सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 Feb 2018


👉 छत्रपति की चरित्र निष्ठा

🔷 उनकी आँखों में रह-रह कर बेचैनी की लहर उठती और विलीन हो जाती। माथे पर उभरती और विलीन होती सिकुड़न चेहरे की गम्भीरता इस बात गवाही दे रहे थे कि वह किसी गहरे सोच में डूबे हैं। साथ ही उन्हें किसी की प्रतीक्षा है और बात थी भी यही। यह सेनापति भामलेकर की प्रतीक्षा कर रहे थे। जो शत्रु-सेना का मुकाबला करने और उसे राज्य की सीमा से दूर तक खदेड़ देने के लिए युद्ध अभियान पर गए थे। उन्हें चिन्ता थी कि कहीं आशा के विपरीत भामलेकर शत्रु सेना के बन्दी न हो गए हों।

🔶 प्रतीक्षा करते हुए काफी देर हो गयी थी। वह महल की अट्टालिका पर ही बैठे थे। तभी उन्होंने तेजी से घोड़ा दौड़ाते चले आ रहे एक घुड़ सवार को देखा। नजदीक आने पर स्पष्ट हुआ कि यह भामलेकर ही थे। उनकी चाल देखकर ही अनुमान लगा लिया कि वह विजयश्री का वरण करके लौटे हैं, पर उनके पीछे दो सैनिक जो डोली लेकर आ रहे थे, उसके बारे में उनको कुछ समझ में नहीं आया।

🔷 दौड़कर वह नीचे आए और भामलेकर को गले लगा लिया। भामलेकर ने कहा-छत्रपति! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी। बेचारा बहलोल जान बचाकर भाग गया। अब हिम्मत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके।

🔶 वह तो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया था भामले, छत्रपति ने कहा-और डोले की ओर इशारा करते हुए कहा, यह क्या है?

🔷 अट्टहास करते हुए भामले ने कहा-इसमें मुसलिम रमणियों में सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल खाँ की बेगम है महाराज! मुगल सरदार ने हजारों लाखों हिन्दू नारियों सतीत्व लूटा है। उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी ओर से आपको यह भेंट हैं।

🔶 भामलेकर के इस कथन को सुनकर एक पल के लिए शिवाजी अवाक् रह गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके कानों में ढेर सारा पिघला हुआ शीशा उड़ेल दिया हो। वह तड़प उठे। उन्हें अपने किसी सरदार और सामन्त से ऐसी किसी मूर्खता की आ नहीं थी। कुछ देर ठहरने के पश्चात् वे डोले के पास गए, पर्दा हटाया और बहलोल की बेगम को बाहर आने के लिए कहा। छुई-मुई सी अपने आप में समिटती सिकुड़ती वह बाहर आयी। शिवाजी ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा-सचमुच तू बड़ी सुन्दर है। अफसोस है कि मैं तेरे पेट से पैदा नहीं हुआ नहीं ता मैं भी तेरे जैसा सुन्दर होता।

🔷 फिर उन्होंने एक अन्य अधिकारी को निर्देश देते हुए कहा कि वह बेगम को बहलोल खाँ के पास ले जाकर सौंप आए। इसके बाद वह सामलेकर की ओर मुड़े और बोले तुम मेरे साथ इतने दिनों तक रहे, पर मुझे पहचान नहीं पाए। वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे और धर्मग्रन्थों की होली जलाए। कोई और पतन के गर्त में गिरता हो, तो उसके प्रतिकार का यह अर्थ नहीं कि हम भी उसी की तरह नीचता पर उतर आएं।

🔶 हमें अपनी साँस्कृतिक गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। अपने अभियान का उद्देश्य किसी राज्य का विस्तार नहीं, संस्कृति का विस्तार है। उन भावनाओं, मान्यताओं विचारों का विस्तार करना है, जिससे इनसान उत्पीड़क का उन्मूलन और उत्पीड़ित को संरक्षण दे सके। छत्रपति के इस कथन को सुनकर सभी उपस्थिति सरदारों सामन्तों के नेत्र सजल हो उठे। भामलेकर को अपनी भूल पर पश्चाताप हो रहा था।

🔷 इधर बेगाम को ससम्मान लौटाया हुआ देखकर बहलोल खाँ विस्मित हुए बिना नहीं रहा। वह तो सोच रहा था कि अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के हरम की शोभा बन चुकी होगी। पर बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जानकर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति पिघल उठा। पत्र में शिवाजी ने अपने सेनानायक की गलती के लिये क्षमा माँगी थी। इस पत्र को देखकर स्वयं को बहुत महान, वीर और पराक्रमी सामने वाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में शिवाजी के सामने बहुत छोटा दिखायी देने लगा। उसने निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देखकर ही दिल्ली लौटूँगा।

