रविवार, 15 दिसंबर 2019
👉 दिवमारूहत तपसा तपस्वी
व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक बन्धन और सामाजिक संवेदन−तीनों अध्याय एक−एक कर दृश्यपटल पर घूमते जाते हैं। महाश्रमण महावीर के धर्मोपदेश उस प्रकाश की तरह हैं जिसमें इन तीनों के उज्ज्वल पृष्ठ ही नहीं कषाय−कल्मषों के कथानक भी एक के ऊपर एक उभरते चले आते हैं। मेघ अनुभव करते हैं कि तृष्णाओं, वासनाओं और अहंताओं के जाल में जकड़ा जीवन नष्ट होता चला जा रहा है, पर लिप्साएँ शान्त नहीं हो पा रही वरन् और अधिक बढ़ती हैं उनकी पूर्ति के लिये और अधिक अनैतिक कृत्य पापों की गठरी बढ़ रही है काल दौड़ा आ रहा है जहाँ से उपभोग का अन्त हो जायेगा शरीर को नाश कर देने वाला क्षण अब आया कि तब आया तब फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हाथ कुछ लगने वाला नहीं। विषय वासनाओं के कीचड़ में फँसे जीवन को विवेक−ज्योति से देखने पर निज का जीवन ही अत्यधिक घृणास्पद लगा। मेघ ने उधर से दृष्टि फेर ली।
काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वंद्व, घृणा तिरष्कार अनैतिकता अवांछनीयतायें यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है। हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को आध्यात्मवादी होना चाहिये, उसके बिना लोक−जप सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिये।
निश्चय अटल हो गया। श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान् महावीर से मन्त्र दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गये?
विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की−सी ज्योति झलझलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं, साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वत्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक सम्पर्क के स्थान राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा व्यवस्था एक एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकांक्षाएं सिर पीटतीं और अहंकार बार−बार आकर खड़ा होकर कहता−ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा। मन और आत्मा का द्वन्द्व निरंतर चलते−चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे तात! मुझे तो साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।
तथागत मुस्कराये और बोले−तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता−यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी−वही स्वर्ग विजेता−उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।
मेघ की आंखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वंद्व, घृणा तिरष्कार अनैतिकता अवांछनीयतायें यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है। हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को आध्यात्मवादी होना चाहिये, उसके बिना लोक−जप सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिये।
निश्चय अटल हो गया। श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान् महावीर से मन्त्र दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गये?
विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की−सी ज्योति झलझलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं, साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वत्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक सम्पर्क के स्थान राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा व्यवस्था एक एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकांक्षाएं सिर पीटतीं और अहंकार बार−बार आकर खड़ा होकर कहता−ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा। मन और आत्मा का द्वन्द्व निरंतर चलते−चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे तात! मुझे तो साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।
तथागत मुस्कराये और बोले−तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता−यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी−वही स्वर्ग विजेता−उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।
मेघ की आंखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
👉 ज्ञान की प्यास
ज्ञान की प्यास हम सबमें है। अन्तस् में कुछ जल रहा है, जो शान्त होना चाहता है। इस शान्ति के लिए अनेकों कोशिशें की जाती हैं। इंसान कितनी ही दिशाओं में इसे खोजता है। शायद अनगिनत जन्मों से यह खोज चल रही है। किसी मायामृग की खोज में उसका चित्त भटकता रहता है। लेकिन हर कदम पर उसे निराशा के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं आता। कोई राह उसे मंजिल पर पहुँचाती हुई प्रतीत नहीं होती। गति होती है, पर गन्तव्य नजर नहीं आता। क्या जिन्दगी के ये टेढ़े-मेढ़े रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते?
इस सवाल के उत्तर में तर्क पूर्ण व्याख्याएँ प्रस्तुत नहीं करनी हैं। जीवन की गहन-गहराइयों में उतरकर ज्ञान का शीतल स्रोत खोजना है, समाधान के सुरीले स्वर सुनने हैं। ज्ञान वाक् जाल में नहीं है। तर्कपूर्ण शब्दों में भी इसे नहीं पाया जा सकता। सच तो यह है कि बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके कुँहासे में वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि मौन हो तो अनुभूति बोलती है। विचार चुप हो तो विवेक जगता है।
सच तो यह है कि जिन्दगी के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर बौद्धिक तर्कों से नहीं मिलते। बौद्धिक तर्कों में ज्ञान का आभास तो है, पर ज्ञान नहीं है। ज्ञान के लिए तो ऋषिवाणी कहती है-‘न प्रवचनेन, न मेधया, न बहुना श्रुतेन’ यानि कि न प्रवचन से, न मेधा से और न बहुत सुनने से। ज्ञान तो ‘अनन्तं निर्विकल्पं’ है। शान्त और शून्य होने पर प्रकट होता है। तभी समस्याएँ गिर जाती हैं, प्रश्न पेड़ के सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं।
समाधान समाधि के शून्य से आता है। ज्ञान की इस किरण के फूटते ही चेतना के एक नये आयाम पर जीवन का प्रवेश हो जाता है। यही भाव दशा तो समाधि है। इसके लिए पूछें और शान्त हो जायें। गहरी शून्यता में डूबें। समाधि में समाधान को आने दें, फलने दें। चित्त की इस निस्तरंग-निर्विकल्प स्थिति में उसका दर्शन करें-जो है, सो मैं हूँ। स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती। स्वयं को खोजे बिना अन्तस् की जलन नहीं घटती। स्वयं को जानना ज्ञान है, बाकी सब जानकारी है। चित्त जिस क्षण भटकन भरी बौद्धिकता को छोड़कर चुप और थिर हो जाता है, उसी क्षण ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ के द्वार खुल जाते हैं। दिशा-शून्य चेतना प्रभु में विलीन हो जाती है। और ज्ञान की प्यास का अन्त केवल प्रभु मिलन में है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४२
इस सवाल के उत्तर में तर्क पूर्ण व्याख्याएँ प्रस्तुत नहीं करनी हैं। जीवन की गहन-गहराइयों में उतरकर ज्ञान का शीतल स्रोत खोजना है, समाधान के सुरीले स्वर सुनने हैं। ज्ञान वाक् जाल में नहीं है। तर्कपूर्ण शब्दों में भी इसे नहीं पाया जा सकता। सच तो यह है कि बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके कुँहासे में वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि मौन हो तो अनुभूति बोलती है। विचार चुप हो तो विवेक जगता है।
सच तो यह है कि जिन्दगी के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर बौद्धिक तर्कों से नहीं मिलते। बौद्धिक तर्कों में ज्ञान का आभास तो है, पर ज्ञान नहीं है। ज्ञान के लिए तो ऋषिवाणी कहती है-‘न प्रवचनेन, न मेधया, न बहुना श्रुतेन’ यानि कि न प्रवचन से, न मेधा से और न बहुत सुनने से। ज्ञान तो ‘अनन्तं निर्विकल्पं’ है। शान्त और शून्य होने पर प्रकट होता है। तभी समस्याएँ गिर जाती हैं, प्रश्न पेड़ के सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं।
समाधान समाधि के शून्य से आता है। ज्ञान की इस किरण के फूटते ही चेतना के एक नये आयाम पर जीवन का प्रवेश हो जाता है। यही भाव दशा तो समाधि है। इसके लिए पूछें और शान्त हो जायें। गहरी शून्यता में डूबें। समाधि में समाधान को आने दें, फलने दें। चित्त की इस निस्तरंग-निर्विकल्प स्थिति में उसका दर्शन करें-जो है, सो मैं हूँ। स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती। स्वयं को खोजे बिना अन्तस् की जलन नहीं घटती। स्वयं को जानना ज्ञान है, बाकी सब जानकारी है। चित्त जिस क्षण भटकन भरी बौद्धिकता को छोड़कर चुप और थिर हो जाता है, उसी क्षण ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ के द्वार खुल जाते हैं। दिशा-शून्य चेतना प्रभु में विलीन हो जाती है। और ज्ञान की प्यास का अन्त केवल प्रभु मिलन में है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४२
👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 5)
Q.5. What are the basic reasons for the anti-women stance of some sects in India?
Ans. During the medieval period there occurred overall degeneration and corruption in Indian society. Resources and power were usurped by a handful of corrupt rulers who ruthlessly exploited the poor and the downtrodden to fulfil their coffers and maintain a high style of living. It was the period of high tide of corrupt practices. Bonded labour, keeping concubines, abduction, feudal wars, mass-murders and so many other vices took deep roots in the society. The scholars dependent on the feudal lords were force, or to write and insert spurious verses in the ancient scriptures to please their masters.
Women, too, could not escape this oppression. To exploit their youth, physical and intellectual capabilities, the social codes of conducts were modified and she was systematically brainwashed and subdued. The rulers, along with the so-called scholars, gave a religious justification for the traditions established by them. The women and the “untouchables” in India thus continuously suffered from dual oppression, from within the country and from the foreign invaders. Woman was made to accept the ‘virtues’ of ‘purdah’ (veil) and submissively follow the just and unjust demands of her ‘God-husband’. She was even compelled to commit suicide by forced immolation on the funeral pyre of her dead husband (the ancient tradition of sati). Depriving a woman from worship of Gayatri was also part of this conspiracy.
Ancient Indian history and scriptural disciplines provide ample evidence to show that the religion in India did not permit any discrimination whatsoever between the rights of men and women. On the contrary, woman was always considered superior to man and worthy of reverence. In ancient times, the Rishikas (nuns) participated as equal with men in all religious rituals. When Gayatri herself has been symbolised as a female deity, what is the logic in denial of right of Gayatri worship to a woman?
