बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

👉 विश्वास करो

🔷 विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

🔶 विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो।

🔷 क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

🔶 विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

🔷 आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

🔶 विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

.... कर्मयोग से
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/December/v1.9

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 1)

🔷 मोटर की ठीक प्रकार साज-संभाल न रखी जाय तो मजबूत और कीमती होने पर भी कुछ ही दिन में उसका कचूमर निकल जाता है। अच्छे-खासे शरीरों की भी दुर्गति इसी कारण होती देखी गयी है। यही बात हर उपकरण, प्राणी, पदार्थ आदि पर लागू होती देखी गयी है। वे सभी अपने सदुपयोग और रख रखाव पर पूरा ध्यान रखे जाने की माँग करते हैं। उपेक्षा या अतिक्रमण के शिकार होने पर वे अपनी क्षमता गँवा बैठते हैं और अन्ततः कष्ट दायक बनते हैं।

🔶 मस्तिष्क मानवी सत्ता का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। समूचे शरीर पर उसी का शासन है। पेट, हृदय, गुर्दे आदि तो श्रमजीवी मात्र हैं। उनका सूत्र संचालन एवं नियमन तो मस्तिष्क द्वारा ही होता है। यह निर्वाह की बात हुई। उत्थान-पतन में भी उसी के निर्धारणों को श्रेय दिया जाता है। राज्याधिकारी को मुकुट पहनाया जाता है। प्रतिष्ठा सिर की होती है। नियति ने जीवधारी को मस्तिष्क रूपी मुकुट प्रदान किया है। यह उसकी मर्जी है कि यथास्थान रखे अथवा पैरों तले कुचले। पैरों तले कुचलने से तात्पर्य है-उसकी क्षमता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देना अथवा दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करना। ‘भाग्य विधान ललाट पर लिखा होता है’ की उक्ति से यही तात्पर्य निकलता है कि विचार क्षेत्र के ऊपर ही यह अवलम्बित है कि व्यक्ति पिछड़ा, अभागा, उपेक्षित, तिरस्कृत होकर जिये, भर्त्सना और प्रताड़ना का पात्र बने अथवा अनुकरणीय, अभिवन्दनीय, श्रेय, समुन्नत एवं गौरवान्वित सुसम्पन्न होकर जिये।

🔷 इस महत्त्वपूर्ण अवयव को प्रदान करते समय सृष्टा ने उसकी भी जिम्मेदारी मनुष्य को सौंप दी है और यह अधिकार दिया है कि जो जब चाहे जिस तरह उपयोग करे। उसके पीछे एक अनुबन्ध भी है कि उसका भला-बुरा प्रयोग करने पर तदनुरूप प्रतिफल वहन करने के लिए भी बाधित होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 1)

🔷 Few such things that must be note in your mind to never forget. Note this in your mind and never forget. I have to tell you one thing that you are born with some exclusive objective in a very exclusive phase of time. It is a transitional phase. You however cannot see but I can and I must say. The time you are born is not an ordinary one rather extraordinary one. At this time the age is changing very fast. Don’t you see how the characteristics of problems of the world are changing?

🔶 Don’t you see the progress made by science? Neither gunpowder nor any bullets rather only x-ray is shoot out to jam the whole area leaving people in that area dead. Such scientific weapons are being built that can destroy the whole world in seconds if so desired. The science is heading towards destruction so speedily that any man of disturbed mind can destroy the beauty of this world for which the man has been working hard for millions of years. Such is the time. The man has become so wicked and shrewd today as never before in history of universe.
                                         
🔷 On the stage of the world, history tells, the man has never been so unreadable. The man now is growing on scales of intelligence, education, luxury, houses and money but on the scales of humanity it has become so weak, so wicked, so shrewd, so dishonest, so cheat and so cunning that I fear if high-jacking of public minds is further allowed then each one will be swallowing other live and no one will believe even own shadow for any help. Such a critical situation today is O SON! I just can’t say anything. As grave is the situation of this world, the danger is before the world. One section of this Age is on the verge of destruction.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 11)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! ये क्या होता है? ये मैं किसकी कहानियाँ सुना रहा हूँ? मुरदे की। जिंदा आदमियों की भी कह रहा हूँ। आपके जिम्मे मैं एक काम सुपुर्द कर रहा हूँ कि जहाँ भी आपको जिंदा आदमी मालूम पड़ें, जिंदादिल आदमी मालूम पड़े, आप उनके पास जाना। आप उनको मेरा संदेश लेकर के जाना और खुशामद करने के लिए जाना और यह कहना कि भगवान् ने जो विशेषताएँ आपके अंदर दी हैं, आपके अंदर जो प्रतिभा है, जो क्षमता है और जो आपके अंदर विशेषता है, उसके लिए भगवान् ने निमंत्रण दिया है, समय ने निमंत्रण दिया है। युग ने निमंत्रण दिया है, मनुष्य जाति के गिरते हुए भविष्य ने और यह कहा है कि पेट भरने के लिए आपको जिंदा रहना काफी नहीं है।

🔷 पेट तो मक्खी-मच्छर भी भर लेते हैं, कीड़े-मकोड़े और कुत्ते भी भर लेते हैं। किसी ने जलेबी खा ली तो क्या और मक्का की रोटी खा ली तो क्या? खाने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। औलाद पैदा करने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। खाने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए सुअर को पैदा किया गया है, जो एक-एक साल में बारह-बारह बच्चे पैदा कर देता है। गंदी-संदी चीजें खाकर के भी हट्टा-कट्टा होकर मोटा पड़ा रहता है। पेट भर गया, बस खर्राटे भरता रहता है। पेट भरने के लिए इंसान को पैदा नहीं किया गया है।

🔶 मित्रो! इंसान बड़े कामों के लिए पैदा किया है। इंसान की जिंदगी कई लाख योनियों में घूमने के बाद आती है। एकाएक कहाँ आ पाती है? इसलिए मित्रो! वहाँ हमारा संदेश लेकर के जाना, युग की पुकार लेकर के जाना। वक्त की पुकार लेकर के जाना और यह कहना कि आपको समय ने पुकारा है, युग ने पुकारा है, राष्ट्र ने पुकारा है, गुरुजी ने पुकारा है। अगर आप उनकी पुकार सुन सकते हों, अगर आपके कान हैं, अगर आपके अंदर दिल है; अगर आपके पास कान नहीं है, दिल नहीं है, तो हम क्या कह सकते हैं। फिर कौन आदमी सुनेगा? रामायण की कथा हम सुन लेते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आ जाते हैं। भागवत की कथा हम सुनकर के आते हैं, व्याख्यान हम सुन करके आते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आते हैं। चिकने घड़े के तरीके से हमारे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 48)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 धन्यभागी हैं वे शिष्य, जो निरन्तर इस बात के लिए प्रार्थनाशील हैं कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि उनमें नित्य निवास करे; उनका हृदय अपने सद्गुरु की दिव्यदृष्टि के आलोक से आलोकित रहे। श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही समस्त जगत् की सृष्टि हुई है। इसी से जगत् के समस्त पदार्थों की पुष्टि होती है। समस्त सत्शास्त्रों का मर्म इसी में समाया है। श्रीगुरु की कृपादृष्टि मिलने पर ही जगत् की समस्त सम्पदाओं की व्यर्थताओं का पता चलता है। यही शिष्यों के समस्त अवगुणों को धुलकर परिमार्जित करती है। तत् सत्ता यही है।

🔷 इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। संसार में गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों के रंग-मञ्च की स्थापना का परम कारण यही है, यही आधार स्तम्भ है। करुणरस का वर्षण करने वाली इस सद्गुरु की कृपादृष्टि में पुरुष एवं प्रकृति अन्य चौबीस तत्त्व समाए हैं। समष्टि की रूपमाला, जीवन के सभी नियम काल आदि सभी कारण जिसमें समाए हैं, वह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीगुरु की कृपा दृष्टि ही है॥ ५९-६०॥
  
🔶 सद्गुरु कृपा दृष्टि का यह मर्म साधना का गहन रहस्य है, जो केवल योग्य शिष्य के सामने ही प्रकट होता है। सामान्य जन तो इसकी सही अवधारणा भी नहीं कर सकते, इसके रहस्य को पहचानना तो बहुत दूर की बात है। जिसमें शिष्यत्व प्रगाढ़ है, जो समर्पण की साधना में प्रवीण है। जिसने अपनी अहंता को गुरुचरणों में विसर्जित कर दिया है, वही साधक इस अनुभूति का अधिकारी बनता है। अन्य जनों को, तो ये बातें कोरी काव्य कल्पना लगती हैं। कई तो ऐसे हैं, जो इस बारे में केवल तर्क-वितर्क में ही जूझते रह जाते हैं; लेकिन जो सच्चे शिष्य हैं, उन्हें अपने आप ही इस सत्य की मिठास का स्वाद मिलता रहता है। इस बारे में अनेक मार्मिक प्रसंग विख्यात हैं। कई सत्य घटनाएँ संत-समाज में प्रचलित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 77

👉 चीनी एक जहर है

👉 चीनी एक जहर है जो अनेक रोगों का कारण है, जानिये कैसे...

