शनिवार, 7 जनवरी 2023

👉 साधना की असफलता के कारण

किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जो मंजिल तय करनी पड़ती है, उसे साधना कहा जाता है। इस साधना में यदि विघ्र-बाधाएँ उपस्थित हो जायें, तो प्राय: मंजिल बीच में ही अधूरी छूट जाती है। जीवन का भौतिक पहलू हो या आध्यात्मिक, कोई भी निरापद नहीं है। सांसारिक कार्यों में सफलता पाने के इच्छुक व्यक्ति मार्ग में पडऩे वाली आर्थिक, तकनीकी, प्रतिस्पद्र्धात्मक आदि बाधाओं से छुटकारा पाने का मार्ग भी पहले से ही निर्धारित कर लेते हैं अथवा उनका सामना करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाते हैं। अध्यात्म मार्ग में भी कम विघ्र बाधाएँ नहीं होती हैं। आध्यात्मिक एवं सांसारिक उपलब्धियों की बाधाओं में अंतर मात्र इतना ही है कि भौतिक प्रगति के मार्ग में बाह्यï विघ्र बाधाएँ अधिक होती हैं, जबकि आत्मिकी क्षेत्र में मनुष्य की स्व उपार्जित विघ्र बाधाएँ ही प्रधान होती है। आत्मिक मार्ग के प्रत्येक पथिक को महान् कार्यों, ईश्वर प्राप्ति आदि के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं से परिचित होना आवश्यक है।
  
साधक यदि बीमार रहता हो, तो उसके लिए नियमित रूप से साधना, उपासना, स्वाध्याय, सत्संग का लाभ उठा पाना कठिन होता है। तामसी एवं असंयम पूर्ण भोजन से चित्त में चंचलता तथा दोष पूर्ण विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे चिंतन विकृत होता चला जाता है। इसीलिए साधना काल में साधक को सात्विक, पौष्टिïक तथा प्राकृतिक रसों से परिपूर्ण सादा आहार ही ग्रहण करना चाहिए। बड़े और महान्ï कार्य समय एवं श्रम साध्य होते हैं। इसमें शंका-आशंका करने वालों को सफलता नहीं मिलती। इसके लिए दृढ़ विश्वासी, संकल्प के धनी व्यक्ति ही सफल हो पाते हैं। बार-बार संदेह किसी भी कार्य को असफल ही करता है। गुरु बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह उस विषय विशेष का पूर्ण ज्ञाता हो। अनभिज्ञ, अल्पज्ञ व्यक्ति को अपना गुरु या मार्गदर्शक बनाना अनुचित है। सच्चे साधक को प्रसिद्धि के विपरीत ठोस कार्यों द्वारा साधना को महत्त्व देना चाहिए। पूर्ण सफलता मिल जाने पर यश छाया के रूप में पीछे-पीछे दौडऩे लगता है। किसी भी कार्य को ठीक एक ही समय पर नियमपूर्वक करते रहने से उस कार्य की आदत बन जाती है।

नियमितता के अभाव में कोई भी साधना सफल नहीं होती। कुतर्कों को त्याग कर साधक को आत्मा की आवाज सुनना और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि सामाजिक रीति-रिवाज, मर्यादा, धर्म, ईश्वर, अस्तित्व यह सब विषय ऐसे हैं, जिन्हें तर्क द्वारा हल नहीं किया जा सकता। आलस्य एक भयंकर बीमारी के समान है। आलस्य के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी कार्य कुशलता को ही खो डालता है। आलस्यवश कार्य न करना, तो पतन पराभव का कारण ही बनता है। अध्यात्म मार्ग के पथिक को बुरे कर्म, बुरे विचारों वाले लोगों से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा किसी न किसी रूप में उसके विचार आप पर प्रभावी हो ही जाएँगे। दूसरों के दोषों को देखने में अपनी शक्ति खर्च न करें, आपके अंत:करण में लगी अचेतन की फिल्म भी दूसरों के दुर्गुणों को अपने अंदर आत्मसात कर लेती है। हम सभी सत्य की खोज में दौड़ रहे हैं। कोई भी पूर्ण सत्य को प्राप्त नहीं कर सका। यह मानकर दूसरों के धर्म, उनकी मान्यताओं के प्रति उदार दृष्टिïकोण अपनाएँ। कट्टïरता की संकीर्णता साधना मार्ग का सबसे बड़ा अवगुण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 चिंतन,भावना एवं कर्मों के श्रेष्ठता द्वारा अर्चन

सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग-थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहेें, तो कोई दूसरा है ही नहीं, तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ घट रहा है। भगवान् महावीर, भगवान्ï बुद्ध अथवा महर्षि  पतंञ्जलि ने जो अङ्क्षहसा की महिमा गायी, उसके पीछे भी यही अद्वैत दर्शन है। इसका मतलब इतना ही है कि शिष्य होते हुए भी यदि तुम किसी को चोट पहुँचा रहे हो, या दु:ख पहुँचा रहे हो अथवा मार रहे हो, तो दरअसल तुम गुरुघात या आत्मघात ही कर रहे हो, क्योंकि गुरुवर की चेतना में तुम्हारी अपनी चेतना के साथ समस्त प्राणियों की चेतना समाहित है।
  
