जी का फोटो लगा हुआ था। गुरुदेव- माताजी के चित्रों को देखकर मैं फिर रोने लगी और आर्त्तभाव से प्रार्थना करने लगी। हे गुरुदेव! अब रात होने जा रही है। बस जाने वाली है। मैं महिला जाति रात में इधर- उधर कहाँ भटकती फिरूँगी। अब तो आप का ही सहारा है।

🔴 अब गाड़ी स्टार्ट हो गई थी। मैं बस को अपलक निहारे जा रही थी। अचानक बस कण्डक्टर पर नजर पड़ी, तो सन्न रह गई। वह हू- ब-हू गुरुजी जैसा दिख रहा था। इसी बीच वह टिकटों का हिसाब करने लगा। ड्राइवर और कण्डक्टर के बीच बातें होने लगीं। कण्डक्टर कह रहा था कि दो सीट का पैसा कम है। बस मालिक बोल रहा था कि जब एक महीना से पूरी सीट फुल है तो पैसा कहाँ से कम हो जाएगा? जब बस में अन्दर जाकर देखा गया तो बीच में दो सीटें खाली थी। इतना सुनते ही वहाँ भीड़ लग गई। भगदड़ मच गई। सभी यात्रियों को जाने की जल्दी थी। कोई कहता हम एक हजार देंगे, कोई कहता हम दो हजार देंगे। सभी रुपए निकालने लगे।

🔵 इसी बीच कण्डक्टर जोरों से चिल्लाया, मैं किसी का रुपया नहीं लूँगा। अभी कुछ घंटे पहले एक माँ बेटा जो टिकट के लिए घूमकर गए हैं, मैं उन्हीं को यह सीट दूँगा। इतना सुनते ही खुशी के मारे आँसू निकल आए। मैंने श्रद्धापूर्वक गुरु देव- माताजी को प्रणाम किया। तब तक मेरा बेटा भी दौड़कर मेरे पास आया और बोला- माँ टिकट की व्यवस्था हो गई, जल्दी चलो। हम बस की ओर दौड़ पड़े। जब हम बस पर चढ़े तो सभी बस यात्री शोर करने लगे। कहने लगे पीछे जाइए, पीछे जाकर बैठिए। हम लोगों ने एक महीना पहले टिकट बुक कराया है। इसलिए आप पीछे जाकर बैठिए।

🔴 तभी कण्डक्टर आए और बोले, आप परेशान न हों। उन्होंने मुझे और मेरे बेटे को 16- 17 नम्बर की सीट पर बैठा दिया और बोले- आप लोग आराम से बैठिए। चिन्ता न करें। मैं आता- जाता रहूँगा। इस तरह जहाँ- जहाँ बस रुकती, वे हम लोगों से पूछते रहते कि कोई कठिनाई तो नहीं है? इस तरह हम सुबह 9 बजे राँची पहुँच गए। वहाँ से दूसरी बस द्वारा टाटानगर सही सलामत पहुँच गए।

🔵 इस तरह से गुरु देव ने बस में आकर मेरी सहायता की। अब सोचती हूँ तो लगता है कि मेरे प्रार्थना करने पर गुरु देव मेरी सहायता करने स्वयं चले आए! आज भी जब मैं घटना को सोचती हूँ तो गुरु देव की कृपा का सहज ही अहसास हो जाता है और हमारी आँखें श्रद्धा से नम हो जाया करती हैं।                    
  
🌹 शशिप्रभा वर्मा साकची, पूर्वी सिंहभूम (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/jab

👉 आज का सद्चिंतन 23 April 2017


👉 CHINTAN (Part 2)

(studying the past-period of self-being): its Significance & Mechanics

🔴 Whenever at some convenient time you sit in solitude, just think we are alone and have no companion or friend. Let the companion, the friend, the family member, the money, the business, the agricultural field be in their places. You only have to think if we have been doing any mistake for last days? Whether have we forgotten the path, deviated? Whether was I born for this only? Whether did I do what for I was born? Whether I was busy earning more than how much was required? Whether I was adding to number of loads unnecessarily by paying attention to family more than what genuinely required? Whether I was busy loading them with gifts they did not required, only for their happiness? Why? r which reasons? Very these are the mistakes of life, we have been committing all along.

🔵 In the same way, whether I took care of food and living style that was to be taken necessarily from health point of view. Whether the required modesty, that ought to be, was incorporated in thinking-style or not? No. We did not fulfill duties either for our bodies or brain or our family members. We stand lagged far behind from point of view of duties. Once think over issues whereat we lagged. Why? What is the advantage of doing this? The advantage is that rectification of mistakes will be possible only when they are known to us. What and why will you rectify when you do not know what and why to do? That is why review or revisit becomes essential. Just review yourself and your past.  

🔴 Not only is the crime that is called the sin. Things, actions making life disordered are also called sins. The theft and the murder are obviously the crimes but not the less is passing time in lethargy & laziness, maintaining an angry temperament, keeping your temperament worried & disordered. What these are? These too are mistakes. Just review repeatedly what mistakes associated with virtues, actions and temperament in your personal life and those associated with your crime both, you have been committing. It is very essential to revisit your past. This action leads us to assess where we are wrong and how much we had been missing and are still missing. The next step is related with rectification of such mistakes and is called Self-Refinement.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 April 2017


👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 88)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 सर्वव्यापी ईश्वर निराकार हो सकता है। उसे परमात्मा कहा गया है। परमात्मा अर्थात आत्माओं का परम समुच्चय। इसे आदर्श का एकाकार कहने में भी हर्ज नहीं। यही विराट् ब्रह्म या विराट विश्व है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को अपने इसी रूप का दर्शन कराया था। राम ने कौशल्या तथा काकभुशुण्डि को इसी रूप को झलक के रूप में दिखाया था और प्राणियों को उनका दृश्य स्वरूप। इसी मान्यता के अनुसार यह लोक सेवा ही विराट् ब्रह्म की आराधना बन जाती है। विश्व उद्यान को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए ही परमात्मा ने बहुमूल्य जीवन देकर अपने युवराज की तरह यहाँ भेजा है। इसकी पूर्ति में ही जीवन की सार्थकता है। इसी मार्ग का अधिक श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करने से अध्यात्म उत्कर्ष का वह प्रयोजन सधता है, जिसे आराधना कहा गया है।

🔵 हम करते रहे हैं। सामान्य दिनचर्या के अनुसार रात्रि में शयन, नित्य कर्म के अतिरिक्त दैनिक उपासना भी उन्हीं बारह घण्टों में भली प्रकार सम्पन्न होती रही है। बारह घण्टे इन तीनों कर्मों के लिए पर्याप्त रहे हैं। चार घण्टा प्रातःकाल का भजन इसी अवधि में होता रहा है। शेष आठ घण्टे में नित्य कर्म और शयन। इसमें शयन की कोताही कहीं नहीं पड़ी। आलस्य-प्रमाद बरतने पर तो पूरा समय ही ऐंड-बेंड में चला जाता है, पर एक-एक मिनट पर घोड़े की तरह सवार रहा जाए, तो प्रतीत होता है कि जागरूक व्यक्तियों ने इसी में तत्परता बरतते हुए वे कार्य कर लिए होते जितने के लिए साथियों को आश्चर्य चकित रहना पड़ता है।

🔴  यह रात्रि का प्रसंग हुआ, अब दिन आता है। उसे भी मोटे रूप में बारह घण्टे का माना जा सकता है। इसमें से दो घंटे भोजन, विश्राम के लिए कट जाने पर दस घण्टे विशुद्ध बचत के रह जाते हैं। इनका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों की लोकमंगल आराधना में नियमित रूप से होता रहा है। संक्षेप में इन्हें इस प्रकार कहा जा सकता है। १-जनमानस के परिष्कार के लिए युग चेतना के अनुरूप विचारणा का निर्धारण-साहित्य सृजन २-संगठन जागृत आत्माओं को युग धर्म के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्तेजना मार्गदर्शन, ३-व्यक्तिगत कठिनाइयों में से निकलने तथा सुखी भविष्य विनिर्मित करने हेतु परामर्श योगदान। हमारी सेवा साधना इन तीन विभागों में बँटी है। इनमें दूसरी और तीसरी धारा के लिए असंख्य व्यक्तियों से संपर्क साधना और पाना चलता रहा है।

🔵 इनमें से अधिकांश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है। इनके नामोल्लेख और घटनाक्रमों का विवरण सम्भव नहीं क्योंकि एक तो जिनकी सहायता की जाए, इनका स्मरण भी रखा जाए। यह अपनी आदत नहीं, फिर उनकी संख्या और विनिर्मित उतनी है कि जितने स्मरण है उनके वर्णन से ही एक महापुराण लिखा जा सकता है। फिर उनको आपत्ति भी हो सकती है। इन दिनों कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रचलन समाप्त हो गया। दूसरों की सहायता को महत्त्व कम दिया। अपने भाग्य या पुरुषार्थ का ही बखान किया जाए। दूसरों की सहायता के उल्लेख में हेटी लगती है। ऐसी दशा में अपनी ओर से उन घटनाओं का उल्लेख करना जिसमें लोगों के कष्ट घटें या प्रगति के अवसर मिलें, उचित न होगा। फिर एक बात भी है कि बखान करने के बाद पुण्य घट जाता है। इतने व्यवधानों के रहते उस प्रकार की घटनाओं के सम्बन्ध में मौन धारण करना ही उपयुक्त समझा जा रहा है और कुछ न कह कर ही प्रसंग समाप्त किया जा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.3

👉 तुम उसे अवश्य पा लोगे

🔵 किसी पहाड़ी झील पर नजर डालो। तुषार की रूपहली चादर बिछी हुई है। हवा चलती है, पानी बरसता है। बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है,  किन्तु झील की निश्चलता में कोई अन्तर नहीं आता। किनारों पर रंग-बिरंगे पक्षी कूँजते और किल्लोल करते हैं, किन्तु उस झील में कोई विक्षेप उत्पन्न नहीं होता। तट पर फैली वृक्षावली में एक से एक सुन्दर, सुगन्धित फूल खिलते, शाखा में से टूटकर झील पर गिरते हैं। किन्तु झील के स्थिर हृदय में उनका कोई प्रतिबिम्ब नहीं उठता। वह अपने निर्विकल्पता का धैर्य है, जिसे तुम अवश्य पा लोगे।

