बुधवार, 28 जून 2023

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 2)

अयोग्य विद्यार्थी का न तो कोई वर्तमान होता है और न भविष्य। वह निकम्मा, चाहे दुःख हो, चाहे प्रसन्न कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस प्रकार पतन द्वारा पाई असफलता तो दुःख का हेतु है, किन्तु पुरुषार्थ से अलंकृत प्रयत्न की असफलता दुःख खेद का नहीं, चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।

प्रायः आर्थिक उतार लोगों को बहुत दुःखी बना देता है। जिसका लंबा−चौड़ा व्यापार चलता हो। लाखों रुपये वर्ष की आमदनी होती हो, सहसा उसका रोजगार ठप हो जाए, कोई लंबा घाटा पड़ जाए, हैसियत, बिगड़ जाए और वह असाधारण से साधारण स्थिति में आ गिरे तो वह अवश्य ही दुःखी और शोक−ग्रस्त रहने लगेगा। फिर भी इस आर्थिक उतार का शोक करना उचित नहीं। क्योंकि शोक करने से स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। यदि शोक करने और दुःखी रहने से स्थिति में सुधार की आशा हो तो एक बार शोक करना और दुःखी रहना उस स्थिति में किसी हद तक उचित कहा जा सकता है। किन्तु यह सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विपन्नता का उपचार दुःखी रहना नहीं, बल्कि उत्साहपूर्वक पुरुषार्थ करना ही है। तथापि लोग उल्टा आचरण करते हैं। यह कम खेद की बात नहीं है।

सम्पन्नता से विपन्नता में आ जाने पर लोग क्यों दुःखी रहते हैं? इसके अनेक कारण होते हैं। इसका एक कारण तो है अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करना। दूसरा कारण है दूसरों की संपन्न स्थिति को सामने रखकर अपनी स्थिति देखना। तीसरा कारण है, सामाजिक अप्रतिष्ठा की आशंका करना चौथा कारण है लज्जा और आत्म−हीनता का भाव रखना। और पाँचवाँ कारण है, विगत वैभव का व्यामोह। यह और इसी प्रकार के अन्य कारणोंवश लोग अपने आर्थिक उतार पर दुःखी और शोकग्रस्त रहा करते हैं। किन्तु यदि इन कारणों पर गहराई से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इन कारणों को सामने रखकर अपनी विपन्नता पर शोक करना बड़ी हल्की और निरर्थक बात है। इनमें से कोई कारण तो ऐसा नहीं, जिसे शोक का उचित सम्पादक माना जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.56


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मंगलवार, 27 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 June 2023

जिन आन्दोलनों के पीछे तप नहीं होता वह कुछ समय के लिए तूफान भले ही मचा ले, पर अंत में वे असफल हो जाते हैं। जिन आत्माओं के पीछे तपस्या नहीं रहतीं वे कितनी ही चतुर, चालाक, गुणी, धनी क्यों न हो, महापुरुषों की श्रेणी में नहीं गिनी जा सकतीं। वे मनुष्य जिन्होंने मानव जाति को ऊँचा उठाया है, संसार की अशान्ति को दूर करके शान्ति की स्थापना की है, अपना नाम अमर किया है, युग प्रवाह को मोड़ा है, वे तप-शक्ति से संपन्न रहे हैं।

हमारा कर्त्तव्य है कि हम लोगों को विश्वास दिलावें कि वे सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और इस संसार में एक ही ध्येय को पूरा करना उनका धर्म है। उनमें से प्रत्येक मनुष्य इस बात के लिए बाधित है कि वह अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिन्दा रहे। जीवन का ध्येय कम या ज्यादा संपन्न होना नहीं, बल्कि अपने को तथा दूसरों को सदाचारी बनाना है। अन्याय और अत्याचार जहाँ कहीं भी हों उनके विरुद्धा आन्दोलन करना एकमात्र अधिकार नहीं, धर्म है और वह भी ऐसा धर्म जिसकी उपेक्षा करना पाप है।

लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अर्ध्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं, पर यदि मिला तो अपनी इस देव प्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते हैं, पर अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 1)

यों तो जरा−जरा सी बात पर दुःखी होना बहुत से लोगों का स्वभाव होता है। यह स्वभाव किसी प्रकार भी वाँछनीय नहीं माना जा सकता। मनुष्य आनन्दस्वरूप है, उसका दुःखी होना क्या? उसे तो हर समय प्रसन्न, आनन्दित तथा उत्साहित ही रहना चाहिए। यही उसके लिए वाँछनीय है और यही जीवन की विशेषता। इस स्वभाव के अतिरिक्त लोग तब तो अवश्य ही दुःखी रहने लगते हैं, जब वे किसी उच्च स्थिति से नीचे उतर जाते हैं। इस दशा में वे अपने दुःखावेग पर नियन्त्रण नहीं कर पाते और फूल जैसे जीवन में ज्वाला का समावेश कर लेते हैं। जब कि उस उतार की स्थिति में भी दुःख−शोक की उपासना करना अनुचित है।

उतार की स्थिति में दुःखी होना तभी ठीक है। जब वह उतार पतन के रूप में घटित हुआ हो। और यदि उसका घटना नियति में नियम ‘परिवर्तन’, ईश्वर की इच्छा, प्रारब्ध अथवा दुष्टों की दुरभिसंधियों के कारण हुआ हो तो कदापि दुःखी न होना चाहिए। तब तो दुःख के स्थान पर सावधानी को ही आश्रित करना चाहिए। पतन के रूप में उतार का घटित होना अवश्य खेद और दुःख की बात है। उदाहरण के लिए किसी परीक्षा को ले लीजिए, यदि परीक्षार्थी ने अपने अध्ययन, अध्यवसाय और परिश्रम में कोताही रखी है। समय पर नहीं जागा, आवश्यक पाठ आत्मसात नहीं किये, गुरुओं के निर्देश और परामर्शों पर ध्यान नहीं दिया। अपना उत्तरदायित्व अनुभव नहीं किया और असावधानी तथा लापरवाही बरती है तो उसका फेल हो जाना खेद, दुःख व आत्महीनता का विषय है। उसे अपने इस किए का दुःख रूपी दण्ड मिलना ही चाहिए। वह इसी योग्य था। उसके साथ न किसी को सहानुभूति होनी चाहिए और न उसे सान्त्वना और आश्वासन का सहयोग ही मिलना चाहिए।

किन्तु उस पुरुषार्थी विद्यार्थी को दुःख से अभिभूत होना उचित नहीं, जिसने पूरी मेहनत की है और पास होने की सारी शर्तों का निर्वाह किया है। बात अवश्य कुछ उल्टी लगती है कि जिसने परिश्रम नहीं किया, वह तो अनुत्तीर्ण होने पर दुःखी हो और जिसने खून−पसीना एक करके तैयारी की वह असफल हो जाने पर दुःखी न हो। किन्तु हितकर नीति यही है कि योग्य विद्यार्थी को असफलता पर दुःखी नहीं होना चाहिए। इसलिए कि उसके सामने उसका उज्ज्वल भविष्य होता है। दुःख और शोक से अभिभूत हो जाने पर वह निराशा के परदे में छिप सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56


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सोमवार, 26 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 June 2023

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती। वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है, फिर वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। मनुष्यत्व जगाने की स्थिति में तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों और सुन्दरों को छोड़कर गान्धीजी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को वह प्राप्त होती है। मनुष्यत्व के अनुशासन में जो आ जाता है तो बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।

ईश्वर की सौंपी हुई और सीना खोलकर स्वीकार की हुई जिम्मेदारी (युग निर्माण योजना) को छोड़ भागना यह अपने बस की बात नहीं। ईश्वरीय इच्छा की उपेक्षा करके अपनी असुविधाओं की चिन्ता करना यह गायत्री परिवार के लिए सब प्रकार अशोभनीय होगा। ऐसे अशोभनीय जीवन से तो मरण अच्छा। अब हमारे सामने एकमात्र कर्त्तव्य यही है कि हम धर्मयुग लाने की महान् प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दें।