ध्यान रहे जब एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पैदा होता है, तो सारा अस्तित्व उसे सुनता है। थोड़ा सा भाव भी हमारे हृदय में उठता है, तो सारे अस्तित्व में उसकी झंकार सुनी जाती है। और ऐसा नहीं कि आज ही अनन्त काल तक यह झंकार सुनी जायेगी। हमारा नामोनिशाँ भले ही न रहे। लेकिन हमने जो कभी चाहा, किया, सोच, भावना बनायी थी, वह सब इस अस्तित्व में गूँजती रहेगी। क्योंकि हममें से कोई यहाँ से भले ही मिट जाये, लेकिन कहीं और प्रकट हो जायेगा।
  
जो लहर मिट गयी है, उसका जल भी उस सागर में शेष रहता है। यह ठीक है कि एक लहर उठ रही है, दूसरी लहर गिर रही है, फिर लहरें एक हैं, भीतर नीचे जुड़ी हुई हैं और जिस जल से उठ रही हैं यह लहर, उसी जल से गिरने वाली लहर वापस लौट रही है। इन दोनों के नीचे के तल में कोई फासला नहीं हैं। यह एक ही सागर का खेल है। हम सब भी लहरों से ज्यादा नहीं है। इस जगत्ï में सभी कुछ लहरवत्ï हैं।
  
परमेश्वर से एक हो चुके चेतना महासागर की भाँति है। सारा अस्तित्व उनमें समाहित है। हमारे प्रत्येक कर्म, भाव एवं विचार उन्हीं की ओर जाते हैं, वे भले ही किसी के लिए भी न किये जाये। इसलिए जब हम किसी को चोट पहुँचाते हैं, दु:ख पहुँचाते हैं, तो हम किसी और को नहीं, सद्गुरु को चोट पहुँचाते हैं, उन्हीं को दु:खी करते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने बैल को चोट पहुँचायी। बाद में वह दक्षिणेश्वर आकर परमहंस देव की सेवा करने लगा। सेवा करते समय उसने देखा कि ठाकुर की पाँव पर उस चोट के निशान थे। पूछने पर उन्होंने बताया, अरे! तू चोट के बारे क्या पूछता है, यह चोट तो तूने ही मुझे दी है। सत्य सुनकर उसका अन्त:करण पीड़ा से भर गया।
  
 क्या हम सचमुच ही अपने भगवान से प्रेम से करते हैं एवं उनमें भक्ति है? यदि हाँ तो फिर हमारे अन्त:करण को सभी के प्रति प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। हमें किसी को भी चोट पहुँचाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सभी में भगवान ही समाये हैं। सभी स्थानों पर उन्हीं की चेतना व्याप्त है। इसलिए हमारे अपने मन में किसी के प्रति कोई भी द्वेष, दुर्भाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस जगत्ï में ईश्वर, खुदा से अलग कुछ भी नहीं है। उन्हीं के चैतन्य के सभी हिस्से हैं। उन्हीं की चेतना के महासागर की लहरें हैं। इसलिए लोगों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

👉 गायत्री की असंख्य शक्तियाँ

🔶 संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्त किया जाता है, वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें, जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही सफल होता और वैभव उपार्जित कर लेता है। जीवन में शक्ति का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनंद नहीं उठाया जा सकता, यहाँ तक कि अनायास उपलब्ध हुए भोगों को भी नहीं भोगा जा सकता। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही विषय भोगों का सुख प्राप्त किया जा सकता है। यदि ये किसी प्रकार अशक्त हो जाएँ, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक तरह नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक लगने लगता है। आत्म-बल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्म-बल से रहित व्यक्ति के लिए सर्वथा असंभव ही है।
  
🔷 भारतीय मनीषियों ने विभिन्न शक्तियों को देवनामों से संबोधित किया है। ये समस्त देव-शक्तियाँ उस परम शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्तत्त्व के अंतर्गत ही है। विद्यमान सभी देव शक्तियाँ उस महत्तत्त्व के ही स्फुलिंग हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहकर पुकराते हैं। जैसे जलते हुए अग्रिकुण्ड में से चिनगारियाँ उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान् शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखने में आती हैं। संपूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाय, तो यह उचित होगा।
  
🔶 हमारे पूर्वजों ने चरित्र को उज्ज्वल तथा विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त अपने व्यक्तित्व को महानता के शिखर तक पहुँचाने के लिए उपासना का मोहात्मक संबल गायत्री महामंत्र को पकड़ा था और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु ब्राह्मïणों, सिद्ध पुरुषों की ही नहीं, साधारण सद्गृहस्थों की उपास्य भी गायत्री ही रही है और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्म-कल्याण का श्रेय साधन किया है, वरन् भौतिक सुख-संपदाओं की सांसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है।

