👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक
आध्यात्मिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोग निदान का परिदृश्य थोड़ा अधिक व्यापक है। इसमें प्रचलित व पारम्परिक तरीकों से अलग हटकर इसका तंत्र विकसित किया गया है। इसका कारण यह है कि आध्यात्मिक दृष्टि मानवीय जीवन को समग्रता एवं परिपूर्णता से देखने पर विश्वास करती है। उसका जोर किसी एक आयाम पर नहीं है, बल्कि दृश्य- अदृश्य सभी आयामों पर समान रूप से है। इसी को ध्यान में रखकर इसकी रोग निदान विधियों को विकसित किया गया है। ताकि रोग की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हो, उन्हें उखाड़ा और नष्ट किया जा सके।
इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आध्यात्मिक चिकित्सा के, रोग निदान के पांच आयामों का ताना- बाना बुना गया है। आयुर्वेद- निदान पंचक की भाँति इसे आध्यात्मिक निदान- पंचक नाम दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत आध्यात्मिक चिकित्सक रोगी के व्यक्तित्व के पांच तत्त्वों का परीक्षण करते हैं। इनमें से पहला है व्यवहार, २. चिन्तन, ३. संस्कार, ४. प्रारब्ध एवं ५. पूर्वजन्म के दोष- दुष्कर्म। इन पांच का परीक्षण करके रोग का सही निदान कर लिया जाता है। जहाँ तक इन पाँच तत्त्वों का प्रश्र है, तो आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए इन सभी का व्यापक महत्त्व है। हालांकि इनमें एक को छोड़कर बाकी सभी आयाम अदृश्य हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति के बिना देखे एवं जाने नहीं जा सकते। लेकिन इन अदृश्य तथ्यों को जाने बिना आध्यात्मिक चिकित्सा भी तो सम्भव नहीं है।
इसमें से पहले यानि कि व्यवहार के अन्तर्गत रोगी की शारीरिक पीड़ा- परेशानी अथवा मानसिक दुःख- दर्द का लेखा- जोखा उसके व्यवहार की स्थिति के आधार पर करते हैं। इस सबसे उसके चिन्तन चेतना पर पड़े हुए प्रभावों की पड़ताल, चिन्तन प्रक्रिया की जाँच से की जाती है। तीसरे क्रम में संस्कार की परत अपेक्षाकृत गहरी है। इसकी जांच किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा सम्भव नहीं। इसे तो सीधे ही आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति से किया जाना होता है। ज्यादातर रोगों के कारण यहीं जड़ जमाए होते हैं। चौथे क्रम में प्रारब्ध की जाँच परख थोड़ी और जटिल होती है। यदि रोग के कारण हमारे बाह्य जीवन में कहीं नजर नहीं आ रहे। और इनका पता हमारे संस्कार क्षेत्र में नहीं चल रहा तो फिर प्रारब्ध की छान- बीन करनी ही पड़ती है।
लम्बे समय तक यानि कि दस- पन्द्रह वर्षों तक चलने वाले रोग अथवा फिर एक के बाद एक नए कष्ट- कठिनाइयों का प्रकट होना प्रायः प्रारब्ध के ही कारण होता है। यहीं पर इनकी जड़ें होती हैं। यदि इस गहरी परत को सही ढंग से न जाना समझा गया तो रोग या कष्ट निवारण के सारे प्रयास धरे रह जाते हैं। पांचवे क्रम में आध्यात्मिक चिकित्सक को कतिपय विशेष रोगियों के रोग निवारण में यह भी जानना पड़ता है कि उसके जीवन में प्रारब्ध के ये दुर्योग क्यों आए। यह दुःखद प्रक्रिया आखिर चली ही क्यों? पिछले जन्मों के कौन से कर्म इसका कारण रहे हैं। पूर्वजन्मों के ज्ञान से ही इस सच का पता लगाया जा सकता है। ऐसा करके ही रोग के सटीक निदान एवं सार्थक समाधान तक पहुँचना सम्भव हो पाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 51
