सोमवार, 16 जनवरी 2023

👉 आत्म निर्माण की ओर (अंतिम भाग)

🔵 यदि तुम्हारे बच्चे से, तुम्हारी स्त्री से, तुम्हारे नौकर से अमुक काम नहीं बनता, वरन् इन्होंने कोई काम बिगाड़ दिया और नुकसान हो गया हो तो क्रोध करने, तिरस्कार और निकृष्ट आलोचना करने से सबके मन में हीनता और पश्चाताप के भाव पैदा होगा। काम बिगड़ जाने से उन्हें पश्चाताप तो है ही, परन्तु तुम्हारे शब्दों से उन्हें बहुत ही चोट पहुँचेगी, इससे वे भयभीत और संकुचित होंगे, आगे वैसा कोई काम करने की उन्हें हिम्मत न होगी-कह देंगे- हमसे न होगा - बिगड़ जायगा, टूट जायगा- इत्यादि।

🔴 उनका छिद्रान्वेषण करने, उनका तिरस्कार करने, हीन, निर्बुद्धि और निकृष्ट बनाने में तुम्हारे मन में भी संताप से कितना विष उत्पन्न होकर रक्त को विषाक्त करेगा - इसकी कल्पना तुम्हें नहीं है। अस्तु, दूसरों का तिरस्कार करने की अपेक्षा उक्त घटना को यह समझ कर क्षमा कर देना चाहिए कि क्रोध और तिरस्कार से कुछ तो बनेगा नहीं, भविष्य में सुधार के लिए उन्हें शिक्षा दे देनी चाहिए। हंसकर उन्हें अमुक काम ठीक प्रकार से करना सिखला दो तो वे तुम्हें महान समझेंगे, तुमसे प्रेम करेंगे और सावधानी तथा प्रेमपूर्वक हरेक काम करेंगे।

🔵 दूसरे लोग जैसा सोचते हैं जो बोलते या करते हैं-उसकी जिम्मेदारी उन पर है, तुम्हें क्या चिन्ता? परन्तु तुम जैसा सोचते हो, जो बोलते या करते हो उसकी जिम्मेदारी तुम पर है-उसकी चिन्ता तुम्हें होनी चाहिए।

🔴 किसी घटना से उतनी हानि नहीं होती, वरन् उस घटना से हम स्वयं अपने विचारों द्वारा अपनी हानि अधिक कर लेते हैं। कोई विपत्ति आने और घटना होने पर कोई रोता बिलखता है, दूसरा व्यक्ति उसे छोड़कर निर्माण में लग जाता है। हुआ सो हुआ, अब आगे सुधारो। इन दोनों व्यक्तियों में कितना अन्तर है?

🔵 तुम किसी योजना में लगे हो, तो धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहो, यह मत सोचो, और मत कहो अरे इतने दिन तो हो गये, न जाने कब यह पूरा होगा। वरन् ऐसा विचार करो-प्रतिदिन यह धीरे-धीरे अब पूरा हो रहा है।

🔴 तुम दूसरों को कैसा समझते हो दूसरे लोग तुम्हें क्या समझते हैं- यह अपनी-2 मनोवृत्ति विकास और दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब है। परन्तु तुम वास्तव में क्या हो, इसका विचार करो अपना सुधार और निर्माण करते रहो, संसार के लोग कुछ भी कहें।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 Jan 2023


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रविवार, 15 जनवरी 2023

👉 आप का मन

मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरंतर होती रहती है। जैसा आप का मन, वैसा ही आप का शरीर, जैसा शरीर, वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लांत, अस्वस्थ एवं पीड़ित हो जाता है। वेदांत में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है।

जैसा हमारी भावनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर और अंग-प्रत्यंग की बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्मस्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

संगम अपने आप में न निकृष्ट है, न उत्तम। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह वैसा ही है, जैसी प्रतिकृति हमारे अंतर्जगत में विद्यमान है। हमारी दुनियाँ वैसी ही है, जैसा हमारा अंत:करण का स्वरूप।

