मंगलवार, 28 नवंबर 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Nov 2017

🔶 जिन आन्दोलनों के पीछे तप नहीं होता वह कुछ समय के लिए तूफान भले ही मचा ले, पर अंत में वे असफल हो जाते हैं। जिन आत्माओं के पीछे तपस्या नहीं रहतीं वे कितनी ही चतुर, चालाक, गुणी, धनी क्यों न हो, महापुरुषों की श्रेणी में नहीं गिनी जा सकतीं। वे मनुष्य जिन्होंने मानव जाति को ऊँचा उठाया है, संसार की अशान्ति को दूर करके शान्ति की स्थापना की है, अपना नाम अमर किया है, युग प्रवाह को मोड़ा है, वे तप-शक्ति से संपन्न रहे हैं।      

🔷 हमारा कर्त्तव्य है कि हम लोगों को विश्वास दिलावें कि वे सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और इस संसार में एक ही ध्येय को पूरा करना उनका धर्म है। उनमें से प्रत्येक मनुष्य इस बात के लिए बाधित है कि वह अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिन्दा रहे। जीवन का ध्येय कम या ज्यादा संपन्न होना नहीं, बल्कि अपने को तथा दूसरों को सदाचारी बनाना है। अन्याय और अत्याचार जहाँ कहीं भी हों उनके विरुद्धा आन्दोलन करना एकमात्र अधिकार नहीं, धर्म है और वह भी ऐसा धर्म जिसकी उपेक्षा करना पाप है। 

🔶 युग परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में जिन्हें घसीटा या धकेला गया है उन्हें अपने को आत्मा का, परमात्मा का प्रिय भक्त ही अनुभव करना चाहिए और शान्त चित्त से धैर्यपूर्वक उस पथ पर चलने की सुनिश्चित तैयारी करनी चाहिए। यदि आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहें तो आत्म-धिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ-मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत मँहगी पड़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान् देगा

🔷 एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते! दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे भगवान, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!"

🔶 बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा! भगवान ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!"

🔷 दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: "भगवान से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!"

🔶 बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर बेवक़ूफ़

🔷 एक बार राजा ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा भगवान से मांगता है तो बेशक भगवान् उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

🔶 वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'भगवान् देगा...' वाला, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना?"

🔷 खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़

🔶 अगले दिन जब राजा  आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!

🔷 राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"

🔶 फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"

🔷 राजा: "फिर?"

🔶 फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'भगवान् देगा, भगवान् देगा!'

🔷 राजा मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, भगवान् ने उसे दे दिया!"

👉 आज का सद्चिंतन 28 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Nov 2017


सोमवार, 27 नवंबर 2017

👉 माता पिता की सेवा से सिद्धि प्राप्ति

🔷 महर्षि पिप्पल बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे। उन की कीर्ति दूर दूर तक फैली हुई थीं एक दिन सारस और सारसी दोनों जल में खड़े आपस में बातें कर रहे थे कि पिप्पल को जितना बड़प्पन मिला हुआ है उससे भी अधिक महिमा सुकर्मा की है, पर उसे लोग जानते नहीं

🔶 पिप्पल ने सारस सारसी के इस वार्तालाप को सुन लिया। वे सुकर्मा को तलाश करते हुए उसके घर पहुँचें। सुकर्मा साधारण गृहस्थ था पर उसने बिना पूछे ही पिप्पल का मनोरथ कह सुनाया। तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह एक साधारण गृहस्थ जो योग तथा अध्यात्म के तत्वज्ञान से अपरिचित है, किस प्रकार इतनी आत्मोन्नति कर सका?

🔷 सुकर्मा से उन्होंने जब अपनी शंका उपस्थिति की तो उसने बताया कि पिता माता को साक्षात भगवान का अवतार मानकर सच्चे मन से मैं उनकी सेवा करता हूँ। यही मेरी साधना है और उसी के बल पर मैं जो कुछ बन सका हूँ सो आप की जानकारी में है ही।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Nov 2017

🔶 दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलता तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनना है। बनेगा तो अंतःकरण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। क्रान्ति अपने से ही आरंभ होगी।      

🔷 प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती। वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है, फिर वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। मनुष्यत्व जगाने की स्थिति में तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों और सुन्दरों को छोड़कर गाँधीजी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को वह प्राप्त होती है। मनुष्यत्व के अनुशासन में जो आ जाता है तो बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।

🔶 ईश्वर की सौंपी हुई और सीना खोलकर स्वीकार की हुई जिम्मेदारी (युग निर्माण योजना) को छोड़ भागना यह अपने बस की बात नहीं। ईश्वरीय इच्छा की उपेक्षा करके अपनी असुविधाओं की चिन्ता करना यह गायत्री परिवार के लिए सब प्रकार अशोभनीय होगा। ऐसे अशोभनीय जीवन से तो मरण अच्छा। अब हमारे सामने एकमात्र कर्त्तव्य यही है कि हम धर्मयुग लाने की महान् प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दें। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Minimum for Self, Maximum for the Society

🔶 We have amazing examples of generosity in the history of India. Kings lead the society with their own examples. Emperor Harshavardhana performed Sarvamedha Yagya and gave always all his possessions to the needy citizens, retain only the bare minimum facilities for his own livelihood; whereas, he was the undisputed ruler of the Indian subcontinent and could have led a lavish life style.

🔷 Janaka was a great king with immense wealth and power, but led the life of a saint and dedicated all his wealth for social welfare. He became famous as Videha, meaning one who is free from bodily lusts. Ishwar Chand Vidyasagar was a professor who gave away all his salary as scholarship for poor students. Such generosity is the real worship of God.