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 33
Ans. During the medieval period there occurred overall degeneration and corruption in Indian society. Resources and power were usurped by a handful of corrupt rulers who ruthlessly exploited the poor and the downtrodden to fulfil their coffers and maintain a high style of living. It was the period of high tide of corrupt practices. Bonded labour, keeping concubines, abduction, feudal wars, mass-murders and so many other vices took deep roots in the society. The scholars dependent on the feudal lords were force, or to write and insert spurious verses in the ancient scriptures to please their masters.
Women, too, could not escape this oppression. To exploit their youth, physical and intellectual capabilities, the social codes of conducts were modified and she was systematically brainwashed and subdued. The rulers, along with the so-called scholars, gave a religious justification for the traditions established by them. The women and the “untouchables” in India thus continuously suffered from dual oppression, from within the country and from the foreign invaders. Woman was made to accept the ‘virtues’ of ‘purdah’ (veil) and submissively follow the just and unjust demands of her ‘God-husband’. She was even compelled to commit suicide by forced immolation on the funeral pyre of her dead husband (the ancient tradition of sati). Depriving a woman from worship of Gayatri was also part of this conspiracy.
Ancient Indian history and scriptural disciplines provide ample evidence to show that the religion in India did not permit any discrimination whatsoever between the rights of men and women. On the contrary, woman was always considered superior to man and worthy of reverence. In ancient times, the Rishikas (nuns) participated as equal with men in all religious rituals. When Gayatri herself has been symbolised as a female deity, what is the logic in denial of right of Gayatri worship to a woman?
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 33
शनिवार, 14 दिसंबर 2019
👉 बड़ा आदमी
बाहर बारिश हो रही थी, और अन्दर क्लास चल रही थी.
तभी टीचर ने बच्चों से पूछा - अगर तुम सभी को 100-100 रुपया दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे?
किसी ने कहा - मैं वीडियो गेम खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी..
तो, किसी ने कहा - मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी..
एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था
टीचर ने उससे पुछा - तुम
क्या सोच रहे हो, तुम क्या खरीदोगे?
बच्चा बोला -टीचर जी मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा !
टीचर ने पूछा - तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना ?
बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया !
बच्चे ने कहा -- मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है
मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है, और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ, ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ बड़ा आदमी बन सकूँ, और माँ को सारे सुख दे सकूँ.!
टीचर -- बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है! ये 100 रूपये मेरे वादे के अनुसार और, ये 100 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना और, मेरी इच्छा है, तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं !
20 वर्ष बाद..........
बाहर बारिश हो रही है, और अंदर क्लास चल रही है !
अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वाली गाड़ी आकर रूकती है स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं!
स्कूल में सन्नाटा छा जाता हैं!
मगर ये क्या?
जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैं, और कहते हैं -- सर मैं .... उधार के 100 रूपये लौटाने आया हूँ!
पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध!
वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है, और रो पड़ता हैं!
तभी टीचर ने बच्चों से पूछा - अगर तुम सभी को 100-100 रुपया दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे?
किसी ने कहा - मैं वीडियो गेम खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी..
तो, किसी ने कहा - मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी..
एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था
टीचर ने उससे पुछा - तुम
क्या सोच रहे हो, तुम क्या खरीदोगे?
बच्चा बोला -टीचर जी मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा !
टीचर ने पूछा - तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना ?
बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया !
बच्चे ने कहा -- मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है
मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है, और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ, ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ बड़ा आदमी बन सकूँ, और माँ को सारे सुख दे सकूँ.!
टीचर -- बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है! ये 100 रूपये मेरे वादे के अनुसार और, ये 100 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना और, मेरी इच्छा है, तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं !
20 वर्ष बाद..........
बाहर बारिश हो रही है, और अंदर क्लास चल रही है !
अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वाली गाड़ी आकर रूकती है स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं!
स्कूल में सन्नाटा छा जाता हैं!
मगर ये क्या?
जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैं, और कहते हैं -- सर मैं .... उधार के 100 रूपये लौटाने आया हूँ!
पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध!
वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है, और रो पड़ता हैं!
👉 आदर्शवादी साहसिकता का उपयुक्त अवसर
मनुष्य अनुचित सोचते और अकर्म करते हैं तो सन्तुलन बिगड़ता है। व्यक्ति दुःख पाता है और समाज संकटग्रस्त होता है। स्थिति उसी प्रकार चलती रहे तो महाविनाश के गर्त में गिरना पड़ेगा। मानवी प्रयास जब अवांछनीयता को रोकने में उपेक्षा बरतते हैं अथवा अपने को असमर्थ समझते हैं तो महाकाल को स्थिति अपने हाथ में लेनी पड़ती है। सृष्टा को अपना यह विश्व उद्यान दुष्प्रवृत्तियों के कुचक्र में फँसकर नष्ट हो जाने देना स्वीकार नहीं। वे भूलोक की अपनी अनुपम कलाकृति को विनाश के गर्त में गिरने देता नहीं चाहते। अस्तु समय रहते सन्तुलन बनाने वाली शक्तियों का अवतरण होता है। वे जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में अपनी प्रकाश किरणें फेंकती हैं। उन्हें कठपुतली जैसा माध्यम बनाकर परिवर्तन का तूफान उत्पन्न करती है।
स्थिति की विषमता को सम्भालने के लिए भगवान इसी रूप में अवतार लेते हैं। युगान्तर चेतना के रूप में उसका अवतरण होता है। उसे कार्यान्वित करने में जो अग्रिम पंक्ति में खड़े होते हैं वे श्रेय पाते हैं। किन्तु उसमें योगदान असंख्यों का होता है। राम के रीछ बानर−कृष्ण के ग्वाल−बाल, बुद्ध के परिव्राजक−गान्धी के सत्याग्रही अवतार भूमिका के उपकरण कहे जा सकते हैं। श्रेय किसको मिला यह संयोग की बात है। परिवर्तन विचारधारा के तूफानी प्रवाह के रूप में आता है और असंख्यों को अपने प्रभाव से उद्वेलित करता है। जागृत आत्माओं को ऐसे अवसरों पर विशेष भूमिका निभानी पड़ती है। जो युग धर्म को समझते हैं−युग देवता का आह्वान सुनते हैं वे धन्य बनते हैं। उन दिनों जो असमंजस में पड़े रहते हैं उन्हें समय को न पहचान सकने की सदा पश्चात्ताप की आत्म प्रताड़ना ही सहन करनी पड़ती हैं।
अरुणोदय का पूर्वाभास पाकर मुर्गा पहले बाँग लगाता है, इस जागरुकता ने उसे प्रख्यात कर दिया। देर से तो सभी पक्षी जगते हैं, पर वे वैसी ख्याति नहीं पाते। उगते सूर्य को नमस्कार किया जाता है पीछे तो वह दिन भर ही बना सकता है। शुक्ल पक्ष में सर्वप्रथम निकलने वाले दौज के चन्द्रमा का दर्शन करने के लिए सब आतुर रहते हैं। पीछे तो वह महीने भर घटता बढ़ता बना ही रहता है। जन्म का पहला दिन स्मरणीय रहता है ऐसे तो जिन्दगी में हजारों दिन आते और चले जाते हैं। पर्वत चोटियों के बारे में प्रथम शोध करने वालों के नाम पर एवरेस्ट आदि शिखरों के नाम रखे गये हैं। नेपच्यून, प्लूटो आदि के नाम भी उनके शोधकर्त्ताओं के नाम पर रखे गये हैं। पीछे तो उनके शोध करने वाले अनेक पैदा होते रहे हैं। फोटो में साफ तस्वीर उनकी आती है जो ग्रुप की अगली पंक्ति में खड़े होते हैं। साहस उन्हीं का सराहनीय है जो दूसरों की प्रतीक्षा न करके अपनी साहसिकता का परिचय देते हैं।
