सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 16)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! सारे-के-सारे ये वो लोग हैं, जो मर गए हैं, जो सड़ गए हैं। लोभ के अलावा, लालच के अलावा, ख्वाहिशों के अलावा, तमन्नाओं के अलावा इनके पास कुछ नहीं है। जो आदमी खाली हो गए हैं और जो ढोल तरीके से पोले हैं, उनका हम क्या करेंगे? इनके लिए हम कुछ नहीं करेंगे और न इनसे समाज के लिए, भगवान् के लिए ही कुछ उम्मीद रखेंगे। किसी के लिए भी इनसे उम्मीद नहीं रखेंगे। इनको हम छोड़ देंगे।

🔶 मित्रो! हमारा मिशन जो इंसान में भगवान् का अवतरण करने के लिए और जमीन पर स्वर्ग की धाराओं को बहाने के लिए बोया और खड़ा किया गया है, उसके लिए हमें जिंदा आदमियों की जरूरत है। जिंदा आदमी ही इस मिशन को आगे लेकर चलेंगे। मुरदा आदमी ज्यादा से ज्यादा माला घुमा देंगे। एक हनुमान जी की घुमा देंगे, एक लक्ष्मी जी की घुमा देंगे, एक युग-निर्माण की घुमा देंगे और एक अपने बेटे की घुमा देंगे और एक अपने मोहल्ले वाले की घुमा देंगे और कहेंगे कि गुरुजी मैं रोज नौ माला जपता हूँ। उसमें एक आपके लिए जपता हूँ और एक लक्ष्मी जी के लिए। वाह, बेटे! लक्ष्मी जी भूखी बैठी थी और भगवान् जी को तीन दिन से नाश्ता नहीं मिला था। तूने एक माला जपी थी, बस उससे भगवान् जी का कलेऊ हो जाएगा और उनको रोटी मिल जाएगी। अहा! ये हैं असली भगत और असली जादूगर। सारे जादू के पिटारे ये अपने माला में भरे हुए बैठे हैं।

🔷 मित्रो! इनसे हमारा काम चलेगा? इनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जो व्यक्ति हर काम के लिए माला को ही काफी समझते हैं, उनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जब कभी इनको जुंग आती है, छटपटाहट आती है, तो खट माला पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि इस पर माला को चलाऊँगा, उस पर माला को चलाऊँगा। इस तरह वे तरह-तरह की चर्खियाँ चला देते हैं। जिस तरह बंदूक में तरह-तरह के कारतूस चढ़ा देते हैं? मंत्र का। इस माला पर महामृत्युंजय मंत्र का कारतूस दनादन चढ़ा दिया, जो खट्-खट् सब बीमारियों को मार डालता है और जब इसको लक्ष्मी जी की जरूरत पड़ती है तब? अहा! ‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’’ मंत्र का दे दनादन-दे दनादन जप, और वो आई देवी और ये आई चंडी और ये आया पैसा। बस इसके पास तो एक ही मशीनगन है। मरने दो इन अभागे को, इसके पास न कोई जिंदगी है, न कोई दिशा है, न कोई प्रेरणा है, न कोई लक्ष्य है और न इसके पास दिल है। ये अभागा तो केवल माला को लेकर ही दफन होने वाला है और माला को लेकर ही मरेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 52)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔷 सद्गुरु चेतना का यह तत्त्व सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित एवं निरामय है। इसमें किसी तरह का विकार नहीं है। यह परमाकाश रूप, अचल, अक्षय और आनन्द का स्रोत है॥ ६४॥ वेद स्तोत्र भी यही कहते हैं। प्रत्यक्ष, शब्द आदि चारों प्रमाणों से भी यही सत्य सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए॥ ६५॥ हे महामति देवि! इसके मनन से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। तुम्हारी साधुता को देखकर ही मैंने यह सत्य तुम्हें बताया है।
  
🔶 गुरुगीता के मंत्रों में इस परम सत्य का उद्घाटन है कि गुरुदेव ही स्मरणीय हैं, चिंतनीय हैं और मननीय हैं। उनकी पराचेतना में रमण करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। कई शिष्य-साधक बौद्धिक रूप से इस सच्चाई को जानते हैं; किन्तु भावरूप से वे इसमें डूब नहीं पाते, निमग्न नहीं हो पाते। इसका कारण यह होता है कि उनकी बुद्धि तरह-तरह सांसारिक गणित लगाती रहती है। इस बुद्धि को श्रीमद्भगवद्गीता के गायक ‘व्यावसायित्मका बुद्धिः’ कहते हैं।

🔷 श्री रामकृष्ण परमहंस इसके लिए ‘पटवारी बुद्धि’ का शब्द उपयोग करते थे। जोड़-तोड़, कुटिलता-क्रूरता में निरत रहने वालों के लिए न तो साधना सम्भव है और न ही उनसे समर्पण बन पड़ता है और जो अपनी अहंता का सिर उतार कर गुरुचरणों पर रखने का साहस नहीं कर सकते, भला उनके लिए गुरु भक्ति कहाँ और किस तरह से सम्भव है। ऐसों को सद्गुरु चाहकर भी नहीं अपना पाते। शिष्य की भाव मलीनता उन्हें यह करने ही नहीं देती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 86

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 2)

🔶 जैसे गोबर के उपले आज थापे जाएं तो वे कई दिन में सूख कर जलाने लायक होते है। हम जो भले बुरे कर्म करते रहते हैं उनका भी धीरे धीरे परिपाक होता रहता है और कालान्तर में वे कर्मफल के रूप में परिणित होते है। इसी प्रक्रिया को भाग्य, तकदीर, कर्मलेख, विधाता के अंक, प्रारब्ध, होतव्यता, आदि नामों से पुकारते हैं। हम देखते हैं कि कई व्यक्ति अत्यन्त शुभ कर्मों में प्रवृत्त है पर उन्हें कष्ट में जीवन बिताना पढ़ रहा है और जो पाप में प्रवृत्त हैं वे चैन की छान रहे हैं। इस का कारण यही है कि उनके भूतकाल के कर्मों का उदय इस समय हो रहा है और आज की करनी का फल उन्हें आगे आने वाले समय में मिलेगा।

🔷 मोटा नियम यही है कि जो किया गया है, उसका फल अवश्य मिलेगा। कर्म जैसे मन्द या तीव्र किये गये होंगे उनकी बुराई अच्छाई के अनुसार न्यूनाधिक सुख दुख का विधान होता है। यह कर्म भोग बड़े बड़ों को भोगना पड़ता है।

🔶 परन्तु इसमें सूक्ष्म नियमानुसार कभी कभी हेर फेर भी हो जाता है। जो प्रारब्ध परिपक्व होकर भोग के रूप में प्रस्तुत है उसमें परिवर्तन होना तो कठिन है पर जो कर्म अभी पक रहे हैं, भोग बनने की स्थिति में जो अभी नहीं पहुँच पाये हैं उन पर वर्तमान कर्मों का प्रभाव पड़ता है और उनका फल न्यून या अधिक हो सकता है अथवा वे नष्ट भी हो सकते हैं। धर्म ग्रन्थों में जहाँ शुभ कर्मों का महात्म्य वर्णन किया गया है वहाँ स्थान-स्थान पर ऐसा उल्लेख आया है कि “इस शुभ कर्म के करने से पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं।” यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि यदि उस कर्म के करने वाले के पाप नष्ट ही हो गये तो वर्तमान में तथा भविष्य में किसी प्रकार का दुख या अभाव उसे न रहना चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं, शुभ कर्म करने वाले भी अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह सुख दुख प्राप्त करते रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 18

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.18

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 5)

🔷 दोष जिस-तिस को देने और गुण इस-उस के गाने से सिर्फ मन हलका होता है। मूलतः चयन अपने ही रुझान का होता है। साथी और समर्थक तो बुरे से बुरे मार्ग पर चलने वालों को भी मिल जाते हैं और श्रेय पथ पर चलने वाले ही कहाँ हर किसी का समर्थन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी ढेरों लोग मूर्ख बनाते और रास्ते में रोड़े अटकाते हैं। अस्तु, दूसरों को महत्त्व देना हो तो उतना ही देना चाहिए कि उनका अस्तित्व तो है, पर इतना नहीं कि किसी को उनके पीछे चलने के लिए विवश ही होना पड़े। आखिर स्वतन्त्र चिन्तन भी तो कोई वस्तु है। मस्तिष्क तो अपना है। उस पर अपना अधिकार नहीं। संकल्प बल से विचारों को दिशा नहीं दी जा सकती है और जो चल रहा है उसमें परिवर्तन-प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं है, ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए।

🔶 विचारणा में जिस स्तर का अभ्यास पड़ गया है, एक बार उसके खरे-खोटे होने पर नये सिरे से पर्यवेक्षण करना चाहिए और जिन अनुपयुक्त अभ्यासों का कूड़ा-कचरा भरा पाया जाय, उसे साहसपूर्वक बुहार फेंकना चाहिए। लौट-लौट कर आने की कठिनाई तो घर में चमगादड़ों का घोंसला हटाने पर भी आती है। भगा देने पर भी वे लौटकर आती हैं। फिर भी वे इतनी प्रबल नहीं हैं कि गृहस्वामियों के निश्चय को पलट सकें। उन्हें झक मारकर अपना घोंसला अन्यत्र बनाना पड़ता है। कुविचारों की जड़ तभी तक जमी रहती है जब उन्हें उखाड़ने-उजाड़ने का कोई अन्तिम निर्णय नहीं होता। असमंजस का लाभ सदा विपक्षी को मिलता है। संशोधन के निश्चय और परिवर्तन के संकल्प में ही दुर्बलता हो, किसी अन्तिम निर्णय पर पहुँचना न बन पड़ रहा हो तो बात दूसरी है।