🔷 (1) चीनी बनाने की प्रक्रिया में गंधक का सबसे अधिक प्रयोग होता है। गंधक माने पटाखों का मसाला

🔶 (2) गंधक अत्यंत कठोर धातु है जो शरीर मे चला तो जाता है परंतु बाहर नही निकलता।

🔷 (3) चीनी कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाती है जिसके कारण हृदयघात या हार्ट अटैक आता है।

🔶 (4) चीनी शरीर के वजन को अनियन्त्रित कर देती है जिसके कारण मोटापा होता है।

🔷 (5) चीनी रक्तचाप या ब्लड प्रैशर को बढ़ाती है।

🔶 (6) चीनी ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (7) चीनी की मिठास को आधुनिक चिकित्सा मे सूक्रोज़ कहते है जो इंसान और जानवर दोनो पचा नही पाते।

🔶 (8) चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ तेइस हानिकारक रसायनो का प्रयोग किया जाता है।

🔷 (9) चीनी डाइबिटीज़ का एक प्रमुख कारण है।

🔶 (10) चीनी पेट की जलन का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (11) चीनी शरीर मे ट्राइ ग्लिसराइड को बढ़ाती है।

🔶 (12) चीनी पेरेलिसिस अटैक या लकवा होने का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (13) चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंग्रेजो ने 1868 मे लगाई थी। उसके पहले भारतवासी शुद्ध देशी गुड़ खाते थे और कभी बीमार नही पड़ते थे।

🔶🔶  कृपया जितना हो सके, चीनी से गुड़ पे आएँ। 🔶🔶

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

👉 संघर्ष

🔷 पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

🔶 एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

🔷 पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

🔶 लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

🔷 पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

🔶 महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

🔷 उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

🔶 वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

🔶 वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है ... इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

🔶 वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Feb 2018


👉 मौन साधना के सिद्ध साधक- महर्षि रमण

🔶 मदुरै जिले के तिरुचुपि नामक एक देहान्त में उत्पन्न वैंकट रमण अपनी ही साधना से इस युग के महर्षि बन गये। आत्मज्ञान उन्होंने अपनी ही साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी। यह भाषा ज्ञान उन्होंने किशोरावस्था में ही प्राप्त कर लिया था। अब आत्म-ज्ञान की बारी थी, जिसके लिए उनकी आत्मा निरन्तर बेचैन थी।

🔷 एक दिन जीवन और मृत्यु का मध्यवर्ती अन्तर समझने के लिए उन्होंने अपने मकान की छत पर ही एकाकी अभ्यास किया। शरीर को सर्वथा ढीला करके अनुभव करले लगे कि उनके प्राण निकल गये, काया सर्वथा निर्जीव पड़ी है। प्राण अलग है। प्राण के द्वारा शरीर की उलट-पलट कर देखने की अनुभूति वे देर तक करते रहे। शरीर और प्राण की भिन्नता का उन्हें गहरा अनुभव होता रहा इसके बाद वस्त्र की तरह उन्होंने शरीर को पहन लिया। यह अनुभव उन्हें आजन्म बना रहा।

🔶 आत्मानुभूति का आनन्द जीवन भर लेते रहने के लिए वे अरुणाचलम् चल दिये यह पर्वत दक्षिण भारत में पार्वती जी की तपस्थली माना जाता है। तप के लिए यह स्थान निकटवर्ती और परम पवित्र लगा। घर से बिना सूचना दिये यहाँ चले आये थे सो उन्होंने घर वालों के कष्ट का ध्यान रखते हुए एक पत्र भेज दिया। साथ ही सदा यहीं रहकर सदा तपश्चर्या करने का अभिप्राय भी। मौन उन्होंने अपना तप स्वरूप बनाया। घर के सब लोग उनका दर्शन कर गये। वापस लौटने का अभिप्राय भी कहते रहे पर उनने अस्वीकृति सिर हिलाकर ही प्रकट कर दी।

🔷 महर्षि मौन रहते थे पर उनके समीप आने वालों और प्रश्न पूछने वालों को मौन भाषा में ही उत्तर मिल जाते थे। उनकी दृष्टि नीची रहती थी। पर कभी किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा तो इसका अर्थ होता था, उसकी दीक्षा हो गई। उन्हें ब्रह्मज्ञान का लाभ मिल गया। ऐसे ब्रह्मज्ञानी बड़भागी थोड़े से ही थे।

🔶 आरम्भिक दिनों में वे अरुणाचल के कतिपय अनुकूल स्थानों में निवास करते रहे। पीछे उन्होंने एक स्थान स्थायी रूप से चुन लिया। आरम्भ में उनकी साधना का कोई नियत स्थान और समय नहीं था। पीछे वे नियमबद्ध हो गये, ताकि दर्शनार्थी आगंतुकों को यहाँ वहाँ तलाश में न भटकना पड़े।

🔷 महर्षि रमण सिद्ध पुरुष थे। मौन ही उसकी भाषा थी। उनके सत्संग में सब को एक जैसे ही सन्देश मिलते थे मानों वे वाणी से दिया हुआ प्रचलन सुन कर उठे थे। सत्संग के स्थान में उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर उनका सन्देश सुनने आया करते थे। बन्दर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगन्तुकों की भीड़ से बिना डरे झिझके अपने नियत स्थान पर आ बैठते थे और मौन सत्संग समाप्त होते ही उड़कर अपने-अपने घोंसलों को चले जाया करते थे।

🔶 संस्कृत के कितने ही विद्वान उनकी सेवा में आये अपने-अपने समाधान लेकर वापस गये। उन्हीं लोगों ने रमण गीता आदि कतिपय संस्कृत पुस्तकें लिखीं जिनमें महर्षि की अनुभूतियों तथा शिक्षाओं का उल्लेख मिलता है।

🔷 वे सिद्ध पुरुष थे पर उनने जान-बूझकर कभी सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं किया। भारत में योगियों की खोज करने वाले पाल ब्रंटन ने बड़े सम्मानपूर्वक उनकी कितनी ही अलौकिकताओं का उल्लेख किया है।

🔶 भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में जिन तपस्वियों का उल्लेख किया जाता है उनमें योगीराज अरविन्द, राम-कृष्ण परमहंस और महर्षि रमण के नाम प्रमुख हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1984 अगस्त पृष्ठ 61
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/August/v1.61

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (अन्तिम भाग)

🔶 कामुक चिन्तन में मानसिक शक्ति का इतना अधिक क्षरण होता है जितना कदाचित ही अन्य किसी प्रयोजन में होता हो। शरीर का ओजस् वीर्यपात से नष्ट होता है, किन्तु उससे भी कहीं अधिक महत्त्व की मानसिक क्षमता को आनन्दमय उत्तेजना से अस्त-व्यस्त कर डालने में कामुक चिन्तन का आक्रमण और भी अधिक विनाशकारी है। इस स्तर की कुकल्पनाओं में से कदाचित ही कोई एक प्रतिशत साकार कर पाता है, किन्तु इस कारण पूरी-पूरी हानि उठा लेता है। नीति मर्यादा को तोड़-फोड़ कर रख देने वाली इस विडम्बना से मनुष्य परोक्षतः मानवी गरिमा का अनुशीलन भी गँवा बैठता है। बाहर से भले ही वह निर्दोष दीखता रहे पर यह हानि ऐसी है, जिसके कारण उत्कृष्टता के अन्यान्य क्षेत्र भी मनुष्य के हाथ से चले जाते हैं और वह क्रमशः अन्यान्य अनुबन्ध उल्लंघन की मनोभूमि भी अपनाने लगता है। शारीरिक ब्रह्मचर्य तो प्रतीक मात्र है। जिस ब्रह्मचर्य की अध्यात्म क्षेत्र में अतिशय प्रशंसा की गई और माहात्म्य-गाथा गाई गई है, उसे मानसिक स्तर की कामुक प्रसंग में बरती जाने वाली पवित्रता ही समझनी चाहिए।

🔷 मानसिक आवेशों में लोभ लिप्सा का अतिवाद भी ऐसा है जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति बेईमानी, विश्वासघात से लेकर आक्रामक कुकृत्यों तक में लीन होता और अपराधी जीवन व्यतीत करता है। ऐसे आवेशग्रस्त अनीति उपार्जन को दुर्व्यसनों और उद्धत प्रदर्शनों में ही खर्च करते और बदले में अनेकों संकट ओढ़ते देखे गये हैं।

🔶 काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट्-रिपुओं को उत्तेजक मनोविकार ही समझा जाना चाहिए। उन्हें ऐसे मनोरोग भी कह सकते हैं जो सन्तुलन और सौजन्य का सर्वनाश करके रख दें। इनसे बचना और बचाना ही उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 2)

🔶 The first step that you will have to take is that you have to stop living like ordinary men and say we would live like special and exclusive men.  Serving stomach is one thing. It is not the only job so why to do it absurdly? Why not to fill it through righteous measures? Why shouldn’t we do works that we can do other than serving the stomach? This question will appear before us leading us to feel the need of reshuffling our mind-set in a new way, changing our mind-set so that we would prioritize the assignments given by BHAGWAN over worldly appeals for the former is more regular and profitable. It is more profitable to partner with BHAGWAN, to allow BHAGWAN to pervade in our life. The world history tells us that persons partnering with BHAGWAN have never been and will never be in loss. It will be great to realize that. It must be understood that a great solution to our life-touching issues has been gained.
                                    
🔷 If we could feel that now it is the right time to change our mentality in order to go with BHAGWAN instead of clubbing with world. It will be our second step to excel. The third step to excel is to shift our ambitions, longings and wishes to centre of greatness from that of a bigwig. This should not be our ambitions that we will continue to concentrate on saturating our desires, spending our brain in managing ego, pomp-show and features of a bigwig and dancing in tune with worldly appeals. If our conscience and mind concede to this fact that these things are trivial and childish issues serving no purpose and if we could relinquish timidity, shrewdness and juvenile attitude only then we could endeavor to attain greatness after all How a glass of water can be filled with milk if the water is not taken out of that glass?
                                      
🔶 The same should be our characters, activities & thinking styles as was that of great men and noble men. After conceding to this fact, conceiving these theories in our mind, changing centers of desires & longings we must initiate some actions in our practical life also. Very this is the way prescribed for SADHAKs.

