शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (अन्तिम भाग)

किसी के पास यदि पैसा कम है, पद छोटा है अथवा शरीर मोटा नहीं है तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि वे भाग्यहीन हैं। सच तो यह है कि यह जंजाल जितने कम होंगे आदमी उतनी ही तेजी से श्रेय पथ पर बढ़ सकेगा और वह लाभ प्राप्त कर सकेगा। जिसके कारण आत्मा की प्रसन्नता और परमात्मा की अनुकम्पा अजस्र मात्रा में बरसने लगे। ऋषियों में से प्रत्येक के पास साधन सामग्री स्वल्प थी। विवेकवानों को औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार करना पड़ता है और इससे अधिक यदि वे किसी प्रकार उपलब्ध कर सकें तो दूसरे हाथ से उसे सत् प्रयोजनों के लिए अविलम्ब लगा भी देते हैं। तपस्वी शक्ति संग्रह करते हैं। यह प्रक्रिया अपने साथ कठोरता बरतने और सर्वतोमुखी संयम अपनाने से ही बन पड़ती है। इस मार्ग को अपनाने वालो में से किसी को अपने दुर्भाग्य की शिकायत करते नहीं सुना गया। वरन् उनकी गरीबी की गरिमा को समझते हुए, हरिश्चन्द्र, हर्ष-वर्धन, अशोक आदि ने अपनी अमीरी को स्वेच्छापूर्वक निछावर कर दिया था।

ऊँचा उठने वालों को हलका बनाना पड़ता है, यदि किसी को कम वैभव से काम चलाने की परिस्थिति में रहना पड़ रहा है। अथवा अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में कष्ट सहना पड़ रहा है तो उसे आन्तरिक दृष्टि से प्रसन्नता अनुभव करते ही पाया जायेगा। इसके विपरीत जिनने अनीतिपूर्वक वैभव जमा कर लिया है। अथवा उच्छृंखल विलास दम्भ पूर्ण प्रदर्शन का साधन जुटा लिया है तो उसे भीतर और बाहर से लानत ही बरसती अनुभव होगी। इस सन्तोष पर कुबेर के खजाने को निछावर किया जा सकता है।

कर्मफल सुनिश्चित है। उसके लिए किसी अन्य न्यायाधीश की या अन्य लोक में जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। अपने भीतर ही ऐसा स्वसंचालित तंत्र विराजमान है, जो कृतियों का प्रतिफल उपस्थित करता रहता है, इसमें थोड़ा विलम्ब लगते देखकर किसी को तनिक भी अधीर नहीं होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 34


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👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 5)

यह नारकीय स्थिति है। भीतर से आत्म प्रताड़ना और बाहर से भर्त्सना जिस पर बरसती है उसे साक्षात् नरकवासी कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रोगों से उद्विग्न रहने वाले नरक ही भोगते हैं। लोक-लोकांतरों में नरक है या नहीं। कुम्भीपाक, वैतरणी आदि का अस्तित्व है या नहीं। इस विवाद में पड़े बिना इतने से भी काम चल सकता है कि जो अपनी शांति और प्रतिष्ठा गँवा बैठा उसके लिए मानव जीवन की सरसता कोसों पीछे रह गयी।

सरकार को चकमा देकर राज दण्ड से बचा जा सकता है। समाज की आंखों में भी धूल झोंकी जा सकती है। पर आत्मा की अदालत ऐसी है जिसने सब कुछ देखा सुना है उसके दण्ड से छुटकारा पा सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। यहाँ देर तो है पर अन्धेर नहीं है। मनुष्य के लिए थोड़े से दिन का विलम्ब ही उसकी आस्था डगमगा देता है, पर तत्वज्ञानियों की दृष्टि से यह जीवन असीम और अनन्त है।

