शुक्रवार, 11 मई 2018

👉 आज का सद्चिंतन 11 May 2018

👉 Maharshi Patanjali

🔷 Some people brought a young man to Maharshi Patanjali and said-“Despite the best efforts from  our side, we are not able to teach this man the importance of yoga sadhana in human life. Kindly help us in this regard”. The Maharshi asked the young man to stay back in his Ashram for a few days.
  
🔶 Several days passed. The people who had brought that man to the Ashram came to meet him there. It was indeed a pleasant surprise for them to see him completely transformed. That man, who was addicted to intoxicating drugs and sensual pleasures a few days back, was now living a life of austerity and self control. He was engrossed in deep meditation beneath a huge tree when they reached the Ashram.
  
🔷 “How did this magical change occur?”-they couldn’t help asking Maharshi Patanjali. The latter humbly replied that there was nothing  amazing in this. It was due to healing and soothing influence of the spiritually suffused vibrations of this Ashram, where every inmate is a devoted sadhaka; this acts as an attitudinal therapy. Those people were well aware that the environment also plays an important role in the progress of sadhana but they could not follow what the Maharshi meant by attitudinal therapy.

🔶 Maharshi further explained –“An eye-specialist cures the problems of eyesight but treatment of the mental-sight, he outlook towards the self and the world.., is the job of a rishi. Because of the deep insight awakened by long-term sadhana, a rishi can view the hidden tendencies and nature of a person and diagnose the ailments of his mental and emotional selves. Using their spiritual powers, rishi can heal such ailments and infirmities of the inner selves of a person. The treatment and righteous orientation of one’s mentality is achieved not merely by preaching and teaching but by the impact of the rishi-level sadhana.

📖 From Akhand Jyoti

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 3)

🔷 कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।

🔶 कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए।

🔷 वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7

👉 गुरुगीता (भाग 106)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता

🔷 गुरूगीता शिष्य की हृदयवीणा से निकले भक्ति के स्वरों की गूँज है। यह ऐसी झंकार है, जो शिष्य के भाव विह्वल हृदय से उठकर सीधे अपने सारे सद्गुरू के प्रेम विह्वल को झंकृत कर देती है। शिष्य के हृदय के इस मौन कंपन को भला उसके गुरूदेव के अलावा और सुनेगा भी तो कौन? यह एक ऐसा सच है, जिसे शिष्य हुए बिना गाया नहीं जा सकता। जिनके जीवन में सारे रिश्ते उसके गुरूदेव में ही समा चुके हों, वह भला किसी और की याद कैसे करें और क्यों करें? वह तो अपने जीवन की हर साँस में अपने गुरू का नाम लेता है। वह तारे, चाहे मारे, शिष्य की गति और कहीं नहीं हो सकती।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में शिष्य के जीवन का यह यथार्थ नए- नए प्रसंगों नए- नए संदर्भों में नए- नए ढंग से कहा गया है। पिछले क्रम में भी इन्हीं स्वरों की गूँज उठी थी कि जो शिष्य है, उनके जीवन का परम शास्त्र गुरूगीता के सिवा और कुछ नहीं है। गुरूगीता का भक्तिपूर्ण पठन, श्रवण एवं लिखकर इसका दान करने से सभी सुफल प्राप्त होते हैं। भगवान् सदाशिव ने भगवती जगदम्बा से यही कहा था कि गुरूगीता का जो शुद्धतत्त्व मैंने आपके सामने कहा है, उसके सविधि जप से संसार की सारी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। गुरूगीता स्वयं में मंत्रराज है, इसके जप का अनन्त फल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त किए बिना नहीं रहता। ऐसा करने से उसके पाप एवं दरिद्रता दोनों ही सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 161

बुधवार, 9 मई 2018

👉 घनश्याम की वीरता

🔶 ‘तुम्हें रुपये देने हैं या नहीं’ क्रुद्ध आवाज में दीवान भीमराव भी चिल्ला रहे थे। ‘मैं जल्दी ही दे दूँगा। इस बार सूखा पड़ गया इसलिए नहीं दे पाया। आपने तो मेरी सदा ही सहायता की है। थोड़ी दया और कीजिए साहब।’ दोनों हाथ जोड़कर गरीब कृषक कह रहा था।

🔷 ‘मैं कुछ नहीं जानता। बस मैं इतना ही कह रहा हूँ कि यदि तुमने एक सप्ताह के अन्दर पैसे नहीं दिये तो तुम्हारे घर की नीलामी करा दूँगा। तुम्हें रुपये इसलिये नहीं दिये थे कि उन्हें दबाकर बैठ जाओ। मूल देना तो दूर रहा, तुमने तो दो वर्ष में ब्याज तक नहीं दी है।’ दीवान जी चिल्लाकार बोले फिर वे क्रोध से पैर पटकते बैलगाड़ी में जाकर बैठ गये। उनके दोनों बेटे एक कोने में सहमें खड़े यह सब सुन रहे थे। पिता की दृष्टि उन पर गयी। तो बोले- ‘अरे तुम लोग क्या कर रहे हो यहाँ। स्कूल जाओ जल्दी से नहीं तो देर हो जायेगी।’

🔶 पिता का आदेश सुनकर घनश्याम और उसके भाई ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ चले। रास्ते भर घनश्याम के मन में वही दृश्य उभरता रहा। दीवान जी का क्रोध से तमतमाया चेहरा और रौबीली आवाज जैसे उसके सामने अभी भी साकार थे। पिता का करुण चेहरा भी उसकी आँखों के आगे आ रहा था। उसने सुना था कि दीवान बड़ा कठोर है। जो कहता है, वह करते उसे देर नहीं लगती। वह अनेक गरीब व्यक्तियों को ऋण देकर उन्हें ऐसे ही सताया करता था। कई बार तो घनश्याम ने लोगों को उसकी मौत की कामना करते हुए भी सुना था।

🔷 यही बात सोचते-सोचते घनश्यामकृष्ण काले आगे बढ़ रहा था कि बाजार के बीच में उसे दीवान जी की बैलगाड़ी दिखाई दी। कुछ हल्ला-सा भी सुनाई दिया। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। घनश्याम भी एक ऊँची दुकान पर चढ़ गया और देखने लगा कि मामला क्या है ? उसने देखा कि दीवान की गाड़ी के बैल बिगड़ गए थे, वे तेजी से भाग रहे थे। उनके साथ जुती गाड़ी घिसटती पीछे चल रही थी। गाड़ी पर बैठे दीवानजी के हाथ से लगाम छूट चुकी थी। कुछ पल बाद ही उसने देखा कि गाड़ी उलट गयी। जुआ तुड़ाकर एक बैल तो भाग गया, पर दूसरा दीवान जी को अपनी सींगों से मारने दौड़ा। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। किसी का यह साहस न हो पा रहा था कि दीवान जी को बचाए। एक बार घनश्याम के मन में आया- ‘इसको अपनी करनी का दण्ड मिल रहा है।’ पर शीघ्र ही उसे मास्टरजी की सीख याद आ गयी, जो सदा यह कहा करते थे कि संकट में पड़े हुए की रक्षा करना ही मनुष्यता है। वे बालकों को वीर बच्चों की कहानियाँ सुना-सुना कर उनमें वीरता का संचार किया करते थे।

🔶 घनश्याम अपने प्राणों की परवाह न कर वहाँ से कूदा और दौड़कर बैल के सामने जा खड़ा हुआ। लोग साँस रोके यह दृश्य देख रहे थे। घनश्याम ने तेजी से बैल की रस्सी पकड़ी और अपनी ओर खींचने लगा। क्रुध बैल और भी चिढ़ गया और दीवान को छोड़कर घनश्याम पर झपटा, पर घनश्याम तो पहले से ही इसके लिए तैयार था। उसने बिना समय खोए और साहस छोड़े विलक्षण चतुराई से जल्दी बैल की रस्सी एक खंभे से लपेट दी। बैल को बँधा देख और भय का कारण दूर जानकर लोग पास आने लगे। थोड़ी देर में बैल भी शांत हो गया। घनश्याम और दूसरे व्यक्तियों ने मिलकर दीवान जी को उठाया।

🔷 उन्होंने घनश्याम को गले लगाते हुए कहा- ‘बेटा ! आज तुमने अपने प्राणों की परवाह न करके मेरी रक्षा की है। मैं तुम्हारे उपकार से झुक गया हूँ। किसके बेटे हो तुम ?’