🔴 कुम्हार तालाब से मिट्टी खोद लाता है। उसे कूट-पीस कर महीन बनाता और छानकर साफ करके पानी डालकर उसे खूब रौंदता, पीटता है। तैयार हो जाने पर, चाक पर चढ़ाकर अपनी इच्छा के अनुसार वह उसे आदमी, पशु या पक्षी का रूप देता है, किन्तु इतना सब होने पर भी मृत्तिका कुछ नहीं बोलती। सब कुछ समभाव से सहन करती हुई कुम्भकार की इच्छा-वशवर्ती रहती है। यदि तुममें उस मृत्तिका की भाँति सहनशीलता और नम्रता है, तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।
  
🔵 मरुस्थल में भटके प्राणी की वांछा में पानी पीने की लालसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पानी के लिए उसकी व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि उसे तपती रेत के कणों में पानी का आभास होने लगता है। वह छटपटाता है, दौड़ता है, विकलाता है, उसकी चाह होती है कि किसी पानी से लबालब भरे जलाशय की नहीं, सिर्फ एक बूँद जल की। वह बूँद में ही अपने सर्वस्व को खोजता है। पनघट पर खड़े पथिक की प्यास में न तो इतनी व्याकुलता होती है और न एकान्तिकता।
  
🔴 वह पानी के अतिरिक्त वहाँ के दृश्य भी देखता और रस भी लेता है। वहाँ पास में खड़े लोगों से गप-शप का आनन्द भी लूटने लगता है। यदि तुम उसे पाना चाहते हो, तो पनघट पर खड़े प्यार से पथिक की इच्छा नहीं, मरुस्थल में भटके तृषित प्राणी की आकांक्षा लेकर चलो, एक दिन तुम उसे अवश्य पा लोगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 37

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 April

🔴 काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकारों का आवेश मनुष्य को अन्धा कर देता है। उसका विवेक ठीक काम नहीं करता, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य का उसे ध्यान नहीं रहता और वह उस प्रकार का व्यवहार कर बैठता है जिससे उसे स्वास्थ्य से हाथ धोना पड़ता है, समाज में अपयश होता है, दूसरों से सम्बन्ध खराब होते हैं और वह अविश्वास का पात्र बन जाता है।

🔵 सम्बन्धियों, धन और यश में आसक्ति वाला मनुष्य लेन-देन में पक्ष-पात करता है। चोरी, ठगी और बेईमानी करता है, दूसरों को धोखा देता है, झूठे वादे करता है और चालाकी से काम लेता है। वह भूल जाता है कि पक्षपात से समाज की व्यवस्था खराब होती है, चोरी और बेईमानी से असुरक्षा और भय की स्थिति पैदा होती है, जिसका प्रभाव स्वयं उसके ऊपर भी पड़ सकता है। झूठ और चालाकी से उसका नैतिक पतन होता है और उस अनीति से जो लाभ होता है वह स्थाई नहीं होता।

🔴 स्वर्ग और नरक कहीं और नहीं है। इन्हें मानव स्वयं इसी धरती पर बनाता है। जब मानव नीति, संयम, त्याग, सेवा, तप और सहानुभूति का जीवन जीते हैं तो समाज में स्वास्थ्य, सुख, शान्ति, बाहुल्य, सद्भावना, प्रेम, हंसी-खुशी और पारस्परिक विश्वास का कल्प-वृक्ष उगता है। यही स्वर्ग है। संकुचित स्वार्थ, असंयम, आलस्य, घृणा, द्वेष और दम्भ समाज में उत्पीड़न, भय, असन्तोष, अभाव और अविश्वास का वातावरण बना देते हैं। यही नरक है। हमारा चिन्तन, भावनाएं और कर्म ही स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है। अपने लिए-समस्त संसार के लिए हम स्वर्ग का सृजन करें अथवा नरक का निर्माण करें यह हमारी इच्छा और चेष्टा पर पूर्णतया निर्भर हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 16)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 जरा विचार कीजिये आपको अमुक दिन अमुक गाड़ी से बम्बई जाना है। अगर आप गाड़ी के सीटी देने के एक मिनट बाद स्टेशन पहुंचे तो फिर आपको वह गाड़ी, वह दिन, वह समय कभी नहीं मिलेगा। निश्चित समय निकल जाने के बाद आप किसी दफ्तर में जायें तो निश्चित है आपका काम नहीं होगा। आपको स्मरण होगा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, जार्ज वाशिंगटन आदि को सड़क पर से गुजरते देखकर लोग अपनी घड़ियां मिलाते थे अपने काम और समय का इस तरह मेल रखें कि उसमें एक मिनट का भी अन्तर न आये। तभी आप अपने समय का पूरा-पूरा सदुपयोग कर सकेंगे।

🔵 आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। यह कई रूपों में मनुष्य पर अपना अधिकार जमा लेता है। कई बार कुछ काम किया कि विश्राम के बहाने हम अपने समय को बरबाद करने लगते हैं। वैसे बीमारी, तकलीफ आदि में विश्राम करना तो आलस्य नहीं है। थक जाने पर नींद के लिये विश्राम करना भी बुरा नहीं है। थकावट हो, नींद आये तो तुरन्त सो जायें लेकिन आंख खुलने पर उठ-पड़ें चारपाई न तोड़ें। अभी उठते हैं, अभी उठते हैं, कहते रहें तो यही आलस्य का मन्त्र है। आंखें खुलीं कि तुरन्त अपने काम में लग जायें।

🔴 रस्किन के शब्दों ‘‘जवानी का समय तो विश्राम के नाम पर नष्ट करना ही घोर मूर्खता है क्योंकि वही वह समय है जिसमें मनुष्य अपने जीवन का, अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठण्डा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य का प्रयत्न भी व्यर्थ चला जाता है।’’ विश्राम करें, अवश्य करें। अधिक कार्य क्षमता प्राप्त करने के लिये विश्राम आवश्यक है लेकिन उसका भी समय निश्चित कर लेना चाहिए और विश्राम के लिये ही लेटना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

👉 रोशन हुआ कुलदीपक का जीवन

🔵 मेरा भतीजा अमल कुमार पाण्डेय मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव था। साथ ही वह झारखण्ड में मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव एसोसिएशन में सेक्रेटरी भी था। उसकी सभी जगह अच्छी पकड़ थी। १९९८ के अक्टूबर- नवम्बर महीने की घटना है। अचानक उसे हेपेटाइटिस- बी हो गया और धीरे- धीरे बहुत घातक स्थिति में पहुँच गया। उसे राँची के अपोलो अस्पताल में एडमिट किया गया। उसका इलाज बहुत अच्छे तरीके से शुरू हो गया। लेकिन कोई दवा काम नहीं कर रही थी। धीरे- धीरे उसकी हालत बिगड़ती ही रही। उसका लीवर, किडनी, हर्ट सब एक साथ प्रभावित हो गया, जिस कारण वह मृतप्राय स्थिति में पहुँच गया।
     
🔴 हम लोगों ने उसे राँची में ही भारत के विख्यात ब्रेन एण्ड न्यूरो स्पेशलिस्ट डॉ० के० के० सिन्हा को दिखाया। उन्होंने देखने के बाद कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा कि लड़का तो ९८ प्रतिशत खत्म हो चुका है। मात्र २ प्रतिशत ही उम्मीद है। वह भी भगवान के हाथ में है। यदि उसे २४ घण्टे के अन्दर प्लेटलेट्स चढ़ाया जा सके तो कुछ उम्मीद बन सकती है, यदि यह २४ घंटे जीवित रह सके।
     
🔵 उन दिनों राँची में प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं था। कलकत्ता से मँगाना पड़ता था। यह बहुत कठिन कार्य था। कहते हैं अच्छी दोस्ती भगवान की कृपा से मिलती है। उसके दोस्तों के अथक प्रयासों से यह कठिनतम कार्य संभव हो सका। जब डॉ० सिन्हा देखकर चले गए तो मैं स्वयं हॉस्पिटल के अधीक्षक से मिला एवं उनसे आग्रह किया कि मैं उसे देखना चाहता हूँ। मैं उसके स्वास्थ्य के लिए भगवान से आधा घंटा प्रार्थना करना चाहता हूँ। उन्होंने मेरा आग्रह स्वीकार कर लिया और मुझे अपने साथ सघन चिकित्सा कक्ष तक ले गए।
 
🔴 मैंने वहीं से एक धुली चादर ली और चादर बिछाकर पालथी मारकर बैठ गया। वहाँ पर एक डॉक्टर तथा दो नर्स उपस्थित थे, जिनकी वहाँ पर ड्यूटी थी। मुझे देखकर वे बोले कि यह तो खत्म हो चुका है। वास्तव में उसकी हालत बिल्कुल खराब होने के कारण वह मृतप्राय हो चुका था। उसकी पेशाब की नली से एक बूँद भी पेशाब नहीं आ रहा था। उसका पूरा शरीर फूल गया था। उसके पूरे हाथ पाँव सुन्न पड़े थे। ऑक्सीजन ने भी काम करना बंद कर दिया था। किसी भी प्रकार की हरकत नहीं हो रही थी। मैं वहीं उसके पैर के पास चादर डालकर बैठ गया तथा दोनों नेत्र बन्द करके सीधे शान्तिकुञ्ज में प्रज्ज्वलित अखण्ड दीप एवं गुरु देव माताजी के चरणों में प्रार्थना करने लगा।
     