एक जन्म का समय बीतना उसके लिए एक रात की निद्रा लेकर नये प्रभात पर फिर उठने के समान है। आज का लिया कर्ज परसों चुकाने की शर्त पर मिल गया है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सदा के लिए मुफ्त में मिल गया और फिर कभी वह देना न पड़ेगा। बहुत से लोग जन्म से ही अन्धे, अपंग उत्पन्न होते हैं। कइयों की प्रतिभा जन्म से ही ऐसी अद्भुत होती है कि दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसे पूर्व संचित संस्कारों का प्रतिफल कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 34

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.34

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👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 4)

कुकर्मों की आदत डालते ही अपने भीतर एक असुर उत्पन्न होता है। स्वाभाविक प्रकृति दैवी है। जगह एक के रहने लायक ही है पर मनःक्षेत्र में दो व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रकृति के घुसते हैं तब निरन्तर संघर्ष करते हैं। देवासुर संग्राम की स्थिति बना देते हैं। एक आगे धकेलता है दूसरा पीछे घसीटता है। दो साँड जिस खेत में लड़ते हैं उसकी हरी-भरी फसल को रौंद कर रख देते हैं। कोई उपयोगी सामान उधर रखा हो वह भी बिखर जाता है। एक म्यान में दो तलवारें ठूंसने पर म्यान फटता है और तलवारों को भी खरोंच आती है। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व गढ़ लेने पर उनका द्वन्द्व युद्ध देखते ही बनता है। आत्म हनन इसी स्थिति को कहते हैं।

संसार में पागलपन तेजी से बढ़ रहा है। आँकड़े बताते हैं कि शारीरिक रोगियों की तुलना में मानसिक रोगियों की संख्या कई गुनी है। सनकी एवं अर्ध विक्षिप्तों की संख्या गिनी जाय और उनके द्वारा हानियों का लेखा जोखा लगाया जायेगा तो प्रतीत होगा कि मानव समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है। गरीबी से भी बड़ी। गरीब की समझदारी तो कायम रहती है पर अधपगले तो आये दिन ऐसा सोचते और करते रहते हैं जिससे उन्हें स्वयं भी नहीं, मित्र-शत्रुओं, परिचितों तक को पग-पग पर त्रास सहने पड़ें।

मनोविज्ञान शास्त्र में मस्तिष्क की श्रेष्ठता को खा जाने वाला दो व्यक्तित्वों का उपजना, परस्पर अन्तर्द्वन्द्व करना ही प्रधान कारण है। यह दूसरा असुर अपने ही अचिन्त्य चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं। ऐसे लोगों पर से दूसरों का विश्वास उठ जाता है। अविश्वासी के साथ कोई आदान-प्रदान नहीं करता। सहयोग देना तो दूर। साथियों का अविश्वास पात्र बना हुआ व्यक्ति मरघट के भूत की तरह एकाकी रह जाता है। समय पर काम आने वाला उसका एक भी मित्र नहीं रहता। चाटुकार ही स्वार्थ सिद्धि के लिए पीछे लगे रहते हैं और जब उन्हें उसमें कमी दिखती है तो छिटक कर अलग हो जाते हैं। यह हानि साधारण नहीं समझी जानी चाहिए, व्यक्तित्व गँवा बैठने के उपरान्त फिर आदमी के पास बचता ही क्या है। वह जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33

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👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 3)

चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम खोज यह है कि शारीरिक और मानसिक बीमारियों का प्रधान उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है। क्योंकि सारे शरीर पर मूल नियंत्रण उसी का है। मनः क्षेत्र उद्विग्न होगा तो शरीर की स्थिति सामान्य होने पर भी कोई न कोई रोग आये दिन घेरे रहेंगे। विकृति रहने तक औषधि उपचार में कोई स्थायी निराकरण न हो सकेगा। यदि मन प्रफुल्ल और हलका हो तो शारीरिक कारणों से उठने वाले रोग तो प्रकृति ही समयानुसार अच्छे कर देती है या फिर मामूली उपचार से दूर हो जाते हैं। पर एक के बाद एक उठते रहने का सिलसिला मनोविकारों के कारण ही होता है।