🔶 घनश्याम ने अपने पिता का नाम बताया तो उन्होंने ध्यान से उसकी ओर देखा। उन्हें याद आया कि जब वे किसान को डांट रहे थे, तो यही बच्चा सहमा-सा एक कोने में खड़ा था। उनका मन उन्हें धिक्कारने लगा- ‘एक मैं पापी हूँ, जो दूसरों को सताता हूँ और एक यह है, जिसने मुझ अपकारी का भी ऐसा उपकार किया है।’

🔷 उन्होंने घनश्याम का हाथ पकड़ा और बोले- ‘चलो मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूँ।’

🔶 वह किसान तो दीवानजी को फिर से आया देखते ही काँपने लगा। घनश्याम को उनके साथ देखकर उसका मन और भी भयभीत हो गया। इस शरारती बालक ने न जाने क्या अपराध किया है। अब तो भगवान ही रक्षक हैं।’ वह मन ही मन सोचने लगा।

🔷 दीवानजी ने किसान को पूरी बात बतायी और कहा कि पूरा पैसा उसने माफ कर दिया है। किसान बहुतेरा कहता रहा- ‘नहीं-नहीं मैं आपका पैसा दे दूँगा, बस मुझे थोड़ा समय और दे दीजिए।’’ परन्तु दीवान ने उसकी बात स्वीकार न की। वे बोले- ‘मैं तुम्हारे ऋण को कभी चुका नहीं सकता।’

🔶 घनश्याम कृष्ण काले के साहस और दयालुता ने पिता के संकट को भी दूर कर दिया उसे वीर बच्चे के रूप में भी पुरस्कृत किया गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2018

👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2018


👉 Amrit Chintan 10 May

🔶 This is the demand of the time, that men’s thinking must change. In prehistoric time, the great Rishi Parashuram destroyed all evil minded kings of that time and established the ruling of justice on throne.

🔷 The famous philosopher cart Jung have opened that worship is a important factor for harmony in life in every sect and religion. People worship in one way or other and have accepted it for good health and all developments and self rectification. They have concluded that all the physicians and psychologist combined have not benefited to that level as only true worship can do.

🔶 The power of spirituality is far ahead of the power of science. It is the spiritual component of man that controls the disasterous power of science. If man can develop this spiritual power of penance and austerity, he will not develop lethal devices for the mankind. Our planning is to develop that true wisdom of life for the vision of 21st century’s Golden era for all.

🔷 One who is friendly with his own soul be will be utmost sincere in all his duties of his life. He will help others and will give all his services to the down trodden people. Such a person is never alone. God and nature works with him.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 2)

🔶 कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।

🔷 कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।

🔶 ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7  

👉 गुरुगीता (भाग 105)

👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है

🔶 गुरूगीता के उपदेष्टा के रूप में स्वयं परात्पर महेश्वर, जिनसे सारे शास्त्र एवं योग मार्गों का उद्गम हुआ है और श्रोता के रूप में स्वयं भगवती जगज्जननी, जिनकी गोद में समूची सृष्टि आश्रय पाती है, इनके संवाद के रूप में उदय हुई गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का यथार्थ विवरण दे पाना किसी भी साधक -सिद्ध के वश की बात नहीं है। हाँ, ऐसे महान् साधकों की अनुभूतियों के विवरण एवं वर्णन पढ़कर रोमाञ्चित, गद्गद्, पुलकित एवं प्रेरित हुआ जा सकता है। ऐसी ही प्रेरक एवं अनुभूतिपूर्ण कथा खाकी बाबा की है।

🔷 खाकी बाबा उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल के विख्यात सन्त हुए हैं इनकी योग विभूतियों की अनेक कथाएँ अभी भी पूर्वांचल के गाँवों में बड़ी श्रद्धा से कही- सुनी जाती है। खाकी बाबा का अधिकाशं समय कुसुमी के जंगल में बीता। हाँ अपने अन्तिम समय में वह अवश्य चित्रकूट चले गए। खाकी बाबा के अनेक कृपा पात्रों में मुस्लिम सन्त सैयद रोशन अलीशाह एवं उनके शिष्य सिराजउद्दीन का विशेष नाम आता है। भट्टमयूरवंशीय मझौली नरेश भी खाकी बाबा के कृपा पात्रों में थे। कहते हैं कि बाबा को आध्यात्मिक पथ पर स्वयं भगवान् सदाशिव चलाया था। उन्होंने स्वयं ही इन योगीराज को तारक मंत्र की दीक्षा दी थी।

🔶 कहते हैं कि बाबा की गहन आध्यात्मिक अभिरूचि थी। बचपन से ही उनका मन संसार में नहीं लगता था। पर कहाँ जाएँ? क्या करें? कोई मार्ग भी तो नहीं था। हारकर उन्होंने श्री दुर्गासप्तशती का आश्रय लिया। स्वयं भगवती रूपी सप्तशती का आश्रय लेकर माँ, जो कण- कण में अग- जग में है। एक दिन जब वे पाठोपरान्त माँ के ध्यान में बैठे, तो अद्भुत झलक मिली। उन्होंने देखा कि आकाश मार्ग से भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा के साथ जा रहे हैं। माँ ने प्रभु से कहा- हे दयानिधान इस बालक का भी कल्याण करें। भगवान् शिव ने माँ की इन बातों को अनसुना कर दिया। कई बार के आग्रह के बाद उन्होंने केवल एक बात कही- देवि! यह अभी सत्पात्र नहीं है। अपने को सत्पात्र बनाने के लिए इसे अभी और भी बहुत कुछ करना है। ऐसा करके उन्होंने माँ से कुछ कहा।

🔷 जो कहा गया- वह तो खाकी बाबा नहीं सुन- समझ पाए ; परन्तु उन्हें इतना अवश्य समझ में आया कि माँ उनसे कह रही हैं कि पुत्र तुम सद्गुरू प्राप्ति के लिए गुरूगीता का आश्रय लो। तुम्हारा सर्वविधि कल्याण होगा। बस, खाकी बाबा ने उस दिन से गुरूगीता का प्रातः, मध्याहृ सायं एवं तुरीय संध्या में पाठ प्रारम्भ कर दिया। ऐसा करते हुए उन्हें बरसों बीत गए। तब एक दिन तुरीय संध्या के समय यानि कि मध्यरात्रि की साधना के समय ध्यानावस्था में भगवान् शिव की झलक फिर मिली। इस बार प्रभु ने उन्हें स्वयं तारक मंत्र का उपदेश दिया। दयानिधान ने स्वयं दक्षिणामूर्ति रूप में उन्हें शिष्य के रूप में अंगीकार किया। अन्तश्चेतना में तारक मंत्र के प्रविष्ट होने के साथ उनकी कुण्डलिनी का उत्थापन हो गया और अनेक योग विभूतियाँ स्वयं ही प्रकट हो गयी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 159

मंगलवार, 8 मई 2018

👉 "उल्टे हाथ कर लेना"

🔷 एक नगर का राजा जिसे ईश्वर ने सब कुछ दिया एक समृद्ध राज्य सुशील और गुणवती पत्नी, संस्कारी सन्तान सब कुछ था उसके पास पर फिर भी दुःखी का दुःखी रहता!

🔶 एक बार वो घुमते घुमते एक छोटे से गाँव मे पहुँचा जहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकीया बेच रहा था और कुछ मटकीयों मे पानी भर रखा था और वही पर लेटे लेटे हरिभजन गा रहा था!

🔷 राजा वहाँ आया और भगवान भोले बाबा के दर्शन किये और कुम्हार के पास जाकर बैठा तो कुम्हार बैठा हुआ और उसने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया! राजा कुम्हार से कुछ प्रभावित हुआ और राजा ने सोचा की ये इतनी सी मटकीयों को बेच कर क्या कमाता होगा?

🔶 तो राजा ने पूछा क्यों भाई प्रजापति जी मेरे साथ नगर चलोगे तो प्रजापति ने कहा नगर चलकर क्या करूँगा राजाजी?

🔷 राजा - वहाँ चलना और वहाँ खुब मटकीया बनाना!

🔶 प्रजापति - फिर उन मटकीयों का क्या करूँगा?

🔷 राजा - अरे क्या करेगा? उन्हे बेचना खुब पैसा आयेगा तुम्हारे पास!

🔶 प्रजापति - फिर क्या करूँगा उस पैसे का?

🔷 राजा - अरे पैसे का क्या करेगा? अरे पैसा ही सबकुछ है!

