सोमवार, 23 जनवरी 2023

👉 अपनी स्थिति के अनुसार साधना चाहिए।

साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।

परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।

जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।

हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।

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लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।

📖 अखण्ड ज्योति- मई 1949 पृष्ठ 23

रविवार, 22 जनवरी 2023

👉 वास्तविक प्रार्थना का सच्चा स्वरूप

मानव मात्र शांति चाहता है, चिरशांति, पर वह शांति है कहाँ? संसार में तो अशांति का ही साम्राज्य है। शांति के भंडार तो वही केवल शक्तिपुंज सर्वेश्वर भगवान् ही हैं। वे ही परम गति हैं और उनके पास पहुँचने के लिए सत्य हृदय से की गई प्रार्थना ही पंखस्वरूप है। उनके अक्षय भंडार से सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

प्रार्थना कीजिए। अपने हृदय को खोल कर कीजिए। चाहे जिस रूप में कीजिए, चाहे जहाँ एकांत में कीजिए, अपनी टूटी-फूटी लडख़ड़ाती भाषा में कीजिए, भगवान् सर्वज्ञ हैं। वे तुरंत ही आप की तोतली बोली को समझ लेंगे। प्रात: काल प्रार्थना कीजिए, मध्याह्नï में कीजिए, संध्या को कीजिए, सर्वत्र कीजिए और सभी अवस्थाओं में कीजिए। उचित तो यही है कि आप की प्रार्थना निरंतर होती रहे। यही नहीं आप का संपूर्ण जीवन प्रार्थना- मय बन जाए।

प्रभु से माँगिए कुछ नहीं। वे तो सबके माँ-बाप हैं। सबकी आवश्यकताओं को वे खूब जानते हैं। आप तो दृढ़ता से उनके मंगलविधान को सर्वथा स्वीकार कर लीजिए। उनकी इच्छा के साथ आपनी इच्छा को जोडक़र एकरूप कर दीजिए। भगवान् की हाँ में हाँ मिलाते रहिए, तभी सच्ची शांति का अनुभव कर सकोगे।


जब कभी जो भी परिस्थिति अनुकूल अथवा प्रतिकूल आ जाए, भगवान को धन्यवाद दीजिए और हृदय से कहिए-‘प्रभो! मैं तो यही चाहता था।’

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 21 जनवरी 2023

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता है, चाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता है, बुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।

जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैं, दुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।

ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनो, जो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।”

हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।

मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलता, यदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।

हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।

📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 19

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.19

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

👉 कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं है

एक धनी व्यक्ति ने सुन रखा था कि भागवत पुराण सुनने से मुक्ति हो जाती है। राजा परीक्षित को इसी से मुक्ति हुई थी। उसने एक पंडित जी को भगवान की कथा सुनाने को कहा। कथा पूरी हो गई पर उस व्यक्ति के मुक्ति के कोई लक्षण नजर न आये। उसने पंडित जी से इसका कारण पूछा- पंडित जी ने लालच वश उत्तर दिया। यह कलियुग है इसमें चौथाई पुण्य होता है। चार बार कथा सुनो तो एक कथा की बराबर पुण्य होगा। धनी ने तीन कथा की दक्षिणा पेशगी दे दी और कथाऐं आरम्भ करने को कहा। वे तीनों भी पूरी हो गई पर मुक्ति का कोई लक्षण तो भी प्रतीत न हुआ। इस पर कथा कहने और सुनने वाले में कहासुनी होने लगी।

विवाद एक उच्च कोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार से वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। वीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निर्लोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊँची थी इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।

आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनायें होना भी आवश्यक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 18

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👉 अध्यात्म का उपदेश

प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।

यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 21


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👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 2)

🔴  मन का वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव, सफल सम्पन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता, तन्मयता के आधार पर मिले हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष को दूर रखे रहना नहीं चाहते। इस दुधारू गाय को, तुर्की घोड़े को पालने का जी सभी का होता है। पर वह हाथ आये तब न?

