गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (अन्तिम भाग)

🔷 उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है। वास्तविक लाभ न अपना हो सकता है और न दूसरों का।

🔶 अस्तु आत्मबल से संबंधित सिद्धियाँ और आत्म-कल्याण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने के लिए जो वस्तुतः निष्ठावान हों उन्हें अपने गुण-कर्म स्वभाव पर गहरी दृष्टि डालनी चाहिए और जहाँ कहीं छिद्र हों उन्हें बन्द करना चाहिए। फूटे हुए बर्तन में जल भरा नहीं रह सकता- छेद वाली नाव तैर नहीं सकती, दुर्बुद्धि और दुश्चरित्र व्यक्ति इन छिद्रों में अपना सारा उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसे छूँछ बनकर खाली हाथ रहना पड़ता है।

🔷 हर दिन नया जन्म हर रात नई मौत वाली साधना इस दृष्टि से अति उपयोगी सिद्ध होती है। प्रातःकाल उठते ही यह अनुभव करना कि अब से लेकर सोते समय तक के लिए ही आज का नया जन्म मिला है। इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है। इस आधार पर दिन भर की पूरी दिनचर्या निर्धारित कर ली जाय। समय जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक कण भी बर्बाद होने की उसमें गुंजाइश न रहे। एक भी अनाचार बन पड़ने की ढील न रखी जाय। निकृष्ट स्तर पर सोचने और हेय कर्म करने पर पूरा प्रतिबन्ध लगाया जाय। इस प्रकार नित्य कर्म से लेकर आजीविका उपार्जन तक संभाषण से लेकर कर्तृत्व तक जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय।

🔶 रात को सोते समय लेखा-जोखा लिया जाय कि आज उत्कृष्टता और निकृष्टता में से किस का उपार्जन ज्यादा हुआ। पाप अधिक बना या पुण्य। भूलें प्रबल रहीं या सतर्कता जीती। इस प्रकार आत्म निरीक्षण करने के उपरान्त दूसरे दिन और भी अधिक सतर्क रहने- और भी उत्तम दिनचर्या बनाने की तैयारी करते हुए निद्रा माता को मृत्यु समझ कर उसकी गोद में शान्ति-पूर्वक जाना चाहिए। यह क्रम निरन्तर जारी रखा जाय तो जीवन में क्रमशः अधिकाधिक पवित्रता का समावेश होता चला जाता है और तदनुरूप आत्मिक प्रगति तीव्र होती चली जाती है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 10

👉 चश्मा

🔷 जल्दी -जल्दी घर के सारे काम निपटा, बेटे को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस जाने का सोच, घर से निकल ही रही थी कि... फिर पिताजी की आवाज़ आ गई, "बहू, ज़रा मेरा चश्मा तो साफ़ कर दो।" और बहू झल्लाती हुई....सॉल्वेंट ला, चश्मा साफ करने लगी। इसी चक्कर में आज फिर ऑफिस देर से पहुंची।

🔶 पति की सलाह पर अब वो सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ़ करके रख देती, लेकिन फिर भी घर से निकलते समय पिताजी का बहू को बुलाना बन्द नही हुआ।

🔷 समय से खींचातानी के चलते अब बहू ने पिताजी की पुकार को अनसुना करना शुरू कर दिया।

🔶 आज ऑफिस की छुट्टी थी तो बहू  ने सोचा - घर की साफ- सफाई कर लूँ। अचानक, पिताजी की डायरी हाथ लग गई। एक पन्ने पर लिखा था- दिनांक 23/12/17 आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सर पर रख देता। वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा...

🔷 आज पिताजी को गुजरे ठीक 2 साल बीत चुके हैं। अब मैं रोज घर से बाहर निकलते समय पिताजी का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती हूँ। उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में.....।

🔶 जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो.......  और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 Feb 2018


👉 जीवन का अर्थ

🔶 जीवन का अर्थ है- सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। निराशा का परिणाम होता है- निष्क्रियता, हताशा, भय, उद्विग्रता और अशांति। जीवन है प्रवाह, निराशा है सडऩ। जीवन का पुष्प आशा की उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने को बाध्य करता है। निराशा एक भ्रांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
  
🔷 आज तक ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, जिसके जीवन में विपत्तियाँ और विफलताएँ न आयी हों। संसार चक्र किसी एक व्यक्ति की इच्छा के संकेतों पर गतिशील नहीं है। वह अपनी चाल से चलता है। इसके अलग-अलग धागों के बीच व्यक्तियों का अपना एक निजी संसार होता है। चक्र-गति के साथ आरोह-अवरोह अनिवार्य है, अवश्यंभावी है। उस समय सम्मुख उपस्थित परिस्थितियों का निदान-उपचार भी आवश्यक है, पर उसके कारण कुंठित हो जाना, व्यक्ति के जीवन की एक हास्यास्पद प्रवृत्ति मात्र है। उसका विश्व गति से कोई भी तालमेल नहीं। निराशा व्यक्ति का अपना ही एक मनमाना और आत्मघाती उत्पादन है। ईश्वर की सृष्टि में वह एक विजातीय तत्त्व है। इसलिए निराशा का कोई भी स्वागत करने वाला नहीं।
  