🔶 प्रजापति - अच्छा राजन अब आप मुझे ये बताईये की उस पैसे से क्या करूँगा?

🔷 राजा - अरे फिर आराम से भगवान का भजन करना और फिर तुम आनन्द मे रहना!

🔶 प्रजापति - क्षमा करना हॆ राजन पर आप मुझे ये बताईये की अभी मै क्या कर रहा हुं और हाँ पुरी ईमानदारी से बताना! काफी सोच विचार किया राजा ने और मानो इस सवाल ने राजा को झकझोर दिया!

🔷 राजा - हाँ प्रजापति जी आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हो और जहाँ तक मुझे दिख रहा है आप पुरे आनन्द मे हो!

🔶 प्रजापति - हाँ राजन यही तो मै आपसे कह रहा हुं की आनन्द पैसे से प्राप्त नही किया जा सकता है!

🔷 राजा - हॆ प्रजापति जी कृपया कर के आप मुझे ये बताने की कृपा करे की आनन्द की प्राप्ति कैसे होगी?

🔶 प्रजापति - बिल्कुल सावधान होकर सुनना और उस पर बहुत गहरा मंथन करना राजन! हाथों को उल्टा कर लिजिये!

🔷 राजा - वो कैसे?

🔶 प्रजापति - हॆ राजन मांगो मत देना सीखो और यदि आपने देना सिख लिया तो समझ लेना आपने आनन्द की राह पर कदम रख लिया! स्वार्थ को त्यागो परमार्थ को चुनो! हॆ राजन अधिकांशतः लोगो के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है की जो कुछ भी उसके पास है वो उसमे सुखी नही है और बस जो नही है उसे पाने के चक्कर मे दुःखी है! अरे भाई जो है उसमे खुश रहना सीख लो दुःख अपने आप चले जायेंगे और जो नही है क्यों उसके चक्कर मे दुःखी रहते हो!

🔷 आत्मसंतोष से बड़ा कोई सुख नही और जिसके पास सन्तोष रूपी धन है वही सबसे बड़ा सुखी है और वही आनन्द मे है और सही मायने मे वही राजा है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2018


👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 3)

🔷 मैं जिस बात का समर्थन करना चाहता हूँ वह यह है कि इस उपेक्षित सत्य को लोग जीते जागते रूप में स्वीकार करें कि धर्म की वास्तविकता का आधार बहुत आवश्यक और विश्वव्यापी आवश्यकता के रूप में मानव प्रकृति की सत्यता में है और इसीलिए मानव प्रकृति के द्वारा उस धर्म की वास्तविकता की लगातार परीक्षा होती रहनी चाहिए। जहाँ पर यह उस आवश्यकता की उपेक्षा और तर्क का उल्लंघन करती है वहाँ पर यह स्वयं अपने औचित्य को दूर भगा देती है।

🔶 मुझे इस कथन को मध्यकालीन भारतवर्ष के बहुत बड़े रहस्यवादी कवि कबीर, जिन्हें मैं अपने देश के सर्वप्रधान आध्यात्मिक विशेष बुद्धिमानों में से एक व्यक्ति मानता हूँ, की कुछ निम्नलिखित पंक्तियों को देते हुए समाप्त करने दीजिए।

🔷 “रत्न कीचड़ में खो गया है और सब लोग उसे ढूँढ़ रहे हैं। कुछ लोग पूरब की ओर खोजते हैं, कुछ पश्चिम की ओर। कुछ लोग पानी में खोजते हैं और कुछ पत्थरों में। किन्तु दास कबीर ने उस के सच्चे मूल्य को जान लिया है और स्वयं अपने हृदयरूपी वस्त्र के एक आँचल में उसे बड़े यत्न के साथ लपेट रखा है।”

✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 9

👉 Science and spirituality

🔷 The discovery of the powers of Nature, their organisation and the skills that make them useful is called science. Science can thus be called the unison of matter and consciousness. Science has made possible the progress of the human civilisation.
It should be noted that the knowledge of the use of matter is not enough; its righteous use should also be considered. The same criterion also applies to consciousness. In the absence of their righteous use, matter and consciousness are abused. The attraction of immediate gains is such that its long-term effects are not appreciated and this shortsighted judgement prompts man to misuse power. Ultimately, he creates a web in which he gets trapped, just like a fish caught in a net. This is accompanied by suffering, public anger and self-destruction, and yet it is a practice generally adopted by people. The society and the government rarely succeed in preventing such practices.

🔶 Science can be credited for the current progress and prosperity, but it is incapable of differentiating between use and abuse. The only way to control its misuse is to incorporate wisdom based on foresightedness and the greatness associated with human glory. This is the essence of spirituality. Spirituality means, “centred and established on the soul”, that is, activities in life are designed keeping the welfare of the soul as the aim. The soul is the consciousness present in the human body.

🔷 Consciousness is more powerful than matter. As discussed earlier, it is the miracle of consciousness that organises matter in a useful state. However, unrestrained consciousness has drawbacks too. For example, it is easy to find faults in others, but does anyone try to inspect their own self for their own faults? Usually, an individual is biased towards his shortcomings and considers himself the best. A person trying to prove himself will present several arguments in his favour. This distorts the reality and generates undesirable thoughts.

🔶 The dual accomplishment of the righteous use of science and the refinement of consciousness is possible only through spirituality.

📖 Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 1)

🔷 मनुष्य−समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अन्तःकरण को आत्मज्ञान रूपी दिव्य ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह है कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंभाव के आपको मानव−जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए, आसक्ति को दूर करके सफलता व निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्म−योग है।

🔶 जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।

🔷 अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 6

👉 शिष्यत्व का समर्पण

🔷 शिष्यत्व का समर्पण आध्यात्मिक जीवन का सौभाग्य शिखर है। बड़े ही पुण्यवान् जनों के हृदयों में शिष्यत्व अंकुरित होता है। यह अंकुरण सहज नहीं है। अनेकों जन्मों के तप, व्रत, जप, दान और अनगिन शुभ कर्मों के सुयोग से हृदय भूमि इतनी उर्वर हो पाती है कि उसमें शिष्यत्व अंकुरित हो सके। इस अद्भुत-अलौकिक अंकुरण का बड़े जतन से रख-रखाव करना पड़ता है। एक तरफ सांसारिक विषय-वासना की विपदाओं से बचना पड़ता है, तो दूसरी ओर बड़ी आध्यात्मिक विकलता से सद्गुरु को टेर लगानी पड़ती है। बड़े ही भाव-विह्वल हृदय से उन्हें पुकारना पड़ता है। सद्गुरु की पुकार के अमृत जल से ही शिष्यत्व का यह बिरवा पल्लवित-पुष्पित होता है।
  
🔶 विकसित होते शिष्यत्व में बड़ा ही दैवी आकर्षण होता है। समस्त मानवीय सद्गुण अपने आप ही इस ओर खिंचे चले आते हैं। आध्यात्मिक शक्तियाँ और अनुभूतियाँ, दिव्य लोकों के ऋषि व देवगण अनायास ही इस पर अपनी कृपा वृष्टि करते हैं। लेकिन शिष्यत्व तो बस अपने सद्गुरु के चरणों का चंचरीक होता है। गुरु प्रेम की पुकार उसके प्राणों में बसती है। गुरुभक्ति में उसकी भावनाएँ पलती हैं। गुरुश्रद्धा उसका सर्वस्व होती है। उसे तो बस एक ही धुन रहती है कब मेरे समर्पण को पूर्णता मिलेगी? कब मेरे आराध्य मेरे समूचे अस्तित्त्व को स्वीकारेंगे? कब वह मेरे हृदय की भावनाओं को अपनी भावना बनाएँगे?
  