🔵  आमतौर से कामुकता, जिह्वा स्वाद, सैर-सपाटे विलास वैभव, यश, सम्मान पाने की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ होती हैं। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ाने उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दिखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गन्तव्य भी तो नहीं दीखता। मन को कहीं कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, सुहाये, मिलना चाहिए।

🔴 रुचियाँ बदलती रहती हैं या बदली जा सकती हैं छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। युवक होने पर अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगन लगती है। तरुण होने पर धन कमाने-गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े भजन करते और कथा सुनते हैं। बचपन में बढ़ी हुई स्फूर्ति हर घड़ी कुछ न कुछ करते रहने की उमंग करती रहती थी पर बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। यह परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी-नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं। 

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

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👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 1)

🔴 मन को वश में रखने के लिए अध्यात्म प्रसंगों में सदा कहा और दुहराया जाता है। पर यह नहीं बताया जाता कि यह किस प्रकार किया जाय? इसलिए ध्यान, प्राणायाम जैसी विधियाँ बताई जाती हैं। पर देखा गया है कि उन विधाओं को अपनाने पर भी मन एकाग्र नहीं होता, पकड़-पकड़ कर बिठाने पर भी मेंढक की तरह उछल जाता है। क्षण भर का अवसर मिलते ही कहीं से कहीं पहुँचता है। इस पकड़-धकड़ में प्रयत्नकर्ता ही थकता है। मन का तो स्वभाव ही ठहरा। वह पवन की तरह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। पखेरू की तरह उसकी उड़ते रहने जैसी आदत जो है। हिरन को पकड़कर बाँधना उसे हाथ-पाँव तोड़ लेने के लिए बाधित करता है।

🔵  मन रस की खोज से मारा मारा फिरता है। उसे उसी की लगन और ललक है। कस्तूरी के हिरन को उस गंध के प्रति अत्यधिक लगाव होता है उसी को खोजने के लिए पाने के लिए वह लालायित होता है। जिधर भी मुँह उठता है, उधर ही दौड़ पड़ता है। यह भाग दौड़ तब तक जारी रहती है जब तक कि उसे गंध के उद्गम का पता नहीं चल जाता।

🔴 मन को सरसता चाहिए। ऐसी स्थिति जिसमें रसास्वादन का अवसर मिले। आनन्द की अनुभूति हो। नीरस क्रिया-कलापों में उसे रुचि नहीं हो पाती इसलिए वह अपना अभीष्ट तलाशने दूसरी जगह चल पड़ता है। तितलियाँ, भौंरे जहाँ-तहाँ उड़ते फिरते हैं पर जब उन्हें सुगंध भरे फूल मिल जाते हैं तब शान्ति के साथ स्थिरतापूर्वक बैठ जाते हैं और प्रमुदित होकर समय गुजारते हैं फिर उन्हें उचटने उखड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। यहाँ बंधन उसके लिए कारगर होता है कि जिसकी तलाश है उसे उपलब्ध करा दिया जाय।

🔵  डोरी से जकड़ने पर तो पशु भी अपने हाथ-पैर तुड़ा लेते हैं। विवशता में ही कोई कैद में रहना स्वीकार करता है। हथकड़ी-बेड़ी बैरक, तालों, संतरी आदि की व्यवस्था न हो तो कोई कैदी जेल में रहना स्वीकार न करे। खिड़की खुलते ही तोता पिंजरे से निकल भागता है और फिर पीछे की ओर देखत तक नहीं। यही बात मन के संबंध में भी कही जा सकती है। उसे नीरसता पसंद नहीं, सहन नहीं। इसलिए उसे जिस तिस खूँटे में बाँधने पर भी स्थिरता अपनाते नहीं बनती। उसे उन्मुक्त आकाश के मनोरम दृश्य देखने का चाव जो है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

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👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 3)

🔴  मन का भी यही हाल है। वह चट्टान की तरह हठीला नहीं, मिट्टी की तरह उसे गीला किया जा सकता है और चतुर कुम्हार की तरह उसे किसी भी ढाँचे में ढाला जा सकता है। मन को चालू गाड़ी की तरह किसी भी सड़क पर चलाया जा सकता है। इस बदलाव में आरंभिक अड़चनें तो आती हैं पर सिखाने, साधने पर वह सरकस के जानवरों की तरह ऐसे तमाशे दिखाने लगता है जो उसकी जन्मजात प्रकृति के अनुरूप नहीं होते। मन को भी इसी प्रकार एक दिशा से दूसरी दिशा में ले जाया जा सकता है। एक प्रकार के अभ्यास से विरत करके दूसरे प्रकार के स्वभाव का बनाया जा सकता है।