📖 From Pragya Puran

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 3 )

🔶 दृष्टिकोण विकसित होते ही ऐसा आनन्द, ऐसी मस्ती आती है कि देखते ही बनता है। दाराशिकोह मस्ती में डूबते चले गए। जेबुन्निसा ने पूछा—‘‘अब्बाजान ! आपको क्या हुआ है आज? आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे। फिर यह मस्ती कैसी?’’ बोले—‘‘बेटी ! आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद् पढ़कर आया हूँ। जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं। जीवन का असली आनन्द उसमें भरा पड़ा है। बस यह मस्ती उसी की है।’’
               
🔷 यह है असली आनन्द। मस्ती, खुशी, स्वर्ग हमारे भीतर से आते हैं। स्वर्ग सोचने का एक तरीका है। किताब में क्या है? वह तो काला अक्षर भर है। हर चीज की गहराई में प्रवेश में प्रवेश कर जो आनन्द खुशी मिलती है, वह सोचने के तरीके पर निर्भर है। इसी तरह बन्धन-मुक्ति भी हमारे चिन्तन में निहित है। हमें हमारे चिन्तन ने बाँधकर रखा है। हम भगवान् के बेटे हैं। हमारे संस्कार हमें कैसे बाँध सकते हैं? सारा शिकंजा चिन्तन का है। इससे मुक्ति मिलते ही सही अर्थों में आदमी बन्धनमुक्त हो जाता है। हमारी नाभि में खुशी रूपी कस्तूरी छिपी पड़ी है। ढूँढ़ते हम चारों ओर हैं। हर दिशा से वह आती लगती है, पर होती अन्दर है।
  
🔶 यदि आपको सुख-शान्ति, मुस्कुराहट चाहिए तो दृष्टिकोण बदलिए। खुशी सब ओर बाँट दीजिए। माँ को दीजिए, पत्नी को दीजिए, मित्रों को दीजिए। राजा कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान करता था। आपकी परिस्थितियाँ नहीं हैं देने की, किन्तु आप सोने से भी कीमती आदमी की खुशी बाँट सकते हैं। आप जानते नहीं हैं, आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है। जिन्दगी की लाश इतनी भारी हो गई है कि वजन ढोते-ढोते आदमी की कमर टूट गई है। वह खुशी ढूँढ़ने के लिए सिनेमा, क्लब, रेस्टोरेण्ट, कैबरे डान्स सब जगह जाता है, पर वह कहीं मिलती नहीं। खुशी दृष्टिकोण है, जिसे मैं ज्ञान की सम्पदा कहता हूँ। जीवन की समस्याओं को समझाकर अन्यान्य लोगों से जो डीलिंग की जाती है वह ज्ञान की देन है। वही व्यक्ति ज्ञानवान होता है, जिसे खुशी तलाशना व बाँटना आता है। ज्ञान पढ़ने-लिखने को नहीं कहते। वह तो कौशल है। ज्ञान अर्थात् नजरिया, दृष्टिकोण, व्यावहारिक बुद्धि।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 159)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञा परिजन उत्साह पूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जन समुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखती भी नहीं है। उन्हें देवालय की प्रतिष्ठा दी जाएगी। बिहार के हजारी किसान ने हजार आम्र-उद्यान निज के बलबूते खड़े करा दिए थे, तो कोई कारण नहीं कि एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का उद्देश्य पूरा न हो सके। इनकी पौध शान्तिकुञ्ज से देने का निश्चय किया गया है और हर प्रज्ञापुत्र को कहा गया है कि वह अशोक वाटिका लगाने-लगवाने में किसी प्रकार की कमी न रहने दें। उसके द्वारा वायुशोधन का होने वाला कार्य शाश्वत शास्त्र सम्मत यज्ञ के समतुल्य ही समझें। अग्निहोत्र तो थोड़े समय ही कार्य करता है, पर यह पुनीत वृक्ष उसी कार्य को निरंतर चिरकाल तक करता रहता है।

🔶 ४-हर गाँव एक युग तीर्थः जहाँ श्रेष्ठ कार्य होते रहते हैं, उन स्थानों की अर्वाचीन अथवा प्राचीन गतिविधियों को देखकर आदर्शवादी प्रेरणा प्राप्त होती रहती है, ऐसे स्थानों को तीर्थ कहते हैं। जिन दर्शनीय स्थानों की श्रद्धालु जन तीर्थयात्रा करते हैं, उन स्थानों एवं क्षेत्रों के साथ कोई ऐसा इतिहास जुड़ा है, जिससे संयमशीलता, सेवा भावना का स्वरूप प्रदर्शित होता है। प्रस्तुत तीर्थों में कभी ऋषि आश्रम रहे हैं। गुरुकुल आरण्यक चले हैं और परमार्थ सम्बन्धी विविध कार्य होते रहे हैं।

🔷 इन दिनों प्रख्यात तीर्थ थोड़े ही हैं। वहाँ पर्यटकों की धकापेल भर रहती है। पुण्य प्रयोजनों का कहीं अता-पता नहीं है। इन परिस्थितियों में तीर्थ भावना को पुनर्जीवित करने के लिए सोचा यह गया है कि भारत के प्रत्येक गाँव को एक छोटे तीर्थ के रूप में विकसित किया जाए। ग्राम से तात्पर्य यहाँ शहरों में द्वेष या उपेक्षा भाव रखना नहीं है, वरन् पिछड़ेपन की औसत रेखा से नीचे वाले वर्ग को प्रधानता देना है। मातृभूमि का हर कण देवता है। गाँव और झोंपड़ा भी। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर छाया पिछड़ापन धो दिया जाए और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना की जाए।

🔶 इतने भर से वहाँ बहुत कुछ उत्साहवर्धक प्रेरणाप्रद और आनंददायक मिल सकता है। ‘‘हर गाँव एक तीर्थ’’ योजना का उद्देश्य है, ग्रामोत्थान, ग्राम सेवा, ग्राम विकास। इस प्रचलन के लिए घोर प्रयत्न किया जाए और उस परिश्रम को ग्राम देवता की पूजा माना जाए।  यह तीर्थ स्थापना हुई, जिसे स्थानीय निवासी और बाहर के सेवा भावी उद्बोधनकर्त्ता मिल-जुलकर पूरा कर सकते हैं। पिछड़ेपन के हर पक्ष से जूझने और प्रगति के हर पहलू को उजागर करने के लिए आवश्यक है कि गाँवों की सार्थक पद यात्राएँ की जाएँ, जन संपर्क साधा जाए और युग चेतना का अलख जगाया जाए।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.181

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 दूरदर्शी विवेकशीलता का युग आ रहा है

🔷 हमने भविष्य की झाँकी देखी है एवं बड़े शानदार युग के रूप में देखी है। हमारी कल्पना है कि आने वाला युग प्रज्ञायुग होगा। ‘प्रज्ञा’ अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता के पक्षधर व्यक्तियों का समुदाय। अभी जो परस्पर आपाधापी, लोभ-मोहवश संचय एवं परस्पर विलगाव की प्रवृत्ति नजर आती है, उसको आने वाले समय में अतीत की कड़वी स्मृति कहा जाता रहेगा। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई होगा एवं हर परिवार उससे मिलकर बना समाज का एक अवयव। सभी का चिन्तन उच्चस्तरीय होगा। कोई अपनी अकेले की ही न सोचकर सारे समूह के हित की बात को प्रधानता देगा।