🔶 इसके लिए आग्रह भेजा गया। बहलोल खाँ और शिवाजी के मिलने का स्थान निश्चित हुआ। नियत तिथि समय व स्थान पर शिवाजी बहलोल खाँ के पहले ही पहुँच गये। बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चाताप आत्मग्लानि के साथ-साथ शिवाजी के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही उनके पैरों में झुक गया- “माफ कर दो मुझे मेरे फरिश्ते। बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला करूंगा। उस समय तेरी सूरत की याद मुझे थोड़ी सी ठंडक पहुँचाएगी।

🔷 ‘जो हुआ सो हुआ’ अब आगे का होश करो एक पराजित और श्रद्धावनत सेनापति को गले लगाते हुए छत्रपति शिवाजी ने कहा।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

👉 अच्छा बनने की प्रेरणा

🔶 एक नगर में एक चोर रहता था। एक दिन उसने बड़ी चोरी करने की योजना बनाई। उसमें प्राण जाने का भी खतरा था। अपने चंचल मन को स्थिर करने, सफलता की कामना करने तथा बाधाओं का निवारण करने के लिए वह चोरी से पूर्व एक मंदिर में मनौती मांगने पहुंचा। पूजा के बाद जब चोर मंदिर का घंटा बजाने लगा तो वह टूटकर उसके सिर पर आ गिरा जिससे उसकी मृत्यु हो गई। चोर के सूक्ष्म शरीर को यमदूत धर्मराज के पास ले गए।

🔷 धर्मराज ने चित्रगुप्त से उसके पाप-पुण्य का लेखा देखने को कहा। बही देखने से पता चला कि चोर ने अपने जीवन में एक दिन एक भूखे भिखारी को खाना खिलाया था। उस पुण्य के परिणाम स्वरूप उसे एक घंटे के लिए स्वर्ग ले जाकर उसकी इच्छापूर्ति करने का विधान था। जब स्वर्ग में चोर से उसकी कोई इच्छा बताने को कहा गया तो वह विचार करके बोला- “मुझे एक घंटे के लिए इंद्रासन चाहिए।”

🔶 चोर की इच्छापूर्ति के लिए देवराज इंद्र ने अपना सिहासन त्याग दिया और एक घंटे के लिए उसे स्वर्ग का राज्य दे दिया गया। इंद्रासन पर विराजते ही चोर का विवेक जाग उठा। उसने सोचा- ‘जब एक भूखे को खाना खिलाने मात्र से मुझे एक घंटे के लिए इंद्रासन मिल सकता है तो कोई ऐसा शुभ कार्य करना चाहिए जिसके प्रताप से मैं सदैव स्वर्ग का सुख भोग सकूं।’

🔷 उसने समस्त देवताओं तथा ऋषि-मुनियों का श्रद्धापूर्वक यथायोग्य सत्कार किया। उसके बाद धन-संपत्ति के स्वामी कुबेर को बुलाकर सभी अमूल्य संपत्ति दान करने का निर्देश दिया। उसने ऋषि वशिष्ठ को कामनापूर्ति करने वाली सुंदर कामधेनु दे दी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को आद्वितीय अश्व और ऋषि अगस्त्य को ऐरावत हाथी भेंट कर दिया। गलत काम करने वाले लोग हमेशा दंड से ही नहीं सुधरते, उनके किसी छोटे से अच्छे कार्य की प्रशंसा से भी उन्हें अच्छा बनने की प्रेरणा मिल सकती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 Feb 2018


👉 सादा जीवन-उच्च विचार

🔷 मानवी सत्ता शरीर और आत्मा का सम्मिश्रण है। शरीर प्रकृति पदार्थ है। उसका निर्वाह स्वास्थ्य, सौन्दर्य, अन्न-जल जैसे प्रकृति पदार्थों पर निर्भर है। आत्मा चेतन है। परमात्मा चेतना का भाण्डागार है। आत्मा और परमात्मा की जितनी निकटता, घनिष्टïता होगी, उतना ही अंतराल समर्थ होगा। व्यक्तित्व विकसित-परिष्कृत होगा। शरीरगत प्रखरता और चेतना क्षेत्र की पवित्रता जिस अनुपात में बढ़ती है, उतना ही आत्मा और परमात्मा के बीच आदान-प्रदान चल पड़ता है। महानता के अभिवर्धन का यही मार्ग है। इसी निर्धारण पर सच्ची प्रगति एवं समृद्धि अवलम्बित है।
  
