शुक्रवार, 17 मार्च 2023

👉 चरित्रवान चाहिये।

थियोडर पारकर कहा करते थे कि सुकरात की कीमत दक्षिण कोरोलिना की रियासतों से बहुत अधिक है। यदि तुम सोच सकते हो तो बिना मूसा के मिश्र की, बिना डेनियल के बेबोलीन की और डेमास्थनीज, फीडीयस, सुकरात या प्लेटो रहित ऐथेन्स की कल्पना करो वे वीरान दिखाई पड़ेंगे। ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व कारथेज क्या था? बिना सीजर, सिसरो और मारकस आरेलियर के रोम क्या था? नेपोलियन, ह्यूगो, और हाईसिन्थ बिना पैरिस क्या है? वर्क, ग्लैडस्टन, पिट मिल्टन और सेक्सपियर बिना इंग्लैंड क्या है? बिना राम, बुद्ध दयानन्द और गाँधी के भारत में क्या बचता है?

हावेज कहता है- ‘चरित्रबल एक शक्ति है एक प्रतिभा है। वह मित्र और सहायक उत्पन्न कर सकती है और सुख सम्पत्ति का सच्चा मार्ग खोल सकती है’। संसार को ऐसे व्यक्तियों की बड़ी आवश्यकता है जिनमें ईमानदारी कूट-कूट कर भरी हो, जो पैसे के लिये अपनी बुद्धि न बेचे, जो सत्य के लिए स्वर्ग के सुख को ठोकर मार दें और जो धर्म के लिये मृत्यु के मुख में अपनी गरदन डाल दें। वालटेयर कहता है- पैसे से कोई बड़ा नहीं बनता, महापुरुष वह है जिसका आचरण श्रेष्ठ है। एक नीतिकार का मत है- मनुष्य का महत्व उसकी विद्या, बुद्धि ताकत या सम्पत्ति में नहीं है, उसका बड़प्पन ईमानदारी और परोपकार में है। एक तत्वज्ञ का कथन है- जिसने अपने मस्तक पर कलंक का टीका नहीं लगाया और जिसकी गरदन किसी के सामने शर्म से नहीं झुकती वही सच्चा बहादुर है।’

चौदहवें लुई ने अपने मंत्री कालवर्ट से पूछा हमारा देश इतना बड़ा है और धन जन की हमारे पास कमी नहीं है फिर भी एक छोटे से देश हालेण्ड को हम क्यों नहीं जीत सके? मंत्री ने उत्तर दिया- श्रीमान, किसी देश की महानता उसकी लम्बाई, चौड़ाई पर नहीं, वरन वहाँ के निवासियों के चरित्र पर निर्भर है।

जब टर्की ने कोसूथ को इस शर्त पर अपने यहाँ आश्रय देना स्वीकार किया कि वह इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले। तो उस बहादुर ने कहा- “मृत्यु और शर्म का जीवन इन दोनों में से मैं पहली को पसंद करूंगा। ईश्वर की इच्छा पूरी होने दो। मैं मरने को तैयार हूँ। मेरे यह हाथ खाली हैं परन्तु इन पर कलंक की कालिमा नहीं पुती है।” चाहे मनुष्य अशिक्षित हो, अयोग्य हो, गरीब हो या हीन कुल का हो फिर भी यदि उसमें सचाई और ईमानदारी है तो वह अपने लिये उच्च स्थान प्राप्त करेगा।

इमरसन कहते हैं- ‘चोरी करने से किसी के महल खड़े नहीं होते, दान करने से कोई दरिद्री नहीं होता। इसी प्रकार सत्य बोलने वाला न तो दुःखी रहता है और न ईमानदार भूखों मर जाता है।’ महान पुरुषों के चरित्र में यह एक विशेषता होती है कि वे चारों ओर से तूफान उठने और आघात पड़ने पर जरा भी विचलित नहीं होते वरन् ब्रज के समान सुदृढ़ बने रहते हैं। लिंकन वकील था। गरीबी से गुजर करता था। पर उसने कभी झूठे मुकदमे की पैरवी नहीं की।