🔷 कुविचारों में निषेधात्मक विचारों का एक बहुत बड़ा परिकर है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो व्यक्तित्व को दबोचे रहते हैं और दलदल में से उबरने ही नहीं देते। कुछ ऐसे हैं जो व्यवहार को विकृत, उद्धत बनाकर साथियों से पटरी नहीं बैठने देते। कुछ ऐसे हैं जो दिशाधारा को प्रभावित करते हैं और कँटीली झाड़ियों में भटकाते हैं। इन सभी की अपनी-अपनी मण्डली और बिरादरी है। वे एक-एक के साथ एक जुड़े रहते हैं। रेलगाड़ी में जुड़े डिब्बे की तरह, जंजीर की कड़ियों की तरह, चींटी, दीमकों और टिड्डियों की तरह उन्हें झुण्ड बनाकर साथ-साथ चलते देखा जा सकता हैं। किन्तु साथ ही यह बात भी है कि रानी मक्खी के उड़ जाने के उपरान्त छत्ते की अन्य मधुमक्खियाँ भी इच्छा या अनिच्छा से अपनी अधिष्ठात्री के साथ चली जाती हैं, इसी प्रकार विचारों के परिकर भी जड़ जमाते और सिर पर पैर रखकर उलटे पावों पलायन करते भी देखे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed. (Part 2)

🔶 Had they not waged war against ill-thoughts, what poor commitments alone could do; how those commitments would have completed. Ill-thoughts would have been overpowered and set aside in a corner. You must have an army of opponent thoughts in stand-by position to help you at any such crucial moment. The moment ill thoughts of avarice, sex-lust, jealousy and timidity come to your mind, just ask your good army to face them to stop and remove from mind. How it will do if you do not fight? Nothing worked except a war against RAVANA.

🔷 Did anything other than war worked against DURYODHAN? Did anything other than war worked against KANS? I am not talking about war of love, violence or non-violence. I however am only talking about war waged against ills & weaknesses in own personalities and improper conducts, wickedness prevalent in society. You must at any cost prepare an army of thoughts that is equally helpful in giving you support and making a new atmosphere around you. These are the thoughts of determination.
                                          
🔶 A farmer named HAZARI decided, ‘‘I have to plant a garden of one thousand mango trees.’’ Well people just conceded to him when he proceeded for that. Why people conceded? He was determined. Had he not been determined then he would have been wasting his time delivering here & there only speeches, ‘‘SAHAB, plant the tress, promote greenery.’’ So does anyone plant? The world spends a lot on advertisements but does anyone listen?

🔷 To be listened it is very essential that the person who is saying this must be a determined fellow. Being determined means committed to come around high class principles in life. Though essentially it should be for little things & for little periods initially so that no hindrance is faced in commitment, so that psychic force is developed and a base is prepared for bigger commitments ahead in life. It also helps a man to maintain his dignity by remembering such committed instances. Therefore it is very essential for you to be committed.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 15)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 और विनोबा कौन हैं मित्रो! जवान आदमी। और गाँधी जी अस्सी वर्ष के करीब पहुँच गए थे। वो कौन थे? जवान आदमी। जवाहरलाल नेहरू चौहत्तर-पिचहत्तर वर्ष के थे, जब उनकी मृत्यु हुई। तब वे कौन थे? जवान आदमी और राजगोपालाचार्य? राजगोपालाचार्य की जब मृत्यु हुई थी, तो वे अस्सी वर्ष को भी पार कर गए थे। वे कौन थे? जवान आदमी, और हम और आप? हम और आप बुड्ढे आदमी हैं, जर्जर आदमी हैं, टूटे हुए और लकवा के मारे हुए आदमी हैं। कंगाली के मारे हुए, दरद के मारे हुए, दुर्भाग्य के मारे हुए और हम सब देवताओं के मारे हुए आदमी हैं।

🔷 हमारी नसें और हड्डियाँ गल गई हैं। हमार मन सड़ गया है और हमारी भावनाएँ सो गई हैं। हमारा जीवन समाप्त हो गया है। हम लुहार की धौंकनी के तरीके से साँस जरूर लिया करते हैं। हमारी साँस चलती तो है, पर बहुत धीरे-धीरे चलती है। हम कौन हैं? हम मुरदा आदमी हैं। हम मर गए हैं। हमारे अंदर कोई जीवट नहीं है, कोई जिंदगी नहीं है। हमारे अंदर कोई लक्ष्य नहीं है, कोई दिशा नहीं है। हमारे अंदर कोई तड़प नहीं है, कोई कसक नहीं है और हमारे अंदर कोई जोश नहीं है। हमारा खून ठंडा हो गया है।

🔶 साथियो! जिनका खून ठंडा हो गया है, उनको मैं क्या कहूँगा? उनको मैं बूढ़ा आदमी कहूँगा। पच्चीस वर्ष का हो तो क्या, अट्ठाइस वर्ष का हो तो क्या, बत्तीस वर्ष का हो तो क्या? वह बूढ़ा आदमी है और मौत का शिकार है। उसके सामने जिंदगी का कोई लक्ष्य नहीं है, उसके सामने कोई चमक नहीं है। जिसके सामने कोई चमक नहीं है, जिसके सामने कोई उम्मीद नहीं है, जिसकी हिम्मत समाप्त हो गई, जो आदमी निराश हो गया, जिसकी आँखों में निराशा और मायूसी छाई हुई है, वह बूढ़ा आदमी है। मित्रो! इन बूढ़े आदमियों का हम क्या करेंगे? इनसे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वे स्वयं के लिए क्या काम कर सकते हैं और भगवान् के लिए क्या कर सकते हैं। और समाज के लिए क्या कर सकते हैं? यह देखकर हम उनसे ना उम्मीद हो जाते हैं। हम उनसे ज्यादा-से-ज्यादा यही उम्मीद रखेंगे कि हमारा जब हवन होगा, तो उन्हें उम्मीद दिलाएँगे कि आपके बेटा-बेटी हो जाएँगे। उनके लिए बस सब से बड़ा एक ही काम है कि बेटा-बेटी हो जाएँ। पैसा हो जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 51)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन
🔶 गुरुगीता का गायन करते हुए शिष्यों की अन्तश्चेतना श्रद्धा रस में भीग रही है। भक्ति का उफान उनकी भाव चेतना में हिलोरें ले रहा है। इन हिलोरों में न केवल अतीत के कल्मष घुले हैं; बल्कि प्रखरता प्रकाश की नयी आभा भी फैली है। गुरुगीता के मंत्रों का प्रभाव ही कुछ ऐसा है। ये भगवान् महादेव के वचन हैं, जो सदा सर्वदा अमोघ हैं। भगवान् सदाशिव की वाणी तीनों कालों में सत्य है। महाकाल के वचनों पर काल का कोई प्रभाव नहीं है। काल का पाश, देश की सीमाएँ इन्हें छू भी नहीं सकती। इन वचनों का सही-सही मर्म तो केवल माता पार्वती ने ही समझा। जो प्रथम श्रोता होने के साथ भगवान् साम्ब सदाशिव की प्रथम शिष्या भी हैं। अपने सद्गुरु की अनुगत और उन्हीं में विलीन।
  
🔷 शिष्यों के लिए वह परम आदर्श हैं। समर्पण-विसर्जन व विलय की सघनता की साकार मूर्ति। जो शिष्य हैं, वे इन सजल श्रद्धा के साकार भाव विग्रह से श्रद्धा के कुछ कण पाकर स्वयं को प्रखर प्रज्ञा रूपी गुरुदेव में लय कर सकते हैं। इस भाव प्रवाह में अवगाहन करने वालों ने गुरु भक्ति की पूर्व कथा में पढ़ा कि सद्गुरु का नाम मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि खरा सोना बनती है। इसके स्मरण-चिंतन से महासंकटों से रक्षा होती है। हर किसी अवस्था में चलते-फिरते, बैठते-उठते यह मंत्रराज साधक की रक्षा करता है। जो भी शिष्य इसकी साधना करता है, उसे अविनाशी, निराकार व निर्विकार आत्म तत्त्व की अनुभूति होती रहती है।
  
🔶 गुरुदेव के इस अद्भुत स्वरूप के एक अन्य रहस्यमय आयाम को प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता भवानी से कहते हैं-

अपूर्वाणां परं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम्। विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम्॥ ६४॥
श्रुतिः  प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानश्चतुष्टयम्। यस्य चात्मतपो वेद देशिकंच सदा स्मरेत्॥ ६५॥
मननं यद्वरं कार्यं तद्वदामि महामते। साधुत्वं च मया दृष्ट्वा त्वयि तिष्ठति साम्प्रतम्॥ ६६॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 85

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

👉 कैसी वाणी कैसा साथ?

🔷 दवे साहेब विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो के बीच बहुत प्रसिद्द थे। उनकी वाणी, वर्तन तथा मधुर व्यवहार से कॉलेज के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियो उन्हें ‘वेदसाहेब’ से संबोधन करते थे. ऐसे भी वे संस्कृत के प्राध्यापक थे, और उनकी बातचीत में संस्कृत श्लोक-सुभाषित बारबार आते थे. उनकी ऐसी बात करने की शैली थी जिससे सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे।

🔶 एक दिन विज्ञान के विद्यार्थियो की कक्षा में अध्यापक नहीं थे तो वे वहाँ पहुंच गए. सभी विद्यार्थियों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया और अपने स्थान पर बैठ गए।

🔷 कक्षा प्रतिनिधि ने दवे साहेब से कहा, सर, कॉलेज के समारोहों में हमने आपको कई बार सुना है. लेकिन आज आपसे करीब से बातचीत करने का मौका मिला है. कृपया संस्कृत साहित्य में से कुछ ऐसी बातें बताइये जो हमारे दैनिक जीवन में काम आये।

🔶 दवे साहेब मुस्कराए और बोले :  पृथिव्याम त्रिनिरत्नानि जलं, अन्नं, सुभाषितम।। यानि कि अपनी इस धरती पर तीन रत्न हैं – जल,अन्न तथा अच्छी वाणी।

🔷 बिना जल तथा अन्न हम जी नहीं सकते, लेकिन सुभाषित या अच्छी वाणी एक ऐसा रत्न है जो हमारी बोली को श्रृंगारित करता है. हम अपने विचारों को सरलता से तथा स्पष्टता से सुभाषित द्वारा सबके सम्मुख रख सकते है।

🔶 दवे साहब अभी बोल ही रहे थे कि किसी विद्यार्थी ने प्रश्न किया,  हम वाणी का प्रयोग कैसे करें? तथा हमें किस तरह के लोगों का संग करना चाहिए?