Finished, today’s session.
                                  
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 10)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! क्षमताएँ जिनके अंदर हैं, प्रतिभाएँ जिनके अंदर हैं, वह कहीं-से-कहीं जा पहुँचता है। आम्रपाली जब तक वेश्या रही, तो पहले नंबर की रही। राजकुमार, राजाओं से लेकर सेठ-साहूकार तक उसकी एक निगाह के लिए, उसकी एक चितवन और एक इशारे के लिए ढेरों रुपया खरच कर डालते थे और उसके गुलाम हो जाया करते थे, लेकिन जब आम्रपाली अपनी करोड़ों की संपत्ति को लेकर भगवान् बुद्ध की ओर चली गई, तो न जाने क्या-से-क्या हो गई और सम्राट् अशोक जो था, ऐसा खूनी था कि उसने खानदान-के-खानदान समाप्त कर दिए थे। सभी शाही खानदानों को एक ओर से उसने मरवा डाला था। मुसलमानों ने एक-आध को मारा था, लेकिन उसने तो किसी को जिंदा ही नहीं छोड़ा। ऐसी खूनी था अशोक। उसने चंगेज खाँ, नादिरशाह और औरंगजेब, सबको एक किनारे रख दिया था। जहाँ कहीं भी हमले किए, वहाँ खून की नदियाँ ही बहाता चला गया।

🔷 लेकिन मित्रो! जब उसने पलटा खाया और जब अपने आप में परिवर्तन कर डाला, तो फिर वह कौन हो गया? सम्राट् अशोक हो गया, जिसने बौद्ध संघ और बौद्ध धर्म का सारे-का-सारा संचालन किया। आज जो हमारे झंडे के ऊपर और हमारे सिक्कों-नोटों के ऊपर तीन शेर वाला निशान बना हुआ है, वह सम्राट् अशोक की निशानी है। और जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर चौबीस धुरी वाला और चौबीस पँखुड़ी वाला चक्र लगा हुआ है, यह क्या है? यह सम्राट् अशोक के द्वारा पारित किया और प्रतिपादित किया हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन है, जिसको हमने राष्ट्रीय झंडे के ऊपर स्थान दिया हुआ है। ये किसकी हिम्मत, किसकी दिलेरी थी किसकी बहादुरी थी? उसकी थी, जो डाकू था और खूँखार था।

🔶 मित्रो! भगवान् जहाँ कहीं भी अपना अंश देता है, विभूति देता है, उसके अंदर चमक होती है, लगन होती है, उसके अंदर तड़प होती है और मुरदे? मुरदे हमारे और आपके जैसे होते हैं। साँस लिया करते हैं। भगवान् की जब पूजा करते हैं, तो भी ऐसे-ऐसे सिर हिलाते रहते हैं और साँस लेते रहते हैं। सेवा करने जाते हैं, तो वहाँ भी निठल्ले की तरह पड़े रहते हैं। सत्संग करने, शिविर करने आते हैं, तो यहाँ भी मौसी जी-मौसा जी की याद सताती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 47)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 गुरुगीता का प्रत्येक महामंत्र गुरुभक्ति का गीत है। यह जब शिष्य की समर्पण साधना की सरगम से सुरबद्ध होता है, तो इसकी सम्मोहकता भुवन मोहिनी होती है। गुरुभक्ति के ये गीत-समर्पण के संगीत से सजकर शिष्य की चेतना में ईश्वरीय प्रकाश की सृष्टि करते हैं। इस महासत्य की अनुभूति अब तक अनेकों शिष्यों को हुई है। इन क्षणों में भी बहुतेरे इस सत्य को अपने जीवन की परिभाषा मानकर जुटे हैं। उनकी लगन उन्हें अन्तर्जगत के अनेकों रहस्यों से परिचित करा रही है। इन रहस्यों में सबसे परम रहस्य एक ही है कि गुरुकृपा से सब कुछ सम्भव है। यहाँ तक कि गुरु कृपा से परम असम्भव भी सहज सम्भव है। इस सच्चाई को जब भी कोई चाहे अपने जीवन में अनुभव कर सकता है।

🔷 गुरु समर्पण की भक्ति कथा में रमे हुए शिष्यों ने गुरु गीता के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन बोध वचनों को पढ़ा कि गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए। यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल में अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए। ध्यान की यह गुप्त गोपनीय विधि अपने परिणाम में साधक को अध्यात्म साधना का चरम फल देने वाली है। जिन्होंने भी इसे किया है, वे सद्गुरु के कृपा के श्रेष्ठतम प्रसाद को पाने में सफल हुए हैं।

🔶 गुरु कृपा की इस साधना महिमा को और भी अधिक स्पष्टता देते हुए भगवान् भोलेनाथ जगन्माता पार्वती से कहते हैं-

सकलभुवनसृष्टिः कल्पिताशेषपुष्टिर निखिलनिगमदृष्टिः संपदां व्यर्थदृष्टिः।
अवगुणपरिमार्ष्टिस्तत्पदार्थैकदृष्टिर भवगुणपरमेष्टिर्मोक्षमार्गैकदृष्टिः॥ ५९॥
सकलभुवनरंगस्थापनास्तंभयष्टिः सकरुणरसवृष्टिस्तत्त्वमालासमष्टिः।
सकलसमयसृष्टिः सच्चिदानंददृष्टिर निवसतु मयि नित्यं श्रीगुरोर्दिव्यदृष्टिः॥ ६०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 76

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 6)

🔷 कामुक चिन्तन इस सुव्यवस्थित निर्धारण पर सीधा आक्रमण करता है और पशुओं जैसी स्थिति में लौटना चाहता है जिसमें यौनाचार को शरीर कृत्य विनोद भर माना जाता है। ऐसी छूट पाने से पूर्व परिवार संस्था और समाज गठन को समाप्त करके आदिम युग में लौटना पड़ेगा। इस पर भी समाधान नहीं। बलिष्ठ कुत्ते कमजोरों को खदेड़ कर यौनाचार का लाभ लेते हैं। आदिम युग में भी स्वेच्छाचार नहीं चलता था। सभ्य युग में मर्यादा पालन का अनुबन्ध है तो आदिम युग में इस प्रयोजन के लिए ठनने वाले मल्ल में स्वयंवर का विजेता होने का। दोनों ही दृष्टि से मनचाही स्वच्छन्दता को छूट नहीं है। मनुष्य न भौंरे हो सकते और न नारियाँ तितली। एक फूल से उड़कर दूसरे पर जा बैठने की छूट उन्हें तब तक नहीं मिल सकती, जब तक कि मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनकर रहना अंगीकार है।

🔶 कामुक चिन्तन असंख्यों पर हावी रहता है। विपरीत लिंग वालों के रूप में यौवन का स्मरण आता रहता है और रमण के लिए मन चलता है। कल्पनाएँ उठती हैं और एक परीलोक बनकर खड़ी हो जाती है। मन मोदक खाने में मनोयोग ऐसे जंजाल में जकड़ जाता है जिसके कारण किन्हीं महत्त्वपूर्ण प्रसंगों पर ध्यान ही नहीं जमता। इस कुचक्र में कितने ही प्रतिभावान छात्र अनुत्तीर्ण होते और भविष्य गँवाते देखे गये हैं। कितने ही कुटेवों के शिकार होते और ओजस्-तेजस् गँवाकर छूँछ बनते हैं। कई उस स्वप्नलोक के साथ इतने अधिक लिपट जाते हैं कि अश्लीलता का उद्धत प्रदर्शन करके अनजानों तक से छेड़खानी करने जैसी कुचेष्टा करते देखे गये हैं। परिणाम स्पष्ट है।

🔷 बहुत बार तो हाथ मलते और खीजते रहने से भी काम चल जाता है, पर बहुत बार बदले में ऐसा मजा चखने को भी मिलता है, जिसका स्मरण जन्म भर बना रहे और छठी का दूध याद आये। व्यभिचार की सीमा तक जा पहुँचने पर भी इस कामुक चिन्तन की परिणति और भी अधिक भयावह होती है। उससे दोनों ही क्षेत्रों के गृहस्थ जीवन बेतुके, अप्रामाणिक, नीरस स्तर के बनते देखे गये हैं। सन्तान पर तो इसका प्रभाव निश्चित रूप से अत्यधिक पड़ता है। वे व्यभिचारी अभिभावकों को क्षमा नहीं करते। इसके कई आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक कारण भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 1)

🔷 Each fellow of us must conceive deeply in our minds that the present time in which we & you are living is the most exclusive one. This is such a transition period in which the Age is changing. Each one of us must conceive that our personality is very special. We have been sent by BHAGWAN for some specific task. Insects and wicked creatures are usually born for reproduction and servicing the stomach. Many of humans too serve only this purpose and live like human-fool and human-insect, also no account of their lives is maintained. Such men also cannot do anything other than serving stomach and reproduction, but BHAGWAN pose his faith on some persons and believes such persons to do some work exclusively for BHAGWAN also and not be busy in own labyrinth only.
                                         
🔶 Every person of YUG NIRMAN PARIVAR must frame an idea about himself that BHAGWAN has sent us for some every exclusive jobs; that this is such some exclusive time-span and each one of us has to feel it that we have been entrusted with duties to fulfill the needs of the Age. If you could believe that path to progress can be opened and you can proceed on the way of great men, thus you can successfully achieve the object of our family of Age-building. You will get exclusive personality which will not be like that of ordinary men.
                                          