🔶 दो तालाबों के बीच नाली का सम्पर्क-संबंध बना देने से ऊँचे तालाब का पानी नीचे तब तक आता रहता है, जब तक कि दोनों की सतह समान नहीं हो जाती। आत्मा और परमात्मा को आपस में जोडऩे वाली उपासना यदि सच्ची हो, तो उसका प्रतिफल सुनिश्चित रूप से यह होना चाहिए कि जीव और ब्रह्मï में गुण, कर्म, स्वभाव की समता दृष्टिïगोचर होने लगे। उपासना निकटता को कहते हैं। आग और ईंधन निकट आते हैं, तो दोनों एक रूप हो जाते हैं। इसके लिए साधक को साध्य के प्रति समर्पण करना होता है। उसके अनुशासन को जीवन नीति बनाना पड़ता है। जो इतना साहस और सद्भाव जुटा सके, वह सच्चा भक्त। भक्त और भगवान् की एकता प्रसिद्ध है। भक्त को अपनी आकांक्षा, विचारणा, आदत एवं कार्य पद्धति में अधिकाधिक उत्कृष्टïता का समावेश करना होता है। आदर्शों का समुच्चय भगवान ही, भक्त का इष्ट एवं उपास्य है।
  
🔷 भगवान् की प्रतिमाओं के पीछे उच्चस्तरीय चिंतन-चरित्र की भावना है। वह भावना न हो, तो प्रतिमाएँ खिलौना भर रह जाती हैं। सदाशयता के प्रति प्रगाढ़ आस्था बनाने में जिसका अंतराल जितना सफल हुआ, वह उसी स्तर का भगवत् भक्त है। भक्त का गुण, कर्म, स्वभाव ईश्वर के सहचर पार्षदों जैसा होना चाहिए। जिस ईश्वर भक्ति के प्रतिफलों का वर्णन स्वर्ग, मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि आदि के रूप में किया गया है, उसमें एकत्व अद्वैत, विलय, विसर्जन की शर्त है। साधक भगवान् को आत्मसात्ï करता है और उसके निर्धारण, अनुशासन में अपनाने को ही गर्व-गौरव और हर्ष-संतोष अनुभव करता है।
  
🔶 शब्द जंजाल से फुसलाने, छुटपुट उपहार देकर बरगलाने और स्वार्थ सिद्धि के लिए बहेलिये, मछुवारे जैसे छद्म प्रदर्शनों की विडम्बना रचना न तो ईश्वर भक्ति है और न उसके बदले किसी बड़े सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए। ईश्वर न्यायकारी है। उसके दरबार में पात्रता की कसौटी पर हर खरे खोटे को परखा जाता है। प्रामाणिकता ही अधिक अनुग्रह एवं अनुदान का कारण होती है। यह कार्य प्रार्थना, याचना के रूप में पूजा-अर्चा मात्र करते रहने से शक्य नहीं। ईश्वर भक्ति, कर्मकाण्ड प्रधान नहीं। उसमें भावना, विचारणा और गतिविधियों को अधिकाधिक उत्कृष्ट बनाना होता है। उसकी उपेक्षा करके मनुहार तक सीमित व्यक्ति आत्मिक उपलब्धियों से वंचित ही रहते हैं। उनके पल्ले थकान, निराशा और खीझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता।
  
🔷 जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों को हठपूर्वक निरस्त करना पड़ता है। अपने आपे से, अभ्यस्त ढर्रे से संघर्ष करने का नाम तपश्चर्या है। यह आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण है। दूसरा है योग साधना। इसका अर्थ है  दैवी विशिष्टïताओं के साथ व्यक्तित्व को जोड़ देना। गुण, कर्म, स्वभाव में चिंतन और चरित्र में उत्कृष्टïता, आदर्शवादिता का समावेश करना। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की इस उभयपक्षीय प्रक्रिया को गलाई, ढलाई, धुलाई, रंगाई भी कहते हैं। इन्हीं को पवित्रता-प्रखरता का युग्म भी कहते हैं। सज्जनता और साहसिकता का समन्वय ही आत्मिक प्रगति का सच्चा स्वरूप है। इस प्रगति के साथ भौतिक क्षेत्र के जंजाल, प्रपंच स्वभावत: घटने लगते हैं और सादा जीवन, उच्च विचार अक्षरश: चरितार्थ होने लगते हैं।
  
🔶 अन्न, जल, वायु पर शरीर की स्थिरता एवं प्रगति निर्भर है। आत्मा की प्रगति के लिए उपासना, साधना एवं आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठïता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भावभरी नियमितता। साधना अर्थात्ï जीवन साधना। संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों-मान्यताओं का उन्मूलन। आराधना अर्थात्ï लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रमदान, अंशदान। यह तीनों ही प्रयास साथ-साथ चलने चाहिए। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जो अपने आप में पूर्ण हो। इसमें से एक भी ऐसा नहीं, जिसे छोडक़र प्रगति पथ पर आगे बढऩा संभव हो सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 5)