युग परिवर्तन अगले दिनों की सुनिश्चित सच्चाई है। ईश्वरीय प्रयोजन पूरे होने हैं। गीता में भगवान अर्जुन को यही समझाते हैं कि यह कौरव दल तो मरा रखा है। तेरे पीछे हटने पर भी वह दूसरी प्रकार से मरेगा। सुनिश्चित सफलता के श्रेय को उपलब्ध करना ही बुद्धिमत्ता है। युग देवता की पुकार सुनने, माँग पूरी करने और प्रेरणा का अनुसरण करने के लिए तो देर सवेर में अभी को हाथ उठाने और पैर बढ़ाने पड़ेंगे। सराहना उनकी है जो समय रहते चेतते हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में थोड़े−थोड़े दिन के लिए जेल गये लोग शासन सम्भालते और पेन्शन पाते देखे जा सकते हैं। जो उस समय चूक गये उनके लिए वह संयोग कभी भी आ नहीं सका। जागृत आत्माओं को युग देवता ने पुकारा है और कहा है वे अग्रिम पंक्ति में खड़े हों। हनुमान, अंगद की−भीम, अर्जुन की भूमिका सम्पन्न करें। जो स्वीकार करेंगे वे न भौतिक दृष्टि से घाटे में रहेंगे न आत्मिक दृष्टि से। जो असमंजस में पड़े रहेंगे उन्हें पश्चात्ताप ही पल्ले बाँध कर प्रयास करना पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 40
स्थिति की विषमता को सम्भालने के लिए भगवान इसी रूप में अवतार लेते हैं। युगान्तर चेतना के रूप में उसका अवतरण होता है। उसे कार्यान्वित करने में जो अग्रिम पंक्ति में खड़े होते हैं वे श्रेय पाते हैं। किन्तु उसमें योगदान असंख्यों का होता है। राम के रीछ बानर−कृष्ण के ग्वाल−बाल, बुद्ध के परिव्राजक−गान्धी के सत्याग्रही अवतार भूमिका के उपकरण कहे जा सकते हैं। श्रेय किसको मिला यह संयोग की बात है। परिवर्तन विचारधारा के तूफानी प्रवाह के रूप में आता है और असंख्यों को अपने प्रभाव से उद्वेलित करता है। जागृत आत्माओं को ऐसे अवसरों पर विशेष भूमिका निभानी पड़ती है। जो युग धर्म को समझते हैं−युग देवता का आह्वान सुनते हैं वे धन्य बनते हैं। उन दिनों जो असमंजस में पड़े रहते हैं उन्हें समय को न पहचान सकने की सदा पश्चात्ताप की आत्म प्रताड़ना ही सहन करनी पड़ती हैं।
अरुणोदय का पूर्वाभास पाकर मुर्गा पहले बाँग लगाता है, इस जागरुकता ने उसे प्रख्यात कर दिया। देर से तो सभी पक्षी जगते हैं, पर वे वैसी ख्याति नहीं पाते। उगते सूर्य को नमस्कार किया जाता है पीछे तो वह दिन भर ही बना सकता है। शुक्ल पक्ष में सर्वप्रथम निकलने वाले दौज के चन्द्रमा का दर्शन करने के लिए सब आतुर रहते हैं। पीछे तो वह महीने भर घटता बढ़ता बना ही रहता है। जन्म का पहला दिन स्मरणीय रहता है ऐसे तो जिन्दगी में हजारों दिन आते और चले जाते हैं। पर्वत चोटियों के बारे में प्रथम शोध करने वालों के नाम पर एवरेस्ट आदि शिखरों के नाम रखे गये हैं। नेपच्यून, प्लूटो आदि के नाम भी उनके शोधकर्त्ताओं के नाम पर रखे गये हैं। पीछे तो उनके शोध करने वाले अनेक पैदा होते रहे हैं। फोटो में साफ तस्वीर उनकी आती है जो ग्रुप की अगली पंक्ति में खड़े होते हैं। साहस उन्हीं का सराहनीय है जो दूसरों की प्रतीक्षा न करके अपनी साहसिकता का परिचय देते हैं।
युग परिवर्तन अगले दिनों की सुनिश्चित सच्चाई है। ईश्वरीय प्रयोजन पूरे होने हैं। गीता में भगवान अर्जुन को यही समझाते हैं कि यह कौरव दल तो मरा रखा है। तेरे पीछे हटने पर भी वह दूसरी प्रकार से मरेगा। सुनिश्चित सफलता के श्रेय को उपलब्ध करना ही बुद्धिमत्ता है। युग देवता की पुकार सुनने, माँग पूरी करने और प्रेरणा का अनुसरण करने के लिए तो देर सवेर में अभी को हाथ उठाने और पैर बढ़ाने पड़ेंगे। सराहना उनकी है जो समय रहते चेतते हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में थोड़े−थोड़े दिन के लिए जेल गये लोग शासन सम्भालते और पेन्शन पाते देखे जा सकते हैं। जो उस समय चूक गये उनके लिए वह संयोग कभी भी आ नहीं सका। जागृत आत्माओं को युग देवता ने पुकारा है और कहा है वे अग्रिम पंक्ति में खड़े हों। हनुमान, अंगद की−भीम, अर्जुन की भूमिका सम्पन्न करें। जो स्वीकार करेंगे वे न भौतिक दृष्टि से घाटे में रहेंगे न आत्मिक दृष्टि से। जो असमंजस में पड़े रहेंगे उन्हें पश्चात्ताप ही पल्ले बाँध कर प्रयास करना पड़ेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 40
👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 4)
Q.4. Are women entitled to take up Gayatri Sadhana?
Ans. For countering the oft-repeated arguments against women’s right to Gayatri worship, let us try to understand the basic principles of ancient Indian culture. It propounds a global religion, for the entire humanity. Nowhere does it support the illogical inequalities based on differentiation of caste, sex etc. The code of conduct in Hindu religion assigns equality of status to all human beings in all respects with unity and compassion as its basic tenets. Thus, the abridgement of natural human civil and religious rights of women is, therefore, not in conformity with authentic Indian spiritual tradition. On the contrary, Hindu culture regards the female of human species as superior to its male counterpart. How could then the wise sages of India deprive the women of practice of Gayatri Sadhana? The spirit of Indian ethos is totally against any such discrimination. Gayatri is accessible to every individual of human species. Any thought or belief contrary to this concept is sheer nonsense and should not be given any importance.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 31
Ans. For countering the oft-repeated arguments against women’s right to Gayatri worship, let us try to understand the basic principles of ancient Indian culture. It propounds a global religion, for the entire humanity. Nowhere does it support the illogical inequalities based on differentiation of caste, sex etc. The code of conduct in Hindu religion assigns equality of status to all human beings in all respects with unity and compassion as its basic tenets. Thus, the abridgement of natural human civil and religious rights of women is, therefore, not in conformity with authentic Indian spiritual tradition. On the contrary, Hindu culture regards the female of human species as superior to its male counterpart. How could then the wise sages of India deprive the women of practice of Gayatri Sadhana? The spirit of Indian ethos is totally against any such discrimination. Gayatri is accessible to every individual of human species. Any thought or belief contrary to this concept is sheer nonsense and should not be given any importance.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 31
👉 मन ही मन भगवान से क्या बातें करें...क्या मांगे।
1. हे मेरे स्वामी! मेरी इच्छा कभी पूर्ण न हो सदैव आपकी ही इच्छा पूर्ण हो.क्योंकि मेरे लिए क्या सही है ये मुझसे बेहतर आप जानते हैं।
2. हे नाथ! मेरे मन, कर्म और वचन से कभी किसी को भी थोड़ा सा भी दुःख न पहुँचे यह कृपा बनाये रखे।
3. हे नाथ! मैं कभी न पाप करूँ, न होता देखूं सुनू और न ही कभी किसी के पाप का बखान करूँ।
4. हे नाथ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ।
5. हे नाथ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ।
6. हे नाथ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी दूसरों को सदैव सुख ही दिया करू।
7. हे नाथ! अगर कभी किसी कारणवश मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे तो उसी समय उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँग लू।
8. हे नाथ! आठो पहर रोम रोम से केवल आपके नाम का ही जप होता रहे।
9. हे नाथ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हो।
10. हे नाथ! हर एक परिस्थिति में मुझे आपके ही दर्शन हो।
2. हे नाथ! मेरे मन, कर्म और वचन से कभी किसी को भी थोड़ा सा भी दुःख न पहुँचे यह कृपा बनाये रखे।
3. हे नाथ! मैं कभी न पाप करूँ, न होता देखूं सुनू और न ही कभी किसी के पाप का बखान करूँ।
4. हे नाथ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ।
5. हे नाथ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ।
6. हे नाथ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी दूसरों को सदैव सुख ही दिया करू।
7. हे नाथ! अगर कभी किसी कारणवश मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे तो उसी समय उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँग लू।
8. हे नाथ! आठो पहर रोम रोम से केवल आपके नाम का ही जप होता रहे।
9. हे नाथ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हो।
10. हे नाथ! हर एक परिस्थिति में मुझे आपके ही दर्शन हो।
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
👉 अपना अपना भाग्य
एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोजन कर रहे थे, कि अचानक राजा ने बातों ही बातों मे अपनी तीनों पुत्रियो से कहा- एक बात बताओ, तुम तीनो अपने भाग्य से खाते-पीते हो या मेरे भाग्य से?"