🔷 संसार में कुछ भी प्राप्त करने की एकमेव महाशक्ति ने इस निखिल ब्रह्मण्ड में अपनी अनंत शक्तियाँ बिखेर रखी हैं। उनमें से जिनकी आवश्यकता होती है, उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर सकता है। विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेकों शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में कर लिया है। विद्युत्, ताप, प्रकाश, चुम्बक, शब्द, अणु- शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य और अविज्ञात शक्तियों को उसने ढूँढ़ा और करतलगत किया है; पर ब्रह्म की चेतनात्मक शक्तियाँ भी कितनी ही हैं, उन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा करतलगत किया जा सकता है। मनुष्य का अपना चुम्बकत्व असाधारण है। वह उसी क्षमता के सहारे भौतिक जीवन में अनेकों को प्रभावित एवं आकर्षित करता है। उसी आधार पर वह साधन जुटाता, सम्पन्न बनता और सफलताएँ उपलब्ध करता है। इसी चुम्बक शक्ति के सहारे वह व्यापक ब्रह्म-चेतना के महासमुद्र में से उपयोगी चेतन तत्त्वों को आकर्षित एवं करतलगत कर सकता है।
  
🔶 इन शक्तियों में सर्वप्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली प्रज्ञा-शक्ति है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा विद्यमानï हो, तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती, जो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके। श्रम और मनोयोग तो आत्मिक प्रगति में भी उतना ही लगाना पर्याप्त होता है, जितना की भौतिक समस्याएँ हल करने में आये दिन लगाना पड़ता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते, जितने कि सामान्य जीवन में आये दिन हर किसी को सहने पड़ते हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ और साहस करना पड़ता है, उससे कम में ही उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन का निर्माण-निर्धारण किया जा सकता है। मूल कठिनाई एक ही है- प्रज्ञा प्रखरता की। यदि वह प्राप्त हो सके, तो जीवन में ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाओं को प्राप्त कर सकने में अब कोई कठिनाई शेष नहीं रह गई।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 गुरु ही साधक व साधना है

🔶 गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञान रूपी तेज का प्रकाश करता है। ‘गु’ अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ प्रकाश का।  ऐसे सदगुरु के लिए लगन, उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए आतुरता में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है। वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सदगुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने की आगे बढ़ते हैं, क्योंकि गुरु चरणों की महिमा अपार है।
  
🔷 गुरुचरण ही अपने तात्त्विक रूप में परब्रह्म का स्वरूप है। लेकिन इसे जाना और समझा तभी जा सकता है, जब साधक अपनी गुरुभक्ति की साधना के शिखर पर आरूढ़ हो जाता है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है—‘श्रीचरणों में नेह है। साधना और सिद्धि है यह॥’ अर्थात् गुुरुचरणों में अनुराग साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो उसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होती है। गुरुचरणों के भावभरे ध्यान से इसकी शुरूआत होती है। भाव भरे ध्यान का रूप कुछ इस अटल विश्वास से है कि सदगुरु का स्थूल रूप और कुछ नहीं, परब्रह्म का घनीभूत प्राकट्य है। बिना किसी शर्त, माँग, अधिकार के स्वयं को उनके श्रीचरणों मेेें न्यौछावर कर देना ही गुुरुचरणों की सच्ची सेवा है। इससे हमारे जन्म-जन्मान्तर के सारे पाप धुल जाते हैं और आत्मा का विशुद्ध स्वरूप निखरने लगता है। साथ ही अन्तर्चेतना में अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति होने लगती है।
  
🔶 साधनामय जीवन की सर्वोच्च व्याख्या का सार है-साधक का सद्ïगुरु में समर्पण, विसर्जन, विलय। अनन्य चिन्तन की निरन्तरता साधक के सदगुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है और तब आती है-विलीनता की अवस्था। इस भावदशा में शिष्य-साधक का काय-कलेवर तो यथावत्ï बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है उसके सदगुरु की चेतना। वह दिखते हुए भी नहीं होता, होता है केवल उसका सदगुरु।
  
🔷 जो गुरुभक्ति की डगर पर चलने का साहस करते हैं, उन्हें दो-चार कदम आगे बढ़ते ही बहुत से साधना-सत्यों का साक्षात्कार होने लगता है। वे जानते हैं कि सदगुरु ही साधक हैं, वही साधना हैं और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं।
  
🔶 तात्पर्य यह है कि सदगुरु की कृपाशक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सदगुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है। तब उसे उस सत्य का बोध होता है कि सदगुरु ही साध्य है; क्योंकि सद्ïगुरु और इष्ट दो नहीं, बल्कि एक हैं। अपने गुुरु ही गोविन्द हैं। वही सदाशिव और परम शक्ति हैं।
  
🔷 प्रयत्न पूर्वक सद्ïगुरु की आराधना के सिवाय कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सदगुरु का चिन्तन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदशों का निष्ठपूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्मविद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है, वही शिष्य है, वही साधक है। वस्तुत: गुरुतत्व से भिन्न और अन्य कुछ भी नहीं है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 5 जनवरी 2023

👉 कर्म का फल

यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल एक ऐसा अमिट तथ्य है, जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिए होता है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कत्र्तव्य धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचय कर सका या नहीं। जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझना है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की ओर बढऩे का शुभारंभ कर दिया।
  