🔷 Now is very exclusive phase of time, not like that of usual normal time rather it is emergency-like situation and we all know that emergent actions are to be taken in any emergency-like situation. The responsibility upon our shoulders is not ordinary one only of serving stomach. There are additional responsibilities we have to discharge as Monkeys, Bears; cow-boys came to accompany KRISHAN and RAM to contribute exclusively for some specific objectives. If you too could  feel like that and realize that you people too are associated with MAHAKAAL the same way then new questions,  problems and also new grounds and reasons behind  exciting scenario will be clear to you.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 8)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! क्या वजह है इसकी? हम में और तुलसीदास जी में क्या अंतर है? एक अंतर है। नाक, आँख, कान, दाँत और हाथ-पाँव सब बराबर हैं, पर एक चीज जो उनके अंदर थी, वह हमारे अंदर नहीं है। वह चीज है, जिसे मैं जिंदगी कहता हूँ, जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ, जिसको मैं विभूति कहता हूँ, जिसको मैं लगन कहता हूँ, तन्मयता कहता हूँ, जीवट कहता हूँ। वह जीवट मित्रो! जहाँ कहीं भी होगा, तो वह बड़ा शानदार काम कर रहा होगा और गलत दिशा पकड़ने पर गलत काम भी कर रहा होगा।

🔶 अंगुलिमाल पहले नंबर का डाकू था। उसने ये कसम खाई थी कि फोकट में किसी का पैसा नहीं लूँगा। उँगलियाँ काट-काटकर उसकी माला बनाकर वह देवी को रोज चढ़ाया करता था। अगर कोई कहता कि अरे भाई! पैसे ले ले, पर उँगली क्यों काटता है हमारी? वह कहता, वाह! फोकट में, दान में नहीं लेता हूँ। पहले तेरी उँगली काटूँगा, तो मेरी मेहनत हो जाएगी। फिर उस मेहनत का पैसा ले लूँगा। ऐसे मुफ्त में कैसे ले लूँगा किसी का पैसा?

🔷 इस तरह वह रोज एक साथ उँगलियाँ कट-काटकर उसकी माला देवी को पहनाया करता था? कौन? खूँख्वार अंगुलिमाल डाकू, लेकिन जब उसने पलटा खाया, तो कैसा जबरदस्त पलटा खाया, आपको मालूम है न? अंगुलिमाल जब तक डाकू था, तो पहले नंबर का और जब संत हो गया, तो उसने हिंदुस्तान से आगे जाकर के सारे-के-सारे विदेशों में, मिडिल ईस्ट में वो काम किए कि बस, तहलका मचा दिया। वह जहाँ कहीं भी गया, अपने प्रभाव से दुनिया को बदलता हुआ चला गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 46)

👉 साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू

🔶 सद्गुरु के ध्यान की यह सर्वोच्च विधि है। यह ध्यान जीवन को शिवस्वरूप प्रदान करने वाला है। अत्यन्त प्रभावशाली एवं परम गोपनीय, अतिदुर्लभ एवं समस्त आध्यात्मिक विभूतियों को प्रकट करने वाला है। ध्यान की इस रहस्यमयी विधि का प्रयोग श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के शिष्य दुर्गाचरण नाग किया करते थे। श्रीरामकृष्ण ने उनकी पात्रता पर विश्वास करके यह विधि प्रदान की थी। जिनकी सन्त साहित्य में रुचि है, उनके लिए दुर्गाचरण नाग का नाम अपरिचित नहीं है। श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में उन्हें नाग महाशय के नाम से जाना जाता था। गृहस्थ होने के बावजूद उनका जीवन संन्यासियों से भी ज्यादा कठोर एवं तपपरायण था। उनके कठोर तपश्चरण के अनेकों कथानक सन्त साहित्य में पढ़े और जाने जाते हैं।
  
🔷 नाग महाशय का सारा दिन गरीबों एवं दुःखी जनों की चिकित्सा सेवा में बीतता था। चिकित्सक होते हुए भी उनके लिए चिकित्सा कभी भी व्यवसाय नहीं बनी,बल्कि उन्होंने सदा ही उसे सेवा कार्य समझा। अपने इस सेवा कार्य में, जिसे वे नारायण सेवा कहा करते थे, कभी-कभी तो घर का सामान और रुपये भी दे आते थे। दिन भर की इस सेवा के बावजूद नाग महाशय की प्रायः सम्पूर्ण रुचि जप-ध्यान में बीतती थी। उनकी साधना इतनी उग्र एवं कठोर थी कि सामान्य निद्रा की उन्हें कोई विशेष जरूरत नहीं रह गयी थी। अमावस के दिन उपवास रखकर गंगा के किनारे जप करते-करते वह भाव समाधि में लीन हो जाते थे। कभी-कभी तो यह समाधि दशा इतनी प्रगाढ़ होती कि नदी का ज्वार उन्हें बहा ले जाता। बाद में इन्हें तैरकर वापस आना पड़ता।
  
🔶 ऐसे महान् साधक नाग महाशय के लिए उनके गुरु श्रीरामकृष्ण ही सर्वस्व थे। साधना के उच्च शिखरों पर आरूढ़ नाग महाशय की पात्रता-पवित्रता एवं साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्रीरामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था-तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया-यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा-तब ठीक है। तुम सच्चे अधिकारी हो। तुम इसे कर सकते हो। ऐसा कहते हुए श्री ठाकुर को समाधि लग गयी। समाधि की इसी भावदशा में नाग महाशय के वक्षस्थल पर उनके पैर पड़ गये। इस स्पर्श मात्र से नाग महाशय को एक दिव्य अनुभूति हुई, जिसमें उनके अन्तःकरण में सहस्रदल कमल में सद्गुरु के ध्यान का स्वरूप प्रकट हो गया। साथ ही उन्हें सर्वत्र दिव्य ज्योति के दर्शन भी हुए।
  
🔷 इस अनुभूति के बाद उन्होंने श्री ठाकुर द्वारा निर्दिष्ट की गयी ध्यान की विधि का प्रयोग करना शुुरू किया। यहाँ पर हम इन पंक्तियों के पाठकों को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सहस्रदल कमल में ध्यान की यह विधि सर्वसाधारण के लिए उचित नहीं है। जिसके आज्ञाचक्र एवं अनाहत चक्र का ठीक-ठीक विकास हो चुका होता है, उन्हीं के लिए यह दुर्लभ साधना उचित बतायी गयी है। सहस्रदल कमल पर गुरुगीता के इन महामंत्रों के अनुरूप ध्यान की परमहंस अवस्था को सिद्धों का ध्यान कहा गया है। यही कारण है कि यहाँ उसका सम्पूर्ण रहस्य नहीं बताया जा रहा। नाग महाशय की उच्च अवस्था देखकर ही श्री श्रीरामकृष्ण ने उन्हें यह दुर्लभ प्रयोग बताया था।
  
🔶 इस ध्यान प्रयोग से नाग महाशय में असीमित योग ऐश्वर्य प्रकट हुआ। उन्होंने अपने गुरुदेव के साकार और निराकार स्वरूप के दर्शन किये। माँ गंगा स्वयं ही उनके आँगन में प्रकट हुई। अनेक देवदुर्लभ चमत्कार नाग महाशय के जीवन में प्रकट हुए। संक्षेप में इस ध्यान विधि से परम असम्भव भी सम्भव बन पड़ता है। हाँ, इसे निर्दिष्ट करने का अधिकार केवल सद्गुरु को है। जिन्हें भी यह विधि गुरुदेव ने बतायी है, वे आज आध्यात्मिक जीवन के परम आनन्द में विभोर हैं। गुरुदेव की कृपादृष्टि ऐसी ही सर्वफलदायिनी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 74

👉 गायत्री साधना का सत्परिणाम अवश्यंभावी

🔶 गायत्री साधना का प्रत्यक्ष परिणाम है-सात्विक आत्मबल की अभिवृद्धि।  सात्विक आत्मबल के दस लक्षण हैं- उत्साह, सतत परिश्रम, कत्र्तव्यपरायणता, संयम, मधुर स्वभाव, धैर्य, अनुद्वेग, उदारता, अपरिग्रह और तत्त्वज्ञान। यदि कोई व्यक्ति सच्ची गायत्री साधना कर रहा है, तो उसमें अवश्य ही ये गुण बढ़ेंगे और जैसे-जैसे यह बढ़ोतरी आगे चलेगी, वैसे ही वैसे जीवन की कठिनाइयों का समाधान होता चलेगा। जब साधक की आत्मा गायत्री शक्ति से परिपूर्ण हो जाती है, तो उसे किसी भी प्रकार का कोई कष्टï, अभाव या दु:ख नहीं रह जाता। वह निरंतर पूर्ण परमानन्द का, ब्रह्मïानंद का अलौकिक रसास्वादन करता रहता है।
  