🔷 इस धुन में शिष्यत्व दिव्यता का महाचुम्बकत्व सघन हो जाता है। उसमें न लोक की कोई चाहत बचती है और न परलोक की। अब उसे न कोई कामना सताती है, न कोई वासना। स्वर्ग, मुक्ति, ज्ञान, ध्यान सबके सब गुरु प्रेम में विलीन हो जाते हैं। उसके प्रत्येक कर्म के कौशल में, विचारों के संवेदन में, भावनाओं की विह्वलता में बस समर्पण के स्वर गूंजते हैं। ‘सद्गुरु कृपा हि केवलम्, न हि अन्यत्र मे जीवनम्’ प्राणों में बस यही एक गीत पलता है। शिष्यत्व की कोई मांग नहीं होती, उसकी कोई शर्त नहीं होती। वह तो अपने प्रभु पर न्योछावर हो जाना चाहता है। स्वयं को उन पर लुटा देना चाहता है। उनके प्रत्येक संकेत व आदेश पर सौ-सौ बार जीना-मरना चाहता है। उसके इस समर्पण को पूर्णता देने के लिए परम कृपालु गुरुदेव उसकी अन्तर्चेतना में अवतरित होते हैं।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 108

👉 गुरुगीता (भाग 104)

👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है

🔷 इस परम रहस्यमयी गुरूकथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ जगदम्बा से कहते हैं-

🔶 इदं तु भक्तिभावेन पठते श्रृणुते यदि। लिखित्वा तत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत्॥ १३१॥
गुरूगीतात्मकं देवि शुद्धतत्त्वं मयोदितम्। भवव्याधिविनाशार्थं स्वयमेव जपेत्सदा॥ १३२॥
गुरूगीताक्षरैकं तु मंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३३॥
अनन्तफलमाप्रोति गुरूगीताजपेन तु। सर्वपापप्रशमनं सर्वदारिद्रयनाशनम्॥१३४॥

🔷 गुरूगीता का भक्तिपूर्वक पठन, श्रवण एवं इसका लेखन तथा दूसरों को इसे देने से सर्वसुफल प्राप्त होते हैं॥१३१॥ प्रभु कहते हैं- हे देवि! गुरूगीता रूपी इस शुद्ध तत्त्व को मैंने आपके सामने कहा है। इसका विधिपूर्वक जप सभी सांसारिक कठिनाइयों का विनाश करने वाला है॥ १३२॥ गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है। अन्य सभी मंत्र मिलकर भी इसकी सोलहवीं कला भी नहीं हैं॥ १३३॥ इस गुरूगीता की मंत्रमाला के जप का अनन्तफल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त करता है। ऐसा करने से उसके सभी पापों का एवं सभी तरह की दरिद्रता का विनाश होता है॥१३४॥

🔶 भगवान् शिव के इस कथन में गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का संकेत है। इसमें इसके पाठ के महत्त्व का वर्णन है। जिस तरह से श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुखारविन्द से उपदेशित होने के कारण सर्वशास्त्रमयी है, उसी तरह गुरूगीता सभी योगियों के परम आराध्य योगीश्वर भगवान् शिव के श्रीमुख से उच्चरित है। एक अर्थ में इसका महत्व श्रीमद् भगवत् गीता से भी बढ़कर है और वह इस तरह कि श्रीमद् भगवद्गीता के श्रोता के रूप में अर्जुन हैं, जो कि मोहग्रस्त एवं किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में इसे सुनना प्रारम्भ करते हैं। जबकि गुरूगीता की श्रोता भगवती आदिशक्ति जगदम्बा स्वयं हैं। जो कि सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करती हैं। जिनकी चित् शक्ति से ही यह सृष्टि चेतना एवं शक्ति प्राप्त करती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 158

👉 विचारों का केन्द्र बिंदु- ’क्यों’?

🔶 जीवन एक विकट समस्या है इसमें न जाने कितने उतार- चढ़ाव आते हैं और स्मृति में विलीन हो जाते हैं। इनमें से कुछ ही विचार थोड़े समय के लिए हमारी स्मृति में रह पाते हैं पर उन पर भी हम सरसरी नजर भर डाल लेते हैं, गहराई से नहीं सोच पाते अन्यथा जीवन सबसे अधिक अध्ययन का विषय एवं ज्ञान का भंडार है। जीवन की प्रत्येक घटना के पीछे कार्यकारण परम्परा का अद्भुत रहस्य छिपा है। विचार करने पर छोटी से छोटी साधारण घटना जीवन का काया पलट कर देती है और विचार नहीं करने पर बड़ी से बड़ी घटनाओं का भी कोई असर नहीं हो पाता।

🔷 कथाओं में हम प्रायः पढ़ते हैं कि अमुक व्यक्ति को बादलों के रंग देखकर वैराग्य हो गया। अमुक को रोगी, दीन, वृद्ध एवं मृतक को देखकर संसार से उदासीनता हो गई, पर हम इनको रात दिन देखते है। फिर भी हम पर इनका असर नहीं होता, आखिर ऐसा क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है। एक घोर पापी किसी महात्मा के एक उपदेश वाक्य से सजग हो उठा पर हमने उनके वाक्यों को अनेक बार पढ़ा और मनन किया फिर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक ही बात एक को भोग की ओर आकर्षित करने वाली होती है और दूसरे को त्याग की ओर। इससे स्पष्ट है कि वह शक्ति घटनाओं में नहीं, हमारे विचारों में ही है।

🔶 विचारों से ही मनुष्य बनता है और उन्हीं से बिगड़ता भी है। अतः जीवन की हर एक समस्या- हर एक घटना पर, चाहे वह कितनी ही तुच्छ और साधारण क्यों न जान पड़े मनन करना आवश्यक है। उसका महत्त्व समझना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के कारण पर विचार किया जाय कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? और ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ?

🔷 अमुक मनुष्य कार्य कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता? उसमें और मुझमें किन- किन बातों का क्या अन्तर है? मेरी और उसकी कार्य प्रणाली में कहाँ सामंजस्य हैं? कहाँ विषमता है? मेरी त्रुटि कहाँ है? मैं कैसे वैसा कर सकता हूँ या बन सकता हूँ? मैंने अमुक समय में वह कार्य किया तो क्यों किया? मुझे अमुक विचार आया तो क्यों आया? और अमुक कार्य या विचार नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? इस प्रकार “क्यों” की विचारधारा को आगे बढ़ाते जाने पर नया प्रकाश मिलता जायगा। नई समस्याओं के नये हल मिलेंगे और नए हलों के लिये नई समस्याएँ। क्यों एवं कैसे- विचारों के विकास का मूल मंत्र है उसे अपना कर आप लाभ उठाइये, विचारक बनिए।

🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 12

http://awgpskj.blogspot.in/2017/06/blog-post_70.html

👉 एक दृश्य-एक तथ्य

🔶 संध्या का समय था। सूर्य अस्ताचल को ओढ़कर अपना मुँह ढाँकने का प्रयत्न कर रहा था। मन्द-मन्द हवा बह रही थी और उसी के साथ भगवती भागीरथी का जल-कल कर बह रहा था। तट पर, एक शिला पर बैठे स्वामी दयानन्द आत्म-चिन्तन में निरत थे- परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है और सर्वेश्वर की कृति आनन्दप्रद। पक्षी दिन भर के श्रम से थक कर आये अपने घोंसलों में विश्राम से पूर्व चहक रहे थे। लगता था वे अपने बच्चों के साथ बैठ कर सन्ध्या गीत गा रहे हो।

🔷 हे अनन्त के सृष्टा और आनन्द के दाता तुझे कोटिशः प्रणाम-महर्षि प्रणत भाव से बुदबुदा उठे। प्रकृति भी सन्ध्या की मन्द शीतल पवन के हिलोरों से मुदित होकर शयन की तैयारी कर रही थी। चारों ओर एकान्त था। ध्वनियाँ थी तो केवल पक्षियों की चोंच से निकले स्वर व सरिता के बहते हुए नीर की, जैसे आनन्द का संगीत बज रहा हो और ऋषि के हृदय में भी उसी आनन्द की वीणा बज रही थी। वे प्राणायाम करते, दीर्घश्वास सोच्छवास छोड़ते पुनः प्राण ग्रहण करते और समाधिस्थ हो जाते।

🔶 ध्यान टूटा तो पास हो कहीं से आती हुई सिसकियों से। लगता था कोई किसी से सदा के लिए बिछुड़ रहा हो और सिसकने वाला जाने वाले को भगवती जाह्नवी को सौंप कर अन्तिम विदा दे रहा हो।

🔷 ऋषि ने उस ओर देखा जिस ओर से कि सिसकी आ रही थी। न अधिक दूर और न अधिक समीप। एक दीन-हीन जीर्ण वस्त्र पहने कंगाल मात्र नारी देह अपने शिशु का शव जल समाधि देने के जिए झुकी।