🔶 प्रज्ञायुग में हर व्यक्ति अपने आपको समाज का एक छोटा-सा घटक किन्तु अविच्छिन्न अंग मानकर चलेगा। निजी लाभ-हानि का विचार न करके विश्व हित में अपना हित जुड़ा रहने की बात सोचेगा। सबकी महत्वाकाँक्षाएँ एवं गतिविधियाँ लोकहित पर केन्द्रित रहेंगी न कि संकीर्ण स्वार्थपरता पर। अहंता को परब्रह्म में समर्पित कर आध्यात्मिक जीवन-मुक्ति का लक्ष्य अगले दिनों इस प्रकार क्रियान्वित होगा कि किसी को अपनी चिन्ता में डूबे रहने की- अपनी ही इच्छा पूर्ति की- अपने परिवार जनों की प्रगति की न तो आवश्यकता अनुभव होगी, न चेष्टा चलेगी। एक कुटुम्ब के सब लोग जिस प्रकार मिल-बाँटकर खाते और एक स्तर का जीवन जीते हैं वही मान्यता व दिशाधारा अपनाये जाने का औचित्य समझा जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 27 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Nov 2017


👉 सफलता की तैयारी

🔷 शहर से कुछ दूर एक बुजुर्ग दम्पत्ती रहते थे वो जगह बिलकुल शांत थी और आस -पास इक्का -दुक्का लोग ही नज़र आते थे।

🔶 एक दिन भोर में उन्होंने देखा की एक युवक हाथ में फावड़ा लिए अपनी साइकिल से कहीं जा रहा है, वह कुछ देर दिखाई दिया और फिर उनकी नज़रों से ओझल हो गया दम्पत्ती ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया, पर अगले दिन फिर वह व्यक्ति उधर से जाता दिखा अब तो मानो ये रोज की ही बात बन गयी, वह व्यक्ति रोज फावड़ा लिए उधर से गुजरता और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो जाता।

🔷 दम्पत्ती इस सुन्सान इलाके में इस तरह किसी के रोज आने -जाने से कुछ परेशान हो गए और उन्होंने उसका पीछा करने का फैसला किया अगले दिन जब वह उनके घर के सामने से गुजरा तो दंपत्ती भी अपनी गाडी से उसके पीछे -पीछे चलने लगे कुछ दूर जाने के बाद वह एक पेड़ के पास रुक और अपनी साइकिल वहीँ कड़ी कर आगे बढ़ने लगा १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका और अपने फावड़े से ज़मीन खोदने लगा।

🔶 दम्पत्ती को ये बड़ा अजीब लगा और वे हिम्मत कर उसके पास पहुंचे, “तुम यहाँ इस वीराने में ये काम क्यों कर रहे हो ?”

🔷 युवक बोला, “ जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ काम पाने क लिए जाना है, और उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो, चूँकि मैंने पहले कभी खेतों में काम नहीं किया इसलिए कुछ दिनों से यहाँ आकार खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”

🔶 दम्पत्ती यह सुनकर काफी प्रभावित हुए और उसे काम मिल जाने का आशीर्वाद दिया।

🔷 मित्रो, किसी भी चीज में सफलता पाने के लिए तैयारी बहुत ज़रूरी है जिस लगन के साथ युवक ने खुद को खेतों में काम करने के लिए तैयार किया कुछ उसी तरह हमें भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

रविवार, 26 नवंबर 2017

👉 सब अपने की समान

🔷 एक दिन गुरु द्रोणाचार्य जी युधिष्ठिर से कहा कि एक दुर्जन खोजकर लाओ। वे दूर दूर तक घूमने गये पर उन्हें कोई दुर्जन न मिला। हर किसी में सज्जनता और ईश्वर की झाँकी उन्हें दिखाई देती रही। लौटकर आये तो उन्होंने असफलता स्वीकार करते हुए कहा- ‘मुझे कोई दुर्जन दिखाई नहीं पड़ता।

🔶 तब गुरुजी ने दुर्योधन को कहा कि- एक सज्जन खोजकर लाओ। वे भी दूर दूर तक गये पर हर किसी में उन्हें दुर्जनता और दुष्टता ही दिखाई दी। एक भी आदमी संसार में उन्हें भला न दीखा। वे भी लौटकर आये और गुरु के सामने सज्जन न ढूँढ़ सकने की अपनी असफलता स्वीकार कर ली।

🔷 इस संसार में दुर्जनों और सज्जनों की कमी नहीं। सभी तरह के मनुष्य मौजूद है पर जो व्यक्ति जैसा होता है उसे अपने समान ही सब दीखते है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 2)

🔶 दूसरे नम्बर की दौलत है हमारी ज्ञान की, विचार करने की शक्ति। हमें जो प्रसन्नता मिलती है इसी ज्ञान की शक्ति से मिलती है। खुशी दिमागी बैलेंस से प्राप्त होती है। यह बाहर से नहीं आती, भीतर से प्राप्त होती है। जब हमारा मस्तिष्क सन्तुलित होता है तो हर परिस्थिति में हमें चारों ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दिखाई देती है। घने बादल दिखाई देते हैं तो एक सोच सकता है कि कैसे काले मेघ आ रहे हैं। अब बरसेंगे। दूसरा सोचने वाला कह सकता है कि कितनी सुन्दर मेघमालाएँ चली आ रही हैं। यह है प्रकृति का सौन्दर्य।
               
🔷 हम गंगोत्री जा रहे थे। चारों ओर सुनसान, डरावना जंगल था। जरा-सी पत्तों की सरसराहट हो तो लगे कि साँप है। हवा चले, वृक्षों के बीच सीटी-सी बजे तो लगे कि भूत है। अच्छे-खासे मजबूत आदमी के नीरव-एकाकी वियावान में होश उड़ जाएँ, पर हमने उस नुकसान में भी प्रसन्नता का स्त्रोत ढूँढ़ लिया। ‘सुनसान के सहचर’ हमारी लिखी किताब आपने पढ़ी हो तो आपको पता लगेगा कि हर लम्हे को जिया जा सकता है, प्रकृति के साथ एकात्मता रखी जा सकती है। अब हम बार-बार याद करते हैं उस स्थान की जहाँ हमारे गुरु ने हमें पहले बुलाया था। अब तो हम कहीं जा भी नहीं पाते, पर प्रकृति के सान्निध्य में अवश्य रहते हैं। हमारे कमरे में आप चले जाइए। आपको सारी नेचर की, प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों की तस्वीरें वहाँ मिलेंगी, बादलों में, झील में, वृक्षों के झुरमुटों में, झरनों में से खुशी छलकती दिखाई देती है। वहाँ कोई देवी-देवता नहीं है, मात्र प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों की तस्वीरें हैं। हमें उन्हीं को देखकर अन्दर से बेइन्तिहा खुशी मिलती है।
  