🔷 भ्रांत, पथ-भ्रष्ट, लालची, गायत्री को मुफ्त में ठगने का षड्यंत्र करने वाले लोग सच्ची साधना नहीं कर सकते। करना तो दूर, उसे ठीक तरह समझ भी नहीं सकते। वे जिव्ह्वा के अग्र भाग से 24 अक्षरों की तोता रटंत करते हैं; अंत:करण में श्रद्धा-विश्वास का नाम भी नहीं होता, मातृ-भक्ति का प्रेमांकुर कहीं दीख नहीं पड़ता। जितने मिनट चौबीस अक्षर रटते हैं, उतने समय अपनी अवांछनीय, अनैतिक, अवास्तविक मृग तृष्णाओं में ही मन को लपलपाते रहते हैं। दस-पाँच दिन जप करने पर यदि उनकी सब तृष्णाएँ पूरी नहीं हो गयीं, तो उनका साहस टूट जाता है और साधना को छोड़ बैठते हैं। साधना विधि से छोटे-छोटे नियम बंधनों तक को गवारा नहीं करना चाहते। दान- पुण्य के नाम पर एक कौड़ी खर्च करना ब्रज उठाने के समान भारी मालूम पड़ता है। ऐसे लोगों की साधना प्राय: निष्फल रहती है। कई बार तो वह पहले की अपेक्षा भी घाटे में रहते हैं। वे सोचने लगते हैं कि हमारे सब काम गायत्री करके रख जायेगी, इसलिए हमें अब कुछ करना नहीं है। वे अपने रहे बचे प्रयत्न को भी छोड़ बैठते हैं। आलस्य, अकर्मण्यता और परावलम्बन की मनोवृत्ति में केवल कार्य नाश ही हो सकता है। ऐसी दशा में उनका लँगड़ा-लूला विश्वास भी नष्टï हो जाता है और भविष्य में आत्म-विद्या के दुरुपयोग से कोई लाभ उठाने का उनमें उत्साह भी नहीं रहता।
  
🔶 उपरोक्त प्रकार की छछोरी बुद्धि के साथ, बाल-क्रीड़ा के साथ साधना करना निष्प्रयोजन है। कभी-कभी तत्काल आश्चर्यजनक परिणाम भी होते अवश्य है; पर सदा ही वैसी आशा नहीं की जा सकती। वेदमाता की आराधना एक प्रकार का आध्यात्मिक कायाकल्प करना है। जिन्हें कायाकल्प कराने की विद्या मालूम है, वे जानते हैं कि इस महा अभियान को करते समय कितने धैर्य और संयम का पालन करना होता है, तब कहीं शरीर की जीर्णता दूर होकर नवीनता प्राप्त होती है। गायत्री आराधना का आध्यात्मिक कायाकल्प और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके लाभ केवल शरीर तक ही सीमित नहीं हैं, वरन्ï शरीर, मस्तिष्क, चित्त, स्वभाव, दृष्टिïकोण सभी का नवनिर्माण होता है और स्वास्थ्य, मनोबल एवं सांसारिक सुख-सौभाग्यों में वृद्धि होती है। ऐसे असाधारण महत्त्व के अभियान में समुचित श्रद्धा, सावधानी, रुचि व तत्परता रखनी पड़े, तो इसे कोई बड़ी बात न समझना चाहिए। केवल शरीर को पहलवानी के योग्य बनाने में काफी समय तक धैर्यपूर्वक व्यायाम करते रहना पड़ता है। दण्ड, बैठक, कुश्ती आदि के कष्टï साध्य कर्मकाण्ड करने होते हैं।
  
🔷 यह सत्य है कि कई बार जादू की तरह गायत्री उपासना का लाभ होता है। आई हुई विपत्ति अति शीघ्र दूर हो जाती है और अभीष्ट मनोरथ आश्चर्यजनक रीति से पूरे हो जाते हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अकाट्य प्रारब्ध भोग न टल सके और अभीष्टï मनोरथ पूरा न हो। गीता में भगवान्ï श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का ही उपदेश दिया है। साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उसका तो परिणाम मिलेगा ही; पर हम अल्पज्ञ होने के कारण अपना प्रारब्ध और वास्तविक हित नहीं समझते।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 Feb 2018


👉 छत्रपति की चरित्र निष्ठा

🔷 उनकी आँखों में रह-रह कर बेचैनी की लहर उठती और विलीन हो जाती। माथे पर उभरती और विलीन होती सिकुड़न चेहरे की गम्भीरता इस बात गवाही दे रहे थे कि वह किसी गहरे सोच में डूबे हैं। साथ ही उन्हें किसी की प्रतीक्षा है और बात थी भी यही। यह सेनापति भामलेकर की प्रतीक्षा कर रहे थे। जो शत्रु-सेना का मुकाबला करने और उसे राज्य की सीमा से दूर तक खदेड़ देने के लिए युद्ध अभियान पर गए थे। उन्हें चिन्ता थी कि कहीं आशा के विपरीत भामलेकर शत्रु सेना के बन्दी न हो गए हों।

🔶 प्रतीक्षा करते हुए काफी देर हो गयी थी। वह महल की अट्टालिका पर ही बैठे थे। तभी उन्होंने तेजी से घोड़ा दौड़ाते चले आ रहे एक घुड़ सवार को देखा। नजदीक आने पर स्पष्ट हुआ कि यह भामलेकर ही थे। उनकी चाल देखकर ही अनुमान लगा लिया कि वह विजयश्री का वरण करके लौटे हैं, पर उनके पीछे दो सैनिक जो डोली लेकर आ रहे थे, उसके बारे में उनको कुछ समझ में नहीं आया।

🔷 दौड़कर वह नीचे आए और भामलेकर को गले लगा लिया। भामलेकर ने कहा-छत्रपति! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी। बेचारा बहलोल जान बचाकर भाग गया। अब हिम्मत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके।

🔶 वह तो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया था भामले, छत्रपति ने कहा-और डोले की ओर इशारा करते हुए कहा, यह क्या है?

🔷 अट्टहास करते हुए भामले ने कहा-इसमें मुसलिम रमणियों में सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल खाँ की बेगम है महाराज! मुगल सरदार ने हजारों लाखों हिन्दू नारियों सतीत्व लूटा है। उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी ओर से आपको यह भेंट हैं।

🔶 भामलेकर के इस कथन को सुनकर एक पल के लिए शिवाजी अवाक् रह गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके कानों में ढेर सारा पिघला हुआ शीशा उड़ेल दिया हो। वह तड़प उठे। उन्हें अपने किसी सरदार और सामन्त से ऐसी किसी मूर्खता की आ नहीं थी। कुछ देर ठहरने के पश्चात् वे डोले के पास गए, पर्दा हटाया और बहलोल की बेगम को बाहर आने के लिए कहा। छुई-मुई सी अपने आप में समिटती सिकुड़ती वह बाहर आयी। शिवाजी ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा-सचमुच तू बड़ी सुन्दर है। अफसोस है कि मैं तेरे पेट से पैदा नहीं हुआ नहीं ता मैं भी तेरे जैसा सुन्दर होता।

🔷 फिर उन्होंने एक अन्य अधिकारी को निर्देश देते हुए कहा कि वह बेगम को बहलोल खाँ के पास ले जाकर सौंप आए। इसके बाद वह सामलेकर की ओर मुड़े और बोले तुम मेरे साथ इतने दिनों तक रहे, पर मुझे पहचान नहीं पाए। वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे और धर्मग्रन्थों की होली जलाए। कोई और पतन के गर्त में गिरता हो, तो उसके प्रतिकार का यह अर्थ नहीं कि हम भी उसी की तरह नीचता पर उतर आएं।

🔶 हमें अपनी साँस्कृतिक गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। अपने अभियान का उद्देश्य किसी राज्य का विस्तार नहीं, संस्कृति का विस्तार है। उन भावनाओं, मान्यताओं विचारों का विस्तार करना है, जिससे इनसान उत्पीड़क का उन्मूलन और उत्पीड़ित को संरक्षण दे सके। छत्रपति के इस कथन को सुनकर सभी उपस्थिति सरदारों सामन्तों के नेत्र सजल हो उठे। भामलेकर को अपनी भूल पर पश्चाताप हो रहा था।

🔷 इधर बेगाम को ससम्मान लौटाया हुआ देखकर बहलोल खाँ विस्मित हुए बिना नहीं रहा। वह तो सोच रहा था कि अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के हरम की शोभा बन चुकी होगी। पर बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जानकर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति पिघल उठा। पत्र में शिवाजी ने अपने सेनानायक की गलती के लिये क्षमा माँगी थी। इस पत्र को देखकर स्वयं को बहुत महान, वीर और पराक्रमी सामने वाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में शिवाजी के सामने बहुत छोटा दिखायी देने लगा। उसने निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देखकर ही दिल्ली लौटूँगा।

🔶 इसके लिए आग्रह भेजा गया। बहलोल खाँ और शिवाजी के मिलने का स्थान निश्चित हुआ। नियत तिथि समय व स्थान पर शिवाजी बहलोल खाँ के पहले ही पहुँच गये। बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चाताप आत्मग्लानि के साथ-साथ शिवाजी के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही उनके पैरों में झुक गया- “माफ कर दो मुझे मेरे फरिश्ते। बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला करूंगा। उस समय तेरी सूरत की याद मुझे थोड़ी सी ठंडक पहुँचाएगी।

🔷 ‘जो हुआ सो हुआ’ अब आगे का होश करो एक पराजित और श्रद्धावनत सेनापति को गले लगाते हुए छत्रपति शिवाजी ने कहा।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

👉 अच्छा बनने की प्रेरणा

🔶 एक नगर में एक चोर रहता था। एक दिन उसने बड़ी चोरी करने की योजना बनाई। उसमें प्राण जाने का भी खतरा था। अपने चंचल मन को स्थिर करने, सफलता की कामना करने तथा बाधाओं का निवारण करने के लिए वह चोरी से पूर्व एक मंदिर में मनौती मांगने पहुंचा। पूजा के बाद जब चोर मंदिर का घंटा बजाने लगा तो वह टूटकर उसके सिर पर आ गिरा जिससे उसकी मृत्यु हो गई। चोर के सूक्ष्म शरीर को यमदूत धर्मराज के पास ले गए।