🔵  जंगली वन्य पशु अनाड़ियों की तरह भटकते हैं पर जब वे पालतू बन जाते हैं तो मालिक की इच्छानुसार अपनी गतिविधियों को बदल देते हैं। मन के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। उसकी रंगीली उड़ाने वासना, तृष्णा की जन्म जन्मान्तरों से अभ्यस्त रही हैं इसलिए इस जन्म में भी वह पुराना, पहचाना मार्ग ही जाना-पहचाना समझ-बूझा लगता है। इसलिए स्वेच्छाचार के लिए वह आतुर फिरता है किन्तु मनुष्य पर अनेक बंधन हैं। पशुओं की तरह वह कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वतंत्र नहीं है।

🔴 मर्यादाएँ, वर्जनाएँ और जिम्मेदारियाँ एक सीमा तक ही सीमित रहने के लिए उसे विवश करती हैं इसलिए वह एक जगह काम न बनता देखकर दूसरी जगह दौड़ता है। मृगतृष्णा में भटकने वाले हिरन की तरह उसकी कुलाचें मार्ग-कुमार्ग पर भटकती रहती हैं। कल्पनाओं के अम्बार छाये रहते हैं। बन्दर जैसी उछल-कूद जारी रहती है। किसी डाली पर देर तक बैठे रहने की अपेक्षा उसे जिस-तिस का रंग-ढंग देखने और उन्हें हिलाने पर मिलने वाले चित्र-विचित्र अनुभव की तरह विभिन्नताएँ और विचित्रताएँ देखने की उमंग उठती रहती है। यही है मन की भगदड़, जिसे रोकने के लिए मूलभूत आधार बदलने की आवश्यकता पड़ती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

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👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (अन्तिम भाग )

🔵  मन का केन्द्र बदला जा सकता है। पशु प्रवृत्तियों की पगडण्डियाँ उसकी देखी-भाली हैं। पर मानवी गरिमा का स्वरूप समझने और उसके शानदार प्रतिफल का अनुमान लगाने का अवसर तो उसे इसी बार इसी शरीर में मिला है। इसलिए अजनबी मन की अड़चन होते हुए भी तर्क, तथ्य, प्रमाण उदाहरणों के सहारे उसे यह समझाया जताया जा सकता है कि पशु प्रवृत्तियों की तुलना में मानवी गरिमा की कितनी अधिक श्रेष्ठता है। दूरदर्शी विवेक के आधार पर यह निर्णय, निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आदर्शवादिता और कर्तव्य परायणता अपनाने पर उसके कितने उच्चस्तरीय परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं।

🔴  पुराने ढंग की ईश्वर भक्ति में मन लगाने और साधनाओं में रुचि लेने के लिए परामर्श दिया जाता है किन्तु पुरातन तत्त्वज्ञान को हृदयंगम कराये बिना उस दिशा में न तो विश्वास जमता है और न मन टिकता है। बदली हुई परिस्थितियों में हम कर्मयोग को ईश्वर प्राप्ति का आधार मान सकते हैं। कर्तव्य को, संयम को, पुण्य परमार्थ को ईश्वर का निराकार रूप मान सकते हैं। कामों के साथ आदर्शवादिता का समावेश रखा जा सके तो वह सम्मिश्रण इतना मधुर एवं सरस बन जाता है कि उस पर मन टिक सके। बया अपने घोंसले को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तन्मयतापूर्वक बनाती है। हम भी अपने क्रिया–कलापों में मानवी गरिमा एवं सेवा भावना का समावेश रखें तो उस केन्द्र पर भी मन की तादात्म्यता स्थिर हो सकती है। मन को निश्चित ही निग्रहित किया जा सकता है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर
 
 
स्वाध्याय संदोह - अंतर्जगत की यात्रा 25 नवम्बर 2016
विषय - अंतर्जगत का शिखर - कैवल्य
विशेष उदबोधन- श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या जी
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https://youtu.be/SFf3-BjpOL0


स्वाध्याय संदोह - अंतर्जगत की यात्रा | 25 नवम्बर 2016
विषय - धारणा, ध्यान, समाधी का संगम - संयम
विशेष उदबोधन- आदरणीय डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/KRW-iokdyE0

स्वाध्याय संदोह - अंतर्जगत की यात्रा 24 नवम्बर 2016
विषय - ध्यान एक अध्यात्मिक शल्य क्रिया
विशेष उदबोधन- श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या जी
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https://youtu.be/rpP5bGV4uoo

स्वाध्याय संदोह - अंतर्जगत की यात्रा 23 नवम्बर 2016
विषय - अंतर्जगत का द्वार प्रत्याहार
विशेष उदबोधन- श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या जी
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https://youtu.be/lBI7wHzGjU4

