गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

👉 दर्पण के माध्यम से आत्म परिष्कार की साधना

पशु-पक्षियों और कीट, पतंगों की तुलना में अशिक्षित एवं अनगढ़ व्यक्ति भी कहीं अधिक साँसारिक जानकारियाँ संग्रह किये होता है। पर वे होतीं सब बाहरी क्षेत्र की ही हैं। अपने संबंध में प्रायः सभी महत्वपूर्ण जानकारियों से वह अनभिज्ञ ही रहता है। कुछ जानता भी है तो वह मात्र प्रयोगात्मक ही होता है। वस्तुस्थिति समझ सकने योग्य गहराई में प्रवेश पाना प्रायः उससे बन ही नहीं पड़ता। जो आँखें केवल सामने की हलचलों, स्थापनाओं को ही देख पाती हैं वे उलट कर भीतर कैसे देखें? गह्वर में कैसे प्रवेश करें? पर्दे के पीछे छिपी हुई यथार्थताओं को कैसे समझें?

त्वचा के भीतर किस अंग अवयव में क्या गड़बड़ है, उसे जानने के लिए टटोलना भर पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए कितने ही पैथालॉजीकल टेस्ट कराने पड़ते हैं। एक्सरेज तथा थर्मोग्राफी के माध्यम से अन्दर की स्थिति का मापन कर परिस्थितियों को समझा जाता है। यही बात मानव जीवन के अन्तराल पर भी लागू होती है। दूसरों की समीक्षा में प्रवीण अपनी निजी जाँच-पड़ताल में व्यक्ति उतनी ही असफल रहता है। समझा जाता है कि संसार भर में बुद्धि का परिमाण डेढ़ है। इसमें से एक अपने हिस्से में आई है और बाकी आधी से संसार के सब लोग मिल बाँट कर काम चलाते हैं। यही बात दोष, दुर्गुणों के संबंध में भी है। दो तिहाई दोष दूसरों में हैं और अपने में तो वे नगण्य सी मात्रा में हैं। इसी भ्रम में सारी दुनिया आकण्ठ मग्न है। अपने दोष और दूसरों के गुण तो किसी की समझ में आते ही नहीं।

किन्तु जब तक वस्तुस्थिति न समझी जाय, तब तक अवगति से उबरना और प्रगति पथ पर आगे बढ़ चलना सम्भव कैसे हो? सुधार परिष्कार यदि अभीष्ट हो तो उसके लिए आत्म-समीक्षा नितान्त आवश्यक है। यह बन पड़े तो ही परिमार्जन बन पड़े और उसी स्थिति में अभ्युदय के लिए आवश्यक सरंजाम जुटे।

इस प्रयोजन के लिए साधना क्षेत्र का एक सरल उपाय है-दर्पण का अवलम्बन। एक बड़ा-सा शीशा इसके लिए प्रयुक्त करना चाहिए। दर्पण ऐसा हो कि पालथी मार कर बैठने पर पूरा शरीर दीख सके। किन्तु दूरी अधिक न हो। ऐसे बड़े आकार का वह मिल सके तो सर्वोत्तम, अन्यथा छोटे साइज से भी काम चलाया जा सकता है। गरदन तक चेहरा साफ-साफ दीखे तो भी समझना चाहिए कि काम चल गया।

दर्पण में दीखने वाले अपने प्रतिबिम्ब को अपना नहीं अपने किसी निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी का मानना चाहिए और भाव यह रखना चाहिए कि इसकी त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीजाँकुर विकसित करना है। सही राह पर चलने से यदि भटकाव हो गया है, तो उसे यथार्थता समझा कर सही रास्ते लाया जाता है। जो सम्पदा पास में है, उसके सदुपयोग का अभिवर्धन का उपाय समझाया जाता है। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर अपना प्रतिबिम्ब गंभीरतापूर्वक देखा जाय और उसे समुन्नत सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय। आदर्शों की कसौटी पर जितनी खोट मिले, उसे सुधारने के लिए उपयुक्त प्रयास करने हेतु संकल्पित हुआ जाय।

सबसे बड़ी भूल आम आदमी से यह होती है कि वह अपने स्वरूप, जीवन के उद्देश्य और शरीर के साथ इसके प्रयोजन संबंध के बारे में जो समझना चाहिए, जिस प्रकार तालमेल बिठाने चाहिए उसे प्रायः पूरी तरह भूल जाता है। मनुष्य जीवन एक ऐसा सुयोग है, जो चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त एक बार अमानत के रूप में मिला है। यह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। इसे सौंपा इसीलिए गया है कि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में उसका उपाय समग्र सतर्कता के साथ किया जाय। प्रसुप्त विभूतियों को जगाने के लिए तपश्चर्या का आश्रय लिया जाय। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को धोने के लिए आत्मशोधन का प्रबल प्रयास किया जाय। अपूर्णता को पूर्णता में बदला जाय। साथ ही सेवा, संवेदना को उभार कर अपने स्वभाव में अधिकाधिक पुण्य परमार्थ का समावेश किया जाय। मानव की गरिमा इसी में सन्निहित है कि वह संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बंधनों से निकल कर लोक हित में जन कल्याण में-कितना निष्ठापूर्वक संलग्न होता है। सृष्टा के विश्व उद्यान को सींचने, सँजोने में कितनी तत्पर तन्मयता का परिचय देता है। जीवन के इस उच्च उद्देश्य को निबाहने में जो जिस सीमा तक सफल होता है, वह उसी सीमा तक मनुष्य जन्म को सार्थक बनाने में सफल होता है। इस सफलता का उपहार पुरस्कार उसे देव मानव बनने के रूप में और सब प्रकार भविष्य को उज्ज्वल बनाने के रूप में उपलब्ध करता है। शालीनता अपनाने के फलस्वरूप व्यक्ति अपने लोक और परलोक दोनों को सुधारता है। निजी क्षेत्र में उल्लास भरा संतोष, संपर्क क्षेत्र में सम्मान भरा सहयोग और दैवी क्षेत्र में अदृश्य अनुग्रह के रूप में उतना कुछ मिलता है जिससे कि तुष्टि, तृप्ति और शान्ति का-हर घड़ी उल्लास भरे आनन्द का-रसास्वादन किया जा सके।