दो बडी पुत्रियो ने कहा कि- "पिताजी हम आपके भाग्य से खाते हैं। यदि आप हमारे पिता महाराज न होते, तो हमें इतनी सुख-सुविधा व विभिन्न प्रकार के व्यंजन खाने को नसीब नहीं होते। ये सब आपके द्वारा अर्जित किया गया वैभव है, जिसे हम भोग रहे हैं।"
पुत्रियों के मुँह से यह सुन कर राजा को अपने आप पर बडा गर्व और खु:शी हो रही थी लेकिन राजा की सबसे छोटी पुत्री ने इसी प्रश्न के उत्तर में कहा कि- "पिताजी मैं आपके भाग्य से नहीं बल्कि अपने स्वयं के भाग्य से यह सब वैभव भोग रही हुँ।" छोटी पुत्री के मुँख से ये बात सुन राजा के अहंकार को बडी ठेस लगी। उसे गुस्सा भी आया और शोक भी हुआ क्योंकि उसे अपनी सबसे छोटी पुत्री से इस प्रकार के जवाब की आशा नहीं थी।
समय बीतता गया, लेकिन राजा अपनी सबसे छोटी पुत्री की वह बात भुला नहीं पाया और समय आने पर राजा ने अपनी दोनो बडी पुत्रियो की विवाह दो राजकुमारो से करवा दिया परन्तु सबसे छोटी पुत्री का विवाह क्रोध के कारण एक गरीब लक्कडहारे से कर दिया और विदाई देते समय उसे वह बात याद दिलाते हुए कहा कि- "यदि तुम अपने भाग्य से राज वैभव का सुख भोग रही थी, तो तुम्हें उस गरीब लकड़हारे के घर भी वही राज वैभव का सुख प्राप्त होगा, अन्यथा तुम्हें भी ये मानना पडे़गा कि तुम्हे आज तक जो राजवैभव का सुख मिला, वह तुम्हारे नहीं बल्कि मेरे भाग्य से मिला।"
चूंकि, लक्कडहारा बहुत ही गरीब था, इसलिए निश्चित ही राजकुमारी को राजवैभव वाला सुख तो प्राप्त नहीं हो रहा था। लक्कड़हारा दिन भर लकडी काटता और उन्हें बेच कर मुश्किल से ही अपना गुजारा कर पाता था। सो, राजकुमारी के दिन बडे ही कष्ट दायी बीत रहे थे लेकिन वह निश्चित थी, क्योंकि राजकुमारी यही सोचती कि यदि उसे मिलने वाले राजवैभव का सुख उसे उसके भाग्य से मिला था, तो निश्चित ही उसे वह सुख गरीब लक्कड़हारे के यहाँ भी मिलेगा।
एक दिन राजा ने अपनी सबसे छोटी पुत्री का हाल जानना चाहा तो उसने अपने कुछ सेवको को उसके घर भेजा और सेवको से कहलवाया कि राजकुमारी को किसी भी प्रकार की सहायता चाहिए तो वह अपने पिता को याद कर सकती है क्योंकि यदि उसका भाग्य अच्छा होता, तो वह भी किसी राजकुमार की पत्नि होती।
लेकिन राजकुमारी ने किसी भी प्रकार की सहायता लेने से मना कर दिया, जिससे महाराज को और भी ईर्ष्या हुई अपनी पुत्री से। क्राेध के कारण महाराज ने उस जंगल को ही निलाम करने का फैसला कर लिया जिस पर उस लक्कड़हारे का जीवन चल रहा था।
एक दिन लक्कडहारा बहुत ही चिंता मे अपने घर आया और अपना सिर पकड़ कर झोपडी के एक कोने मे बैठ गया। राजकुमारी ने अपने पति को चिंता में देखा तो चिंता का कारण पूछा और लक्कड़हारे ने अपनी चिंता बताते हुए कहा कि- "जिस जंगल में मैं लकडी काटता हुँ, वह कल निलाम हो रहा है और जंगल को खरीदने वाले को एक माह में सारा धन राजकोष में जमा करना होगा, पर जंगल के निलाम हो जाने के बाद मेरे पास कोई काम नही रहेगा, जिससे हम अपना गुजारा कर सके।"
चूंकि, राजकुमारी बहुत समझदार थी, सो उसने एक तरकीब लगाई और लक्कडहारे से कहा कि- "जब जंगल की बोली लगे, तब तुम एक काम करना, तुम हर बोली मे केवल एक रूपया बोली बढ़ा देना।"
दूसरे दिन लक्कड़हारा जंगल गया और नीलामी की बोली शुरू हुई और राजकुमारी के समझाए अनुसार जब भी बोली लगती, तो लक्कड़हारा हर बोली पर एक रूपया बढा कर बोली लगा देता। परिणामस्वरूप अन्त में लक्कड़हारे की बोली पर वह जंगल बिक गया लेकिन अब लक्कड़हारे को और भी ज्यादा चिंता हुई क्योंकि वह जंगल पांच लाख में लक्कड़हारे के नाम पर छूटा था जबकि लक्कड़हारे के पास रात्रि के भोजन की व्यवस्था हो सके, इतना पैसा भी नही था।
आखिर घोर चिंता में घिरा हुआ वह अपने घर पहुँचा और सारी बात अपनी पत्नि से कही। राजकुमारी ने कहा- "चिंता न करें आप, आप जिस जंगल में लकड़ी काटने जाते है वहाँ मैं भी आई थी एक दिन, जब आप भोजन करने के लिए घर नही आये थे और मैं आपके लिए भोजन लेकर आई थी। तब मैंने वहाँ देखा कि जिन लकडियों को आप काट रहे थे, वह तो चन्दन की थी। आप एक काम करें। आप उन लकड़ीयों को दूसरे राज्य के महाराज को बेंच दें। चुंकि एक माह में जंगल का सारा धन चुकाना है सो हम दोनों मेहनत करके उस जंगल की लकडि़या काटेंगे और साथ में नये पौधे भी लगाते जायेंगे और सारी लकड़ीया राजा-महाराजाओ को बेंच दिया करेंगे।"
लक्कड़हारे ने अपनी पत्नि से पूंछा कि "क्या महाराज को नही मालुम होगा कि उनके राज्य के जंगल में चन्दन का पेड़ भी है।"
राजकुमारी ने कहा- "मालुम है, परन्तु वह जंगल किस और है, यह नही मालुम है।"
लक्कड़हारे को अपनी पत्नि की बात समझ में आ गई और दोनो ने कड़ी मेहनत से चन्दन की लकड़ीयों को काटा और दूर-दराज के राजाओं को बेंच कर जंगल की सारी रकम एक माह में चुका दी और नये पौधों की खेप भी रूपवा दी ताकि उनका काम आगे भी चलता रहे।
धीरे-धीरे लक्कड़हारा और राजकुमारी धनवान हो गए। लक्कड़हारा और राजकुमारी ने अपना महल बनवाने की सोच एक-दूसरे से विचार-विमर्श करके काम शुरू करवाया। लक्कड़हारा दिन भर अपने काम को देखता और राजकुमारी अपने महल के कार्य का ध्यान रखती। एक दिन राजकुमारी अपने महल की छत पर खडी होकर मजदूरो का काम देख रही थी कि अचानक उसे अपने महाराज पिता और अपना पूरा राज परिवार मजदूरो के बीच मजदूरी करता हुआ नजर आता है।
राजकुमारी अपने परिवारवालों को देख सेवको को तुरन्त आदेश देती है कि वह उन मजदूरो को छत पर ले आये। सेवक राजकुमारी की बात मान कर वैसा ही करते हैं। महाराज अपने परिवार सहित महल की छत पर आ जाते हैं और अपनी पुत्री को महल में देख आर्श्चय से पूछते हैं कि तुम महल में कैसे?
राजकुमारी अपने पिता से कहती है कि- "महाराज… आपने जिस जंगल को निलाम करवाया, वह हमने ही खरीदा था क्योंकि वह जंगल चन्दन के पेड़ों का था।"
और फिर राजकुमारी ने सारी बातें राजा को कह सुनाई। अन्त में राजा ने स्वीकार किया कि उसकी पुत्री सही थी।
दो बडी पुत्रियो ने कहा कि- "पिताजी हम आपके भाग्य से खाते हैं। यदि आप हमारे पिता महाराज न होते, तो हमें इतनी सुख-सुविधा व विभिन्न प्रकार के व्यंजन खाने को नसीब नहीं होते। ये सब आपके द्वारा अर्जित किया गया वैभव है, जिसे हम भोग रहे हैं।"
पुत्रियों के मुँह से यह सुन कर राजा को अपने आप पर बडा गर्व और खु:शी हो रही थी लेकिन राजा की सबसे छोटी पुत्री ने इसी प्रश्न के उत्तर में कहा कि- "पिताजी मैं आपके भाग्य से नहीं बल्कि अपने स्वयं के भाग्य से यह सब वैभव भोग रही हुँ।" छोटी पुत्री के मुँख से ये बात सुन राजा के अहंकार को बडी ठेस लगी। उसे गुस्सा भी आया और शोक भी हुआ क्योंकि उसे अपनी सबसे छोटी पुत्री से इस प्रकार के जवाब की आशा नहीं थी।
समय बीतता गया, लेकिन राजा अपनी सबसे छोटी पुत्री की वह बात भुला नहीं पाया और समय आने पर राजा ने अपनी दोनो बडी पुत्रियो की विवाह दो राजकुमारो से करवा दिया परन्तु सबसे छोटी पुत्री का विवाह क्रोध के कारण एक गरीब लक्कडहारे से कर दिया और विदाई देते समय उसे वह बात याद दिलाते हुए कहा कि- "यदि तुम अपने भाग्य से राज वैभव का सुख भोग रही थी, तो तुम्हें उस गरीब लकड़हारे के घर भी वही राज वैभव का सुख प्राप्त होगा, अन्यथा तुम्हें भी ये मानना पडे़गा कि तुम्हे आज तक जो राजवैभव का सुख मिला, वह तुम्हारे नहीं बल्कि मेरे भाग्य से मिला।"
चूंकि, लक्कडहारा बहुत ही गरीब था, इसलिए निश्चित ही राजकुमारी को राजवैभव वाला सुख तो प्राप्त नहीं हो रहा था। लक्कड़हारा दिन भर लकडी काटता और उन्हें बेच कर मुश्किल से ही अपना गुजारा कर पाता था। सो, राजकुमारी के दिन बडे ही कष्ट दायी बीत रहे थे लेकिन वह निश्चित थी, क्योंकि राजकुमारी यही सोचती कि यदि उसे मिलने वाले राजवैभव का सुख उसे उसके भाग्य से मिला था, तो निश्चित ही उसे वह सुख गरीब लक्कड़हारे के यहाँ भी मिलेगा।
एक दिन राजा ने अपनी सबसे छोटी पुत्री का हाल जानना चाहा तो उसने अपने कुछ सेवको को उसके घर भेजा और सेवको से कहलवाया कि राजकुमारी को किसी भी प्रकार की सहायता चाहिए तो वह अपने पिता को याद कर सकती है क्योंकि यदि उसका भाग्य अच्छा होता, तो वह भी किसी राजकुमार की पत्नि होती।