भलाई, बुराई, उत्तमता, निकृष्टता, भव्यता, कुरूपता, मन की ऊँची नीची भूमिकाएँ मात्र हैं। हमारे अपने हाथ में है कि हम चाहे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की भट्टी में भस्म होते रहें और अपना जीवन शूलमय बनाएँ अथवा सद्गुणों का समावेश कर अपने अंत:करण में शांति स्थापित करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1946 पृष्ठ 4


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 Jan 2023


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👉 पगडंडियाँ न खोजें राजमार्ग पर चलें

जीवन एक वन है जिसमें फूल भी है और कांटे भी; जिसमें हरी-भरी सुरम्य घाटियाँ भी हैं और ऊबड़-खाबड़ जमीन भी। अधिकतर वनों में वन्य-पशुओं और वनवासियों के आने-जाने से छोटी-मोटी पगडण्डियाँ बन जाती हैं। देखने में तो यह सुव्यवस्थित रास्ते प्रतीत होते हैं किन्तु यह जंगलों में जाकर लुप्त हो जाते हैं। आसानी और शीघ्रता के लिए बहुधा यात्री इन पगडंडियों को पकड़ लेते हैं और सही रास्ते को छोड़ देते हैं।

जीवन-वन में ऐसी पगडंडियाँ बहुत हैं जो छोटी दीखती हैं, पर गंतव्य स्थान तक पहुँचती नहीं है। जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ही ढूंढ़ते हैं, किन्तु उनको यह मालूम नहीं होता है कि ये अन्त तक नहीं पहुँचती और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर दल-दल में फँसा देती है। ये रास्ते वास्तव में बड़े ही आकर्षक होते हैं।

पाप और अनीति का मार्ग जंगल की पगडंडी, मछली की वंशी और चिड़ियों के जाल की तरह है। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाये, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं जो जल्दी ही सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही वाँछनीय हैं, पर उतावली में उद्देश्य को ही नष्ट कर देना, बुद्धिमत्ता नहीं माना जायगा।

जीवन-वन का राजमार्ग सदाचार और धर्म है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय-साध्य तो हैं, पर जोखिम उसमें नहीं है। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती है, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी बन्धन है, पर अनीति का वह दल-दल, वन की वह कँटीली झाड़ियाँ और ऊबड़-खाबड़ जमीन राजमार्ग में कहाँ ? जिनमें फँसकर जीवनोद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। हम पगडंडियों पर न चलें, राजमार्ग ही अपनावें। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शान्तिदायक भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1975 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1975/February.3

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शनिवार, 14 जनवरी 2023

👉 सत्यता में अकूत बल भरा हुआ है

आप सदा सत्य बोलिए, अपने विचारों को सत्यता से परिपूर्ण बनाइए, आचरण में सत्यता बरतिए और अपने आप को सत्यता से सराबोर रखिए। ऐसा करने से आप को एक ऐसा प्रचंड-बल प्राप्त होगा, जो संसार के समस्त बलों से अधिक होगा। कनफ्यूशियस कहा करते थे कि सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल है, परंतु वस्तुत: सत्य में अपार बल है। उसकी समता भौतिक सृष्टि के किसी बल के साथ नहीं की जा सकती।

जो अपनी आत्मा के सामने सच्चा है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार आचरण करता है, बनावट, धोखेबाजी, चालाकी को तिलांजलि देकर जिसने ईमानदारी को अपनी नीति बना लिया है, वह इस दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धिमान् व्यक्ति है, क्योंकि सदाचरण के कारण मनुष्य शक्ति का पुंज बन जाता है। उसे कोई डरा नहीं सकता। जबकि झूठे और मिथ्याचारी लोगों का कलेजा बात-बात में सशंकित रहता है और पीपल के पत्तों की तरह काँपता रहता है।
धन-बल, जन-बल, तन-बल, मन-बल आदि अनेक प्रकार के बल इस संसार में होते हैं, परंतु सत्य का बल सब से अधिक शक्तिशाली होता है। सच्चा पुरुष इतना शक्तिशाली होता है कि उसके आगे मनुष्यों को ही नहीं, देवताओं को ही नहीं, परमात्मा को भी झुकना पड़ता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-नवं. 1945 पृष्ठ 1

