बुधवार, 24 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 35)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

आध्यात्मिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोग निदान का परिदृश्य थोड़ा अधिक व्यापक है। इसमें प्रचलित व पारम्परिक तरीकों से अलग हटकर इसका तंत्र विकसित किया गया है। इसका कारण यह है कि आध्यात्मिक दृष्टि मानवीय जीवन को समग्रता एवं परिपूर्णता से देखने पर विश्वास करती है। उसका जोर किसी एक आयाम पर नहीं है, बल्कि दृश्य- अदृश्य सभी आयामों पर समान रूप से है। इसी को ध्यान में रखकर इसकी रोग निदान विधियों को विकसित किया गया है। ताकि रोग की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हो, उन्हें उखाड़ा और नष्ट किया जा सके।

इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आध्यात्मिक चिकित्सा के, रोग निदान के पांच आयामों का ताना- बाना बुना गया है। आयुर्वेद- निदान पंचक की भाँति इसे आध्यात्मिक निदान- पंचक नाम दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत आध्यात्मिक चिकित्सक रोगी के व्यक्तित्व के पांच तत्त्वों का परीक्षण करते हैं। इनमें से पहला है व्यवहार, २. चिन्तन, ३. संस्कार, ४. प्रारब्ध एवं ५. पूर्वजन्म के दोष- दुष्कर्म। इन पांच का परीक्षण करके रोग का सही निदान कर लिया जाता है। जहाँ तक इन पाँच तत्त्वों का प्रश्र है, तो आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए इन सभी का व्यापक महत्त्व है। हालांकि इनमें एक को छोड़कर बाकी सभी आयाम अदृश्य हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति के बिना देखे एवं जाने नहीं जा सकते। लेकिन इन अदृश्य तथ्यों को जाने बिना आध्यात्मिक चिकित्सा भी तो सम्भव नहीं है।

इसमें से पहले यानि कि व्यवहार के अन्तर्गत रोगी की शारीरिक पीड़ा- परेशानी अथवा मानसिक दुःख- दर्द का लेखा- जोखा उसके व्यवहार की स्थिति के आधार पर करते हैं। इस सबसे उसके चिन्तन चेतना पर पड़े हुए प्रभावों की पड़ताल, चिन्तन प्रक्रिया की जाँच से की जाती है। तीसरे क्रम में संस्कार की परत अपेक्षाकृत गहरी है। इसकी जांच किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा सम्भव नहीं। इसे तो सीधे ही आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति से किया जाना होता है। ज्यादातर रोगों के कारण यहीं जड़ जमाए होते हैं। चौथे क्रम में प्रारब्ध की जाँच परख थोड़ी और जटिल होती है। यदि रोग के कारण हमारे बाह्य जीवन में कहीं नजर नहीं आ रहे। और इनका पता हमारे संस्कार क्षेत्र में नहीं चल रहा तो फिर प्रारब्ध की छान- बीन करनी ही पड़ती है।

लम्बे समय तक यानि कि दस- पन्द्रह वर्षों तक चलने वाले रोग अथवा फिर एक के बाद एक नए कष्ट- कठिनाइयों का प्रकट होना प्रायः प्रारब्ध के ही कारण होता है। यहीं पर इनकी जड़ें होती हैं। यदि इस गहरी परत को सही ढंग से न जाना समझा गया तो रोग या कष्ट निवारण के सारे प्रयास धरे रह जाते हैं। पांचवे क्रम में आध्यात्मिक चिकित्सक को कतिपय विशेष रोगियों के रोग निवारण में यह भी जानना पड़ता है कि उसके जीवन में प्रारब्ध के ये दुर्योग क्यों आए। यह दुःखद प्रक्रिया आखिर चली ही क्यों? पिछले जन्मों के कौन से कर्म इसका कारण रहे हैं। पूर्वजन्मों के ज्ञान से ही इस सच का पता लगाया जा सकता है। ऐसा करके ही रोग के सटीक निदान एवं सार्थक समाधान तक पहुँचना सम्भव हो पाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 51

👉 The Paradoxical Commandments

People are illogical, unreasonable, and self-centered. Love them anyway. If you do good, people will accuse you of selfish ulterior motives. Do good anyway. If you are successful, you will win false friends and true enemies. Succeed anyway. The good you do today will be forgotten tomorrow. Do good anyway. Honesty and frankness make you vulnerable. Be honest and frank anyway. The biggest men and women with the biggest ideas can be shot down by the smallest men and women with the smallest minds. Think big anyway. What you spend years building may be destroyed overnight. Build anyway. People really need help but may attack you if you do help them. Help people anyway. Give the world the best you have and you’ll get kicked in the teeth. Give the world the best you have anyway.

Kent M. Keith

👉 आत्मा की परमात्मा से पुकार

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया, जब जौ भर सूँड़ जल से बाहर रह गयी, तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गयी, दूसरे के प्राण बच गये। जीवात्मा की तात्त्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं है।

प्रश्न उठता है कि इस स्थिति का कारण क्या है? जब इस प्रश्न पर विचार किया जाता है, तब पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान् था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर, शाश्वत्, सनातन, सत्-चित् आनन्द से ओत-प्रोत था, उसकी उपेक्षा की गयी। फलस्वरूप भीतर और बाहर से सब प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन-हीन की तरह, अभागी जिन्दगी जियी गयी।

सत् स्थिर आत्मा है। गुण कर्म स्वभााव में सन्निहित मानवीय गरिमा ही सत् है। जो सत् को पकड़ता है,अपनाता है और धारण करता है, उसका आनन्द सुरक्षित रहता है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित विभूतिवान बना देती है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृत तुल्य अनुदान बरसता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है। ‘असतो मा सद्गमय’। उसे सत् की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रूके। शान्ति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दल-दल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। अपने अंतराल से ही आनन्द का ऐसा निर्झर बहे, जो अपने को गौरव प्रदान करे और दूसरों की हित साधना करते हुए धन्य बने।

आत्मा की दूसरी पुकार है- ‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’। हे सर्वशक्तिमान्! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात के अंधियारे में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध नहीं होने से ठोकर खाते और काँटों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ का कुछ समझ में आता है, कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधाएँ भी लक्ष्य रखती है। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दीखता है। ऐसी परिस्थिति में घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता से पुकारता है- ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’। ‘अज्ञान से ज्ञान की ओर लें चल। भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर जिसे अपनाकर सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।

जीवात्मा की तीसरी पुकार है- ‘मृत्योर्मा मा अमृतं गमय’। मृत्यु की ओर नहीं, अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय-कल्मष सम्पर्क क्षेत्र के प्रचलन, उस ओर घसीट लिए जा रहे हैं, जिस पर मरण ही मरण है। आत्म हनन के उपरांत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकांक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक।

प्रकृति चक्र के अनुसार समय-समय पर उनमें परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है और वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इसलिए हे परमात्मन्! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक-एक कदम आगे बढ़ती आ रही है और अब तब में दबोचने ही वाली है। इससे पूर्व हम अपने अन्तःकरण को, आनन्द को, भविष्य को निरन्तर मारते-कुचलते रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

👉 भगवान को भेंट

पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।

एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।

कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा।

फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ।

उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l

जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा।

भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं।

उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा।

काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे  ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए।

तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l

सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए...

इस कहानी का सार ये है कि.........
भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती जी🙏
सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी .....
भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है जी..!!!
हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं..... जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 23 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 July 2019


👉 मजबूत आधारशिला रखना है

युग निर्माण योजना की मजबूत आधारशिला रखे जाने का अपना मन है। यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। उसकी प्रसव पीड़ा में अगले दस वर्ष अत्यधिक अनाचार, उत्पीड़न, दैवीय कोप, विनाश और क्लेश, कलह से भरे बीतने हैं। दुष्प्रवृत्तियों का परिपाक क्या होता है, इसका दंड जब भरपूर मिल लेगा, तब आदमी बदलेगा। यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रक्रियाओं को अपना सकने योग्य जनमानस तैयार करना है। लोगों को यह बताना है कि अगले दिनों संसार का एक राज्य, एक धर्म, एक अध्यात्म, एक समाज, एक संस्कृति, एक कानून, एक आचरण, एक भाषा और एक दृष्टिकोण बनने जा रहा है, इसलिए जाति, भाषा, देश, सम्प्रदाय आदि की संकीर्णताएँ छोड़ें और विश्वमानव की एकता की, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना स्वीकार करने के लिए अपनी मनोभूमि बनाएँ।

लोगों को समझाना है कि पुराने से सार भाग लेकर विकृत्तियों को तिलांजलि दे दें। लोकमानस में विवेक जाग्रत् करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार शिरोधार्य करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास कराना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत संपदाएँ न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीरी दोनों ही संसार से विदा हो जाएँगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने-जाड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते स्वल्प संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी-ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज अनर्गल जैसी लगती हैं।

संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिए पर लुढ़कती हुई उपरोक्त महान लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1969, पृष्ठ 59,60

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 34)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