🔶 सामान्य जीवन के उतार-चढ़ावों से ही जो उद्विग्र, अशांत हो जाते हैं, वे जीवन में किसी बड़े काम को करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बड़े काम तो धैर्य, अध्यवसाय तथा कठोर श्रम की अपेक्षा रखते हैं। मानसिक संतुलन वहाँ पहली शर्त है। तरह-तरह की जटिल, पेचीदी परिस्थितियाँ बड़े कामों में पैदा होती रहती हैं। अशांत, व्यग्र मन:स्थिति में डरके बीच कोई रास्ता नहीं ढूँढा जा सकता। असफलता और हताशा ही ऐसे व्यक्तियों की ललाट रेखा है।
  
🔷 संसार बना ही सफलता-असफलता दोनों के ताने बाने से है। सभी व्यक्ति असफलताओं, अवरोधों से हताश होकर, हिम्मत हारकर बैठ जाएँ, तब तो संसार की सारी सक्रियता ही नष्ट हो जाए। पतझड़ के बाद वसंत-रात्रि के बाद दिन-दु:ख के बाद सुख तो सृष्टि चक्र की सुनिश्चित गति व्यवस्था है। इसमें निराश होने जैसी कोई बात है नहीं।
  
🔶 इससे भी उच्च मन:स्थिति उन महापुरुषों की होती है, जो अपने समय की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प लेकर आजीवन चलते रहते हैं, यह जानते हुए भी कि पीड़ा का विस्तार, अतिव्यापक है और पतन की शक्तियाँ अति प्रबल हैं। अपने प्रयास का प्रत्यक्ष परिणाम संभवत: सामान्य लोगों को नहीं ही दिखे, तो भी वे लक्ष्य पथ पर धीर- गंभीर भाव से बढ़ते ही जाते हैं। वे उत्कृष्टतर मन:स्थिति में जीते हैं।
  
🔷 ऐसे ही व्यक्ति देश, समाज और युग के पतनोन्मुख प्रवाह को विपरीत दिशा में मोड़ देते हैं। अपनी गतिविधियों से आये परिवर्तनों को-नवीन दिशाधारा को वे स्वयं तो स्पष्टï देख पाते हैं, पर सामान्य व्यक्ति अपने परिवेश में कोई अधिक स्थूल परिवर्तन उस समय तक उत्पन्न नहीं देख पाने के कारण उन परिवर्तनों और सफलताओं का आकलन नहीं कर पाते।
  
🔶 विशाल वटवृक्ष के पत्तों में वायु की प्रत्येक पुलक से स्पन्दन होता है, पीपल के पत्ते हवा के हर झोकों से खड़-खड़ कर उठते हैं, पर इससे स्वयं पीपल या बरगद पर रंचमात्र हलचल नहीं होती। जबकि छोटे कमजोर पौधे झंझा के एक ही थपेड़े में लोटपोट हो जाते हैं। अवरोधों की राई को पहाड़ मान बैठने और निराशा के नैश अंधकार में ऊषा की स्वर्णिम आभा का अस्तित्व ही भुला बैठने की गलती तो नहीं ही करनी चाहिए, निराशा एक भ्रांति है, यथार्थ जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 2)

🔶 मनोरोगों में एक वर्ग अवसादजन्यों का और दूसरा आवेश स्तर वालों का है। उदासी, निराशा, भय, चिन्ता, आशंका, अविश्वास जैसों की गणना अवसाद वर्ग में आती है। वे मनुष्य को ठंडा कर देते हैं और लो ब्लड प्रेशर की तरह उस स्थिति में नहीं रहने देते कि कुछ करते-धरते बन सके। इन व्याधियों से आक्रान्त व्यक्ति पक्षाघात पीड़ित अपंगों की तरह दीन हीन बने गई गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। उन पर अभागे होने का लांछन लगता है, जो अनुकूलता रहते हुए भी सही चिन्तन और सही प्रयास बन पड़ने के कारण ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। इतने पर भी उन्हें उपद्रवियों की तुलना में भारभूत होते हुए भी किसी प्रकार सहन कर लिया जाता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज खुद तो अशक्त वयोवृद्ध की तरह चारपाई पकड़े रहता है, पर दूसरों से अपना भार उठवाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार का त्रास नहीं देते।

🔷 उपद्रवी मनोरोगों में क्रोध, आवेश, सनक, आक्रमण, अपराध जैसे कुकृत्यों की गणना होती है। वस्तुतः यह सभी विकृत अहंकार के बाल-बच्चे हैं। निज की अहमन्यता और दूसरे का असम्मान करने का दुस्साहस ही उस स्तर की विक्षिप्तता को जन्म देते हैं। सामान्य शिष्टाचार और सज्जनोचित सौजन्य की मर्यादा है कि अपनी नम्रता, विनम्रशीलता बनाये रखी जाय और सम्पर्क में आने वालों को सम्मान दिया जाय। जो इतना कर पाते हैं उनकी गणना सभ्य नागरिकों के लिए आवश्यक शिष्टाचार के जानकार में की जाती है, भले मानसों की पंक्ति में बिठाया जाता है।