दंडमय से तो विवेक रहित पशु को भी अवांछनीय मार्ग पर चलने से रोका जा सकता है। मानवीय अंत:करण की विकसित चेतना तभी अनुभव की जा सकेगी, जब वह कुमार्ग पर चलने से रोके और सन्मार्ग के लिए प्रेरणा प्रदान करे। लाठी के बल पर भेड़ों को इस या उस रास्ते पर चलाने में गड़रिया सफल रहता है। सभी जानवर इसी प्रकार दंड भय दिखाकर उसे जोते जाते हैं। यदि हर काम का तुरंत दंड मिलता और ईश्वर बलपूर्वक किसी मार्ग पर चलने के लिए विवश करता, तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, उसकी स्वतंत्र आत्म चेतना विकसित हुई या नहीं, इसका पता ही नहीं चलता।
  
ईश्वर या खुदा ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अंतर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनंद लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो। उन्नति को अपनाने वाला विवेक और कर्त्तव्य परायणता यह दो ही कसौटी मनुष्यता का आत्मिक स्तर विकसित होने की है। इस आत्म विकास पर ही जीवनोद्देश्य की पूर्ति और मनुष्य जन्म की सफलता निहित है। ईश्वर खुदा चाहता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना का विकास करे और विकास के क्रम से आगे बढ़ता हुआ पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने की सफलता प्राप्त करे।
  
यदि ईश्वर को यह प्रतीत होता कि बुद्धिमान बनाया गया मनुष्य पशुओं जितना मूर्ख ही बना रहेगा, तो शायद उसने दण्ड के बल पर चलाने की व्यवस्था उसके लिए भी सोची होती। तब झूठ बोलते ही जीभ में छाले पडऩे, चोरी करते ही हाथ में फोड़ा उठ पडऩे, बेईमानी करते ही बुखार आ जाने, कुदृष्टिï डालते ही आँख दु:खने लगने, कुविचार आते ही सिर दर्द होने जैसे दण्ड मिलने की तुर्त-फुर्त व्यवस्था बनी रही होती, तो किसी के लिए भी दुष्कर्म करना संभव ही न होता। लोग जब उसमें लाभ की अपेक्षा प्रत्यक्ष हानि देखते तो दुष्कर्म करने की हिम्मत न करते। ऐसी स्थिति में मनुष्य की स्वतंत्र चेतना, विवेक बुद्धि और आंतरिक महानता के विकसित होने का अवसर ही नहीं आता और आत्म विकास के बिना पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकने की दिशा में प्रगति ही न होती। अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा, सबसे बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व संभाल सकने में समर्थ है या नहींï? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 समस्त शक्तियों का स्रोत

कोई भी व्यक्ति जितना कुछ वैभव, उल्लास और साधन सम्पत्ति अर्जित करता है, वह उपार्जन एक ही मूल्य पर होता है। वह मूल्य है- शक्ति। जिसमें जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, वह उतना ही वैभव और उल्लास अर्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति हो तो विभिन्न भोगों को भोगा जा सकता है और इन्द्रियाँ यदि अशक्त, असमर्थ हो जायें, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय लगते हैं। उनकी ओर देखने का भी जी नहीं करता। नाड़ी संस्थान की क्षमता यदि क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक प्रकार से नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति यदि घट जाय, तो मनुष्य की गणना विक्षिप्त व्यक्तियों में होने लगती है और विक्षिप्तों जैसी नहीं भी हो, तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि उसकी स्थिति उपहासास्पद बन जाती है। धन की शक्ति में यदि कोई व्यक्ति, शून्य हो तो वह दीन-हीन बना रहता है। अभावग्रस्तता से उसकी स्थिति दयनीयों जैसी बनी रहती है और वह जीवन की सामान्य आवश्यकतायें भी भली प्रकार पूरी नहीं कर पाता। मित्रता को भी शक्ति कहा जा सकता है, जिसका स्वरूप सामाजिक होता है। यदि सच्चा मित्र शक्ति न रहे, तो व्यक्ति अपने आप को एकाकी अनुभव करने लगता है और जीवन निरर्थक-निरीह लगने लगता है।
  
इन सभी शक्तियों में प्रधान है- आत्मबल। आत्मबल आध्यात्मिक पक्ष से संबंधित होने के कारण अन्य सभी शक्तियों से उच्च स्तर का समझा जाता है। यदि यह शक्ति पास में न रहे, तो मनुष्य प्रगति के पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिए प्राय: असंभव ही रहती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क्या आध्यात्मिक और क्या भौतिक, सभी क्षेत्रों में अभीष्टï सफलता प्राप्त करने के लिए शक्ति का संपादन नितांत आवश्यक है। शक्ति संपादन के संबंध में यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि इनका स्वरूप चाहे जो हो, स्रोत एक ही है।

आभूषण चाहें कान के बने या गले का, सोना का ही उपयोग किया जाता है। पृथ्वी पर व्याप्त समस्त ऊष्माओं का केन्द्र सूर्य ही है, चाहे वह शरीर की गर्मी हो या आग की। भारतीय मनीषियों ने इसी प्रकार समस्त शक्तियों का स्रोत साधन एक ही माना है और उसे गायत्री नाम दिया है। भौतिक जगत में पंचभूतों को प्रभावित करने वाली जितनी भी शक्तियाँ हैं और आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक, भावनात्मक तथा संकल्पनात्मक शक्तियाँ हैं, उन सब का मूल उद्ïगम एवं अजस्र भण्डार एक ही है, जिसे गायत्री नाम से संबोधित किया गया है। इस भण्डार में शक्ति सागर में जितना भी गहरे उतरा जाय, उतना ही बहुमूल्य रत्न राशि उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती चली जाती है।
  