दर्पण में दीख पड़ने वाले अपने परम आत्मीय छाया पुरुष से यही पूछना चाहिए। उसके उत्तर न देने पर भी अपनी तीव्र दृष्टि से यह परखना चाहिए कि इन प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर इसके पास है या नहीं? यदि नहीं तो उसे परम प्रिय होने के नाते इस हितैषिता की शिक्षा देनी चाहिए कि मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं। बिस्तर किसी भी समय गोल करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यही उचित है कि जो बीत गया, उसमें हुई भूलों के लिए पश्चाताप करते हुए शेष है, उसे श्रेष्ठतम बनाने के लिए इसी क्षण से मुड़ पड़ा जाय। समय को आलस प्रमाद में न बिताया जाय। यह वर्तमान ही है, जिसमें दिशा बदलने का काम अविलम्ब आरम्भ किया जा सकता है और तेजी से कदम बढ़ाते हुए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

माता बच्चे को गोद में उठाने से पहिले उसके शरीर से लिपटी हुई गंदगी को साफ कर लेती है। कीचड़ से, मल मूत्र से सने हुए व्यक्ति को कोई व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक पास नहीं बैठने देता। उससे वार्त्तालाप, व्यवहार करने से पूर्व यह चाहता है कि वह शुद्ध होकर आये। स्वच्छ घर, स्वच्छ पात्र, स्वच्छ परिधान, स्वच्छ शरीर सभी को सुहाता है, भगवान को भी। इसलिए प्रथम दृष्टि यही डाली जानी चाहिए कि गुण, कर्म, स्वभाव में कहाँ-कहाँ ऐसी दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो रहा है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। इन्हें खोजने के लिए तनिक भी पक्षपात नहीं बरतना चाहिए। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह स्वयं ही अपने छाया पुरुष की समीक्षा करनी चाहिए और उसका अतिशय शुभ चिन्तक परमप्रिय होने के नाते हित कामना से इतना दबाव देना चाहिए कि वह परामर्श मात्र सुनकर इस कान से सुने उस कान से न निकाल दे वरन् अभ्युदय की महत्ता समझने हुए अपने सुधार परिवर्तन के लिए सुनिश्चित संकल्प और सुदृढ़ संकल्प करे। यह प्रयास निरन्तर जारी रखा जाय, तो उसका प्रतिफल आश्चर्य जनक होता है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्व मंगल, जैसे कारण नहीं कि दर्पण में विराजमान अपना अभिन्न आत्म परिष्कार के द्वारा उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में निरत न हो सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖  अखण्ड ज्योति मई 1987 

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

👉 परिस्थितियों का जन्मदाता

अध्यात्मवाद का दूसरा सिद्धान्त है ‘‘आत्मनिर्भरता।’’ अपने ऊपर विश्वास करना, अपनी शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा दिव्य गुण है जो हर कार्य को करने योग्य साहस, विचार एवं योग्यता उत्पन्न करता रहता है। दूसरों के ऊपर निर्भर रहने से अपना बल घटता है और इच्छाओं की पूर्ति में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं। स्वाधीनता, निर्भयता औैर प्रतिष्ठा इस बात में है कि अपने ऊपर निर्भर रहा जाय, सफलता का सच्चा और सीधा पथ भी यही है।
  
अपनी हर एक बाह्य परिस्थिति की जिम्मेदारी दूसरों पर मत डालिए वरन् अपने ऊपर लीजिए। दुनिया को दर्पण के समान समझिए जिसमें अपनी ही सूरत दिखार्ई पड़ती है। दूसरे लोगों में जो अच्छाइयाँ, बुराइयाँ दिखाई पड़ती हैं, सामने जो प्रिय एवं अप्रिय परिस्थितियाँ आती हैं उसका कारण कोई और नहीं वरन् आप स्वयं हैं और उनमें परिवर्तन करने की शक्ति भी किसी और में नहीं वरन् स्वयं आप में है।
  
शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की कुंजी पिण्ड के अन्दर है, हर व्यक्ति अपने लिए एक अलग संसार बनाता है और उसकी रचना उस पदार्थ से करता हे जो उसके अन्दर होता है। वास्तव में संसार बिल्कुल जड़ है उसमें किसी को सुख-दु:ख पहुँचाने की शक्ति नहीं है। मकड़ी अपना जाला खुद बुनती है और उसमें विचरण करती है। आप अपने लिए अपना संसार स्वतंन्त्र रूप से बनाते हैं और जब चाहते हैं उसमें परिवर्तन कर लेते हैं।
  