🔶 किन्तु जो ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे दूसरों का जितना तिरस्कार करते हैं उससे कही अधिक मात्रा में स्तर गिरा लेने के रूप में निज की हानि कर चुके होते हैं। ऐसे ही नागरिक मर्यादाओं से अपरिचित या अनभ्यस्त लोग क्रोधी कहे जाते हैं। वे अपनी ही मान्यता या मर्जी को सब कुछ मानते हैं। दूसरे की सुनते ही नहीं। यह नहीं सोचते कि अपना निर्धारण सही भी है या नहीं। सही हो तो भी यह आवश्यक नहीं कि दूसरे उसे उसी रूप में मानने या कर सकने की स्थिति में भी है या नहीं। जो अपनी ही अपनी चलाते हैं, दूसरों की स्थिति समझने और विचार विनिमय से मतभेद दूर करने की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही लोग बात-बात पर आग बबूला होते और क्रोध में लाल-पीले होते देखे गये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to become a Pursuer (SADHAK)? (Part 2)

🔶 ARJUN DEV neither did anything nor got done anything, he rather built himself. That is why his GURUDEV deemed him to be a fit person. The seven-hermits (SAPTRISHIs) built/improved themselves. They had wealth of austerity and knowledge within themselves. Wherever they lived, whatever thereafter they did was categorized as work of great level. Had their personalities been of low standard, how it could do?
                                   
🔷 A tendency to further improve own personality was always seen in Gandhi JI. This led thousands of people to follow him. BUDDHA continued to improve himself to subsequently inspire thousands of people to follow him. We must generate magnetism within us. Iron ores & particles gather at a place within mines because of presence of certain magnetic field within the Mine appealing other iron particles from all around the magnetic area within mines scattered in a vast area. The mine continues to drag iron particles from all around. We should improve our qualities. We should improve our magnetism. We should improve our personalities for very this is the biggest challenge or assignment for us to complete.
                                           
🔶 We serve the society. Yes! It is good, that too you should do but what I say is that even more important is to improve your being. Metal that is drawn out of mines happens to be ore but when it is cooked on fire to be refined, the same impure metal becomes famous as pure gold, pure silver or pure steel. We must make ourselves like steel, gold etc. we should wash ourselves, clean ourselves and improve ourselves.

🔷 If this much could be done, must be understood has been done what was to be done. It must be understood that answer has been found. Social service too must be done but priority must be accorded to make oneself a tool for that purpose. It is far more important to endeavor to rectify, refine and improve oneself. Do social service also but do not forget that self-improvement is a never-ending process. Friends let me say one more thing before I finish.
                                    
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 4)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 समझदारी जहाँ कहीं भी होगी, न जाने क्या-से-क्या करती चली जाएगी? समझदार आदमी आर्थिक क्षेत्र में चला जाएगा, तो वो मोनार्क पैदा हो जाएगा और हेनरी फोर्ड पैदा हो जाएगा। पहले ये छोटे-छोटे आदमी थे। नवसारी गुजरात का एक नन्हा-सा आदमी, जरा-सा आदमी और समझदार आदमी अगर व्यापार क्षेत्र में चला जाएगा, तो उसका नाम जमशेद जी टाटा होता चला जाएगा। राजस्थान का एक अदना-सा आदमी जुगल किशोर बिड़ला होता चला जाएगा। अगर आदमी के अंदर गहरी समझदारी हो तब? तब एक नन्हा-सा आदमी, जरा सा आदमी, दो कौड़ी का आदमी जिधर चलेगा, अपनी समझदारी के साथ, वह गजब ढाता हुआ चला जाएगा।

🔶 मित्रो! गहरी समझदारी की बड़ी कीमत है। गहरी समझदारी वाले सुभाषचंद्र बोस गजब ढाते हुए चले गए। सरदार पटेल एक मामूली से वकील। यों तो दुनिया में एक ही नहीं, बहुत सारे वकील हुए हैं, लेकिन पटेल ने अपनी क्षमता और प्रतिभा यदि वकालत में खरच की होती, तो शायद अपनी समझदार अक्ल की कीमत एक हजार रुपया महीना वसूल कर ली होती और उन रुपयों को वसूल करने के बाद में मालदार हो गए होते और उनका बेटा शायद विलायत में पढ़कर आ जाता और वह भी वकील हो सकता था।