🔷 पुत्र, तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया हैं, इसका उत्तर मैं तीन श्लोकों के माध्यम से देना चाहूंगा। तुम्हारा पहला प्रश्न- वाणी का प्रयोग कैसे करें?

यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पुर्वमेवाभिभाषते।
स्मितपुर्वाभिभाषी च तस्य लोक: प्रसीदति।।
(महाभारत शांतिपर्व 84/6)

🔶 देवों के गुरु बृहस्पतिजी हमें इस श्लोक से शिक्षा देते है कि, लोकव्यवहार में वाणी का प्रयोग बहुत ही विचारपूर्वक करना चाहिए. बृहस्पतिजी स्वयं भी अत्यंत मृदुभाषी एवं संयतचित्त है. वे देवराज इन्द्रसे कहते है : राजन ! आप तो तीनों लोकों के राजा हैं, अत: आपको वाणी के विषयमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए. जो व्यक्ति दूसरोँ को देखकर पहले स्वयं बात करना प्रारंभ करता है और मुस्कराकर ही बोलता है, उस पर सभी लोग प्रसन्न हो जाते है।

यो हि नाभाषते किंचित सर्वदा भृकुटीमुख:।
द्वेष्यो भवति भूतानां स सांत्वमिह नाचरन।।
(महा. शान्ति. 84/5)

🔷 इसके विपरीत जो सदा भौहें टेढ़ी किए रहता है, किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, बोलता भी है तो टेढ़ी या व्यंगात्मक वाणी बोलता है, मीठे वचन न बोलकर कर्कश वचन बोलता है, वह सब लोगों के द्वेष का पात्र बन जाता है।

🔶 अब तुम्हारा दूसरा प्रश्न – हमें किसका संग करना चाहिए?

सद्भि: संगं प्रकुर्वीत सिद्धिकाम: सदा नर:।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्।।
(गरुड़पु. आ. 108/2)

🔷 देवों के गुरु बृहस्पतिजी बताते है कि ‘जो मनुष्य चारों पुरुषार्थ [यानि कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष] की सिद्धि हो ऐसी चाहत रखता हो तो उसे सदैव सज्जनों का ही साथ करना चाहिए. दुर्जनों के साथ रहने से इहलोक तथा परलोकमें भी हित नहीं है।

🔶 दवेसाहेब तथा विद्यार्थियो का संवाद पूरा हुआ और सभी विद्यार्थियो के मुखमंडल पर आनंद की उर्मी थी, आज सभी विद्यार्थियों को एक अच्छी सीख मिल चुकी थी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 1)

🔶 प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किये हुए भले बुरे कामों का, फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरन्त मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधि निर्धारित भली-बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए है उनका परिणाम कभी पीछे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

🔷 यदि प्रत्येक भले बुरे कर्म का फल तुरन्त हाथों-हाथ मिल जाता होता तो इस संसार में कहीं भी पापी और पाप का निशान ढूंढ़ने मिलता। क्योंकि जैसे विष खाते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है। वैसे ही पाप करते ही उसकी भयंकर पीड़ा होती तो उसे कोई स्पर्श भी न करता और बुराई का स्वादिष्ट फल मिठाई की तरह मधुर, बर्फ सा शीतल, चन्दन सा सुगंधित और सब प्रकार मनोहर आनन्द मय होता तो दौड़ दौड़ कर सभी लोग बुराई करते, अशुभ कर्म करने में कोई किसी से पीछे न रहता। परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धिमता की परीक्षा करने के लिए और उसकी स्वतंत्रता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता को स्वतंत्र दिशा में विकसित होने देने के लिए ऐसी व्यवस्था की है कि कर्मफल तुरन्त तो बहुत कम मिलते हैं वे आगे पीछे के लिए जमा होते रहते है। यह उधार खाता, उचंत खाता, बैंकों के हिसाब की तरह आगे पीछे जमा खर्च में पड़ता रहता है। यह वह स्थान है जिस पर मनुष्य की बुद्धिमता परखी जाती है, इसी खतरे से सावधान करने के लिए धर्म का विधान है।

🔶 वेद पुराण शास्त्र, इतिहास इसी जगह पर सावधान करने के लिए अपना अभिमत घोषित करते रहते हैं। फिर भी लोग चूकते हैं।-भ्रम में पड़ते हैं, और इस संदेह में पढ़ते हैं कि जाने कर्मफल मिलता भी है या नहीं। शास्त्रों की वाणी, धर्म की व्यवस्था जाने सच है भी या नहीं। इस संदेह में भ्रमित होकर ही वे पाप और नास्तिकता को अपना लेते है। तुरन्त फल न मिलना यही तो माया है, इस माया में ही मनुष्य भ्रमित होता है। आग छूने से जलन और बर्फ छूने से ठंडक की भाँति यदि पाप पुण्य का स्पर्श अपना अपना तुरन्त परिणाम दिखाते तो वेदशास्त्र धर्म भजन, पूजन कथा, कीर्तन आदि किसी की जरूरत न पड़ती। जैसे हरी घास को देखते ही गधा सीधा उसे खाने को चला जाता है वैसे ही सब लोग पुण्य के लिए सीधे चल देते है। और जैसे लाल झंडे को देखकर भैंस बिदकती है वैसे ही पाप का नाम सुनते ही लोग उससे बचकर दूर भागते हैं। पर ऐसा है नहीं, यही ईश्वर की माया है। हम माया को समझें और उसके जाल में न उलझें यही हमारी बुद्धिमानी का प्रमाण हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.17

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 4)

🔶 कहा जाता है कि शरीर बल, सूझ-बूझ, साधन और सहयोग से कठिनाइयों का हल निकलता है और प्रगति का द्वार खुलता है। यह कथन जितना सही है उससे भी अधिक सही यह है कि मनोबल बाजी जीतता है। वही सबसे बड़ा बल है। शरीर से दुर्बल और साधनों की दृष्टि से अभावग्रस्त होते हुए भी कितने ही व्यक्ति महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए हैं। इसमें उनके मनोबल ने ही प्रमुख भूमिका निभाई है। मनोबल को बढ़ाने और अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि सदा आशा भरे सपने देखे जायें। रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर्तमान परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का, ऊँचा उठने का ढाँचा खड़ा किया जा सकता है और उस उत्साह भरे पराक्रम के सहारे सफलता के स्तर तक पहुँचा जा सकता है।

🔷 कल क्या होने जा रहा है यह किसी को भी विदित नहीं है। न वैसा कुछ नियति निर्धारण है। मनुष्य स्वयं ही किसी रास्ते का चयन करते हैं, अपने ही पैरों चलते हैं और अपनाये गये मनोरथ के अनुरूप किसी लक्ष्य तक पहुँचते हैं। कौन किस स्तर का चयन करे? किसके पैर किस राह पर चलें, यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक करते देखे गये हैं। उनमें से किन्हें महत्त्व दिया जाय, किन्हें न दिया जाय, यह फैसला अपना ही होता है।

🔶 यह सोचना व्यर्थ है कि परिस्थितियों या सम्बन्धियों ने उन्हें दबाया और ऐसा करने को विवश किया जैसा कि मन नहीं था। यह बात मात्र दुर्बल मनोबल वालों पर ही लागू होती है। मनस्वी जानते हैं कि कोई किसी को बाधित नहीं कर सकता। मनुष्य की संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि उस पर दूसरों के फैसले लद सकें और अपरिहार्य बन सकें। एक समय की भूल दूसरे समय सुधर भी सकती है। आज की सहमति को कल की असहमति में भी बदला जा सकता है। परिवर्तन काल की उथल-पुथल में कुछ अड़चन असुविधा तो होती है, पर नया रास्ता बन जाने की भी संगति मुड़-तुड़ कर बैठ ही जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed.

🔷 Many noble, important and interesting works you have to do after you go back from here but you will not be able to do so because your mind will loosen. To overcome this situation you please prepare an army, a series of thoughts. Thoughts can be cut off by thoughts; one poison can be killed by another poison; throne can be stuck out by another throne. Ill-thoughts that usually trouble you must be countered by an army of opponent thoughts. Good thoughts, noble thoughts too can form a strong army.  
                                         
🔶 If ill-thoughts of avarice, dishonesty and longing come to your mind, you please keep in stand-by position an army of statements of great men their history, health and honesty and say we will use honestly earned money only and not dishonestly earned money. If ill-thoughts of sex, lust and adultery come to your mind, you please again keep in stand-by position an army of good-thoughts like how HANUMAN became a powerful person due to celibacy, how BHISM PITAMAH became an able person due to celibacy. You can remind many such persons from history taking from SHANKERACHARYA to many other saints and noble persons who had once waged war against their ill-thoughts to place their names in history.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 14)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसलिए मित्रो! जहाँ कहीं भी क्षमताएँ दिखाई पड़े, प्रतिभाएँ दिखाई पड़ें, वहाँ आप हमारे संदेश वाहक के रूप में जाना और खासतौर से उनसे प्रार्थना करना, अनुरोध करना। पूर्व में मैंने विभूतिवानों को संबोधित किया था और उनका आह्वान किया था कि आपकी जरूरत है। भगवान् ने आपको विशेषताएँ दी हैं, उसकी उसे जरूरत है, लड़ाई, युद्ध का जब वक्त आता है, तो नौजवानों की भरती कंपलसरी कर दी जाती है और जो लोग बुड्ढे होते हैं, उनको छोड़ दिया जाता है।