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👉 कर्म की स्वतंत्रता

समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किए गए हैं कि वह प्रत्येक काम को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इंद्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्मसिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता, तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा की अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।

कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा। 

गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है। 

📖 अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1946 पृष्ठ 17


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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

👉 आत्मनिर्माण सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति, आत्मसंतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है। इन सबसे भी बढ़कर एक पुण्य-परमार्थ है और वह है-`आत्मनिर्माण’। अपने दुर्गुणों को, विचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, द्रोह, चिंता, भय एवं वासनाओं को, विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा धर्म है, जिसकी तुलना सहस्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

अपने अज्ञान को दूर करके मन-मंदिर में ज्ञान का दीपक जलाना, भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक-तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना, करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्मनिर्माण करे, तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं को पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा-सहायता करना, इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना, इतना बड़ा धर्म-कार्य है, जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य-परमार्थ से नहीं हो सकती।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
~ अखण्ड ज्योति-फरवरी 1947 पृष्ठ 1

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👉 जीवन को तपस्यामय बनाइए

प्रकृति का नियम है कि संघर्ष से तेजी आती है। रगड़ और घर्षण यद्यपि देखने में कठोर कर्म प्रतीत होते हैं, पर उन्हीं के द्वारा सौंदर्य का प्रकाश होता है। सोना तपाए जाने पर निखरता है। धातु का एक रद्दी-सा टुकड़ा जब अनेक विध कष्टदायक परिस्थितियों के बीच में होकर गुजरता है, तब उसे भगवान की मूर्ति होने का, या ऐसा ही अन्य महत्त्वपूर्ण गौरवमय पद प्राप्त होता है। 

जीवन वही निखरता है, जो कष्ट और कठिनाइयों से टकराता रहता है। विपत्ति, बाधा और कठिनाइयों से जो लड़ सकता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से युद्ध करने का जिसमें साहस है, उसे-ही, सिर्फ उसे-ही जीवन विकास का सच्चा सुख मिलता है। इस पृथ्वी के पर्दे पर एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ है, जिसने बिना कठिनाई उठाए, बिना जोखिम उठाए, कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर ली हो।

कष्टमय जीवन के लिए अपने आप को खुशी-खुशी पेश करना, यही तप का मूलतत्त्व है। तपस्वी लोग ही अपनी तपस्या से इंद्र का सिंहासन जीतने में और भगवान का आसन हिला देने में समर्थ हुए हैं। मनोवांछित परिस्थितियाँ प्राप्त करने का संसार में एकमात्र साधन तपस्या ही है। स्मरण रखिए, सिर्फ वे ही व्यक्ति इस संसार में महत्व प्राप्त करते हैं, जो कठिनाइयों के बीच हॅसना जानते हैं, जो तपस्या में आनंद मानते हैं।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
~ अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1945 पृष्ठ 1

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👉 इन्द्रियों के गुलाम नहीं, स्वामी बनिए!