🔶 शिशिर की शीत समीर के मन्द झोंके और जाह्नवी के शीतल जल की ठण्डक ने माँ को जैसे कंपकंपा कर रख दिया! उससे भी अधिक पुत्र विछोह ने कँपा कर रख दिया होगा। वह अबला इन्हीं शीतल झोंकों के कारण पानी में लुढ़कते-लुढ़कते बची थी। उसकी एकमात्र ओढ़नी जिसका उपयोग उसने कफ़न के लिए भी किया था भीग चुका था और पुत्र के तैरते हुए शव को किनारे पर बैठी वह फटी-फटी आँखों से निहार रही थी। शव जब आँखों से ओझल हो गया तो दुःख, विलाप ओर विवशता की त्रिवेणी में डूबती हुई वह माँ लौटने लगी।

🔷 ऋषि ने समीप जाकर पूछा- देवी क्या इस शिशु का पिता साथ नहीं आया।’

🔶 फूट पड़ी वह। बड़ी कठिनता से बोली- वृद्ध पति अभी दो माह पूर्व ही मुझे अकेली छोड़कर चले गये हैं तथा अब वह यह पुत्र भी।’

🔷 आयु में तो वह अभी युवती ही दिखाई दे रही थी और अपने पति के साथ वृद्ध का सम्बोधन अनायास ही लगाकर ऋषि हृदय को झकझोर दिया था, अपनी स्थिति का कारण बताकर।

🔶 ‘हे सर्वेश्वर! अब तू मुझे माताओं का इस रूप में दर्शन करा रहा है- ऋषि के ओष्ठ फड़फड़ाये। वे भाव मग्न से हो गये थे ओर स्त्री जा चुकी थी।

🔷 पर ऋषि को एक नयी दृष्टि देकर।

🔶 अब वे चैन से नहीं बैठ सके। उन्होंने संकल्प लिया कि- माताओं की यह दुर्दशा करने वाली परिस्थितियों को बदल कर रहूँगा। अकेले अपना कल्याण कर लिया तो मुझ सा स्वार्थी ओर कौन होगा? जिसने माँ का दूध पिया, उसके आँचल की छाया में रहा यह मात्र स्वार्थ ही नहीं कृतघ्नता भी है।

🔷 और अतीत बताता है। पहली बार अब से शताधिक वर्ष अनमेल विवाह जैसी कुरीतियों को चुनौती दी तथा उन्हें हटाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे, एक हम हैं जो आये दिन अपनी आँखों से बुराइयाँ देखते हैं, पर उनसे जूझने से कतराते ही रहते हैं।

📖 अखंड ज्योति जनवरी 1977

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2018


👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 2)

🔶 साँप्रदायिकता की उद्धत भावना को जो कि बहुधा सक्रिय अथवा निष्क्रिय उत्तेजनापूर्ण अथवा विनम्र पीड़ा पहुँचाने वाले ढंगों से बहुत ही कम अथवा बिना क्रोध युक्त उत्तेजना के काम में आती हैं तथा तथ्य का स्मरण दिलाने की जरूरत है कि कविता के ही समान धर्म केवल विचार नहीं है वरन् विचारों का प्रकटीकरण है।

🔷 ईश्वर का आत्म-प्रकटी-करण सृष्टि की विभिन्नता में है और असीम के प्रकटी-करण में हमारी भावना में भी व्यक्तिगत रूप की ऐसी विभिन्नता होनी चाहिए जो अविरल और अनन्त हो। जब किसी धर्म में समस्त मानव-जाति पर अपने ही मत को लादने की महत्वाकाँक्षा उत्पन्न हो जाती है। तब उसका पतन हो जाता है और वह अत्याचार करने लगता है तथा साम्राज्यवाद का एक रूप बन जाता है। यही कारण है कि जिससे हम मार्मिक मामलों में फैजिज्म के एक विवेकशून्य को संसार के अधिकाँश भागों में फैलते हुए तथा मनुष्य की आत्मशक्ति के विस्तार को अपने अनुभव ज्ञान विहीन तलुवों से खूब कुचलते हुए करते हैं।

🔶 अपने ही एक धर्म को सभी देशों और सभी दलों में प्रधान बना देने का प्रयत्न ऐसे ही लोगों में देखा जाता है जिन्हें साँप्रदायिकता का व्यसन जाता है।

🔷 यह कहना उनको बुरा मालूम होता है। प्रेम के वितरण करने में ईश्वर उदार है तथा मनुष्यों के साथ आदान-प्रदान करने के उसके साधन एक ऐसी गली में परिमित नहीं हैं जो इतिहास के एक संकीर्ण स्थान पर जाकर अकस्मात् समाप्त हो जाती है।

✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 Amrit Chintan 8 May

🔶 We have found the solution of all the problems of the present era. The problems are due to lack of use of true wisdom of life and short sightedness. The solution will be based on scientific facts and evidences. Real step will be to free our self from superstitious traditions and by adopting good virtues and values of life. Strong will and courage will achieve the great revolution for a golden era.

🔷 Self introspection and self development is the only process in life for cultural development. But to attain the ideality in life one will have to do something more – that is that we will have to work to develop the new generation to adopt ideality in life. That process will add feathers to the society you are living in.

🔶 Devotees of Gayatri are “Pragya Putra” i.e. volunteers in action. The duties assigned to them is a collective effort similar to that when Rishis collected their blood (put their collective efforts) which was represented by appearance of Sita in box found by King Janak while ploughing to raise grain for food in famine. Finally this effort results in destroying the power of evil represented by king Raven of Lanka.

🔷 Similar circumstances have appeared in the mass which needs the awakened people to understand their role to establish harmony and peace in life of human beings Pragya Putra devotion will be measured on that scale.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 साहसी आगे आये

🔶 जिनमें साहस हो, आगे आवें। हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने ही वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उस दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभात का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहें तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आप को यशस्वी बना सकते हैं।

🔷 देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गए। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही, पर वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रांति अवश्यंभावी है। उसका मोर्चा राजनीतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता सँभालेंगे। यह प्रक्रिया युग निर्माण योजना के रूप में आरंभ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तरदायित्व सौंपने को प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1965 पृष्ठ 52  

👉 गुरुगीता (भाग 103)

👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है

🔶 गुरूगीता परम दिव्य शास्त्र है। इसका अर्थ एवं इसके शब्द दोनों ही दिव्य हैं। इसके अर्थ में परम गम्भीर एवं गूढ़ तत्त्वज्ञान की झाँकी है। आध्यात्मिक साधना के शिखर अनुभवों की झलक है। इतना ही नहीं, गुरूगीता के अर्थ में ज्ञान, कर्म व भक्ति तथा हठ एवं राजयोग की दुर्लभ साधनाएँ प्रकाशित होती हैं। इनमें से किसी एक साधना विधि का साधन करने वाला आध्यात्मिक जीवन की दुर्लभ, दुर्लभतर एवं दुर्लभतम विभूतियों को पा सकता है। ऐसा कहने का आधार लेखकीय कल्पना नहीं, वरन् शास्त्रों व सन्त जीवन चरित का स्वाध्याय व अध्यात्म पुरूषों के सत्संग का अनुभव है। यह सत्य इतना प्रामाणिक है, जिसे कोई साधक अपने स्वयं के अनुभव में बदल सकता है। कतिपय भाग्यशाली ऐसा कर भी रहे है।

🔷 अर्थ जितनी ही दिव्यता- गुरूगीता के शब्दों और अक्षरों में है। हालाँकि यह सत्यबुद्धि एवं सभी तर्कों से परे है। सच तो यही है कि गुरूगीता के अक्षरों व शब्दों के महत्त्व को जानना, समझना, इसके अर्थ को समझने से ज्यादा दुष्कर व दुरूह है। क्योंकि अर्थ में तो तर्क, दर्शन एवं ज्ञान का संयोजन है। इसे बुद्धि एवं अन्तर्प्रज्ञा से जाना जा सकता है। परन्तु अक्षरों व शब्दों के संयोजन में छुपी हुई दिव्यता को पहचानना केवल श्रद्धासिक्त हृदय से ही सम्भव है। इसी बलबूते पर गुरूगीता की यह मांत्रिक सामर्थ्य प्रकट होती है। गुरूगीता का सम्पूर्ण ग्रन्थ अपने आप में मंत्रशास्त्र है। इसके कई दुर्लभ प्रयोग हैं, जो अलग -अलग ढ़ंग से सिद्ध एवं सम्पन्न किए जाते हैं। इस क्रम में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि इसे जानने वाले भी विरल एवं दुर्लभ हैं। साधकों एवं सिद्धों के समुदाय में विरल जन ही ऐसे हैं, जो मंत्रमयी गुरूगीता के मंत्रों का प्रयोग करने की सामर्थ्य रखते हैं।