मिश्र का प्राचीन कालीन एक राजा लिखता है- ‘मैंने किसी बालक या स्त्री को कष्ट नहीं दिया। किसी किसान के साथ असदव्यवहार नहीं किया। मेरे राज्य में विधवा को यह मालूम नहीं होता था कि वह अनाथ हो गई है।’ कितने आश्चर्य की बात है कि लोग इस बात को नहीं जानते कि दुनिया को उनकी योग्यता की अपेक्षा चरित्र अधिक पसंद है। उच्च आचरण के कारण ही लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति बना था।

क्या ईसा मर गया? शिव, दधीचि या हरिश्चन्द्र का अस्तित्व मिट गया? क्या वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन नहीं रहे? क्या बन्दा बैरागी और वीर हकीकत दुनिया में नहीं हैं? रोज हजारों आदमी मरते हैं उन्हें कोई जानता तक नहीं, किन्तु श्रेष्ठ आचरण मनुष्य का सुनहला स्मारक खड़ा कर देता है जो युगों तक चमकता रहता है। ऐश्वर्य भोगी राजाओं की अपेक्षा, जंगल-जंगल खाक छानते फिरने वाले राणा प्रताप अधिक सुखी हैं। बैरिस्टर गाँधी की अपेक्षा साधु गाँधी का महत्व अधिक है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 13

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


गुरुवार, 16 मार्च 2023

👉 पतन नहीं उत्थान का मार्ग अपनायें

पालतू पशुओं के बंधन में बँधकर रहना पड़ता है, पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि स्वतन्त्र जीवन जियें और इच्छित परिस्थितियों का वरण करें। उत्थान और पतन के परस्पर विरोधी दो मार्गों में से हम जिसको भी चाहें अपना सकते हैं। पतन के गर्त में गिरने की छूट है। यहाँ तक कि आत्महत्या पर उतारू व्यक्ति को  भी बलपूर्वक बहुत दिन तक रोके नहीं रखा जा सकता।

यही बात उत्थान के सम्बन्ध में भी है। वह जितना चाहे उतना ऊँ चा उठ सकता है। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करते, लम्बी दूरी पार करते, सृष्टि के सैन्दर्य का दर्शन करते हैं। पतंग भी हवा के सहारे आकाश चूमती है। आँधी के सम्पर्क में धूलिकण और तिनके तक ऊँची उड़ानें भरते हैं। फिर मनुष्य को उत्कर्ष की दिशाधारा अपनाने से कौन रोक सकता है?

आश्चर्य है कि लोग अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता का उपयोग पतन के गर्त में गिरने लिए करते हैं। यह तो अनायास भी हो सकता है। ढेला फेंकने पर नीचे गिरता है और बहाया हुआ पानी नीचे की दिशा में बहाव पकड़ लेता है।

दूरदर्शिता इसमें है कि ऊँचा उठने की बात सोची और वैसी योजना बनाई जाय। जिनके कदम इस दिशा में बढ़ते हैं, वे नर पशु न रहकर महामानव बनते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आत्मदेव को साधें

परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के हमात्म्य तथा विधा भी बहुतेरे; किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही- इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को अघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।

इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक कि अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चायें भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सार्वजनीन  ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए,जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी अँगुली न उठे।

ऐसे देवता एक और हैं और वह हैं- आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराशतिरस्कृत॥
अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से रहते हूए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 15 मार्च 2023