🔶 जीवन का आनन्द सदैव भीतर से आता है। यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रिया-कलाप चल रहे हों, उन सभी में हमको खुशी ही खुशी बिखरी दिखाई पड़ेगी। बच्चे को देखकर, धर्मपत्नी को देखकर अन्दर से आनन्द आता है। सड़क पर चल रहे क्रिया-कलापों को देखकर आप आनन्द लेना सीख लें। यदि आपको सही विचारणा की शक्ति मिल जाए तो जो स्वर्ग आप चाहते हैं उस स्वर्ग के लिए मरने की जरूरत नहीं है, मैं आपको दिला सकता हूँ। स्वर्ग दृष्टिकोण में निहित है। इन आँखों से देखा जाता है। देखने को ‘दर्शन’ कहते हैं। दर्शन अर्थात् दृष्टि। दर्शन अर्थात् फिलॉसफी। जब हम किसी बात की गहराई में प्रवेश करते हैं, बारीकी मालूम करने का प्रयास करते हैं, तब इसे दृष्टि कहते हैं। यही दर्शन है। किसी बात को गहराई से समझने का माद्दा आ गया अर्थात् दर्शन वाली दृष्टि विकसित हो गई। आपने किताब देखी, पढ़ी पर उसमें क्या देखा? उसका दर्शन आपकी समझ में आया या नहीं। सही अर्थों में तभी आपने दृष्टि डाली, यह माना जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 26 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Nov 2017


शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

👉 संस्कार-

🔷 बेटा तुम्हारा इन्टरव्यू लैटर आया है। मां ने लिफाफा हाथ में देते हुए कहा। यह मेरा सातवां इन्टरव्यू था। मैं जल्दी से तैयार होकर दिए गए नियत समय 9:00 बजे पहुंच गया। एक घर में ही बनाए गए ऑफिस का गेट खुला ही पड़ा था मैंने बन्द किया भीतर गया।

🔶 सामने बने कमरे में जाने से पहले ही मुझे माँ की कही बात याद आ गई बेटा भीतर आने से पहले पांव झाड़ लिया करो। फुट मैट थोड़ा आगे खिसका हुआ था मैंने सही जगह पर रखा पांव पोंछे और भीतर गया।

🔷 एक रिसेप्शनिस्ट बैठी हुई थी अपना इंटरव्यू लेटर उसे दिखाया तो उसने सामने सोफे पर बैठकर इंतजार करने के लिए कहा। मैं सोफे पर बैठ गया, उसके तीनों कुशन अस्त व्यस्त पड़े थे आदत के अनुसार उन्हें ठीक किया, कमरे को सुंदर दिखाने के लिए खिड़की में कुछ गमलों में छोटे छोटे पौधे लगे हुए थे उन्हें देखने लगा एक गमला कुछ टेढ़ा रखा था, जो गिर भी सकता था माँ की व्यवस्थित रहने की आदत मुझे यहां भी आ याद आ गई, धीरे से उठा उस गमले को ठीक किया।

🔶 तभी रिसेप्शनिस्ट ने सीढ़ियों से ऊपर जाने का इशारा किया और कहा तीन नंबर कमरे में आपका इंटरव्यू है। मैं सीढ़ियां चढ़ने लगा देखा दिन में भी दोनों लाइट जल रही है ऊपर चढ़कर मैंने दोनों लाइट को बंद कर दिया तीन नंबर कमरे में गया।

🔷 वहां दो लोग बैठे थे उन्होंने मुझे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और पूछा तो आप कब ज्वाइन करेंगे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जी मैं कुछ समझा नहीं इंटरव्यू तो आप ने लिया ही नहीं।

🔶 इसमें समझने की क्या बात है हम पूछ रहे हैं कि आप कब ज्वाइन करेंगे ? वह तो आप जब कहेंगे मैं ज्वाइन कर लूंगा लेकिन आपने मेरा इंटरव्यू कब लिया वे दोनों सज्जन हंसने लगे।

🔷 उन्होंने बताया जब से तुम इस भवन में आए हो तब से तुम्हारा इंटरव्यू चल रहा है, यदि तुम दरवाजा बंद नहीं करते तो तुम्हारे 20 नंबर कम हो जाते हैं यदि तुम फुटमेट ठीक नहीं रखते और बिना पांव पौंछे आ जाते तो फिर 20 नंबर कम हो जाते, इसी तरह जब तुमने सोफे पर बैठकर उस पर रखे कुशन को व्यवस्थित किया उसके भी 20 नम्बर थे और गमले को जो तुमने ठीक किया वह भी तुम्हारे इंटरव्यू का हिस्सा था अंतिम प्रश्न के रूप में सीढ़ियों की दोनों लाइट जलाकर छोड़ी गई थी और तुमने बंद कर दी तब निश्चय हो गया कि तुम हर काम को व्यवस्थित तरीके से करते हो और इस जॉब के लिए सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार हो, बाहर रिसेप्शनिस्ट से अपना नियुक्ति पत्र ले लो और कल से काम पर लग जाओ।

🔶 मुझे रह रह कर माँ और बाबूजी की यह छोटी-छोटी सीखें जो उस समय बहुत बुरी लगती थी याद आ रही थी।

🔷 मैं जल्दी से घर गया मां के और बाऊजी के पांव छुए और अपने इस अनूठे इंटरव्यू का पूरा विवरण सुनाया।

🌹  इसीलिए कहते हैं कि व्यक्ति की प्रथम पाठशाला घर और प्रथम गुरु माता पिता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Nov 2017


👉 दुनिया के सारे धर्म हैं, गायत्री मंत्र में

🔶 जो धर्म प्रेम, मानवता और भाईचारे का सन्देश देने के लिए बना था, आज उसी के नाम पर हिंसा और कटुता बढ़ाई जा रही है। इसलिये आज एक ऐसे विश्व धर्म की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो दिलों को जोडऩे वाला हो। हर धर्म में ऐसी बातें और प्रार्थनाये हैं, जो सभी धर्मों को रिप्रजेंट करती हैं। हिन्दुओं में गायत्री मन्त्र के रुप में ऐसी ही प्रार्थना है, जो हर धर्म का सार हैं।

🔷 हिन्दू – ईश्वर प्राणाधार, दु:खनाशक तथा सुख स्वरुप है । हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें।

🔶 ईसाई – हे पिता! हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा। क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही हैं।

🔷 इस्लाम – हे अल्लाह! हम तेरी ही वन्दना करते हैं और तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए।

🔶 सिख – ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है, वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, निर्वैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है।

🔷 यहूदी – हे जेहोवा! (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा।

🔶 शिंतो – हे परमेश्वर! हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें। परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हो। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो।

🔷 पारसी – वह परम् गुरु! (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भण्डार के कारण, राजा के समान महान् है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।

🔶 दाओ! (ताओ) – "ब्रह्म" चिन्तन एवं पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उत्तम धर्म है।

🔷 जैन – अर्हन्तों को नमस्कार! सिद्धों को नमस्कार! आचार्यों को नमस्कार! उपाध्यायों को नमस्कार! और सब साधुओं को नमस्कार!