🔷 धर्मराज ने चित्रगुप्त से उसके पाप-पुण्य का लेखा देखने को कहा। बही देखने से पता चला कि चोर ने अपने जीवन में एक दिन एक भूखे भिखारी को खाना खिलाया था। उस पुण्य के परिणाम स्वरूप उसे एक घंटे के लिए स्वर्ग ले जाकर उसकी इच्छापूर्ति करने का विधान था। जब स्वर्ग में चोर से उसकी कोई इच्छा बताने को कहा गया तो वह विचार करके बोला- “मुझे एक घंटे के लिए इंद्रासन चाहिए।”

🔶 चोर की इच्छापूर्ति के लिए देवराज इंद्र ने अपना सिहासन त्याग दिया और एक घंटे के लिए उसे स्वर्ग का राज्य दे दिया गया। इंद्रासन पर विराजते ही चोर का विवेक जाग उठा। उसने सोचा- ‘जब एक भूखे को खाना खिलाने मात्र से मुझे एक घंटे के लिए इंद्रासन मिल सकता है तो कोई ऐसा शुभ कार्य करना चाहिए जिसके प्रताप से मैं सदैव स्वर्ग का सुख भोग सकूं।’

🔷 उसने समस्त देवताओं तथा ऋषि-मुनियों का श्रद्धापूर्वक यथायोग्य सत्कार किया। उसके बाद धन-संपत्ति के स्वामी कुबेर को बुलाकर सभी अमूल्य संपत्ति दान करने का निर्देश दिया। उसने ऋषि वशिष्ठ को कामनापूर्ति करने वाली सुंदर कामधेनु दे दी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को आद्वितीय अश्व और ऋषि अगस्त्य को ऐरावत हाथी भेंट कर दिया। गलत काम करने वाले लोग हमेशा दंड से ही नहीं सुधरते, उनके किसी छोटे से अच्छे कार्य की प्रशंसा से भी उन्हें अच्छा बनने की प्रेरणा मिल सकती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 Feb 2018


👉 सादा जीवन-उच्च विचार

🔷 मानवी सत्ता शरीर और आत्मा का सम्मिश्रण है। शरीर प्रकृति पदार्थ है। उसका निर्वाह स्वास्थ्य, सौन्दर्य, अन्न-जल जैसे प्रकृति पदार्थों पर निर्भर है। आत्मा चेतन है। परमात्मा चेतना का भाण्डागार है। आत्मा और परमात्मा की जितनी निकटता, घनिष्टïता होगी, उतना ही अंतराल समर्थ होगा। व्यक्तित्व विकसित-परिष्कृत होगा। शरीरगत प्रखरता और चेतना क्षेत्र की पवित्रता जिस अनुपात में बढ़ती है, उतना ही आत्मा और परमात्मा के बीच आदान-प्रदान चल पड़ता है। महानता के अभिवर्धन का यही मार्ग है। इसी निर्धारण पर सच्ची प्रगति एवं समृद्धि अवलम्बित है।
  
🔶 दो तालाबों के बीच नाली का सम्पर्क-संबंध बना देने से ऊँचे तालाब का पानी नीचे तब तक आता रहता है, जब तक कि दोनों की सतह समान नहीं हो जाती। आत्मा और परमात्मा को आपस में जोडऩे वाली उपासना यदि सच्ची हो, तो उसका प्रतिफल सुनिश्चित रूप से यह होना चाहिए कि जीव और ब्रह्मï में गुण, कर्म, स्वभाव की समता दृष्टिïगोचर होने लगे। उपासना निकटता को कहते हैं। आग और ईंधन निकट आते हैं, तो दोनों एक रूप हो जाते हैं। इसके लिए साधक को साध्य के प्रति समर्पण करना होता है। उसके अनुशासन को जीवन नीति बनाना पड़ता है। जो इतना साहस और सद्भाव जुटा सके, वह सच्चा भक्त। भक्त और भगवान् की एकता प्रसिद्ध है। भक्त को अपनी आकांक्षा, विचारणा, आदत एवं कार्य पद्धति में अधिकाधिक उत्कृष्टïता का समावेश करना होता है। आदर्शों का समुच्चय भगवान ही, भक्त का इष्ट एवं उपास्य है।
  
🔷 भगवान् की प्रतिमाओं के पीछे उच्चस्तरीय चिंतन-चरित्र की भावना है। वह भावना न हो, तो प्रतिमाएँ खिलौना भर रह जाती हैं। सदाशयता के प्रति प्रगाढ़ आस्था बनाने में जिसका अंतराल जितना सफल हुआ, वह उसी स्तर का भगवत् भक्त है। भक्त का गुण, कर्म, स्वभाव ईश्वर के सहचर पार्षदों जैसा होना चाहिए। जिस ईश्वर भक्ति के प्रतिफलों का वर्णन स्वर्ग, मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि आदि के रूप में किया गया है, उसमें एकत्व अद्वैत, विलय, विसर्जन की शर्त है। साधक भगवान् को आत्मसात्ï करता है और उसके निर्धारण, अनुशासन में अपनाने को ही गर्व-गौरव और हर्ष-संतोष अनुभव करता है।
  
🔶 शब्द जंजाल से फुसलाने, छुटपुट उपहार देकर बरगलाने और स्वार्थ सिद्धि के लिए बहेलिये, मछुवारे जैसे छद्म प्रदर्शनों की विडम्बना रचना न तो ईश्वर भक्ति है और न उसके बदले किसी बड़े सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए। ईश्वर न्यायकारी है। उसके दरबार में पात्रता की कसौटी पर हर खरे खोटे को परखा जाता है। प्रामाणिकता ही अधिक अनुग्रह एवं अनुदान का कारण होती है। यह कार्य प्रार्थना, याचना के रूप में पूजा-अर्चा मात्र करते रहने से शक्य नहीं। ईश्वर भक्ति, कर्मकाण्ड प्रधान नहीं। उसमें भावना, विचारणा और गतिविधियों को अधिकाधिक उत्कृष्ट बनाना होता है। उसकी उपेक्षा करके मनुहार तक सीमित व्यक्ति आत्मिक उपलब्धियों से वंचित ही रहते हैं। उनके पल्ले थकान, निराशा और खीझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता।
  
🔷 जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों को हठपूर्वक निरस्त करना पड़ता है। अपने आपे से, अभ्यस्त ढर्रे से संघर्ष करने का नाम तपश्चर्या है। यह आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण है। दूसरा है योग साधना। इसका अर्थ है  दैवी विशिष्टïताओं के साथ व्यक्तित्व को जोड़ देना। गुण, कर्म, स्वभाव में चिंतन और चरित्र में उत्कृष्टïता, आदर्शवादिता का समावेश करना। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की इस उभयपक्षीय प्रक्रिया को गलाई, ढलाई, धुलाई, रंगाई भी कहते हैं। इन्हीं को पवित्रता-प्रखरता का युग्म भी कहते हैं। सज्जनता और साहसिकता का समन्वय ही आत्मिक प्रगति का सच्चा स्वरूप है। इस प्रगति के साथ भौतिक क्षेत्र के जंजाल, प्रपंच स्वभावत: घटने लगते हैं और सादा जीवन, उच्च विचार अक्षरश: चरितार्थ होने लगते हैं।
  
🔶 अन्न, जल, वायु पर शरीर की स्थिरता एवं प्रगति निर्भर है। आत्मा की प्रगति के लिए उपासना, साधना एवं आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठïता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भावभरी नियमितता। साधना अर्थात्ï जीवन साधना। संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों-मान्यताओं का उन्मूलन। आराधना अर्थात्ï लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रमदान, अंशदान। यह तीनों ही प्रयास साथ-साथ चलने चाहिए। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जो अपने आप में पूर्ण हो। इसमें से एक भी ऐसा नहीं, जिसे छोडक़र प्रगति पथ पर आगे बढऩा संभव हो सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 5)

🔶 प्रतिकूलता को सहन न कर सकना, मतभेद को स्वीकार न करना, जो चाहा गया है वही होना जैसा स्वभाव बना लेने पर आवेश आने लगता है। अधीर, जल्दबाज, समय की प्रतीक्षा न कर सकने वाले को अगली बार के प्रयास में तालमेल बैठाने जैसी सम्भावनाओं को गँवा बैठने पर आवेश चढ़ दौड़ता है। दूसरों की तनिक भी अवज्ञा, उपेक्षा सहन न कर सकने वाले भी उत्तेजित रहते देखे गये हैं। उनमें सामने वाले की स्थिति का सही निर्णय कर सकने तक की क्षमता नहीं रहती। जब बात पूरी तरह सुनी समझी ही नहीं गई तो उसमें भ्रम रहना स्वाभाविक है। आवेश भ्रमवश आया है या वस्तुस्थिति समझकर, हर हालत में उसकी परिणति हानिकारक ही होती है।

🔷 कुछ उत्तेजनाएँ ऐसी होती है जिनमें सामने वाले की गलती तो नहीं, अपनी अभिलाषा और उतावली ही प्रधान होती है। इसके कारण भी मस्तिष्क का सन्तुलन बिगड़ता है और सही निर्णय न कर पाने की स्थिति बनती है। ऐसी मनःस्थिति को सनक कहा जाता है। सनक वह, जिसमें औचित्य-अनौचित्य का, सम्भव-असम्भव का, लाभ-हानि का कुछ भी भान न रहे और अवांछनीय चिन्तन को चरितार्थ करने जैसी उद्दण्डता उभरे। सनकों की संख्या अधिक है। इनमें दो ऐसी हैं जो बहुतों पर चढ़ दौड़ती हैं और उन्हें बेतरह हैरान करती हैं। इनमें से एक है कामुकता, दूसरी है लोभ-लिप्सा। दोनों की प्रकृति तो भिन्न है फिर भी प्रतिक्रिया और परिणाम में समान हैं। वे मनुष्य के विवेक का बुरी तरह अपहरण करती हैं।