👉 जीवन जीने की कला ही सच्ची साधना

कलाकार के हाथ अनगढ़ वस्तुओं को पकड़ते हैं और अपने उपकरणों के सहारे उन्हें नयनाभिराम सुन्दरता से भरते और बहुमुल्य बनाते हैं। कुम्हार मिट्टी से सुन्दर खिलौने बनाते हैं- मूर्तिकार पत्थर के टुकड़े को देव प्रतिमा में परिणत करता है। गायक बाँस के टुकड़े से वंशी की ध्वनि निनादित करता है। धातु का टुकड़ा स्वर्णकार केहथौड़े की चोट खाकर आकर्षक आभूषण बनता है। कागज, रंग और कलम से बहुमूल्य चित्र बनाने का कर्तृत्व कितना चमत्कार उत्पन्न करता है, इसे कोई भी देख सकता है।

क्या वस्तुतः जीवन ऐसा ही है, जिसे रोते- खीझते किसी प्रकार पूरा किया जाना है? उसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है, तो बहुमूल्य मनुष्य जीवन भी क्यों न भार बनकर लदा रहेगा। किन्तु यह भी स्पष्ट है कि यदि उसे कलाकार की प्रतिभा से सँभाला- सँजोया जाय, तो उसे निश्चय ही देवोपम स्तर का स्वर्गीय परिस्थितियों से भरा पूरा जिया जा सकता है।

साधना जीवन जीने की कला का नाम है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकालकर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका, उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

अपनी समस्याओं के लिए हम ही ज़िम्मेदार

जिस प्रकार मकड़ी अपने लिए अपना जाल स्वयं बुनती है। उसे कभी-कभी बंधन समझती है तो रोटी-कलपती भी है किन्तु जब भी उसे वस्तुस्थिति की अनुभूति होती है तो समूचा मकड़-जाल समेट कर उसे गोली बना लेती है और पेट में निगल लेती है। अनुभव करती है कि सारे बंधन कट गए और जिस स्थिति में अनेकों व्यथा-वेदनाएँ सहनी पड़ रही थी, उसकी सदा-सर्वदा के लिए समाप्ति हो गई।

उसी प्रकार हर मनुष्य अपने लिए, अपने स्तर की दुनिया, अपने हाथों आप रचता है। उसमें किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं है। दुनिया की अड़चनें और सुविधायें तो धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ- 3.1

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


सोमवार, 13 मार्च 2023

👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए।

“आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए। जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/February/v1


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आत्मविकास के कुछ उपाय:-

यदि आप आत्मनिर्भर हैं, तो स्मरण रखिए आपने ऐसी सम्पदा प्राप्त कर ली है, जो सम्पद् में, विपद् और आनन्द के क्षणों में आपको सदैव ऊँचा उठायेगी। बस, आपको आवश्यक यह है कि प्रतिदिन कुछ नवीन, कुछ उपयोगी ज्ञान की अभिवृद्धि करते रहें, ज्ञान के कोष को बढ़ाते रहें, आगे बढ़ते रहें।

यदि आप आत्म प्रताड़ना करते हैं, अपने विषय में हीनभाव रखते हैं, तो आप भावनाओं की बीमारी से त्रस्त है। यह बीमारी आपको आपकी महत्ता का अनुभव नहीं होने देती। इससे मुक्ति का उपाय यह है कि आप कार्यों को बिना भावना की परवाह किए सम्पन्न करते जाइए। यह नियम बना लीजिए कि अपने किए हुए किसी भी कार्य की बुराई न करेंगे, अपने विषय में उच्च और पवित्र धारणाएँ बना लीजिए और उन्हें पुष्ट करते रहिए। कार्य करने से आप की हीनता लुप्त होगी। अधिक सोचने से वह पुष्ट होती है। सोचिए कम कार्य अधिक कीजिए । जो व्यक्ति अपनी अधिक टीका-टिप्पणी करता है, और गलतियाँ निकाला करता है, वह आपका विकास एवं परिष्कार रोक लेता है।