🔵 मैं सबसे बेखबर ध्यान में तल्लीन था। लगभग २०- २५ मिनट हुए होंगे। मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे गुरु देव मेरे कान में कह रहे हैं कि घबड़ाओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा। मुझे अखण्ड दीपक की लौ काफी तेज जलती प्रतीत हुई। हम पूरी तरह से ध्यान मग्न हो गए थे, जिससे मुझे अपनी सुध भी नहीं रही। जब ध्यान टूटा तो देखा करीब ५० मिनट हो गया था। मैं हड़बड़ा कर उठा और अधीक्षक महोदय से २० मिनट देर होने के लिए माफी माँगी तथा निवेदन किया कि पुनः एक घण्टे बाद मुझे आने की अनुमति दे दें। उन्होंने बड़े ही सहज भाव से स्वीकृति दे दी। मैं पुनः एक घण्टे बाद उसी स्थान पर बैठकर महामृत्युंजय मंत्र और सूर्य गायत्री मंत्र का गायत्री मंत्र में संपुट लगाकर अखण्ड दीप के समीप होने की भावना करते हुए जप करने लगा। इसके पश्चात् करीब आधे घण्टे के बाद मैंने देखा कि उसे दो- दो मिनट पर एक- एक बूँद पेशाब हो रहा है। मैंने जाकर उसी डाक्टर से यह बात बताई, जिसकी ड्यूटी थी तो उन्होंने फिर वही वाक्य दुहराया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।
     
🔴 मैं वापस घर आ गया और शाम को सात बजे आदरणीया शैल जीजी से फोन पर भतीजे की स्थिति के बारे में सूचना दी। जीजी बोलीं कोई नशा या ड्रग्स लेता था क्या? मैंने बताया कि इन सबकी आदत उसे कभी नहीं रही। वे बोलीं कि स्थानीय गायत्री शक्तिपीठ में माँ के सामने अलग से दीपक प्रज्वलित कर दीजिए। गुरु देव की कृपा से ठीक हो जाना चाहिए। मैं राँची स्थित गायत्री शक्तिपीठ आया और आदरणीया जीजी के कहे अनुसार वैसा ही किया। रात्रि में हम लोग सो गए थे। अचानक उठे तो किसी ने आकर बताया कि अमल को रात भर में ७०० एम एल पेशाब हुआ है। उसके लिए प्लेटलेट्स भी कोलकाता से आ गई थीं, जिसे चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। गुरुदेव माताजी के प्रति श्रद्धा से मेरा हृदय भर उठा। पूरे हॉस्पिटल में यह चर्चा का विषय बन गया था कि आज भी धर्म से व्यक्ति की रक्षा होती है।

🔵 मुझे वहाँ के अधीक्षक महोदय ने भी बधाई दी। क्योंकि मेरे भतीजे की उम्र ३८ वर्ष की थी और उसने ३२ बार उसी हॉस्पिटल में रक्तदान किया था। इस कारण वह हॉस्पिटल के सभी डॉक्टर्स को प्रिय था। मैं तुरन्त उसके पास गया। देखा कि अब वह छटपटा रहा है। उसके पूरे शरीर में हलचल है। ऑक्सीजन वगैरह भी चालू हो गया था। मैंने पुनः एकान्त में बैठकर पूर्व की भाँति जप करना शुरू कर दिया। कुछ घण्टों के बाद वह होश में आ गया। होश में आते ही उसने मुझे देखा। उसके होंठ बोलने के लिए हिल रहे थे। बड़ी मुश्किल से उसके मुँह से ‘बाबू’ शब्द निकला। उसके मुँह से यह शब्द सुनकर मेरा हृदय बाग- बाग हो रहा था। अमल कुमार स्वस्थ हो गया। गुरु की इस असीम कृपा और प्यार को मैं जीवन भर नहीं भूल सकता।                   
  
🌹 उड़िया बाबा जमुई (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/kuldeep

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 87)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴  हमारे मार्गदर्शक ने प्रथम दिन ही त्रिपदा गायत्री का व्यवहार, स्वरूप-उपासना, साधना, आराधना के रूप में भली प्रकार बता दिया था, नियमित जप-ध्यान करने का अनुबंधों सहित पालन करने के निर्देश के अतिरिक्त यह भी बताया था कि चिंतन में उपासना, चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाए। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म-अवलंबन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।

🔵 आराधना का अर्थ है- लोकमंगल में निरत रहना। जीवन साधना प्रकारांतर से संयम साधना है। उसके द्वारा न्यूनतम में निर्वाह चलाया और अधिकतम बचाया जाता है। समय, श्रम, धन और मन मात्र इतनी ही मात्रा का शरीर तथा परिवार के लिए खर्च करना पड़ता है, जिसके बिना काम न चले। काम न चलने की कसौटी है-औसत देशवासियों का स्तर। इस कसौटी पर कसने के उपरांत किसी भी श्रमशील और शिक्षित व्यक्ति का उपार्जन इतना हो जाता है कि काम चलाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ बच सके। इसी के सदुपयोग को आराधना कहते हैं। आमतौर से लोग इस बचत को विलास में, अपव्यय में अथवा कुटुंबियों में बिखेर देते हैं। उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि इस संसार में और भी कोई अपने हैं, औरों की भी कुछ जरूरतें हैं। यदि दृष्टि में इतनी विशालता आई होती, तो उस बचत को ऐसे कार्यों में खर्च किया गया होता जिससे अनेकों का वास्तविक हित साधन होता और समय की माँग पूरी होने में सहायता मिलती।

🔴  ईश्वर का एक रूप साकार है, जो ध्यान धारणा के लिए अपनी रुचि और मान्यता के अनुरूप गढ़ा जाता है। यह मनुष्य से मिलती-जुलती आकृति-प्रकृति का होता है। यह गठन उस प्रयोजन के लिए है तो उपयोगी, आवश्यक किंतु साथ ही यह ध्यान रखने योग्य भी है कि वास्तविक नहीं, काल्पनिक है। ईश्वर एक है, उसकी इतनी आकृतियाँ नहीं हो सकतीं, जितनी कि भिन्न-भिन्न संप्रदायों में गढ़ी गई हैं। उपयोग मन की एकाग्रता का अभ्यास करने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। प्रतिमा पूजन के पीछे आद्योपान्त प्रतिपादन इतना ही है कि दृश्य प्रतीक के माध्यम से अदृश्य दर्शन और प्रतिपादन को समझने हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.3

👉 आज का सद्चिंतन 22 April 2017


👉 CHINTAN ( Part 1)

(studying the past-period of self-being): its Significance & Mechanics

🔴 ‘CHINTAN’ simply means an exercise you do when you are exclusively with yourself at some convenient time just to study your past life in a nutshell. Just revisit/review how your own ‘PAST’ has passed. ‘OH! So is not possible to you but you definitely know how to do that when it comes to others’. You are intelligent/clever enough to review your neighbor, your wife and of course your children. What to talk of others, you can even review the BHAGWAN to pinpoint his mistakes. To say, you just do not spare anyone.

🔵 Now no one is left there who is not under your scanner except of course you. But what about your mistakes; you do not review that. Once we review our past-life and life-style and investigate ourselves, we will come to know bulk of such things that should not have been done by us, that should not have been adopted by us.  

🔴 Our mind is so remarkably composed that it very easily & cleverly justifies our every action.  It maintains that our temperament is good, good are habits, good are out thoughts and good is our thinking, well our all is well and of others’ wrong. There is no holdup other than this in spiritual progress. That is why self-review/self-inspection must be your starting point.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 April 2017


👉 धर्म का पवित्र प्रवाह

🔵 धर्म तो गंगा का पवित्र प्रवाह है, जिसका स्पर्श अन्तःकरण में निर्मलता का शीतल अहसास जगाता है। अपनी छुअन से औरों को निर्मल करने वाला धर्म खुद मलिन कैसे हो सकता है? वह भला भ्रष्ट किस तरह हो सकता है? विधर्मियों द्वारा पवित्र स्थल, धार्मिक स्थल, धर्म आदि को भ्रष्ट किए जाने की बातें बच्चों का बचपना ही तो हैं। इन्हें सुनकर समझ में नहीं आता कि हँसें या रोएँ। हकीकत में ऐसी बातों से धर्म को तो कुछ नहीं होता; हाँ! अपना अहम् और अपनी स्वार्थी भावनाएँ जरूर जख्मी होती हैं।

🔴 स्वधर्मी और विधर्मी-ये सम्भव ही नहीं। धर्म के विधर्म जैसा कुछ भी नहीं होता। इस दुनिया में सूर्य एक है, धरती एक है तो भला धर्म दो, तीन या पाँच किस तरह हो सकते हैं? वास्तव में अज्ञान और अधर्म के लिए संख्या की कोई सीमा ही नहीं है। जितने चाहो, जितनी तरह के चाहो, उतने गिन लो।
    
🔵 समूचे विश्व में क्या कोई ऐसा भी इनसान है, जो साँस में कार्बन डाइऑक्साइड लेता हो, कानों से देखता हो और आँखों से सुनता हो। है क्या कोई ऐसा मनुष्य? यथार्थ में ऐसा सम्भव ही नहीं। बायें हाथ से लिखने वाले, दायें हाथ से लिखने वाले, ईश्वर में आस्था रखने वाले और ईश्वर में आस्था नहीं रखने वाले मनुष्य मिलेंगे, किन्तु श्वास में प्राणवायु न लेने वाले जीवित मनुष्य कहीं नहीं मिलेंगे। शाकाहारी, माँसाहारी, काले, गोरे, पीले मनुष्य सबने देखे होंगे, परन्तु वे सबके सब साँस में प्राणवायु ही लेते हैं। इसमें विभिन्नता ढूँढने पर भी नहीं मिलती। धर्म भी प्राणवायु है। इसमें जो भेद दिखाई देते हैं, वे इसे ग्रहण करने वालों की शक्ल-सूरत के हैं अथवा फिर अपने अज्ञान से उपजे अधर्म के।
    
🔴 शुद्ध प्राणवायु की ही भाँति शुद्ध धर्म को पाने की कोशिश होनी चाहिए। शुद्ध हवा पाने के लिए हम क्या करते हैं? उसे अशुद्ध करने वाली चीजों को हटाने की कोशिश करते हैं। ठीक इसी तरह धर्म को अशुद्ध करने वाले तत्त्वों को हटा दिया जाय, तो शुद्ध धर्म बड़ी ही सरलता एवं स्वाभाविकता से अपने पास आ जाएगा।
    