हम चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक परिजन के अंतःकरण में लोकसेवा को मानव जीवन का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानने की निष्ठा जम जाये। उनमें इतना सत्साहस जाग पड़े कि वह थोड़ा श्रम और थोड़ा धन नियमित रूप से उस प्रयोजन के लिए लगाने का निश्चय करे और उस निश्चय को दृढ़ता एवं भावनापूर्वक निबाहें। यदि इतना हो जाता तो गायत्री परिवार के गठन के पीछे हमारे श्रम, त्याग और उमड़ते हुए भावों की सार्थकता प्रमाणित हो जाती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 उन्नति के पथ पर (भाग 3)

केवल ख्याति पाना ही तो उन्नति नहीं है। ख्याति तो चोर, डाकू, बदमाश आदि भी प्राप्त कर लेते हैं। ऐसी उन्नति से मनुष्यता को लाभ नहीं है। सात्विक तथा शुद्ध उन्नति ही संसार का भला कर सकती है। शुद्ध तथा दृढ़ संकल्प ही ऐसी उन्नति की पहली सीढ़ी है। और फिर उन्नति सभी के हृदयों में अंकुर रूप से विद्यमान है। सुविचारों और सुसंगति के पानी से यह अंकुर विशाल वृक्ष में परिणत हो जाता है। यह तो एक महोदधि है। मनुष्य कई बार असफल प्रयत्न होने पर भी साहस नहीं तोड़ते, वे ही मनुष्य रत्न अमूल्य रत्न ले आते हैं। उन्नति करते हुए यह ध्यान रहे कि उन्नति किसी को खोजती नहीं परन्तु वह खोजी जाती है। इसके लिये देखिये की आप से उन्नत कौन है। उनके संघ में रहिये और उन्नत होने का प्रयत्न करते रहिए।

कोई बुरा कार्य न करो। सोचो कि इस कार्य के लिये मनुष्य क्या कहेंगे। बुरे कार्य के कारण अपमानित होने का डर ही उन्नति का श्रीगणेश है। उन्नति करती है तो अपने आपको अनन्त समझो और निश्चय करो कि मैं उन्नति पथ पर अग्रसर हूँ। परन्तु अपनी समझ और अपने निश्चय को यथार्थ बनाने के लिये कटिबद्ध हो जाओ। अपने अनंत विचारों को शब्दों की अपेक्षा कार्य रूप में प्रगट करो। प्रयत्न करते हुए अपने आपको भूल जाओ। जब तुम अनन्त होने लगो तो अपने आपको महाशक्ति का अंश मान कर गौरव का अनुभव करो, परन्तु शरीर, बुद्धि और धन के अभिमान में चूर न हो जाओ। यदि उन्नति के कारण आपको अभिमान हो गया तो मध्याह्न के सूर्य की भाँति आपका पतन अवश्यंभावी है।

जब आप उन्नति पथ पर अग्रसर हैं तो भूल जायें कि आप कभी नीच, तथा दुष्ट-बुद्धि और पतित थे। निश्चित करो कि मेरा जन्म ही उन्नति के लिये हुआ है और ध्येय की प्राप्ति में सुध-बुध खो दो। और जब भी आपमें हीन विचार आये तो सोचो कि-जब वेश्या पतिव्रता हो गई तो उसे वेश्या कहना पाप है। दुष्ट जब भगवत् शरण हो गया, तो वह दुष्ट कहाँ रहा? जब लोहा पारस से छू गया तो उसमें लोहे के परमाणु भी तो नहीं रहे। इसी तरह जब मैं उन्नति पथ पर अग्रसर हूँ तो अवनति हो ही कैसे सकती है?