आप अपने संतोष और उत्साह के लिए दूसरों पर निर्भर मत रहिए। दूसरों का अनुकरण कीजिए। ऐसा करने से आपकी मौलिकता, गुण और विशेषताएं सभी प्रकट न होंगी। स्वयं सोचिए कि क्या उत्तम है? वही कीजिए चाहे कोई कुछ भी कहे। आपकी विशेषताएं प्रकाश में आयेंगी और लोग चमत्कृत होंगे।

यदि आप घमंडी, अहंभाव से भरे हुए, दूसरों से प्रशंसा चाहने वाले या क्रोधी हैं, तो उसका अभिप्राय यह है कि आप अंदर ही अंदर अपनी हीनता से डरते हैं। हीनता की प्रतिक्रिया आपके मानसिक जगत् में ही हो रही है।

अपनी वेशभूषा और शृंगार की अधिक देख-रेख करने वाला व्यक्ति बाहरी टीपटाप में विकास और गंभीरता की कमी छिपाता है। वास्तविक परिपक्वता आन्तरिक एवं बौद्धिक है। जो व्यक्ति सही अर्थों में विकसित हुआ है, उसकी पोशाक साधारण होती है, वह गहरे रंग नहीं पसंद करता, आभूषणों से घृणा करता है, सरल सीधा स्वच्छ और भले मानुषों जैसा पोशाक पहनता है।

यदि आप अपने प्रति ईमानदार हैं, तो न तो आप अपनी अच्छाई छिपायेंगे, न झूठा शेखी बघारेंगे। आप समझेंगे कि मनुष्य होने के नाते आपकी भी दूसरों की तरह कुछ कमजोरियाँ हैं। आप अपने को दूसरों से यदि अच्छा नहीं समझेंगे, तो बुरा भी न मानेंगे। आप अपनी विशेषताएं प्रकट करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषताएं रखता है। यदि व्यक्तित्व का ठीक तरह अध्ययन किया जाय, तो आप भी महान बन सकते हैं।

यदि आप झूठे दिखावे को पसन्द नहीं करते हैं, इसका अभिप्राय यह है कि आप अपने मन में आत्मा की आवाज के अनुसार सत्य का अन्वेषण कर रहे हैं। आप उन्नति की ओर उठ रहे हैं।

यदि आप सच्चे हैं, तो आप अपने या दूसरे किसी के विषय में भी बढ़ा-चढ़ा कर मिथ्या भाषण करेंगे। आपके कार्य कुशलता लिए हुए होंगे और आप दूसरों को दिखाकर व्यर्थ का उपहास न करेंगे। यदि आज अपने प्रति सच्चे नहीं हैं, तो आप स्वार्थ की रीतियों से दूसरों को धोखा देने का प्रयत्न करेंगे। जैसे आप वास्तव में नहीं हैं, वैसा दिखाकर आप अपनी महत्ता कम कर रहे हैं। यदि आप जैसे आप हैं, वैसे ही दूसरों को दिखाते हैं, तो आपका व्यक्ति अपने स्वाभाविक रूप में विकसित होता रहेगा।

जब तक मनुष्य अपने मानसिक जगत् में परिपक्वता प्राप्त नहीं करता, छोटी-मोटी बातों में फंसा रहता है, अपनी भावनाओं पर संयम नहीं रख पाता तब तक वह बच्चा ही बना हुआ है।

मानसिक दृष्टिकोण से बालक न बनिए। संसार की विभीषिकाओं, आपत्तियों और संघर्ष को सहन करने की आत्मशक्ति का निरन्तर विकास करते रहिए।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 सच्चा सुधार

मनुष्य में अपूर्णता और त्रुटियाँ भरी हुई हैं, इससे अज्ञानवश बहुत से पाप होते रहते हैं। समय आने पर जिनके लिए वह स्वयं पश्चाताप करता है और सुधार के मार्ग पर चल खड़ा होता है। इसलिए किसी व्यक्ति का सच्चा दोष देखने पर भी हमें चाहियें, कि हम उसके प्रति घृणा द्वेष, क्रोध अथवा और किसी प्रकार का अपमान पूर्वक बर्ताव न करें अर्थात् सख्ती से सुधार की चेष्टा न करे।