🔶 प्रतिकूलता को सहन न कर सकना, मतभेद को स्वीकार न करना, जो चाहा गया है वही होना जैसा स्वभाव बना लेने पर आवेश आने लगता है। अधीर, जल्दबाज, समय की प्रतीक्षा न कर सकने वाले को अगली बार के प्रयास में तालमेल बैठाने जैसी सम्भावनाओं को गँवा बैठने पर आवेश चढ़ दौड़ता है। दूसरों की तनिक भी अवज्ञा, उपेक्षा सहन न कर सकने वाले भी उत्तेजित रहते देखे गये हैं। उनमें सामने वाले की स्थिति का सही निर्णय कर सकने तक की क्षमता नहीं रहती। जब बात पूरी तरह सुनी समझी ही नहीं गई तो उसमें भ्रम रहना स्वाभाविक है। आवेश भ्रमवश आया है या वस्तुस्थिति समझकर, हर हालत में उसकी परिणति हानिकारक ही होती है।

🔷 कुछ उत्तेजनाएँ ऐसी होती है जिनमें सामने वाले की गलती तो नहीं, अपनी अभिलाषा और उतावली ही प्रधान होती है। इसके कारण भी मस्तिष्क का सन्तुलन बिगड़ता है और सही निर्णय न कर पाने की स्थिति बनती है। ऐसी मनःस्थिति को सनक कहा जाता है। सनक वह, जिसमें औचित्य-अनौचित्य का, सम्भव-असम्भव का, लाभ-हानि का कुछ भी भान न रहे और अवांछनीय चिन्तन को चरितार्थ करने जैसी उद्दण्डता उभरे। सनकों की संख्या अधिक है। इनमें दो ऐसी हैं जो बहुतों पर चढ़ दौड़ती हैं और उन्हें बेतरह हैरान करती हैं। इनमें से एक है कामुकता, दूसरी है लोभ-लिप्सा। दोनों की प्रकृति तो भिन्न है फिर भी प्रतिक्रिया और परिणाम में समान हैं। वे मनुष्य के विवेक का बुरी तरह अपहरण करती हैं।

🔶 दाम्पत्य जीवन की एक मर्यादा है। नर-नारी एक सूत्र में बँधे हैं और प्रणय की सुविधा पाने के बदले उसके साथ जुड़ी हुई भारी भरकम जिम्मेदारियाँ उठाते हैं। कामुकता की स्वच्छन्दता रहने पर समाज का ढाँचा ही चरमरा जायेगा। इस आधार पर जो घनिष्ठता उत्पन्न होती है उसका निर्वाह मखौल बनकर रह जायेगा। इसी प्रकार कामुक आचरण से उत्पन्न होने वाले बालकों का भविष्य अन्धकार के गर्त में गिरेगा तथा गृहस्थ जीवन में भी निश्चिन्तता न रहेगी। विश्वास की चरम सीमा जिस दाम्पत्य जीवन में भी रहनी चाहिए, उसके न रहने पर परिवार संस्था का स्वरूप ही समाप्त हो जायेगा। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए समाज शास्त्रियों और नीति शास्त्रियों के संयुक्त प्रयास से कामुकता को दाम्पत्य जीवन तक सीमित किया गया है। यह औचित्य पूर्ण अनुशासन है जिसे इच्छा या अनिच्छा से निभाया ही जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 2)

🔶 Wherever BHAGWAN takes AVTAR, it is believed there that it happened for the purpose of elimination of unrighteousness and establishment of righteousness. We too will have to adopt both the activities simultaneously if within us comes the inspiration of BHAGWAN. We must take a stand to fight against undesirability and immorality around us and promote goodness within us and others. We must not surrender before injustice. Wherever is seen misconduct, we must gather courage to non-cooperate, oppose or whatsoever possible be done according to circumstances. Only this way orderliness can be managed in society.
                                       
🔷 Coward man, feared man, man afraid of trouble, man afraid of hooliganism cannot remove those evils and flaws and needs of removal of injustice and establishment of orderliness will not be fulfilled. To make future bright we require enlightening valour and courage in mass-mentality.
                                                
🔶 The human race seems heading to commit suicide. To stop that automated process we must revive theocracy again.  Big job require big means and big means can be managed by only big personality. Very this is my objective for which I desire greatness to be created within every conscience. Every person should concentrate more on sacrificing for social life than for personal luxuries. By reorganization I mean that we should strive for new person, new society and new Age. For this it is essential for all of us to unite for the job of person-building in order to make human being excellent and well developed.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गुरुगीता (भाग 45)