रोग निदान- रोगी की चिकित्सा का आधार है। इसी के सहारे रोगी के लिए औषधि, अनुपान, पथ्यापथ्य आहार एवं जीवन क्रम का निर्धारण हो पाता है। इसमें थोड़ी सी भूल- चूक होने पर चिकित्सा का सारा सरंजाम लड़खड़ा जाता है। यही नहीं कभी- कभी तो स्वास्थ्य का वरदान देने वाली चिकित्सा प्रणाली जानलेवा भी सिद्ध होती है। इसी वजह से प्रत्येक चिकित्सा पद्धति ने अपने ढंग से रोग निदान की अचूक विधियों की खोज की है। इसके कारगर तरीकों का अनुसन्धान एवं विकास किया है। क्योंकि चिकित्सा प्रणाली कोई भी हो, इसकी सफलता या विफलता का सारा दारोमदार सही व सटीक रोग निदान पर निर्भर करता है। स्थिति तो यहाँ तक है कि आज रोग निदान की अचूक विधियों को ही चिकित्सा प्रणाली की सफलता की गारन्टी के रूप में माना जाने लगा है।

जिसे हम आधुनिक चिकित्सा पद्धति कहते हैं, उसने अपनी सफलता के लिए रोग निदान की अत्याधुनिक तकनीकें विकसित की हैं। कई चिकित्सालयों एवं चिकित्सा संस्थानों ने तो इसी के लिए अपनी प्रसिद्धि हासिल की है, कि उनके यहाँ रोग निदान का यह ढांचा कितना चुस्त- दुरुस्त एवं मजबूत है। सामान्य रोगी परीक्षण या रोग निदान की क्लीनिकल विधियों से लेकर पेथोलोजिकल विधियाँ या फिर सी- टी. स्कैन, एम.आर. आई. के मंहगे उपकरण इसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए तत्पर रहते हैं। अपने- अपने ढंग से चिकित्सकों की कोशिश यही रहती है कि इसमें किसी तरह की कोई भूल- चूक न होने पाए।

चिकित्सा प्रणाली कोई भी हो, पर रोग निदान के एकदम सटीक होने की कोशिश सभी जगह हैं। आयुर्वेद में वात, पित्त एवं कफ प्रकृति को ध्यान में रखकर रोग निदान करने की परम्परा है। उसके लिए नाड़ी परीक्षण एवं निदान पंचक आदि की प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं। इसके निष्कर्षों के आधार पर ही रोगी की चिकित्सा का सरंजाम किया जाता है। होमियोपैथी में यह परिदृश्य थोड़ा अलग ढंग का है, इसमें रोगी की शारीरिक स्थिति के साथ उसकी मनोदशा का भी परीक्षण करते हैं। इन प्रचलित एवं पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों के अलावा वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों के जो आयाम इन दिनों विकसित हुए हैं, उन सभी में कहीं न कहीं रोग निदान की समुचित विधि व्यवस्था की गयी है। क्योंकि जब निदान ही नहीं तो समाधान किस व्याधि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 50

👉 Life will give you back

A son and his father were walking on the mountains.
Suddenly, his son falls, hurts himself and screams.
To his surprise, he hears the voice repeating,
somewhere in the mountain.
Curious, he yells: ‘‘Who are you?’’
He receives the answer: ‘‘Who are you?’’
And then he screams to the mountain: ‘‘I admire you!’’
The voice answers: ‘‘I admire you!’’
Angered at the response, he screams: ‘‘Coward!’’
He receives the answer: ‘‘Coward!’’
He looks to his father and asks: ‘‘What’s going on?’’
The father smiles and says: ‘‘My son, pay attention.’’
Again the man screams: ‘‘You are a champion!’’
The voice answers: ‘‘You are a champion!’’
The boy is surprised, but does not understand.
Then the father explains: ‘‘People call this ECHO, but really this is LIFE.
It gives you back everything you say or do.
Our life is simply a reflection of our actions.
If you want more love in the world, create more love in your heart.
If you want more competence in your team, improve your competence.
This relationship applies to everything, in all aspects of life;
Life will give you back everything you have given to it.

रविवार, 21 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई उनके पास आता था, वह उसकी समस्याओं को बड़ी आसानी से समझ लेते थे। समस्याओं की समझ, उसके कारणों की खोज एवं इसके सार्थक समाधान में उन्हें कुछ ही मिनटों का समय लगता था। एक बार बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा था- जब भी कोई मेरे पास अपनी समस्या लेकर आता है, मैं उसकी आँखों के माध्यम से उसकी अन्तर्चेतना में प्रविष्ट हो जाता हूँ। और उसकी समस्या के यथार्थ को जान लेता हूँ। उनकी इस बात पर जिज्ञासा करते हुए एक शिष्य ने कहा, गुरुदेव! आने वाला तो अपनी समस्या स्वयं ही आपको बता देता है। इसमें जानने की क्या जरूरत है।

इस शिष्य के कथन पर कुछ इस तरह से हँस पड़े जैसे कोई प्रौढ़ समझदार व्यक्ति किसी छोटे बच्चे की बात पर हँसता है। और वे हँसते हुए बोले, बेटा कम ही लोग मेरे पास सही बात बताते हैं। यानी वे झूठ बोलते हैं, अथवा फिर अपनी बातों को बढ़ा- चढ़ा कर कहते हैं। अथवा आधी- अधूरी बात कहते हैं। अब ऐसी बातों से तो काम चलता नहीं। इसलिए मुझे उनके अन्दर झांक कर सच्चाई जाननी पड़ती है। इस तरह से समस्या की सारी सच्चाई पता चल जाती है। साथ ही समाधान के सूत्र भी हाथ लग जाते हैं। सो कैसे? पूछने वाले की इस जिज्ञासा पर वह बोले- भगवान् का बनाया हुआ यह इन्सानी व्यक्तित्व भी बड़ा अजब- गजब है। इसकी गहरी परतों में न केवल समस्या की जड़ें होती हैं, बल्कि समाधान के सूत्र भी होते हैं। प्रायः ये समस्याएँ किसी पूर्वजन्म के कर्म, प्रारब्ध या संस्कार के कारण पनपती है। समाधान के रूप में बस इनकी थोड़ी सी आध्यात्मिक शल्यक्रिया करनी पड़ती है।

गुरुदेव की ये बातें भले ही थोड़ी रहस्यमय लगे, पर यह उनके जीवन के नित्यप्रति का सच रहा है। यदा- कदा वह यह भी कहते थे कि अधिसंख्यक समस्याएँ, विकृति एवं विकार आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के अभाव में पनपते हैं। यदि पीड़ित व्यक्ति की जीवन दृष्टि सुधार दी जाय तो समस्या का समाधान हो जाता है। इस क्रम में एक बात महत्त्वपूर्ण है। वह यह कि जो पीड़ित व्यक्ति होता है, उसकी सोच- विचार को सही दिशा देना भी आसान काम नहीं है। क्योंकि निरन्तर पीड़ा सहते रहने के कारण उसमें संकल्प एवं साहस चुक जाते हैं। ऐसी अवस्था में उसे अतिरिक्त ऊर्जा के अनुदान की जरूरत पड़ती है। ऐसा होने पर ही वह अपने बिखरे जीवन को फिर से संवार पाता है।

स्थिति जो भी हो किन्तु इतना सच है कि आध्यात्मिक चिकित्सक को मानवीय चेतना का मर्मज्ञ होने के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अजस्र स्रोत होना चाहिए। उसकी बौद्धिक पारदर्शिता, सघन भाव प्रवणता एवं अन्तरात्मा में उफनते आध्यात्मिक शक्ति के महासागर ही उसे सफल आध्यात्मिक चिकित्सक बनाते हैं। अपनी इस सामर्थ्य के बलबूते ही वह अपने रोगी के रोग निदान एवं समाधान में सक्षम हो पाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 48

शनिवार, 20 जुलाई 2019

Awaken your Self-Confidence | आत्मविश्वास जागृत करो | Hariye Na Himmat |...



Title

Jeevan Ke Aadhar Tumahi Ho | जीवन का आधार तुम्ही हो | Pragya Geet



Title

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधू  की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की  - "भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।" साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला - "अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।" साधू आनंद  की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है। साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया। झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे। साधू कहने लगा - "हे भगवान् ! ये तूने क्या किया?"

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला - "महाराज  आप क्यों दु:खी हो रहे है? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान्  इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो! यह भी नहीं रहने वाला।"

साधू मन ही मन सोचने लगा - "मैं तो केवल भेष से साधू हूँ। सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।" कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद  तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है।  मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद  नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया।

साधू ने आनंद  से कहा - "अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया। भगवान्  करे अब तू ऐसा ही बना रहे।" यह सुनकर आनंद  फिर हँस पड़ा और कहने लगा - "महाराज! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।"

साधू ने पूछा - "क्या यह भी नहीं रहने वाला?"