जो आदमी केवल इन्द्रिय सुखों और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति के लिए जीवित है और जिस के जीवन का उद्देश्य ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ है। निस्संदेह वह आदमी परमात्मा की इस सुन्दर पृथ्वी पर एक कलंक है, भार है। क्योंकि उसमें सभी परमात्मीय गुण होते हुए भी वह एक पशु के समान नीच वृत्तियों में फंसा हुआ है। जिस आदमी में ईश्वरीय अंश विद्यमान है, वही अपने सुख से हमें अपने पतित जीवन को दुख भरी गाथा सुनाता है!! यह कितने दुख की बात है। जिस आदमी का शरीर सूजा हुआ, भद्दा लज्जा युक्त दुखी और रुग्ण है व इस सत्य की घोषणा करता है कि जो आदमी विषय वासनाओं की तृप्ति में अंधा धुँध, बिना आगा पीछा देखे, लगा रहता है वही शारीरिक अपवित्रताओं, यातनाओं को सहता है।  

वास्तव में आदर्श मनुष्य वही है जो समस्त पाशविक वृत्तियों तथा विषय वासनाओं को रखता हुआ भी उनके ऊपर अपने सुसंयता तथा सुशासक मन से राज्य करता है, जो अपने शरीर का स्वामी है, जो अपनी समस्त विषय वासनाओं की लगाम को अपने दृढ़ तथा धैर्य युक्त हाथों में पकड़ कर अपनी प्रत्येक इन्द्रिय से कहता है कि तुम्हें मेरी सेवा करनी होगी न कि मालिकी। मैं तुम्हारा सदुपयोग करूंगा दुरुपयोग नहीं। ऐसे ही मनुष्य अपनी समस्त पाशविक वृत्तियों तथा वासनाओं की शक्तियों को देवत्व में परिणित कर सकते हैं, विलास मृत्यु है और संयम जीवन है। सच्चा रसायन शास्त्री वही है जो विषम वासनाओं के लोहे को आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्तियों के स्वर्ण में पलट लेता है।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
~  अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1945 पृष्ठ 1

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👉 जीवन की बागडोर आपके हाथ में

भाष्य ने जहाँ छोड़ दिया, वहीं पड़ गए और कहने लगे कि हम क्या करें, किस्मत साथ नहीं देती, सभी हमारे खिलाफ हैं, प्रतिद्वन्द्विता पर तुले हैं, जमाना बड़ा बुरा आ गया है। यह मानव की अज्ञानता के द्योतक पुरुषार्थहीन विचार हैं, जिन्होंने अनेक जीवन बिगाड़े हैं। मनुष्य भाग्य के हाथ की कठपुतली है, खिलौना है, वह मिट्टी है, जिसे समय-असमय यों ही मसल डाला जा सकता है, ये भाव अज्ञान, मोह एवं कायरता के प्रतीक हैं।

अपने अंत:करण में जीवन के बीज बोओ तथा साहस, पुरुषार्थ, सत्संकल्पों के पौधों को जल से सींचकर फलित-पुष्पित करो। साथ ही अकर्मण्यता की घास-फूस को छाँट-छाँट कर उखाड़ फेंको। उमंग उल्लास की वायु की हिलोरें उड़ाओ।

आप अपने जीवन के भाग्य, परिस्थितियों, अवसरों के स्वयं निर्माता हैं। स्वयं जीवन को उन्नत या अवनत कर सकते हैं। जब आप सुख-संतोष के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वैसी ही मानसिक धारा में निवास करते हैं, तो संतोष और सुख आप के मुखमंडल पर छलक उठता है। जब आप दु:खी, क्लांत रहते हैं, तो जीवनवृत्त मुरझा जाता है और शक्ति का ह्रास हो जाता है।

शक्ति की, प्रेम की, बल और पौरुष की बात सोचिए, संसार के श्रेष्ठ वीर पुरुषों की तरह स्वयं परिस्थितियों का निर्माण कीजिए। अपनी दरिद्रता, न्यूनता, कमजोरी को दूर करने की सामर्थ्य आप में है। बस केवल आंतरिक शक्ति प्रदीप्त कीजिए।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-सितं. 1946 पृष्ठ 21

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मंगलवार, 10 जनवरी 2023

👉 अध्यात्मवाद

वर्तमान की समस्त समस्याओं का एक सहज सरल निदान है- ‘अध्यात्मवाद’। यदि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक जैसे सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये, तो समस्त समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिïकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिïकोण में वांछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेगें।
  
अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्परूप है, संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार-विहार और रहन-सहन को विचार परक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ्य समाप्त हो जाता है। विभिन्न शारीरिक समस्याओं का आसानी से हल निकल सकता है, यदि इस संदर्भ में दृष्टिïकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। यदि शरीर को पूरी तरह पवित्र और स्वच्छ रखा जाय, आत्म संयम और नियमितता द्वारा शरीर धर्म का पालन करते रहा जाय, तो शरीर पूरी तरह स्वस्थ बना रहेगा तथा शारीरिक संकट की संभावना ही न रहेगी। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहेगा।
  
शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन्ï उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य में गिरावट के  प्रधान कारण होते हैं। जो लोग अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, उसके नियमों का ठीक-ठीक पालन करते हैं, वे सुदृढ़ एवं निरोग बने रहते हैं।
  
मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निद्र्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है, किंतु यह खेद का विषय है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकारग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ एवं आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रखता है। यदि इस प्रचण्ड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मन:शांति का महत्त्व समझ लिया जाय और नि:स्वार्थ, निर्लोभ एवं निर्विकारिता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न कर लिया जाय,  तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है।
  
सुदृढ़ स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह-सहयोग क्रिया-कौशल, समुचित धन, सुदृढ़ दाम्पत्य, ससुंस्कृत संतान, प्रगतिशील विकास क्रम, श्रद्धा, सम्मान, सुव्यवस्थित एवं संतुष्टï जीवन का एकमात्र सुदृढ़ आधार अध्यात्म ही है। आत्म-परिष्कार से संसार परिष्कृत होता चला जाता है। अपने को सुधारने से सारी समस्याओं का समाधान होता चला जाता है। अपने को ठीक कर लेने से आसपास के वातावरण के ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि जो अपना सुधार नहीं कर सका, अपनी गतिविधियों को सुव्यवस्थित नहीं कर सका, उसका भविष्य अंधकार मय ही बना रहेगा। इसीलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अहंता का परिवर्तन

जैसे कुआँ खोदने पर जमीन में मिट्टियों के कई पर्त निकलते हैं, वैसे ही मनोभूमि की स्थिति है। उनके कार्य, गुण और क्षेत्र भिन्न-भिन्न हैं। ऊपर वाले पर्त- मन और बुद्धि हैं। मन में इच्छाएँ, वासनाएँ, कामनाएँ पैदा होती हैं, बुद्धि का काम विचार करना, मार्ग ढूँढऩा और निर्णय करना है।

स्थूल मन के प्रमुख भाग दो हैं- चित्त, अहंकार। चित्त में संस्कार, आदत, रुचि, स्वभाव, गुण की जड़ें रहती हैं। अहंकार ‘‘अपने सम्बन्ध में मान्यता’’ को कहते हैं। अपने को जो व्यक्ति धनी-दरिद्र, पापी-पुण्यात्मा, स्त्री-पुरुष, जीव-ब्रह्म आदि जैसा भी कुछ मान लेता है, वह वैसे ही अहंकार वाला माना जाता है। आत्मा के अहम् के सम्बन्ध में मान्यता का नाम ही अहंकार है। इन मन, बुद्धि, अहंकार के अनेकों भेद-उपभेद हैं और उनके गुण, कर्म, अलग-अलग हैं।
  
जैसे मन और बुद्धि का जोड़ा है, वैसे ही चित्त और अहंकार का जोड़ा है। मन में नाना प्रकार की इच्छाएँ-कामनाएँ रहती  हैं, पर बुद्धि उनका निर्णय करती है कि कौन-सी इच्छा प्रकट करने योग्य है, कौन-सी दबा देने योग्य है? इसे बुद्धि जानती है और वह सभ्यता, लोकाचार, सामाजिक नियम, धर्म, कत्र्तव्य, असम्भव आदि का ध्यान रखते हुए अनुपयुक्त इच्छाओं को भीतर दबाती रहती है। जो इच्छा कार्य रूप में लाये जाने योग्य जँचती है, उन्हीं के लिये बुद्धि अपना प्रयत्न आरम्भ करती है। इस प्रकार यह दोनों मिलकर मस्तिष्क क्षेत्र में अपना ताना-बाना बुनत रहते हैं।
  