👉 साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू

🔷 गुरुगीता के प्रत्येक महामंत्र में अपरिमित आध्यात्मिक ऊर्जा समायी है। वे धन्य हैं, अति बड़भागी हैं, जो इनका गायन करते हैं, जिनका मन इन महामंत्रों की साधना करने में अनुरक्त हुआ है; क्योंकि ऐसे अपूर्व साधकों को सहज ही सद्गुरु प्रेम की उपलब्धि होगी और यह सद्गुरु प्रेम अध्यात्म जगत् का परम दुर्लभ तत्त्व है। जिसके हृदय में निष्कपट सद्गुरु प्रेम है, उसे सब कुछ अपने आप ही सुलभ हो जाता है। उसे किसी भी अन्य साधन एवं साधना की जरूरत नहीं रहती, समस्त साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरु ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-‘साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
  
🔶 गुरुनेह की भावकथा में रमे हुए शिष्यों ने इस गुरु प्रेम कथा के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन वचनों को पढ़ा है कि गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतु बन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। गुरुदेव की उपासना करने में तल्लीन रहना प्रत्येक शिष्य का कर्तृत्व है; क्योंकि उनके अनुग्रह से महान् अज्ञान का नाश होता है। गुरुदेव भगवान् सभी तरह की अभीष्ट सिद्धि देने वाले हैं; उन्हें नमन करना शिष्यों का परम धर्म है। इसका थोड़ा सा भी पालन संसार के महाभय से त्राण करने वाला है। सभी तरह की पीड़ायें गुरु कृपा से स्वयं ही शान्त हो जाती हैं।

🔷 गुरु प्रेम की इस साधना महिमा के अगले क्रम को प्रकट करते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगन्माता भवानी से कहते हैं-

पादाब्जं सर्वसंसार दावानल विनाशकम्। ब्रह्मरन्ध्रे सिताम्भोजमध्यस्थं चन्द्रमण्डले॥ ५७॥
अकथादित्रिरेखाब्जे   सहस्रदलमण्डले। हंसपार्श्वत्रिकोणे च स्मरेत्तन्मध्यगं गुरुम् ॥ ५८॥

🔶 गुरुदेव की करुणा की व्याख्या करने वाले इन महामंत्रों में साधना के गहरे रहस्य सँजोये हैं। इन रहस्यों को गुरुभक्त साधकों के अन्तःकरण में सम्प्रेषित करते हुए भगवान् भोलेनाथ के वचन हैं- गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए॥ ५७॥ यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल के बीच में सहस्रदलमण्डल पर अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए॥ ५८॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 73

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 7)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)
🔶 मित्रो! जिंदगी की बड़ी कीमत है। जिंदगी लाखों रुपये की कीमत की है, करोड़ों रुपये की है, अरबों-खरबों रुपये की कीमत की है। तुलसीदास भी जिंदगी वाला इंसान था। वासना के लिए जब व्याकुल हुआ, तो ऐसा हुआ कि बस हैरान-ही-हैरान परेशान-ही-परेशान और जब भगवान् की भक्ति में लगा, तो हमारी और आपकी जैसी भक्ति नहीं थी उसकी कि माला फिर रही है इधर और मन फिर रहा है उधर। मन के फिर रहे हैं इधर और सिर खुजा रहे हैं उधर। भजन कर रहे हैं इधर और पीठ खुजा रहे हैं उधर। भला ऐसी कोई भक्ति होती है? तुलसीदास ने भक्ति की, तो कैसी मजेदार भक्ति की कि बस पीपल के पेड़ पर से, बेल के पेड़ पर से कौन आ गया? भूत आ गया। उन्होंने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा दो। उस भूत ने कहा कि भगवान् के तो नहीं करा सकते, हनुमान् जी के करा सकते हैं। अच्छा! चलो हनुमान् जी के ही करा दो।

🔷 हनुमान् जी वहाँ रामायण सुनने जाते थे। उसने उनके दर्शन करा दिए। तुलसीदास ने हनुमान् जी को पकड़ लिया और कहा कि हमको रामचंद्र जी के दर्शन करा दीजिए। आपने पढ़ा है न तुलसीदास जी का जीवन! उन्होंने क्या किया कि रामचंद्र जी का , जिनका कि वे नाम लिया करते थे, उन रामचंद्र जी को पकड़कर ही छोड़ा। उन्होंने कहा कि रामचंद्र जी का भी ठिकाना नहीं है और मेरा भी ठिकाना नहीं है। दोनों को एक होना होगा या तो मैं रहूँगा या रामचंद्र जी रहेंगे? या तो हनुमान् जी रहेंगे या रामचंद्र जी रहेंगे?