🔶 कंपलसरी लड़ाई में सभी नौजवानों को, चौड़े सीने वालों को पकड़ लिया जाता है और फौज में भरती कर लिया जाता है। कब? जब देश पर दुश्मन का हमला होता है। मित्रो! उनसे जो नौजवान हैं, प्रतिभावान् हैं, विभूतिवान् हैं, उनसे मेरा संदेश कहना। लेकिन जो व्यक्ति मानसिक दृष्टि से बुड्ढे हो गए हैं, वे जवान हों तो क्या, सफेद बाल वाले बुड्ढे हों तो क्या, हमको उनकी जरूरत नहीं है। क्यों? क्योंकि वे मौत के शिकार हैं। वे इसी के लिए हैं कि जब मौत को चारे की जरूरत पड़े, तो वे उसकी खुराक का काम करें।

🔷 मित्रो! बुड्ढा आदमी कौन? क्या वह जिसके बाल सफेद हो गए हैं? सफेद बालों वाला बुड्ढा होता है कहीं, वह जवान होता है। इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री जिसका नाम चर्चिल था, अस्सी वर्ष का हो गया था और उसकी कमर में दरद रहता था। इंग्लैंड के लोगों ने कहा कि हम अपनी हुकूमत और अपने राष्ट्र की जिम्मेदारी इस आदमी के हाथ में सुपुर्द करेंगे, और वो चर्चिल जो था, जब दिन-रात जर्मनी वाले इंग्लैण्ड के ऊपर बम बरसा रहे थे, तब सारी-की-सारी सत्ता का केन्द्र वही एक आदमी था। बड़ा जबरदस्त आदमी, नौजवान आदमी था। कितने वर्ष का था, अस्सी वर्ष का, जो सारे-के-सारे लोगों से कह रहा था, इंग्लैण्ड के लोगों! घबराने की जरूरत नहीं। भगवान् हमारा सहायक है और हम ऊँचा उठेंगे, आगे बढ़ेंगे और हम फतह करके रहेंगे। हर आदमी के अंदर उसने जिंदगी पैदा की और जोश पैदा किया। वो कौन आदमी था? जवान आदमी था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में साधना के कई गम्भीर रहस्य समाए हैं। इन मंत्रों में जिस साधना विधि का सांकेतिक वर्णन है, उसकी विस्तृत चर्चा कई तांत्रिक ग्रन्थों में मिलती है। इसकी विस्तार से विवेचना तो एक अलग लेख की विषय वस्तु बनेगी। जिसे श्रद्धालु शिष्यों के अनुरोध पर फिर कभी दिया जाएगा; परन्तु यहाँ संक्षेप में सद्गुरु नाम के महामंत्र का उल्लेख अवश्य किया जा रहा है। इसे ही भगवान् भोलेनाथ ने परम मंत्र एवं मन्त्रराज कहा है। इस मंत्र का स्वरूप क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर में गुरुभक्त सिद्धजन कहते हैं कि ॐ ऐं (नाम) आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ, इस प्रकार सद्गुरु के नाम का जप करना चाहिए। इस मंत्र के स्वरूप को अपने गुरुदेव के मंगलमय नाम के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे अपने गुरुदेव का नाम है ‘श्रीराम’ तो उनके नाम का महामंत्र होगा- ‘ॐ ऐं श्रीराम आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ’। जो गुरुभक्त हैं, वे प्रतिदिन गायत्री महामंत्र के जप के साथ इस महामंत्र की एक माला का भी जप कर सकते हैं।
  
🔶 अनुभवी साधकों का तो यह भी कहना है कि गायत्री महामंत्र के जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करने से गायत्री जप पूर्ण हो जाता है। नियमित साधना करने वाले सूक्ष्मतत्त्व के ज्ञाता साधकों का यह मानना है कि कई बार जन्म-जन्मान्तर के अशुभ कर्मों के कारण गायत्री का जप शीघ्र फलदायी नहीं हो पाता। विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किए गए अनुष्ठान सफल नहीं होते हैं। इसका कारण केवल इतना ही है कि विगत  जन्मों के अशुभ संस्कार, दुर्लंघ्य प्रारब्ध इसमें बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। इसी वजह से गायत्री महामंत्र के कई अनुष्ठान कर लेने के बावजूद भी पुत्र प्राप्ति की, धन प्राप्ति की कामनाएँ अधूरी रहती हैं। कई बार तो साधक के मन की आस्था घटने लगती है। उसे अविश्वास घेर लेता है। अन्तःकरण में अंकुरित होने वाले सन्देह एवं भ्रम कहने लगते हैं कि कहीं गायत्री साधना के ही प्रभाव में कुछ कमी तो नहीं।
  
🔷 ऐसी स्थिति में सद्गुरु का तपोबल ही सम्बल होता है। जो काम अपने प्रयास, पुरुषार्थ से असम्भव होता है, वह गुरुकृपा से सम्भव होता है। गुरु कृपा ही असम्भव को सम्भव बनाने वाली प्रक्रिया है; पर इसका विधिवत् आह्वान करना पड़ता है। इसे अपने अन्तःकरण में धारण करना पड़ता है। यदि ऐसा किया जा सके, तो दुष्कर और दुरूह प्रारब्ध को भी मोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। सभी तरह की विघ्न-बाधाओं को धूल-धूसरित और धराशायी किया जा सकता है। राह के सभी रोड़े फिर कभी आड़े नहीं आते। असफलता-सफलता में परिवर्तित होती है। खोया आत्मबल फिर से वापस मिलता है।
  
🔶 बस इसके लिए करना इतना ही है कि सन्ध्यावंदन के बाद गायत्री जप करने से पहले एक माला गुरु नाम के महामंत्र का जप करें। फिर इसके बाद गायत्री जप करें और बाद में गायत्री जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करें। उदाहरण के लिए यदि तीस माला गायत्री जपी गयी है, तो तीन माला गुरुनाम मंत्र का जप करें। कई तन्त्र ग्रन्थ यह भी कहते हैं कि प्रत्येक दस माला के बाद एक माला गुरु नाम मंत्र का जप किया जा सकता है। कई साधकों ने इस विधि को भी परम कल्याणकारी अनुभव किया है। इस विधि से की गई साधना न केवल लौकिक उपलब्धियाँ एवं सफलताएँ प्रदान करती है; बल्कि अलौकिक आध्यात्मिक सफलताओं के भी भण्डार खोलती है। इस तरह नियमित निरन्तर की गई साधना से साधक को आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है। उसका जीवन कृतकृत्य एवं कृतार्थ होता है। गुरुदेव के तपोबल को और अधिक शिष्य कैसे आत्मसात् करें, इसकी चर्चा अगले मंत्रों में की गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 82

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

👉 बेवक़ूफ़ : एक गृहणी

🔶 वो रोज़ाना की तरह आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी थी। रसोई में आई और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया। फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें।

🔷 कुछ ही पलों मे वो अपने  सास ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई। फिर बच्चों को नाश्ता कराया।

🔶 पति के लिए दोपहर का टिफीन बनाना भी जरूरी था। इस बीच स्कूल का रिक्शा आ गया और  वो बच्चों को रिक्शा तक छोड़ने चली गई।

🔷 वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये। इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो। उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए।

🔶 अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था की छोटी ननद आई और ये कहकर ये कहकर गई की भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना, मेरा भी नाश्ता लगा देना।

🔷 तभी देवर की भी आवाज़ आई की भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या? अभी लीजिये नाश्ता तैयार है। पति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने अपने ऑफिस के लिए निकल चले।

🔶 उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों को नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी।

🔷 इस बीच सफाई वाली भी आ गयी। उसने बर्तन का काम सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई वाली के साथ मिलकर सफाई में जुट गयी।

🔶 अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी की काल बेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे।

🔷 उसने ख़ुशी ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बाते करते करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करती रही। ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो नन्द के पास बेठी ही थी की सास की आवाज़ आई की बहु खाने का क्या प्रोग्राम हे।

🔶 उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे। उसकी फ़िक्र बढ़ गयी वो जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी। खाना बनाते बनाते अब दोपहर का दो बज चुके थे।

🔷 बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे आ गये। उसने जल्दी जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनका मुंह हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया। इस बीच छोटी नन्द भी कॉलेज से आ गयी और देवर भी आ चुके थे।

🔶 उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी। खाना खाकर सब लोग फ्री हुवे तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये।

🔷 इस वक़्त तीन बज रहे थे। अब उसको खुदको भी भूख का एहसास होने लगा था। उसने हॉट पॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी।

🔶 उसने फिर से किचिन की और रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले की आज देर हो गयी भूख बहुत लगी हे जल्दी से खाना लगा दो।

🔷 उसने जल्दी जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचिन से गर्म रोटी बनाकर ला ला कर देने लगी।
 
🔶 अब तक चार बज चुके थे। अभी वो खाना खिला ही रही थी की पतिदेव ने कहा की आ जाओ तुम भी खालो। उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल आया की आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं।
 
🔷 इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी। अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था की आँख से आंसू निकल आये।
 
🔶 पति देव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा की तुम क्यों रो रही हो। वो खामोश रही और सोचने लगी की इन्हें कैसे बताऊँ की ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता हे और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं।
 
🔷 पति के बार बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा की कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये। पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो।

🔶 क्या आपको भी लगता है की गृहणी मुफ़्त की रोटिया तोड़ती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2018


👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 3)

🔷 जंक्शन पर गाड़ियाँ एक लाइन में खड़ी होती हैं। इनमें से किसे, किस दिशा में दौड़ना है, कहाँ पहुँचना है, इसका निर्धारण प्वाइंटमैन लीवर गिराकर करता है। वह दो पटरियों को इस प्रकार मिला देता है कि गाड़ी की दिशा बन सके और फिर उस पर दौड़ते हुए वह अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सके। एक ही लाइन में खड़ी दो गाड़ियाँ साथ-साथ छूटती हैं, पर उनकी दिशा अलग होने के कारण एक बम्बई पहुँचती है तो दूसरी कलकत्ता। दोनों के बीच भारी दूरी है। यह क्योंकर बन गयी? इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियाँ जोड़ने वाला प्वाइंटमैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उस छोटे से निर्धारण ने कैसा कमाल कर दिया। यह उदाहरण विचारणा को दिशाधारा मिलने के सम्बन्ध में पूरी तरह लागू होता है।