🔵 धर्म को अशुद्ध करता है कौन? और कोई नहीं, अपने ही झूठे व्यवहार और अपनी ही झूठी मान्यताएँ। इन झूठे व्यवहारों एवं झूठी मान्यताओं को कैसे पहचाना जाय? इस पहचान का तरीका बड़ा सरल है। इनसान-इनसान के बीच जो भेद खड़ा करे, परस्पर द्वेष पैदा करे, वे सबके सब मिथ्या-झूठ हैं। जरा सोचिए, यह हम ही कर पाएँगे कि मेरे और उसके बीच भेद कौन पैदा कर रहा है, कौन है जो वैर के बीज बोये जा रहा है? यदि ‘ईश्वर’ है, तो सन्देहास्पद है। यदि वह ‘धर्म’ है, तो अधर्म भी है। यदि वह ‘शास्त्र’ है, तो बकवास है।
    
🔴 धर्म विवेक को, हमारी आपकी अन्तरात्मा को जाग्रत् करता है। वह मनुष्य की आत्मश्रद्धा को बढ़ाता है। धर्म का पवित्र प्रवाह बिना किसी भेद-भाव के मनुष्य मात्र के भीतर प्रेम की फसल को उपजाता है। जो इसके विपरीत करता है, वह अवश्य अधर्म है। इसे हर तरह से छोड़कर धर्म के निर्मल प्रवाह का स्पर्श पाने की कोशिश करना ही मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 36

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 April

🔴 भावना हृदय की आन्तरिक वस्तु है। यदि हम झूठे भाव से अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच अपनत्व, उदारता और त्याग का भाव प्रदर्शन करना चाहेंगे तो कभी न कभी इसकी सत्यता परिलक्षित हो ही जायगी। तब अन्य सदस्यों का दृष्टिकोण हमारे प्रति कितना गलत हो जायेगा। लोग सशंकित हो जायेंगे। हमारे प्रति अश्रद्धालु हो जायेंगे। इस मर्यादा का पालन आन्तरिक गुण है कि हम परिवार में श्रद्धा के पात्र समझे जायं। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं भावना की वस्तु है।

🔵 सफल, प्रगतिशील विकासोन्मुख और सम्मानित जीवन-यापन करना जिन्हें अभीष्ट हो उन्हें इसके लिए अन्तरंग से छिपे हुए सामर्थ्य बीजों को अंकुरित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वे आमतौर से उपेक्षित पड़े रहते हैं, लोग बाह्य साधनों में सफलताओं की सम्भावना एवं कामनाओं की पूर्ति के आधार ढूँढ़ते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि वे आधार बाहर नहीं भीतर है जिनसे व्यक्तित्व को विकसित करना सम्भव होता है और सफलताओं के रुके हुए द्वार खुलते हैं।

🔴 किसी प्रकार सफलता प्राप्त करने की नीति बुरी है। अधिक जल्दी और अधिक लाभ प्राप्त करने की धुन में लोग अनैतिक काम करने पर उतारू हो जाते हैं और अपराधियों जैसी गतिविधियाँ अपनाते हैं। सम्भव है उससे आरम्भ में कुछ लाभ भी रहे, पर पीछे वस्तुस्थिति प्रकाश में आते ही वह बालू का महल पूरी तरह धराशायी हो जाता है। निन्दनीय और अप्रामाणिक ठहराया गया व्यक्ति हर किसी की आँखों से गिर जाता है। उसका नैतिक पतन न केवल व्यक्तित्व को ही अवाँछनीय ठहराता है वरन् उसके किये कामों में भी अविश्वसनीयता का ढिंढोरा पीटता है। ऐसे व्यक्तियों को एक प्रकार से सामाजिक पक्षाघात ग्रसित ही कहना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 15)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

इस कल से बचने के लिए ही महात्मा कबीर ने चेतावनी देते हुए कहा है।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब।।

🔴 कल पर अपने कोई भी काम न टालें। जिन्हें आज करना है उन्हें आज ही पूरा करलें। स्मरण रखिये प्रत्येक काम का अपना अवसर होता है और अवसर वही है जब वह काम आपके सामने पड़ा है। अवसर निकल जाने पर काम का महत्व भी समाप्त हो जाता है तथा बोझ भी बढ़ता जाता है। स्वेटमार्डेन ने लिखा है बहुत से लोगों ने अपना काम कल पर छोड़ा और वे संसार में पीछे रह गये अन्य लोगों द्वारा प्रतिद्वन्दिता में रहा दिये गये।’

🔵 समय का ठीक-ठीक लाभ उठाने के लिए आवश्यक है कि एक समय एक ही काम किया जाय। जो व्यक्ति एक समय में अनेकों काम करना चाहते हैं उनका कोई भी काम पूरा नहीं होता और उनका अमूल्य समय व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है।

🔴 जो काम स्वयं करना है उसे स्वयं ही पूरा करें। अपना काम दूसरों पर छोड़ना भी एक तरह से दूसरे दिन काम टालने के समान ही है। ऐसे व्यक्ति का अवसर भी निकल जाता है और उसका काम भी पूरा नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

👉 पूज्य गुरुदेव ने की प्राणरक्षा

🔵 हमारा जन्म उड़ीसा में हुआ था। जब मैं करीब २४- २५ वर्ष का था, हमारे गाँव में भागवत् कथा करने एक सन्त श्री रामचरणदास जी (मौनी बाबा)आते थे। मैं भी भागवत सुनता था। उसमें मैंने सुना कि शरीर नाशवान् है। यह सुन कर मन में आता रहता था, यदि शरीर नाशवान् है तो इसे रख कर क्या करूँगा।

🔴 एक दिन होली की पूर्णिमा रात्रि में, हाथ में जहर लेकर, शरीर को नष्ट करने का संकल्प लेकर सुनसान समुद्र के किनारे जा बैठा। जैसे ही जहर खाने (पीने) का प्रयास किया तो मेरे हाथ में झटका सा लगा। विषपात्र हाथ से छूट कर गिर गया। मैंने सोचा इस सुनसान में कौन आ गया! देखा लम्बा कुर्ता धोती पहने एक आदमी बोला- क्या पागल हो गये हो? इसको नष्ट करने का अधिकार तुम्हें नहीं है। यह बात सुनकर मैं अचरज में पड़ गया। कोई आदमी यहाँ था नहीं। यह कहाँ से आ गया। मैंने पूछा- आप कौन हैं ?? वह आदमी मुस्कुराया और बोला- आपको इस जीवन में बहुत काम करना है, जीवन को ऐसे नष्ट करने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है। यह बात बोलकर वह आदमी धीरे- धीरे समुद्र के अन्दर जाने लगा। जल में उसके पैर जमीन में चलने की तरह पड़ रहे थे। मैं ने भी पानी में उतरकर पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन कुछ दूर जाकर मैं समुद्र की लहर में डूब गया और बेहोश अवस्था में समुद्र के किनारे आ गया। ईश्वर कृपा से जब मुझे होश आया तब चारों तरफ से मछुआरे घेरे खड़े थे। मुझे अनुभव हो रहा था कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था।

🔵 मछुआरों को जब मैंने अपना परिचय दिया तो उन्होंने मुझे घर पहुँचा दिया। जब मौनी बाबा फिर से गाँव में भागवत् कथा करने आए तो उन्होंने मुझे बुलवाया। फिर मैंने उनसे दीक्षा भी ले ली। करीब दो वर्ष बाद मैं जगन्नाथपुरी रथ यात्रा देखने गया था। उसी भीड़ में फिर मेरी मुलाकात मौनी बाबा से हो गई। वे मुझे एकांत में ले गए और राष्ट्र निर्माण के बारे में विचार विमर्श करने लगे। उन्होंने कहा- आपको मत्त जी के पास जाना है। वे हरिद्वार में हैं। गायत्री के बारे में, राष्ट्र निर्माण के बारे में समझाते हैं। वर्ष १९९६ में पहली बार गायत्रीतीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार आया, गुरु जी (मत्त जी) के बारे में बाबाजी से सुन रखा था। मैं दो घंटे शान्तिकुञ्ज का दर्शन करता रहा। अचानक मुझे स्मरण हो आया, जहर पीने का प्रयास करते समय जिस व्यक्ति को मैंने देखा था, वही स्वरूप आचार्य श्रीराम शर्मा जी के चित्र में पाया। मैं बार- बार सोचने लगा कि इन्होंने ही मेरे प्राण की रक्षा की है। इस शरीर से वे क्या कार्य कराएँगे वही जाने।

🔴 मैं गौ रक्षा समिति में १९९८ में काम कर रहा था। उड़ीसा से बिहार प्रांत में आया। मैं चकाई में गौ रक्षा हेतु कार्य करने लगा। उसमें गायत्री परिवार के परिजन भी शामिल हो गए। धीरे- धीरे सम्पर्क बढ़ता गया। २००९ में ट्रस्ट का गठन हुआ। अब चकाई में गौशाला निर्माण, प्राकृतिक चिकित्सा के साथ- साथ आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण के कार्य में लगा हुआ हूँ। मैं गुरु कृपा से इस गायत्री परिवार से जुड़ गया हूँ। परम पूज्य गुरुदेव के विचारों पर चलकर समाज सेवा के कार्य में संलग्न हूँ। जिन्होंने मेरी प्राण रक्षा की है, यह जीवन अब उन्हीं का है।                    
  
🌹 उड़िया बाबा जमुई (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/pran

👉 आज का सद्चिंतन 21 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 April 2017


👉 शाश्वत सौन्दर्य का बोध

🔵 मैंने पूछा-‘‘मैं किसे प्यार करूँ?’’ -तो ध्यान की गहराइयों से एक आवाज आयी-‘‘उन्हें, जिन्हें लोग दलित, गर्हित और गया-गुजरा समझते हैं। जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं। उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होगे।’’

🔴 मैंने कहा-‘‘लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।’’ मेरी प्यारी आत्मा ने कहा-‘‘तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौन्दर्य की खोज करो, जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधले बादलों में आकाश की नीलिमा के सदृश, प्रच्छन्न शान्ति लिए बैठा है। जब बाह्य आवरणों का धुँधला बादल छट जाएगा तो सौन्दर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही नहीं जाएगा।’’