आनंद उत्तर दिया - "हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं  है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।"

आनंद  की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद  का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद  का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।

साधू कहता है - "अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है? क्यों इतराता है? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ। लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।"

साधू कहने लगा - "धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।"

साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद  ने अपनी तस्वीर  पर लिखवा रखा है - "आखिर में यह भी  नहीं रहेगा।

👉 आज का सद्चिंतन 20 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (अन्तिम भाग)



उत्थान से पतन और पतन से उत्थान के अचानक परिवर्तनों के अगणित प्रमाण, उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर विद्यमान हैं। आरंभिक परिस्थितियों से अन्तिम उपलब्धि तक क्रमिक गति से चलते हुए आकाश- पाताल जितना अन्तर उत्पन्न करने वाली घटनाएँ तो अपनी आँखों के सामने ही असंख्यों देखी जा सकती हैं। इसका मूल कारण एक ही है अंतःक्षेत्र की प्रबल आस्था और प्रचण्ड आकांक्षा। इतना भर सार तत्त्व जहाँ भी होगा, वहाँ विपरीत परिस्थितियाँ काई की तरह फटती चली जायेंगी और टिड्डी दल की तरह परामर्शों सहयोगों और अनुकूलताओं का समूह एकत्रित होता चला जायेगा। पतित, सामान्य और महान जीवनों के अन्तरों में परिस्थिति नहीं मनःस्थिति ही आधारभूत कारण रही है।

अन्तःकरण के कठोर क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए अध्यात्म विज्ञान का तत्व दर्शन और साधना उपचार ही प्रभावी सिद्ध होता है। योग साधना और तपश्चर्या का समूचा कलेवर इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ है। कठोर चट्टानें हीरे की नोंक वाले बरमे के अतिरिक्त और किसी औजार से छेदी नहीं जाती। अन्तःकरण में जमी अवांछनीयता को निरस्त करके उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना के लिए अध्यात्म विज्ञान का ही सहारा लेना पड़ेगा। उसी विद्या में पारंगत इंजीनियर अध्यात्मवेत्ता इस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कर सकेगा। विकृत विपन्नताओं के स्थान पर परिष्कृत परिस्थितियों की स्थापना यदि सचमुच हो तो उसका हल अध्यात्म विद्या का अवलम्बन लिये बिना और किसी प्रकार निकलेगा नहीं। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही दिशा निर्धारण और सार्थक श्रम करने में सुविधा रहेगी।

व्यक्ति निर्माण के लिए भौतिक उपायों की सार्थकता तब है जब अन्तःकरण के स्तर में परिवर्तन हो- दृष्टिकोण सुधरे। यह कार्य प्रशिक्षण मात्र से नहीं हो सकेगा। आस्थाओं का स्पर्श आस्थाएँ करती है। भावनाओं को भावनाओं से छुआ जाता है। काँटा काँटे से निकलता है और विष, विष से ही मारा जाता है। आस्था अन्तःकरण की अत्यन्त गहरी परतों में अपनी जड़ जमाये बैठी रहती है। उन तक पहुँचना और सुधार परिवर्तन करना सामान्य प्रयासों से सम्भव नहीं, उसके लिए उच्च स्तर के प्रयत्न करने पड़ते है। इनमें उपासनात्मक उपचारों के अतिरिक्त अन्य प्रयत्न अभीष्ट परिणाम उत्पन्न नहीं करते।

उपासना की प्रक्रिया को अन्तःकरण की वरिष्ठ चिकित्सा समझा जाना चाहिए। कुसंस्कारों की, कषाय कल्मषों की महाव्याधि से छुटकारा पाने के लिए मात्र यही रामबाण औषधि है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 32)

यही है आज के युग का सच। ऐसे आडम्बर से भरे एवं घिरे आध्यात्मिक चिकित्सकों की इस समय बाढ़ आयी हुई है। टी.वी. में प्रचार, अखबारों में विज्ञापन, लच्छेदार प्रवचन, बात- बात में अपनी प्रशंसा, ऐसे लोग और कुछ भले हों, आध्यात्मिक चिकित्सक कभी नहीं हो सकते। क्योंकि इसके लिए बौद्धिक चतुराई या चालाकी नहीं कठिन तप साधनाएँ चाहिए। वेष नहीं आचरण चाहिए। लुभावनी वाणी की बजाय उदार हृदय चाहिए। दिखावे और आडम्बर से यहाँ कोई काम चलने वाला नहीं है। ऐसे लोग भोले- भाले पीड़ित जनों को ठगकर खुद माला- माल तो हो सकते हैं, पर उनका कोई भी हित साधन नहीं कर सकते। इस तरह के धूर्तों के चंगुल में फंसने वाले स्वास्थ्य लाभ करने के स्थान पर दुःख, दारिद्रय, विपन्नता व विषाद ही हासिल करते हैं।

आध्यात्मिक चिकित्सक के लिए तो कठोर तपकर्म ही उनके जीवन की परिभाषा होता है। शरीर, मन और वचन से ये कभी भी तप साधना से नहीं डिगते। इनका जीवन अपने आप में उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगशाला होता है। जिसमें कठिन आध्यात्मिक प्रयोगों की शृंखला हमेशा चलती रहती है। इनके रोम- रोम में आध्यात्मिक ऊर्जा की सरिताएँ उफनती है। इनका व्यक्तित्व आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुञ्ज होता है। जिनके अन्दर ऐसी योग्यता होती है, वही आध्यात्मिक चिकित्सक होने के लिए सुपात्र- सत्पात्र होते हैं।
आध्यात्म विद्या- अस्तित्व के समग्र बोध का विज्ञान है। जो इसमें निष्णात हैं, उनकी दृष्टि पारदर्शी होती है।

वे व्यक्तित्व की सूक्ष्मताओं, गहनताओं व गुह्यताओं को समझने में सक्षम होते हैं। उनके लिए किसी के अन्तर में प्रविष्ट होना उसकी समस्याओं को जान लेना बेहद आसान होता है। वे औरों को उसी तरह से देखने में समर्थ होते हैं- जैसे हम सब किसी शीशे की अलमारी में बन्द सामान को देखते हैं। यह सामान क्या है? किस तरह से रखा है? पारदर्शी शीशे से साफ- साफ नजर आता है। कुछ इसी तरह से आध्यात्मिक चिकित्सक को अपने रोगी के रहस्य नजर आते हैं। उसके लिए जितना प्रत्यक्ष व्यवहार होता है, उतने ही प्रत्यक्ष संस्कार होते हैं। वह जितनी आसानी से वर्तमान जीवन को जान सकता है, उतनी आसानी से पूर्वजन्मों को भी निहार सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 47

👉 Swami Vivekananda

One day, Swami Vivekananda was returning from temple of Ma Kali. On the path, Swamiji saw a number of monkeys who were not allowing him to pass through it. Whenever Swamiji would take a step forward, those monkeys would make a lot of noise and make angry face, showing their anger by shrieking near his feet.

As Swami Vivekananda took a step forward, monkeys got close to him. Swamiji began to run and the monkeys started chasing him. Faster Swamiji ran, bolder monkey got and tried to catch him and bite him.

Just then an old Sanyasi shouted from a distance, "Face them…"

Those words brought Swamiji to senses and he stopped running. He turned back to boldly face them. As soon as Swamiji did that, the monkeys ran away and left.

Moral: We should not run away from challenges; instead we should face them boldly.

👉 परिवार निर्माणः-

(१) परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला, पाठशाला समझे। इस उद्यान मे सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगाये। हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने का भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह आदर्शवान बने ताकि स्वयं कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे सांचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है संचालक का आदर्शवादी ढांचे में ढलना। दूसरा है माली की तरह हरे पौधे का शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।

(२) परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्र्य, असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चे को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की- लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्व पालन तभी हो सकता है, जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा, जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें।

(३) संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्परायें प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाये। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले, सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य- प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना, उपहासास्पद माना जाय, केश विन्यास और अश्लील, उत्तेजक पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदें। नाक, कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीत फैशन कोई महिला न अपनाये।

(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।

(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

Believe in the Strength of your soul | आत्मशक्ति पर विश्वास रखो | Hariye...