🔶 हालाँकि गुरूगीता में इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं। गुरूगीता के पिछले क्रम में भी कुछ ऐसे ही गूढ़ निर्देशों की चर्चा की गयी है। इसमें भगवान् सदाशिव ने जगन्माता भवानी को बताया है कि हे देवि! गुरूगीता द्वारा उपदेशित मार्ग ही मुक्तिदायक है। लेकिन इन सभी साधनाओं का उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए, न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए। जो ज्ञानहीन लोग इन महत्त्वपूर्ण ,दुर्लभ एवं गोपनीय साधनाओं का उपयोग सांसारिक कामों के लिए करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है। परन्तु जो ज्ञानी अपनी निष्कामता क साथ इन साधनाओं का उपयोग करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 157

सोमवार, 7 मई 2018

👉 आज का सद्चिंतन 7 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 May 2018


👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 1)

🔶 यदि आप सचमुच सत्य के प्रेमी हैं, तो उसके समस्त असीम सौंदर्य और महत्व के साथ पूर्ण रूप में उसे खोजने का साहस कीजिए। किंतु रूढ़ियों की पत्थर की दीवालों के भीतर कंजूसों के समान एकान्त स्थान में उसके (सत्य के) व्यर्थ के संकेत चिन्हों का संग्रह करके ही संतोष न कर लीजिए। महात्माओं की आध्यात्मिक उच्चता के कारण जोकि उन सबसे समान रूप से पाई जाती है, हमें विनम्रतापूर्ण सादगी के साथ उनका आदर करना चाहिए।

🔷 यह आध्यात्मिक उच्चता उन में उस समय देखी जाती है जब वे अपनी विश्वजनीन उच्च विचारों के साथ मनुष्य की आत्मा को स्वयं उसके व्यक्तिगत उसकी जाति और उसके धर्म के अहं भाव के बन्धन से छुड़ाने के लिए एकत्रित होते हैं। किंतु परंपराओं की एक नीची भूमि में जहाँ धर्म एक दूसरे के दासों और अन्धविश्वासों को चुनौती देकर ललकारते हैं और उनका खण्डन करते हैं वहाँ पर एक बुद्धिमान मनुष्य निश्चय ही संदेह ओर आश्चर्य के साथ उनके पास से चला जायेगा।

🔶 मेरा मतलब इस बात का समर्थन करने का नहीं है कि समस्त मानव जाति के लिए कोई एक ही प्रकार का प्रार्थनागृह रखा जाय अथवा कोई एक ऐसा विश्वजनीन नमूना रखा जाए जिसका अनुकरण सभी पूजा के और सद्भावना के कार्यों के द्वारा किया जाय।

✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 Indian Culture

🔶 The publication of Sri Aurobindo’s renowned work “The foundation of Indian Culture” had sparked a new wave of interest in the multiple aspects of Indian Culture. His disciples and other residents of his Ashram also used to have prolonged discussion on the elements of this great legacy of the Vedic Age.

🔷 Once a disciple raised a query as to why the Indian Culture is reffered to as the “Divine Culture” while the cultures of all the other nations are known after their names only. He put this question to Nalinda, who was the seniormost sadhak in the Ashram and was considered very close to the master. Nalinda could not find a satisfactory answer to the query and said that he would approach Sri Aurobindo himself for a reply.One day, while discussing some related topic, Nalinda put the same query before Sri Aurobindo.

🔶 The latter replied-“ The principle objective of the Indian Culture is the awakening and expression of Divinity in human life. The Vedic Rishis, the founders of the Indian Culture, had developed the grand structure of this culture around this very central search. Because of the incorporation of divine values and elements in its genesis and expansion, the Indian Culture is also synonymous with Divine Culture.”

📖 From Pragya Puran

👉 चाहिए साहसी, जिम्मेदार

🔶 युग निर्माण योजना, शतसूत्री कार्यक्रमों में बँटी हुई है। वे यथास्थान, यथास्थिति, यथासंभव कार्यान्वित भी किए जा रहे हैं, पर एक कार्यक्रम अनिवार्य है और वह यह कि इस विचारधारा को जन-मानस में अधिकाधिक गहराई तक प्रविष्ट कराने, उसे अधिकाधिक व्यापक बनाने का कार्यक्रम पूरी तत्परता के साथ जारी रखा जाए। हम थोड़े व्यक्ति युग को बदल डालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। धीरे-धीरे समस्त मानव समाज को सद्भावना सम्पन्न एवं सन्मार्ग मार्गी बनाना होगा और यह तभी संभव है जब यह विचारधारा गइराई तक जन-मानस में प्रविष्ट कराई जा सके। इसलिए अपने आस-पास के क्षेत्र में इस प्रकाश को व्यापक बनाए रखने का कार्य तो परिवार के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को करते ही रहना होगा।

🔷 अन्य कोई कार्यक्रम कहीं चले या न चले, पर यह कार्य तो अनिवार्य है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को प्रभावित करने के लिए निरंतर समय, श्रम, तन एवं मन लगाया जाता रहे। जो ऐसा कर सकते हैं, जिनमें ऐसा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई है, उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी कह सकते हैं। धन नहीं, लक्ष्य हमारे हाथ में है, उसे पूरा करने का उत्तरदायित्व भी हमारे उत्तराधिकार में किसी को मिल सकता है। उसे लेने वाले भी कोई बिरले ही होंगे। इसलिए उनकी खोज तलाश आरंभ करनी पड़ रही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, दिसम्बर 1964 पृष्ठ 49-50   

👉 धर्म का तत्त्व

🔶 धर्म के विस्तार एवं विविधता की खोज अनावश्यक है। आवश्यक है धर्म के तत्त्व की खोज, इसकी अनेकता में एकता की खोज, इसके परम सार की खोज। यह खोज जितनी अनिवार्य एवं पवित्र है, इसकी विधि उतनी ही रहस्यमय और आश्चर्यपूर्ण है। इसे न समझने वाले जीवन की भँवरों की भटकन में भटकते रहते हैं। धर्म को खोजते हुए स्वयं को खो देते हैं। क्योंकि वे धर्म के तत्त्व को नहीं उसके विस्तार एवं विविधता को खोजते हैं।
  
🔷 धर्म के तत्त्व की खोज तो स्वयं की खोज में पूरी होती है। स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म अपने-आप ही मिल जाता है। यह तत्त्व शास्त्रों में नहीं है। शास्त्रों में तो जो है, वह केवल संकेत है। धर्म-ग्रन्थों में जो लिखा है, वह तो बस चन्द्रमा की ओर इशारा करती हुई अंगुली भर है। जो इस अंगुली को चन्द्रमा समझने की भूल करता है, वह अंगुली को तो थाम लेता है, पर चन्द्रमा को हमेशा के लिए खो देता है।
  
🔶 शास्त्रों की ही भाँति सम्प्रदाय भी है। धर्म का तत्त्व इन सम्प्रदायों में भी नहीं है। सम्प्रदाय तो संगठन है। ये सुव्यवस्थित रीति से केवल अपने मत का प्रचार करते हैं। बहुत हुआ तो धर्म की ओर रुचि पैदा करते हैं। अधिक से अधिक उसकी ओर उन्मुख कर देते हैं। धर्म का तत्त्व तो निज की अत्यन्त निजता में है। उसके लिए स्वयं के बाहर नहीं, भीतर चलना आवश्यक है।
  
🔷 धर्म का तत्त्व तो स्वयं की श्वास-श्वास में है। बस उसे उघाड़ने की दृष्टि नहीं है। धर्म का तत्त्व स्वयं के रक्त की प्रत्येक बूंद में है। बस उसे खोजने का साहस और संकल्प नहीं है। धर्म का तत्त्व तो सूर्य की भांति स्पष्ट है, लेकिन उसे देखने के लिए आँख खोलने की हिम्मत तो जुटानी ही होगी।
  
🔶 धर्म का यही तत्त्व तो अपना सच्चा जीवन है। लेकिन इसकी अनुभूति तभी हो सकेगी, जब हम देह की कब्रों से बाहर निकल सकेंगे। दैहिक आसक्ति एवं भोग-विलास के आकर्षण से छुटकारा पा सकेंगे। यह परम सत्य है कि धर्म की यथार्थता जड़ता में नहीं चैतन्यता में है। इसलिए सोओ नहीं, जागो और चलो। परन्तु चलने की दिशा बाहर की ओर नहीं, अन्दर की ओर हो। अन्तर्गमन ही धर्म के तत्त्व को खोजने और पाने का राजमार्ग है।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 106