🔶 दाम्पत्य जीवन की एक मर्यादा है। नर-नारी एक सूत्र में बँधे हैं और प्रणय की सुविधा पाने के बदले उसके साथ जुड़ी हुई भारी भरकम जिम्मेदारियाँ उठाते हैं। कामुकता की स्वच्छन्दता रहने पर समाज का ढाँचा ही चरमरा जायेगा। इस आधार पर जो घनिष्ठता उत्पन्न होती है उसका निर्वाह मखौल बनकर रह जायेगा। इसी प्रकार कामुक आचरण से उत्पन्न होने वाले बालकों का भविष्य अन्धकार के गर्त में गिरेगा तथा गृहस्थ जीवन में भी निश्चिन्तता न रहेगी। विश्वास की चरम सीमा जिस दाम्पत्य जीवन में भी रहनी चाहिए, उसके न रहने पर परिवार संस्था का स्वरूप ही समाप्त हो जायेगा। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए समाज शास्त्रियों और नीति शास्त्रियों के संयुक्त प्रयास से कामुकता को दाम्पत्य जीवन तक सीमित किया गया है। यह औचित्य पूर्ण अनुशासन है जिसे इच्छा या अनिच्छा से निभाया ही जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 2)

🔶 Wherever BHAGWAN takes AVTAR, it is believed there that it happened for the purpose of elimination of unrighteousness and establishment of righteousness. We too will have to adopt both the activities simultaneously if within us comes the inspiration of BHAGWAN. We must take a stand to fight against undesirability and immorality around us and promote goodness within us and others. We must not surrender before injustice. Wherever is seen misconduct, we must gather courage to non-cooperate, oppose or whatsoever possible be done according to circumstances. Only this way orderliness can be managed in society.
                                       
🔷 Coward man, feared man, man afraid of trouble, man afraid of hooliganism cannot remove those evils and flaws and needs of removal of injustice and establishment of orderliness will not be fulfilled. To make future bright we require enlightening valour and courage in mass-mentality.
                                                
🔶 The human race seems heading to commit suicide. To stop that automated process we must revive theocracy again.  Big job require big means and big means can be managed by only big personality. Very this is my objective for which I desire greatness to be created within every conscience. Every person should concentrate more on sacrificing for social life than for personal luxuries. By reorganization I mean that we should strive for new person, new society and new Age. For this it is essential for all of us to unite for the job of person-building in order to make human being excellent and well developed.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गुरुगीता (भाग 45)

👉 साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू

🔷 गुरुगीता के प्रत्येक महामंत्र में अपरिमित आध्यात्मिक ऊर्जा समायी है। वे धन्य हैं, अति बड़भागी हैं, जो इनका गायन करते हैं, जिनका मन इन महामंत्रों की साधना करने में अनुरक्त हुआ है; क्योंकि ऐसे अपूर्व साधकों को सहज ही सद्गुरु प्रेम की उपलब्धि होगी और यह सद्गुरु प्रेम अध्यात्म जगत् का परम दुर्लभ तत्त्व है। जिसके हृदय में निष्कपट सद्गुरु प्रेम है, उसे सब कुछ अपने आप ही सुलभ हो जाता है। उसे किसी भी अन्य साधन एवं साधना की जरूरत नहीं रहती, समस्त साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरु ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-‘साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
  
🔶 गुरुनेह की भावकथा में रमे हुए शिष्यों ने इस गुरु प्रेम कथा के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन वचनों को पढ़ा है कि गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतु बन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। गुरुदेव की उपासना करने में तल्लीन रहना प्रत्येक शिष्य का कर्तृत्व है; क्योंकि उनके अनुग्रह से महान् अज्ञान का नाश होता है। गुरुदेव भगवान् सभी तरह की अभीष्ट सिद्धि देने वाले हैं; उन्हें नमन करना शिष्यों का परम धर्म है। इसका थोड़ा सा भी पालन संसार के महाभय से त्राण करने वाला है। सभी तरह की पीड़ायें गुरु कृपा से स्वयं ही शान्त हो जाती हैं।

🔷 गुरु प्रेम की इस साधना महिमा के अगले क्रम को प्रकट करते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगन्माता भवानी से कहते हैं-

पादाब्जं सर्वसंसार दावानल विनाशकम्। ब्रह्मरन्ध्रे सिताम्भोजमध्यस्थं चन्द्रमण्डले॥ ५७॥
अकथादित्रिरेखाब्जे   सहस्रदलमण्डले। हंसपार्श्वत्रिकोणे च स्मरेत्तन्मध्यगं गुरुम् ॥ ५८॥

🔶 गुरुदेव की करुणा की व्याख्या करने वाले इन महामंत्रों में साधना के गहरे रहस्य सँजोये हैं। इन रहस्यों को गुरुभक्त साधकों के अन्तःकरण में सम्प्रेषित करते हुए भगवान् भोलेनाथ के वचन हैं- गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए॥ ५७॥ यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल के बीच में सहस्रदलमण्डल पर अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए॥ ५८॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 73

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 7)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)
🔶 मित्रो! जिंदगी की बड़ी कीमत है। जिंदगी लाखों रुपये की कीमत की है, करोड़ों रुपये की है, अरबों-खरबों रुपये की कीमत की है। तुलसीदास भी जिंदगी वाला इंसान था। वासना के लिए जब व्याकुल हुआ, तो ऐसा हुआ कि बस हैरान-ही-हैरान परेशान-ही-परेशान और जब भगवान् की भक्ति में लगा, तो हमारी और आपकी जैसी भक्ति नहीं थी उसकी कि माला फिर रही है इधर और मन फिर रहा है उधर। मन के फिर रहे हैं इधर और सिर खुजा रहे हैं उधर। भजन कर रहे हैं इधर और पीठ खुजा रहे हैं उधर। भला ऐसी कोई भक्ति होती है? तुलसीदास ने भक्ति की, तो कैसी मजेदार भक्ति की कि बस पीपल के पेड़ पर से, बेल के पेड़ पर से कौन आ गया? भूत आ गया। उन्होंने कहा कि हमको भगवान् के दर्शन करा दो। उस भूत ने कहा कि भगवान् के तो नहीं करा सकते, हनुमान् जी के करा सकते हैं। अच्छा! चलो हनुमान् जी के ही करा दो।

🔷 हनुमान् जी वहाँ रामायण सुनने जाते थे। उसने उनके दर्शन करा दिए। तुलसीदास ने हनुमान् जी को पकड़ लिया और कहा कि हमको रामचंद्र जी के दर्शन करा दीजिए। आपने पढ़ा है न तुलसीदास जी का जीवन! उन्होंने क्या किया कि रामचंद्र जी का , जिनका कि वे नाम लिया करते थे, उन रामचंद्र जी को पकड़कर ही छोड़ा। उन्होंने कहा कि रामचंद्र जी का भी ठिकाना नहीं है और मेरा भी ठिकाना नहीं है। दोनों को एक होना होगा या तो मैं रहूँगा या रामचंद्र जी रहेंगे? या तो हनुमान् जी रहेंगे या रामचंद्र जी रहेंगे?

🔶 मैं तो लेकर के हटूँगा। भला ऐसे कैसे हो सकता है कि मैं हनुमान् चालीसा पढ़ूँगा और हनुमान् जी भाग जाएँ और पकड़ में नहीं आएँ? पकड़ में कैसे नहीं आएँगे? हनुमान् को पकड़ में जरूर आना पड़ेगा। हनुमान् जी पकड़ में जरूरत आ गए। हनुमान् जी पकड़ में नहीं आए, हनुमान् जी के ताऊ रामचंद्र जी भी पकड़ में आ गए। दोनों को पकड़ लिया उसने। किसने पकड़ लिया? तुलसीदास ने। हम और आप पकड़ सकते हैं क्या? हम और आप नहीं पकड़ सकते। भूत तो पकड़ सकते हैं? नहीं पकड़ सकते। हनुमान् जी को पकड़ लेंगे? नहीं, हनुमान् जी भी पकड़ में नहीं आएँगे और रामचंद्र जी तो, भला कैसे पकड़ में आ सकते हैं? वे भी नहीं आएँगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

👉 सबसे अनमोल धरोहर

🔷 बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया"?

🔶 पिता ने कहा -"हाँ"

🔷 उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब"?

🔶 पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं।

🔷 मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं।

🔶 जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।

🔷 मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था।

🔶 तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।

🔷 तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।

🔶 मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था।

🔷 तभी तुम्हारा तीन साल का भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया, वो पहली और आखरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...

🔶 भगवान की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी...

🔷 एक पिता ने लिखा है...

