🔴 महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व में एक विशेषता यह थी कि वह हर स्तर के व्यक्ति को प्रभावित कर लेते थे। बडे लोगों के प्रति लोगों में सम्मान एवं श्रद्धा का भाव तो होता है, किंतु आत्मीयता नहीं होती। इसी प्रकार छोटों की विशेषताओं की प्रशंसा तो करते हैं किंतु उनके प्रति समानता का व्यवहार नहीं कर पाते। गाँधी जी में वह गुण था जिसके कारण वह समाज के हर वर्ग के साथ आत्मीयता का भाव स्थापित कर लेते थे तथा स्नेह एवं सम्मान दोनों समान रूप से प्राप्त कर लेते थे। वह वास्तव में जन नेता कहे जा सकते थे और उनका जादू सर चढ़कर बोलता था। प्रस्तुत घटना से उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष पर प्रकाश पड़ता है।
🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।
🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।
🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।
🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।
🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142
🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।
🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।
🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।
🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।
🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142







