मनीषियों ने परब्रह्मï परमात्मा की चेतना, प्रेरणा सक्रियता एवं समर्थता को गायत्री कहा है तथा इसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति बताया है। विभिन्न देवशक्तियाँ जो अन्यान्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं और विभिन्न देवनामों से पुकारी जाती हैं, इसी शक्ति के ज्योति स्फुलिंग है। वे समस्त शक्तियाँ उस परम शक्ति की ही किरणें हैं। उत्पादन, विकास एवं संहार में संलग्ïन ब्राह्मïी, वैष्णवी और शांभवी शक्तियों के प्रतीक प्रतिनिधि ब्रह्मïा, विष्णु, महेश परमब्रह्मï की इसी सर्वोपरि शक्ति से अपना काम चलाते हैं और अभीष्टï कार्यों को पूरा करने के लिए शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। पंचतत्त्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ और अंतरिक्ष कहकर पुकारते हैं। उनकी शक्ति का स्रोत भी परमब्रह्मï की वही चेतना है, जिसे गायत्री कहा गया है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 4 जनवरी 2023

👉 साधना ऐसी जो प्रत्यक्ष सिद्धि दात्री हो

व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था, संयमशीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठïापन और संवर्धन करने के उपरांत ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गंदगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में बैठने के लिए मचले, तो वह उसकी इच्छा पूरी नहीं करती, प्यारा लगते हुए भी उसके रोने की परवाह नहीं करती। पहला काम करती है- उसे धोना, नहलाना, गंदे कपड़े उतारकर नये स्वच्छ वस्त्र पहनाना। इतना कर चुकने के उपरांत वह उसे गोद में लेती, दुलार करती, खिलाती और दूध पिलाती है। बच्चों की उतावली सफल नहीं होती, माता की व्यवस्था बुद्धि ही कार्यान्वित होती है।
  
अध्यात्म क्षेत्र में इन दिनों एक भारी भ्रांति फैली हुई है कि पूजा परक कर्मकाण्डों के सहारे जादूगरों जैसे चमत्कारी प्रतिफल मिलने चाहिए। देवता को स्तवन पूजन के मनुहार, उपहार पर फुसलाया जाना चाहिए और उससे अपनी उचित-अनुचित मनोकामनाओं को पूरा कराया जाना चाहिए। यह स्थापना अनैतिक है, असंगत भी। यदि इतने सस्ते में मनोकामनाएँ पूरी होने लगे, तो सफलता के लिए कोई क्यों परिश्रम करेगा और क्यों पात्रता विकसित करेगा? फिर सभी उद्योग परायण व्यक्ति मूर्ख समझे जाएंगे और देवता की जेब काटकर उल्लू सीधा करने वाले चतुर। यह मान्यता यदि सही रही होती, तो देव पूजा में अधिकांश समय बिताने वाले पंडित, पुजारी, साधु, बाबाजी अब तक उच्चकोटि की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने की स्थिति में पहुँच गये होते। जबकि उनमें से अधिकांश सामान्य जनों से भी गई गुजरी स्थिति में देखे जाते हैं। इसी प्रकार तंत्र-मंत्र के फेर में पड़े रहने वाले आतुर और भावुक व्यक्ति बड़ी-बड़ी आशा अभिलाषाएं संजोएँ रहते हैं। समय बीतता जाता है और सफलता के दर्शन नहीं होते, तो फिर वे निराश होने लगते हैं। प्रयास बंद कर देते हैं। अध्यात्म अवलम्बन का उलाहना देते हैं और लगभग नास्तिक स्तर के बन जाते हैं।
  
यह दु:खद परिस्थिति इसलिए उत्पन्न होती है कि उन्होंने आत्म-विज्ञान का तत्त्वदर्शन समझने से पूर्व आतुरता वश मात्र कर्मकाण्ड आरंभ कर दिये और बालू के महल बनाने लगे। जबकि होना यह चाहिए था कि बीज से वृक्ष उत्पन्न होने के सिद्धांत के साथ जुड़े हुए अन्य तथ्यों को भी समझते और उन पर समुचित ध्यान देते। बीज से वृक्ष बनने की बात सच है। साधना से सिद्धि मिलने की भी, परन्तु आदि और अंत को अपना लेना एवं बीच का विस्तार उपेक्षित कर देना सही नीति नहीं है। बीज को ऊर्वर भूमि, खाद और पानी तीनों का सुयोग मिलना चाहिए, वह अंकुरित होगा, बढ़ेगा और फूलेगा-फलेगा।

इतना किये बिना बीज से वृक्ष बना देने की जादूगरी कोई बाजीगर ही कर सकता है, यह उसी का काम है। हथेली पर सरसों जमाना। किसान वैसा नहीं करते। जादूगर रुपये बरसाकर दर्शकों को चकित कर सकते हैं, पर व्यवसायी जानते हैं कि यदि ऐसा संभव रहा होता, तो यह बाजीगर करोडग़ति हो गये होते और किसी को परिश्रम करके व्यवसाय संलग्ïन रहने की आवश्यकता न पड़ती। चलने पर ही रास्ता पूरा होता है। आत्मिक प्रगति, जिसे कोई चाहे तो देव अनुग्रह भी कह सकता है, जीवन को परिष्कृत करने की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किए बिना पकड़ में नहीं आ सकती।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जीवन के गरिमामय बोध तो हो

एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी-खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये । यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी  ही खाली हो गई। जब पीछे देखा तो उसे होश आया।   फर्लांगों से धीरे-धीरे वह चावल फैल रहे थे और धूल में मिलकर दृष्टिï से ओझल हो गए थे। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन दानों को फिर  से पा सका होता। पर  वे तो पूरी तरह धूल में गढ़ चुके थे, वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की जलती हुई ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी।
    
हमारे जीवन का अमूल्य हार कितना सुन्दर है; हम इसे कितना प्यार करते हैं। माता खुद भूखी रहकर अपने नन्हे से बालक को मिठाई खरीदकर खिलाती है, बालक के मल मूत्रों में खुद पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौने पर सुलाती है। वह बड़े से बड़ा नुकसान कर दे, एक कहुआ शब्द तक नहीं कहती।
  
हमारी आत्मा हमारे जीवन से इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक प्यार करती है। जीवन सुखी बीते, उसे आनन्द और प्रसन्नता प्राप्त हो, इसके लिए आत्मा पाप भी करती है। खुद नरकों की यातना सहती है- खुद मलमूत्रों में पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौन पर सुलाती है। यह प्यार माता के प्यार से किसी प्रकार कम नहीं है। जीवन को वह जितना प्यार करती हैं, उतना क्या कोई किसी को कर सकता है?
  
पर हाय! इसकी एक-एक मणि चुपके-चुपके मजदूर के चावलों की तरह बिखरती जा रही है। और हम मदहोश होकर मस्ती के गीत गाते हुए झूम-झूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। जीवन-लड़ी के अनमोल मोती घड़ी, घंटे, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्षों के रूप में धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहे हैं। एक ओर माता कहती है कि मेरा पूत बड़ा हो रहा है, दूसरी ओर मौत कहती है कि मेरा ग्रास निकट आ रहा है। बूँद-बूँद करके जीवन रस टपक रहा है और घड़ा खाली होता जा रहा है। कौन जानता है कि हमारी थैली में थोड़ा-बहुत कुछ बचा भी है! फिर भी क्या हम इस समस्या पर विचार करते हैं? कभी सोचते हैं कि समय क्या वस्तु है? उसका क्या मूल्य है?  यदि हम नहीं सोचते और अपनी पीनक को ही स्वर्ग-सुख मानते हैं तो सचमुच बीते वर्ष को गँवाना और नवीन वर्ष का आना कोई विशेष महत्व नहीं रखता।
  
क्या आप कभी इस पर भी विचार करते हैं कि आपके जीवन का इतना बड़ा भाग, सर्वोत्तम अंश किस प्रकार बर्बाद हो गया? क्या इसे इसी प्रकार नष्टï करना चाहिए था? क्या आत्मा को इन्हीं कर्मों की पूर्ति के लिये ईश्वर ने भेजा था, जिन को अब तक तुमने पूरा किया है? याद रखना, वह दिन दूर नहीं है जब तुम्हें यही प्रश्र शूल की तरह दुख देंगे। जब जीवन रस की अन्तिम बूँद टपक जायेगी और तुम मृत्यु के कंधे पर लटक रहे होगे, तब तुम्हारी तेज निगाह बुढ़ापा, अधेड़ावस्था, यौवन, किशोरावस्था, बचपन और गर्भावस्था तक दौड़ेगी। अपने अमूल्य हार की एक-एक मणि धूलि में लोटती हुई दिखाई देगी। तब अपनी मदहोशी पर तिलमिला उठोगे।।  आज तो समय काटने के लिये ताश या फलाश खेलने की तरकीब सोचनी पड़ती है। पर परसों पछतायेगा इन अमूल्य क्षणों के लिए! और शिर धुन-धुनकर रोयेगा अपने इस पाजीपन पर।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 साधक की दो विपत्तियाँ

तमोगुण की प्रधानता रखने वाला व्यक्ति दो प्रकार की विपत्तियों में फँस सकता है। पहली विपत्ति है अपने को हीन समझना- मैं दुर्बल हूँ, घृणित हूँ, अकर्मण्य हूँ, आदि भावनायें उठने से वह समझने लगता है कि मैं सबसे नीच हूँ भगवान मुझ जैसे नीच का कैसे उद्धार कर सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि सोचने वाला भगवान की शक्ति का सीमित मानता है और भगवान गूँगे को बोलने की शक्ति तथा लंगड़े को चलने की शक्ति दे देते हैं यह बात असत्य समझता है। दूसरी विपत्ति है जरा सी सिद्धि पा जाने पर साधना से मुँह मोड़ लेना और प्राप्त सिद्धि को सब कुछ समझ कर उसी के भोग में लग जाना। साधना की ये दोनों ही विपत्तियाँ विघ्न हैं।