🔶 मैं तो लेकर के हटूँगा। भला ऐसे कैसे हो सकता है कि मैं हनुमान् चालीसा पढ़ूँगा और हनुमान् जी भाग जाएँ और पकड़ में नहीं आएँ? पकड़ में कैसे नहीं आएँगे? हनुमान् को पकड़ में जरूर आना पड़ेगा। हनुमान् जी पकड़ में जरूरत आ गए। हनुमान् जी पकड़ में नहीं आए, हनुमान् जी के ताऊ रामचंद्र जी भी पकड़ में आ गए। दोनों को पकड़ लिया उसने। किसने पकड़ लिया? तुलसीदास ने। हम और आप पकड़ सकते हैं क्या? हम और आप नहीं पकड़ सकते। भूत तो पकड़ सकते हैं? नहीं पकड़ सकते। हनुमान् जी को पकड़ लेंगे? नहीं, हनुमान् जी भी पकड़ में नहीं आएँगे और रामचंद्र जी तो, भला कैसे पकड़ में आ सकते हैं? वे भी नहीं आएँगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

👉 सबसे अनमोल धरोहर

🔷 बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया"?

🔶 पिता ने कहा -"हाँ"

🔷 उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब"?

🔶 पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं।

🔷 मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं।

🔶 जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।

🔷 मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था।

🔶 तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।

🔷 तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।

🔶 मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था।

🔷 तभी तुम्हारा तीन साल का भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया, वो पहली और आखरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...

🔶 भगवान की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी...

🔷 एक पिता ने लिखा है...

🔶 हमें तो सुख मे साथी चाहिये दुख मे तो हमारी बेटी अकेली ही काफी है…

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2018


👉 एकाग्रता की अदभुद सामर्थ्य

🔶 एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है, जो मन: संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्त्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबने विचारों पर नियन्त्रण करने उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त की है।

🔷 इसके बिना चंचलता की वानरी वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्त्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। बाल चपलता का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे- विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके, तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।
  
🔶 आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है, जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं, वरन्ï विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी गयी है। प्रार्थनाएँ सामूहिक ही होती हैं। उपासना भी सामूहिक हो, तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज, गरिजाघरों में प्रेयर, मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज है। इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है। एक दिशाधारा का चिंतन हो रहा हो, तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितांत एकांत में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है।
  
🔷 कई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं और शिकायत करते हैं कि उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अंतर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा संबंध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है, उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त  हो ही जाय, यह आवश्यक नहीं है।
  
🔶 जिस एकाग्रता की आवश्यकता, अध्यात्म प्रगति के लिए बताई गयी है वह मन की स्थिरता नहीं वरन्ï चिंतन की दिशा धारा है। उपासना के समय सारा चिंतन, आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझने में लगाना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि ब्राह्मïी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है, उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 4)

🔷 क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को अपने रोष, विरोध या पराक्रम का परिचय देकर डराना होता है और यह भाव रहता है कि दबाव देकर उसे वह करने के लिए विवश किया जाय जो चाहा गया है। किन्तु देखा गया है कि यह उद्देश्य कदाचित ही कभी पूरा होता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में जिस पर अपना रौद्र रूप प्रकट किया जाता है या जिन असंस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है, उससे सामने वाले के स्वाभिमान को चोट पहुँचती है। इससे एक नई समस्या खड़ी होती है। सामने वाला क्षुब्ध होता है और प्रतिशोध लेने, नीचा दिखाने की बात सोचता है। विग्रहों में से अधिकांश की जड़ वहीं पाई जाती है। मतभेद दूर करने या अनुरोध को स्वीकारने के लिए यदि सौम्य तरीका अपनाया गया होता तो विग्रह की नौबत न आती और प्रयोजन पूरा न सही, आधा अधूरा तो सध ही जाता। क्रोध उन सभी सम्भावनाओं को परास्त कर देता है।

🔶 क्रोध एक प्रकार का सन्निपात ज्वर है जिससे आक्रान्त व्यक्ति न केवल बेचैन दीखता, हाथ पैर पीटता और अपनी दयनीय स्थिति का परिचय देता है वरन् गलत सोचता और दूसरों से अपशब्द कहता तथा दुर्व्यवहार करता भी पाया जाता है। सन्निपात ग्रस्त को रुग्णता के चंगुल में फँसा हुआ, विवश, निर्दोष भी मान लिया जाता है और दया सहानुभूति का पात्र समझ कर उसका व्यवहार भुला दिया जाता है। किन्तु क्रोध के बारे मे ऐसी बात नहीं है। उसे दरिद्र, दुष्ट, अहंकारी माना जाता है और बदले में प्रतिशोध उभरता है। क्रोधी को न केवल प्रतिशोध का प्रहार सहना पड़ता है वरन् उत्तेजना के उबाल में ढेरों रक्त जलाना पड़ता है और मनःसंस्थान की कार्यकर्त्री मशीन को तोड़-मरोड़ कर रख देने जैसा दुहरा संकट सहना पड़ता है।