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔶 बात अनूठी है, सद्गुरू एवं सद्गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग की उपयोगिता क्या है? संसार पाने के लिए अथवा संसार से मुक्त होने के लिए। इस सत्य पर शिष्य को बार- बार विचार करना चाहिए। यह विचार न करने पर शिष्य के लिए सद्गुरू मिलन व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है। क्योंकि वह सद्गुरू प्राप्ति को भी संसार से जोड़कर देखता है और इसी मापदण्ड पर सद्गुरू की सत्यता का मापन करता है। ऐसा व्यक्ति बार- बार इसी को सोचता है कि सद्गुरू से मिलने के बाद उसे कितनी सांसारिक सफलताएँ या विफलताएँ हासिल हुई। जबकि सोचा यह जाना चाहिए कि सद्गुरू प्राप्ति के बाद अपना अन्तःकरण कितना अनासक्त एवं निष्काम हुआ।

🔷 कथा महाभारत की है और जगविदित है, परन्तु फिर भी एक बार पुनः मनन करने योग्य है। माता कुन्ती भगवान् कृष्ण की सगी बुआ थी। श्रीकृष्ण को उन्होंने भगवान् के रूप में जाना भी था। उसके बाद भी उनके ऊपर सम्पूर्ण जीवन भर एक के बाद एक नये कष्ट आते रहे। उनके विवाह के बाद राजा पाण्डु को शाप मिला और वे अपने पति के वियोग, सखी एवं बहन जैसी माद्री के वियोग की कथा से उनके जीवन कार्यों का प्रारम्भ हुआ। बहुत दिनों तक वे पाँचो पाण्डवों के साथ वन का दुःख झेलती रही। अन्त में महात्मा भीष्म के बुलाने पर उनका हस्तिनापुर आना हुआ।

🔶 और यहीं से आरम्भ हुई कौरवों के कुचक्रों की शुरूआत। साथ ही जगद्गुरू कृष्ण का साहचर्य भी रहा। लाक्षागृह- वरणावत का अग्रिकाण्ड फिर उससे बच निकलना। बाद में पाण्डवों का द्रोपदी से विवाह, परन्तु साथ ही राज्य के बँटवारे में पुनः छल और पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ का बीहड़ वन दिया जाना, जिसे उन्होंने अपने बल और कौशल से इन्द्रप्रस्थ के रूप में सँवारा। पुनः कौरवों की ईर्ष्या और जुए के कुटिल खेल का प्रारम्भ। इसमें द्रोपदी का अपमान और पाण्डवों का पुनः वनवास।

🔷 वन में बाहर वर्षों तक निरन्तर कष्टों को सहन करना, फिर एक साल के अज्ञातवास में छिपे रहना। इसके बाद प्रारम्भ हुआ महाभारत का महासंग्राम। और इसके बाद कुन्ती का पुनः वनगमन और वहाँ उनकी मृत्यु। इतनी दुःसह व्यथा सहने वाली कुन्ती से जब श्रीकृष्ण ने पूछा- बुआ तुम्हें क्या वरदान चाहिए, तो उन्होंने बड़ी भक्ति से कहा- हे केशव! मैं दुःखों का वरदान चाहती हूँ।

🔶 चकित कृष्ण ने उनसे जानना चाहा -- इतने दुःखों की चाहत क्यूँ है? तो वे बोली- हे केशव! जीवन के दुःखों में तुम्हारी याद बहुत आती है। और हे भक्तवत्सल प्रभु! मैं तुम्हें कभी नहीं भूलना चाहती। सो हे जनार्दन! वे दुःख बहुत अच्छे लगते हैं, जो मुझे तुम्हारी याद दिलाते हैं। बस यही सच्चे शिष्य का स्वर है, जो वह गुरू से कहता है, उनसे माँगता है। जो इस तत्त्व को, सत्य को जानता है- वही शिष्य है और उसी ने गुरूगीता के मर्म को जाना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

शनिवार, 5 मई 2018

👉 भगवान बुद्ध

🔷 भगवान् बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्म चर्चा का लाभ ले रहा था।

🔶 तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-वत्स! उठो, यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिये योग्य आसन का प्रबन्ध करो।

🔷 अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी हैं।

🔶 गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हंसे और बोले- तात! जाति-जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 May 2018


👉 Humanity: Our Precious Heritage – Part 2

🔷 There was an era during which ennobling feelings of helping others reigned. A person used to think, “How could I be of help to others? Whom should I offer my services to so as to uplift his condition?” This was considered a measure of superiority. People did not yearn as much for riches, glory, etc as they did for sacrificing themselves in the interest of the society and the world. They considered it honourable to give up life for ideals and whosoever got this opportunity considered it God’s grace bestowed upon them.

🔶 History contains several examples of sacrifices of highest stature. Pannadai sacrificed her son for the security of the royal throne. Sukanya had accidentally damaged the eyes of Rishi Chyavan. In repentance, she married him and shared all his hardships. Is such sacrifice less than ideal? Gandhari’s husband Dhritrashtra was blind; she could not bear the difficulties he was going through due to his blindness. Hence she voluntarily chose blindness by covering her eyes with a strip of cloth. Can anyone forget this piece of history? Such glorious examples of unbelievable sacrifices have been the backbone of the Hindu culture. It is the reason why India’s fame radiates even today like a brilliant constellation in the sky.

📖 Akhand Jyoti Jan 2001

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

🔷 प्रज्ञा परिवार  सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों, सैनिकों का स्तर ऊँचा होना चाहिए। ऐसा ऊँचा इतना अनुशासित कि उसके कृ र्तृत्व को देखकर अनेक की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण, पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया—वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को संपन्न करने के लिए कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए। लोभ, मोह और अंहकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिए। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकें गे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

🔶 दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के संदेश को और भी व्यापक बनाया जाए। इसके लिए जन-जन से संपर्क  साधा जाए। घर-घर अलख जगाया जाए। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाए। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़ें उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जाएँ। भले ही वे जन्मदिन मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन संपन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती है और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिए जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके।
  
🔷 जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिए इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊँचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिए। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसे चरित्र भी चाहिए और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1985 पृष्ठ 65   

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे।

🔷 बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में भगवान् भोलेनाथ ने जगन्माता से ऐसे सिद्ध साधक के विषय में कहा था कि ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्त्व को देखता है। वह इस सत्य का अनुभव करता है कि आत्म तत्त्व ही श्रेष्ठ है। श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद वह शिष्य ,साधक सभी आसक्तियों से रहित, एकाकी, निःस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है। उसे अभीष्ट मिले या फिर न मिले, उसे ज्यादा मिले या कम मिले, इस चिन्ता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से
रहित, संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है। उसे यह सब मिलता है- गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करने से।

🔶 इस गुरू मार्ग की महिमा को बताते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

उपदेशः तथा देवि गुरूमार्गेण मुक्तिदः। गुरूभक्तिस्तथा ध्यानं सकलं तव कीर्तितम्॥ १२८॥
अनेन यदभवेत् कार्य तद्वदामि महामते। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥ १२९॥
लौकिकात्कर्मणो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवम्। ज्ञानी तू भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म यत्कृतम्॥ १३०॥

🔷 हे देवि! उपदेशित गुरू मार्ग मुक्ति दायक है। गुरू की भक्ति, गुरू का ध्यान और वह सब जो आपसे कहा गया है॥ १२८॥ इस सबका उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए॥ १२९॥ जो ज्ञानहीन लोग इन सबका लौकिक कामनाओं के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है, परन्तु जो ज्ञानी अपने कर्म का निष्काम भाव से प्रतिपादन करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं॥ १३०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

शुक्रवार, 4 मई 2018

👉 इंसान और भगवान

🔶 एक बार एक गरीब किसान एक अमीर साहूकार के पास आया, और उससे बोला कि आप अपना एक खेत एक साल के लिए मुझे उधार दे दीजिये। मैं उसमें मेहनत से काम करुँगा, और अपने खाने के लिए अन्न उगाऊंगा।

🔷 अमीर साहूकार बहुत ही दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को अपना एक खेत दे दिया, और उसकी मदद के लिए 5 व्यक्ति भी दिए। साहूकार ने किसान से कहा कि मैं तुम्हारी सहायता के लिए ये 5 व्यक्ति दे रहा हूँ, तुम इनकी सहायता लेकर खेती करोगे तो तुम्हे खेती करने में आसानी होगी।