अन्त:करण क्षेत्र में चित्त और अहंकार का जोड़ा अपना कार्य करता है। जीवात्मा अपने को जिस श्रेणी का, जिस स्तर का अनुभव करता है, चित्त में उस श्रेणी के, उसी स्तर के पूर्व संस्कार सक्रिय और परिपुष्ट रहते हैं। कोई व्यक्ति अपने को किसी वर्ग विशेष या समाज के निम्र वर्ग का मानता है, तो उसका यह अहंकार उसके चित्त को उसी जाति के संस्कारों की जड़ जमाने और स्थिर रखने के लिये प्रस्तुत रखेगा। जो गुण, कर्म, स्वभाव इस श्रेणी के लोगों के होते हैं, वे सभी उसके चित्त में संस्कार रूप से जड़ जमाकर बैठ जायेंगे। यदि उसका अहंकार अपराधी या शराबी की मान्यता का परित्याग करके लोकसेवी, महात्मा, सच्चरित्र एवं उच्च होने की अपनी मान्यता स्थिर कर ले, तो अति शीघ्र उसकी पुरानी आदतें, आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ बदल जायेंगी और वह वैसा ही बन जाएगा, जैसा कि अपने सम्बन्ध में उसका विश्वास है। अन्त:करण की एक ही पुकार से, एक ही हुंकार से, एक ही चीत्कार से जमे हुए कुसंस्कार उखड़ कर एक ओर गिर पड़ते हैं और उनके स्थान पर नये, उपयुक्त, आवश्यक, अनुरूप संस्कार कुछ ही समय में जम जाते हैं। जो कार्य मन और बुद्धि द्वारा अत्यन्त कष्ट-साध्य मालूम पड़ता था, वह अहंकार परिवर्तन की एक चुटकी में ठीक हो जाता है।
  
अहंकार तक सीधी पहुँच साधना के अतिरिक्त और किसी मार्ग से नहीं हो सकती। मन और बुद्धि को शान्त, मूर्छित अवस्था में छोडक़र सीधे अहंकार तक प्रवेश पाना ही साधना का उद्देश्य है। गायत्री साधना का विधान भी इसी प्रकार का है। उसका सीधा प्रभाव अहंकार पर पड़ता है। ‘‘मैं ब्राह्मी शक्ति का आधार हूँ, ईश्वरीय स्फुरणा गायत्री मेरे रोम-रोम में ओतप्रोत हो रही है, मैं उसे अधिकाधिक मात्रा में अपने अन्दर धारण करके ब्राह्मी-भूत हो रहा हूँ।’’ यह मान्यताएँ मानवीय अहंकार को पाशविक स्तर से बहुत ऊँचा उठा ले जाती हैं और उसे देवभाव में अवस्थित करती हैं। गायत्री साधना अपने साधक को दैवी आत्म-विश्वास, ईश्वरीय अहंकार प्रदान करती है और वह कुछ ही समय में वस्तुत: वैसा ही हो जाता है। जिस स्तर पर उसकी आत्म-मान्यता है, उसी स्तर पर चित्त-प्रवृत्तियाँ रहेंगी। वैसी आदतें, इच्छाएँ, रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ क्रियाएँ उसमें दीख पड़ेंगी। जो दिव्य मान्यता से ओत-प्रोत है- निश्चय ही उसकी इच्छाएँ, आदतें और क्रियाएँ वैसी ही होंगी। यह साधना प्रक्रिया मानव अन्त:करण का कायाकल्प कर देती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 9 जनवरी 2023

👉 आपका मूल्य क्या है?

एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूं कि ऐसे चित्र को चार दिनों में बना सकता हूँ। इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव, साधना और योग्यता छिपी हुई है। कला प्रेमी उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने चित्र खरीद लिया। यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता तो निश्चय ही उसे कम मूल्य मिलता, पर उसके आत्म विश्वास और कला साधना की जीत हुई।
  
चित्रकार ने अपने को जितना मूल्यवान समझा, संसार ने उतना ही महत्व स्वीकार किया। हमें उतना ही सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जितना हम स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते हैं। शांत चित्त से कभी-कभी अपने चरित्र की अच्छाइयों, श्रेष्ठताओं और उत्तम गुणों पर विचार करें। आप जितनी देर तक अपनी अच्छाइयों पर मन एकाग्र करेंगे, उतना वे आपके चरित्र में विकसित होंगी। बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकान्त में अपने चरित्र, स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करें और इससे दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें। मनुष्य के मन में ऐसी अद्ïभूत गुप्त चमत्कारी शक्तियां दबी पड़ी रहती हैं कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे दिव्य गुण उसके चरित्र में बढ़ते-पनपते रहते हैं। आत्म निरीक्षण के माध्यम से आप अपने दैवीय विशिष्ट गुण को बखूबी मालूम कर सकते हैं अथवा किसी योग्य चिकित्सक की सहायता ले सकते हैं। अब्राहम लिंकन की उन्नति का गुर यही था। उसने निरंतर ध्यान और मनोवैज्ञानिक अध्ययन द्वारा अपने छिपे हुए गुणों को खोज निकाला। वह उसी दिशा में निरंतर उन्नति करता गया। एक चिरप्रचलित उक्ति है- ‘मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुत: वह वैसा ही है।’

प्राय: हम देखते हैं कि अनेक अभिभावक दूसरों के बच्चों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं और अपने बच्चे की बुराई। वे बच्चों को  डांटते-फटकारते हैं। नतीजतन उनके बच्चे बड़े होकर घर से भाग जाते हैं या घर पर नहीं टिकते। अभिभावक अपने बच्चों का कम मूल्य लगाते हैं, फलस्वरूप समाज भी उन्हें घटिया दर्जे का ही मानता है। आप कभी-कभी अपने गुणों, अपनी विलक्षण प्रतिभा, अपनी विशेष ईश्वरीय देन के बारे में खूब सोचिए। त्रुटियों की उपेक्षा कर श्रेष्ठताओं की सूची बनाइए। उन्हीं पर विचार और क्रियाएं एकाग्र कीजिए। यह अपनी श्रेष्ठताएं विकसित करने का मनोवैज्ञानिक मार्ग है। प्रिय पाठक, आपको अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और अनेक शक्तियों का ज्ञान नहीं है। आप नेत्रों पर पट्टी बांधे अन्धा-धुन्ध आगे मार्ग टटोल रहे हैं। यदि आप अपनी गुप्त शक्तियों के सहारे आगे बढऩे लगें, मन को सृजनात्मक रूप में शिक्षित कर लें तो जीवन फूलों की सेज प्रतीत होगा और अनेक कार्य आप पूर्ण करने लगेंगे।

आप ताकत की दवाइयां खाते हैं। पौष्टिक अन्न लेते हैं। डंड, मुद्ïगर और तरह-तरह की कसरतें करते हैं। पर सच तो यह है कि शक्ति कहीं बाहर से नहीं आती, वह स्वयं हमारे अन्दर ही मौजूद है। जो हमारे मन की अवस्था के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। डेढ़ पसली के महात्मा गांधी के शरीर में एक दृढ़ निश्चयी मन की ही ताकत थी। उस मन की शक्ति से ही उन्होंने विदेशी राष्ट्र की जड़ें खोखली कर दी थीं। आप में भी असीम शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनकी खोज की जाय, तो निश्चय ही आप संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। अब आज से आप नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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