🔷 उनकी हवेली भी हो सकती थी और घर पर मोटरें भी हो सकती थीं, लेकिन वही सरदार पटेल अपनी समझदारी को और अपनी बुद्धिमानी को लेकर खड़े हो गए। कहाँ खड़े हो गए? वकालत करने के लिए। किसकी वकालत करने के लिए? काँग्रेस की वकालत करने के लिए और आजादी की वकालत करने के लिए। जब वे वकालत करने के लिए खड़े हो गए, तो कितनी जबरदस्त बैरिस्टरी की और किस तरीके से वकालत की और किस तरीके से तर्क पेश किए और किस तरीके से उनने फिजाँ पैदा की कि हिंदुस्तान की दिशा ही मोड़ दी और न जाने क्या-से-क्या हो गया?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 42)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार
🔶 गुरुगीता का गायन शिष्यों के अन्तर्मन को गुरुभक्ति से भिगोता है। उनके हृदय में सद्गुरु समर्पण के स्वर फूटते हैं। मन-प्राण में गुरुवर के लिए अपने सर्वस्व को  न्योछावर करने की उमंग जगती है। अन्तर्चेतना में सद्गुरु की चेतना झलकने और छलकने लगती है। जिन्होंने भी गुरुगीता की अनुभूति पायी है- सभी का यही मत है। साधनाएँ अनेक हैं, मत और पथ भी अनगिनत हैं; पर गुरुभक्तों के लिए यही एक मंत्र है—अपने गुरुदेव का नाम। उनका एक ही कर्म है, अपने गुरुवर की सेवा। उनमें सदा एक ही भाव विद्यमान रहता है, गुरुदेव के प्रति समर्पण का भाव। जिन्दगी के सारे रिश्ते-नाते, सभी सम्बन्ध गुरुदेव में ही हैं। उनके सिवा त्रिभुवन में न कोई सत्य है और न कोई तथ्य।
  
🔷 उपर्युक्त मंत्रों में भगवान् भोलेनाथ के इन वचनों को हमने पढ़ा है कि दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले प्राणायाम का भला क्या प्रयोजन है? अरे! गुरुवर की चेतना के अन्तःकरण में उदय होने मात्र से बलवान वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है। ऐसे गुरुदेव की निरन्तर सेवा करनी चाहिए; क्योंकि इससे सहज ही आत्मलाभ हो जाता है। अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा चिन्तन भी शिव-चिन्तन के समान है। उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी शिव-कीर्तन के बराबर है। सद्गुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण-शिष्यों के जीवन का सार है। इस सरल; किन्तु समर्थ साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।

🔶 गुरु भक्ति की इस साधना महिमा के अगले क्रम को स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव जगन्माता पार्वती से कहते हैं-

यत्पादरेणुकणिका काऽपि संसारवारिधेः। सेतुबंधायते नाथं देशिकं तमुपास्महे॥ ५५॥
यस्मादनुग्रहं लब्ध्वा महदज्ञानमुत्सृजेत्। तस्मै श्रीदेशिकेन्द्राय नमश्चाभीष्टसिद्धये॥ ५६॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 69

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 5)

🔶 आत्मिक प्रगति के लिए उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम क्रिया प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि की छह मंजिली इमारत बनानी ही चाहिए पर उससे पहले यम नियम का ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए। मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।

🔷 ओछी मनोभूमि के व्यक्ति यदि किसी प्रकार किसी तन्त्र-विधि से कुछ लाभ वरदान प्राप्त भी करलें तो भी वह अन्ततः उनके लिए विपत्ति ही सिद्ध होगी। आमाशय में अर्बुद और आंतों में व्रण से संत्रस्त रोगी यदि मिष्ठान पकवान खा भी लें उसके लिए वे बहुमूल्य और पौष्टिक होते हुए भी कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे। जबकि पेट से स्वस्थ सबल होने पर ज्वार, बाजरा भी पुष्टिकर सिद्ध होते हैं। रहस्यमय अनुष्ठान साधनों की मन्त्र प्रक्रिया एवं साधना विधि की गरिमा इन पंक्तियों में कम नहीं की जा रही है और न उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।

🔶 अच्छी उपज लेने के लिए केवल अच्छा बीज ही पर्याप्त नहीं, अच्छी भूमि भी होनी चाहिए। पूजा विधान बीज है और साधक की मनोभूमि खेत। किसान भूमि जोतने, सींचने, संभालने में छह महीने लगाता है और बीज बोने में एक दिन। यदि अन्तःकरण निर्मल बना लिया जाय तो थोड़ा सा मंत्र साधन की शबरी जैसे अनजान साधकों को भी सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। इसके विपरीत कर्म-काण्ड में पारंगत कठोर प्रयत्न रत होने पर भी मिली हुई सफलता उल्टी विनाशकारी होती है। दूषित मनोवृत्ति बनाये रहने के कारण रावण, कुम्भ-करण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि को दुर्गति के गर्त में गिरना पड़ा। वह तप तथा वरदान उनके अहंकार और अनाचार को बढ़ाने में- सर्प को दूध पिलाने की तरह अनर्थ मूलक ही सिद्ध हुए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 9

👉 पेड़

🔶 एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

🔷 बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।

🔶 एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।"

🔷 बच्चे ने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है मुझे पढना है, लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे, इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"