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How is our Thinking | हमारा चिंतन कैसा हो | Dr Chinmay Pandya



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👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 31)

आध्यात्मिक चिकित्सक कौन हो सकता है? इन पंक्तियों को पढ़ने वालों की उर्वर मनोभूमि में अब तक यह प्रश्रबीज अंकुरित हो चुका होगा। किसे समझें आध्यात्मिक चिकित्सक? अथवा किस तरह से बनें आध्यात्मिक चिकित्सक? ऐसे सवालों का किसी चिन्तनशील मन में उपजना स्वाभाविक है। बात सही भी है- आध्यात्मिक चिकित्सा के सैद्धान्तिक पहलू कितने ही सम्मोहक क्यों न हो, परन्तु उसके प्रायोगिक प्रभाव किसी आध्यात्मिक चिकित्सक के माध्यम से ही पाए जा सकते हैं। एक वही है जो मानवीय जीवन के सभी दोषों, विकारों को दूर कर सम्पूर्ण स्वास्थ्य का वरदान दे सकता है। इसके अभाव में न तो आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव हो पाएगी और न ही व्यक्तित्व के अभाव व अवरोध दूर हो सकेंगे।

निःसन्देह आध्यात्मिक चिकित्सक होने का दायित्व बड़ा है। आध्यात्मिक चिकित्सा के सिद्धान्तों एवं प्रयोगों को जानना, सामान्य चिकित्सा शास्त्र से कहीं अधिक दुष्कर है। आयुर्वेद या होमियोपैथी अथवा एलोपैथी या फिर साइकोथेरेपी के सिद्धान्त एवं प्रयोग अपने व्यक्तित्व को संवारे- सुधारे बिना भी समझे जा सकते हैं। पर आध्यात्मिक चिकित्सा के सिद्धान्त एवं प्रयोग विधियाँ स्वयं अपने व्यक्तित्व की पाठशाला एवं प्रयोगशाला में सीखनी पड़ती है। इसके लिए किन्हीं ग्रन्थों का अवलोकन या अध्ययन पर्याप्त नहीं होता। यहाँ व्यक्ति की व्यावहारिक या बौद्धिक योग्यता से काम नहीं चलता। जो केवल शब्द जाल के महाअरण्य में भटकते रहते हैं, वे इस क्षेत्र में असफल व अयोग्य ही सिद्ध होते हैं।

हालांकि इन दिनों काफी कुछ उलटबांसी देखने को मिल रही है। ‘बरसै कम्बल भीगे पानी’ जैसे नजारे सब तरफ दिखाई देते हैं। इस उलटी रीति के बारे में गोस्वामी जी महाराज कहते हैं-
मारग सोई जा कहुं जोइं भावा।
पण्डित सोई जो गाल बजावा॥
मिथ्यारम्भ दम्भ रत जोई।
ता कहुं संत कहइ सब कोई॥
जिसको जो अच्छा लग जाय, उसके लिए वही आध्यात्मिक पथ है। जो डींग मारता है, वही पण्डित है। जो मिथ्या आडम्बर रचता है, और दम्भ में रत है, उसी को सब कोई सन्त कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 46

बुधवार, 17 जुलाई 2019

👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 4)

मस्तिष्क की यहाँ निरर्थकता नहीं बताई जा रही है और न तर्क, प्रभाव अध्ययन का, विचार साधन का महत्त्व कम किया जा रहा है। उसकी उपयोगिता तो है ही और रहेगी ही। बात इतनी भर है कि मस्तिष्क भौतिक जीवन में अत्यन्त पेचीदा समस्याओं को सुलझाने और महत्त्वपूर्ण फैसले करने और पेचीदगियों को सरल बनाने में अद्भुत सूझ- बूझ का परिचय दे सकने में समर्थ होते हुए भी अन्तःकरण में जमे हुए संचित संस्कारों को प्रभावित करने में यत्किंचित् ही सहायक हो पाता है। कारण कि वह गहरी परत मस्तिष्क के प्रभाव क्षेत्र में पूरी तरह है नहीं। वरन् उलटे मस्तिष्क को ही अपने इच्छानुकूल चलने के लिए विवश करता है।

अंतःकरण ही मानवी सत्ता का केन्द्र बिन्दु है। वह जितना महत्वपूर्ण हैं उतना ही अद्भुत इस अर्थ में कि उसमें तनिक सा अन्तर आते ही मनुष्य का सारा स्वरूप बदल जाता है। अद्भुत इस अर्थ में कि भावनाओं, संवेदनाओं की दृष्टि से अति सरल होते हुए भी अपनी स्थिति के संबन्ध में इतना दुराग्रही है कि बदलने में अत्यन्त कठोरता का परिचय देता है। परिवर्तन के लिए किये जाने वाले साधारण प्रयत्नों को तो ऐसे ही उपहास में उड़ा देता है। ईश्वर से मिलने की, सूक्ष्म जगत से सम्पर्क साधने की क्षमताएँ इसी मर्म स्थल में सन्निहित हैं। ऋद्धियों और सिद्धियों की समस्त रत्न राशियाँ इसी तिजोरी में भरी हुई हैं। इतने पर भी इसका खोल सकना अत्यन्त कठिन है। जानकार लोग भी अपने आपको असहाय पाते हैं। आत्मबोध की आवश्यकता समझने- समझाने वाले- उसके द्वारा मिलने वाले चमत्कारों का स्वरूप समझने वाले भी इतना सङ्कल्प नहीं जुटा पाते कि आत्म जागृति का लाभ उठा सके और साक्षात्कार कर सके। अपनी जानकारी से स्वयं लाभान्वित न हुआ जा सके, तो समझना चाहिए कि कोई बहुत बड़ा कारण या अवरोध काम करता है।

अन्तःकरण की स्थिति में थोड़ा सा परिवर्तन होते ही जीवन के स्वरूप में असाधारण परिवर्तन प्रस्तुत होता है। वाल्मीकि, अजामिल अम्बपाली, अंगुलिमाल, बिल्वमंगल आदि अनेकों के दुष्ट जीवनों ने पलटा खाया और देखते- देखते कायाकल्प कर लिया। बोधि वृक्ष के नीचे एक दिन गौतम राजकुमार के अन्तःकरण ने पलटा खाया और वे दूसरे दिन ही भगवान बुद्ध बन गये। समर्थ गुरु रामदास का विवाह मुहूर्त निकट था, उनके भीतर दुस्साहस पूर्वक दूसरे प्रकार का निश्चय कर बैठा। देखते- देखते सारी दिशाधारा ही उलट गई। गृहस्थों जैसा सामान्य जीवन क्रम दूसरे ही दिन महामानवों की, ऋषियों की पंक्ति में जा विराजा। ऐसे चमत्कार अन्तःकरण के परिवर्तन से ही होते रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इन ग्रन्थों में मंत्रों में छिपे पड़े हैं अति गोपनीय प्रयोग (भाग 30)

जहाँ तक दुर्गासप्तशती की बात है, तो इस रहस्यमय ग्रन्थ में वेदों में वर्णित सभी तांत्रिक प्रक्रियाएँ कूटभाषा में वर्णित हैं। इसके अलग- अलग पाठक्रम अपने अलग- अलग प्रभावों को प्रकट करते हैं। यूं तो इसके पाठक्रम अनेक हैं। पर प्रायः इसके ग्यारह पाठक्रमों की चर्चा मिलती है। ये ग्यारह पाठक्रम कुछ इस प्रकार हैं- १. महाविद्या क्रम, २. महातंत्री क्रम, ३. चण्डी क्रम, ४. महाचण्डी क्रम, ५. सप्तशती क्रम, ६. मृत संजीवनी क्रम, ७. रूपदीपिका क्रम, ८. निकुंभला क्रम, ९. योगिनी क्रम, १०. संहार क्रम, ११. अक्षरशः विलोम क्रम। पाठक्रम की ये सभी विधियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। और प्रयोग के पूर्ण होते ही अपने प्रभाव को प्रकट किए बिना नहीं रहतीं।

इन पाठ क्रमों के अतिरिक्त श्री दुर्गासप्तशती के सहस्रों प्रयोग हैं। इनमें से कुछ साधारण हैं तो कुछ अतिविशिष्ट। इन सब की चर्चा यहाँ सम्भव नहीं जान पड़ रही। क्योंकि यह विषय अति गोपनीय एवं गम्भीर है, जिसे गुरुमुख से सुनना- जानना व करना ही श्रेयस्कर है। संक्षेप में हम यहाँ इतना ही कहेंगे कि पृथ्वी पर ही नहीं समस्त सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे दुर्गासप्तशती के समर्थ प्रयोगों से हासिल न किया जा सके। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले इसे रंचमात्र भी अतिशयोक्ति न समझें। लगातार जो अनुभव किया गया है, वही कहा गया है। वैसे यदि बात अपने स्वयं के व्यक्तित्व की चिकित्सा की हो तो दुर्गासप्तशती के साथ गायत्री महामंत्र के प्रयोग को श्रेष्ठतम पाया गया है।

वृन्दावन के उड़िया बाबा की दुर्गासप्तशती पर भारी श्रद्धा थी। अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए जब उन्होंने घर छोड़ा, तो कोई सम्बल न था। कहाँ जाएँ, किधर जाएँ, कुछ भी सुझायी न देता था। ऐसे में उन्हें जगन्माता का स्मरण हो आया। मां के सिवा अपने बच्चे की और कौन देखभाल कर सकता है। बस मां का स्मरण करते हुए वे शतचण्डी के अनुष्ठान में जुट गए। दुर्गासप्तशती के इस अनुष्ठान ने उनके व्यक्तित्व को आध्यात्मिक ऐश्वर्य से भर दिया। अपने इस अनुष्ठान के बारे में वे भक्तों से बताया करते थे। गायत्री महामंत्र के साथ दुर्गासप्तशती के पाठ के संयोग से अपने जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा की जा सकती है। इतना ही नहीं स्वयं भी आध्यात्मिक चिकित्सक होने का गौरव पाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 44

👉 Amrit Chintan 17 July 2019

★ "To live content with small means, to seek elegance rather than luxury, and refinement rather than fashion, to be worthy, not respectable, and wealthy, not rich, to study hard, think quietly, talk gently, act frankly, to listen to stars and birds, to babes and sages, with open heart, to bear all cheerfully, do all bravely, await occasions, hurry never, in a word to let the spiritual, unbidden and unconscious, grow up through the common, this is to be my symphony."