मानसिक दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बड़े बेतुके, अविचारी, उद्धत, सनकी, शेख चिल्ली लोकाचार का ध्यान न रखने वाले होते हैं। उन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर अधपगले से कम भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसे लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत ही सिद्ध होते हैं। वे किसी को नहीं सम्भाल पाते उल्टे उन्हीं को दूसरों के द्वारा सम्भालना पड़ता है। ऐसे लोगों को विकृत व्यक्तित्व कहते हैं। उनकी उपयोगिता, प्रगति एवं सफलता निरन्तर घटती ही जाती है। बुढ़ापा आने पर तो ऐसे लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है।

मानवी चेतना का मौलिक स्वभाव सज्जनता सद्भावना से जुड़ा हुआ है। उसमें जब अनाचार घुसते पड़ते हैं तो काँटे की तरह चुभते रहते हैं और बेचैनी उत्पन्न करते हैं। दुष्टता बरतने से दूसरों की जो हानि होती है उसकी तुलना में अपनी हानि कहीं अधिक होती है। दूसरे तो चोट खाते समय ही हैरान होते हैं पर अपने भीतर आत्म प्रताड़ना का एक ऐसा राक्षस घुस बैठता है जो आजीवन त्रास देता रहता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33


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👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 2)

चोरी करते ही हाथों में लकवा मार जाय। कुमार्ग पर चलने वालों के पैर लड़खड़ा जाते। झूठ बोलने वाले की जीभ ठप्प हो जाती। कुदृष्टि डालने वालों को दिखना बन्द हो जाता। व्यभिचारी नपुंसक हो जाते तो फिर धर्मशास्त्रों की, उपदेशकों की, पुलिस कचहरी की कोई आवश्यकता न पड़ती। कुकृत्य करने की किसी की हिम्मत ही न पड़ती। अच्छे कर्मों के सत्परिणाम हाथों हाथ मिलते तो हर आदमी इसी को लाभदायक व्यवसाय समझकर अपने मन से ही किया करता। पर इसे भगवान की मसखरी ही समझना चाहिए कि विलम्ब से प्रतिफल मिलने के कारण लोग अधीर हो उठते हैं और विश्वास ही गँवा बैठते हैं। उससे उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सम्भालने के लिए संतों और सुधारकों को आना पड़ता है और बात बेकाबू होती है तो उसके लिए भगवान को आना पड़ता है। मनुष्य की अपनी दूरदर्शिता की परीक्षा का तो यही केन्द्र है।

बीजों में कुछ ऐसे होते हैं जो एक सप्ताह के भीतर हरियाली दे जाते हैं और तीन महीने उनकी फसल भी कट जाती है। पर कुछ ऐसे हैं जो बहुत देर लगाते हैं। ताड़ का बीज बोने पर एक वर्ष में अंकुर फोड़ता है हर वर्ष कुछ इंच बढ़ता है और पाँच सौ वर्ष की आयु तक जीता है जबकि मक्का पकने में थोड़े ही दिन लगते हैं। स्कूल में दाखिल होने के उपरान्त स्नातक बनने और अफसर पद पर नियुक्त होने में चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। होता यह भी है कि मजूर दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को अपनी मजूरी के पैसे ले जाता है।

असंयम बरतने वालो का स्वास्थ्य खराब तो होता है पर उसमें देर लगती है। देखा यह भी गया है कि नशा पीते ही मदहोशी चढ़ दौड़ती है। उपरोक्त उदाहरणों में यह प्रकट है कि कभी-कभी तो परिणाम जल्दी मिलता है पर कभी उसमें देर हो जाती है। कुछ देर तो हालत में लगती है, आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है। कर्मफल के सम्बन्ध में भी यह देर सबेर का चक्र चलता है। पर परिणाम होना सुनिश्चित है। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह पिछले किये हुए कर्मों का ही प्रतिफल है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 32

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👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 1)