एक व्यक्ति क्रोधी है- उसे प्रतीत होगी की सारी दुनिया उससे लड़ती-झड़ती है, कोई उसे चैन से नहीं बैठने देता, किसी में भलमानसाहत है ही नहीं, जो आता है उससे उलझता चला आता है। एक व्यक्ति झूठ बोलता है- उसे लगता है कि सब लोग अविश्वासी हैं, सन्देह करने वाले हैं, किसी पर भरोसा ही नहीं करते। एक व्यक्ति नीच है- वह देखता है कि सारी दुनिया घृणा करने वाले, घमण्डियों, स्वार्थियों से भरी हुई है, किसी में सहानुभूति है ही नहीं। एक व्यक्ति निकम्मा और आलसी है- उसे मालूम होता है कि दुनिया में काम है ही नहीं, सब जगह बेकारी फैली हुई है, व्यापार नष्ट हो गया, नौकरियाँँ नहीं हैं, लोग बहुत काम लेकर थोड़ा पैसा देना चाहते हैं। एक व्यक्ति बीमार है- उसे दिखार्ई पड़ता है कि दुनिया में सारे भोजन अस्वादिष्ट, हानिकारक और नुकसान पहुँचाने वाले हैं। इसी प्रकार व्यभिचारी, लम्पट, मूर्ख, कंजूस, अशिक्षित, सनकी, गँवार, पागल, भिखारी, चोर तथा अन्यान्य मनोविकारों वाले व्यक्ति अपने लिए अलग दुनिया बनाते हैं। वे जहाँ जाते हैं उनकी दुनिया उनके साथ जाती है।
  
जब मनुष्य आत्म निर्भरता के वीरतापूर्ण दृष्टिïकोण को छोडक़र पराया मुँह ताकने की कायरता, क्लीवता और हीनता की अन्धकारमयी  भूमिका में उतरता है तो वह बड़े दीन वचन बोलने लगता है। ‘मैं क्या कर सकता हूँ, दूसरों ने मुझे जकड़ रखा है, रास्ते रोक रखे हैं।’ ऐसी शिकायतों में तीन चौथाई भाग झूठ होता है। भूत, पलीत, देवी, देवता, भाग्य, ईश्वर, ग्रह, नक्षत्र, समय, युग तथा और भी अनेक बहानों को पकड़ कर वह कहता है कि यही सब मेरे सुख-दु:ख के कारण हैं। विपत्ति के समय वह देवी-देवताओं की मनौती मानता है। चाहता है कि कोई ऐसा देव-दानव कहीं से उतर आये जो पलक मारते उन कठिनाइयों को हल कर दे। इस प्रकार की विचारधारा बेकार और भयंकर है। यह स्पष्टï है कि जो अपनी विपत्ति से आप लडऩे को तैयार नहीं होता, उसकी सहायता कोई दृश्य या अदृश्य शक्ति नहीं करती। सुनिए, कान खोल कर सुनिए। यदि आप कष्टï से बचकर आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं तो आत्मनिर्भरता सीखिए, अपनी भुजाओं पर विश्वास कीजिए, अपनी बुद्धि को काम में लाइये और अपने पैरों पर खड़े हो जाइए। तभी आपकी इच्छा और आकांक्षाएँ पूर्ण हो सकेंगी।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सत्य-तप और वैराग्य का समन्वय

सत्य की प्राप्ति-तपस्वी ही कर सकता है। शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से बचने में जिस तितीक्षा और कष्ट सहिष्णुता की-धैर्य और संयम की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा लेने का नाम ही तप है। अकारण शरीर के सताने का नाम ही तप नहीं है। सताना तो किसी का भी बुरा है फिर शरीर को व्यथित और संतप्त करने से ही क्या हित साधन हो सकता है। तपस्या वह है जो सत्यमय जीवन लक्ष्य निर्धारित करने के कारण सीमित उपार्जन से निर्वाह करने की स्थिति में- गरीबी अथवा मितव्ययिता अपनानी पड़ती है। इसे प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार और शिरोधार्य करने का नाम तप साधना ही है।

सत्य रूप नारायण को प्राप्त करने का मूल्य है वैराग्य। वैराग्य का अर्थ घर परिवार को छोड़, विचित्र वेश बनाना या भिक्षाटन करना नहीं है वरन् यह है कि जिस राग-द्वेष की धूप छाँह में सारा जगत हँसता, रोता, अशान्त और उद्विग्न रहता है उस विडम्बना से बचते हुए महान लक्ष्य की ओर अनवरत गति से चलते जाना। सत्य निष्ठ व्यक्ति इस असत्य मग्न संसार को एक विचित्र प्राणी लगता है। उसे भी अज्ञान के अन्धकार में भटकती दुनिया दयनीय लगती है। दोनों का तालमेल नहीं बैठता। यह विसंगति कहीं कटुता उत्पन्न करती है, कहीं तिरस्कार उलीचती है, कहीं अवरोध उत्पन्न करती है, कहीं त्रास देती है। इसे उपेक्षापूर्वक देखना वैराग्य है और इस पर भी जो त्रास सहने पड़े उन्हें सन्तोष पूर्वक सहने का नाम तप है।

 वैराग्य और तप के डाँडों के सहारे विवेकवान व्यक्ति अपनी साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

✍🏻  पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-मई 1972 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.1


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सोमवार, 13 फ़रवरी 2023

👉 अपने आपको जानो, समझो और सुधारो

परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे, खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएँ, तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है, जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्राडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते, भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों।
    
इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आंतरिक प्रखरता के बल पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ-प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उल्टे नीचे ही गिरते चले गये हैं।
    
एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और  पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था, जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी, वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य लोग वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यंत्र-तंत्रों की सिद्धि में विधि-विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती, जितनी साधक के श्रद्धा, विश्वास की। भूतप्रेतों से लेकर देवी-देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं, उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना अथवा अमुक चिकित्सक का असफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है।
    
विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टाने एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़-पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं, जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्र-वृत्ति उन्हीं को मिलती है, जो परिश्रमपूर्वक पढऩे और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना।
    
आत्मबोध का तात्पर्य है, अपने से सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है- आंतरिक दोष-दुर्गुणों को निरस्त करके सद्ïभावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवीय और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
    
ब्रह्म विद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वाऽरे श्रोतव्य: निदिध्यासितव्य:’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है - ‘अपना उद्धार आप करो’ अपने आप को गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्मïवाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढऩे और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं- ‘आत्मैव आत्मना बन्धु: आत्मैव रिपुरात्मन:’ का गीता कथन अक्षरश: सत्य है। अपने पौरुष- पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है। अपने उत्थान-परिष्कार की तथा पतन-पराभव की कुंजियाँ अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके, तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्पवृक्ष है, जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जाएँगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाए, पर जीवन- देवता की, आत्म-निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 ईश्वर कहाँ है?

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
मैं बौरि खोजन गई रही किनारे बैठ॥

ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए, उसे प्राप्त करने के लिए हम नाना प्रकार के प्रयत्न करते हैं, पर उसे नहीं पाते, कहते हैं कि वह सर्वत्र है, वह सब जगह हैं, पर फिर भी हमें क्यों नहीं दीखता? उसे प्राप्त करने को धन, वैभव, जीवन तक नष्ट करते हैं, पर पाते नहीं, अन्त में निराश हो कहते हैं कि-ईश्वर नहीं हैं।

भाई ईश्वर हैं! पर उसे खोजने में गलती कर रहे हो, हम उसे धन वैभव से नहीं पा सकते, अगर उसे पाना हैं तो प्रेम करना सीखो प्राणी मात्र से प्रेम करो, जड़ चेतन से प्रेम करो, आत्मा से प्रेम करो। उसे पाने को जंगल में जाने की, धूनी रमाने की, धन वैभव कष्ट करने की, कोई आवश्यकता नहीं हैं। जब वह सर्वत्र है तो आपके पास भी होगा, होगा नहीं-हैं। कहाँ? आपके शरीर में।

जिसे आप आत्मा कहते हैं क्या आपने कभी अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान दिया हैं? नहीं यही कारण है कि आप उसे ढूँढ़ने पर भी नहीं पाते। विचार करो! जब तुम बोलते हों, चलते हों, काम करते हों, सोचते हो या शुभ काम करने की प्रेरणा होती है तो वह कहाँ से और कौन करता या कहता हैं? जब तुम किसी को कष्ट पहुँचाने का विचार कर चलते हो और तुम्हें अन्दर से कोई रोकता हैं कि ऐसा न करो वह कौन हैं? वह अपने अन्दर मौजूद हैं, उसे अपने अन्दर ही प्राप्त किया जा सकता हैं।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1944 पृष्ठ 15

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रविवार, 12 फ़रवरी 2023

👉 जो औरों के काम आयें

समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर जहाँ देश, समाज या विश्व का प्रश्र है, वहाँ तो कठिनाई का अनुपात असाधारण होगा ही।

प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठ उत्पन्न करनी पड़ती हे। इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है। अनेकों समस्याएँ और कठिनाइयों, आए दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियों बनी रही रहती हैं। जो कठिनाइयों से जूझ सकता हैं और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावानन्ï कहते हैं।
  
औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं।
  
दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं।
  
तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे  रहते हैं। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, प्रतिस्पर्धाएँ  जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है।
  
सबसे ऊँची श्रेणी देवमानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। वे प्रतिभाशाली होते हैं, पर उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक के उच्च स्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझ पाते हैं, जो अपने कार्यक्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं।
  
बड़े कामों को बड़े शक्ति केन्द्र ही सम्पन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान्ï हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथा स्थान रखती है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे ही वरिष्ठï प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभाएँ वस्तुत: ऐसी सम्पदाएँ है, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन्ï अपने क्षेत्र, समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते हैं।
  
आड़े समय में इन उच्च स्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोज और उभारा जाता है। मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को प्रामाणिक और कर्तृत्व को ऊर्जा का उद्ïगम स्रोत सिद्ध कर सकें।
  
वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्ïभुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हैं, तो भी उनके एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्त्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्मïमुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्म बल और परमात्मा की प्राप्ति

जिस विचारधारा में मनुष्य परिभ्रमण करता है, वैसा ही स्वयं बनने लगता है, जो आदर्श, सिद्धांत, लक्ष्य, श्रद्धापूर्वक अंत:भूमि में धारण किये जाते हैं, उनका एक साँचा तैयार हो जाता है। इस साँचे में गीली मिट्टी की तरह मनुष्य ढलने लगता है और यदि कुछ समय लगातार, दृढ़ता एवं श्रद्धापूर्वक यह प्रयत्न जारी रहे, तो जीवन पकी हुई प्रतिमूर्ति की तरह ठीक उसी प्रकार का बन जाता है।