William Henry Channing

◇ A lady once offered me a mat; but as I had no room to spare within the house, nor time to spare within or without to shake it, I declined it, preferring to wipe my feet on the sod before my door. It is best to avoid the beginnings of evil.

Henry David Thoreau

■ "He has achieved success who has lived well, laughed often, and loved much; Who has enjoyed the trust of pure women, the respect of intelligent men and the love of little children; Who has filled his niche and accomplished his task; Who has never lacked appreciation of Earth's beauty or failed to express it; Who has left the world better than he found it, Whether an improved poppy, a perfect poem, or a rescued soul; Who has always looked for the best in others and given them the best he had; Whose life was an inspiration; Whose memory a benediction."

Bessie Anderson Stanley

Om Chanting and Meditation 108 Times Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya



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The Combination of Contemplation and Character | चिंतन और चरित्र का समन्...



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सोमवार, 15 जुलाई 2019

👉 कृपया समय पर दें

एक भिखारी एक दिन सुबह अपने घर के बाहर निकला। त्यौहार का दिन है। आज गांव में बहुत भिक्षा मिलने की संभावना है। वह अपनी झोली में थोड़े से दाने डालकर चावल के, बाहर आया। चावल के दाने उसने डाल दिये हैं अपनी झोली में। क्योंकि झोली अगर भरी दिखाई पड़े तो देने वाले को आसानी होती है। उसे लगता है किसी और ने भी दिया है। सब भिखारी अपने हाथ में पैसे लेकर अपने घर से निकलते हैं, ताकि देने वाले को संकोच मालूम पड़े कि नहीं दिया तो अपमानित हो जाऊंगा और लोग दे चुके हैं।

आपकी दया आपकी दया काम नहीं करती भिखारी को देने में। आपका अहंकार काम करता है.और लोग दे चुके हैं, और मैं कैसे न दूं। वह डालकर निकला है थोडे से दाने। थोड़े से दाने उसने डाल रखे हैं चावल के। बाहर निकला है।

सुरज निकलने के करीब है। रास्ता सोया है। अभी लोग जाग रहे हैं। देखा है उसने,राजा का रथ आ रहा है। स्वर्ण रथ—सूरज की रोशनी में चमकता हुआ। उसने कहा, धन्य भाग्य मेरे! भगवान को धन्यवाद। आज तक कभी राजा से भिक्षा नहीं मांग पाया, क्योंकि द्वारपाल बाहर से ही लौटा देते। आज तो रास्ता रोककर खड़ा हो जाऊंगा! आज तो झोली फैला दूंगा। और कहूंगा, महाराज!

पहली दफा भिक्षा मांगता हूं। फिर सम्राट तो भिक्षा देंगे। तो कोई ऐसी भिक्षा तो न होगी। जन्म—जन्म के लिए मेरे दुख दूर हो जायेंगे। वह कल्पनाओं में खोकर खड़ा हो गया।
रथ आ गया। वह भिखारी अपनी झोली खोले, इससे पहले ही राजा नीचे उतर आया। राजा को देखकर भिखारी तो घबड़ा गयाऔर राजा ने अपनी झोली अपना वस्त्र भिखारी के सामने कर दिया।तब तो वह बहुत घबड़ा गया।

उसने कहा आप! और झोली फैलाते हैं? राजा ने कहा, ज्योतिषियों ने कहा है कि देश पर हमले का डर है। और अगर मैं जाकर आज राह पर भीख मांग लूं तो देश बच सकता है। वह पहला आदमी जो मुझे मिले, उसी से भीख मांगनी है। तुम्हीं पहले आदमी हो। कृपा करो। कुछ दान दो। राष्ट्र बच जाये।

उस भिखारी के तो प्राण निकल गए। उसने हमेशा मांगा था। दिया तो कभी भी नहीं था। देने की उसे कहीं कल्पना ही नहीं थी। कैसे दिया जाता है, इसका कोई अनुभव नहीं था। मांगता था। बस मांगता था। और देने की बात आ गई, तो उसके प्राण तो रुक ही गये! मिलने का तो सपना गिर ही गया। और देने की उलटी बात! उसने झोली में हाथ डाला। मुट्ठी भर दाने हैं वहां। भरता है मुट्ठी, छोड़ देता है। हिम्मत नहीं होती कि दे दें।

राजा ने कहा, कुछ तो दे दो। देश का खयाल करो। ऐसा मत करना कि मना कर दो। बहुत मुश्किल से बहुत कठिनाई से एक दाना भर उसने निकाला और राजा के वस्त्र में डाल दिया! राजा रथ पर बैठा। रथ चला गया। धूल उड़ती रह गई। और साथ में दुख रह गया कि एक दाना अपने हाथ से आज देना पडा। भिखारी का मन देने का नहीं होता।
दिन भर भीख मांगी। बहुत भीख मिली। लेकिन चित्त में दुख बना रहा एक दाने का, जो दिया था।

कितना ही मिल जाये आदमी को, जो मिल जाता है, उसका धन्यवाद नहीं होता;
जो नहीं मिल पाया, जो छूट गया, जो नहीं है पास, उसकी पीड़ा होती है।

लौटा सांझ दुखी, इतना कभी नहीं मिला था! झोला लाकर पटका। पत्नी नाचने लगी। कहा, इतनी मिल गयी भीख! नाच मत पागल! तुझे पता नहीं, एक दाना कम है, जो अपने पास हो सकता था। फिर झोली खोली। सारे दाने गिर पड़े। फिर वह भिखारी छाती पीटकर रोने लगा, अब तक तो सिर्फ उदास था। रोने लगा। देखता कि दानों की उस कतार में, उस भीड़ में एक दाना सोने का हो गया!

तो वह चिल्ला—चिल्लाकर रोने लगा कि मैं अवसर चूक गया। बड़ी भूल हो गयी। मैं सब दाने दे देता, सब सोने के हो जाते। लेकिन कहां खोजूं उस राजा को? कहां जाऊं? कहा वह रथ मिलेगा? कहां राजा द्वार पर हाथ फैलायेगा? बडी मुश्किल हो गयी। क्या होगा? अब क्या होगा? वह तड़पने लगा।उसकी पत्नी ने कहा, तुझे पता नहीं, शायद जो हम देते हैं, वह स्वर्ण का हो जाता है। जो हम कब्जा कर लेते हैं, वह सदा मिट्टी का हो जाता है।

जो जानते हैं, वे गवाही देंगे इस बात की; जो दिया है, वही स्वर्ण का हो गया।
मृत्यु के क्षण में आदमी को पता चलता है, जो रोक लिया था, वह पत्थर की तरह छाती पर बैठ गया है।
जो दिया था, जो बांट दिया था, वह हलका कर गया। वह पंख बन गया। वह स्वर्ण हो गया।
वह दूर की यात्रा पर मार्ग बन गया।

👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2019


👉 इन ग्रन्थों में मंत्रों में छिपे पड़े हैं अति गोपनीय प्रयोग (भाग 29)

आध्यात्मिक चिकित्सा की जितनी सूक्ष्मता व व्यापकता, सैद्धान्तिक सच्चाई एवं प्रायोगिक गहराई वेदों में है, उतनी और कहीं नहीं। यह सुदीर्घ अनुभव का सच है। जिसे समय- समय पर अनेकों ने खरा पाया है। वेद मंत्रों में आध्यात्मिक चिकित्सा के सिद्धान्तों का महाविस्तार बड़ी पारदर्शिता से किया गया है। इसमें मानव जीवन के सभी गोपनीय, गहन व गुह्य आयामों का पारदर्शी उद्घाटन है। साथ में बड़ा ही सूक्ष्म विवेचन है। यहाँ आध्यात्मिक चिकित्सा का सैद्धान्तिक पथ जितना उन्नत है, उसका प्रायोगिक पक्ष उतना ही समर्थ है। ऋग्, यजुष एवं सामवेद के मंत्रों के साथ अथर्ववेद के प्रयोग तो अद्भुत एवं अपूर्व हैं। इनके लघुतम अंश से अपने जीवन में महानतम चमत्कार किए जा सकते हैं। यह विषय इतना विस्तृत है कि इसके विवेचन के लिए इस लघु लेख का अल्प कलेवर पर्याप्त नहीं है। जिज्ञासु पाठकों का यदि आग्रह रहा तो बाद में इसके विशिष्ट प्रायोगिक सूक्तों में वर्णित चिकित्सा विधि को बताया जाएगा।

अभी तो यहाँ इतना ही कहना है कि वेद में मुख्य रूप से आध्यात्मिक चिकित्सा की दो ही धाराएँ बही हैं। इनमें से पहली है यौगिक और दूसरी है तांत्रिक। ये दोनों ही धाराएँ बड़ी समर्थ, सबल एवं सफल हैं। इनके प्रभाव बड़े आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक हैं। बाद के दिनों में महर्षियों ने इन दोनों विधियों के सिद्धान्त एवं प्रयोग को श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्री दुर्गासप्तशती में समाहित किया है। हमारे जिज्ञासु पाठकों को हो सकता है थोड़ा अचरज हो, परन्तु यह सच है कि इन दोनों ग्रन्थों में से प्रत्येक में मूल रूप से ७०० मंत्र हैं। इस सम्बन्ध में आध्यात्मिक चिकित्सकों के प्रायोगिक अनुभव कहते हैं कि इन दोनों पवित्र ग्रन्थों में कथा भाग से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इनके मंत्र प्रयोग हैं। जिन्हें यदि कोई सविधि सम्पन्न कर सके तो जिन्दगी की हवाएँ और फिजाएँ बदली जा सकती हैं।