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 24


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रविवार, 25 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 25 June 2023

संसार में सभी का स्वागत मुस्कान के साथ करें। मुस्कान आपकी आन्तरिक प्रसन्नता, सद्भावना, आत्मीयता का सिग्नल है। दुश्मन के साथ मुस्करा कर बातचीत करने से दुश्मनी के भाव नष्ट हो जाते हैं। मुस्कान के द्वारा दूषित भाव ग्रँथियाँ सहज ही नष्ट हो जाती हैं।

प्रत्येक  व्यक्ति मूल रूप से अच्छा है, बुरा नहीं। अतः किसी के गुण-दोषों से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए।  गुण और दोषों का संबंध उसी तरह है, जैसे दीपक के प्रकाश में उसकी स्वयं की छाया और यह निश्चित है कि दीपक की छाया के अभाव में प्रकाश का भी अस्तित्व नहीं। दृढ़ निश्चयी व्यक्ति  में कुछ न कुछ हठीलापन होना संभव है। कर्त्तव्य के साथ थोड़ा बहुत अहंकार होना स्वाभाविक है। इस तरह के दोष छाया दोष कहे जाते हैं जिनका अस्तित्व भी स्वीकार करना आवश्यक है।

शान्तिकुञ्ज अनौचित्य की नींव हिला देने वाला एक क्रान्तिकारी विश्वविद्यालय है। यहाँ से इक्कीसवीं सदी का विशालकाय आन्दोलन प्रकट होकर ऐसा चमत्कार करेगा कि उसके आँचल में भारत ही नहीं समूचे विश्व को आश्रय मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 उन्नति के पथ पर (भाग 2)

 जीवन के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में एक से एक बढ़कर मनुष्य हैं यदि ऐसे ही विचार हों, तो उन्नति असम्भव है, क्योंकि वह मनुष्य ऐसे क्षेत्र में जाना चाहेगा जिसमें कम प्रतिद्वन्दी हों और वे उससे हरेक बात में कम हो, परन्तु ऐसा सम्भव नहीं। अतः उन्नति के प्रत्येक क्षेत्र में धैर्य और साहस तथा आत्म विश्वास की अत्यावश्यकता है। झुंझलाहट और जल्दबाजी उन्नति नहीं होने देती। उन्नति करते हुये यही ध्यान रखना चाहिये कि बस उन्नति करनी है। दूसरे उन्नत पुरुषों से आगे निकलना है इसके साथ-साथ यह भी ख्याल रखे कि कुछ भी न करने या अस्थिरता से करने की अपेक्षा एक निश्चित दिशा में स्थिरता से कुछ न कुछ निरंतर करते रहना अच्छा है। इससे अवनति की तो सम्भावना है ही नहीं परन्तु उन्नति कुछ न कुछ अवश्य होगी।

मेरे एक मित्र हैं जो बड़े जल्दबाज हैं और किसी कार्य को धैर्यपूर्वक नहीं करते। वे व्यायाम तो करते नहीं और करते भी हैं तो चाहते हैं कि “बस एक बार ही जल्दी से मोटा हो जाऊं और शरीर बना लूँ।” एक बार तो दूध के उफान जैसा जोश आता है परन्तु धीरे-धीरे धैर्य की कमी के कारण वह जोश ठंडा होने लगता है और खत्म हो जाता है। यही हाल पढ़ाई का है। वे चाहते हैं कि एक बार ही दिमाग में वृद्धि हो और फिर सभी कुछ याद कर ले। उन्हें जब यह बताया जाता है कि पढ़ने से मस्तिष्क बढ़ता है, तो कुछ पढ़ते हैं। परन्तु फिर दिमाग थकने लगता है तो कह उठते हैं “दिमाग बढ़ता ही नहीं।” वे फिर पढ़ नहीं सकते। वे कहते हैं पीछे याद किया नहीं, आगे का कैसे करूं? परन्तु वे महाशय न पीछे का याद करते हैं न आगे का। ऐसे मनुष्य यही चाहते हैं कि ऐसी बूटी घोट कर पिला दी जाय कि सभी कुछ एक बार में ही याद हो जाय।