चोरी, डकैती, ठगी, व्यभिचार, बेईमानी आदि दुष्कर्म कोई व्यक्ति यकायक नहीं कर बैठता। विचार बहुत पूर्व से उसके मन में चक्कर लगाते हैं, इससे धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति इस ओर ढलती जाती है और एक दिन सफल बदमाश बन जाता है। यही बात भलाई के मार्ग में होती है। बहुत समय तक स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं, तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रगट होते हैं और वह वैसा बन जाता है।
  
पदार्थ विज्ञान के ज्ञाताओं को विदित है कि समान श्रेणी के पदार्थों की सहायता से सूक्ष्म तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है। गन्धक, फास्फोरस, पुटाश, सरीखे अगिनतत्त्व प्रधान पदार्थों का अमुक प्रक्रिया के साथ संघर्ष करने से विश्वव्यापी सूक्ष्म अगिनतत्त्व चिनगारी के रूप में प्रगट हो जाता है। इसी प्रकार शब्द और विचारों की सहायता से चैतन्य तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है।

एक लेखक या वक्ता एक विशेष अनुभूति के साथ लोगों के सामने अपने विचार इस प्रकार रखता है कि वे विविध भाववेशों में डूबने, उतराने लगते हैं। हँसते को रुला देनाा और रोते को हँसा देना कुशल वक्ता के बायें हाथ का खेल है। इसी प्रकार क्रोध, घृणा, प्रतिहिंसा या दया, क्षमा, उपकार आदि के भावावेश शब्द और विचारों की सहायता से किसी व्यक्ति में पैदा किये जा सकते हैं।
  
भावनाओं का आवागमन, शब्द और विचारों की सहायता से होता है, संगीत, नृत्य, गान, रोदन, हुंकार, गर्जना, गाली, ललकार, विनय, मुस्कराहट, अट्टïहास, तिरस्कार, अहंकार से सने हुए शब्द सुनने वालों के मन में विविध प्रकार के भाव उत्पन्न करते हैं और उन भावों से उत्तेजित होकर मनुष्य बड़े-बड़े दुस्साहसपूर्ण कार्य कर डालते हैं। शब्द और विचार मिलकर एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम बन जाते हैं जो सूक्ष्म चैतन्य जगत में से उसी प्रकार के तत्त्वों को खींच लाते हैं और जिस स्थान पर उन्हें पटका गया था वहाँ प्रगट हो जाते हैं। दूसरों के ऊपर ही नहीं-अपने ऊपर भी अमुक प्रकार के चैतन्य तत्त्वों को इसी माध्यम द्वारा भराा जा सकता है। इससे प्रगट है कि परमाणुमय भौतिक जगत की भाँति, संकल्पमय चैतन्य जगत में भी वैसे माध्यम मौजूद हैं जो अदृश्य तत्त्वों और शक्तियों को खींच लाते हैं और उनका प्रत्यक्षीकरण कर देते हैं।
  
गायत्री की शब्दावली एक ऐसा ही माध्यम है। इसकी शब्द शृंखला का गुंथन इस प्रकार हुआ है कि भावना ग्रंथियाँ उत्तेजित होती हैं और यह मंत्रोच्चारण एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम सूत्र बन जाता है जिसके द्वारा गायत्री की ब्राह्मी शक्ति सूक्ष्म लोक से खींच-खींच कर मनुष्य के अन्त:करण में जमा होने लगती है और वह दिव्य तत्त्वों से ओत-प्रोत होने लगता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएँ अन्त: प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ बाह्यï जीवन में भी दृष्टिïगोचर होती हैं। आत्मा की समीप सत्, चित्त और आनन्दमय तत्त्वों का भण्डार प्रचुर मात्रा में जमा होने लगता है। यह संचय ही आत्मबल कहलाता है। इस प्रकार वेदमाता गायत्री की कृपा के साधक आत्म-बल सम्पन्न बन जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

👉 आत्मा की उन्नति

जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्त:करण में एक प्रकार का कोहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धडक़ता है इसका तात्पर्य है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है। यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है । किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है, तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसके अनुसार चलने वाले सदा पुण्य कर्म ही करते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती, इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।

आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों से शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है। यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं।

वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

👉 आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास

महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच महात्मा के स्तर तक पहुँचा जाना सम्भव है और पहुँचाया जाता भी रहा है।
  
मर्यादाओं से आबद्ध रह कर नागरिक कर्तव्यों का पालन करते रहना उद्धत आचरणों से बचना, शील और सौजन्य को निबाहना यह मनुष्यता का आवश्यक उत्तरदायित्व है। जिन्होंने अपने भीतर आत्मा को समझा है और उसकी गौरव-गरिमा को ध्यान में रखा है। उसे संयम, सदाचार और कर्तव्यनिष्ठïा से जुड़ा हुआ शालीन जीवन जीना ही पड़ेगा।
  
महात्मा की गरिमा इससे अगली मंजिल है। महान का अर्थ है- विशाल व्यापक। जो आत्मा अपने शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक कर्तव्यों से आगे बढक़र विश्व मानव के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए अग्रसर होती है, मानवीय कर्तव्यों से आगे के देव कर्तव्यों को वहन करने के लिए तत्पर होती है वह महात्मा है। महात्मा अपने लिए नहीं सोचता, विराट्ï के लिए सोचता है, अपने लिए नहीं करता, विराट्ï के लिए करता है, अपने लिए जीवित नहीं रहता, विराट्ï के लिए जीता है।
  