🔵 मैंने जानना चाहा-ऐसा भी तो है, लोग शरीर, कुल-जाति से सुन्दर होते हुए भी मानसिक मलीनता से ग्रस्त हैं। वासनाओं के अँधेरों से घिरे हैं। तब क्या मैं उनसे घृणा करूँ? हृदयाकाश में प्रदीप्त च्योतिर्मय सूर्यमण्डल से आता हुआ एक स्वर पुनः गूँजा-नहीं, घृणा मत करना, घृणा उनके अँधेरों को और अधिक घना करेगी। इससे उनकी मलीनता और अधिक प्रगाढ़ होगी। उन्हें अधिक और अधिक प्यार की जरूरत है। प्रेम का निर्मल जल उन्हें परिशुद्ध करेगा। प्रेम की उज्ज्वलता उनके अँधेरों को प्रकाशित करेगी और वासनाओं को समाप्त। मलीनताओं के नष्ट होते ही उनका शाश्वत सौन्दर्य स्वतः प्रकट हो जाएगा। वैसा ही सौन्दर्य जिसके ध्यान में तुम इन क्षणों में तल्लीन हो।

🔴 तो मैंने कहा-‘‘माँ! संसार कोलाहलपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूँज रहे हैं, तुम बताओं मैं सुनूँगा क्या?’’ अविचल और शान्तभाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई वेदमाता गायत्री की एक और स्वर झंकृति सुनायी दी-‘‘वत्स! उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है, न ओठ और न कण्ठ। नीरव अन्तराल से जो मौन प्रेरणाएँ और परागान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव जीवन धन्य हो जाएगा।’’

🔵 तभी से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन-दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। उन्हें भी मैं अपने निर्मल प्रेम के जल से धोता हूँ, जो वासनाओं की मलीनता से ग्रस्त हैं। मेरे अन्दर अब प्यार के सिवा और कुछ नहीं। तब से मैं हृदय गुहा में असीम सौन्दर्य के ध्यान में निमग्न हूँ, तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्दपूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमण्डल का कोई अदृश्य गायक गाता और शाश्वत सौन्दर्य का बोध कराता रहता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 35

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 14)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 संसार में जितने भी महान पुरुष हुए हैं उनकी महानता का एक ही आधार स्तम्भ है कि उन्होंने अपने समय का पूरा-पूरा उपयोग किया। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। जिस समय लोग मनोरंजन, खेल-तमाशों में मशगूल रहते हैं, व्यर्थ आलस्य प्रमाद में पड़े रहते हैं, उस समय महान् व्यक्ति महत्त्वपूर्ण कार्यों का सृजन करते रहते हैं। ऐसा एक भी महापुरुष नहीं जिसने अपने समय को नष्ट किया हो और वह महान् बन गया हो। समय बहुत बड़ा धन है। भौतिक धन से भी अधिक मूल्यवान्। जो इसे भली प्रकार उपयोग में लाता है वह सभी तरह के लाभ प्राप्त कर सकता है। छोटे से जीवन में भी बहुत बड़ी सफलतायें प्राप्त कर लेता है। वह छोटी-सी उम्र में ही दूसरों से बहुत आगे बढ़ जाता है।

🔵 समय जितना कीमती और फिर न मिलने वाला तत्व है उतना उसका महत्व प्रायः हम लोग नहीं समझते। हममें से बहुत-से लोग अपने समय का बहुत ही दुरुपयोग करते हैं, उसको व्यर्थ की बातों में नष्ट करते रहते हैं। आश्चर्य है समय ही ऐसा पदार्थ है जो एक निश्चित मात्रा में मनुष्य को मिलता है लेकिन उसका उतना ही अधिक अपव्यय भी होता है। हममें से कितने लोग ऐसा सोचते हैं कि हमारा कितना समय आवश्यक और उपयोगी कार्यों में लगता है और कितना व्यर्थ के कामों में, सैर-सपाटे, मित्रों में गपशप, खेल-तमाशे, मनोरंजन, आलस्य, प्रमाद आदि में? हम कितना नष्ट करते हैं, व्यर्थ की बकवास, अनावश्यक कार्यों में? हम जितना समय नष्ट करते हैं यदि उसका लेखा-जोखा लें तो प्रतीत होगा कि अपने जीवन धन का एक बहुत बड़ा भाग हम अपने आप ही व्यर्थ नष्ट कर डालते हैं समय के रूप में। काश एक-एक मिनट, घण्टे, दिन का हम उपयोग करें तो कोई कारण नहीं कि हम जीवन में महान् सफलताएं प्राप्त न करें।

🔴 समय की बरबादी का सबसे पहला शत्रु है किसी काम को आगे के लिये टाल देना। ‘आज नहीं कल करेंगे।’ इस कल के बहाने हमारा बहुत-सा वक्त नष्ट हो जाता है। स्वेटमार्डेन ने लिखा है ‘इतिहास के पृष्ठों में कल की धारा पर कितने प्रतिभावानों का गला कट गया, कितनों की योजनायें अधूरी रह गईं, कितनों के निश्चय बस यों ही रह गये, कितने पछताते, हाथ मलते रह गये! कल असमर्थता और आलस्य का द्योतक है।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 86)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 जन्मतः सभी अनगढ़ होते हैं। जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार सभी पर न्यूनाधिक मात्रा में लदे होते हैं। वे अनायास ही हट या भग नहीं जाते। गुरु कृपा या पूजा-पाठ से भी वह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उनके समाधान का एक ही उपाय है-जूझना। जैसे ही कुविचार उठें, उनके प्रतिपक्षी सद्विचारों की सेना को पहले ही प्रशिक्षित, कटिबद्ध रखा जाए और विरोधियों से लड़ने को छोड़ दिया जाए। जड़ जमाने का अवसर न मिले तो कुविचार या कुसंस्कार बहुत समय तक ठहरते नहीं। उनकी सामर्थ्य स्वल्प होती है।

🔵 वे आदतों और प्रचलनों पर निर्भर रहते हैं। जबकि सद्विचारों के पीछे तर्क, तथ्य, प्रमाण, विवेक आदि अनेकों का मजबूत समर्थन रहता है। इसलिए शास्त्रकार की उक्ति ऐसे अवसरों पर सर्वथा खरी उतरती है, जिनमें कहा गया है कि ‘‘सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं।’’ इसी बात को यों भी कहा जाता है कि ‘‘परिपक्व किए गए सुसंस्कार ही जीतते हैं, आधार रहित कुसंस्कार नहीं।’’ जब सरकस के रीछ-वानरों को आश्चर्यजनक कौतुक, कौतूहल दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि अनगढ़ मन और जीवन क्रम को संकल्पवान साधनों के हंटर से सुसंस्कारी न बनाया जा सके।

🔴 गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने से त्रिवेणी संगम बनने और उसमें स्नान करने वाले का काया-कल्प होने की बात कही गई है। बगुले का हंस और कौए का कोयल आकृति से बदल जाना तो सम्भव नहीं है, पर इस आधार पर विनिर्मित हुई अध्यात्म धारा का अवगाहन करने से मनुष्य का अंतरंग और बहिरंग जीवन असाधारण रूप से बदल सकता है, यह निश्चित है। यह त्रिवेणी उपासना, साधना और आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं हैं जिन्हें इतने समय में, इस विधि से, इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके।

🔵 यह चिंतन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्चस्तरीय परिवर्तन हैं, जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरंतर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई विचारधारा में अपने गुण, कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु-पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है। पूजा कुछ थोड़े समय की हो सकती है, पर साधना तो ऐसी है, जिसके लिए गोदी के बच्चे को पालने के लिए निरंतर ध्यान रखना पड़ता है। फलवती भी वही होती है। जो लोग पूजा को बाजीगरी समझते हैं और जिस-तिस प्रकार के क्रिया-कृत्य करने भर के बदले ऋद्धि-सिद्धियों के दिवास्वप्न देखते हैं, वे भूल करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.2

👉 आज का सद्चिंतन 20 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 April 2017


👉 जगज्जननी की कृपा से नारी का स्वरूप बोध

🔵 हे माँ! आपका सान्निध्य पाकर हम जान सके कि ‘नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, ऋद्धि है और वह सब कुछ है जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है।’ यदि उसे श्रद्धासिक्त सद्भावना अर्पित की जाय, तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है।

🔴 आपका वात्सल्य पाकर हमें बोध हुआ कि नारी सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हें केवल पुरुष के कन्धों पर डाल दिया गया होता, तो वह न जाने कब लड़खड़ा गया होता, किन्तु विशाल भवनों का असह्य भार वहन करने वाली नींव के समान वह उतनी ही कर्त्तव्यनिष्ठा, उतने ही मनोयोग, सन्तोष और उतनी ही प्रसन्नता के साथ उसे आज भी ढोए चल रही है। वह मानवीय तपस्या की साकार प्रतिमा है।

🔵 भौतिक जीवन की लालसाओं को उसी की पवित्रता ने रोका और सीमाबद्ध करके उन्हें प्यार की दिशा दी। प्रेम नारी का जीवन है। अपनी इस निधि को वह अतीत काल से मानव पर न्योछावर करती आयी है। कभी न रुकने वाले इस अमृत निर्झर ने संसार को शान्ति और शीतलता दी है।

🔴 हे जगज्जननी! आपकी कृपा से हम अपने अन्तःकरण में इस ऋषिवाणी को अनुभव करते हैं-
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्ति।।

🔵 हे देवि! समस्त संसार की सब विद्याएँ तुम्हीं से निकली हैं और सब स्त्रियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं, समस्त विश्व एक मात्र तुम्हीं से पूरित है। अतः तुम्हारी स्तुति किस प्रकार की जाय?