🔶 बौद्ध धर्म – मैं बुद्ध की शरण में हूँ! मैं धर्म की शरण में हूँ! मैं संघ की शरण में हूँ!

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Nov 2017

🔶 लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अर्ध्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं, पर यदि मिला तो अपनी इस देव प्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते हैं, पर अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।      

🔷 किसी को हमारा स्मारक बनाना हो तो वह वृक्षा लगाकर बनाया जा सकता है। वृक्षा जैसा उदार, सहिष्णु और शान्त जीवन जीने की शिक्षा हमने पाई। उन्हीं जैसा जीवनक्रम लोग अपना सकें तो बहुत है। हमारी प्रवृत्ति, जीवन विद्या और मनोभूमि का परिचय वृक्षों से अधिक और कोई नहीं दे सकता। अतएव वे ही हमोर स्मारक हो सकते हैं।

🔶 यह समय ऐसा है जैसा किसी-किसी सौभाग्यशाली के ही जीवन में आता है। कितने व्यक्ति किन्हीं महत्त्वपूर्ण अवसरों की तलाश में रहते हैं। उन्हें उच्च-स्तरीय प्रयोजनों में असाधारण भूमिका संपादित करने का सौभाग्य मिले और वे अपना जीवन धन्य बनावें। यह अवसर युग निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने मौजूद है। उन्हें इसका समुचित सदुपयोग करना चाहिए। इस समय की उपेक्षा उन्हें चिरकाल तक पश्चाताप की आग में जलाती रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! सज्जनो!!

🔶 इस संसार में कुल मिलाकर तीन शक्तियाँ हैं, तीन सिद्धियाँ हैं। इन्हीं पर हमारा सारा जीवन-व्यापार चल रहा है। लाभ सुख जो भी प्राप्त करते हैं, इन्हीं तीन शक्तियों के आधार पर हमें मिलते हैं। पहली शक्ति है श्रम की शक्ति, शरीर के भीतर की शक्ति भगवान् की दी हुई शक्ति। इससे हमें धन व यश मिलता है। जमीन पहले भी थी, अभी भी है। यह मनुष्य का श्रम है। जब वह लगा तो सोना, धातुएँ, अनाज उगलने लगी। जितना भी सफलताओं का इतिहास है, वह आदमी के श्रम की उपलब्धियों का इतिहास है। यही सांसारिक उन्नति का इतिहास है।
               
🔷 जमीन कभी ब्रह्माजी ने बनाई होगी तो ऐसी ही बनाई होगी जैसा कि चन्द्रमा है। यहाँ गड्ढा, वहाँ खड्डा, सब ओर यही। श्रम ने धरती को समतल बना दिया। नदियाँ चारों ओर उत्पात मचा देती थीं। जलप्लावन से प्रलय-सी आ जाती थी। रास्ते बन्द हो जाते थे। ब्याह-शादियाँ भी बन्द हो जाती थीं, उन चार महीनों में जिन्हें चातुर्मास कहा जाता है सुना होगा आपने नाम। आदमी जहाँ थे, वहीं कैद हो जाते थे। यह आदमी का श्रम है, आदमी की मशक्कत है कि आदमी ने पुल बनाए, नाव बनाई, बाँध बनाये। अब वह बन्धन नहीं रहा। सारी मानव जाति श्रम पर टिकी है। आदमी का श्रम, जिसकी हम अवज्ञा करते हैं। दौलत हमेशा आदमी के पसीने से निकलती है। आपको सम्पदा के लिए कहीं गिड़गिड़ाने, नाक रगड़ने की जरूरत नहीं है। एक ही देवता है—श्रम का देवता। वही देवता आपको दौलत दिला सकता है। उसी की आपको आराधना-उपासना करनी चाहिए।
  
🔶 माना कि आपके बाप ने कमाकर रख दिया है, पर बिना श्रम के उसकी रखवाली नहीं हो सकती। श्रम कमाता भी है, दौलत की रखवाली भी कर सकता है। हम श्रम का महत्त्व समझ सकें, उसे नियोजित कर सकें तो हम निहाल हो सकते हैं। मात्र सम्पत्तिवान-समृद्ध ही नहीं, हम अन्यान्य दौलत के भी अधिकारी हो सकते हैं। सेहत, मजबूती श्रम से ही आती है। शिक्षा, कला-कौशल शालीनता, लोक-व्यवहार में पारंगतता श्रम से ही प्राप्त होती है। बेईमानी से, चालाकी से आदमी दौलत की छीन-झपट मात्र कर सकता है, पर उसे कमा नहीं सकता। आप यदि फसल बोना चाह रहे हैं तो बीज बोइए। यदि चालाकी करें, बीज खा जाएँ तो कुछ नहीं होने वाला। हर आदमी को ईमानदारी से श्रम किए जाने की, मशक्कत की कीमत समझाइए। सम्पदा अभीष्ट हो, विनिमय करना चाहते हो तो कहिए श्रमरूपी पूँजी अपने पास रखें। उसका सही नियोजन करिए। यह है दौलत नम्बर एक।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Evolution –– The Inherent Urge of Life

🔶 Every living being has a natural urge to find its original source in a higher, evolved and enlightened state. This subliminal impulse of inner consciousness is what generates the natural cycle of progressive evolution of consciousness through ascending order of life forms. A seed grows into a tree which fructifies in the developed state and gives rise to its origin –– the seed.  A child’s inner desire is inclined towards becoming a fully grown up man.  The force of evolution in human life manifests as quest of human mind, through its curiosity to know and interact with its surroundings, with the systems, and mechanisms of his personal and social life, and its wonderstruck appreciation of the beauty and mystery of Nature.