🔷 उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया। आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

🔶 एक दिन वो फिर आया और कहने लगा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"

🔷 आम के पेड ने कहा, "तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।" उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

🔶 आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था।

🔷 पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी। फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा, "शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"

🔶 आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।"

🔷 वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा, "आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"  इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

🔷 वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों।

🔶 जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई।

🔷 आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

🔶 जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 Feb 2018

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 1)

🔶 शरीर का तापमान सीमित और स्थिर रहे तो ही वह अपना दैनिक सामान्य क्रम ठीक तरह चलाते रह सकने की स्थिति में रहता है। उसमें घट-बढ़ हो तो मुसीबत खड़ी होती है। बढ़े हुए तापमान को ज्वर माना जाता है और बेचैनी उत्पन्न करता है। घट जाने पर शीत रोग में भी प्राण संकट उत्पन्न होता है। यही बात रक्तचाप के सम्बन्ध में भी है। हाई ब्लड प्रेशर के मरीज उद्विग्न रहते, अनिद्रा, चक्कर आदि की शिकायत करते हैं। लो ब्लड प्रेशर में शिथिलता आ घेरती है और ऐसी स्थिति बनती है मानों उठने चलने तक की सामर्थ्य नहीं रही। शरीर स्वस्थ तभी माना जायेगा जब तापमान, रक्तचाप आदि की स्थिति सामान्य रहे। असामान्य होने पर वह दैनिक काम-काज करने योग्य नहीं रहता और रोगियों जैसी चिन्ताजनक व्यथा सहन करता है।

🔷 यही बात मस्तिष्क के सम्बन्ध में भी है। उस पर सिरदर्द, आधासीसी, अनिद्रा, विस्मृति, उन्माद, अपस्मार जैसे रोग तो यदा कदा ही चढ़ते हैं, जिनकी हानि उपरोक्त रोगों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। सिर रोगों का कारण, निदान, उपचार जानने के लिए चिकित्सकों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, किन्तु तनाव वर्ग की आधि-व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका कारण, निदान और उपचार थोड़ी गहराई तक उतरने पर हर व्यक्ति स्वयं ही जान सकता है। जान ही नहीं, यदि चाहे तो उनका उपचार भी बिना किसी की सहायता के स्वयमेव भी कर सकता है।

🔶 शिरोरोग शरीर को क्षति पहुँचाते और उसकी क्रियाशक्ति को कुंठित बनाते हैं। किन्तु मनोरोगों की हानि उससे कहीं अधिक हैं। मन मस्तिष्क ही चिन्तन, निर्धारण की अति महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। यदि वह ठीक तरह न बन पड़े तो मनुष्य न केवल अपंग निरर्थक जैसी बन जाता है, वरन् उन्मादियों की तरह विग्रह भी खड़े करता है। स्वयं हैरान होता और दूसरों को हैरानी में डालता है। निर्वाह कठिन हो जाता है। साथियों से पटरी नहीं बैठती है। गलत निर्णय होते रहने पर अनुकूलता भी प्रतिकूलता बनती जाती है। मित्रों का घटना और शत्रुओं का बढ़ना आरम्भ हो जाता है। फलतः ऐसा व्यक्ति उपेक्षा और तिरस्कार सहता है।

🔷 कहना न होगा कि ऐसे व्यक्ति के पल्ले असफलताओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता है। क्षमताओं के सुनियोजन से ही प्रगति और सम्पन्नता हाथ लगती है। जब वे अवांछनीय कृत्यों में नष्ट-भ्रष्ट होने लगेंगी तो फिर सामान्य या महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक भी करते धरते न बन सकेगा। ऐसे व्यक्ति या तो जिस-तिस पर बरसते हैं, अपने ऊपर खीजते हैं या और किसी से बस न चलने पर भाग्य, भगवान, देवता या किसी के द्वारा जादू कर दिये जाने, वैर निबाहने जैसे बहाने गढ़कर किसी कदर मन हलका करते हैं। इन विडम्बनाओं के अपनाने पर भी कुछ काम नहीं बनता, स्थिति यथावत बनी रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to become a Pursuer (SADHAK)? (Part 1)

🔶 Many of SADHAKs keep questioning me- what to do? What to do? I keep telling each of them not to ask that rather ask what to become? What to become?  Your becoming something is more important than your doing something because thereafter will be righteous what you will be doing. If you only try to become a modeling tool then any watered clay coming in contact with you would be converting into a toy like you and of your wish. Be a sun, you will move and shine and result? People coming in your contact will accompany you and shine. Nine planets and 32 satellites all are with the sun; all shine and keep moving in tune with the sun because the sun moves. We must do that.
                                    