लेकिन राजकुमारी ने किसी भी प्रकार की सहायता लेने से मना कर दिया, जिससे महाराज को और भी ईर्ष्या हुई अपनी पुत्री से। क्राेध के कारण महाराज ने उस जंगल को ही निलाम करने का फैसला कर लिया जिस पर उस लक्कड़हारे का जीवन चल रहा था।
एक दिन लक्कडहारा बहुत ही चिंता मे अपने घर आया और अपना सिर पकड़ कर झोपडी के एक कोने मे बैठ गया। राजकुमारी ने अपने पति को चिंता में देखा तो चिंता का कारण पूछा और लक्कड़हारे ने अपनी चिंता बताते हुए कहा कि- "जिस जंगल में मैं लकडी काटता हुँ, वह कल निलाम हो रहा है और जंगल को खरीदने वाले को एक माह में सारा धन राजकोष में जमा करना होगा, पर जंगल के निलाम हो जाने के बाद मेरे पास कोई काम नही रहेगा, जिससे हम अपना गुजारा कर सके।"
चूंकि, राजकुमारी बहुत समझदार थी, सो उसने एक तरकीब लगाई और लक्कडहारे से कहा कि- "जब जंगल की बोली लगे, तब तुम एक काम करना, तुम हर बोली मे केवल एक रूपया बोली बढ़ा देना।"
दूसरे दिन लक्कड़हारा जंगल गया और नीलामी की बोली शुरू हुई और राजकुमारी के समझाए अनुसार जब भी बोली लगती, तो लक्कड़हारा हर बोली पर एक रूपया बढा कर बोली लगा देता। परिणामस्वरूप अन्त में लक्कड़हारे की बोली पर वह जंगल बिक गया लेकिन अब लक्कड़हारे को और भी ज्यादा चिंता हुई क्योंकि वह जंगल पांच लाख में लक्कड़हारे के नाम पर छूटा था जबकि लक्कड़हारे के पास रात्रि के भोजन की व्यवस्था हो सके, इतना पैसा भी नही था।
आखिर घोर चिंता में घिरा हुआ वह अपने घर पहुँचा और सारी बात अपनी पत्नि से कही। राजकुमारी ने कहा- "चिंता न करें आप, आप जिस जंगल में लकड़ी काटने जाते है वहाँ मैं भी आई थी एक दिन, जब आप भोजन करने के लिए घर नही आये थे और मैं आपके लिए भोजन लेकर आई थी। तब मैंने वहाँ देखा कि जिन लकडियों को आप काट रहे थे, वह तो चन्दन की थी। आप एक काम करें। आप उन लकड़ीयों को दूसरे राज्य के महाराज को बेंच दें। चुंकि एक माह में जंगल का सारा धन चुकाना है सो हम दोनों मेहनत करके उस जंगल की लकडि़या काटेंगे और साथ में नये पौधे भी लगाते जायेंगे और सारी लकड़ीया राजा-महाराजाओ को बेंच दिया करेंगे।"
लक्कड़हारे ने अपनी पत्नि से पूंछा कि "क्या महाराज को नही मालुम होगा कि उनके राज्य के जंगल में चन्दन का पेड़ भी है।"
राजकुमारी ने कहा- "मालुम है, परन्तु वह जंगल किस और है, यह नही मालुम है।"
लक्कड़हारे को अपनी पत्नि की बात समझ में आ गई और दोनो ने कड़ी मेहनत से चन्दन की लकड़ीयों को काटा और दूर-दराज के राजाओं को बेंच कर जंगल की सारी रकम एक माह में चुका दी और नये पौधों की खेप भी रूपवा दी ताकि उनका काम आगे भी चलता रहे।
धीरे-धीरे लक्कड़हारा और राजकुमारी धनवान हो गए। लक्कड़हारा और राजकुमारी ने अपना महल बनवाने की सोच एक-दूसरे से विचार-विमर्श करके काम शुरू करवाया। लक्कड़हारा दिन भर अपने काम को देखता और राजकुमारी अपने महल के कार्य का ध्यान रखती। एक दिन राजकुमारी अपने महल की छत पर खडी होकर मजदूरो का काम देख रही थी कि अचानक उसे अपने महाराज पिता और अपना पूरा राज परिवार मजदूरो के बीच मजदूरी करता हुआ नजर आता है।
राजकुमारी अपने परिवारवालों को देख सेवको को तुरन्त आदेश देती है कि वह उन मजदूरो को छत पर ले आये। सेवक राजकुमारी की बात मान कर वैसा ही करते हैं। महाराज अपने परिवार सहित महल की छत पर आ जाते हैं और अपनी पुत्री को महल में देख आर्श्चय से पूछते हैं कि तुम महल में कैसे?
राजकुमारी अपने पिता से कहती है कि- "महाराज… आपने जिस जंगल को निलाम करवाया, वह हमने ही खरीदा था क्योंकि वह जंगल चन्दन के पेड़ों का था।"
और फिर राजकुमारी ने सारी बातें राजा को कह सुनाई। अन्त में राजा ने स्वीकार किया कि उसकी पुत्री सही थी।
👉 शक्ति पूजा का रहस्य
शक्ति पूजा के लिए जरूरी है- शक्ति संचय। इसके बिना न तो शक्ति पूजा बन पड़ती है और न ही जीवन में इसके सुफल मिल पाते हैं। जहाँ शक्ति का संचय होता है, वहीं सुख-सत्कार व शान्ति के पुष्प बरसते हैं। इसके विपरीत जहाँ शक्ति का अभाव होता है, वहाँ दुःख, तिरस्कार व कलह के काँटे ही बिखरे रहते हैं। जो शक्ति का संचय करते हैं, उन्हें ही समर्थ, बलवान्, बुद्धिमान् व सौभाग्यशाली कहा जाता है। शक्ति संचय की उपेक्षा करने वाले तो असहाय, अशक्त, निर्बल, दुर्बल व दरिद्र कहकर पग-पग पर अपने दुर्भाग्य की यातना सहते हैं।
जो शक्ति पूजा के इच्छुक हैं, उन्हें शक्ति संचय के लिए भी कमर कसनी पड़ेगी। उनको अभी और इसी क्षण से माँ महाशक्ति की पूजा के लिए पंचोपचार की तैयारी करनी होगी। इन पंचोपचारों के क्रम में पहली है- शारीरिक शक्ति, २. मानसिक शक्ति, ३. भावनात्मक शक्ति, ४. आर्थिक शक्ति एवं ५. आध्यात्मिक शक्ति। इन पाँच शक्तियों का अभाव ही मानव को पीड़ा की प्रताड़ना सहने के लिए विवश करता है। इन्हीं पाँच शक्तियों की बर्बादी मनुष्य को पतन के गहरे अँधेरों में धकेलती है। जबकि इन पाँचों शक्तियों के संचय से व्यक्ति की प्रसन्नता शतगुणित होती है और सत्कर्मों में इनके सद्व्यय से वह निरन्तर उत्थान के सोपान चढ़ता है।
नवरात्रि के नौ दिन शक्ति पूजा के इसी रहस्य को समझने के दिन हैं। इन नौ दिनों में हमें अपनी संचित शक्ति से माँ भगवती की पूजा करनी है। इन नौ दिनों में यूं तो अनगिन रहस्य समाये हैं किन्तु प्रधानतया इन रहस्यों की संख्या नौ ही है, जो गायत्री के महामंत्र के नौ शब्दों १. तत्, २. सवितुः, ३. वरेण्यं, ४. भर्गो, ५. देवस्य, ६. धीमहि, ७. धियो, ८.योनः ९. प्रचोदयात् में समाहित हैं। इन्हीं नौ शब्दों की महिमा से भूः भुवः स्वः के रूप में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण इन तीन शरीरों की सभी शक्तियों का जागरण होता है और इसी के फलस्वरूप ॐकार के परम पद की प्राप्ति होती है। पर ऐसा होता उन्हीं के जीवन में है, जो अपने जीवन के क्षण-क्षण में शक्ति के कण-कण का संचय करते हैं और साथ ही सत्कर्मों के रूप में इसका सद्व्यय करके विश्व-व्यापिनी माँ जगदम्बा गायत्री की अर्चना-आराधना करते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४१
जो शक्ति पूजा के इच्छुक हैं, उन्हें शक्ति संचय के लिए भी कमर कसनी पड़ेगी। उनको अभी और इसी क्षण से माँ महाशक्ति की पूजा के लिए पंचोपचार की तैयारी करनी होगी। इन पंचोपचारों के क्रम में पहली है- शारीरिक शक्ति, २. मानसिक शक्ति, ३. भावनात्मक शक्ति, ४. आर्थिक शक्ति एवं ५. आध्यात्मिक शक्ति। इन पाँच शक्तियों का अभाव ही मानव को पीड़ा की प्रताड़ना सहने के लिए विवश करता है। इन्हीं पाँच शक्तियों की बर्बादी मनुष्य को पतन के गहरे अँधेरों में धकेलती है। जबकि इन पाँचों शक्तियों के संचय से व्यक्ति की प्रसन्नता शतगुणित होती है और सत्कर्मों में इनके सद्व्यय से वह निरन्तर उत्थान के सोपान चढ़ता है।
नवरात्रि के नौ दिन शक्ति पूजा के इसी रहस्य को समझने के दिन हैं। इन नौ दिनों में हमें अपनी संचित शक्ति से माँ भगवती की पूजा करनी है। इन नौ दिनों में यूं तो अनगिन रहस्य समाये हैं किन्तु प्रधानतया इन रहस्यों की संख्या नौ ही है, जो गायत्री के महामंत्र के नौ शब्दों १. तत्, २. सवितुः, ३. वरेण्यं, ४. भर्गो, ५. देवस्य, ६. धीमहि, ७. धियो, ८.योनः ९. प्रचोदयात् में समाहित हैं। इन्हीं नौ शब्दों की महिमा से भूः भुवः स्वः के रूप में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण इन तीन शरीरों की सभी शक्तियों का जागरण होता है और इसी के फलस्वरूप ॐकार के परम पद की प्राप्ति होती है। पर ऐसा होता उन्हीं के जीवन में है, जो अपने जीवन के क्षण-क्षण में शक्ति के कण-कण का संचय करते हैं और साथ ही सत्कर्मों के रूप में इसका सद्व्यय करके विश्व-व्यापिनी माँ जगदम्बा गायत्री की अर्चना-आराधना करते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४१
👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 3)
Q.3. Do Brahmans have a special privilege to do Gayatri Sadhana?