प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई उत्साही विद्यार्थी भाषण देने के लिये मंच पर जाता है तो दूसरे लड़के उसे निरुत्साहित करने के लिये तालियाँ पीट देते हैं। इन लड़कों में या तो ऐसे लड़के होते हैं जो स्वयं स्टेज पर नहीं बोल सकते या ऐसे होते हैं जो उसकी उन्नति से ईर्ष्या करते हैं और उसे पतित करना चाहते हैं। संसार में लगभग ऐसे ही मनुष्य हैं जो स्वयं तो उन्नति कर नहीं सकते और दूसरों के भी उन्नति पथ में रोड़े अटकाते हैं ऐसे पुरुषों की परवाह न करके हमें तो केवल बढ़ना ही चाहिये। क्योंकि उन्नति को कष्टसाध्य समझने वाले मानव उन्नति पथ पर आपकी खिल्ली उड़ायेंगे और आपको निरुत्साहित करने की कोशिश करेंगे। परन्तु यदि आप उनकी ओर ध्यान देंगे तो आपको अपनी ही उन्नति से भय लगेगा जैसे पर्वत की चोटी पर चढ़े हुए पुरुष को उसके नीचे देखने से।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 23


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शनिवार, 24 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 June 2023

🔷 लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया, उससे सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल, कपट और असत्य आदि दुष्कर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

🔶यदि आपको अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में कुरूपता, कुत्सा और कलुष उन्मुखता का आभास मिले तो समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा सोई हुई है और साथ ही यह भी मान लेना चाहिए कि यह एक बड़ा दुर्भाग्य है-एक प्रचंड हानि है। इतना ही क्यों, वरन् तुरन्त उसे दूर करने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। यदि आप प्रमादवश जिस स्थिति में हैं, उसमें ही पड़े रहना चाहेंगे तो निश्चय ही अपनी ऐसी क्षति करेंगे, जो युग-युग तक, जन्म-जन्मांतरों तक पूरी नही हो सकती।

🔷 जो लोग यह सोचते हैं कि अपनी उन्नति करना एक स्वार्थ मात्र है, वे भारी भ्रम में हैं। अपना उद्धार करना संसार का उद्धार करने का प्रथम चरण है। जो अपना उपकार आप नहीं कर सकता, वह संसार अथवा किसी दूसरे का उपकार क्या कर सकता है? जो स्वयं अच्छा है, वही दूसरों को अच्छा बना सकता है, जो स्वयं उदार और निर्लोभ है, वह ही किसी दूसरे को इसकी शिक्षा दे सकने का अधिकारी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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उन्नति के पथ पर (भाग 1)

प्रत्येक पुरुष में उन्नति की भावना हमेशा विद्यमान रहती है। उसके हृदय में अपने आप को दूसरों से अलग अनुभव करने की एक हूक सी उठती है। वह चाहता है कि मनुष्य मेरा आदर करें और मेरा नाम उन्नति शील पुरुषों की तरह प्रसिद्ध हो जाये। मनुष्य प्रायः प्रत्येक कार्य इसी उद्देश्य को लेकर करता है।

यह उन्नति की भावना एक ऐसी जल धारा है जिसका प्रवाह कभी बंद नहीं होता परन्तु प्रवाह की दिशा बदल सकती है। जब मनुष्य एक तरफ उन्नति नहीं कर पाता तो दूसरी ओर पिल पड़ता है। विद्यार्थी जब पढ़ाई में सबसे आगे नहीं हो सकता तो वह खेलों में प्रसिद्ध होना चाहता है। यदि वहाँ भी सफलता प्राप्त न हो तो वह मजाक, बदमाशी, अधिक बोलना, या कम बोलना-इनमें ही वह साथियों से कहलवा लेना चाहता है कि वह ऐसा ही है। एक प्रकार वह उन्नति अवश्य करता है परन्तु यह नहीं कह सकते कि उसकी उन्नति से जगत् की कितनी उन्नति हुई है।