इसलिए साधक को सदा इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वह भी भगवान का अंश है और भगवती महा माया आदि शक्ति उसके अन्तराल में बैठी हुई उसका संचालन कर रहीं हैं। सर्व शक्तिमान भगवान की लीला के अधीन होकर चुपचाप बैठे रहना साधक के लिए उचित नहीं है। यह तो उसके अहंकार की विद्यमानता का फल है जब तक अहंकार रहता है तब तक वास्तविक धारणा का उत्पन्न होना ही सम्भव नहीं है इस लिए अहंकार को निर्मूल कर देने पर ही साधक उन विपत्तियों से बच सकता है।

श्री अरविन्द
अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 5

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👉 गायत्री की अमोघ शक्ति

गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक  प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य के मन:क्षेत्र में समाए हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, ईर्ष्या, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाए बैठे हों, मन में तुरंत ही हलचल आरंभ होती है और उनका उखडऩा, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई  पडऩे लगता है।
  
संसार में समस्त दु:खों की जननी कुबुद्धि ही है। जितने भी दु:खी मनुष्य इस विश्व में दीख पड़ते हैं, उनके दु:खों का एकमात्र कारण उनके कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दु:ख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुत: दु:ख का अस्तित्व ही नहीं है।
  
संसार में जितने दु:ख हैं, सब कुबुद्धि के कारण हैं। लड़ाई, झगड़ा, आलस्य, अत्याचार आदि के पीछे मनुष्य की दुर्बुद्धि ही काम करती है। इन्हीं कारणों से रोग, अभाव, चिन्ता आदि का प्रादुर्भाव होता है और नाना प्रकार की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं। कुबुद्धि से बुरे विचार बनते हैं। इसीलिए कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। गायत्री उपासना से मस्तिष्क में सद्ïविचार और हृदय में सद्ïभाव उत्पन्न होते हैं।
  
जिनकी स्मरण शक्ति मंद है, मस्तिष्क जल्दी थक जाता है, उन्हें गायत्री उपासना करके थोड़े ही समय में इस महान्ï शक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। सिर में दर्द, चक्कर आना आदि रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं, उन्हें गायत्री उपासना करनी चाहिए। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान्ï और निरोग बनते हैं। जिनके घर में कुबुद्धि का साम्राज्य छाया रहता है, आपस में द्वेष, असहयोग, मनमुटाव, कलह, दुराव एवं दुर्भाव रहता है, आये दिन झगड़े होते रहते हैं, आपाधापी और स्वार्थपरता में प्रवृत्ति रहती है, गृह-व्यवस्था को ठीक रखने, समय का सदुपयोग करने, योग्यताएँ बढ़ाने, कुसंग से बचने, श्रमपूर्वक आजीविका कमाने, मन लगाकर विद्या-अध्ययन करने में प्रवृत्ति न होना आदि दुर्गुण कुबुद्धि के प्रतीक हैं। जहाँ यह बुराइयाँ भरी रहती हैं, वे परिवार कभी भी उन्नति नहीं कर सकते, अपनी  को कायम नहीं रख सकते। इसके विपरीत, उनका पतन होना आरंभ हो जाता है। बिखरी हुई बुहारी की सीकों की तरह छिन्न-भिन्न होने पर वर्तमान स्थिति भी स्थिर नहीं रहती। दरिद्रता, हानि, घाटा, शत्रुओं का प्रकोप, मानसिक अशांति की अभिवृद्धि आदि बातें दिन-दिन बढ़ती हैं और वे घर कुछ ही समय में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। कुबुद्धि ऐसी अग्रि है, जहाँ भी वह रहती है, वहीं की वस्तुओं को जलाने और नष्ट करने का कार्य निरन्तर करती रहती है।
  
जहाँ उपरोक्त प्रकार की स्थिति हो, वहाँ गायत्री उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उसमें बैठे हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं, उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं, तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती ही है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता-जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोत्तरी होती हुई, स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। साधना निर्बल हो, तो प्रगति धीरे-धीरे होती है, पर होती अवश्य है। सद्बुद्धि एक शक्ति है, जो जीवन-क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख-शान्ति का वरदान प्राप्त करता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 2 जनवरी 2023

👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता?

👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता?

आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होने के इच्छुक साधक के लिये अपने आपको नियम पर दृढ़ रखने तथा नियमित जप, तप, उपासना साधना करते रहना ब्रह्म प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं प्रथम शर्त भी है। बिना साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है। उसी प्रकार ब्रह्म साक्षात्कार के लिए पूज, उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है। इस प्राथमिक सोपान पर चलकर ही आगे बढ़ना सम्भव है।

किन्तु बहुधा साधना उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं होती? समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते है फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है यह प्रश्न विचारणीय है।

साधना के दो अंग हैं- चेष्टा और दूसरा त्याग। किसी की प्राप्ति के लिए चेष्टा करनी पड़ती है साथ ही उसके लिए त्याग भी? नदी अपनी सम्पूर्ण चेष्टा से विराट सागर की ओर धावमान होती है उसमें एकरस एक्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु उसकी चेष्टा में वह सम्पूर्ण भाव भी परिलक्षित होता है जिसमें वह अपने आप को पद-पद पर विराट के लिए निवेदन करती हुई आगे बढ़ती है। अपनी वर्तमान स्थिति को उसी के लिए क्षण-क्षण में उत्सर्ग करती हैं।

आध्यात्मिक साधना का पथ भी ठीक इसी प्रकार है। जिस प्रकार पूजा, उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।