बहुत बार हमारे क्रोध और अपमान को दोषी व्यक्ति सह लेता है। क्योंकि पाप के भय से वह भयभीत होता है। उसकी दूषित वृत्ति कुछ समय के लिए दब जाती है, परन्तु सर्वदा के लिए उसका नाश नहीं होता। हमारे द्वारा किये गये अपमान का बदला लेना उसके मन में खटकता रहता है, जो उसकी दोषाग्नी में घृत जैसा काम करता है।

हमारे लिए उसकी दोष पूर्ण चेष्टा होने शुरू हो जाती है, जो काम, क्रोध और हिंसा की वृत्तियाँ को जगा कर हमारे पतन का कारण होती है, यदि किसी का सच्चा सुधार करना हो तो उसके दोषों को जड़ से उखाड़ना चाहियें।

प्रेम, सेवा, स्वार्थ त्याग, द्वारा उसके मन पर अधिकार करना चाहियें क्योंकि मन ही अच्छी बुरी वृत्तियों का स्थान है। परन्तु इस प्रकार दोषों को दूर करने के लिए असीम स्वार्थ त्याग और आत्म विश्वास की आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

👉 अपने वचन का पालन करिए!

आत्म-सम्मान को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने का एक ही मार्ग है, वह यह कि-’ईमानदारी’ को जीवन की सर्वोपरि नीति बना लिया जाये। आप जो भी काम करें, उसमें सच्चाई की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए, लोगों को जैसा विश्वास दिलाते हैं, उस विश्वास की रक्षा कीजिए। विश्वासघात, दगा करना, वचन पलटना, कुछ कहना और कुछ करना, मानवता का सबसे बड़ा पातक है।

आजकल वचन पलटना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसे हलके दर्जे का पाप समझा जाता है पर वस्तुतः अपने वचन का पालन न करना, जो विश्वास दिलाया है उसे पूरा न करना बहुत ही भयानक, सामाजिक पाप है। धर्म-आचरण की अ, आ, इ, ई, वचन पालन से आरंभ होती है। यह प्रथम कड़ी है जिस पर पैर रखकर ही कोई मनुष्य धर्म की ओर, आध्यात्मिकता की ओर, बढ़ सकता है।

आप जबान से कहकर या बिना जबान से कहे या किसी अन्य प्रकार दूसरों को जो कुछ विश्वास देते हैं, उसे पूरा करने का शक्ति भर प्रयत्न कीजिए, यह मनुष्यता का प्रथम लक्षण है। जिसमें यह गुण नहीं, सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं कहा जा सकता और न उसे वह सम्मान प्राप्त हो सकता है जो एक सच्चे मनुष्य को होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 1

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 प्रेम मर मिटने का नाम है।

पतंगे को पता होता है कि शमा कि रौशनी में उसे फन्ना हो जाना है।

भँवरे को पता है कि वोह कोमल पत्तियों को काट सकता है पर प्रेम पर आंच न आये वोह मिट जाता है।

चातक स्वाति कि पहली बूँद कि इंतज़ार में मुक्ति पा लेता है।

ठीक वैसे जैसे समुन्द्र आकाश से गिरी हुई पानी की बूँद को आत्मसात कर लेता है। फिर बूँद का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वोह भी सागर बन जाती है वोह शरणागती स्वीकार लेती है।

जिसे प्रेम होता है तो वोह अपने प्रेमी से प्रेम करने की अनुमति नहीं लेता बस प्रेम करता है अंत नहीं देखता, फल की चिंता नहीं करता। बस प्रेम करता है। मोक्ष होगा या नहीं मिलन होगा या नहीं उससे कोई मतलब नहीं होता उसे। वोह मात्र प्रेम करता है।

करनी हैं अगर शिकायत भगवान से,
तो छोड़ दे पूजा कोई ओर काम कर...........