Ans. The professed proprietary right of Brahmans (by birth) on Gayatri worship is ridiculous. Credit for embodiment and elaboration of mysticism of Mahamantra Gayatri goes to rishi Vishwamitra, who belonged to Kshatriya caste by birth. Thus, even if the caste is considered essential for Gayatri worship, the Kshatriyas should have priority over other castes.
The concept of Brahmanism has an entirely different connotation. A Brahman is one who conforms to the wisdom of Brahma (Brahmaparayan) and has an exemplary character. Only such persons of refined character can derive maximum advantage from Gayatri worship. It has been said that Gayatri is Kamdhenu of Brahmans. In several Sanskrit couplets, Dwijs alone have been described as entitled to worship Gayatri.
Traditionally, the words Dwij and Brahman have been considered as synonymous. In this way each Dwij or Brahman was supposed to have the exclusive privilege of worship of Gayatri. Does it mean that individuals belonging to other castes were scripturally prohibited from worshipping Gayatri?
The confusion has arisen because of misunderstanding of the meanings of words like Brahman, Dwij and caste, which are being misconstrued as hereditary distinctions conferred by God on various classes of society. Nothing can be more absurd than considering the Creator as discriminative and partial, making people take birth in a family of high or low caste.
When scriptures declare that Gayatri is kamdhenu of Brahmans i.e. Gayatri fulfils all desires of a Brahman, they mean that any human being who diligently aspires to be a Brahman by following righteousness in thoughts, words and deeds gets an access to the benefits of Gayatri. That is to say, Brahmanism is a pre-requisite for Gayatri worship.
As regards the world Dwij it literally means ‘born again’. The initiation to Gayatri is the spiritual birth of a person, who has otherwise taken birth as any other animal. This initiation or Diksha is like ‘Baptism’ amongst the Christians and is akin to admission in the primary class of the school of spirituality. The concept of caste has been grossly distorted, misunderstood and misappropriated by vested interests. In Vedic times, division of civic responsibilities into four classes of people who were given education and training pertaining to their respective assignments was considered expedient. Each of this class was referred to as a varna. In course of time, when successive generations began to follow the same profession varnas got ossified into ‘castes’. With the change in social environment, certain castes assumed greater prominence in the society and in order to retain their supremacy propagated the concept of caste by birth as a God-given status.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 30
Ans. The professed proprietary right of Brahmans (by birth) on Gayatri worship is ridiculous. Credit for embodiment and elaboration of mysticism of Mahamantra Gayatri goes to rishi Vishwamitra, who belonged to Kshatriya caste by birth. Thus, even if the caste is considered essential for Gayatri worship, the Kshatriyas should have priority over other castes.
The concept of Brahmanism has an entirely different connotation. A Brahman is one who conforms to the wisdom of Brahma (Brahmaparayan) and has an exemplary character. Only such persons of refined character can derive maximum advantage from Gayatri worship. It has been said that Gayatri is Kamdhenu of Brahmans. In several Sanskrit couplets, Dwijs alone have been described as entitled to worship Gayatri.
Traditionally, the words Dwij and Brahman have been considered as synonymous. In this way each Dwij or Brahman was supposed to have the exclusive privilege of worship of Gayatri. Does it mean that individuals belonging to other castes were scripturally prohibited from worshipping Gayatri?
The confusion has arisen because of misunderstanding of the meanings of words like Brahman, Dwij and caste, which are being misconstrued as hereditary distinctions conferred by God on various classes of society. Nothing can be more absurd than considering the Creator as discriminative and partial, making people take birth in a family of high or low caste.
When scriptures declare that Gayatri is kamdhenu of Brahmans i.e. Gayatri fulfils all desires of a Brahman, they mean that any human being who diligently aspires to be a Brahman by following righteousness in thoughts, words and deeds gets an access to the benefits of Gayatri. That is to say, Brahmanism is a pre-requisite for Gayatri worship.
As regards the world Dwij it literally means ‘born again’. The initiation to Gayatri is the spiritual birth of a person, who has otherwise taken birth as any other animal. This initiation or Diksha is like ‘Baptism’ amongst the Christians and is akin to admission in the primary class of the school of spirituality. The concept of caste has been grossly distorted, misunderstood and misappropriated by vested interests. In Vedic times, division of civic responsibilities into four classes of people who were given education and training pertaining to their respective assignments was considered expedient. Each of this class was referred to as a varna. In course of time, when successive generations began to follow the same profession varnas got ossified into ‘castes’. With the change in social environment, certain castes assumed greater prominence in the society and in order to retain their supremacy propagated the concept of caste by birth as a God-given status.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 30
👉 तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं
हे प्रभो! मेरी केवल एक ही कामना है कि मैं संकटों से डर कर भागूं नहीं, उनका सामना करूं। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय तब तुम मुझे सान्त्वना दो। मैं अपनी अञ्जलि के भाव सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।
जब किसी कष्टप्रद और संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूं। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाये। हे प्रभो! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी−संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर घड़ी अपने साथ देखते हुए उन्हें हँसी खेल समझ कर अपने चित्त को हल्का रखूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
चाहे जैसी ही प्रतिकूलताएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है। लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ मेरा सर्वस्व छिन गया।
प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मैं इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, सम्बल बने−क्षीणता नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।
रवींद्रनाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1978/March/v1/
जब किसी कष्टप्रद और संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूं। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाये। हे प्रभो! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी−संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर घड़ी अपने साथ देखते हुए उन्हें हँसी खेल समझ कर अपने चित्त को हल्का रखूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
चाहे जैसी ही प्रतिकूलताएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है। लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ मेरा सर्वस्व छिन गया।
प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मैं इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, सम्बल बने−क्षीणता नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।
रवींद्रनाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1978/March/v1/
मंगलवार, 10 दिसंबर 2019
👉 परम मित्र कौन है?
एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे। एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था। एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।
दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।
और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।
एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था। अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :- "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो?
वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं। उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।
अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है। फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।
दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।
वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए। फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।
तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।
अब आप सोच रहे होंगे कि...
वो तीन मित्र कौन है...?
तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार।
जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं। सब से पहला मित्र है हमारा अपना 'शरीर' हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है। एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।
दूसरा मित्र है शरीर के 'सम्बन्धी' जैसे :- माता - पिता, भाई - बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह - दोपहर शाम मिलते है।
और तीसरा मित्र है :- हमारे 'कर्म' जो सदा ही साथ जाते है।
अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।
दूसरा मित्र - सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक "राम नाम सत्य है" कहते हुए जाते हैं तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।
और तीसरा मित्र आपके कर्म हैं।
कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।
अब अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी।
और धर्मराज भी हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खोल देगा।
रामचरित मानस की पंक्तियां हैं कि...
"काहु नहीं सुख-दुःख कर दाता।
निजकृत कर्म भोगि सब भ्राता।।"
〰〰〰〰〰〰〰〰
तमसो मा ज्योतिर्गमय
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दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।
और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।
एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था। अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :- "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो?
वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं। उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।
अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है। फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।
दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।
वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए। फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।
तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।
अब आप सोच रहे होंगे कि...
वो तीन मित्र कौन है...?
तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार।
जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं। सब से पहला मित्र है हमारा अपना 'शरीर' हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है। एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।
दूसरा मित्र है शरीर के 'सम्बन्धी' जैसे :- माता - पिता, भाई - बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह - दोपहर शाम मिलते है।
और तीसरा मित्र है :- हमारे 'कर्म' जो सदा ही साथ जाते है।
अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।
दूसरा मित्र - सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक "राम नाम सत्य है" कहते हुए जाते हैं तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।
और तीसरा मित्र आपके कर्म हैं।
कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।
अब अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी।
और धर्मराज भी हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खोल देगा।
रामचरित मानस की पंक्तियां हैं कि...
"काहु नहीं सुख-दुःख कर दाता।
निजकृत कर्म भोगि सब भ्राता।।"
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तमसो मा ज्योतिर्गमय
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👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 2)
Q.2. Is it true that Gayatri Sadhana is permissible to a particular caste only ?
Ans. The concept of caste is grossly misunderstood in the modern society. Ancient Indian Culture did not relate the caste system to one’s parentage or ancestry. In those days, defaulters of basic codes of social conduct were deprived of normal civil rights. They were compelled by the society to undertake specific duties along with deprivation of the right to worship Gayatri. The caste of a person thus denoted the field of his activity rather than his parentage. Denial of worship was, therefore, a punishment to the guilty. In the present context, the codes for “social punishment” have changed. Work-assignments have also undergone a sea-change. Under these circumstances, all human beings, owing their existence to the one Supreme Being, are entitled to worship Gayatri irrespective of their ancestry, parentage or belief.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 28
Ans. The concept of caste is grossly misunderstood in the modern society. Ancient Indian Culture did not relate the caste system to one’s parentage or ancestry. In those days, defaulters of basic codes of social conduct were deprived of normal civil rights. They were compelled by the society to undertake specific duties along with deprivation of the right to worship Gayatri. The caste of a person thus denoted the field of his activity rather than his parentage. Denial of worship was, therefore, a punishment to the guilty. In the present context, the codes for “social punishment” have changed. Work-assignments have also undergone a sea-change. Under these circumstances, all human beings, owing their existence to the one Supreme Being, are entitled to worship Gayatri irrespective of their ancestry, parentage or belief.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 28
👉 कुछ ख़ास बातें..