जब मनुष्य उन्नति करता है या करना चाहता है, तो सबसे पहली कमी जो पथारुढ़ होने से उसे रोकती है वह है आत्म विश्वास की कमी। जब मनुष्य कार्य क्षेत्र में प्रवेश करता है तो दूसरे उन्नत पुरुषों को देखकर उसकी हिम्मत पस्त हो जाती है। “मैं कहाँ, ये कहाँ। जमीन आसमान का अन्तर हैं इनके आगे मेरी कैसे पेश चलेगी।” आदि क्षुद्र विचार उसके नवपल्लवित शुभ विचारों पर आक्रमण कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 23


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शुक्रवार, 23 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 23 June 2023

🔷 यह संसार कर्मभूमि है। कर्म और निरन्तर कर्म ही सिद्धि एवं समृद्धि की आधारशिला है। कर्मवीर, कर्मयोगी तथा कर्मठ व्यक्ति कितनी ही निम्न स्थिति और पिछड़ी हुई अवस्था में क्यों न पड़ा हो, आगे बढ़कर परिस्थितियों को परास्त कर अपना निर्दिष्ट स्थान प्राप्त कर ही लेता है। उठिये अपना लक्ष्य प्राप्त करके दिशा देखिए कि वह किधर आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यह मानकर जीवन पथ पर अभियान कीजिए कि आप एक महापुरुष हैं, आपको अपने अनुरूप, अपने चरित्र के बल पर समाज में अपना स्थान बना ही लेना है।

🔶 आत्म अवमूल्यन आत्महत्या जैसी क्रिया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बनकर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छाप छोड़ना चाहते हैं और आशा करते हैं कि इस आधार पर यश मिलेगा, वे मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करते हैं।

🔷 मुसीबतें दरअसल बोझ नहीं, संकेत हैं जो आत्म विकास का दिशा निर्देश करती हैं। इन संकेतों को समझना और उनसे लाभ उठाना ही मनुष्य की बुद्धिमानी है। यदि इतनी कला मनुष्य को आ जाय तो कठिनाई से बड़ा देवता नहीं, विपत्ति से बढ़कर हितैषी नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अनिश्चित व्यय वाले व्यक्ति

आमदनी का सम्बन्ध हमारी प्रकृति, आदतों, फैशन, रहन सहन का ढंग, जलवायु, देशकाल, आवश्यकताओं, घर के सदस्यों की संख्या, रीति रस्म, आचार व्यवहार पर निर्भर है। इनमें से प्रत्येक का ध्यान हमें रखना पड़ता है। उपभोक्ताओं की परिस्थितियों के अनुसार आमदनी की कमी या अधिकता बदलती रहती है। प्रायः देखा जाता है कि आदत पड़ जाने पर मनुष्य विलासिता पर व्यय करना आवश्यकताओं पर व्यय करने से अधिक उत्तम समझता है। जिस व्यक्ति को शराब, चाय, सिनेमा, वेश्यागमन, तम्बाकू, गाँजा, चरस का व्यसन लग जाता है, वे दूध, दही, मक्खन, हवादार मकान इत्यादि जीवन रक्षण और निपुणता - दायक पदार्थों में व्यय करना पसन्द नहीं करते।

फैशन परस्त लोग घर की गरीबी न देखते हुए भी बाहरी टीपटाप, मिथ्या प्रदर्शन में फंसे रहते हैं। निर्धन लोग थोड़ी सी वाहवाही के लिए कर्ज लेकर विवाह, जनेऊ या दान इत्यादि में व्यय कर देते हैं। गरीब मजदूर भी पान, बीड़ी, सिनेमा, चाय, जुआ, सट्टा, शराब इत्यादि व्यसनों में व्यय करते हुए नहीं डरते। भिक्षुक तक चाय या बीड़ी पीना दूध रोटी से अधिक पसन्द करते हैं।