बाकि तो बस भगवान का नाम जपता जा - जीवन में तू तपता जा

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

गुरुवार, 9 मार्च 2023

👉 देश सेवा का मार्ग

प्लेटो ने एक स्थान पर लिखा है कि -’किसी देश का इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण वाले स्त्री पुरुषों का बाहुल्य हो।’ कवि बाल्ट व्हाइट मैन का कथन है कि-’किसी देश की महत्ता उसके ऊँचे भवनों, शिक्षालयों, सम्पत्ति कोषों से नहीं हो सकती। बलवान् और चरित्रवान् व्यक्ति ही अपने देश को महान बना सकते हैं। वह बड़ा ही भाग्यशाली राष्ट्र है, जिसके निवासी उच्च आचरण को अपना आदर्श मानते हों। जर्मनी के भाग्य विधाता हिटलर ने एक स्थान पर लिखा है-हमारे देश को निर्बल स्वास्थ्य वाले धुरन्धर विद्वानों की अपेक्षा ऐसे व्यक्तियों की अत्यधिक आवश्यकता है, जो भले ही कम पढ़े लिखे हों परन्तु वे स्वस्थ हों, सदाचारी हों, आत्म विश्वासी हों और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले हों।’

देश की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम उच्च आचरण वाले, निर्भीक, साहसी सदाचारी और स्वस्थ मनुष्यों की संख्या बढ़ावें। सुख, स्वराज्य, सुशासन तब तक किसी देश में स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि वहाँ के निवासी मानवोचित गुणों वाले न हों, वे मानवता का उत्तरदायित्व अनुभव न करते हों। निर्बलता, कायरता, भीरुता, छल, पाखंड और प्रवंचना का जब तक जोर रहेगा, तब तक दासता और दुर्भाग्य हमारा पल्ला नहीं छोड़ सकते। महात्मा गाँधी का कथन है कि “शारीरिक और मानसिक स्वस्थता की आवश्यकता जो लोग अनुभव करते हों और जो अपने को सब दृष्टियों से बलवान बनाने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहें, ऐसे ही देश सेवकों की भारत माता को आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 1

👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए। “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए।

जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति जनवरी 1944 पृष्ठ 1

रविवार, 5 मार्च 2023

👉 आत्म-मैत्री की स्थापना

आत्म-मैत्री का भाव स्थापित करने के लिये मनुष्य को पुनः शिक्षा की आवश्यकता होती है। पहले तो अपनी महानता का भाव छोड़ना पड़ता है। समाज में बड़े कहे जाने की इच्छा सरलता से नष्ट नहीं होती। बहुत से व्यक्ति बड़े ही विनीत और नम्र बनते हैं। वे अपने आपको सब की पदधूल कहते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े अभिमानी होते हैं और उनका नम्र बनने का दिखावा ढोंग मात्र होता है। दूसरे को इस प्रकार अपने वश में किया जाता है और उसके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। सच्चे मन से महत्वाकाँक्षा का त्याग वही करता है जो सब प्रकार की असाधारणता अपने जीवन से निकाल डालता है।

जो व्यक्ति अपने आपको सामान्य व्यक्ति मानने लगता है वह नैतिकता में नीचे दिखाई देने वाले व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता है। वह उनकी भूलों को क्षम्य समझता है। वह जब बाहरी जगत् में प्रकाशित अनेक भावों को क्षम्य मानने लगता है तो वह अपने दलित भावों को भी उदार दृष्टि से देखने लगता है। दूसरों के दोषों से घृणा का भाव हट जाने से अपने दोषों से भी घृणा का भाव हट जाता है। फिर उसके मन के भीतर के दलित भाव चेतना के समक्ष आने लगते हैं, और जैसे-जैसे उसका बाहरी जगत से साम्य स्थापित होता जाता है, उसके आन्तरिक मन से भी साम्य स्थापित हो जाता है। वह अपने भीतरी मन से मित्रता स्थापित करने में समर्थ होता है।