🔷 क्रोध किस कारण किया गया इसे कोई नहीं देखता। आक्रोश का उन्माद एक प्रकार का आक्रमण है जिसके कारण पक्ष सही होने पर, कारण का औचित्य रहने पर भी आवेशग्रस्त को अपराधी की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है। न्याय पाने का अवसर चला जाता है। स्वभाव और व्यक्तित्व अनगढ़ होने की मान्यता यदि बनने लगे तो समझना चाहिए कि प्रामाणिकता चली गई। ऐसे लोग न दूसरे की सहानुभूति पाते हैं और न सहयोग का लाभ ले पाते हैं। शरीर जलता रहता है सो अलग, मन उबलता रहता है सो अलग।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 1)

🔷 The third job that develops internal consciousness is ‘‘Social Revolution’’. Besides opposing & going against minor flaws visible in society there is also a need to induce in life creative things to make a good society. High profile principles are such creative things that make a man society-oriented. The sentiment of ‘‘ATMVAT SARVBHUTESHU’’ must be enlightened in consciences of general masses. Every one of masses must be committed for doing to others what one expects from others. This is the primary condition that must be induced deep within public mind to trigger a social revolution.                                    
                                 
🔶 Each one of us must be convinced about ‘‘VASUDHAIV KUTUMBKAM’’ or that ‘‘the whole world is our abode’’. Not two or three houses rather the whole earth is our home and the way we take care of our home and siblings, the same way we must be careful about peace and harmony the world over and pursue the same. Social revolution can be triggered only with revival of essence of spirituality which underlines such principles that help a man to control over individualism to become society-oriented. If we could wield in our life the principle of ‘‘ATMANAH PRATIKULANI PARESHAAM NAH SAMAACHARET’’, Excellency is bound to descend in social life. If we could develop within us a tendency to mutually share our resources, we can very easily & happily survive with scale of means that we have today with us. We should earn generously and use what is earned and not consume.
                                      
🔷 Evenness must be a part of life-style. Evenness among all societies in which equality between male and female and economical structure must also be put in high steam. Each one of us must become a responsible citizen and manage our family and social affairs on principles of cooperation. We should gather and show courage like that of JATAYU in case of any injustice and impropriety seen anywhere.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 6)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसी तरह सूरदास, प्रतिभा वाले और हिम्मत वाले सूरदास जब खड़े हो गए और जो भी दिशा उन्होंने पकड़ ली, उसमें उन्होंने टॉप किया। सूरदास ने जब अपने आपको सँभाल लिया और अपने आपको बदल लिया, तब उन्होंने टॉप किया। टॉप से कम में तो वे रह ही नहीं सकते। वही बिल्वमंगल जब वेश्यागामी था तो पहले नंबर का और जब संत बना तब भी पहले नंबर का। पहले नंबर का क्यों? इसलिए कि वह भगवान् का भक्त हो गया। जब वह भगवान् का भक्त हो गया, तो फिर वह ऐसा मजेदार भक्त हुआ कि उसने वह काम कर दिखाए, जिस पर हमको अचंभा होता है। हिम्मत वाला और दिलेर आदमी जो काम कर सकता है, मामूली आदमी उसे नहीं कर सकता।

🔶 उसने अपनी आँखें गरम सलाखें डालकर फोड़ डालीं। हम और आप कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते। ऐसा कोई दिलेर आदमी ही कर सकता है। उसने दिलेरी के साथ और तन्मयता के साथ ऐसी मजबूत भक्ति की कि श्रीकृष्ण भगवान् को भागकर आना पड़ा और बच्चे के रूप में, जिनको कि वे अपना इष्टदेव मानते थे, उसी रूप में उनकी सहायता करनी पड़ी। आँखों के अंधे सूरदास की लाठी पकड़ करके टट्टी-पेशाब कराने के लिए, स्नान कराने के लिए भगवान् ले जाया करते थे और सारा इंतजाम किया करते थे। भगवान् उनकी नौकरी बजाया करते थे।

🔷 कौन से सूरदास की? उस सूरदास की, जो प्रतिभावान् था। मैं किसकी प्रशंसा कर रहा हूँ? भक्ति की? भक्ति की बाद में, सबसे पहले प्रतिभा की, समझदारी की। प्रतिभा की बात मैं कह रहा हूँ। प्रतिभा अपने आप में एक जबरदस्त वस्तु है। वह जहाँ कहीं भी चली जाएगी, जिस दिशा में भी चली जाएगी, चाहे वह जहाँ कहीं भी जाएगी, पहले नंबर का काम करेगी। तुलसीदास ने क्या काम किया? तुलसीदास ने जब अपनी दिशाएँ बदल दीं, जब उनकी बीबी ने कहा, नहीं, तुम्हारे लिए ये मुनासिब नहीं है। क्या तुम इसी तरीके से वासना में अपनी जिंदगी खत्म कर दोगे?