अपना शरीर हर छिद्र से मलीनता निष्कासित करता है, पर इसलिए कौन उसे घृणास्पद और त्याज्य ठहरता हैं कि इनमें गन्दगी विद्यमान है। घृणा की आवश्यकता नहीं समझी जाती और शरीर को स्वच्छ करने पर ही ध्यान रहता है। अपनी ही तरह दूसरों की विविध मलीनताओं के रहते जो हेय, घृणास्पद, पतित और त्याज्य नहीं ठहराता वरन्ï अपनी सहज ममता से प्रेरित होकर उसे निर्मल बनाने का श्रम करता है, वह महात्मा है। अपना छोटा बच्चा दिनभर गलती करता रहता है, उसका बहिष्कार नहीं करते और देख-भाल, डाँट-डपट, तोड़-फोड़ के अवसरों की रोकथाम करके जितना सम्भव होता है उस क्षति का बचाव करते हैं। इस पर भी जो हानि होती रहती है उसे सहन करते हैं। छोटे बालकों और अभिभावकों के बीच यह चिर अतीत से चला आ रहा है। दिग्भ्रान्त जन समाज के अनाचरणों के प्रति आक्रोश उत्पन्न किये बिना जो धैर्य और शान्तिपूर्वक विग्रह की रोकथाम पर ध्यान देता है उस उदारमना व्यक्ति को महात्मा कहना चाहिए।
  
हम अपने और अपने प्रियजनों के दु:खों से दु:खी होते हैं। इस क्षेत्र में सुख संवर्धन का प्रयत्न करते हैं। हमें अपना सुख, यश, वैभव, उत्कर्ष प्रिय लगता है और जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी इसी सुखद स्थिति में रखने के लिए प्रयत्न करते हैं, यह परिधि जब बड़ी हो जाती है और प्यार-दुलार का, ममता-आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ जाता है तो वैसी ही अनुभूति हर किसी के साथ जुड़ जाती है। दूसरों का कष्ट अपना कष्टï लगता है; अपने को सुखी बनाने के लिए जिस प्रकार अपना स्वभाव और चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिए विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभासित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गए। जिसका अहन्ता ग्रीष्म की हिम बनकर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिए यह महात्मा का ही विग्रह है।
  
जब तक स्व, पर ऊहा-पोह चलता रहता है तब तक आत्मा और महात्मा का प्रेम-प्रसंग, आदान-प्रदान, परिहास, मनुहार चल रहा समझा जाना चाहिए। जब द्वैत की समाप्ति हो जाय और केवल एक ही शेष रहे स्व, पर का अन्तर सोचने की गुंजाइश ही न रहे तब समझना चाहिए उसी काय कलेवर में परमात्मा का अवतार हो गया।

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👉 अभ्यास से क्षमताओं का विकास

सतत अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है तथा उन्हें असामान्य कार्यों के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। प्रतिभा-योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम को छोड़ दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड़ दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव संवेदनाओं को सँजोना छोड़ बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी और अंतत: लुप्त हो जायेगी, जबकि बुद्धि की दृष्टिï से कम पर सतत अभ्यास में मनोयोगपूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अन्दर असामान्य क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। निश्चित समय एवं निर्धारित क्रम में किया गया प्रयास मनुष्य को किसी भी प्रतिभा का स्वामी बना सकता है। जबकि अभ्यास के अभाव में प्रतिभाएँ कुंठित हो जाती हैं, उनसे व्यक्ति अथवा समाज को कोई लाभ नहीं मिल पाता।
  
मानव शरीर अनगढ़ है और वृत्तियाँ असंयमित। इन्हें सुगढ़ एवं सुसंयमित करना ही अभ्यास का लक्ष्य है। अनगढ़ काया एवं मन अनभ्यस्त होने के कारण सामान्यतया किसी भी नए कार्य को करने के लिए तैयार नहीं होते। उलटे अवरोध खड़ा करते हैं। उन्हें व्यवस्थित करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। अभ्यास से ही आदतें बनती हैं और अंतत: संस्कार का रूप लेती हैं। परोक्ष रूप से अभ्यास की यह प्रक्रिया ही व्यक्तित्व का निर्माण  करती है।
  
कितने ही व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में अपने को असमर्थ मानते हैं। उन्हें असंभव जानकर प्रयास नहीं करते हैं। फलस्वरूप कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाते, अपनी मान्यताओं के अनुरूप हेय एवं असमर्थ ही बने रहते हैं। जबकि किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लेने एवं आत्मविश्वास जुटा लेने वाले व्यक्ति उसमें अवश्य सफल होते हैं। आत्म विश्वास की कमी एवं प्रयास का अभाव ही मनुष्य को आगे बढऩे से रोकता तथा महत्त्वपूर्ण सफलताओं को पाने से वंचित रहता है।
  