आंतरिक समता अथवा एकत्व और बाह्य समता एक दूसरे के सापेक्ष हैं, मनुष्य अपने आपको सुधार कर अपना समाज से सम्बन्ध सुधार सकता है और समाज से सम्बन्ध सुधारने से अपने आप से सम्बन्ध सुधार सकता है। वास्तव में वाह्य और आन्तरिक जगत एक ही पदार्थ के दो रूप हैं। मन और संसार एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा मनुष्य का मन होता है उसका संसार भी वैसा ही होता है।

हमारी नादानी ही हमें अपना तथा संसार का शत्रु बनाती है और विचार की कुशलता दोनों प्रकार की कहानियों का अन्त कर देती है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 12

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 कौन क्या कहता है?

लोग क्या कहते हैं? इसके आधार पर किसी कार्य की भलाई-बुराई का निर्णय नहीं किया जा सकता। क्योंकि कई बार लोग अच्छे कार्यों की बुराई करते हैं और बुरों की भलाई। कारण भले बुरे की वास्तविक पहिचान हर किसी को नहीं होती। हम जो काम करें, उसके लिए यह न देखें कि कौन क्या कहता है? वरन् यह सोचें कि हमारी आत्मा इसके लिये क्या कहती है। यदि आत्मा गवाही दे कि हम जो कार्य कर रहे हैं उत्तम है और हमारी बुद्धि निस्वार्थ है, तो बिना किसी की परवाह किये हुए हमें अपने कार्य में प्रवृत्त रहना चाहिए।

यदि शुभ मार्ग में बाधाएं आती हों और लोग विरोध करते हों तो घबराये मत और न ऐसा सोचिए कि हमारे साथ कोई नहीं, हम अकेले हैं। शुभ कार्य करने वाला कभी अकेला नहीं है। अदृश्य लोक में महान पुरुषों की प्रबल शक्तियाँ विचरण करती रहती हैं, वे हमें उत्तम पथ दिखती हैं, तथा हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ती हैं और इतना साहस भर देती हैं कि एक बड़ी सेना का बल उसके सामने तुच्छ है। चोर घर के लोगों के खाँस देने से ही डर कर भाग जाता है, किन्तु धर्मात्मा मनुष्य मृत्यु के सामने भी छाती खोल कर अड़ा रहता है। सत्यनिष्ठ की पीठ पर परमेश्वर है। धर्मात्मा मनुष्य किसी भी प्रकार न तो अकेला है और न निर्बल। क्योंकि अनन्त शक्ति का भण्डार तो उसके हृदय में भरा पड़ा है।

हम किसी की परवाह क्यों करें? यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर आरुढ़ हैं, यदि हमारा आत्मा पवित्र है, तो हमें निर्भयतापूर्वक अपने पथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए और इस बात की ओर कुछ चिन्ता न करनी चाहिए कि कौन क्या कहता है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 23

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

👉 कठिनाइयों का अन्त कैसे हो?

जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।

महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है।

जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है। इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है। पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 व्यक्तित्व की स्थापना