🔶 मनुष्य जिस भी स्तर की विचारणा अपनाना चाहे, उसे वैसे चयन की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तर्क और तथ्य तदनुरूप ढेरों इकट्ठे किए जा सकते हैं। मित्र सम्बन्धी साथ नहीं देंगे, परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनेंगी, घाटा पड़ेगा और भविष्य अन्धकार से घिरा रहेगा, इस स्तर की निराशाजनक कल्पना के पक्ष में अनेकों तर्क सोचे जा सकते हैं। संगति बिठाने वाले ढेरों ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें कल्पित निराशा का समर्थन करने वाले घटनाक्रम घटित हुए हों। निराशा को अंगीकार करने वाला अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए अनेकानेक कारण ढूँढ़ सकता है। साथ ही जोर देकर कह भी सकता है कि उसने जो सोचा है गलत नहीं है।

🔷 रुख बदलते ही दूसरे प्रकार के तर्कों और उदाहरणों का पर्वत खड़ा हो जायेगा। आशा और उत्साह की उमंगें उठें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास जमे तो फिर उस स्तर के तर्कों की कमी न रहेगी। हेय परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कितनों ने असाधारण प्रगति की और आशाजनक सफलता प्राप्त की है, इसके उदाहरणों से न केवल इतिहास के पृष्ठ भरे पड़ें हैं वरन् वैसे उदाहरणों से अपना समय एवं सम्पर्क क्षेत्र भी सूना नहीं मिलेगा। वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता? जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े, तो न केवल वैसा विश्वास बँधेगा वरन् प्रयत्न भी चल पड़ेगा और यह असम्भव न रहेगा कि उत्कर्ष की जो साध संजोयी थी वह समयानुसार पूरी होकर न रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God among Sufferers

🔶 "Where can I find God?", asked a young man. And saint Namdev said," Come with me in the evening. I shall show you God right before your eyes." The young man waited impatiently. In the evening the saint took him to a hutment and stood in front of a poor old man's hut. They went inside the hut. There on a tattered bed lay a frail sick child whose mother has passed away. He had been diagnosed with T.B. Saint Namdev gave him medicine, attended to him and caressed him. When leaving, the saint promised the boy that he will visit him again the next day.
                                      
🔷 "We have spent the entire evening", said the young man, "where is the God you promised me to show?" And the saint replied, "Oh! Didn't you see Him? That poor sick child was God himself!" Now, the young man understood that serving the humanity is the real worship of God.
                                           
📖 From Pragya Puran

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 13)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! आपको समय से पहले बदल जाना चाहिए, नहीं तो आपको पश्चाताप ज्यादा करना पड़ेगा। जब कोई डाकू चीजें छीन ले जाता है, तो आदमी को ज्यादा अफसोस होता है, लेकिन अगर अपने हाथों से किसी भिखारी को दे देता है, स्कूल की इमारत बनाने के लिए दे देता है, तो उसको संतोष होता है। पैसा तो चला गया न, चाहे वह डाकू ले गया हो तो भी और चाहे स्कूल बनाने के लिए दे दिया तो भी। लेकिन अपने हाथ से देने पर संतोष रहता है। अतः आपको लोगों से यह कहने के लिए जाना है क अब युग बदल रहा है, समय बदला रहा है, युग की धाराएँ बदल रही हैं। धन के बारे में मूल्यांकन बदल रहा है। धन लोगों के पास रहने वाला नहीं है।

🔷 धन बहुत तेजी से चला जाने वाला है। आप देख नहीं रहे हैं क्या? गवर्नमेंट क्या-क्या कर रही है? मृत्यु टैक्स लगा रही है। संपत्ति टैक्स लगा रही है और दूसरे टैक्स लगा रही है। सब अगले दिनों जो गवर्नमेंट आने वाली है, अगले दिनों जो समय आने वाला है, उसमें रशिया वाला कानून लागू हो जाएगा, चाइना वाला कानून लागू हो जाएगा। हमको और आपको बस हाथ-पाँव से मेहनत करनी पड़ेगी, परिश्रम करना पड़ेगा और उस मेहनत के बदले में जो खुराक हमको मिलनी चाहिए, जो रोटी मिलनी चाहिए, वह मिल जाएगी। खुराक की सारी-की-सारी चीजें मिल जाएँगी।

🔶 साथियो! लोगों से कहना कि आपको भगवान् ने जो विभूतियाँ दी हैं, क्षमताएँ दी हैं, उसका सवाब आप उठा सकते हैं, लाभ उठा सकते हैं, जीवात्मा को शांति दे सकते हैं। जीवात्मा की शांति के लिए, पुण्य के लिए अपने आपको तैयार कर लेना चाहिए, ताकि आपका अंतःकरण शांति में रहे और समाज को भी आपके बदले का अनुदान मिले और हमारा सिर भी गर्व से ऊँचा उठ जाए। समय से पहले हम अंगद के तरीके से इसीलिए आपके पास आए हैं, ताकि यह बता सकें कि आपको वक्त रहते बदल जाना चाहिए और लाभ उठा लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔶 गुरुगीता के गायन से गुरुभक्ति जाग्रत् होती है। शिष्य में समर्पण की सजलता पनपती है। ज्यों-ज्यों इसकी प्रगाढ़ता बढ़ती है, त्यों-त्यों शिष्य की चेतना अपने गुरुदेव में विलीन हो जाती है। शिष्य गुरुमय हो जाता है। यह सब प्रभाव-प्रताप गुरुगीता का है। धन्य हैं वे, जो इसका निरन्तर पठन, चिन्तन व मनन करते हैं। गुरुभक्ति का यह शास्त्र सब भाँति से अद्भुत-अनुपम है। जो अनुभवी हैं, वे इसके मर्म को जानते हैं। जिन्हें अभी इसका अनुभव नहीं मिला है, वे प्रयास करने पर इसका स्वाद चख सकते हैं। शिव के वचन- आदिमाता पार्वती के द्वारा श्रवण से उपजा यह शास्त्र अनेक आध्यात्मिक रहस्यों से भरा है। इसके प्रत्येक मंत्र में सद्गुरु की कृपा का अमृत है।
  
🔷 अमृत सिंचन के उपर्युक्त मंत्र में गुरुगत प्राण शिष्यों ने पढ़ा कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही इस जगत् की सृष्टि हुई है। जगत् के सभी पदार्थ इसी से पुष्ट होते हैं। सत्शास्त्रों का सार मर्म इसी में समाया है। गुरुदेव की कृपादृष्टि की अनुभूति होने पर पता चलता है कि जगत् की सभी सम्पदाएँ व्यर्थ हैं। इस दृष्टि से ही शिष्य के अवगुण घुलकर परिमार्जित होते हैं। तत् सत्ता यही है। इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों की स्थापना का परम कारण यही है। सद्गुरु की दृष्टि में ही पुरुष-प्रकृति एवं अन्य चौबीस तत्त्व समाये हैं। समष्टि की रूपमाला व जीवन के सभी नियम-काल सभी कुछ गुरुदेव की कृपादृष्टि में समाहित हैं।
  
🔶 गुरुकृपा और गुरुदेव के नाम की महिमा के एक नये आयाम को उद्घाटित करते हुए भगवान् साम्ब सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-
  
अग्निशुद्धसमंतात    ज्वालापरिचकाधिया। मंत्रराजमिमं   मन्येऽहर्निशं   पातु  मृत्युतः॥ ६१॥
तदेजति   तन्नैजति    तद्दूरे    तत्समीपके। तदन्तरस्य  सर्वस्य  तदु  सर्वस्य  बाह्यतः॥ ६२॥
अजोऽहमजरोऽहं च अनादिनिधनः स्वयम्।     अविकारश्चिदानन्द  अणीयान्महतो  महान्॥ ६३॥
  
🔷 हे देवि! सद्गुरु का नाम परम मंत्र है। यह मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि अग्नि में तपाए सुवर्ण की भाँति शुद्ध होती है। इसके स्मरण-चिंतन से निरन्तर मृत्यु से रक्षा होती है॥ ६१॥ चलते हुए या बैठे हुए, दूर होने पर, पास रहने पर, बाहर होने पर अथवा अन्दर रहने पर गुरु नाम का यह महामंत्र समूची सामर्थ्य से रक्षा करता है॥ ६२॥ जो इस मंत्रराज की साधना करता है, उसे अजन्मा, अमर, अजर, अनादि, मृत्युरहित, निर्विकार, चिदानन्द, अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी विराट् आत्मतत्त्व की निरन्तर अनुभूति होती रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 80

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

👉 दोस्ती

🔷 एक तितली मायूस सी बैठी हुई थी।पास ही से एक और तितली उड़ती हुई आई। उसे उदास देखकर रुक गई और बोली - क्या हुआ? उदास क्यों इतनी लग रही हो?

🔶 वह बोली - मैं एक फूल के पास रोज जाती थी। हमारी आपस में बहुत दोस्ती थी। बड़ा प्रेम था। पर अब उसके पास समय ही नहीं है मेरे लिए। वह तो बहुत व्यस्त हो गया है।

🔷 दूसरी तितली बोली - वह व्यस्त हो गया है तो तेरे पास तो समय है न तू तो जा सकती है। तू गई?

🔶 मैं क्यों जाऊँ? जब अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं में क्यों जाऊँ?