हमारे कर्म ही समयानुसार भले बुरे परिणामों के रूप में सामने आते रहते हैं। सृष्टा ने ऐसी स्वसंचालित प्रक्रिया बनाई है कि अपने कृत्यों का परिणाम स्वयं भुगत लेने का चक्र सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है। यह उचित ही हुआ। अन्यथा हर व्यक्ति के द्वारा चौबीस घण्टे में जो भले बुरे कृत्य होते रहते हैं वे जन्म भर में इतने अधिक इकट्ठे हो जाते हैं कि इन फाइलों को पढ़ना और दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करना एक न्यायाधीश के लिए सम्भव न होता। इतने मनुष्य के लिए इतने न्यायाधीश नियुक्त करने में भगवान की कितनी परेशानी पड़ती।

झंझट से बचने और व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भगवान ने मनुष्य के भीतर ऐसा स्वसंचालित तन्त्र फिट कर दिया है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता और उसके दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता है। यह है मनुष्य का अचेतन मन जिसे धर्म ग्रंथों की भाषा में चित्र गुप्त भी कहा गया है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है।

शास्त्रों ने अनेक स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य अपने कर्मों को स्वयं ही भोगता रहता है। साधारणतया यही देखने में भी आता है। सत्कर्म करने वाले ऊँचे उठते, प्रतिष्ठा पाते और सुखी रहते हैं। कुकर्मी उनकी बुरी परिणति भुगतते रहते हैं। इसमें कई बार देर लग जाती है और मनुष्य अधीर होकर कर्मफल पर अविश्वास व्यक्त करने लगता है और निर्भय होकर उच्छृंखलता पर उतारू हो जाता है।

सत्कर्म करने वाले जैसे सत्परिणामों की आशा करते थे वैसा न मिलने पर वे भी निराश होते और अविश्वासी बनते देखे गये हैं। इसे सृष्टि व्यवस्था का एक रहस्य कह सकते हैं। कर्मों का परिणाम यथावत् होने की बात निश्चित होते हुए भी उसमें विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब का समाधान बनाने के लिए इतने शास्त्रों की रचना हुई है। धर्मों उपदेशकों को समय-समय पर इसके लिए भारी श्रम करते रहना पड़ा है। मनुष्य की विवेक बुद्धि एवं श्रद्धा निष्ठा की परीक्षा इसी पर होती रही है। अन्यथा यदि हाथों हाथ कर्मफल मिला होता तो समझने समझाने की इतनी जरूरत न पड़ती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

👉 सुमन की सुगन्ध

सुमन कोमल और सुगंधित होता है। सुमन का अर्थ सुन्दर स्वच्छ मन भी है। जो स्वामी तुलसीदास जी ने संतों के हृदय को जल के समान निर्मल और नवनीत (मक्खन) के समान कोमल बताया है। मक्खन अपने दुख से द्रवीभूत हो जाता है। जब तपाया जाय तभी पिघल उठता है। पर सज्जनों का हृदय दूसरों के दुख देखकर भी पिघल उठता है। कई पुष्पों में भी यह गुण होता है। वे संसार का वैभव और प्रकाश उल्लास देखकर हंसते हैं और उस पर कालिमा पुती देखकर मुरझा जाते हैं। कमल का फूल सूर्य निकलते ही खिल जाता है और रात्रि आते ही मुरझा जाता है इस प्रकार के पुष्पों को उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उच्च श्रेणी का सुमन (सुन्दर मन) वही है जो दूसरों का वैभव देखकर प्रसन्न होता है और दीन दुखियों को देखकर दुखी होता है।

रामायण कहती है कि “संत हृदय नवनीत समाना। कहा कविन पै कहा न जाना॥ निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवै सो संत पुनीता॥” पराये दुखों को देखकर भगवान बुद्ध की तरह जिसका अन्तस्थल रो पड़ता है वास्तव में वह सच्चा संत है। किसी का कष्ट देखकर जो आँसू निकलते हैं उसमें उसके सारे ताप घुलकर वह जाते है और अन्त स्थल परम पवित्र हो जाता।