🔶 साहूकार की बात सुनकर किसान उन 5 लोगों को अपने साथ लेकर चला गया, और उन्हें ले जाकर खेत पर काम पर लगा दिया। किसान ने सोचा कि ये 5 लोग खेत में काम कर तो रहे हैं, फिर मैं क्यों करू? अब तो किसान दिन रात बस सपने ही देखता रहता, कि खेत में जो अन्न उगेगा उससे क्या क्या करेगा, और उधर वे पाँचो व्यक्ति अपनी मर्जी से खेत में काम करते। जब मन करता फसल को पानी देते, और अगर उनका मन नहीं करता, तो कई दिनों तक फसल सुखी खड़ी रहती।

🔷 जब फसल काटने का समय आया, तो किसान ने देखा कि खेत में खड़ी फसल बहुत ही ख़राब है, जितनी लागत उसने खेत में पानी और खाद डालने में लगा दी खेत में उतनी फसल भी खेत में नहीं उगी। किसान यह देखकर बहुत दुखी हुआ।

🔶 एक साल बाद साहूकार अपना खेत किसान से वापिस माँगने आया, तब किसान उसके सामने रोने लगा और बोला आपने मुझे जो 5 व्यक्ति दिए थे मैं उनसे सही तरीके से काम नहीं करवा पाया और मेरी सारी फसल बर्बाद हो गयी। आप मुझे एक साल का समय और दे दीजिये मैं इस बार अच्छे से काम करूँगा और आपका खेत आपको लौटा दूँगा।

🔷 किसान की बात सुनकर साहूकार ने कहा- बेटा यह मौका बार बार नहीं मिलता, मैं अब तुम्हें अपना खेत नहीं दे सकता। यह कहकर साहूकार वहाँ से चला गया, और किसान रोता ही रह गया।

🔶 मित्रो अब आप यहाँ ध्यान दीजिये

🔷 वह दयालु साहूकार “भगवान” हैं। गरीब किसान “हम सभी व्यक्ति” हैं। साहूकार से किसान ने जो खेत उधार लिया था, वह हमारा “शरीर” है।

🔶 साहूकार ने किसान की मदद के लिए जो पांच किसान दिए थे, वो है हमारी पाँचो इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन”

🔷 भगवान ने हमें यह शरीर अच्छे कर्मो को करने के लिए दिया है, और इसके लिए उन्होंने हमें 5 इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन” दी है। इन इन्द्रियों को अपने वश में रखकर ही हम अच्छे काम कर सकते हैं ताकि जब भगवान हमसे अपना दिया शरीर वापिस मांगने आये तो हमें रोना ना आये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 May 2018


👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 Humanity: Our Precious Heritage

🔶 When the whole world was following the policy of selfishness, whereby a person would accumulate in excess and deprive others, saints in India mused, what was the uniqueness of man in practising this dictum? Everybody is desirous of indulging in pleasures. Everyone is willing to commit unethical deeds for earning money. The society is tormented by people’s habit of loafing around in idleness. Who does not crave to eat the best food and wear best clothes? All these are the features of an ordinary man.

🔷 Many of these tendencies are found in animals too, and if man also wallows in them, what is his speciality? Such an attitude does not make the right use of his knowledge, intellect and wisdom. In spite of being the possessor of extraordinary strength and abilities, if man leads a contemptible life, then where does lie the meaningfulness of the human life? Superior possessions should be used for superior deeds – only Indians have apprehended this fact. For this very reason alone our authority and eminence have subsisted in the world.

🔶 The problem of bread and butter could not be more acute for man than the need to understand the aim of life. Even an atheist will accept that human life is a rare opportunity. It would be unwise to waste it like ordinary people do. Going in an opposite direction of the routine, the purpose of human life can be ascertained. The outcome of living life casually, pain and suffering, is evident to us all. Therefore the saints asked: why not go in an opposite direction and discover some new facts? With this ideology a new philosophy emerged in India. It inspired the birth of sadhana. The achievements (siddhis) of sadhana were majestic and great.

🔷 The dispersal of even a fraction of these achievements resulted in heavenly happiness in the world. The name of these achievements was “humanity”, meaning practising the dictum “I do not want it, you take it. Nothing belongs to me; everything belongs to the Almighty God” (i.e. selflessness and sacrifice). After thorough sadhanas and the resulting experiences, saints concluded that everyone is entitled to God’s gifts, so they should be distributed to all. By pursuing this guideline, the development of happiness can take place and the world can be kept secure. Save this, there is no other way to establish peace in man’s life.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए?

🔶 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए, इसकी जानकारी दूरदर्शी विवेकवानों को समय-समय पर कराई जाती रही है और कहा जाता रहा है कि दुर्मति ही दुर्गति का कारण है। चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है।

🔷 युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं। इसके लिए जैसे-जैसे लोभ, मोह के बन्धन शिथिल होते जाँय, समय एवं साधन दान को आज की परम आवश्यकता मानते हुए हर परिजन को युग धर्म के निर्वाह में जुट जाना चाहिए।

🔶 पतन निवारण की इस सेवा के निमित्त दो ही उपाय हैं- (1) स्वाध्याय (2) सत्संग।  इन्हीं दो के सहारे सद्ज्ञान का विस्तार हो सकता है और युग तमिस्रा से छुटकारा मिल सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1985 62  

👉 गुरुगीता (भाग 101)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों की साधना से सद्गुरू का सामीप्य एवं सद्गुरू की कृपा दोनों ही सम्भव है। कई बार नवीन साधक के मन में जिज्ञासा होती है कि कहाँ ढुँढे अपने सद्गुरू को? कैसे मिले सद्गुरू? किसके चरणों में करें अपने समर्पण की साधना? कुछ अक्षरों में गुँथे इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना आसान नहीं लगता, क्योंकि व्यावहारिक अनुभव यही कहता है कि सद्गुरू की प्राप्ति आसान नहीं होती। प्रायः यही होता हैं कि सद्गुरू मिलते ही नहीं और यदि किसी संयोगवश मिल भी गये, तो उनकी सद्गुरू के रूप में पहचान आसान नहीं होती। यह एक ऐसी जटिल पहेली है, जिसे हल करने में लोग अपना सम्पूर्ण जीवन गँवा देते हैं, फिर भी समस्या ज्यों की त्यों रहती है।

🔷 इस समस्या के समाधान में एक अनुभव कथा कहने का मन है। यह कथा एक किशोरवय के साधक की है, जो अपने सद्गुरू को ढूँढ रहा था। अपनी इस खोज को उसने अपनी साधना बना लिया। उसकी इस साधना के तीन पहलू रहे- पहला का आस्थापूर्वक पाठ। दूसरा- गुरू रूप में भगवान् शिव का वरण एवं तीसरा- गुरूमंत्र के रूप में गायत्री मंत्र का जप। जो सतत साधना करते हैं, जिनका शास्त्र ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन है- वे इस सत्य को भलीभाँति जानते हैं कि भगवान् शिव अपने दक्षिणामूर्ति स्वरूप में सभी प्राणियों के गुरू हैं। दस रूप में वे सभी को सद्गुरू प्राप्ति का वरदान देते हैं।

🔶 कोई भी साधक यदि उपरोक्त साधना ठीक से करता रहे, तो एक दिन भगवान् शिव ही उसे उसके सद्गुरू का परिचय देते हैं और उनकी प्राप्ति कराते हैं। अनुभूति कथा के इस किशोर साधक को भी अपनी यह साधना निरन्तर आठ वर्षों तक करनी पड़ी। अन्त में एक दिन स्वयं भगवान् सदाशिव ने उसके स्वप्न में आकर कहा- देख, मुझे पहचान मैं हूँ तेरा सद्गुरू। और इस स्वप्न में ही भगवान् शिव का दिव्य कलेवर उसके सद्गुरू के रूप में बदल गया। हाँ यह बात अलग है, इस स्वप्न परिचय को साकार होने में उसे दो वर्षों की साधना और करनी पड़ी। इन दो वर्षों में परिस्थिति चक्र में आश्चर्यजनक मोड़ आये, उसे उसके सद्गुरू का सान्निध्य भी मिला और कृपा भी। यह सत्य कथा किसी भी साधक के जीवन का सच बन सकती है। बस, प्रयास हो भावभरे मन से साधना की। साधना बनी रहे, तो सिद्धि मिलते, सिद्ध बनते देर नहीं लगती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 154

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...