🔴 अन्तःकरण में इस भाव की घनीभूत अनुभूति से प्रेरित होकर हम सब आपकी सन्तानें, आपकी द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर अखण्ड च्योति के इस अंक को ‘नारी-अंक’ के रूप में आपको समर्पित करते हैं। भावों की इस पुप्षाञ्जलि को स्वीकार करो माँ! और हम सब पर सदा की भाँति अपने आँचल की वरद्च्छाया बनाये रखना।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 34

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 13)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिये असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है लेकिन एक ऐसी भी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीं पाया जा सकता और वह है—समय। एक बार हाथ से निकला हुआ समय फिर कभी हाथ नहीं आता। कहावत है ‘‘बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द कभी वापस नहीं बुलाये जा सकते।’’ समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता।

🔵 समय ही जीवन की परिभाषा है, क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। समय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है। समय का दुरुपयोग करना जीवन का नष्ट करना है। समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रतिक्षण, मिनट, घन्टे, दिन, महलने, वर्षों के रूप में निरन्तर अज्ञात दिशा को जाकर विलीन होता रहता है। समय की अजस्र धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है और फिर शून्य में विलीन हो जाती है फ्रैंकलिन ने कहा है—‘‘समय बरबाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।’’ निस्सन्देह वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं हमारा कर्तव्य है कि हम समय का पूरा पूरा सदुपयोग करें।

🔴 सचमुच जो व्यक्ति अपना तनिक सा भी समय व्यर्थ नष्ट करते हैं उन्हें समय अनेकों सफलताओं से वंचित कर देता है। नेपोलियन ने आस्ट्रेलिया को इसलिए हरा दिया कि वहां के सैनिकों ने पांच ही मिनटों का विलम्ब कर दिया उसका सामना करने में। लेकिन वही नेपोलियन कुछ ही मिनटों में बन्दी बना लिया गया क्योंकि उसका एक सेनापति कुछ ही मिनट विलम्ब से आया। वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन की पराजय इसी कारण से हुई। समय की उपेक्षा करने पर देखते देखते विजय का पासा पराजय में पलट जाता है लाभ हानि में बदल जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

👉 देवशिशु ने जगायी सद् बुद्धि

🔵 यह घटना १९९० की है, जब मैं परम वन्दनीया माताजी से दीक्षा लेकर पहली बार नवरात्रि अनुष्ठान में था। इससे पहले कि मैं घटना का जिक्र करूँ, यह बता दूँ कि मेरे यहाँ बिना मांसाहार या मछली के भोजन नहीं बनता था। गायत्री दीक्षा लेने एवं नवरात्रि में अनुष्ठान करने के कारण मैंने मांस- मछली खाना बंद कर दिया। मैं एक बार दाल रोटी चटनी और शाम को फलाहार लेने लगा। इसके चलते परिवार के सभी सदस्य, माता- पिता भाई, मेरी अर्द्धांगिनी को छोड़ कर सभी, मुझसे नाराज रहने लगे और बातचीत बंद कर दी।

🔴 नवरात्रि के अंतिम दिन की बात है। मेरा पाँच वर्ष का भतीजा अमित अचानक किसी कारण से डर गया। वह बुरी तरह रोने- चिल्लाने लगा। जो भी उसे गोद में उठाने जाता, वह छिटककर उससे दूर जा खड़ा होता और आँखें फाड़कर उसकी ओर देखने लगता। दादा- दादी, माता- पिता सभी परेशान हो गए। बच्चा जोर- जोर से चिल्ला रहा था- तुम लोगों के इतने बड़े- बड़े दाँत हैं, तुम लोग मुझे खा जाओगे, मैं तुम्हारे पास नहीं आऊँगा। सभी हतप्रभ थे, कुछ समझ नहीं पा रहे थे। मैं जप में बैठा था। करीब आधे घण्टे से यह सिलसिला चल रहा था। आखिर में थक- हारकर सब लोग मुझे पुकारने लगे- शंकर देखो न मुन्ने को क्या हो गया है। हम लोगों से डर रहा है। कहता है हमारे सिर पर सींग है, हमारे बड़े- बड़े दाँत हैं, हम उसे खा जाएँगे।

🔵 सभी लोगों का ध्यान दूसरी ओर देख बच्चा चुपचाप जाकर एक मेज के नीचे दुबककर बैठ गया। उसकी आँखों में आँसू भरे थे। बच्चे को क्या कष्ट है यही अज्ञात था। मैंने सोचा सबसे पहले उसका भय दूर करना चाहिए। मैंने आँखें बंद कर गायत्री का ध्यान किया। एक हल्की सी आवाज सुनाई पड़ी- आचमनी का जल बच्चे को पिला। मैं आचमनी का जल लेकर उसके पास गया। मुझे पास देखकर बच्चा जल्दी से आकर मुझसे चिपक गया। गोद में उठाकर दुलारा तो देखा उसके मुख पर एक पूरी आश्वस्ति का भाव था। वह मेरे पास आकर अपने- आपको सुरक्षित महसूस कर रहा था।

🔴 ध्यान में मिले निर्देश के अनुसार मैंने आचमनी का जल पिलाया। बच्चा गोद में ही सो गया। इस घटना के बाद मेरे प्रति परिवार का मनोभाव बदल गया। फिर उन्होंने भी माँसाहार त्याग दिया और दीक्षा लेकर गायत्री परिवार से जुड़ गए।           

🔵 माँसाहार आसुरी प्रवृत्ति है यह मैंने पुस्तकों में तो पढ़ा था, पर सरल स्वभाव शिशु के स्वच्छ हृदय में यह बात इस प्रकार मूर्त्त रूप में प्रकट हुई कि मेरे परिवार का वातावरण ही बदल दिया। इसे मैं गायत्री उपासना का ही प्रतिफल मानता हूँ।                     
  
🌹 जयशंकर रावत आसनसोल (प.बंगाल)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/j

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 85)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 तीसरा पक्ष अहंता का है। शेखीखोरी, बड़प्पन, ठाट-बाट, सजधज, फैशन आदि में लोग ढेरों समय और धन खर्च करते हैं। निजी जीवन तथा परिवार में नम्रता और सादगी का ऐसा ब्राह्मणोचित माहौल बनाए रखा गया कि अहंकार के प्रदर्शन की कोई गुंजायश नहीं थी। हाथ से घरेलू काम करने की आदत अपनाई गई। माताजी ने मुद्दतों हाथ से चक्की पीसी है। घर का तथा अतिथियों का भोजन तो वे मुद्दतों बनाती रही हैं। घरेलू नौकर की आवश्यकता तो तब पड़ी जब बाहरी कामों का असाधारण विस्तार होने लगा और उनमें व्यस्त रहने के कारण माताजी का उसमें समय दे सकना सम्भव नहीं रह गया।

🔵 यह अनुमान गलत निकला कि ठाट-बाट से रहने वालों को बड़ा आदमी समझा जाता है और गरीबी से गुजारा करने वाले उद्विग्न, अभागे, पिछड़े पाए जाते हैं। हमारे सम्बन्ध में यह बात कभी लागू नहीं हुई। आलस्य और अयोग्यतावश गरीबी अपनाई गई होती, तो अवश्य वैसा होता, पर स्तर उपार्जन योग्य होते हुए भी यदि सादगी का हर पक्ष स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया है, तो उसमें सिद्धांतों का परिपालन ही लक्षित होता है।

🔴 जो भी अतिथि आए, जिन भी मित्र सम्बन्धियों को रहन-सहन का पता चलता रहा, उनमें से किसी ने भी इसे दरिद्रता नहीं कहा, वरन् ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह ही माना। मिर्च न खाने, खड़ाऊ पहनने जैसे एकाध नियम सादगी के नाम पर अपनाकर लोग सात्त्विकता का विज्ञापन भर करते हैं। वस्तुतः आध्यात्मिकता निभती है सर्वतोमुखी संयम और अनुशासन से। उसमें समग्र जीवनचर्या को ब्राह्मण जैसी बनाना एवं अभ्यास में उतारने के लिए सहमत करना होता है। यह लंबे समय की और क्रमिक साधना है। हमने इसके लिए अपने को साधा और जो भी अपने साथ जुड़े रहे उन्हें यथा सम्भव सधाया।

🔵 संचित कुसंस्कारों का दौर हर किसी पर चढ़ता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर अपनी उपस्थिति देते रहे, पर उन्हें उभरते ही दबोच लिया गया। बेखबर रहने, दर-गुजर करने से ही वे पनपते और कब्जा जमाने में सफल होते। वैसा अवसर जब-जब आया उन्हें खदेड़ दिया गया। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों पर ध्यान रखा गया कि इसमें साधक के अनुसार सात्विकता का समावेश है या नहीं। संतोष की बात है कि इस आंतरिक महाभारत को जीवन भर लड़ते रहने के कारण अब चलते समय अपने को विजयी घोषित कर सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.2

👉 "सुनसान के सहचर" (अन्तिम भाग)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 हमारी उपासना और साधना साथ- साथ मिलकर चली हैं। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये, वरदान केवल यह माँगा कि हमें अपनी सहृदयता और विशालता मिले, जिसके अनुसार अपने में सबको और सबमें अपने को अनुभव किया जा सकना सम्भव हो सके। १४ महा पुरश्चरणों का तप, ध्यान, संयम सभी इसी परिधि के इर्द- गिर्द घूमते रहे हैं।           

🔵 अपनी साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए, समक्ष आये उतार- चढ़ावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो, तो वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालों के लिए यह सब कैसे सम्भव हो सका है? इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढ़ना हो, तो हमारी जीवन यात्रा बहुत मार्गदर्शन कर सकती है। वस्तुत: हमने एक प्रयोगात्मक जीवन जिया है। आध्यात्मिक आदर्शों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है, हम ऐसे तथ्य की खोज करते हैं और उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधियाँ केन्द्रित करते रहे हैं। हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा- पूरा सहयोग रहा, सो अनावश्यक जाल- जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरसता उपलब्ध होती रही है। उसी की चर्चा इन पंक्तियों में इस उद्देश्य से कर रहे हैं कि जिन्हें मार्ग पर चलने और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढने की आवश्यकता है उन्हें अनुकरण के लिए प्रमाणित आधार मिल सके।

🔴 आत्मिक प्रगति के पथ पर एक सुनिश्चित एवं क्रमबद्ध योजना के अनुसार चलते हुए 'हमने एक सीमा तक अपनी मंजिल पूरी कर ली हें और उतना आधार प्राप्त कर लिया है जिसके बल पर यह अनुभव किया जा सके कि परिश्रम निरर्थक नहीं गया, प्रयोग असफल नहीं रहा । क्या विभूतियाँ या उपलब्धियाँ प्राप्त हुई इसकी चर्चा हमारे मुँह शोभा नहीं देती। इसके जानने- सुनने और खोजने का अवसर हमारे चले जाने के बाद ही आना चाहिए। उसके इतने अधिक धक प्रमाण बिखरे पड़े मिलेंगे कि किसी अविश्वासी को भी यह विश्वास करने के लिए विवश किया जा सकेगा, कि न तो आत्म विद्या का विज्ञान गलत है और न उस मार्ग पर सही ढंग से चलने वाले के लिए आशाजनक सफलता प्राप्त करने में कोई कठिनाई है। इस मार्ग पर चलने वाले आत्म शान्ति आन्तरिक और दिव्य अनुभूति की परिधि में घूमने वाली अगणित उपलब्धियों से कैसे लाभान्वित हो सकते है? इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ढूँढ़ने के लिए भावी शोधकर्ताओं को हमारी जीवन- प्रक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। समयानुसार ऐसे शोधकर्ता उन विशेषताओं और विभूतियों के अगणित प्रमाण- प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं ढूँढ़ निकालेंगे जो आत्मवादी- प्रभु जीवन मे हमारी तरह हर किसी को उपलब्ध हो सकना सम्भव है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan.4