🔷 The perception of Nature works like a mirror for the human mind. It tries to seek and visualize its evolved states in the ever-new expressions of Nature.  This is how it acquires knowledge and experience and endeavors for further progress.

🔶 Life in the unlimited expansion of the universe manifests itself in progressive and dynamic states of consciousness. Rigidity, backwardness, complacency and self-centeredness are against the laws of evolution. Evolution is a perpetually progressive manifestation of Divine Consciousness. The dimensions of the gradual evolution in human life are much wider and have their higher horizons rooted in the sublime realms of divine consciousness.  These emanate from the aspiration of the soul to awaken and unite with its Supreme Source.  Spiritual transmutation is a progressive evolution of consciousness towards this ultimate goal.   

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 158)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान, प्रगति पथ पर अग्रसर होने के रहस्य भरे तत्त्वज्ञान के अतिरिक्त इसी अवधि में भाषण, कला, सुगम-संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह-उद्योगों का सूत्र संचालन भी सम्मिलित रखा गया है ताकि उससे परोक्ष और प्रत्यक्ष लाभ अपने तथा दूसरों के लिए उपलब्ध किया जा सके।

🔶 अनुमान है कि अगले १४ वर्षों में एक लाख छात्रों के उपरोक्त प्रशिक्षण पर भारी व्यय होगा। प्रायः एक करोड़ भोजन व्यय में ही चला जाएगा। इमारत की नई रद्दोबदल, फर्नीचर, बिजली आदि के जो नए खर्च बढ़ेंगे, वे भी इससे कम न होंगे। आशा की गई है कि बिना याचना किए भारी खर्च को वहन कर अब तक निभा व्रत आगे भी निभता रहेगा और यह संकल्प भी पूरा होकर रहेगा। २५ लाख का इस उच्चस्तरीय शिक्षण में सम्मिलित होना तनिक भी कठिन नहीं, किन्तु फिर भी प्रतिभावानों को प्राथमिकता देने की जाँच-पड़ताल करनी पड़ी है और प्रवेशार्थियों से उनका सुविस्तृत परिचय पूछा गया है।

🔷 ३-एक लाख अशोक वृक्षों का वृक्षारोपणः वृक्षारोपण का महत्त्व सर्वविदित है। बादलों से वर्षा खींचना, भूमि-कटाव रोकना, भूमि की उर्वरता बढ़ाना, प्राणवायु का वितरण, प्रदूषण का अवशोषण, छाया, प्राणियों का आश्रय, इमारती लकड़ी, ईंधन आदि अनेकों लाभ वृक्षों के कारण इस धरती को प्राप्त होते हैं। धार्मिक और भौतिक दृष्टि से वृक्षारोपण को एक उच्चकोटि का पुण्य परमार्थ माना गया है।

🔶 वृक्षों में अशोक का अपना विशेष महत्त्व है, इसका गुणगान सम्राट अशोक जैसा किया जा सकता है। सीता को आश्रय अशोक वाटिका में ही मिला था। हनुमान जी ने भी उसी के पल्लवों में आश्रय लिया था। आयुर्वेद में यह महिला रोगों की अचूक औषधि कहा गया है। पुरुषों की बलिष्ठता और प्रखरता बढ़ाने की उसमें विशेष शक्ति है। साधना के लिए अशोक वन के नीचे रहा जा सकता है। शोभा तो उसकी असाधारण है ही। यदि अशोक के गुण सर्वसाधारण को समझाए जाएँ तो हर व्यक्ति का अशोक वाटिका बना सकना न सही पर घर-आँगन, अड़ोस-पड़ोस में उसके कुछ पेड़ तो लगाने और पोसने में समर्थ हो ही सकते हैं।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.181

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 अद्भुत सहनशीलता

🔷 बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान विश्वनाथ शास्त्री एक शास्त्रार्थ कर रहे थे। विरोधी पक्ष उनके प्रचण्ड वर्क और प्रमाणों के सामने लड़खड़ाने लगा और उसे अपनी हार होती दिखाई देने लगी।

🔶 विरोधियों ने शास्त्री जी को क्रोध दिलाकर झगड़ा खड़ा कर देने और शास्त्रार्थ को अंगर्णित रहने देने के लिए एक चाल चली। उनने सुँघनी तमाखू की एक मुठ्ठी शास्त्री जी ने मुँह पर फेंक मारी जिससे उन्हें बहुत छींक आई और परेशानी भी हुई।

🔷 शास्त्री जी बड़े धैर्यवान थे, उनने हाथ मुँह धोया। तमाखू का असर दूर किया और शान्त भाव से मुसकराते हुए कहा- हाँ, सज्जनों यह प्रसंग से बाहर की बात बीच में आ गई थी, अब आइए मूल विषय पर आवें और आगे का विचार विनिमय जारी रखो।

🔶 शास्त्री जी की इस अद्भुत सहनशीलता को देखकर विरोधी चकित रह गये। उनने अपनी हार स्वीकार कर ली।

🔷 मनुष्य का एक बहुत ही उच्चकोटि का गुण सहनशीलता है। जो दूसरों के द्वारा उत्तेजित किये जाने पर भी विक्षुब्ध नहीं होते और अपनी मनः स्थिति को संतुलित बनाये रखते हैं वस्तुतः वे ही महापुरुष है। ऐसे ही लोगों का विवेक निर्मल रहता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 भविष्य अज्ञात है...

🔷 मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?

🔶 उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वां बच्चियां हैं– छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।

🔷 मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा, जिसकी मर्जी से मौत होती है, जिसकी मर्जी से जीवन होता है! तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।

🔶 इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है। देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा? उसे जमीन पर फेंक दिया गया। एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा। यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था। उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए। इस आदमी को कुछ खाने- पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।

🔷 उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी- चिल्लायी। और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।

🔶 देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के कपड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों खुशियों कश्रो,नंंक्या घट रहा है!