🔷 तितली बोली - पगली ! तू कैसे कह सकती है कि उसे तेरी ज़रूरत नहीं। अनुमान क्यों लगाती है? क्या पता वह तेरा ही उस भीड़ में इंतज़ार करता हो।

🔶 तितली के आँसू निकल आए। उसने अपनी सखी को गले लगाया और गई अपने मित्र से मिलने। फूल बोला - कहाँ रही इतने दिन ! मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा तुम्हारे बिन !! कहाँ थी ??

🔷 तितली मुस्कुराई और बोली कहीं नहीं रास्ता गुम हो गया था।

🔶 प्रेम लेने का मन करे तो प्रेम दे दो। किसी से बात करने का मन करे तो बात कर लो। दूसरे का इंतज़ार न करो। कुछ पता नहीं दूसरा भी इंतज़ार कर रहा हो।

🔷 प्रभु हमसे प्रेम करें या प्रभु हमसे पहले प्रेम करें,यह सोचने की बजाय उनसे पहले ही प्रेम करना प्रारम्भ कर दो। उनके प्रेम के इंतज़ार में नहीं, अपितु उनसे लाड प्यार करने में समय व्यतीत करो।

🔶 प्यार देने में अलग आनन्द है ..और प्यार लेने में अलग।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2018


👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 2)

🔶 शरीर के साथ अनाचार करने वाले ही आमतौर से दुर्बल, रुग्ण रहते हैं। स्वयं कष्ट सहते और साथियों को त्रास देते हैं। ठीक यही बात मस्तिष्क पर भी लागू होती है। विचारणा की भी एक विधा और मर्यादा है। पटरी पर चलने वाली रेल की तरह ही उसकी भी दिशाधारा होनी चाहिए। नदियाँ जब किनारों का अतिक्रमण करके उफनने लगती हैं तो बाढ़ के रूप में अपनी विकरालता का परिचय देती हैं। रेल भी पटरी छोड़कर बेहिसाब किधर को ही चल पड़े तो उससे होने वाले दुष्परिणाम की कल्पना कोई भी कर सकता है।

🔷 विचारों की शक्ति असीम है। इस संसार पर अदृश्य शासन करने वाले-दैत्य दानवों की पौराणिक मान्यता को यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो एक शब्द में उस समूचे परिवार को विचार प्रवाह कह सकते हैं। यही क्षेत्र है जिसका स्तर मनुष्य के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण माना जाता है। आम आदमी का मस्तिष्क सम्बद्ध वातावरण के अनुरूप ढलता पाया गया है। किन्तु यह पत्थर की लकीर नहीं है, कोई चाहे तो उसका परिपूर्ण परिशोधन और उपयुक्त नव निर्धारण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है। आदिवासी वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उन पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि वे नगरों में प्रवेश नहीं कर सकते या वहाँ जाकर कोई काम धन्धा नहीं कर सकते।

🔶 गाड़िया लुहार जहाँ-तहाँ भटकते और लोहा पीटकर गुजारा करने के अभ्यस्त हैं। पीढ़ियों से इसी तरह रहते हैं। फिर भी इसे उनका स्वेच्छा निर्धारण ही कहा जायेगा। वे चाहें तो अन्य नागरिकों की तरह अपने निवास निर्वाह में बिना किसी कठिनाई के स्थायित्व भी ला सकते हैं। विचारणा के सम्बन्ध में भी यही बात है। यों वह बनती और पकती तो वातावरण के चाक और आवे में ही है। फिर भी मनुष्य मिट्टी नहीं है, वह घोंसले के पक्षी की तरह किसी भी दिशा में कभी भी उड़ सकता है और अपने दायरे-कार्यक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन कर सकने के लिए स्वतंत्र है। हमें अपना वर्तमान सुधारने की जब उमंग उठे तो सर्व प्रथम इस मनःक्षेत्र का ही निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए और उसकी दिशाधारा में, स्तर एवं अभ्यास में तदनुरूप परिवर्तन करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 2)

🔶 If it is allowed to go on this way and if the current trend of scientific progress, growth in selfishness within men is allowed to continue and if no control over humans is managed this world will end. If situation remains the same keep this in mind that the state of affairs of this world after 100 years is going to be worsened if any of you is alive by then, I however will not be alive. But there is one more situation I dream of. Dreams I see. My dream world is very beautiful world. It is such a world that is soaked in love, faith, mutual respects and cooperation. It is a world wherein each one is intending to serve other, so sweet, so nice is my dream world that keeps rounding in my mind. If somehow my dream comes true then all this wealth, science, amenities and facilities, I feel, will make this earth a heaven.
                                      
🔷 Thousands and millions of years ago where were such roads, electricity, lightening, telephone and post offices. There were nothing like that but in such a scenario our ancestors used to live heavenly life. Today when we have far better circumstances, the same world could be far more peaceful, easy and pleasuring and create immense happiness. Today we are positioned at a crossroad from here we have to proceed whether towards destruction or towards development. You have to play a role here at this point. You have to cast your vote. When two sides have same votes, vote of president proves to be game changer .your vote is game changer. It is up to you which side you choose to vote. You may either vote for destruction-side or other side of constructive measures.
                                           
🔶 I feel you must vote for peace and harmony. For this you must stop living like an animal rather start living like a man, thoughtful man and like a wise man. This is very crucial phase of time which is not going to repeat itself in future.   

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 12)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप वहाँ जाना और लोगों से यह कहना कि अगर कहीं आपके अंदर जिंदादिली हो, तो आपको समय की पुकार सुननी चाहिए और युग की पुकार सुननी चाहिए। समय की माँग को पूरा करना चाहिए और युग की माँग को पूरा करना चाहिए और महाकाल ने, भगवान् ने जहाँ आपको बुलाया है, वहाँ आपको चलना चाहिए। हनुमान् जी भगवान् की पुकार सुनकर चले गए थे, रीछ और बंदर चले गए थे, गिलहरी चली गई थी। आपके लिए क्या यह संभव नहीं है? क्या आप इस लोभ और मोह से, अपने वासना और तृष्णा के बंधनों को काटते हुए अंगद के तरीके से चलने के लिए तैयार हैं?

🔶 मित्रो! मैं आपको अंगद के तरीके से संदेशवाहक बनाकर के भेजता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे संदेशवाहक बनाकर भेजा। हिंदुस्तान से बाहर कई बार अंगद की तरह से मैं केवल संदेशवाहक के रूप में गया हूँ। मैंने कोई व्याख्यान नहीं दिए और न संगठन किए। सारे-के-सारे देशों में, विदेशों में और न जाने कहाँ-से-कहाँ गया, लेकिन अपने गुरु का संदेश लेकर के गया। मैंने लोगों से कहा, देखो अपने को बदल दो। समय बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। धन किसी के पास रहने वाला नहीं है। अगले दिनों में, थोड़े दिनों में आप देखना कि धन किस तरीके से गायब हो जाता है। राजाओं के राज किस तरीके से चले गए, यह हमने और आपने देख लिया। आपने देखा कि थोड़े दिनों पहले जो लोग राजा कहलाते थे, सोने-चाँदी की तलवारें लेकर हाथी पर चला करते थे, आज वे किस तरीके से अपनी दोनों वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।

🔷 साथियो! जहाँ कहीं भी जाएँगे, वहाँ आप लोगों से कहना कि समय बहुत जबरदस्त है। समय सबसे बड़ा है। धन बड़ा नहीं है। जहाँ कहीं भी विभूतियाँ आपको दिखाई पड़ती हों, वहाँ आप हमारे संदेशवाहक के रूप में जाना, जैसे कि हमारे गुरुजी ने सारी दुनिया के जबरदस्त आदमियों के पास और भावनाशील आदमियों के पास हमको संदेश दे करके भेजा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 49)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔷 इनमें से एक सत्य घटना ऐसी है, जिसमें से गुरुगीता के इन महामंत्रों का मर्म उद्घाटित होता है। यह घटना विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के संस्थापक भगवत्पाद श्री रामनुजाचार्य के जीवन की है। आचार्य की कृपा से अनेकों धन्य हुए। इन धन्यभागी लोगों में कुरेशभट्ट की चर्चा होती है। इन कुरेशभट्ट ने अपने सच्चे शिष्यत्व से, सार्थक समर्पण से, स्वयं की अहंता के विसर्जन से गुरु की कृपा दृष्टि को अनुभव किया। जीवन की सार्थकता पायी। सच्चा अध्यात्म लाभ अर्जित किया।
  
🔶 कुरेशभट्ट असाधारण मनीषी, परम तपस्वी एवं ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। उनके तर्कों की धार, प्रवाहपूर्ण प्राञ्जल भाषा पण्डित मण्डली को कुण्ठित कर देती थी। पण्डित समाज में उनका भारी मान था। अनेकों योग एवं तंत्र की सिद्धियाँ उन्हें सहज सुलभ थीं; पर अध्यात्म के यथार्थ तत्त्व से वे वंचित थे। इस बात की कसक उनमें थी; लेकिन साथ ही उनमें कहीं इस बात का सूक्ष्म अहं भी था कि वे परम विद्वान् एवं सिद्धि सम्पन्न हैं। अध्यात्म की जिज्ञासा एवं विद्वत्ता के अहं ने उन्हें द्वन्द्व में डाल रखा था। समझ में नहीं आ रहा था कि वे किसे अपना मार्गदर्शक गुरु बनाएँ। अन्त में बड़े सोच-विचार के बाद उन्होंने आचार्य रामानुज की शरण में जाने का निश्चय किया। आचार्य उन दिनों भारत की धरती पर सर्वमान्य विद्वान् थे। उनके तप की प्रभा से समस्त दिशाएँ प्रकाशित थीं।
  