मानवीय काया परमात्मा की विलक्षण संरचना है। सर्वसमर्थता के बीज उसके अन्दर विद्यमान है।  उसे जैसा चाहे ढलाया, बनाया जा सकता है। सामान्यतया लोग कुछ दिनों तक तो बड़े उत्साह के साथ किसी भी कार्य को करने का प्रयास करते हैं, पर अभीष्टï सफलता तुरन्त न मिलने पर प्रयत्न छोड़ देते हैं। फलस्वरूप अपने प्रयत्नों से असफल सिद्ध होते हैं। जबकि धैर्य एवं मनोयोगपूर्वक सतत अभ्यास में लगे व्यक्ति असामान्य क्षमताएँ तक विकसित कर लेते हैं। अभ्यास आदतों का रूप लेने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करते हैं। अभ्यास की प्रक्रिया द्वारा शारीरिक- मानसिक क्षमताओं का विकास ही नहीं, रोगों का निवारण भी किया जा सकता है।  शरीर एवं मनोभावों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर स्वयं को उपयोगी अभ्यासों के लिए सहमत करता है।
  
मानवीय काया एवं मन में शक्ति भण्डार छिपे पड़े हैं। विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं। निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रयास चल पड़े और उसमें धैर्य एवं क्रमबद्धता का समावेश हो जाय, तो असंभव समझे जाने वाले कार्य भी सम्भव हो सकते हैं। पहलवान, विचारवान, कवि, लेखक, वक्ता, चित्रकार, वैज्ञानिक, अध्यापक कोई अकस्मात नहीं बन जाते, वरन्ï उन्हें उसके लिए सतत प्रयास करना पड़ता है। शरीर एवं मन को निर्धारित लक्ष्य के लिए अभ्यस्त करना होता है। प्रयत्न करने पर कोई भी व्यक्ति अपने अनगढ़ शरीर एवं मन को प्रशिक्षित कर सकता है।  अनगढ़ शरीर एवं मन को सुगढ़ एवं व्यवस्थित करने के लिए पूरे धैर्य के साथ सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

👉 संकल्प शक्ति

संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। तत्परतापूर्वक और तन्मयतापूर्वक मन लगाने के लिए साहस जुटाया जाता है। साधन एवं सहयोग एकत्रित करने का ताना-बाना बुना जाता है और उसके लिए समुचित दौड़-धूप की जाती है। कठिनाइयाँ आ सकती हैं और उनका सामना अथवा समाधान करने के लिए पहले से ही क्या तैयारी रखी जा सकती है, इन सब प्रश्रों पर गंभीरता एवं दूरदर्शिता के साथ विचार किया जाता है। जानकारों के साथ परामर्श किया जाता है। सामयिक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। ऐसे सुनिश्चित प्रयत्नों को संकल्प कहते हैं।
  
संकल्प और असंकल्प का अन्तर समझने वालों को असफलता से बचने और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने में विशेष कठिनाई नहीं होती। संकल्पवान् हर परिस्थिति का सामना करने के लिए साहस उभारते हैं। आंतरिक और परिस्थितिजन्य अवरोधों से जूझने का पराक्रम करते हैं। फलत: असमंजस हटता है और पुरुषार्थ की गतिशीलता प्रखर होती चली जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है।
  
श्रेष्ठता की साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए चल पडऩे की क्षमता उन्हीं में होती है। संकल्प का कार्य है- अमुक कार्य करने का अमुक लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय। दृढ़ निश्चय का अर्थ है- काम करने की सुव्यवस्थित योजना बनाना, उसके लिए समुचित श्रम, साधना और मनोयोग लगाने की प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा का अर्थ है- आत्म गौरव को दाँव पर लगा देना, प्रयास को चरम पुरुषार्थ के साथ पूरा करना। मन:संस्थान की संरचना कर सकना संकल्प का ही काम है। इसी से कहा जाता है कि संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
संकल्प को जड़ और सफलता को तना कहा जा सकता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तत्त्ववेत्ताओं ने व्रतशील संकल्प के निर्धारण के कार्य को आधी सफलता माना है। यह मान्यता अक्षरश: सत्य है, जिसे संदेह हो वह इस सच्चाई की परीक्षा स्वयं करके देख सकता है।
  
सृष्टि का प्रादुर्भाव भी प्रजापति ब्रह्म की संकल्पशक्ति के  द्वारा ही हुआ है। जागरूकता पुरुषार्थ का प्रथम संकल्प है। हममें से प्रत्येक को कुछ सृजनात्मक संकल्प करना चाहिए। अब हमें जागरूक होने की आवश्यकता है। मनगढंत हवाई उड़ानें भरते रहने से हम कहीं के न रहेंगे। कहा भी गया है- ख्वाब कभी पूरे नहीं होते, संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
संकल्प शक्ति के प्रचण्ड सामथ्र्यवान-व्रतशील व्यक्ति उच्च आदर्शों को लेकर अपने कार्य क्षेत्र में उतरे और तुच्छ सामथ्र्य के रहते हुए भी महान् कार्य करने में सफल हुए हैं। भगवान् ने मनुष्य को जहाँ अन्य प्राणियों की तुलना में अनेकों शारीरिक-मानसिक विशेषताएँ प्रदान की हैं, वहाँ एक और विलक्षण अनुदान भी दिया है, जिसका नाम है संकल्प बल। इसकी सामथ्र्य का कोई पारावार नहीं है। संकल्प बल ही है, जो सन्मार्ग पर चल पड़े, तो व्यक्तित्व को इतना ऊँचा उठा सकता है, जिस पर देवता भी ईष्र्या करने लगें। नर हो या नारी, बालक हो या वृद्ध, स्वस्थ हो या रुग्ण, धनी हो या निर्धन, परिस्थितियों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। प्रश्र संकल्प शक्ति का है। मनस्वी व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाते और सफल होते हैं। समय कितना लगा और श्रम कितना पड़ा, उसमें अंतर हो सकता है, पर आत्म निर्माण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अपनी आकांक्षा को सक्रियता एवं प्रखरता के अनुरूप देर-सबेर में सफल करके ही रहता है। यदि मनुष्य अपनी साहसिकता को जगा लें, संकल्प शक्ति का सदुद्देश्य के लिए उपयोग करने लगे, तो कोई कारण नहीं कि वह अपनी गौरव- गरिमा का सिक्का जमाने में किसी से पीछे रहे।