🔷 जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा। एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे। लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए? देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा। तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।

🔶 भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर पर चाहिए। तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं। लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं…।

🔷 दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं। तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।

🔶 और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को पाल लिया। अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो
रहा है।

🔷 देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।

🔶 तुम अगर अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। छोड़ दो उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। तुम बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत करना।


🌹  टालस्टाय 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Nov 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Nov 2017

🔶 हम अपने परिजनों से लड़ते-झगड़ते भी रहते हैं और अधिक काम करने के लिए उन्हें भला-बुरा भी कहते रहते हैं, पर यह सब इस विश्वास के कारण ही करते हैं कि उनमें पूर्वजन्मों के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक संस्कार विद्यमान हैं, आज वे प्रसुप्त पड़े हैं, पर उन्हें झकझोरा जाय तो जगाया जा सकना असंभव नहीं। कटु प्रतीत होने वाली भाषा में और अप्रिय लगने वाले शब्दों में हम अक्सर परिजनों का अग्रगामी उद्बोधन करते रहते हैं। इस संदर्भ में रोष या तिरस्कार मन में नहीं रहता, वरन् आत्मीयता और अधिकार की भावना ही काम करती रहती है।     

🔷 आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की दिशा में जिनकी रुचि नहीं बढ़ी और लोकमंगल के लिए त्याग, बलिदान करने के लिए जिनमें कोई उत्साह पैदा नहीं हुआ मात्र पूजा-पाठ, तिलक-छापे और कर्मकाण्ड तक सीमित रह जाये ऐसे निर्जीव आध्यात्मिकता को देखते हैं तो इतना ही सोचते हैं बेचारा कुमार्गगामी कार्यों से बचकर इस गोरखधंधे में लग गया तो कुछ अच्छा ही है। अच्छाई का नाटक भी अच्छा, पर काम तो इतने मात्र से चलता नहीं। प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता तो वह है जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके।

🔶 हम चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक परिजन के अंतःकरण में लोकसेवा को मानव जीवन का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानने की निष्ठा जम जाये। उनमें इतना सत्साहस जाग पड़े कि वह थोड़ा श्रम और थोड़ा धन नियमित रूप से उस प्रयोजन के लिए लगाने का निश्चय करे और उस निश्चय को दृढ़ता एवं भावनापूर्वक निबाहें। यदि इतना हो जाता तो गायत्री परिवार के गठन के पीछे हमारे श्रम, त्याग और उमड़ते हुए भावों की सार्थकता प्रमाणित हो जाती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (अन्तिम भाग)

🔶 मित्रो! मैं कह रहा था दर्शन की बात। दर्शन जिसको जन्म देती है, वह है—मनीषा। मनीषा को हम ऋतम्भरा—प्रज्ञा कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम इसे गायत्री कह सकते हैं। श्रेष्ठ चिन्तन करने वाले के समूह का नाम है मनीषा। इस मनीषा का हम आह्वान करते हैं, उसकी पूजा करते हैं। मनीषा माँ है। माँ क्या करती है? माँ बच्चे के लिए समय-समय पर जरूरत की चीजें बनाकर खिलाती है, उसे छाती का दूध पिलाती है? हजम कर सके, ऐसी खुराक बनाकर देती है माँ। मनीषा वह है जो युग की आवश्यकताओं, समय की आवश्यकताओं, इनसान की आवश्यकताओं की तलाशती रहती है, समझती है व वैसी ही खुराक दर्शन की देती है, जिसकी जरूरत है। युग की मनीषा ध्यान रखती है कि आज के समय की जरूरत क्या है? पुराने समय का वह ढोल नहीं बजाती।
              
🔷 वह युग को समझती है, देश को समझती है और परिस्थितियों के अनुरूप युग को ढालने की कोशिश करती है, आस्थाओं से रहित हैवानी के गुलाम इनसान को आदमी बनाती है, उसे ऊँचा उठना सिखाती है व उसके घरों में स्वर्गीय परिस्थितियाँ पैदा करती हैं। ऐसी ही मनीषा का मैं आह्वान करता हूँ व कहता हूँ कि आप में से जो भी यह सेव कर सकें, वह स्वयं को धन्य बना लेगा, अपना जीवन सार्थक कर लेगा। आज बुद्धिवाद ही चारों ओर छाया है। ‘नो गॉड, नो सोल’ की बात कहता जमाना दीखता है। ये किसकी बात है? नास्तिकों की, वैज्ञानिकों की, बुद्धिवादों की। इन्होंने फिजाँ बिगाड़ी है? नहीं इनसे ज्यादा उन धार्मिकों ने, पण्डितों ने, बाबाजियों ने बिगाड़ी है जो उपदेश तो धर्म का देते हैं पर जीवनक्रम में उनके कहीं धर्म का राई-रत्ती भी नहीं है।
 
🔶 पुजारी की खुराफात देवी को सुना दें तो देवी शर्मिन्दा हो जाए। धर्म को व विज्ञान को सबको ठीक करना होगा मित्रो! और वह काम करेगी मनीषा। कुम्भ नहाइए बैकुण्ठ को जाइए, यह कौन-सा धर्म है? ऐसे धर्म को बदलना होगा व विज्ञान द्वारा दिग्भ्रान्त की जा रही पीढ़ी को भी मनीषा को ही मार्गदर्शन देना होगा। आपको युग की जरूरतें पूरी करनी चाहिए। आदमी के भीतर की आस्थाएँ कमजोर हो गई हैं, उन्हें ठीक करना चाहिए। आज की भाषा में बात कीजिए व लोगों का समाधान कीजिए। विज्ञान की भाषा में, नीति की, धर्म की, सदाचार की, आस्था की बात कीजिए व सबका मार्गदर्शन करिए। बताइए सबको कि आदर्शों ने सदैव जीवन में उतारने के बाद फायदा ही पहुँचाया है, नुकसान किसी का नहीं किया।

🔷 अब्राहम लिंकन ने बीच मेज पर खड़ा करके कहा था यह स्टो है। इसने अमेरिका के माथे पर लगा कलंक हटा दिया। आप क्या करना चाहते हैं? हम भारतीय संस्कृति को मेज पर खड़ा करके यह कहना चाहते हैं कि यह वह संस्कृति है जिसने दुनिया का कायाकल्प कर दिया। आज भी यह पूरी तरह से मार्गदर्शन देने में सक्षम है। मनीषी इसने ही पैदा किए। यदि मनीषी जाग जाएँ तो देश, समाज, संस्कृति सारे विश्व का कल्याण होगा। भगवान् करे, मनीषा जगे, जागे, जगाए व जमाना बदले। हमारा यह संकल्प है वह हम इसे करेंगे। आपको जुड़ने के लिए आमन्त्रित करते हैं। आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति।

🌹  समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Transformation of Ashok, Angulimal and Shraddhananda

🔶 The Divine blessing comes in the form of a motivation for following the noble path. The blessing manifests itself in the form of a radical transformation in a persons, nature, likings, and attitudes.