ऐसे पवित्र सुमनों में मनमोहक सुगन्धि अपने आप आकर्षित हो जाती है। समुद्र में सम्मिलित होने के लिये नदियाँ अपने आप दौड़ पड़ती हैं। दयालु आत्मा में अन्य समस्त गुण अपने आप भर जाते हैं और वह वायु के साथ जब इधर-उधर फैलते हैं तो सुगन्ध कहलाते हैं। इसी सुगंध के आधार पर वे सुमन देवताओं के मस्तक पर चढ़ते हैं।

यदि तुम्हारा मन सुमन है तो उसमें निश्चय ही सद्गुणों की सुगंध भर जायगी और उस सुगंध पर संसार निछावर होगा।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 16

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1940/December/v1.16

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👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 2)

🔶 इन तीनों को त्याग दीजिए- कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक।

(1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है।

(2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है।

(3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

🔶 इन तीनों को ग्रहण कीजिए- चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिए इन तीनों सद्गुणों- होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता- का विकास अनिवार्य है।

(1) यदि आप अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में निरन्तर जागरुक, सावधान रहें, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें, सतर्क रहें, तो आप अपने निश्चित ध्येय की प्राप्ति में निरन्तर अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क मनुष्य कभी गलती नहीं करता, असावधान नहीं रहता। कोई उसे दबा नहीं सकता।

(2) सज्जनता एक ऐसा दैवी गुण है जिसका मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष वन्दनीय है। वह जीवन पर्यंत पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार, एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती हैं।

(3) सहनशीलता दैवी सम्पदा में सम्मिलित है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है केवल महान आत्माएँ ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं। इनके अतिरिक्त इन तीन पर श्रद्धा रखिये-धैर्य, शान्ति, परोपकार।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13


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बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

👉 सफल मनुष्य जीवन

विचारों में हम उठते हैं और विचारों से ही गिरते हैं। उनसे ही खड़े होते हैं और उनसे ही चलते हैं। उनकी जबरदस्त शक्ति से सबका भाग्य बनता है। जो आदमी अपने विचार का स्वामी बनकर रहता है, जो आदमी इच्छाओं को अपने वश में रखता है और जो प्रेमपूर्ण सचाई के तथा साहस भरे विचार करता है वह अपने आदर्श को सत्य के प्रकाश में ढूंढ़ लेता है।

तुम्हारे जीवन के जो क्षण व्यतीत हो रहे हैं उनको सादे, मधुर, पवित्र, सुन्दर, श्रेष्ठ आशापूर्ण, उच्च तथा नम्र विचारों से भरो। वे विचार तुम्हारे जीवन क्षेत्र में अपने अनुरूप फल पैदा करेंगे फल। स्वरूप तुम्हारा दैनिक जीवन आन्तरिक शुभ विचारों का जीता जागता चित्र बन जायेगा। ऐसा जीवन ही ‘सफल मनुष्य जीवन’ होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 13

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👉 इन तीन का ध्यान रखिए। (भाग 1)

उत्पादन की जड़-इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये-
अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना।

(1) ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।

(2) जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।

(3) सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं। विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

🔴 इन तीनों को झिड़को :-

निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता

(1) ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

(2) घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता।

(3) कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है। दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

👉 पुस्तक-प्रेम

दार्शनिक एमर्सन कहा करते थे, कि “पुस्तकों का स्नेह ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है।” निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। श्रेष्ठ महापुरुषों, दिव्य दार्शनिकों और खोज करने वाले तपस्वियों के घोर परिश्रम द्वारा प्राप्त हुए बहुमूल्य रत्न पुस्तकों की तिजोरी में बन्द हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि इतने अनुभव पूर्ण ज्ञान को हम इतनी आसानी से पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।

सिसरो ने कहा है कि अच्छी पुस्तकों को घर में इकट्ठा करना मानो घर को देव मंदिर बना लेना है। कार्लाईल ने लिखा है—”जिन घरों में अच्छी किताबें नहीं वे जीवित मुर्दों के रहने के कब्रिस्तान हैं।” जीवन कला एवं सरसता का समावेश पुस्तकों की सहायता से होता है। जिन्दगी की पेचीदा समस्याओं के ऊपर विचार करने के लिए पुस्तकें प्रोत्साहन देती हैं और प्रकाश—दीप की भाँति सत्मार्ग की ओर हमारा पथ प्रदर्शन करती हैं।