पूजा, उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।

तुच्छ मनुष्य केवल अपनी शक्ति, सामर्थ्य साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता। उस अनन्त अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता और न उसकी अनुभूति हो प्राप्त कर सकता हैं इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति, हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है। उसके लिए तब कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती है।

ब्रह्म प्राप्ति के लिए हमें अपने आपको देना होगा। उन्होंने तो अपने आपको दे डाला। सर्वव्यापी प्रभु सर्वदा सर्वत्र ही हमारे भीतर बाहर व्याप्त है। हमारे अन्दर अभाव है, हम संकीर्णता का बना पहने हुए है, मैं और ममत्व की रंगीन ऐनक लगाये हुए हैं इसी लिए उनके पुण्य मिलन से हम दूर है। हमने नाना प्रकार के स्वार्थ अहंकार, क्षुद्रता के कठिनतम घेरों में अपने आपको आबद्ध कर लिया है जहाँ अपनी स्वतन्त्र सत्त को देखते है, किन्तु प्रभु मिलन के मार्ग को यही तो कठिन बनाये हुए है और हमें उस की अनुभूति से वंचित रखते है। इसी कमी के कारण हम कठिन साधनाएँ करते हुए भी देर तक विश्वात्मा, ब्रह्म की झलक नहीं पाते।

उपासना, साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।

उपनिषद् में कहा है कि ‘ब्रह्म तल्लक्षमुच्यते” ब्रह्म ही उसका लक्ष है। तो फिर लक्ष को अपनी ओर नहीं खींचा जा सकता, अपने आपको ही लक्ष्य तक पहुँचाना होता है। जिस प्रकार निशाना लगाकर तीर चलाने पर वह सम्पूर्ण रूपेण अपने लक्ष्य के प्रति अपने आपको अर्पण करता है उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति के लिए उसी में सर्वस्व अर्पण करके तन्मय हो जाना पड़ेगा। सकल अवस्थाओं में सकल कार्यों उपलब्धि एवं स्थितियों में वही एक मात्र भाव बनाये रखना पड़ेगा।

प्रभु से हमारी दूरी, दुःख, वेदना, क्लान्ति आदि इसलिए है कि हम अपने अहं को मिटा नहीं पात। यह अहं ही हमारे और उनके बीच में दीवार बन बैठा हे जो अपनी स्वतंत्र सत्ता शक्ति सामर्थ्य से उस अखण्ड, सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान को पाने की मिथ्या कल्पना करता है और हमें उनसे दूर रखता हैं इसलिए अहंकार को उसके उच्च शिखर से उतार कर निम्न स्थिति में ले जाना होगा। सकल विश्व के साथ समानता एवं एकता रखकर अपने आपको सब के पीछे ले जाकर खड़ा करना होगा सबसे नीचे बैठना होगा। हम अकिंचनता और दीनता में प्रभु की कृपा दृष्टि पाकर सदा के लिए उनके बन जायेगा। जब हम सब प्राणिमात्र के साथ बैठे है एकता स्थापित करते हैं अपने अहंकार को कम करके परमात्मा के हाथों में अपना समर्पण करते हैं तभी हम उस ब्रह्म की गोद में बैठने के अधिकारी बनते है।

ब्रह्म साक्षात्कार के लिए अपने ज्ञान की विशुद्धि शक्ति के सचेष्टता के साथ-साथ अपना आत्म संपर्क उस परम सत्ता में करना होगा। अहंकार को मारना होगा। अपने को उस प्रभु के हृदय देश में स्थापित कर उसी की इच्छा से सर्व क्रिया कलाप जारी रखना होगा। अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसमें निवेदित करना होगा। अहंकार, स्वार्थ, तुच्छता संकीर्णता को त्याग नम्रताशील, सामंजस्य, उदारता की साधना करनी होगी। अकिंचन भाव से परमात्मा सत्ता को सर्वत्र स्वीकार करते हुए भेद, विविधता ऊंच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा।

श्री स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1961 पृष्ठ 12

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बुधवार, 28 दिसंबर 2022

👉 कण-कण में भगवान

“मीरा की आदत सी बन गई थी। जब वह मंदिर में बैठती, तो कभी मूर्ति की ओर पीठ कर लेती, तो कभी पैर। एक बार वह प्रतिमा की ओर पैर करके बैठी थी, इतने में एक व्यक्ति ने मंदिर में प्रवेश किया। मीरा को इस स्थिति में बैठी देख उसे क्रोध आ गया। उसे भगवान का यह अपमान बर्दाश्त न हो सका। वह आगबबूला हो उठा और मन में जो आया बक डाला।

अब मीरा को वस्तुस्थिति का बोध हुआ। नाराजगी का कारण समझ में आया, तो मुस्कुरा दिया, कहा- बेटा। गालियाँ क्यों दे रहा है? भला तू ही बता, जिस ओर भगवान नहीं है, मैं उसी ओर पैर कर लूँगी। मुझे तो हर ओर, हर दिशा में, कण-कण में भगवान दिखते हैं।

व्यक्ति का अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने पैरों में गिरकर क्षमा माँगी और चलता बना।

संकीर्ण दृष्टि वालों को सर्वत्र बुराई ही दिखती है।

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👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लो...