आध्यात्मिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोग निदान का परिदृश्य थोड़ा अधिक व्यापक है। इसमें प्रचलित व पारम्परिक तरीकों से अलग हटकर इसका तंत्र विकसित किया गया है। इसका कारण यह है कि आध्यात्मिक दृष्टि मानवीय जीवन को समग्रता एवं परिपूर्णता से देखने पर विश्वास करती है। उसका जोर किसी एक आयाम पर नहीं है, बल्कि दृश्य- अदृश्य सभी आयामों पर समान रूप से है। इसी को ध्यान में रखकर इसकी रोग निदान विधियों को विकसित किया गया है। ताकि रोग की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हो, उन्हें उखाड़ा और नष्ट किया जा सके।
इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आध्यात्मिक चिकित्सा के, रोग निदान के पांच आयामों का ताना- बाना बुना गया है। आयुर्वेद- निदान पंचक की भाँति इसे आध्यात्मिक निदान- पंचक नाम दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत आध्यात्मिक चिकित्सक रोगी के व्यक्तित्व के पांच तत्त्वों का परीक्षण करते हैं। इनमें से पहला है व्यवहार, २. चिन्तन, ३. संस्कार, ४. प्रारब्ध एवं ५. पूर्वजन्म के दोष- दुष्कर्म। इन पांच का परीक्षण करके रोग का सही निदान कर लिया जाता है। जहाँ तक इन पाँच तत्त्वों का प्रश्र है, तो आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए इन सभी का व्यापक महत्त्व है। हालांकि इनमें एक को छोड़कर बाकी सभी आयाम अदृश्य हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति के बिना देखे एवं जाने नहीं जा सकते। लेकिन इन अदृश्य तथ्यों को जाने बिना आध्यात्मिक चिकित्सा भी तो सम्भव नहीं है।
इसमें से पहले यानि कि व्यवहार के अन्तर्गत रोगी की शारीरिक पीड़ा- परेशानी अथवा मानसिक दुःख- दर्द का लेखा- जोखा उसके व्यवहार की स्थिति के आधार पर करते हैं। इस सबसे उसके चिन्तन चेतना पर पड़े हुए प्रभावों की पड़ताल, चिन्तन प्रक्रिया की जाँच से की जाती है। तीसरे क्रम में संस्कार की परत अपेक्षाकृत गहरी है। इसकी जांच किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा सम्भव नहीं। इसे तो सीधे ही आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति से किया जाना होता है। ज्यादातर रोगों के कारण यहीं जड़ जमाए होते हैं। चौथे क्रम में प्रारब्ध की जाँच परख थोड़ी और जटिल होती है। यदि रोग के कारण हमारे बाह्य जीवन में कहीं नजर नहीं आ रहे। और इनका पता हमारे संस्कार क्षेत्र में नहीं चल रहा तो फिर प्रारब्ध की छान- बीन करनी ही पड़ती है।
लम्बे समय तक यानि कि दस- पन्द्रह वर्षों तक चलने वाले रोग अथवा फिर एक के बाद एक नए कष्ट- कठिनाइयों का प्रकट होना प्रायः प्रारब्ध के ही कारण होता है। यहीं पर इनकी जड़ें होती हैं। यदि इस गहरी परत को सही ढंग से न जाना समझा गया तो रोग या कष्ट निवारण के सारे प्रयास धरे रह जाते हैं। पांचवे क्रम में आध्यात्मिक चिकित्सक को कतिपय विशेष रोगियों के रोग निवारण में यह भी जानना पड़ता है कि उसके जीवन में प्रारब्ध के ये दुर्योग क्यों आए। यह दुःखद प्रक्रिया आखिर चली ही क्यों? पिछले जन्मों के कौन से कर्म इसका कारण रहे हैं। पूर्वजन्मों के ज्ञान से ही इस सच का पता लगाया जा सकता है। ऐसा करके ही रोग के सटीक निदान एवं सार्थक समाधान तक पहुँचना सम्भव हो पाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 51










