कैम्पिस ने एक बार लोगों को उपदेश दिया था कि—’अपना कोट बेचकर भी अच्छी किताबें खरीदो।’ उनका कहना था कि कोट के अभाव में जाड़े के कारण आपके शरीर को कुछ कष्ट होगा, परन्तु पुस्तकों के अभाव में आत्मा को भूखा मरना पड़ेगा। भौतिक जगत की जड़ता नीरसता ओर बहिरंगता की कर्कशता से छुड़ाने की शक्ति पुस्तकों में हैं उन्हीं में जीवन का अमृत रस भरा हुआ है जिसे पान करके तुच्छ जीव से ऊँचे उठकर हम महामानव बनते हैं। हर मनुष्य को पुस्तक प्रेमी होना चाहिए विचारपूर्ण सत ग्रन्थों का संग्रह और स्वाध्याय करना अपने को पशुता से देवत्व की ओर ले जाना का स्पष्ट चिन्ह है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1944 पृष्ठ 8

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👉 अवकाश के क्षण

हम अपने निर्धारित काम करते हैं। किन्तु काम को करते हुए भी बहुत सी फुरसत की घड़ियाँ मिलती हैं यदि उनका उपयोग ठीक प्रकार किया जावे तो इस थोड़े-थोड़े समय से ही बहुत काम हो सकता है।

पार्लियामेण्ट के प्रमुख वक्ता एल हुवरिट का ओजस्वी भाषण सुनकर उसके भाई प्रभावित हुए और प्रशंसा करते हुए बोले-”हमारे कुटुम्ब में सबसे प्रतिभावान हुवरिट है। मुझे याद है कि जब हम लोग खेला करते थे तब उस फुरसत के वक्त में वह अपना काम किया करता था।” हेरेट बीचरस्होव ने अपनी सर्वोत्तम कृति ‘टाम काका की कुटिया’ की रचना घर गृहस्थी के झंझटों के बीच फंसे रहते हुए ही की है। भोजन की प्रतीक्षा में जितना समय लगता था उतने ही क्षणों के नियमपूर्वक काम में लाकर वीचर महोदन ने एक महाग्रन्थ को पढ़ डाला। महाशय लाँग फेलो ने चाय उबलने तक की फुरसत को काम में लाकर ‘इन करनो’ नामक ग्रन्थ का अनुवाद कर डाला था। कवि वर्न्स खेती का काम करते थे जब जहाँ मौका मिलता तो कविता करने लगते उनकी अमर रचनाओं का बड़ा मान है। महाकवि मिल्टन राज्य मंत्री था उसे बड़ा काम रहता था फिर भी उसने कुछ घड़ियाँ नित्य बचाकर ‘पेरेडाइज लाँस्ट’ नामक महाकाव्य रच डाला। ईस्ट इण्डिया हाउस में क्लर्की करते करते जान स्टुअर्ट मिल ने अपना सर्वोत्तम ग्रन्थ लिखा।

डॉक्टर गेलीलियो को अपने बीमारों की देख-भाल में बड़ा सर पचाना पड़ता था फिर भी वह कुछ समय बचाकर विज्ञान की शोध करता। अन्त में उसने ऐसे-ऐसे आविष्कार किये जिनके लिये संसार सदा उनका कृतज्ञ रहेगा। माइकिल फेर्ड नामक जिल्द साज ने कुछ घंटे बचाकर बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक शोधे कर डाली। चार्ल्स फास्ट नामक चमार एक घंटे प्रतिदिन अध्ययन करके अमेरिका का सर्वोपरि गणिताचार्य हो गया। रोज थोड़ा-थोड़ा काम करने से कुछ ही दिनों में उसका आश्चर्यजनक परिणाम दिखाई देता है। प्रति दिन एक घंटा भी किसी काम के सीखने में लगाया जाये तो मनुष्य उसमें बहुत उन्नति प्राप्त कर सकता है।