स्वाध्याय संदोह - अंतर्जगत की यात्रा । 22  नवम्बर 2016
विषय - अंतर्जगत का द्वार प्रत्याहार
विशेष उदबोधन- श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या जी
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https://www.youtube.com/watch?v=QfiHvjhHA9U&feature=youtu.be

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Jan 2023




👉 कर्म ही ईश्वर-उपासना

उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगायें, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है, जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते हैं, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।

किन्तु केवल प्रार्थना ही प्रभु का स्तवन नहीं है। हम कर्म से भी भगवान् की उपासना करती हैं। भगवान् कोई मनुष्य नहीं हैं, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् क्रियाशील है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके कर्म करने वाला मनुष्य उसे बहुत शीघ्र आत्मज्ञान कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, वर्तन धोना और भोजन पकाना यह भी भगवान् की ही स्तुति हैं यदि हम यह सारे कर्म इस आशय से करें कि उससे विश्वात्मा का कल्याण हो। कर्त्तव्य भावना से किये गये कर्म परोपकार से भगवान् उतना ही प्रसन्न होता है जितना कीर्तन और भजन से। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।

पूजा करते समय हम कहते है-हे प्रभु! तू मुझे ऊपर उठा, मेरा कल्याण कर, मेरी शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बना दे और कर्म करते समय हमारी भावना यह कहती रहे, हे प्रभु! तूने मुझे इतनी शक्ति दी, इतना ज्ञान दिया, वैभव और वर्चस्व दिया, वह कम विकसित व्यक्तियों की सेवा में काम आये। मैं जो करता हूँ, उसका लाभ सारे संसार को मिले।”

इन भावनाओं में कहीं अधिक शक्ति और आत्म-कल्याण की सुनिश्चितता है। इसलिये भजन की अपेक्षा ईश्वरीय आदेशों का पालन करना ही सच्ची उपासना है।

~ मैनली हाप्किन्स
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 1


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👉 विश्वात्मा ही परमात्मा

वैज्ञानिक और योगी- दो भाइयों ने सत्य की खोज का निर्णय किया। वैज्ञानिक ने विज्ञान और योगी ने मनोबल के विकास का मार्ग अपनाया। एक का क्षेत्र विराट का अनुसंधान था और दूसरे का अंतर्जगत्। दोनों ही पुरुषार्थ थे, अपने-अपने प्रयत्नों में परिश्रमपूर्वक जुट गये।

वैज्ञानिक ने पदार्थ को कौतूहल की दृष्टि से देखा और यह जानने में तन्मय हो गया कि संसार में फँसे हुये यह पदार्थ कहाँ से निकले है। योगी ने देह को आश्चर्य से देखा और यह विचार, संकल्प और भावनायें कहाँ से आती है? उसकी शोध में दत्तचित्त संलग्न हो गया।

वैज्ञानिक और योगी बढ़ते गये, बढ़ते गये। रुकने का एक ने भी नाम नहीं लिये। पर हुआ यह कि वैज्ञानिक विराट् के वन में भटक गया और योगी शरीर के अंतरजाल में। दोनों की विविधता, बहुलता और विलक्षणता के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दिया।

हाँ अब वे एक ऐसे स्थान पर अवश्य जा पहुँचे जहाँ विश्वात्मा अपने प्रकाश रूप में निवास करती थीं। गोद से भटके हुये दोनों बालको को जगत्जननी जगदम्बा ने अपने आँचल में भर लिया। वैज्ञानिक ने कहा- माँ! तुम ज्योतिर्मयी हो और योगी ने उसे दोहराया माँ। तुम दिव्य प्रकाश हो!

माँ ने कहा- ’तात्! मैं अन्तिम सत्य नहीं हूँ। मैं भी उन्हीं तत्वों से बनी हूँ, जिनसे तुम दोनों बने हो। मैं प्रकाश धारण करती हूँ, प्रकाश नहीं हूँ। मैं स्वर चक्षु और घ्राण वाहिका हूँ पर स्वर, दृश्य और घ्राण नहीं हूँ। तुम्हारी तरह मैं भी उस चिर प्रकाश की प्रतीक्षा में खड़ी हूँ, जो परम प्रकाश है, परम सत्य हैं पर मैंने उसे प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। मैं तो इस प्रयत्न में हूँ कि उस सत्य के जो भी बीज सृष्टि में बिखरे पड़े हैं, वह मुरझाने न पायें। अपने पुत्रों की इसी सेवा सुश्रूषा में अपने सत्य को भूल गई हूँ। मुझे तो एक ही विश्वास है कि वह इन्हीं बीजों में बीज रूप से छुपा हुआ है, इनकी सेवा करते-करते किसी दिन उसे पा लूँगी तो मैं भी अपने को धन्य समझूँगी।” विश्वात्मा को प्राप्त कर वैज्ञानिक और योगी दोनों ही आनन्द मग्न हो गये। और स्वयं भी उसी की सेवा में जुट गये।