🔷 अपनी जिज्ञासा को लेकर वे रामानुज के पास पहुँच गए; परन्तु उनकी अहं वृत्ति के कारण आचार्य ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया। कई बार उन्होंने इसके लिए प्रयास किया, पर हर बार असफल रहे। एक दिन जब वे आचार्य के पास बैठे थे, आचार्य की मुँहबोली बहिन अतुला उनके पास आयी और बोली- भैया ससुराल में मुझे रोटी बनाने में बड़ा कष्ट होता है। आपके पास यदि कोई उपयुक्त व्यक्ति हो, तो उसे मुझे दे दीजिए ; ताकि वह मेरी ससुराल में खाना पका सके। कुछ देर सोचने के बाद आचार्य की दृष्टि पास बैठे कुरेश भट्ट की ओर गयी और उन्होंने कहा- कुरेश, मैं तुम्हें अपना शिष्य तो नहीं बना सकता, परन्तु यदि तुम चाहो तो मेरी इस बहिन के यहाँ रसोइया बन सकते हो। परम धनवान्, महाविद्वान्, प्रचण्ड तपस्वी सिद्धि सम्पन्न कुरेश के लिए ऐसा प्रस्ताव सुनकर पास बैठे लोग चौंक पड़े।
  
🔶 लेकिन कुरेश अहंभाव से भले ग्रस्त हो, पर शास्त्रों के मर्म से परिचित थे। उन्हें सद्गुरु की कृपादृष्टि का मर्म पता था। बिना क्षण की देर लगाए उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, प्रभु! आप शिष्य न सही, मुझे अपना सेवक होने का गौरव दे रहे हैं। यही मेरे लिए सब कुछ है। उस क्षण से लेकर वर्षों तक वह अतुला की ससुराल में रोटी बनाते रहे। सबको प्रेमपूर्ण भोजन कराते रहे। साथ ही उनका मन सद्गुरु के ध्यान में रमा रहा। प्रार्थना की इस निरन्तरता ने उनके अहं को धो डाला।  उनकी चेतना उनके सद्गुरु से एक हो गयी। आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की विभूतियाँ उनमें आ विराजी। एक दिन आचार्य स्वयं उन्हें लेने उनके पास आए और बोले- वत्स! अब तुम स्वतः ही मेरे शिष्य बन गए हो। सद्गुरु की अमृतवर्षिणी कृपा दृष्टि को पाकर उनका जीवन कृतकृत्य हो गया। सचमुच ही सद्गुरु कृपा ऐसी है, जो शिष्य के जीवन को शुद्धतम बना देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 78

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

👉 सतर्कता

🔶 सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था, एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी, फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड_रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं, उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया, तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम रवि था, बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था अपनी डी पी मे।

🔷 सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली, अभी उसे रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशन टिंग के साथ बज उठा, उसने चेक करा तो वो रवि का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें रवि ने लिखा था " थैंक यू वैरी मच ",

🔶 वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा " थैंक्स किसलिये ?"

🔷 उधर से तुरंत जवाब आया " मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये ",

🔶 सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गई।

🔷 अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे रवि के मैसेज नज़र आये, रवि ने उसे कई रोमान्टिक कवितायेँ भेज रखीं थीं, उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया।

🔶 थोड़ी देर मे ही रवि का रिप्लाई आ गया, वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था,

🔷 उसने रवि को अपना संछिप्त परिचय दे दिया, उसका परिचय जानने के बाद रवि ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी।

🔶 और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला, सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था।

🔷 सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था, जिस दिन उसकी रवि से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है, रवि उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था,आज रात फिर सलोनी रवि से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद रवि ने सलोनी से कहा ...

🔶 " यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मै तुमसे_मिलना_चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने काप्रोग्राम बनाओ ना ",
सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी,

🔷 शायद अंजान होने का डर था वो, सलोनी ने यही बात रवि से कह दी," अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे।

🔶 रवि ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की," अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मै ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ " सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की," ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना " रवि ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा, और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था।

🔷 अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, रवि ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था, थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई।

🔶 रवि उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया।

🔷 पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था।

🔶 सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा किया उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली " हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है।

🔷 " अरे_यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ_कर_बात करते हैं "
और फिर रवि ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी।

🔶 जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक_आदमी_बैठा हुआ नज़र आया, शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था, सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर रवि से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर_खींच लिया और बाहर से रवि ने उसे अंदर धक्का दे दिया।

🔷 ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को रवि ने पकड़ लिया।

🔶 अब वो ना तो चीख सकती थी और ना ही अपने बचाव में कुछ कर सकती थी।।

🔷 दोस्तों फेसबुक अपने विचारो को व्यक्त करना का अच्छा साधन हैं।

🔶 यहा किसी से भी जरूरत से ज्यादा Attached ना हो आपकी सुरक्षा आपके ही हाथ हैं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 22 Feb 2018


👉 व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनायें

🔶 मनुष्य एक अबोध शिशु के रूप में इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। तब न उसमें भला-बुरा सोचने की क्षमता होती है और न किसी तथ्य को समझाने, परिस्थितियों से लाभ उठाने या अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने की शक्ति। मनुष्य की जीवन यात्रा किसी पाठशाला में भर्ती कराए गए छोटे से बालक की तरह आरम्भ होती है। उस समय उसे जो कुछ सिखा व समझा दिया जाय तदनुरूप वह आगे बढ़ता रहता है। उस समय व्यक्तित्व की आधार शिला रखने का उत्तरदायित्त्व अभिभावकों का है। परन्तु जब कुछ सोचने समझने लायक स्थिति हो जाती है और व्यक्ति अपना भला-बुरा देखने लगता है तब अपना व्यक्तित्व इस प्रकार गढऩा आरम्भ कर देना चाहिए जिससे कि जीवन समर में सफलता प्राप्त की जा सके। व्यक्ति का निजी जीवन सुसंस्कृृत बनाना जीवन साधना का एक अंग है तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को सुघड़ता पूर्वक पूरा करना, समाज से अपने व्यवहार सम्बन्धों का स्तर स्थापित करना दूसरा अंग है। इन्हीं का नाम संस्कृति और सभ्यता है।
  
🔷 व्यक्ति और समाज कोई भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं। एक इकाई है, तो दूसरा समुच्चय। व्यक्ति इकाई है और समाज व्यक्तियों का समूह।  इसलिए समाज की स्थिति व्यक्तियों के स्तर पर निर्भर करती है। फिर भी व्यक्ति को स्वयं के प्रति और समाज के प्रति दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से सोचना तथा जीवन साधना का स्वरूप निर्धारित करना पड़ेगा। व्यक्ति स्वयं के प्रति कितना सजग, सद्गुणी, संस्कारवान तथा चरित्रनिष्ठ है यह जीवन साधना की पहली सीढ़ी या एक पक्ष है, जिसे संस्कृति कहा जा सकता है। जीवन साधना का दूसरा पक्ष समाज के प्रति व्यक्ति की रीति-नीति से सम्बद्ध है, जिसमें सद्व्यवहार, शिष्टाचार, सामाजिकता, सहकार आदि प्रवृत्तियाँ आती हैं।
  
🔶 व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने गुण, कर्म और स्वभाव के परिष्कार की प्रक्रिया पद्धति अपनानी चाहिए। मनुष्य के प्रारंभ के कुछ वर्ष ही वह अपने अभिभावकों पर निर्भर रहता है। विचार क्षमता और विवेक चेतना जागृत होते ही उसे अपने व्यक्तित्व निर्माण में लगना चाहिए, क्योंकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से ही परिस्थितियों का लाभ उठाया तथा जीवन को ऊँचा बनाया जा सकता है। असंस्कृत और फूहड़ व्यक्तित्व अनुकूल परिस्थितियों का लाभ नहीं उठा पाते जबकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से प्रतिकूलाताओं को भी सहायक बनाया जा सकता है और राह के पत्थर को भी सीढ़ी बनाकर ऊँचा उठाया जा सकता है।
  
🔷 व्यक्तित्व का गठन गुण, कर्म और स्वभाव से मिलकर बनता है। लम्बे समय तक अभ्यास में आते रहने पर गुण ही स्वभाव बन जाते हैं और स्वभाव में आई विशेषताएँ ही गुण कहलाती हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति ईमानदारी के गुण का अभ्यास शुरू करता है। विगत जीवन में अनीति उपार्जन करने के बाद भी ईमानदारी का महत्त्व समझ मेें आ जाय और उसे जीवन नीति बनाने की आकांक्षा उत्पन्न हो, तो प्रारम्भ में उसका अभ्यास गुण की भाँति ही करना पड़ता है। प्रलोभन के अवसर प्रस्तुत होने पर भी दृढ़ रहा जाय तथा लम्बे समय तक ईमानदारी को जीवनक्रम में शामिल रखा जाय तो एक स्थिति ऐसी आती है जब यह गुण अपने स्वभाव में सम्मिलित हो जाता है।

🔶 स्वभाव में सम्मिलित होने के बाद उस अभ्यास को तोडऩा मुश्किल हो जाता है। गुणों के अभ्यास द्वारा स्वभाव का परिष्कार करने के साथ अपने व्यक्तित्व को सुगठित करने के लिए इच्छाओंं, भावनाओं और क्रियाओं को परिष्कृत करना आवश्यक है। मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू सजाने-सँवारने और परिष्कृत करने चाहिए। मनुष्य को अपने कर्म, विचार और भावनाओं की गतिविधियों, क्रियाओं, विचारणाओं एवं आकांक्षाओं का परिष्कार सतत करते रहना ही चाहिए, ताकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विश्वास करो

🔷 विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

🔶 विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो।

🔷 क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

🔶 विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

🔷 आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

🔶 विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

.... कर्मयोग से
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/December/v1.9

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 1)

🔷 मोटर की ठीक प्रकार साज-संभाल न रखी जाय तो मजबूत और कीमती होने पर भी कुछ ही दिन में उसका कचूमर निकल जाता है। अच्छे-खासे शरीरों की भी दुर्गति इसी कारण होती देखी गयी है। यही बात हर उपकरण, प्राणी, पदार्थ आदि पर लागू होती देखी गयी है। वे सभी अपने सदुपयोग और रख रखाव पर पूरा ध्यान रखे जाने की माँग करते हैं। उपेक्षा या अतिक्रमण के शिकार होने पर वे अपनी क्षमता गँवा बैठते हैं और अन्ततः कष्ट दायक बनते हैं।