🔷 We must be glorious. We will see that the masses which we wished otherwise to follow us; to copy us will be following us. What is ridiculous is to expect others to move with a stagnant figure, to follow a static figure. Dissolve yourself like a seed to become a tree to subsequently produce from within you many seeds like you. You need seeds and ask others to bring seeds for you--it is quite ridiculous. Why not you produce seeds from within you?  Why not you produce fruits from within you to subsequently produce seeds from those fruits?
                                          
🔶 Friends! People who have built themselves never required asking such questions like what to do? Their every action itself implied what to do. So attractive were their personalities and that was enough to mark the peak of success and greatness. ARJUN DEV used to wash pans and mould himself in tune with discipline of his GURUDEV. His GURUDEV, when required to nominate his successor out of many pupils that time, selected ARJUN DEV as his befitting successor despite the fact that many others were seniors and more learned ones. His GURUDEV RAMDAS justified his choice by saying that ARJUN DEV had built/improved himself while rest of candidates were busy in what they could get done by others and what they themselves do, whereas it should have been aimed at improving themselves.
                                    
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 3)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! हमको समाज में सोए हुए, गड़े हुए कुंभकरणों को जगाना चाहिए। कुंभकरणों की कमी है क्या? नहीं, इनकी कमी नहीं है, पर वे सो गए हैं। हमारा एक काम यह भी होना चाहिए कि जहाँ कहीं भी आपको विभूतिवान् मनुष्य दिखाई पड़ें, तो आपको उनके पास बार-बार चक्कर काटना चाहिए और बार-बार उनकी खुशामद करनी चाहिए।

🔶 विभूतिवान् लोगों में एक तबके के वे लोग आते हैं, जिनको हम विचारवान् कहते हैं, समझदार कहते हैं। समझदार मनुष्य इस ओर चल पड़ें, तो भी गजब ढा देते हैं और उस ओर चल पड़ें, तो भी गजब ढा देते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना बड़े समझदार आदमी थे और बड़े अक्लमंद आदमी थे। मालबार हिल के ऊपर मुंबई में उनकी कोठी बनी हुई है। उनके यहाँ चालीस जूनियर वकील काम करते थे और केस तैयार करते थे। मोहम्मद अली जिन्ना केवल बहस करने के लिए हाईकोर्ट में जाते थे और एक-एक केस का हजारों रुपया वसूल करते थे-उस जमाने में। मोतीलाल नेहरू के मुकाबले के आदमी थे। उनमें बड़ी अक्ल थी, बड़े दिमाग वाले थे। बड़ा दिमाग वाला, अक्ल वाला मनुष्य इधर को चले, तो भी गजब और उधर को चले, तो भी गजब। सही भी कर सकता था वह तथा गलत भी। यही हुआ।

🔷 मोहम्मद अली जिन्ना एक दिन खड़े हो गए और पाकिस्तान की वकालत करने लगे, पाकिस्तान की हिमायत करने लगे। परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि सारे पाकपरस्तों के अंदर उन्होंने एक ऐसी बगावत का माद्दा पैदा कर दिया, ऐसी लड़ाई पैदा कर दी, जेहाद पैदा कर दी और न जाने क्या-क्या पैदा कर दिया कि एक ही देश के लोग एक दूसरे के खूनी हो गए, बागी हो गए। खूनी और बागी होकर के जहाँ-तहाँ दंगे करने लगे। आखिर में गाँधीजी को यह बात मंजूर करनी पड़ी कि पाकिस्तान बनकर ही रहेगा। निर्णय सही था कि गलत, यह चर्चा का विषय नहीं है। वास्तविकता यह जाननी चाहिए कि यह जहर किसने बोया? यह जहर उस आदमी ने बोया, जिसको हम समझदार कहते हैं और अक्लमंद कहते हैं, मोहम्मद अली जिन्ना कहते हैं। यह तो मैं उदाहरण दे रहा हूँ। मनुष्यों का क्या उदाहरण दूँ, मैं तो समझदारी का उदाहरण दे रहा हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 41)

👉 गुरुकृपा से असंभव भी संभव है

🔶 गुरुगीता के इन मन्त्रों के अर्थ को अधिक स्पष्ट रीति से समझने के लिए गुरुभक्ति साधना की एक सत्यकथा साधकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कथा आदि गुरु शंकराचार्य एवं उनके शिष्य तोटकाचार्य से सम्बन्धित है। आचार्य शंकर उन दिनों बद्रीनाथ धाम में वेदान्त दर्शन पर अपने प्रसिद्ध शारीरक भाष्य को लिख रहे थे। वेदान्त दर्शन यानि कि ब्रह्मसूत्र पर यह सुप्रसिद्ध भाष्य है। इसकी एक-एक पंक्ति में वेदान्त साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य सँजोये हैं। हिमालय के शुभ्र धवल शिखरों की छाँव में भगवान् नारायण की पावन तपस्थली में उन दिनों आचार्य की लेखन पयस्विनी प्रवाहित हो रही थी। आचार्य का प्रायः सम्पूर्ण दिन अपने एकान्त चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।
  