महानता का भाव स्वयं एक आत्महीनता की ग्रन्थि का परिणाम है। जब किसी प्रकार के आचरण से मनुष्य को आत्मग्लानि हो जाती है तो वह उस वासना का दमन करता है, जो आत्मग्लानि का कारण बनती है। दमन होने के कारण मनुष्य में दो प्रकार का व्यक्तित्व स्थापित हो जाता है। एक तरफ वह चेतन मन में महान नैतिक व्यक्ति बन जाता है और दूसरी ओर उसके अचेतन मन में अवरोधित भावनाओं की प्रबलता हो जाती है। जितना ही अनैतिक वासना का दमन होता है वह और भी प्रबल होती है और जितना ही वह प्रबल होती है उतनी नैतिक भावना को प्रबल होना पड़ता है। इस तरह नैतिकता की असाधारण प्रबलता व्यक्ति के अचेतन मन में विरुद्ध भावना की प्रबलता दर्शाती है। जो प्राकृतिक वासना सामान्य रहती है और व्यक्ति के जीवन के विकास के लिये शक्ति प्रदान कर सकती है, वह दलित होने पर विशेष रूप से दुष्ट और हानिकारक बन जाता है। इस प्रकार महत्वाकाँक्षा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको ही अपना शत्रु बना लेता है। यदि वह अकेला छूट जाये तो वह अपना समय आत्म-भर्त्सना में ही व्यतीत करेगा। वह किसी न किसी काम के लिये अपने आपको कोसता रहेगा।

पर इस प्रकार की मनोवृत्ति अधिक स्थायी नहीं होती। इसके स्थायी होने से विक्षिप्तता आ जाती है। अतएव वह अपनी आन्तरिक स्थिति को भूला देता है और अपने शत्रुओं को अपने से बाहर खोज निकालता है, अर्थात् उसके आत्म शत्रुता के भाव बाहरी किसी व्यक्ति के ऊपर आरोपित हो जाते हैं और वह अपने शत्रुओं को अपने भीतर न देखकर अपने बाहर देखने लगता है। इस तरह मनुष्य का मन अपने आपको भुलावा देता है।

जो व्यक्ति जितना ही अपने आप से घृणा करता है, वह अपने आपका शत्रु है। वह बाहर भी घृणा करने के लिये उपयुक्त पात्र लेता है और ठीक शत्रु की खोज कर लेता है। वह उन्हीं दोषों को उनमें पाता है जो स्वयं उसके अचेतन मन में वर्तमान हैं और जिनके कारण वह अपने आप से घृणा करता है। बहुत से लोग किसी व्यक्ति से घृणा नहीं करते वरन् उनके कुछ दोषों से घृणा करते हैं। यदि इन दोषों को देखा जाय तो वे वही निकलेंगे जो स्वयं उसके मन में हैं और जिनको नष्ट करने की वह असफल चेष्टा कर चुका है। जो व्यक्ति अपने आपको जीतने में असफल रहता है वह अपने से बाहर किसी व्यक्ति को अथवा उसकी बुराइयों को जीतने का प्रयत्न करता है। उसकी असाधारणता ही उसकी असफलता का प्रमाण है। जब मनुष्य अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है तो उसके जीवन में सहज भाव आ जाता है। वह बाहर से साधारण व्यक्ति हो जाता है।

जब तक मनुष्य अपने आपका शत्रु बना हुआ है, वह चाहे जितना ही सब का मित्र बनने का प्रयत्न क्यों न करे अथवा अपने शत्रुओं को विनाश करने की चेष्टा क्यों न करे, शत्रुओं को पा ही लेगा। उसकी इच्छा के प्रतिकूल संसार में लोग उसके शत्रु बन जायेंगे। उसका सारा जीवन इन्हीं शत्रुओं से लड़ने में व्यतीत होगा। उसे बाहरी चिन्ताऐं सताती रहेंगी। जब मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति में बाहरी शत्रु नहीं भी रहता तो उसे काल्पनिक शत्रु अथवा उसके विचार से ही उसे भय होने लगता है। कोई भी अवाँछनीय विचार मन में घुस जाता है और फिर निकालने से नहीं निकलता। इतना ही नहीं जितना ही उसे निकालने का प्रयत्न किया जाता है वह और भी प्रबल हो जाता है। ये बाहरी शत्रु अथवा बाध्य-विचार आन्तरिक दलित भावनाओं के, जिन्हें व्यक्ति ने अपना शत्रु बना रखा है, प्रतीक मात्र हैं। इस प्रकार की स्थिति का अन्त करने के लिये आत्म मैत्री का भाव स्थापित करना आवश्यक है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...