~ जाबालि
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 1

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बुधवार, 18 जनवरी 2023

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 jan 2023


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👉 मुक्ति के लिए प्रयत्न

कुछ लोग धनी बनने की वासना रूपी अग्नि में अपनी समस्त शक्ति, समय, बुद्धि, शरीर यहाँ तक कि अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। यह तुमने भी देखा होगा। उन्हें खाने-पीने तक की भी फुरसत नहीं मिलती। प्रातःकाल पक्षी चहकते और मुक्त जीवन का आनन्द लेते हैं तब वे काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग काल के कराल गाल में प्रविष्ट हो जाते हैं। शेष को पैसा मिलता है पर वे उसका उपभोग नहीं कर पाते। कैसी विलक्षणता। धनवान् बनने के लिए प्रयत्न करना बुरा नहीं। इससे ज्ञात होता है कि हम मुक्ति के लिए उतना ही प्रयत्न कर सकते हैं, उतनी ही शक्ति लगा सकते हैं, जितना एक व्यक्ति धनोपार्जन के लिये।

मरने के बाद हमें सभी कुछ छोड़ जाना पड़ेगा, तिस पर भी देखो हम इनके लिए कितनी शक्ति व्यय कर देते हैं। अतः उन्हीं व्यक्तियों को, उस वस्तु की प्राप्ति के लिये जिसका कभी नाश नहीं होता, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है, क्या सहस्त्रगुनी अधिक शक्ति नहीं लगानी चाहिए? क्योंकि हमारे अपने शुभ कर्म, अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ- यही सब हमारे साथी हैं, जो हमारी देह नाश के बाद भी साथ जाते हैं। शेष सब कुछ तो यही पड़ा रह जाता है।

यह आत्म-बोध ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव- देव-मानव बन जाता है और तब हम जन्म और मृत्यु की इस घाटी से उस ‘एक’ की ओर प्रयाण करते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु- किसी का आस्तित्व नहीं है। तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं।

~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 जून पृष्ठ 1

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👉 आत्म-त्याग ही सर्वोच्च धर्म

जीवन का एक लक्ष्य है ज्ञान और द्वितीय सुख। ज्ञान और सुख के समन्वय का ही नाम मुक्ति है। आत्म-चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वस्यता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।

जब तुम किसी को क्षति पहुँचाते हो तो तुम अपने आपको क्षति पहुँचाते हो। तुम में और तुम्हारे भाई में कोई अन्तर नहीं है। जिस तरह छोटे-छोटे अवयवों से मिलकर शरीर बना है, उसी प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों से मिलकर संसार बना है। कान को दुःख होता है तो आँख रोती है, उसी तरह समाज के किसी भी व्यक्ति का दुःख तुम्हारे पास पहुँचता है, इसलिये केवल अपने सुख से मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

इस कसौटी पर जब लोगों को अपने लिये बढ़-चढ़कर अधिकार माँगते देखता हूँ तो ऐसे आदमी से मुझे बड़ी घृणा होती है। अधिकार व्यक्ति को स्वार्थी और संकीर्ण बनाते हैं। विश्व में जो कुछ अशुभ है, उसका उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति पर है। अपने भाई से अपने को कोई पृथक् नहीं कर सकता। सब अनन्त के अंश हैं। सब एक दूसरे के रक्षक और सहयोगी हैं। वास्तव में वही सच्चा योगी है जो अपने में संपूर्ण विश्व को और सम्पूर्ण विश्व में अपने को देखता है। अपने लिये अधिकारों की माँग करना पुण्य नहीं है, पुण्य तो यह है कि हम छोटे-से-छोटे जीव के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकते हैं या नहीं। इसके लिये अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं। इस लोक में यही सबसे बड़ा पुण्य है। आत्म-त्याग ही इस संसार का सर्वोच्च धर्म है।

~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1
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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...