🔶 तुमको भगवान् की भक्ति में लगा जाना चाहिए और जितना हमको प्यार करते हो, उतना ही भगवान् से करो, तो मजा आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बदल जाए। उनको यह बात चुभ गई। हमको और आपको चुभती है क्या? नहीं चुभती। हमारी औरतें सौ गालियाँ देती रहती हैं। और फिर हम ऐसे ही हाथ-मुँह धोकर के आ बैठते हैं। वह फिर गाली सुनाती है और गुस्सा होकर के चले जाते हैं और कहते हैं कि फिर तेरे घर नहीं आएँगे और बस वह जाता है और दुकान पर बैठा बीड़ी पीता रहता है। शाम को घूम-फिरकर फिर आ जाता है। क्यों फिर आ गए? आ गए, क्योंकि उसके अंदर वह चीज नहीं है, जिसे जिंदगी कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 44)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार

🔷 भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है; किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे; लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए, तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।
  
🔶 श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानन्द की चरण धूलि इकट्ठा कर एक डिबिया में रख ली थी। स्वामी जी के खड़ाँऊ उसकी पूजा बेदी में थे। इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना उसका नित्य नियम था। इसके अलावा उसे किसी और योगविधि का पता न था। कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ उसे नहीं मालूम थी। मुद्राओं एवं बन्ध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता न था। किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान न था। अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था। इसी का वह जाप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता।
  
🔷 एक दिन प्रातः जब वह रोज की भाँति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ उनके चरणों का चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावलि प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था; पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ, जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
  
🔶 गुरु नाम की धुन के साथ ही ये दोनों श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयी और उसके अन्दर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात् उसे अनायास ही अपने आश्रम में  स्वामी भास्करानन्द ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई दिए। योग विद्या से अनभिज्ञ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा। दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया, तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनायी। लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बोले- बेटा! इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं। अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे, वही तुम्हें दिखने लगेगा।
  
🔷 स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा- ‘हे गुरुदेव, मैं तो सदा-सदा आप को ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को अपनी भौहों के बीच में लगाया करता था। यह जो कुछ भी है, आपकी चरण धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास हो गया है कि गुरुचरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भवसागर पार कर सकता है।’ लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। बस उतना ही सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति चाहिए। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 71

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

👉 तीन कसौटियाँ

🔶 प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्ध था। सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला, “मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है।”

🔷 ये सुनते ही सुकरात ने कहा, “दो पल रूकें”, “मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं ‘तीन कसौटियों का परीक्षण’ कहता हूँ।”

🔶 “तीन कसौटियाँ? कैसी कसौटियाँ?”, परिचित ने पूछा।

🔷 “हाँ”, सुकरात ने कहा, “मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि आप कैसी बात कहने जा रहे हैं, इसलिए किसी भी बात को जानने से पहले मैं इन कसौटियों से परीक्षण करता हूँ।

🔶  इसमें पहली कसौटी सत्य की कसौटी है। क्या आप सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात आप मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?

🔷 “नहीं”, परिचित ने कहा, “दरअसल मैंने सुना है कि…”

🔶 “ठीक है”, सुकरात ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि आप आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है।

🔷 चलिए, अब दूसरी कसौटी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की कसौटी कहता हूँ। मेरे मित्र के बारे में आप जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?

🔶 “नहीं, बल्कि वह तो…”, परिचित ने कहा.

🔷 “अच्छा”, सुकरात ने कहा, “इसका मतलब यह है कि आप मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और आप यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ। लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि आखिरी यानि तीसरी कसौटी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है; और वह है उपयोगिता की कसौटी।

🔶 जो बात आप मुझे बताने वाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?”

🔷 “नहीं, ऐसा तो नहीं है”, परिचित ने असहज होते हुए कहा।

🔶 “बस, हो गया”, सुकरात ने कहा, “जो बात आप मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?”

🔷 दोस्तों आज के नकारात्मक परिवेश में हमें अक्सर ऐसे लोगों से पाला पड़ता है जो हमेशा किसी न किसी की बुराईयों का ग्रन्थ लेकर घूमते रहते हैं और हमारे बीच मतभेद पैदा करने को कोशिश करते रहते हैं, इनसे निबटने के लिए सुकरात द्वारा बताई गयी इन तीन कसौटियों, सत्य की कसौटी, अच्छाई की कसौटी और उपयोगिता की कसौटी को आप भी अपने जीवन में अपनाकर अपना जीवन सरल और खुशहाल बना सकते हैं। 

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...