🔶 हमें तो सुख मे साथी चाहिये दुख मे तो हमारी बेटी अकेली ही काफी है…

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2018


👉 एकाग्रता की अदभुद सामर्थ्य

🔶 एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है, जो मन: संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्त्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबने विचारों पर नियन्त्रण करने उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त की है।

🔷 इसके बिना चंचलता की वानरी वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्त्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। बाल चपलता का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे- विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके, तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।
  
🔶 आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है, जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं, वरन्ï विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी गयी है। प्रार्थनाएँ सामूहिक ही होती हैं। उपासना भी सामूहिक हो, तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज, गरिजाघरों में प्रेयर, मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज है। इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है। एक दिशाधारा का चिंतन हो रहा हो, तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितांत एकांत में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है।
  
🔷 कई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं और शिकायत करते हैं कि उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अंतर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा संबंध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है, उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त  हो ही जाय, यह आवश्यक नहीं है।
  
🔶 जिस एकाग्रता की आवश्यकता, अध्यात्म प्रगति के लिए बताई गयी है वह मन की स्थिरता नहीं वरन्ï चिंतन की दिशा धारा है। उपासना के समय सारा चिंतन, आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझने में लगाना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि ब्राह्मïी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है, उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 4)

🔷 क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को अपने रोष, विरोध या पराक्रम का परिचय देकर डराना होता है और यह भाव रहता है कि दबाव देकर उसे वह करने के लिए विवश किया जाय जो चाहा गया है। किन्तु देखा गया है कि यह उद्देश्य कदाचित ही कभी पूरा होता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में जिस पर अपना रौद्र रूप प्रकट किया जाता है या जिन असंस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है, उससे सामने वाले के स्वाभिमान को चोट पहुँचती है। इससे एक नई समस्या खड़ी होती है। सामने वाला क्षुब्ध होता है और प्रतिशोध लेने, नीचा दिखाने की बात सोचता है। विग्रहों में से अधिकांश की जड़ वहीं पाई जाती है। मतभेद दूर करने या अनुरोध को स्वीकारने के लिए यदि सौम्य तरीका अपनाया गया होता तो विग्रह की नौबत न आती और प्रयोजन पूरा न सही, आधा अधूरा तो सध ही जाता। क्रोध उन सभी सम्भावनाओं को परास्त कर देता है।

🔶 क्रोध एक प्रकार का सन्निपात ज्वर है जिससे आक्रान्त व्यक्ति न केवल बेचैन दीखता, हाथ पैर पीटता और अपनी दयनीय स्थिति का परिचय देता है वरन् गलत सोचता और दूसरों से अपशब्द कहता तथा दुर्व्यवहार करता भी पाया जाता है। सन्निपात ग्रस्त को रुग्णता के चंगुल में फँसा हुआ, विवश, निर्दोष भी मान लिया जाता है और दया सहानुभूति का पात्र समझ कर उसका व्यवहार भुला दिया जाता है। किन्तु क्रोध के बारे मे ऐसी बात नहीं है। उसे दरिद्र, दुष्ट, अहंकारी माना जाता है और बदले में प्रतिशोध उभरता है। क्रोधी को न केवल प्रतिशोध का प्रहार सहना पड़ता है वरन् उत्तेजना के उबाल में ढेरों रक्त जलाना पड़ता है और मनःसंस्थान की कार्यकर्त्री मशीन को तोड़-मरोड़ कर रख देने जैसा दुहरा संकट सहना पड़ता है।

🔷 क्रोध किस कारण किया गया इसे कोई नहीं देखता। आक्रोश का उन्माद एक प्रकार का आक्रमण है जिसके कारण पक्ष सही होने पर, कारण का औचित्य रहने पर भी आवेशग्रस्त को अपराधी की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है। न्याय पाने का अवसर चला जाता है। स्वभाव और व्यक्तित्व अनगढ़ होने की मान्यता यदि बनने लगे तो समझना चाहिए कि प्रामाणिकता चली गई। ऐसे लोग न दूसरे की सहानुभूति पाते हैं और न सहयोग का लाभ ले पाते हैं। शरीर जलता रहता है सो अलग, मन उबलता रहता है सो अलग।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Social-Revolution (Part 1)

🔷 The third job that develops internal consciousness is ‘‘Social Revolution’’. Besides opposing & going against minor flaws visible in society there is also a need to induce in life creative things to make a good society. High profile principles are such creative things that make a man society-oriented. The sentiment of ‘‘ATMVAT SARVBHUTESHU’’ must be enlightened in consciences of general masses. Every one of masses must be committed for doing to others what one expects from others. This is the primary condition that must be induced deep within public mind to trigger a social revolution.                                    
                                 
🔶 Each one of us must be convinced about ‘‘VASUDHAIV KUTUMBKAM’’ or that ‘‘the whole world is our abode’’. Not two or three houses rather the whole earth is our home and the way we take care of our home and siblings, the same way we must be careful about peace and harmony the world over and pursue the same. Social revolution can be triggered only with revival of essence of spirituality which underlines such principles that help a man to control over individualism to become society-oriented. If we could wield in our life the principle of ‘‘ATMANAH PRATIKULANI PARESHAAM NAH SAMAACHARET’’, Excellency is bound to descend in social life. If we could develop within us a tendency to mutually share our resources, we can very easily & happily survive with scale of means that we have today with us. We should earn generously and use what is earned and not consume.
                                      
🔷 Evenness must be a part of life-style. Evenness among all societies in which equality between male and female and economical structure must also be put in high steam. Each one of us must become a responsible citizen and manage our family and social affairs on principles of cooperation. We should gather and show courage like that of JATAYU in case of any injustice and impropriety seen anywhere.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 6)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसी तरह सूरदास, प्रतिभा वाले और हिम्मत वाले सूरदास जब खड़े हो गए और जो भी दिशा उन्होंने पकड़ ली, उसमें उन्होंने टॉप किया। सूरदास ने जब अपने आपको सँभाल लिया और अपने आपको बदल लिया, तब उन्होंने टॉप किया। टॉप से कम में तो वे रह ही नहीं सकते। वही बिल्वमंगल जब वेश्यागामी था तो पहले नंबर का और जब संत बना तब भी पहले नंबर का। पहले नंबर का क्यों? इसलिए कि वह भगवान् का भक्त हो गया। जब वह भगवान् का भक्त हो गया, तो फिर वह ऐसा मजेदार भक्त हुआ कि उसने वह काम कर दिखाए, जिस पर हमको अचंभा होता है। हिम्मत वाला और दिलेर आदमी जो काम कर सकता है, मामूली आदमी उसे नहीं कर सकता।

🔶 उसने अपनी आँखें गरम सलाखें डालकर फोड़ डालीं। हम और आप कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते। ऐसा कोई दिलेर आदमी ही कर सकता है। उसने दिलेरी के साथ और तन्मयता के साथ ऐसी मजबूत भक्ति की कि श्रीकृष्ण भगवान् को भागकर आना पड़ा और बच्चे के रूप में, जिनको कि वे अपना इष्टदेव मानते थे, उसी रूप में उनकी सहायता करनी पड़ी। आँखों के अंधे सूरदास की लाठी पकड़ करके टट्टी-पेशाब कराने के लिए, स्नान कराने के लिए भगवान् ले जाया करते थे और सारा इंतजाम किया करते थे। भगवान् उनकी नौकरी बजाया करते थे।

🔷 कौन से सूरदास की? उस सूरदास की, जो प्रतिभावान् था। मैं किसकी प्रशंसा कर रहा हूँ? भक्ति की? भक्ति की बाद में, सबसे पहले प्रतिभा की, समझदारी की। प्रतिभा की बात मैं कह रहा हूँ। प्रतिभा अपने आप में एक जबरदस्त वस्तु है। वह जहाँ कहीं भी चली जाएगी, जिस दिशा में भी चली जाएगी, चाहे वह जहाँ कहीं भी जाएगी, पहले नंबर का काम करेगी। तुलसीदास ने क्या काम किया? तुलसीदास ने जब अपनी दिशाएँ बदल दीं, जब उनकी बीबी ने कहा, नहीं, तुम्हारे लिए ये मुनासिब नहीं है। क्या तुम इसी तरीके से वासना में अपनी जिंदगी खत्म कर दोगे?

🔶 तुमको भगवान् की भक्ति में लगा जाना चाहिए और जितना हमको प्यार करते हो, उतना ही भगवान् से करो, तो मजा आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बदल जाए। उनको यह बात चुभ गई। हमको और आपको चुभती है क्या? नहीं चुभती। हमारी औरतें सौ गालियाँ देती रहती हैं। और फिर हम ऐसे ही हाथ-मुँह धोकर के आ बैठते हैं। वह फिर गाली सुनाती है और गुस्सा होकर के चले जाते हैं और कहते हैं कि फिर तेरे घर नहीं आएँगे और बस वह जाता है और दुकान पर बैठा बीड़ी पीता रहता है। शाम को घूम-फिरकर फिर आ जाता है। क्यों फिर आ गए? आ गए, क्योंकि उसके अंदर वह चीज नहीं है, जिसे जिंदगी कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 44)

👉 गुरुचरणों की रज कराए भवसागर से पार

🔷 भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है; किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे; लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए, तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।
  
🔶 श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानन्द की चरण धूलि इकट्ठा कर एक डिबिया में रख ली थी। स्वामी जी के खड़ाँऊ उसकी पूजा बेदी में थे। इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना उसका नित्य नियम था। इसके अलावा उसे किसी और योगविधि का पता न था। कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ उसे नहीं मालूम थी। मुद्राओं एवं बन्ध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता न था। किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान न था। अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था। इसी का वह जाप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता।
  
🔷 एक दिन प्रातः जब वह रोज की भाँति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ उनके चरणों का चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावलि प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था; पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ, जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
  
🔶 गुरु नाम की धुन के साथ ही ये दोनों श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयी और उसके अन्दर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात् उसे अनायास ही अपने आश्रम में  स्वामी भास्करानन्द ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई दिए। योग विद्या से अनभिज्ञ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा। दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया, तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनायी। लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बोले- बेटा! इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं। अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे, वही तुम्हें दिखने लगेगा।
  
🔷 स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा- ‘हे गुरुदेव, मैं तो सदा-सदा आप को ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को अपनी भौहों के बीच में लगाया करता था। यह जो कुछ भी है, आपकी चरण धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास हो गया है कि गुरुचरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भवसागर पार कर सकता है।’ लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। बस उतना ही सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति चाहिए। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 71

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