मि. माजर्ट प्रतिक्षण कुछ न कुछ करते रहते थे उन्होंने अपनी मृत्यु शैय्या पर ‘रेक्यूयम’ नामक पुस्तक को लिखा। डॉक्टर मारसन गुड लंदन में एक बीमार को देखने गये रास्ते में उन्होंने ‘लुक्रेशियश’ का अनुवाद कर डाला। हेनरी क्रिक ह्वाइट ने दफ्तर आने जाने के समय में ग्रीक भाषा सीखी थी और डॉक्टर वर्नें ने इटालियन और फ्रेंच भाषाओं को घोड़े की पीठ पर पढ़ा था। समय जैसी अमूल्य वस्तु दुनियाँ में और कोई नहीं हो सकती। जार्ज स्टीफ नसन कहते हैं-फुरसत के वक्त को मैं सुवर्ण समझता हूँ और उसे कभी व्यर्थ नहीं जाने देता। सिसरो कहता था- ‘जिस समय को अन्य व्यक्ति दिखावे तथा आराम में खर्च करते हैं उसे ही मैं तत्वज्ञान के अध्ययन में लगाता हूँ। इटली के एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था-’जो यहाँ आवे वह मेरे काम में मदद करे।’ जान एड्यस का समय जब कोई नष्ट करता था तो उसे बड़ा बुरा लगता था। ह्टियर कहता है-’आज के दिन में हमारा भविष्य छिपा हुआ है। आज का दिन नष्ट करने का अर्थ है अपने भाग्य को कुचलना।’

समय ही सम्पत्ति है। सच बात तो यह है कि पैसे की अपेक्षा समय कहीं अधिक मूल्यवान है समय को बरबाद करने के माफिक हैं-शक्ति को नष्ट करना, योग्यता को नष्ट करना, सौभाग्य को नष्ट करना, और अपना लोक परलोक नष्ट करना। समझदार व्यक्ति फुरसत के समय के छोटे-छोटे टुकड़ों को बचाकर महान् बन जाते हैं किन्तु उन्हें योंही लापरवाही में उड़ा देने वाले अपनी असफलता पर रोते हैं और भाग्य को कोसते हैं। समय मित्र के वेश में हमारे सम्मुख उपस्थित होता है और ईश्वर की भेजी हुई बहुमूल्य नियामतें हमारे लिए लाता हैं किन्तु जब हम उसका उचित आदर नहीं करते तो उलटे पावों लौट जाता है। फ्रेंकलिन कहते हैं-”क्या तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है? यदि है तो समय को व्यर्थ नष्ट न करो क्योंकि जीवन समय से ही बना हुआ है।” शेक्सपियर के यह शब्द कितने मार्मिक हैं-”मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।”

✍🏻 स्वेट मार्डेन
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1941 पृष्ठ 13

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सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

👉 क्षमा, क्षांति

क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है।

क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है।

क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है।

दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है।

क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है। क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

◼ चित्त में आह्लाद– मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है।

◼ मैत्रीभाव- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है।

◼ भावविशुद्धि– क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है।

◼ निर्भयता– क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है।

◼ द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम– क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है।

क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है।

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👉 मन निर्मल तो दु:ख काहे को होय

इस जगत में व्याप्त हर प्राणी अपने आपको सुखी रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रयास व्यर्थ हो जाता है। जब तक हम अपने चंचल मन को वश में नहीं कर लेते तब तक हम सुख की अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकते। सुख प्राय: दो तरह के होते हैं, दिव्यानुभूति सुख और आत्मिक सुख। आत्मिक सुख को हम भौतिक सुख के सन्निकट रख सकते हैं। दिव्यानुभूति सुख के लिए इस सांसारिक जगत के मोह से ऊपर उठना होता है, लेकिन भौतिक सुख के लिए मन का संतुलित होना आवश्यक है। खुशी सुखी मन का संवाहक होती है। एक संतुलित मन हमेशा प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है, जो सुख का कारण बनता है। अपने आपको खुश रखने की कोशिश करने वाला इंसान अपने कर्तव्यों और दायित्वों से बंधा होता है। लेकिन, जो इंसान अपने मन को वश में नहीं रखता, वह परिस्थिति में विचलित हो जाता है और विचलित मन खुशी की अनुभूति नहीं कर सकता।