एक अमीर व्यक्ति के लिए आलीशान महल, बिजली के पंखे, लैम्प, मोटर, फाउन्टेन पेन, भड़कीले वस्त्र, सजावट की वस्तुएँ आराम की वस्तुएँ समझी जायेंगी, किन्तु एक गरीब किसान, या क्लर्क, मामूली दुकानदार नौकरी पेशा के लिए ये ही वस्तुएँ विलासिता की चीजें मानी जावेंगी।

सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10

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गुरुवार, 22 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 22 June 2023

🔷 ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ यह सिद्धान्त मात्र सूक्ति ही नहीं, बल्कि यह पुरुषार्थी एवं परिश्रमी व्यक्तियों का अनुभव सिद्ध सत्य है। परिश्रम के अभाव में प्रतिभा बेकार पड़ी रहती है, पर काम करते-करते योग्यता का विकास हो जाया करता है। प्रतिभा को उन्नति का आधार मानने वालों को यह बात न भूलनी चाहिए कि परिश्रम प्रतिभा का पिता है।

🔶 सहानुभूति दूसरों का प्रेम पाने का सर्वोत्तम उपाय है और आत्म संतोष का सर्वसुलभ साधन है।  जिस व्यक्ति, जिस समाज में सहानुभूति जिन्दा रहती है, दुःख-दर्द और अभाव में भी वहाँ के प्राणी राहत अनुभव करते हैं और दिव्य प्रेम के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करते हैं।

🔷 विश्वास रखिए संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर कोई न कोई महान् पुरुष सोया पड़ा रहता है। आपके अंदर भी है। यदि ऐसा न होता तो एक साधारण दीन-हीन मजूदर का अपढ़ पुत्र अब्राहम लिंकन संसार का महान् व्यक्ति न हो पाता। एक जिल्दसाज की नौकरी करने वाला माइकल फैरिडे महान् वैज्ञानिक न होता। साधारण वकील के स्तर से महात्मा गाँधी विश्व बंधु बापू न हो पाते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 कभी उधार न लीजिये-

उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है। उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है। 

“उधार लेने की आदत कैसी है, इस पर दो राये नहीं हो सकतीं। इसका तो एक ही उत्तर है- आदत बहुत बुरी है। उधार लेते समय तो चाहे वह रुपया हो या और कोई चीज कुछ पता नहीं चलता, परन्तु देते समय दशा बिगड़ जाती है। ऐसा लगता है, जैसे पैसे फेंक रहे हैं। धीरे-2 यह आदत इतनी जोर पकड़ती है कि उधार की चीज या पैसा लौटाने को मन नहीं होता और फल यह होता है- मित्रों का कन्नी काटना, समाज में निरादर, बदनामी आदि। फिर वह “भेड़िया आया” वाली बात होती है। यदि कभी वास्तविक आवश्यकता पड़ी भी तो पैसा नहीं मिलता। इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ऋण के चार प्रमुख कारण बतलाये हैं- कपड़े-लत्ते, जूता, तड़क भड़क और आमोद-प्रमोद। ऋण पर ऋण बढ़ता है और उसका तार जीवन भर नहीं छूटता। शुक्ल जी लिखते हैं-“ऋण एक नाले के समान है, जो ज्यों ज्यों आगे चलता है, त्यों त्यों बढ़ता है। सबसे बुरी बात ऋण में यह है कि जिसे ऋण का अभ्यास पड़ जाता है, उसकी घडक खुल जाती है, उसे आगम का भय नहीं रहता और जब तक उसका नाश नहीं होता, तब तक वह विष का घूँट बराबर पिये जाता है। यदि उसका चित्त ऐसा हुआ कि जिसमें लतें जल्दी लगती हो, तो वह निर्द्वन्द्व न रह सकेगा, ऋण के बराबर बढ़ते हुए बोझ से दब कर वह छटपटाया करेगा।

आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये। व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है। बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है। सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है। टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है।

अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10


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बुधवार, 21 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 21 June 2023