🔷 आदिगुरु भगवान् शंकराचार्य के शिष्यों में पद्मपाद, सुरेश्वर आदि परम विद्वान् शिष्य थे। विद्वान् शिष्यों की इस मण्डली में एक मूढ़मति मन्दबुद्धि, बेपढ़ा-लिखा एक बालक भी था। यह बालक बिना पढ़ा-लिखा भले ही था, उसकी बुद्धि भले ही तीव्र न थी; परन्तु उसका हृदय आचार्य के प्रति भक्ति से भरा था। आचार्य उसके लिए सर्वस्व थे। आचार्य की सेवा ही उसका जीवन था। इसके अलावा उसे और कुछ भी न आता था। उसकी मूढ़ता और मन्दबुद्धि पर कभी-कभी आचार्य के अन्य शिष्य उपहास भी कर लेते थे। पर इससे उसे कोई फर्क न पड़ता था। वह तो बस गुरुगत प्राण था। गुरुसेवा के अलावा उसे और कोई चाह न थी। फिर भी आचार्य न जाने क्यों उसे अपनी सायं कक्षा में बुलाना न भूलते थे।
  
🔶 एक दिन आचार्य की नियमित कक्षा का समय हो गया था। पद्मपादाचार्य, सुरेश्वराचार्य, हस्तामलकाचार्य आदि सभी भगवान् शंकराचार्य के श्रीचरणों के समीप आ जुटे थे; किन्तु आचार्य का वह सेवक शिष्य दिखाई नहीं दे रहा था। आचार्य को उसी की प्रतीक्षा थी। वह रह-रहकर इधर-उधर देख लेते। कक्षा में विलम्ब हो रहा था। उपस्थित शिष्यों में से प्रत्येक को प्रतीक्षा असह्य हो रही थी। सभी को भारी उत्सुकता थी कि उनके गुरुदेव ने आज नया क्या लिखा है। यह उत्सुकता अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँची, पर कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। अन्त में पद्मपाद ने साहस किया, पाठ प्रारम्भ करने की कृपा करें भगवन्। वत्स! मुझे अपने एक शिष्य की प्रतीक्षा है। आचार्य ने उत्तर दिया। पर वह तो निरा विमूढ़ है भगवन्! उसका आना न आना दोनों ही एक जैसे हैं। पद्मपाद के स्वरों में विनम्रता होते हुए भी एक खीझ थी।
  
🔷 आचार्य भगवत्पादशंकर से यह बात छुपी न रही। उन्होंने यह जान लिया कि उनके इन विद्वान् शिष्यों को अपनी विद्वता का कुछ अभिमान हो आया है। शिष्यों का गर्वहरण करने वाले आचार्य शंकर मुस्कराए और एक क्षण के लिए ध्यानस्थ हो गए। उनका वह शिष्य, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी, उन्हीं के वस्त्र धोने के लिए गया था। यह उसका नित्य का कार्य था; किन्तु आज अचानक उसके अन्तःकरण में समस्त विद्याएँ एक साथ प्रकाशित हो गयी। वह गुरुकृपा की इस अनुभूति पर कृतकृत्य हो गया। अपने कांधे पर गुरुदेव के धुले वस्त्रों को लिए हाथ जोड़े तोटक छन्दों में आचार्य की स्तुति करते हुए वह चला आ रहा था।

विदिताखिलशास्त्र सुधा जलधे, महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
हृदये कमले विमलं  चरणं, भवशंकरदेशिक मम शरणम्॥
करुणावरुणालय पालयमाम्, भवसागरदुःखविदून हृदम्।
रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं, भव शंकरदेशिकमम शरणं॥

🔷 तोटक छन्द में स्व स्फुरित इस गुरु वन्दना को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी अवाक् रह गए। उन्हें भारी अचरज तो तब हुआ, जब उसे आचार्य ने आदेश दिया- वत्स! आज मेरे स्थान पर तुम इन्हें ब्रह्मसूत्र पर मेरे मन्तव्य को समझाओ। इतना ही नहीं, तुम इनके सम्मुख उन सूत्रों की व्याख्या भी करो, जिन पर अभी मैंने भाष्य नहीं लिखा है। तोटकाचार्य- जो आज्ञा गुरुदेव! कहकर आचार्य की आज्ञा का पालन कर दिखाया। तोटकाचार्य की अनायास उदित हुई प्रखर प्रतिभा को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो गयी कि तोटकाचार्य पर गुरु-कृपा बरस गयी है। त्राहिमाम गुरुदेव! कहते हुए सभी शिष्य आचार्य के चरणों में गिर पड़े। आचार्य ने उन्हें निराभिमानी बनने की सलाह दी। सभी अनुभव कर रहे थे कि गुरु-कृपा से सब कुछ सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 67

👉 नफरत को ख़त्म करके अपने विचारों को शुद्ध करें


🔶 ये मनुष्य की प्रकृति है कि वो नकारात्मक चीजों को बहुत जल्दी पकड़ता है। परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष के बारे में बहुत कम लोग सोचते है। कोई भी स्थिति हो हम सबसे पहले दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ते हैं, उनकी गलतियाँ तलाश करते हैं और फिर बिना सोचे समझे लग जाते हैं उन पर आरोप, इल्ज़ाम लगाने में।