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 12)

🌹 समय जो गुजर गया, फिर न मिलेगा

🔴 काम न करने का तथा किसी व्यवसाय में अभिरुचि न होने का कारण यह है कि एक सी स्थिति में रहते हुए मनुष्य को उकताहट पैदा होती है। यह स्वाभाविक भी है। मनोरंजन की आवश्यकता सभी को होती है। सन्त-महात्मा भी प्रकृति-दर्शन और तीर्थ यात्रा आदि के रूप में मनोरंजन प्राप्त किया करते हैं। यह उकताहट यदि सम्हाली न जाय तो किसी व्यसन के रूप में ही फूटती है। व्यसन की शुरुआत खाली समय में कुसंगति के कारण ही होती है।

🔵 आज-कल इस प्रकार के साधनों की किसी प्रकार की कमी नहीं है। निरुत्साह और मानसिक थकावट दूर करने के लिये विविध मनोरंजन के साधन आज बहुत बढ़ गये हैं किन्तु समय के सदुपयोग और जीवन की सार्थकता की दृष्टि से, इनमें से उपयोगी बहुत कम ही दिखाई देते हैं। अधिकांश तो धन-साध्य और मनुष्य का नैतिक पतन करने वाले ही हैं। इसलिए यह भी आवश्यक हो गया है कि जब कुछ समय श्रम से उत्पन्न थकावट को दूर करने के लिए निकालें तो यह भली-भांति विचार करलें कि यह जो समय उक्त कार्य में लगाने जा रहे हैं उसका आध्यात्मिक उत्थान और आत्म-विकास के लिये क्या सदुपयोग हो रहा है? मनोरंजन केवल प्रसुप्त वासना की पूर्ति के लिये न हो वरन् उसमें भी आत्म-कल्याण की भावना सन्निहित बनी रहे तो उस समय का उपयोग सार्थक माना जा सकता है।

🔴 फुरसत और खाली समय का उपयोग अच्छे-बुरे किसी भी काम में हो सकता है। नई-नई विद्या, कला, लेखन, शास्त्रार्थ के द्वारा नई सूझ और आध्यात्मिक बुद्धि जागृत होती है। इससे अपना व समाज दोनों का ही कल्याण होता है। सत्कर्म में लगाये हुए समय से मनुष्य का जीवन सुखी, समुन्नत तथा उदात्त बनता है। जापान की उन्नति का प्रमुख कारण फुरसत के समय का सदुपयोग ही है। वहां सरकारी काम के घण्टों के बाद का समय लोग कुटीर उद्योगों में लगाते हैं, छोटे-छोटे खिलौने, घड़ियां आदि बनाते हैं, इससे वहां की राष्ट्रीय सम्पत्ति बढ़ी है, लोगों की जीवन सुखी हुआ है और नैतिक सदाचार का प्रसार हुआ है। खाली समय का उपयोग जिस प्रकार के कार्यों में करेंगे वैसी ही उन्नति अवश्य होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (अंतिम भाग)

🌹 इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता

🔵 इतने पर भी एक कठिनाई फिर भी ज्यों-की-त्यों रह जाती है कि अंत:करण की गहराई तक प्रवेश करके उन्हें क्रियान्वित होते देखने की आशा-संभावना तभी पूरी होती है, जब उस हेतु प्रखर प्रतिभाएँ निखरकर, आगे बढ़कर आएँ और मोर्चा सँभालें। यह कार्य घटिया लोगों का नहीं है, उनकी कृतियाँ उपहासास्पद बनती हैं। दूरवर्ती अनजान लोग किसी की वाचालता पर सहज विश्वास नहीं करते और जो मन, वचन, कर्म से आदर्शों के प्रति समर्पित हों, ऐसे लोग ढूँढ़े नहीं मिलते। इस विसंगति के कारण लोकमानस में अभीष्ट परिवर्तन बन नहीं पड़ता और अनेक विडम्बनाओं की तरह धर्मोपदेश भी मनोरंजन का एक निमित्त कारण बनकर रह जाता है।      

🔴 कठिनाई यही दूर करनी है। स्रष्टा का अवतरण इन्हीं दिनों इस प्रकार होना है, जिसमें भावनाशील लोग अपनी कुत्सा-कुंठाओं पर विजय प्राप्त करें। ब्राह्मणोचित जीवन अंगीकार करें और अपना समग्र व्यक्तित्व इस स्तर का ढालें, जिसके प्रभावक्षेत्र में आने वाले सभी लोग यह विश्वास कर सकें कि उत्कृष्टता की पक्षधर आदर्शवादिता, कार्यरूप में अपनाई जा सकती है और उसमें हानि-ही-हानि सहनी पड़े, ऐसी बात नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सुविधा-साधनों में कुछ कमी हो सकती है, पर उसके बदले जो आत्मसंतोष, लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह उपलब्ध होता है, वह इतने कम महत्त्व का नहीं है, जिसे संकीर्ण स्वार्थपरता के बंधनों में बँधे, रोते-कलपते जीवन की तुलना में किसी भी प्रकार कम महत्त्व का माना जा सके।                          

🔵 इन दिनों यही होना चाहिए, संभवत: होने भी वाला है। भाव-संवेदना मात्र कल्पना-जल्पना के क्षेत्र तक सीमित न रहे वरन् कार्यक्षेत्र में उतरे और अपनी सामर्थ्य के अनुरूप प्रचार-प्रयोजनों में से उन्हें अपनाएँ, जो उसके लिए संभव और स्वाभाविक हैं।

🔴 ऐसे परामर्श हर परिष्कृत अंत:करण में दैवी प्रेरणा से अनायास ही अवतरित हो रहे हैं। आवश्यकता मात्र उन्हें हृदयंगम करने और कार्यरूप में परिणत करने भर की है।

👉 प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 19 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 April 2017

👉 शान्तिकुञ्ज - प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष

🔵 कल्पवृक्ष का अस्तित्व स्वर्गलोक में माना जाता है और कहा जाता है कि उसकी अमुक विधि से पूजा-प्रार्थना करने पर अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस अदृश्य एवं रहस्यमय प्रतिपादन में सन्देह करने की गुंजाइश है।

🔴 किन्तु भूलोक के इस कल्पवृक्ष का अनुभव हर कोई कर सकता है, जिसे शान्तिकुञ्ज कहते हैं। परम पूच्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी ने इसे रोपा, अपनी सम्मिलित तपशक्ति से खाद-पानी देकर इसे बड़ा किया। ४७ वर्षों में अब यह इतना बड़ा हो गया है कि समस्त विश्व को इसके शीतल समीर का अहसास होने लगा है। यह अद्भुत, अनुपम और असाधारण है। यह दिव्य भी है और महान भी। इसके अन्तराल में सम्भावनाओं और सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं। जरूरत इसकी छाया में बसने और उन्हें उठाने की है।

🔵 पूज्य गुरुदेव के शब्दों में इसी कल्पवृक्ष पर भगवान् महाकाल का घोंसला है। यही युगान्तरीय चेतना का हेडक्वार्टर है। विश्व के नवनिर्माण में लगी समस्त सूक्ष्म-शक्तियों के अभियान का केन्द्रीय कार्यालय यही है। हिमालय के दिव्यक्षेत्र में बसने वाली ऋषिसत्ताएँ सूक्ष्म-रूप से यहाँ विचरण करती हैं। यहाँ आने वाले लोगों के हृदयों में उज्ज्वल प्रेरणाओं का संचार करती हैं। दिव्य देहधारी देवसत्ताएँ यहाँ आने वाले आर्त, कष्टपीड़ित जनों की पीड़ा निवारण कर उनकी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं।

🔴 यह देवभूमि सबसे प्रत्यक्ष, सबसे निकट और सबसे वरदायी देवता हैं। यहाँ के कण-कण में व्याप्त प्रकाश ऋषियुग्म का तप प्राण काले, कुरूप और अनगढ़ लोहे जैसे व्यक्तित्व को खरे सोने में बदल देता है। जीवन की दशा और दिशा आमूल-चूल बदल जाती है। उनके आशीर्वाद का अमृत सिंचन जीवन में नवप्राण भरता है, नयी ऊर्जा का संचार करता है।

🔵 कहा जाता है कि कल्पवृक्ष से भी कुछ प्राप्त करने का एक निश्चित विधि-विधान है। शान्तिकुञ्ज भी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। इससे वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है, जो कल्पवृक्ष से अभीष्ट है। शर्त एक ही है कि अभीष्ट की प्राप्ति के लिए यहाँ रहकर साधनात्मक दिनचर्या अपनाई जाय। इसकी छाया में रहकर साधना परायण जीवन जीने वालों की झोली मनचाहे अनुदानों-वरदानों से भरपूर हुए बिना नहीं रहती।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 33
 
 
 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 April 2017


👉 घृणास्पद व्यक्ति नहीं, दुष्प्रवृति

🔵 खेतडी नरेश ने स्वामी विवेकानंद को एकबार अपनी सभा में आमंत्रित किया। स्वामीजी वहाँ गये भी और लोगों को तत्त्वज्ञान का उपदेश भी किया। समाज सेवा का प्रसंग आया और वे समझाने लगे कि मनुष्य छोटा हो या बड़ा, शिक्षित हो या अशिक्षित उसका अस्तित्व समाज में टिका हुआ है, इसलिए बिना किसी भेदभाव के ईश्वर उपासना की तरह ही समाज-सेवा का व्रत भी पालन करना चाहिए। उसमें कोई व्यक्ति छोटा नहीं होता, वरन् उपासना की तरह सेवा भी मानव अंतकरण को विशाल ही बनाती है।