🔶 मस्तिष्क मानवी सत्ता का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। समूचे शरीर पर उसी का शासन है। पेट, हृदय, गुर्दे आदि तो श्रमजीवी मात्र हैं। उनका सूत्र संचालन एवं नियमन तो मस्तिष्क द्वारा ही होता है। यह निर्वाह की बात हुई। उत्थान-पतन में भी उसी के निर्धारणों को श्रेय दिया जाता है। राज्याधिकारी को मुकुट पहनाया जाता है। प्रतिष्ठा सिर की होती है। नियति ने जीवधारी को मस्तिष्क रूपी मुकुट प्रदान किया है। यह उसकी मर्जी है कि यथास्थान रखे अथवा पैरों तले कुचले। पैरों तले कुचलने से तात्पर्य है-उसकी क्षमता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देना अथवा दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करना। ‘भाग्य विधान ललाट पर लिखा होता है’ की उक्ति से यही तात्पर्य निकलता है कि विचार क्षेत्र के ऊपर ही यह अवलम्बित है कि व्यक्ति पिछड़ा, अभागा, उपेक्षित, तिरस्कृत होकर जिये, भर्त्सना और प्रताड़ना का पात्र बने अथवा अनुकरणीय, अभिवन्दनीय, श्रेय, समुन्नत एवं गौरवान्वित सुसम्पन्न होकर जिये।

🔷 इस महत्त्वपूर्ण अवयव को प्रदान करते समय सृष्टा ने उसकी भी जिम्मेदारी मनुष्य को सौंप दी है और यह अधिकार दिया है कि जो जब चाहे जिस तरह उपयोग करे। उसके पीछे एक अनुबन्ध भी है कि उसका भला-बुरा प्रयोग करने पर तदनुरूप प्रतिफल वहन करने के लिए भी बाधित होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 1)

🔷 Few such things that must be note in your mind to never forget. Note this in your mind and never forget. I have to tell you one thing that you are born with some exclusive objective in a very exclusive phase of time. It is a transitional phase. You however cannot see but I can and I must say. The time you are born is not an ordinary one rather extraordinary one. At this time the age is changing very fast. Don’t you see how the characteristics of problems of the world are changing?

🔶 Don’t you see the progress made by science? Neither gunpowder nor any bullets rather only x-ray is shoot out to jam the whole area leaving people in that area dead. Such scientific weapons are being built that can destroy the whole world in seconds if so desired. The science is heading towards destruction so speedily that any man of disturbed mind can destroy the beauty of this world for which the man has been working hard for millions of years. Such is the time. The man has become so wicked and shrewd today as never before in history of universe.
                                         
🔷 On the stage of the world, history tells, the man has never been so unreadable. The man now is growing on scales of intelligence, education, luxury, houses and money but on the scales of humanity it has become so weak, so wicked, so shrewd, so dishonest, so cheat and so cunning that I fear if high-jacking of public minds is further allowed then each one will be swallowing other live and no one will believe even own shadow for any help. Such a critical situation today is O SON! I just can’t say anything. As grave is the situation of this world, the danger is before the world. One section of this Age is on the verge of destruction.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 11)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! ये क्या होता है? ये मैं किसकी कहानियाँ सुना रहा हूँ? मुरदे की। जिंदा आदमियों की भी कह रहा हूँ। आपके जिम्मे मैं एक काम सुपुर्द कर रहा हूँ कि जहाँ भी आपको जिंदा आदमी मालूम पड़ें, जिंदादिल आदमी मालूम पड़े, आप उनके पास जाना। आप उनको मेरा संदेश लेकर के जाना और खुशामद करने के लिए जाना और यह कहना कि भगवान् ने जो विशेषताएँ आपके अंदर दी हैं, आपके अंदर जो प्रतिभा है, जो क्षमता है और जो आपके अंदर विशेषता है, उसके लिए भगवान् ने निमंत्रण दिया है, समय ने निमंत्रण दिया है। युग ने निमंत्रण दिया है, मनुष्य जाति के गिरते हुए भविष्य ने और यह कहा है कि पेट भरने के लिए आपको जिंदा रहना काफी नहीं है।

🔷 पेट तो मक्खी-मच्छर भी भर लेते हैं, कीड़े-मकोड़े और कुत्ते भी भर लेते हैं। किसी ने जलेबी खा ली तो क्या और मक्का की रोटी खा ली तो क्या? खाने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। औलाद पैदा करने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। खाने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए सुअर को पैदा किया गया है, जो एक-एक साल में बारह-बारह बच्चे पैदा कर देता है। गंदी-संदी चीजें खाकर के भी हट्टा-कट्टा होकर मोटा पड़ा रहता है। पेट भर गया, बस खर्राटे भरता रहता है। पेट भरने के लिए इंसान को पैदा नहीं किया गया है।

🔶 मित्रो! इंसान बड़े कामों के लिए पैदा किया है। इंसान की जिंदगी कई लाख योनियों में घूमने के बाद आती है। एकाएक कहाँ आ पाती है? इसलिए मित्रो! वहाँ हमारा संदेश लेकर के जाना, युग की पुकार लेकर के जाना। वक्त की पुकार लेकर के जाना और यह कहना कि आपको समय ने पुकारा है, युग ने पुकारा है, राष्ट्र ने पुकारा है, गुरुजी ने पुकारा है। अगर आप उनकी पुकार सुन सकते हों, अगर आपके कान हैं, अगर आपके अंदर दिल है; अगर आपके पास कान नहीं है, दिल नहीं है, तो हम क्या कह सकते हैं। फिर कौन आदमी सुनेगा? रामायण की कथा हम सुन लेते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आ जाते हैं। भागवत की कथा हम सुनकर के आते हैं, व्याख्यान हम सुन करके आते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आते हैं। चिकने घड़े के तरीके से हमारे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 48)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 धन्यभागी हैं वे शिष्य, जो निरन्तर इस बात के लिए प्रार्थनाशील हैं कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि उनमें नित्य निवास करे; उनका हृदय अपने सद्गुरु की दिव्यदृष्टि के आलोक से आलोकित रहे। श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही समस्त जगत् की सृष्टि हुई है। इसी से जगत् के समस्त पदार्थों की पुष्टि होती है। समस्त सत्शास्त्रों का मर्म इसी में समाया है। श्रीगुरु की कृपादृष्टि मिलने पर ही जगत् की समस्त सम्पदाओं की व्यर्थताओं का पता चलता है। यही शिष्यों के समस्त अवगुणों को धुलकर परिमार्जित करती है। तत् सत्ता यही है।

🔷 इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। संसार में गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों के रंग-मञ्च की स्थापना का परम कारण यही है, यही आधार स्तम्भ है। करुणरस का वर्षण करने वाली इस सद्गुरु की कृपादृष्टि में पुरुष एवं प्रकृति अन्य चौबीस तत्त्व समाए हैं। समष्टि की रूपमाला, जीवन के सभी नियम काल आदि सभी कारण जिसमें समाए हैं, वह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीगुरु की कृपा दृष्टि ही है॥ ५९-६०॥
  
🔶 सद्गुरु कृपा दृष्टि का यह मर्म साधना का गहन रहस्य है, जो केवल योग्य शिष्य के सामने ही प्रकट होता है। सामान्य जन तो इसकी सही अवधारणा भी नहीं कर सकते, इसके रहस्य को पहचानना तो बहुत दूर की बात है। जिसमें शिष्यत्व प्रगाढ़ है, जो समर्पण की साधना में प्रवीण है। जिसने अपनी अहंता को गुरुचरणों में विसर्जित कर दिया है, वही साधक इस अनुभूति का अधिकारी बनता है। अन्य जनों को, तो ये बातें कोरी काव्य कल्पना लगती हैं। कई तो ऐसे हैं, जो इस बारे में केवल तर्क-वितर्क में ही जूझते रह जाते हैं; लेकिन जो सच्चे शिष्य हैं, उन्हें अपने आप ही इस सत्य की मिठास का स्वाद मिलता रहता है। इस बारे में अनेक मार्मिक प्रसंग विख्यात हैं। कई सत्य घटनाएँ संत-समाज में प्रचलित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 77

👉 चीनी एक जहर है

👉 चीनी एक जहर है जो अनेक रोगों का कारण है, जानिये कैसे...

🔷 (1) चीनी बनाने की प्रक्रिया में गंधक का सबसे अधिक प्रयोग होता है। गंधक माने पटाखों का मसाला

🔶 (2) गंधक अत्यंत कठोर धातु है जो शरीर मे चला तो जाता है परंतु बाहर नही निकलता।

🔷 (3) चीनी कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाती है जिसके कारण हृदयघात या हार्ट अटैक आता है।

🔶 (4) चीनी शरीर के वजन को अनियन्त्रित कर देती है जिसके कारण मोटापा होता है।

🔷 (5) चीनी रक्तचाप या ब्लड प्रैशर को बढ़ाती है।

🔶 (6) चीनी ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (7) चीनी की मिठास को आधुनिक चिकित्सा मे सूक्रोज़ कहते है जो इंसान और जानवर दोनो पचा नही पाते।

🔶 (8) चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ तेइस हानिकारक रसायनो का प्रयोग किया जाता है।

🔷 (9) चीनी डाइबिटीज़ का एक प्रमुख कारण है।

🔶 (10) चीनी पेट की जलन का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (11) चीनी शरीर मे ट्राइ ग्लिसराइड को बढ़ाती है।

🔶 (12) चीनी पेरेलिसिस अटैक या लकवा होने का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (13) चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंग्रेजो ने 1868 मे लगाई थी। उसके पहले भारतवासी शुद्ध देशी गुड़ खाते थे और कभी बीमार नही पड़ते थे।

🔶🔶  कृपया जितना हो सके, चीनी से गुड़ पे आएँ। 🔶🔶

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...