इस सम्बन्ध में एक घटना उल्लेखनीय है। यह घटना महर्षि अरविन्द के जीवन की है। उन दिनों वे अलीपुर जेल की काल कोठरी में कैद थे। पुस्तकों के नाम पर उनके पास वेद की पोथियाँ, श्रीमद्भगवद्गीता एवं दुर्गासप्तशती ही थी। इन्हीं का चिन्तन- मनन इन दिनों उनके जीवन का सार सर्वस्व था। वह लिखते हैं कि साधना करते- करते ये महामंत्र स्वयं ही उनके सामने प्रकट होने लगे। यही नहीं इन ग्रन्थों में वर्णित महामंत्रों ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें अनेकों तरह की योग विधियों से परिचित कराया। यह त्रिकाल सत्य है कि श्रीमद्भगवद्गीता के प्रयोग साधक को योग के गोपनीय रहस्यों की अनुभूति देते हैं। वह अपने आप ही आध्यात्मिक चिकित्सा के यौगिक पक्ष में निष्णात हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 43

👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 3)

यही बात प्रशंसनीय कार्य करने के सम्बन्ध में भी है। सत्कर्म करने वाला अपने वंश, परिवार, क्षेत्र, देश, युग सभी को प्रतिष्ठित करता है। यह सामूहिकता का उत्तरदायित्व जिन दिनों ठीक तरह निबाहा जाता है उन दिनों प्रकृति के अनुग्रह की वर्षा सभी पर होती हैं। और जिन दिनों संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला होता है तो दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती है, वातावरण बिगड़ता है और दण्ड उनको भी भुगतना पड़ता है, जो प्रत्यक्षतः तो निर्दोष दिखाई पड़ते हैं, पर समूचे मानव समाज की दुष्प्रवृत्तियों को रोकने और सत्प्रवृत्तियों में संलग्न होने के प्रयास की जिम्मेदारी न निभाने से अनायास ही अपराधी वर्ग में सम्मिलित हो जाते है।

युग परिवर्तन के लिए व्यक्ति और समाज में उत्कृष्टता के तत्वों का अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रबल प्रयत्नों का किया जाना आवश्यक है। व्यक्ति को चरित्रनिष्ठ ही नहीं समाजनिष्ठ भी होना चाहिए। मात्र अपने आपको अच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं। अपनापन भी विस्तृत होना चाहिए।

आस्थाओं की पृष्ठभूमि वस्तुतः एक अलग धरातल है। उसका निर्माण मस्तिष्कीय संरचना की तुलना में कहीं अधिक जटिल और कहीं अधिक कठोर है। अंतःकरण की अपनी स्वतन्त्र रचना है। उस पर बुद्धि का थोड़ा बहुत ही प्रभाव पड़ता है। सच तो यह है कि अंतःकरण ही बुद्धि की कठपुतली को अपने इशारे से नचाता है। आन्तरिक आस्थाओं और आकांक्षाओं की जो अभिरुचि होती है उसी को पूरा करने के लिए चतुर राजदरबारी की भूमिका मस्तिष्क को निभानी पड़ती है। उसका अपना अभिमत जो भी हो, उसे करना वही पड़ता है जो अधिपति का निर्देश है। हो सकता है कि मस्तिष्क वस्तुतः भौतिकता का पक्षधर हो, किन्तु व्यवहार में लाते समय वह तब तक समर्थ न हो सकेगा जब तक अन्तःकरण भी अनुकूल न हो जाये। किसी भी नशेबाज से वार्तालाप किया जाय तो वह समझाने वाले से भी अधिक ऐसे तथ्य प्रस्तुत कर देगा जिससे नशा पीने की हानियों का प्रतिपादन होता है। इतनी जानकारी होते हुए भी वह उस लत को छोड़ने के लिए तत्पर न हो सकेगा। उसका कारण एक ही है कि नशे के पक्ष में उसके अन्तःकरण में इतनी गहरी अभिरुचि जम गयी है, जिसे विचारशीलता मात्र के सहारे पलट सकना सम्भव नहीं हो पाता। शराबी आये दिन अपने को धिक्कारता है, शपथे लेता है किन्तु जब अन्दर से लत भड़कती है तो असहाय की तरह शराब खाने की ओर इस प्रकार घिसटता चला जाता है मानों कोई बल पूर्वक उसे अपनी पीठ पर लाद कर लिये जा रहा हो। रास्ते में संकल्प विकल्प भी उठते है। लौटने को मन भी करता है। पर सारे तर्क एक कोने पर रखे रह जाते हैं। आदत अपनी जगह स्थिर रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 13 जुलाई 2019

Do Not Stary | भटकना मत | Hariye Na Himmat Day 20



Title

👉 परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।

एक सन्त के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया और उसे पिंजरे में रख लिया। सन्त ने कई बार शिष्य से कहा कि “इसे यों कैद न करो। परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।”

किन्तु शिष्य अपने बालसुलभ कौतूहल को न रोक सका और उसे अर्थात् पिंजरे में बन्द किये रहा।

तब सन्त ने सोचा कि “तोता को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए”

उन्होंने पिंजरा अपनी कुटी में मँगवा लिया और तोते को नित्य ही सिखाने लगे- ‘पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।’

कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भाँति रट गया। तब एक दिन सफाई करते समय भूल से पिंजरा खुला रह गया। सन्त कुटी में आये तो देखा कि तोता बाहर निकल आया है और बड़े आराम से घूम रहा है साथ ही ऊँचे स्वर में कह भी रहा है- “पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।”

सन्त को आता देख वह पुनः पिंजरे के अन्दर चला गया और अपना पाठ बड़े जोर-जोर से दुहराने लगा। सन्त को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ। साथ ही दुःख भी।

वे सोचते रहे “इसने केवल शब्द को ही याद किया! यदि यह इसका अर्थ भी जानता होता- तो यह इस समय इस पिंजरे से स्वतंत्र हो गया होता!

दोस्तों ठीक इसी तरह - हम सब भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते तो हैं किन्तु उनका मर्म नहीं समझ पाते और उचित समय तथा अवसर प्राप्त होने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 13 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 2)

प्रकृति प्रकोप के रूप में सामूहिक दण्ड व्यवस्था ही चलती है। अति वृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, तूफान, महामारी, भूमि कीटक आदि के रूप में कई प्रकार की विकृतियाँ आये दिन दरवाजे पर लगी रहने की घटनाएँ पाप युग में होती हैं। सतयुग के सम्बन्ध में विवरण मिलता है कि तब मनुष्य दीर्घजीवी होते थे। बाप के सामने बेटा नहीं मरता था। वृक्ष मनचाहे फल देते थे। भूमि से प्रचुर अन्न उपजता था। गौएँ बहुत दूध देती थी। वर्षा उपयुक्त समय पर उपयुक्त मात्रा में होती थी। प्रकृति प्रकोप कभी नहीं होता था। यह प्रकृति की अनुकूलता मनुष्य की सत्प्रवृत्तियों के साथ जुड़ी हुई है। इकॉलाजी विज्ञान के अनुसार प्रकृति की विचारशीलता, सन्तुलन व्यवस्था, दूरदर्शिता एवं न्याय प्रियता का अब क्रमशः अधिकाधिक परिचय मिलता जा रहा है। सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का सामूहिक दण्ड भी उसी व्यवस्था के अन्तर्गत आता है।

व्यक्ति के कर्म का दण्ड व्यक्ति को मिलना चाहिए। यह व्यवस्था तो चलती ही है, पर सामूहिक उत्तरदायित्वों से बँधा रहने के कारण मनुष्य को सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों की रोक थाम करने का भी जिम्मेदार माना है। उसकी उपेक्षा की जाय तो वह भी एक पाप बनता है। स्वयं अच्छा रहना तो उचित ही है, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि जिस समाज में रहा जा रहा है उसे परिष्कृत बनाये रहने की जिम्मेदारी निबाहने में भी उतनी ही तत्परता बरती जाय। अपने आप के हित साधन में लगे रहने वाले, दूसरों की उपेक्षा करने वाले स्वार्थी कहलाते है और निन्दा के पात्र बनते हैं। यद्यपि स्वार्थ साधन कोई प्रत्यक्ष अपराध नहीं है और न उससे किसी मर्यादा का प्रत्यक्षतः उल्लंघन ही होता है। फिर भी व्यक्तिवादी स्वार्थ परायण व्यक्ति निन्दित ठहराये जाते हैं, उसका एक ही कारण है कि मनुष्य के लिए सामाजिक सुव्यवस्था के प्रति उतना ही जागरूक रहना आवश्यक माना गया है जितना कि अपने निर्वाह और सुरक्षा का प्रबन्ध करना।