🔶 असंतोष से असंतोष का जन्म होता है। यदि आज हम किसी के लिए असंतोष के कारण बनते हैं, तो यह न समझना चाहिए कि उसे सताकर हम स्वयं सुख-शान्ति से रह सकेंगे। पहली बात तो यह है कि मनुष्य की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिशोधगामिनी होती है। उसकी प्रेरणा रहती है कि जिसने उसके साथ दुःखद व्यवहार किया है उसके साथ भी वैसा ही दुःखद व्यवहार करके बदला लिया जाये। इस प्रकार विद्वेष की कष्ट एवं हानिमूलक परम्परा लग जाती है जिससे सूत्रपाती तथा प्रतिशोधी दोनों ही समान रूप से अशांत तथा संतप्त रहते हैं।

🔷 यदि हम सुंदर बनना और सुंदरता को स्थिर रखना चाहते हैं तो हमें प्रसाधन अथवा शृंगार सामग्री के स्थान पर आंतरिक दशा को सुधारने का प्रयत्न करना होगा। यदि हमारा स्वभाव क्रोधी है, हम ईर्ष्या-द्वेष से जलते-भुनते रहते हैं, लोभ, स्वार्थ अथवा पराया धन प्राप्ति की विषैली भावना को पालते रहते हैं, तो दुनिया भर के प्रसाधनों का प्रयोग करते रहने पर भी हमारा व्यक्तित्व मोहक अथवा मनभावन नहीं बन सकता।

🔶 केवल राम-नाम लेने से आत्मिक उद्देश्य पूरे हो सकते हैं, इस भ्रान्त धारणा को मन में से हटा देना चाहिए। इतना सस्ता आत्म कल्याण का मार्ग नहीं हो सकता। पूजा उचित और आवश्यक है, पर उसकी सफलता एवं सार्थकता तभी संभव है, जब जीवन क्रम भी उत्कृष्ट स्तर का हो, अन्यथा तोता रटन्त किसी का कुछ हित साधन नहीं कर सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (अन्तिम भाग)

तप का एक मात्र कार्य आत्मा पर पड़े हुए मल को-या आवरण को दूर करने मात्र का ही है। व्यास ने स्वाध्याय को परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला इसी लिए बतलाया है क्योंकि जो आवरण के अन्धकार में चला गया है उसे प्रकट करने के लिए अन्धकार को दूर करने की आवश्यकता है।

जीवन का उद्देश्य कुछ भी हो, उस उद्देश्य तक जाने के लिए भी स्वाध्याय की आवश्यकता होती है। स्वाध्याय जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने की खामियों को भी दूर कर सकती है। जो स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।

स्वाध्याय को श्रम की सीमा कहा गया है। श्रम में ही पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष तथा स्वर्ग तक के समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं। बिना स्वाध्याय के साँगोपाँग रूप से कर्म नहीं हो सकते और साँगोपाँग हुए बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। इसलिए सम्पूर्ण सिद्धियों का एक मात्र मूल मंत्र है स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।

आत्म निरीक्षण में अपनी शक्ति का निरीक्षण और अपने कर्म का निरीक्षण किया जाता है। शक्ति अनुसार कर्म करने में ही सफलता मिलती है। कौन सी शक्ति किस कर्म की सफलता में सहायक हो सकती है यह बिना ज्ञान हुए भी सफलता नहीं मिलती। ज्ञान का साधन भी स्वाध्याय ही है। इसी कारण ज्ञान हो और प्रमाद से वह विस्मृत हो गया हो तब भी स्वाध्याय की आवश्यकता है। अग्रसर होकर जिस कार्य को किया जाता है, सम्पूर्ण शक्ति जिस कार्य में लगी रहती है, उसकी सिद्धि में किंचित भी सन्देह नहीं करना चाहिए इसीलिए इहलौकिक और पारलौकिक दोनों स्थानों की सिद्धि के लिए, आत्मकल्याण के लिए निरन्तर स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-

स्वाध्यायान्माप्रमदः -स्वाध्याय में प्रमाद न करो और अहरहः स्वाध्यायमध्येतव्यः -रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 दिसम्बर पृष्ठ 4


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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...