🔴 आगे की बात स्वामी जी पूरी नहीं कर सके, क्योंकि उधर से नर्तकियों का एक दल आ पहुँचा। सामंतों का स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है कि उनका ध्यान उधर चला गया, इसलिये प्रवचन अपने आप समाप्त हो गया। इधर नर्तकियों के नृत्य की तैयारी होने लगी। जैसे ही एक नर्तकी ने सभा मंडप में प्रवेश किया कि स्वामी जी का मन धृणा और विरक्ति से भर गया। वे उठकर वहाँ से चल दिए। स्वामी जी की यह उदासीनता और किसी के लिए कष्टकारक प्रतीत हुई हो या नही, पर उस नर्तकी के हृदय को आघात अवश्य पहुँचा।

🔵 घृणा चाहे जिस व्यक्ति के प्रति हो, अच्छी नहीं। बुरे कर्मों का फल कर्ता आप भोगता है, भगवान् की सृष्टि ही कुछ ऐसी है कि खराब काम के दंड से कोई भी बच नहीं सकता, पर यह दंड-व्यवस्था उसी के हाथों तक सीमित रहनी चाहिए, वह सर्वद्रष्टा है पर मनुष्य की पहुँच किसी के सूक्ष्म अंतःकरण तक नहीं, इसलिए उसे केवल कानूनी दण्ड़ का ही अधिकार एक सीमा तक प्राप्त है। घृणा तो दुश्मनी ही पैदा करती है, भले ही वह कोई दलित या अशक्त व्यक्ति क्यों न हो। प्रतिशोध कभी भी अहित कर सकता है। स्वामी दयानंद जी के घात का कारण पूछो तो ऐसी ही घृणा थी, जो मनुष्य के लिए कभी अपेक्षित नहीं।

🔴 नृत्य प्रारंभ हुआ। नर्तकी ने अलाप किया- "प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो" और वह ध्वनि स्वामी जी के कानों में पडी़। स्वामी जी चौंक पडे। मस्तिष्क में जोर के झटके से विचार उठा-परमात्मा का अवगाहन हम इसीलिये तो करते है कि पाप परिस्थितियों के कारण हमारे अंतकरण कलुषित हुए पडे हैं, हम उनमे निर्मल और निष्पाप बने। सामाजिक परिस्थितियों से कौन बचा है' यह बेचारी नर्तकी ही दोषी क्यों ? मालूम नहीं समाज की किस अवस्था के कारण इस बेचारी को इस वृत्ति का सहारा लेना पडा़ अन्यथा वह भी किसी प्रतिष्ठित घराने की बहू और बेटी होती।

🔵 अब तक मस्तिष्क में जो स्थान घृणा ने भर रखा था, वह अब भस्मीभूत हो गया। अब स्वच्छ करुणा और विवेक का उदय हुआ-संसार में व्यक्ति घृणा का पात्र नहीं, वृत्ति को ही धृणित मानना चाहिए।

🔴 स्वामी विवेकानंद वापस लौटे, अपना स्थान पुन-ग्रहण किया। लोगों के मन में उनके प्रति जो श्रद्धा थी वह और द्विगुणित हो उठी। स्वामी जी जब तक नृत्य हुआ, कला की सूक्ष्मता और उससे होने वाली मानसिक प्रसन्नता का अध्ययन करते रहे। विद्यार्थी के समान उन्होंने संपूर्ण रास केवल अध्ययन दृष्टि से देखा, न कोई मोह था न आसक्ति। नृत्य समाप्त होने पर ही वापस अपने डेरे को लौटे।

🔵 इतनी भूल सुधार के कारण उन्होंने सभी सभासदो और नर्तकी को भी यह शिक्षा तो दी ही दी कि "व्यक्ति को घृणास्पद मानने का अर्थ यह नहीं कि वृत्ति को भी घृणा न की जाए। उससे तो बचना ही चाहिए। आजीविका के लिए वह नर्तकी कला प्रदर्शन तो करती रही, पर उस दिन उसे स्वामी जी के प्रति श्रद्धा ने वासना से विरक्ति दे दी और उसने आजीवन व्रतशील जीवनयापन किया। सभासदों में से अनेक ने अपनी दोष दृष्टि का परित्याग किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 139, 140

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 11)

🌹 समय जो गुजर गया, फिर न मिलेगा

🔴 आलस में समय गंवाने वाले कुसंग और कुबुद्धि के द्वारा उल्टे रास्ते तैयार करते हैं। कहते हैं ‘‘खाली दिमाग शैतान का घर।’’ जब कुछ काम नहीं होता तो खुराफात ही सूझती है। जिन्हें किसी सत्कार्य या स्वाध्याय में रुचि नहीं होती खाली समय में कुसंगति, दुर्व्यसन, ताश-तमाशे और तरह-तरह की बुराइयों में ही अपना समय बिताते हैं। समाज में अव्यवस्था का कारण कोई बाहरी शक्ति नहीं होती, अधिकांश बुराइयां, कलह और झंझट बढ़ाने का श्रेय उन्हीं को है जो व्यर्थ में समय गंवाते रहते हैं। मनुष्य लम्बे समय तक निष्प्रयोजन खाली बैठा नहीं रह सकता अतएव यदि वह भले काम नहीं करता तो बुराई करने में उसे देर न लगेगी। उसे अच्छा या बुरे, सच्चा हो चाहे काल्पनिक, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। इसलिये यदि उसे सही विषय न मिले तो वह बुराइयां ही ग्रहण करता है और उन्हें ही समाज में बिखेरता हुआ चला जाता है।

🔵 मनुष्य के अन्तःकरण में ही उसका देवत्व और असुरत्व विद्यमान है। जब तक हमारा देवता जागृत रहता है और हम विभिन्न कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहते हैं तब तक आन्तरिक असुरता भी दबी हुई पड़ी रहती है पर यह प्रसुप्त वासनायें भी अवकाश के लिये चुपचाप अन्तर्मन में जगती रहती हैं समय पाते ही देवत्व पर प्रहार कर बैठती हैं?

🔴 जब यह दिखाई दे कि अब अपने पास कोई काम शेष नहीं रहा तो मनुष्य अपने निवास के आस-पास की सफाई, वस्त्रों की हिफाजत, घर की मरम्मत, खेतों की देख-भाल, लेखन, ज्ञान विषयक चर्चा या किसी जीवनोपयोगी साहित्य का स्वाध्याय ही करने लग जाय। इससे टूटी-फूटी वस्तुओं की साज-सम्हाल, स्वास्थ्य-रक्षा और ज्ञान की वृद्धि ही होगी। समय का मूल्यांकन केवल रुपये पैसे से ही नहीं हो सकता। जीवन में और भी अनेकों पारमार्थिक व्यवसाय हैं। उन्हें भी देखना और ज्ञान प्राप्त करना हमारा धर्म होना चाहिए। सत्कार्यों में लगाये गये समय का परिणाम सदैव सुखदायक ही होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 39)

🌹 इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता

🔵 विचार क्रांति की सर्वोपरि आवश्यकता है। हेय चिंतन ही दरिद्रता, अशिक्षा, अस्वस्थता, कुचेष्टा और दुष्प्रवृत्तियों का निमित्त है। इन बीमारियों का अलग-अलग इलाज कारगर नहीं हो सकता। रक्त शोधक उपचार करने से ही आए दिन उगने वाले फोड़े-फुंसियों से छुटकारा मिलता है। जड़ सींचने से ही पेड़ हरा होता है। वह कार्य पत्तों को पोसने से पूरा होना संभव नहीं। विकास और सुधार के लिए तो अनेकानेक काम करने को पड़े हैं, पर यदि उन सबको समेटने की अपेक्षा विचारों का तारतम्य सही बिठा लिया जाए तो अन्यान्य बहुमुखी विकृतियों पर सहज काबू पाया जा सकता है। विचारों से ही कार्य विनिर्मित होते हैं। इन्हीं कारण उत्थान-पतन की भूमिका दृष्टिगोचर होती है। यदि विचारों को शालीनता, सज्जनता, नीति-निष्ठा कर्तव्यपरायणता और समाजनिष्ठा की दिशा में उन्मुख किया जा सके तो फिर शरीर एवं साधनों के माध्यम से मात्र वे ही कार्य बन पड़ेंगे, जो सुधार एवं विकास के लिये आवश्यक हैं।     

🔴 प्राचीनकाल में घर-घर अलख जगाने, संपर्क साधने और विचार-विनिमय करने जैसे कुछ ही कार्य ऐसे थे, जिनके सहारे लोकमानस का परिष्कार बन पड़ता था। अधिक लोगों को एक स्थान पर एकत्र करने के लिये सामूहिक कर्मकाण्डों की आवश्यकता होती थी, पर अब तो विज्ञान ने उन सभी कार्यों को सरल बना दिया है। यदि उन्हें योजनाबद्ध रूप से बड़े पैमाने पर किया जा सके तो क्षेत्र की व्यापकता होते हुए भी प्रयोजन की पूर्ति में अधिक कठिनाई न रहेगी।                          

🔵 प्रेस अपने समय का एक वरदान है। इसके द्वारा कम समय में अधिक लोगों तक सस्ते आधार पर पहुँचना संभव हो सकता है। लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, वीडियो तथा स्लाइड प्रोजेक्टर जैसे सस्ते उपकरण भी अधिक लोगों तक कम समय में विचारोत्तेजक प्रवाह पहुँचाने में समर्थ हो सकते हैं। संगीत-मंडलियाँ यदि योजनाबद्ध रूप से काम करें तो उनके सहारे भी जागरण का बड़ा काम बड़े परिमाण में बन सकना संभव हो सकता है। ऐसे ही अन्य छोटे-बड़े माध्यम से ढूँढ़े जा सकते हैं, जो उल्टी दिशा में बहते-प्रवाह को उलटकर सीधा कर सकें। यह प्रचार प्रतिभासम्पन्न लोगों की सहायता से और भी अच्छी तरह व्यापक परिधि में पूर्ण हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 23 June 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त क...