सरकार कई अपराधों के लिए सामूहिक जुर्माना करती है। समीपवर्तिय क्षेत्र में अपराध होता रहे इसका हमसे सीधा सम्बन्ध नहीं, यह सोचकर उसे रोका न जाय तो इस उपेक्षा को भी मानवी कर्तव्य शास्त्र में दण्डनीय अपराध माना गया है। सामूहिक जुर्माना ऐसे ही अपराधों में किये जाने की दण्ड व्यवस्था है। पड़ौस के गाँव में डकैती पड़ती रहे और जिसके पास बन्दूक का लाइसेन्स है वह डाकुओं का सामना करने न गया, तो उस कायरता को अपराध माना जायेगा और उसकी बन्दूक जब्त कर ली जायेगी। सामूहिक प्रकृति प्रकोप भी ऐसे ही सामूहिक दण्ड विधान के रूप में समूचे मनुष्य जाति पर बरसते है। आवश्यक नहीं कि जिन्हें कष्ट भुगतना पड़ा है मात्र उन्हीं का अपराध हो। मुहल्ले में गन्दगी के ढ़ेर जमा हो तो जमा करने वाले भी और उसे न रोकने वाले भी उस सड़न से हानि उठावेंगे। पड़ोस का छप्पर जलता रहे और अपने घर शान्ति पूर्वक बैठे रहा जाय तो बढ़ती हुई आग अपने को भी लपेटने लगेगी। मुहल्ले में गुन्डा गर्दी बढ़ती रहे तो अनेक सौम्य प्रकृति के बालक भी उस कुचक्र के शिकार किसी न किसी प्रकार बनकर ही रहेंगे। एक व्यक्ति दुष्कर्म करता है बदनामी सारे परिवार या गाँव की होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इन ग्रन्थों में मंत्रों में छिपे पड़े हैं अति गोपनीय प्रयोग (भाग 28)

आध्यात्मिक चिकित्सा के ग्रन्थ अनगिनत हैं। इनका विस्तार असीम है। प्रत्येक धर्म ने, पंथ ने आध्यात्मिक साधनाओं की खोज की है। अपने देश- काल के अनुरूप ये सभी महत्त्वपूर्ण हैं। इनका मकसद भी एक है- सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन एवं समग्र रूप से विकसित व्यक्तित्व। इसी उद्देश्य को लेकर सभी ने गहरे आध्यात्मिक प्रयोग किए हैं- और अपने निष्कर्षों को सूत्रबद्ध, लिपिबद्ध किया है। इन प्रयोगों की शृंखला में कई बार तो ऐसा हुआ कि विशेषज्ञों की भावचेतना अपने शिखर पर पहुँच गयी और वहाँ स्वयं ही सूत्र अवतरित होने लगे। परावाणी में दैवी सन्देश प्रकट हुए। इस्लाम का पवित्र ग्रन्थ कुरआन ऐसे ही दैवी संदेशों का दिव्य संकलन है। बाइबिल की पवित्र कथाएँ भी ऐसी ही भावगंगा में प्रवाहित हुई हैं। प्राचीन पारसी जनों के जेन्द अवेस्ता से लेकर अर्वाचीन सिख गुरुओं के ग्रन्थ साहिब तक सभी ग्रन्थ देश- काल के अनुरूप अपना अहत्व दर्शाते रहे हैं। इनमें से किसी आध्यात्मिक ग्रन्थ को कमतर नहीं कहा जा सकता।

परन्तु जब बात प्राचीनता के साथ परिपूर्णता की हो, इस वैज्ञानिक युग में उसकी सामयिकता और सार्वभौमिकता की हो, तो वेद ही परम सत्य के रूप में सामने नजर आते हैं। वेद सब भाँति अद्भुत एवं अपूर्व हैं। ये समस्त सृष्टि में संव्याप्त आध्यात्मिक दृष्टि, आध्यात्मिक शक्ति एवं आध्यात्मिक प्रयोगों का पवित्र उद्गम हैं। यदि इस कथन को अतिशयोक्ति न माना जाय तो यहाँ यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि समस्त विश्व वसुधा में आध्यात्मिक भाव गंगा कहीं बही है, उसका पवित्र उद्गम वेदों का गोमुख ही है। विश्व के प्रत्येक धर्म, पंथ और मत में जो कुछ भी कहा गया है उसके सार निष्कर्ष को वेद मंत्रों में खोजा और पढ़ा जा सकता है। यदि भविष्य कथन और भविष्य दृष्टि पर किसी का विश्वास जमे तो वे जान सकते हैं कि भावी विश्व की आध्यात्मिकता वेदज्ञान पर ही टिकी होगी।

ऐसा कहने में किसी तरह का पूर्वाग्रह नहीं है। बल्कि गम्भीर व कठिन आध्यात्मिक प्रयोगों के निष्कर्ष के रूप में यह सत्य बताया जा रहा है। हां यह सच है कि वेदमंत्रों को ठीक- ठीक समझना कठिन है। क्योंकि ये बड़ी कूटभाषा में कहे गये हैं। जो लोग अपने को संस्कृत भाषा का महाज्ञानी बताकर इनके शब्दार्थों में सत्य को टटोलने की कोशिश करते हैं, उन्हें केवल भ्रमित होना पड़ता है। वे सदा खाली हाथ रहते हैं और अपने को महा- अज्ञानी सिद्ध करते हैं। वेदमंत्रों के अर्थ शब्दों के उथलेपन में नहीं साधना की गहराई में समाए हैं। सच तो यह है कि प्रत्येक वेदमंत्र की अपनी विशिष्ट साधना विधि है। एक सुनिश्चित अनुशासन है और उसके सार्थक सत्परिणाम भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 42

👉 Profit From Dishonesty - Merely An Illusion

Those who accept dishonesty as dignified, and adopt it to be their ideal, are failing to analyze the situation in a thorough enough manner. They are disillusioned. The truth is that money simply cannot be earned by dishonest means. Even when we do acquire some wealth temporarily, the wealth can not stay permanent and really be ours. True living can only be earned through courage, wisdom, discipline, dexterity, and skillfulness.

Dishonest earnings through inappropriate means lead to results that are not only unstable but that are also eventually painful. There might be temporary escape from direct punishment, but eventually, in the long term, dishonesty invariably leads to public anger, outrage, hate, isolation, and sadness. In practice, deceit and corruption must be sugar coated with a fake layer of honesty for it to work. Conning does require establishing trust and confidence. If any suspicion arises, the person being conned is likely to jump out of the trap. Once proven guilty, the con man loses credibility forever and ends up bearing more eventual losses than profits.

There could be scores of everyday examples where the people who are caught bribing, cheating, evading tax, doing back marketing, and illegally hoarding not only get severely punished by the law but they also loose their social status and prestige. Once their deeds become public, everyone starts hating them.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 14

👉 विचार शक्ति के चमत्कार:-

विचार अपने आप में एक चिकित्सा है। शुभ कामना, सत्परामर्श रूपी विचारों का बीजारोपण यही प्रयोजन सिद्ध करते हैं।  विचार संप्रेषण, विचारों से वातावरण का निर्माण, विचार विभीषिका इसी सूक्ष्म विचार शक्ति के स्थूल परिणाम हैं। महर्षि अरविन्द व रमण ने मौन साधना की व अपनी विचार शक्ति को सूक्ष्म स्तर पर क्रियान्वित किया जिसका परिणाम था कि वातावरण में संव्याप्त विक्षोभ मिटाया जा सका तथा स्वतंत्रता आन्दोलन की लहर फैली। सारी क्रांतियाँ विचारों के स्तर से ही आरम्भ हुई हैं। साम्यवाद-प्रजातन्त्र विचार संयमजन्य सामर्थ्य की देन है। विचारों की आँधी जब आती है तो प्रचण्ड तूफान की तरह सबको अपनी लपेट में ले लेती है। बुद्ध और गांधी के समय भी इसी प्रकार आँधी आयी जिसने सूक्ष्म स्तर पर जन-जन को प्रभावित किया व परिवर्तन ला दिया।

अस्त-व्यस्त विचार-शक्ति व्यक्ति को जल्दबाज बनाते हैं व ऐसे व्यक्ति दूरगामी निर्णय न लेकर ऐसे कदम उठा सकते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से विक्षिप्तता ही कहा जा सकता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 27)

ऐसी ही एक घटना यहाँ शब्दों में पिरोयी जा रही है। वर्षों पूर्व घटी इस घटना में एक बच्चे के माता- पिता, परम पूज्य गुरुदेव के पास आए। उनके साथ उनका बच्चा भी था। जो कुछ समय से ज्वर से ग्रसित था। यह ज्वर था कि किसी चिकित्सक की औषधि से ठीक ही नहीं हो रहा था। हां, इसके दुष्प्रभाव हाथ, पांव सहित समूचे शरीर पर पड़ने शुरू हो गए थे। एक तरीके से उसका शरीर लुंज- पुंज हो गया था। बच्चे की दिमागी हालत भी बिगड़ने लगी थी। समूचा स्नायु संस्थान निष्क्रिय पड़ता जा रहा था। माता- पिता ने अपने बच्चे की सारी व्यथा गुरुदेव को कह सुनायी। उन्होंने सारी बातें ध्यान से सुनी और मौन हो गए।