मन को संतुलित रखने के लिए जीवन में नित्य अभ्यास की जरूरत होती है। अपने मन को कभी-कभी हम इतना भारी कर लेते हैं कि घुटन-सी होने लगती है। प्राकृतिक गुणों के हिसाब से हल्की चीजें सदैव ऊपर होती हैं। जब मन हल्का होने लगता है, तब वह धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ जाता है और मन स्वच्छ एवं निर्मल प्रतीत होने लगता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति हर चीज की बारीकियों को इसी तरह समझने लगता है। उसके बाद वह संसार के द्वंद्व से मुक्त हो जाता है और सुख का आभास करने लगता है।

कभी-कभी बहुत आगे की सोच हमें भयाक्रांत कर देती है। इस क्षणभंगुर दुनिया में जो भी घटता है वह परमात्मा की इच्छानुरूप घटित होता है। इसलिए स्वयं को निमित्तमात्र समझकर अपने कर्त्तव्य-पथ पर चलकर इस सुख का अनुभव कर सकते हैं। भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता। रात्रिकाल के बाद सुबह का सूर्य देखना भी परमात्मा के निर्देशानुसार होता है। प्रलय, तूफान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं और आतंकवादी हमलों जैसी मानवकृत घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। मनुष्य चाहे जो करे, लेकिन इन घटनाओं के सामने नि:सहाय हो जाता है। इसलिए सिर्फ अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए।

अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए सबसे पहले अपने आस-पड़ोस के लोगों को सुखी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। आचरण से ही वातावरण का निर्माण होता है। दूसरों को खुशी देकर हम अपनी खुशी को भी कई गुणा बढ़ा लेते हैं। सांसारिक लिप्ता में लिप्त व्यक्तियों के लिए दूसरों की खुशी उसके स्वयं के दुखी होने का कारण बन जाती है। एक  सुंदर कोठी में रहने वाली और स्वयं एक अच्छी नौकरी करने वाली महिला, एक कामवाली को प्रतिदिन ध्यान से देखा करती थी। उस महिला को प्रतिदिन उसका पति छोडऩे के लिए और काम समाप्त होने के बाद उसे लेने के लिए आता था। इसे देखकर कोठी वाली महिला बहुत व्यथित रहती थी। उसे इस बात का दु:ख था कि एक काम करने वाली महिला भी उससे अधिक खुश है। वह सोचती रहती थी इतना धन होने के बावजूद उसके पति के पास उसके लिए समय नहीं है। इस धन-संपदा का क्या अर्थ है, जब अपने पति के साथ अधिकांश समय नहीं गुजार सकती। इस बात को लेकर वह महिला अपने पति के साथ अक्सर झगड़ा करने लगी। एक दिन महिला ने देखा कि काम करने वाली महिला का हाथ टूटा हुआ है। वह अचंभित हुई। दूसरे लोगों से ज्ञात हुआ कि कामवाली महिला का पति उस पर बहुत अत्याचार करता था। उसके पति को डर था कि इसके कारण उसकी पत्नी उसे छोड़कर न चली जाए, इसलिए वह सुबह-शाम उसे लेकर आता और लेकर जाता था। सत्य को जानकर महिला को बहुत पश्चताप हुआ।

कभी-कभी हम दूसरों को देखकर अपनी स्थिति की तुलना उसके साथ करने लगते हैं। यह भी दुख का कारण बनता है। दरअसल सुख और दुख हमारे मन के ही अंदर होते हैं। सच्चे मन से और दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक मिलकर परिश्रम करने वाले इंसान के पास कभी दु:ख पहुंच ही नहीं सकता।

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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...