1. आप कुछ नहीं करेंगे..
तो आप को कोई कुछ नहीं कहेगा..!!
2. आप अगर सक्रिय हैँ..
तो हमेशा आप पर उँगलियाँ उठेगी..!!
3. अगर आप ये नहीं सोचेंगे..
कि श्रेय किसको मिलेगा..
तो आप बहुत कुछ कर सकते हैँ..!!
4. आपके जितने विरोधी होंगे..
आपका उतना बड़ा कद होगा..!!
5. आप जितना ज्यादा काम करेंगे..
उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा..!!
6. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती हैं..
जो उन्हें उठाना चाहता है..!!
7. आप जो भी प्रोजेक्ट करेंगे..
उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा..
और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी..!!
8. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी है..
वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा.!!
9. आप को प्रशंसा जब मिलेगी..
जब आप उसकी अपेक्षा करना बंद कर देंगे..!!
10. आप लोकप्रिय तब होंगे..
जब अपने साथियों के कार्यों को सराहेंगे..
और उनका उत्साह बढ़ाएंगे..!!
11. आप कब सही थे..कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे..कोई नहीं भूलेगा..!!
12. आप जितना नियम मान कर चलेंगे..
आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा..!!
सबसे ख़ास बात..
सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होता है..और इस के लिए बहुत कुछ सहना होता है..और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं है...!!!
तो आप को कोई कुछ नहीं कहेगा..!!
2. आप अगर सक्रिय हैँ..
तो हमेशा आप पर उँगलियाँ उठेगी..!!
3. अगर आप ये नहीं सोचेंगे..
कि श्रेय किसको मिलेगा..
तो आप बहुत कुछ कर सकते हैँ..!!
4. आपके जितने विरोधी होंगे..
आपका उतना बड़ा कद होगा..!!
5. आप जितना ज्यादा काम करेंगे..
उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा..!!
6. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती हैं..
जो उन्हें उठाना चाहता है..!!
7. आप जो भी प्रोजेक्ट करेंगे..
उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा..
और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी..!!
8. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी है..
वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा.!!
9. आप को प्रशंसा जब मिलेगी..
जब आप उसकी अपेक्षा करना बंद कर देंगे..!!
10. आप लोकप्रिय तब होंगे..
जब अपने साथियों के कार्यों को सराहेंगे..
और उनका उत्साह बढ़ाएंगे..!!
11. आप कब सही थे..कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे..कोई नहीं भूलेगा..!!
12. आप जितना नियम मान कर चलेंगे..
आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा..!!
सबसे ख़ास बात..
सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होता है..और इस के लिए बहुत कुछ सहना होता है..और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं है...!!!
👉 आध्यात्मिक चिकित्सा
आध्यात्मिक चिकित्सा- बोध, निदान एवं विज्ञान का पूर्ण तंत्र है। इसमें जीवन की दृश्य-अदृश्य संरचना का सम्पूर्ण बोध है। इसी के साथ यहाँ जीवन के दैहिक-दैविक एवं आध्यात्मिक रोगों के निदान की सूक्ष्म विधियों का समग्र ज्ञान है। इतना ही नहीं इसमें इन सभी रोगों के सार्थक समाधान का प्रायोगिक विज्ञान भी समाविष्ट है, जो मानव जीवन की सम्पूर्ण चिकित्सा के ऋषि संकल्प को दुहराता है।
यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्न थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।
पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हँं आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले-वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।
शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मर्षि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा- आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः। दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥
अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३५
यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्न थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।
पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हँं आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले-वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।
शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मर्षि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा- आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः। दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥
अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३५
शनिवार, 7 दिसंबर 2019
👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?
हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषियों, महासिद्धों के तप प्राण घुले हुए हैं। इसमें घुली हुई है- उनकी विकल वेदना, उनकी गहरी पीड़ा और उनके सघन सन्ताप से उपजा महाप्रश्न- को धर्मानुद्धरिष्यसि? कौन करेगा धर्म का उद्धार? यदि हमारे दिलों में संवेदना है तो इस प्रश्न की टीस भरी चुभन हमें जरूर महसूस होगी। हमारे प्राण इस ऋषि पीड़ा को अवश्य अनुभव करेंगे।
धर्म-प्रवचन नहीं है। बौद्धिक तर्क विलास, वाणी का वाक् जाल भी धर्म नहीं है। धर्म- तप है। धर्म- तितीक्षा है। धर्म- कष्ट सहिष्णुता है। धर्म- परदुःख कातरता है। धर्म- सच्चाइयों और अच्छाइयों के लिए जीने और इनके लिए मर मिटने का साहस है। धर्म- मर्यादाओं की रक्षा के लिए उठने वाली हुंकारें हैं। धर्म- सेवा की सजल संवेदना है। धर्म- पीड़ा निवारण के लिए स्फुरित होने वाला महासंकल्प है। धर्म- पतन निवारण के लिए किए जाने वाले युद्ध का महाघोष है। धर्म- दुष्वृत्तियों, दुष्कृत्यों, दुरीतियों के महाविनाश के लिए किए जाने वाले अभियान का शंखनाद है। धर्म- सर्वहित के लिए स्वहित का त्याग है।
ऐसा धर्म केवल तप के बासन्ती अंगारों में जन्म लेता है। बलिदान के बासन्ती राग में इसकी सुमधुर गूंज सुनी जाती है। अबकी बार वसन्त पंचमी पर बहती बासन्ती बयार हम सबके जीवन में तप के इन्हीं अंगारों को दहकाने आयी है। महातप की इन्हीं ज्वालाओं को धधकाने आयी है। हमें ऋषि सन्तान होने का बोध और इससे जुड़े कर्त्तव्यों का अहसास कराने आयी है। हमें ही देना है बासन्ती बयार में घुले हुए ऋषियों के महाप्रश्न का उत्तर। हमें ही गढ़नी है अपने जीवन में धर्म की सच्ची परिभाषा। लेकिन यह होगा तभी जब हम अपने जीवन को धर्म का यज्ञकुण्ड बना लें। और तप की महाज्वालाओं में स्वयं के प्राणों का अनवरत समिधादान करते रहें। इस धर्म यज्ञ का सुफल ही धर्म के सत्य को व्यापक विस्तार देगा।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३९
धर्म-प्रवचन नहीं है। बौद्धिक तर्क विलास, वाणी का वाक् जाल भी धर्म नहीं है। धर्म- तप है। धर्म- तितीक्षा है। धर्म- कष्ट सहिष्णुता है। धर्म- परदुःख कातरता है। धर्म- सच्चाइयों और अच्छाइयों के लिए जीने और इनके लिए मर मिटने का साहस है। धर्म- मर्यादाओं की रक्षा के लिए उठने वाली हुंकारें हैं। धर्म- सेवा की सजल संवेदना है। धर्म- पीड़ा निवारण के लिए स्फुरित होने वाला महासंकल्प है। धर्म- पतन निवारण के लिए किए जाने वाले युद्ध का महाघोष है। धर्म- दुष्वृत्तियों, दुष्कृत्यों, दुरीतियों के महाविनाश के लिए किए जाने वाले अभियान का शंखनाद है। धर्म- सर्वहित के लिए स्वहित का त्याग है।
ऐसा धर्म केवल तप के बासन्ती अंगारों में जन्म लेता है। बलिदान के बासन्ती राग में इसकी सुमधुर गूंज सुनी जाती है। अबकी बार वसन्त पंचमी पर बहती बासन्ती बयार हम सबके जीवन में तप के इन्हीं अंगारों को दहकाने आयी है। महातप की इन्हीं ज्वालाओं को धधकाने आयी है। हमें ऋषि सन्तान होने का बोध और इससे जुड़े कर्त्तव्यों का अहसास कराने आयी है। हमें ही देना है बासन्ती बयार में घुले हुए ऋषियों के महाप्रश्न का उत्तर। हमें ही गढ़नी है अपने जीवन में धर्म की सच्ची परिभाषा। लेकिन यह होगा तभी जब हम अपने जीवन को धर्म का यज्ञकुण्ड बना लें। और तप की महाज्वालाओं में स्वयं के प्राणों का अनवरत समिधादान करते रहें। इस धर्म यज्ञ का सुफल ही धर्म के सत्य को व्यापक विस्तार देगा।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३९