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👉 अपने अन्दर के भगवान् को जगाइये

संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्राय: अंत तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था, जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारंभ किया। न्यायाधीश बनकर आया था; पर स्वयं अन्याय करने लगा। ऐसी स्थिति में परमात्मा के अनुदान भला उसका कब तक साथ देते; क्योंकि परमात्मा ने ही आत्मा को आच्छादित कर रखा है। आत्मा मेें जो भी शक्ति और प्रकाश है, वह सब परमात्मा का ही स्वरूप है। परमात्मा आत्मा से विलग कहाँ?
  
सम्पूर्ण देव शक्तियाँ इसमें समायी हुई हैं। जब अग्रि देव जाग्रत् होते हैं, तो भूख लगती है, वरुण देवता को जल की जरूरत पड़ती है। किसी को निद्रा की, तो किसी को जागृति की। सबकी अपनी दिशा-अपना काम है।
  
इनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता न होती रहे और उनका नियंत्रण बराबर किया जाता रहे। इस दृष्टि से एक जबरदस्त नियामक सत्ता की आवश्यकता जान पड़ी, तो परमात्मा स्वयं उसमें आत्मा के रूप में समा गया। इस तरह इस अद्ïभुत मनुष्य जीवन का प्रादुर्भाव इस सृष्टि में हुआ। तब से लेकर आज तक मनुष्य निरन्तर एक प्रयोग के रूप में चलता आ रहा है। कभी वह गलती करता है, तो उस अपराध के बदले सजा मिलती है और यदि वह अधिक कर्तव्यशील होता है, तो उसे अधिक बड़े ईनाम और अधिकार दिये जाते हैं। गलती का परिणाम दु:ख और भलाई का परिणाम सुख। सुख और दु:ख का यह अंतद्र्वन्द्व आदिकाल से चलता आ रहा है।
  
जब मनुष्य के अन्तर का असुर-भाग बलवान हो जाता है, तो दु:खों में बढोत्तरी होती है। वर्तमान समय इस स्थिति की पराकाष्ठा है, यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। मनुष्य का यह पतन देखकर विश्वास नहीं होता कि उसके अंदर परमात्मा जैसी महत्त्वपूर्ण शक्ति का विकास हो सकता है। दुर्बल मनुष्य में सर्वशक्तिमान् परमात्मा ओत-प्रोत हो सकता है, इसकी इन दिनों कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  
मनुष्य की इस दयनीय दशा का एक ही कारण है और वह यह है कि उसने अपनी मनोभूमि इतनी गंदी बना ली है, जहां परमात्मा का प्रखर प्रकाश पहँुचना सम्भव नहीं है। यदि सचेत रहकर उसने अपनी भलाई की शक्ति को जीवन्त रखा होता, तो वह जिन साधनों को लेकर इस धरती पर आया था, वे अचूक ब्रह्म अस्त्र है। उनकी शक्ति वज्र से भी प्रबल सिद्ध होती है। सृष्टिï का अन्य कोई भी प्राणी उसका सामना करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह युवराज बनकर आया था। विजय, सफलतायें, उत्तम सुख, शक्ति, शौर्य-साहस, निर्भयता उसे उत्तराधिकार में मिले थे। इनसे वह चिरकाल तक सुखी रह सकता था। भ्रम, चिन्ता, शंका, संदेह आदि का कोई स्थान उसके जीवन में नहीं, पर अभागे मनुष्य ने अपनी दुरवस्था अपने आप उत्पन्न की। अंत:करण की-ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करने के कारण ही उसकी यह दु:खद स्थिति बनी। अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का अपराधी मनुष्य स्वयं है, इसका दोष परमात्मा को नहीं।
  
ईश्वरीय गुणों से पथ-भ्रष्टï मनुष्य की जो दुर्दशा होनी चाहिए थी, वह हुई। दु:ख की खेती उसने स्वयं बोई और उसका फल भी उसे ही चखना पड़ा। परमात्मा हमारे अति समीप रहकर प्रेम का संदेश देता है, पर मनुष्य अपनी वासना से (कुबुद्धि से) उसे कुचल देता है। वह अपनी सादगी, ताजगी और प्राण शक्ति से हमें सदैव अनुप्राणित रखने का प्रयत्न करता है, पर मनुष्य आडम्बर, आलस्य और अकर्मण्यता के द्वारा उस शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। कालान्तर में जब आंतरिक प्रकाश की शक्ति क्षीण पड़ जाती है, तो दु:ख और द्वन्द्व के बखेड़े बढ़ जाते हैं। तब मनुष्य को औरों की भलाई करना तो दूर, अपना ही जीवन भार रूप हो जाता है। परमात्मा की अंत:करण से विस्मृति ही कष्टï और क्लेश के बंधन का कारण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...