🔷 किसी से कोई काम गलत हो गया, किसी से कोई गलती हो गयी, किसी ने हमारे अनुसार काम नहीं किया, कोई हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा तो बस आरोपों का सिलसिला शुरू। और कभी कभी इस प्रक्रिया में हम दूसरों के प्रति अपने मन में इस कदर नफरत पाल लेते हैं कि हर पल वो नफरत हमें परेशान करती है। और कभी कभी तो हम ऐसी फ़ालतू बातों को लेकर नफरत करने लग जाते है जिसका सामने वाले को पता तक नहीं होता। हम अकेले ही घुटते रहते हैं मरते रहते है और सामने वाला उस बारे में सोच तक नहीं रहा होता है।

🔶 एक बार की बात है। एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल से गुजर रहे थे। जंगल से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि एक नदी किनारे एक लड़की चट्टान पर बैठी हुई है। लड़की ने संत को प्रणाम करके कहा, ” महाराज!  मैं ये नदी पार करके सामने के गाँव में जाना चाहती हूँ, परन्तु नदी के बहाव को देखकर, इसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। लड़की ने संत से प्रार्थना करते हुए कहा, ”महाराज!  शाम होने को है और मुझे अपने घर पहुँचना है, अगर आप मुझे नदी पार करवा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी।”

🔷 संत ने एक पल के लिए कुछ विचार किया। फिर उन्होंने उस लड़की को अपनी पीठ पर बिठाया और तैर कर नदी के पार उतार दिया। लड़की ने संत को प्रणाम करके विदा ली। शिष्य संत के इस व्यवहार को देख कर विस्मित सा हो रहा था। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।

🔶 तीन महीने बाद, एक दिन दोनों गुरु शिष्य पेड़ के नीचे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे। एकाएक शिष्य चिल्ला उठा, ”बस अब और नहीं, मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता। उसने संत से कहा, महाराज!  मुझे यकीन नहीं होता कि आपने एक संत होते हुए भी एक स्त्री को छुआ और उसे पीठ पर बैठा कर नदी के पार उतारा। मैंने आपको एक सच्चा संत मान कर आपकी दिन-रात सेवा की और आपने ये कर्म किया? आपने न केवल मेरा विश्वास तोड़ा है बल्कि आपने तो उस परमात्मा को भी धोखा दिया है। आप संत नहीं हो सकते।”

🔷 अपने शिष्य के वचन सुनकर संत हल्के से मुस्कुराये और बोले, ”वत्स, मैंने उस स्त्री को केवल दो मिनट में नदी के उस पार उतार दिया। क्योंकि मानव सेवा और समाज का भला ही एक संत का उदेश्य होता है। उस दिन के बाद एक पल के लिए भी वो स्त्री मेरे मन या स्मरण में नहीं रही। परन्तु तुमने हर पल उसको अपने मन में रखकर, पिछले तीन महीने उसके साथ बिताये है। ध्यान के समय, विचरण करते समय, भोजन करते हुए, पल-पल वो तुहारे साथ थी। वो रह रही थी उस नफरत में, जो तुम्हारे मन में घर कर गयी, उसने तुम्हारी विचार करने की शक्ति पर भी अधिकार कर लिया।”

🔶 फिर संत ने शिष्य को समझाते हुए कहा, “वत्स, मनुष्य के अंदर ह्रदय ही वो स्थान है जहां शांति और शुद्धता का वास ज़रूरी है। जीवन के सफ़र में साथ चलने वाले राहगीरों के कार्यो से हमारे मन में अशुद्धता का आगमन नहीं होना चाहिए। मानव सेवा और समाज का भला करते हुए हमें अपने हृदय में अशुद्ध  विचारों को कभी नहीं आने देना चाहिए।”

गुरु की बात सुनकर शिष्य निरुत्तर हो गया।

🔷 मित्रों, हमारे साथ भी ज़्यादातर ऐसा ही होता है। हममें से भी ज़्यादातर लोग परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष को ना देखते हुए उसके नकारात्मक पक्ष को पकड़ कर बैठ जाते हैं। फिर वे नकारात्मक विचार धीरे धीरे नफरत में बदल जाते हैं और हमारे जीवन के हर एक पल में इस कदर शामिल हो जाते हैं कि उठते, बैठते, सोते, जागते, खाना खाते हुए, कुछ भी काम करते हुए हर पल हमें परेशान करते हैं। हम अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। जबकि कभी कभी उस नकारात्मक विचार या नफरत को कोई मतलब ही नहीं होता है।

🔶 तो मित्रों, फ़ालतू के नकारात्मक विचारो को, नफरत को अपने दिलो दिमाग से निकाल दो। परिस्थितियों के सकारात्मक पक्ष को देखते हुए सभी पहलुओं पर विचार करो तथा सकारात्मक विचारों से अपने मन को शुद्ध करें और समाज का भला करते हुए अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का प्रयास करें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Feb 2018


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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...