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019
👉 ध्यान का विहान
नए साल का सूरज ध्यान का विहान लेकर आया है। हिमालय की हिमाच्छादित पर्वतमालाओं पर होने वाला नव वर्ष का यह सूर्योदय सब भाँति अद्भुत व अपूर्व है। सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश व प्राण देने वाले सविता देव ने हिमालय के हिम शिखरों, वहाँ के नदी-नद व घाटियों को, गहन गुफाओं को अपने स्वर्णिम प्रकाश से भर दिया है। नव वर्ष के इस सूर्य ने दुर्गम हिमालय में रहने वाले ऋषियों, तपस्वियों,-महासिद्धों को ध्यान से सबेरा दिया है। ध्यान के इस विहार में उनकी प्राण चेतना-विचार चेतना व भाव चेतना सूर्य की स्वर्णिम आभा से जगमगा उठी है।
ध्यान में यह विहान आपके जीवन में भी अवतरित हो सकता है। करना बस इतना है कि प्रायः सूर्योदय के समय बिस्तर पर लेटे हुए या आसन पर बैठे हुए अपनी आँखें बन्द करें। और मन की आँखों से हिमालय के इस अद्भुत सूर्योदय को निहारें। भाव यह करें कि हिमालय के हिम शिखरों में अवतरित हुई सूर्य की स्वर्णिम आभा, जिसमें हिमालय के ऋषियों, तपस्वियों व सिद्धों का तप-प्राण घुला है, आपके सिर से होकर शरीर में प्रवेश कर रहा है। आभा के इस दिव्य पुञ्ज को अपने सिर के ऊपर कुछ इस तरह अनुभव करें, जैसे कि सिर के ऊपर सूर्योदय हो गया है। और आपके सिर के ऊपर प्रकाश व प्राण की धाराएँ उड़ेल रहा हो।
भीतर जाती हुई प्रत्येक श्वास के साथ इस कल्पना को प्रगाढ़ करें। अपनी गहराइयों में प्रवेश करते प्रकाश को अनुभव करें। श्वास को छोड़ते हुए यह कल्पना करें कि शरीर प्राण व मन के प्रत्येक कण में समाया अंधेरा एक अंधेरी नदी के रूप में सिर से बाहर की ओर निकल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में श्वास के आने-जाने की गति को अति धीमी व गहरी बनाए रखें। बहुत धीरे-धीरे इस क्रम को आगे बढ़ाए। सुबह-सुबह कम से कम बीस-पच्चीस मिनट इस प्रक्रिया को पूरी करें। लगातार करते रहा जाय तो छः महीने में इसके परिणाम मिलने लगेंगे। प्राण-मन व अन्तःकरण में ध्यान का सबेरा साफ-साफ झलकने लगता है। ध्यान के इस विहार में प्राण चेतना, विचार चेतना व भाव चेतना सूर्य की स्वर्णिम आभा से जगमगाते अनुभव होते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३८
ध्यान में यह विहान आपके जीवन में भी अवतरित हो सकता है। करना बस इतना है कि प्रायः सूर्योदय के समय बिस्तर पर लेटे हुए या आसन पर बैठे हुए अपनी आँखें बन्द करें। और मन की आँखों से हिमालय के इस अद्भुत सूर्योदय को निहारें। भाव यह करें कि हिमालय के हिम शिखरों में अवतरित हुई सूर्य की स्वर्णिम आभा, जिसमें हिमालय के ऋषियों, तपस्वियों व सिद्धों का तप-प्राण घुला है, आपके सिर से होकर शरीर में प्रवेश कर रहा है। आभा के इस दिव्य पुञ्ज को अपने सिर के ऊपर कुछ इस तरह अनुभव करें, जैसे कि सिर के ऊपर सूर्योदय हो गया है। और आपके सिर के ऊपर प्रकाश व प्राण की धाराएँ उड़ेल रहा हो।
भीतर जाती हुई प्रत्येक श्वास के साथ इस कल्पना को प्रगाढ़ करें। अपनी गहराइयों में प्रवेश करते प्रकाश को अनुभव करें। श्वास को छोड़ते हुए यह कल्पना करें कि शरीर प्राण व मन के प्रत्येक कण में समाया अंधेरा एक अंधेरी नदी के रूप में सिर से बाहर की ओर निकल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में श्वास के आने-जाने की गति को अति धीमी व गहरी बनाए रखें। बहुत धीरे-धीरे इस क्रम को आगे बढ़ाए। सुबह-सुबह कम से कम बीस-पच्चीस मिनट इस प्रक्रिया को पूरी करें। लगातार करते रहा जाय तो छः महीने में इसके परिणाम मिलने लगेंगे। प्राण-मन व अन्तःकरण में ध्यान का सबेरा साफ-साफ झलकने लगता है। ध्यान के इस विहार में प्राण चेतना, विचार चेतना व भाव चेतना सूर्य की स्वर्णिम आभा से जगमगाते अनुभव होते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३८
गुरुवार, 5 दिसंबर 2019
👉 जीवन की सफलता
जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है। मनुष्य भी इन अनगिनत तरंगों में एक छोटी सी तरंग है। एक लघु बीज है- असीम सम्भावनाओं का।
तरंग की स्वाभाविक आकांक्षा है सागर होने की और बीज की स्वाभाविक चाहत है कि वृक्ष हो जाय। तरंग जब तक महासागर की व्यापकता में फैले नहीं, बीज जब तक फूलों से खिले नहीं, फलों से लदे नहीं, तब तक तृप्ति असम्भव है। इनके अस्तित्त्व की, इनके जीवन की सफलता भी इसी में है।
मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है परमात्मा होने की। परमात्मा का अर्थ है जीवन की सफलता और पूर्णता। परमात्मा स्वर्ग या आसमान में बैठा हुआ कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो जीवन की अन्तिम सफलता है, परम पूर्णता है। जीवन की तृप्ति एवं परितोष यही है। इसके पहले पड़ाव तो बहुत हैं पर मंजिल नहीं है।
इस मंजिल तक पहुँचे बिना प्रत्येक मनुष्य पीड़ित रहता है। असफलता का दंश उसे सालता रहा है। वह चाहे जितना धन कमा ले, कितना ही वैभव जुटा ले, किन्तु उसे अपने जीवन की सफलता एवं सार्थकता की अनुभूति नहीं हो पाती। एक कंटीली चुभन, बेचैनी भरा दर्द हमेशा बना रहता है। इसे भुलाने की कितनी ही कोशिशें की जाती हैं, लेकिन हर कोशिश कुंठा में ही तब्दील होती है।
और यह ठीक भी है, क्योंकि यदि कहीं ऐसा हो जाय तो बीज कभी भी वृक्ष न बनेगा। तरंग को कभी सागर की व्यापकता न मिलेगी। बीज जब तक वृक्ष बनकर फूलों से न खिलें, उसकी सुगन्ध मुक्त आकाश में न बिखरे तब तक परितृप्ति कैसी? तरंग जब तक महासागर की व्यापकता न पाए तब तक सफलता कैसी? मनुष्य भी जब तक जीवन के परम शिखर परमात्मा को छूकर उससे एकाकार न हो तब तक उसकी सार्थकता कैसी?
जीवन की सफलता तो परमात्मा की अनन्तता को पाने में है। इसे पाए बिना जिन्होंने समझ लिया कि वे सफल हो गए, बड़े अभागे हैं। बड़भागी तो वे हैं, जो अनुभव करते हैं कि जीवन में कुछ भी करो, कुछ भी पाओ असफलता ही हाथ लगती है। क्योंकि ये एक न एक दिन परमात्मा को पा लेंगे, स्वयं परमात्मा हो जाएँगे।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३७
तरंग की स्वाभाविक आकांक्षा है सागर होने की और बीज की स्वाभाविक चाहत है कि वृक्ष हो जाय। तरंग जब तक महासागर की व्यापकता में फैले नहीं, बीज जब तक फूलों से खिले नहीं, फलों से लदे नहीं, तब तक तृप्ति असम्भव है। इनके अस्तित्त्व की, इनके जीवन की सफलता भी इसी में है।
मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है परमात्मा होने की। परमात्मा का अर्थ है जीवन की सफलता और पूर्णता। परमात्मा स्वर्ग या आसमान में बैठा हुआ कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो जीवन की अन्तिम सफलता है, परम पूर्णता है। जीवन की तृप्ति एवं परितोष यही है। इसके पहले पड़ाव तो बहुत हैं पर मंजिल नहीं है।
इस मंजिल तक पहुँचे बिना प्रत्येक मनुष्य पीड़ित रहता है। असफलता का दंश उसे सालता रहा है। वह चाहे जितना धन कमा ले, कितना ही वैभव जुटा ले, किन्तु उसे अपने जीवन की सफलता एवं सार्थकता की अनुभूति नहीं हो पाती। एक कंटीली चुभन, बेचैनी भरा दर्द हमेशा बना रहता है। इसे भुलाने की कितनी ही कोशिशें की जाती हैं, लेकिन हर कोशिश कुंठा में ही तब्दील होती है।
और यह ठीक भी है, क्योंकि यदि कहीं ऐसा हो जाय तो बीज कभी भी वृक्ष न बनेगा। तरंग को कभी सागर की व्यापकता न मिलेगी। बीज जब तक वृक्ष बनकर फूलों से न खिलें, उसकी सुगन्ध मुक्त आकाश में न बिखरे तब तक परितृप्ति कैसी? तरंग जब तक महासागर की व्यापकता न पाए तब तक सफलता कैसी? मनुष्य भी जब तक जीवन के परम शिखर परमात्मा को छूकर उससे एकाकार न हो तब तक उसकी सार्थकता कैसी?
जीवन की सफलता तो परमात्मा की अनन्तता को पाने में है। इसे पाए बिना जिन्होंने समझ लिया कि वे सफल हो गए, बड़े अभागे हैं। बड़भागी तो वे हैं, जो अनुभव करते हैं कि जीवन में कुछ भी करो, कुछ भी पाओ असफलता ही हाथ लगती है। क्योंकि ये एक न एक दिन परमात्मा को पा लेंगे, स्वयं परमात्मा हो जाएँगे।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३७
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