बच्चे के माता- पिता बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी ओर देख रहे थे। पर यहाँ गुरुदेव की आँखें छलक उठी थीं। वह उस बच्चे की पीड़ा से, माता- पिता के सन्ताप से विह्वल हो गए थे। थोड़ी देर बाद वह भाव भरे मन से उन लोगों से बोले, बेटा- तुम लोगों ने हमारे पास आने में देर कर दी। इसके प्रारब्ध का दुर्योग अब एकदम पक गया है। ऐसी स्थिति में कुछ भी करना सम्भव नहीं। वैसे भी यह बच्चा है, यदि हम इस पर अपनी विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करेंगे तो इसका शरीर सह नहीं पाएगा। बहुत सम्भव है कि यह मर ही जाए।

गुरुदेव की इन बातों ने माता- पिता को निस्पन्द कर दिया। वे निराशा से विगलित हो गए। उन्हें इस तरह पीड़ित देखकर गुरुदेव बोले, तुम लोग मेरे पास आए हो, तो इस असम्भव स्थिति में थोड़ा- बहुत तो मैं करूँगा ही। इसमें पहली चीज तो यह कि बच्चे का दिमाग एकदम ठीक हो जाएगा। अपाहिज स्थिति में भी यह प्रतिभावान होगा। अभी जो यह लगभग गूँगा हो गया है, आपसे बातचीत कर सकेगा। शारीरिक अपंगता की यह स्थिति होने के बावजूद इसमें कई तरह के कौशल विकसित होंगे। बस बेटा! इस स्थिति में इसके लिए इससे ज्यादा कुछ भी सम्भव नहीं। गुरुदेव के इन शब्दों ने बच्चे के माता- पिता को जैसे वरदान दे दिया। थोड़े ही महीने के बाद पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव उस बच्चे के जीवन में प्रकट हुए। अपाहिज होते हुए भी वह प्रतिभावान कलाकार बना। उसके प्रारब्ध का अटल दुर्योग टला तो नहीं पर पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा ने उसे रूपान्तरित तो कर ही दिया। इस आश्चर्यजनक प्रक्रिया के संकेत आज भी महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रन्थों में देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 40

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टाँगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इस लिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-
“शर वत् तन्मयो भवेत्”
बाण की तरह तन्मय होना चाहिए।

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950

👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 1)

व्यक्तियों की गतिविधियाँ जब श्रेष्ठता से समन्वित रहती है तो उनके श्रम, समय, मनोयोग एवं साधनों का उपयोग सत्प्रयोजनों में होता है, फलतः सुखद परिस्थितियाँ बढ़ती जाती हैं, निरर्थक कार्यों में लगने से पिछड़ेपन की और अनर्थ कार्यों से अधःपतन की परिस्थितियाँ बनती हैं। जब जन प्रवाह पतनोन्मुख होता है तो स्वभावतः अभाव, संकट एवं विद्रोह बढ़ते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया का कुचक्र चलता है और बुरे युग के- पाप युग, नरक युग के समस्त लक्षण सर्वत्र दृष्टिगोचर होते है। सत्प्रयत्नों के सत्परिणाम तो स्पष्ट ही हैं। धर्मराज्य, सतयुग आदि ऐसे ही समय को कहा जाता है। युग कैसा है? कैसा होगा? इन प्रश्नों का उत्तर यह पर्यवेक्षण करके दिया जा सकता है कि लोग क्या कर रहे है और क्या करने की तैयारियों में लग रहे हैं।

कुविचार और कुकर्म बढ़ने लगे तो वातावरण में भावनात्मक विषाक्तता उत्पन्न होनी स्वाभाविक है। उसका प्रतिफल व्यापक रूप से दुखद दुर्घटनाओं के रूप में परिलक्षित होता है। यही कलियुग है। चन्दन वृक्ष सुगन्धित होते है, उन्हें छूकर जो पवन चलता है वह दूर- दूर तक सुवास बिखेरता है। पुष्प वाटिका भी अपने समीपवर्ती क्षेत्र में सुगन्धित और जीवन दायिनी प्राण वायु बिखेरती हैं। सज्जनों को चन्दन वृक्ष और पुष्प पादपों की संज्ञा दी जा सकती है। वे स्वयं तो आन्तरिक प्रसन्नता और साथियों की सद्भावना से सुखी सन्तुष्ट रहते ही हैं, अपनी गरिमा का उपहार सारे वातावरण को प्रदान करते है। कीचड़ और कूड़े से, सड़े नाले से बदबू उठती है, विषाणु बढ़ते हैं, कुरुचिपूर्ण वातावरण बनता है और बीमारियाँ फैलती है मनुष्यों के व्यक्तित्व यदि सड़े नाले और कूड़े के ढ़ेर जैसे बने रहे तो उनकी विकृतियाँ उन अकेले को ही कष्ट नहीं देगी, वरन् समूचे वातावरण में अवांछनीय विक्षोभ उत्पन्न करेंगी। यही कलियुग का- पाप युग का स्वरूप है। युगों के भले- बुरे होने में व्यक्तियों का स्तर ही प्रधान कारण होता है। जन समूह के द्वारा अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियाँ अपनी प्रतिक्रिया से समूचे वातावरण में ऐसी ही विषाक्तता उत्पन्न करती हैं, जो सबके लिए सब प्रकार दुखदायी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती चली जाय।

विषाक्तता के वायुमण्डल का दूषित होना पदार्थ विज्ञान के आधार पर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। अध्यात्म विज्ञान के आधार पर यह जानने में भी कठिनाई न होनी चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों के कारण प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल विक्षुब्ध होता है और उसकी प्रतिक्रिया ऐसी व्यापक परिस्थितियों के रूप में बरसती है, जिनसे संसार को संकटों का सामना करना पड़े। प्रकृति प्रकोप की दुर्घटनाएँ ऐसे ही विक्षुब्ध वातावरण की देन है। आवश्यक नहीं कि जहाँ के लोगों की दुष्प्रवृत्तियाँ हों वही बरसे। सूर्य की गर्मी से समुद्र में बादल उत्पन्न होते हैं आवश्यक नहीं कि वे समुद्र में ही बरसे। वे कहीं भी जाकर बरस सकते है। जब सारी धरती और सारा आसमान एक है तो बादलों को कहीं भी बरसने की छूट रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Last Part)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS


A student has to face many hardships in course of his education. A mother suffers while bringing up the child. Ascetics, social reformers and righteous persons undergo unbearable hardships while working for reformation of the society and evolution of the human soul. Such voluntarily undertaken hardships, confrontations and problems faced in course of fulfillment of self-assumed
responsibilities cannot be considered as consequences of past misdeeds.

It would not be proper to regard every “happygo- lucky” person as a virtuous person in his past life or every sufferer as a sinner of his past birth. Such a concept would be unjustified and misleading. There is no reason for someone to have self-pity or feel remorseful on such a false premise. The course from karma to prarabdha follows an occult and mysterious process known only to the Creator.

We have to remain ever vigilant towards our duties and responsibilities and leave the rest to impartial Supreme Justice of God. Let us face the misfortunes and good fortunes of life with equanimity. God has made us responsible only for our duties as human beings. There could be many reasons for successes-failure and happiness unhappiness. Only the Creator knows their purpose in His
Absolute Wisdom. Let us entirely offer ourselves to the Divine to be used for the free and unobstructed flow of His Will through us.

.... The End
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 55

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 July 2019


👉 Moments of self-expression

■  अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा-पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता सिद्ध किये कोई व्यक्ति दैवी शक्तियों को बहका-फुसला सकेगा, इसकी आशा नहीं ही करनी चाहिए।

◇ बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, बल्कि हर दृष्टि से लाभदायक भी।

★ अक्लमंदी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव बंधन है। इस पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बुद्धिमत्ता में ही है। बुद्धिमत्ता अर्थात् विवेकशीलता-दूरदर्शिता, इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।

◇ अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है-दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है, जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "A Dull Brain Trained For Sharp Memory

There is no parallel to Mr. W J M Baton of England in building up brain-power and memory capacity. Born in Kent county of England, Mr. Baton was so dull that he could not remember what he read. He was very weak and sick, for what he had to leave his school prematurely at the age of 11. What type of memory and wisdom can be expected from him? But inspired by his father, he developed a hobby of memorizing small events occurring around him and then describe to people with date, time and names of the places, just to impress them.

He gradually increased his memorizing capacity to such an extent that started being considered as a walking encyclopedia! He did this with a firm determination to achieve the goal of sharp memory power. With sincere efforts, he acquired such a memory that he became famous around every place. Once he was interviewed by well-known astrologers, politicians and esteemed persons of England, who asked him some details of events believed to be forgotten for a long time. But he replied with accurate data of place and time in perfect chronology that surprised everybody.

Baton became so famous in his time that after his death, one American health institute purchased his head for 10,000 dollars to study the secrets of his extraordinary brain capacity.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein
(Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 20

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...