🔷 Emperor Ashok conquered the great kingdom of Kalinga at the cost of large scale violence. The success obtained through bloodshed and destruction did not give him peace of mind. Buddha's preaching transformed Ashok totally. From a blood-thirsty lusty king he became the messenger of love and peace and donated all his wealth for the mission of spreading the spiritual way of life.

🔶 Angulimal was a cruel dacoit, who used to rob people, cut off their fingers and wore garlands made of his victims' fingers. When Budha's divine love showered upon him, there was an amazing change. Angulimal became Buddha's disciple and devoted himself to the cause of spreading spirituality.

🔷 As a youth Swami Shraddhananda was following the dirty path of promiscuity. He was also addicted to gambling, alcohol and meat. He was a spoilt son of a police officer. One night he returned home very late from a prostitute and started vomiting. His wife was a very pious lady. She washed him, changed his clothes and put him to bed. When he woke up he asked her, "Did you have your dinner?" The pious wife replied, "As my husband I see the image of God in you. How can I eat without offering you dinner first?" This incident shook him from inside, that night he completely transformed and eventually became a great divine leader of the Arya Samaj.

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 157)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 युगसंधि सन् २००० तक है। अभी उसमें प्रायः १४ वर्ष हैं। हर साल इतने जन्मदिन भी मनाए जाते रहें तो १ लाख कार्यकर्ताओं के जन्मदिन १ लाख यज्ञों में होते रहेंगे। देखा-देखी इसका विस्तार होता चले, तो हर वर्ष कई लाख यज्ञ और कई करोड़ आहुतियाँ हो सकती हैं। इससे वायुमण्डल और वातावरण दोनों का ही संशोधन होगा, साथ ही जनमानस का परिष्कार करने वाली अनेकों सत्प्रवृत्तियाँ इन अवसरों पर लिए गए अंशदान, समयदान संकल्प के आधार पर सुविकसित होती चलेंगी।

🔶 २-एक लाख को संजीवनी विद्या का प्रशिक्षणः शान्तिकुञ्ज की नई व्यवस्था इस प्रकार की जानी है कि जिसमें ५०० आसानी से और १००० ठूँस-ठूँस कर नियमित रूप से शिक्षार्थियों का प्रशिक्षण होता रह सकता है। इस प्रशिक्षण में व्यक्ति का निखार, प्रतिभा का उभार, परिवार सुसंस्कारिता, समाज में सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन जैसे महत्त्वपूर्ण पाठ नियमित पढ़ाए जाएँगे। आशा की गई है कि इस स्वल्प अवधि में भी जो पाठ्यक्रम हृदयंगम कराया जाएगा, जो प्राण-प्रेरणा भरी जाएगी वह प्रायः ऐसी होगी जिसे साधना का, तत्त्वज्ञान का सार कह सकते हैं। आशा की जानी चाहिए कि इस संजीवनी विद्या को जो साथ लेकर वापिस लौटेंगे, वे अपना काया-कल्प अनुभव करेंगे और साथ ही ऐसी लोक नेतृत्त्व क्षमता सम्पादित करेंगे, जो हर क्षेत्र में हर कदम पर सफलता प्रदान कर सके। यह प्रशिक्षित कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में पाँच सूत्री योजना का संचालन एवं प्रशिक्षण करेंगे।

🔷 मिशन की पत्रिकाओं के पाठक तो ग्राहकों की तुलना में पाँच गुने अधिक हैं। पत्रिका न्यूनतम पाँच व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है। इसी प्रकार प्रज्ञा परिवार की संख्या प्रायः २४-२५ लाख हो जाती है। इनमें नर-नारी शिक्षित वर्ग के हैं। सभी को इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है। २५ पीछे एक विद्यार्थी मिले तो उनकी संख्या एक लाख हो जाती है। युग संधि की अवधि में इतने शिक्षार्थी विशेष रूप से लाभ उठा चुके होंगे। इन्हें मात्र स्कूली विद्यार्थी नहीं माना जाना चाहिए, वरन् जिस उच्चस्तरीय ज्ञान को सीखकर वे लौटेंगे उससे यह आशा कि जा सकती है कि उनका व्यक्तित्व महामानव स्तर का युग नेतृत्त्व की प्रतिभा से भरा-पूरा होगा।

🔶 वह शिक्षण मई १९८६ से आरम्भ हुआ है। उसकी विशेषता यह है कि शिक्षार्थियों के लिए निवास, प्रशिक्षण की तरह भोजन भी निःशुल्क है। इस मद में स्वेच्छा से कोई कुछ दे तो अस्वीकार भी नहीं किया जाता, पर गरीब-अमीर का भेद करने वाली शुल्क परिपाटी को इस प्रशिक्षण में प्रवेश नहीं करने दिया गया है। अभिभावक और अध्यापक की दुहरी भूमिका प्राचीनकाल के विद्यालय निभाया करते थे, इस प्रयोग को भी उसी प्राचीन विद्यालय प्रणाली का पुनर्जीवन कहा जा सकता है।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.180

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

👉 दुर्भावनाओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव

🔷 अस्वस्थ मन वाले व्यक्ति का शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। जिसका मन चिन्ता, भय, शोक, क्रोध, द्वेष, घृणा आदि से भरा रहता है उसके वे अवयव विकृत होने लगते है जिनके ऊपर स्वास्थ्य की आधार शिला रखी हुई है। हृदय, आमाशय, जिगर, आँतें, गुर्दे तथा मस्तिष्क पर मानसिक अस्वस्थता का सीधा असर पड़ता है। निष्क्रियता आती है उनके कार्य की गति मंद हो जाती है, अन्न पाचन एवं शोधन, जीवन कोषों का पोषण ठीक प्रकार न होने से शिथिलता का साम्राज्य छा जाता है।

🔶 पोषण के अभाव से सारा शरीर निस्तेज और थका मादा सा रहने लगता है। जो विकार और विष शरीर में हर घड़ी पैदा होते रहते है, उनकी सफाई ठीक प्रकार न होने से वे भीतर ही जमा होने लगते है। इनकी मात्रा बढ़ने से रक्त में, माँस पेशियों में और नाडियों में विष जमा होने लगता है जो अवसर पाकर नाना प्रकार के रोगों के रूप में फूटता रहता है। ऐसे लोग आये दिन किसी न किसी बीमारी से पीड़ित रहते देखे जाते है। एक रोग अच्छा नहीं होता कि दूसरा नया खड़ा होता है।

🔷 दुश्चिंताऐं जीवन शक्ति को खा जाती है। शरीर के अंदर एक विद्युत शक्ति काम करती है, उसी की मात्रा पर विभिन्न अवयवों की स्फूर्ति एवं सक्रियता निर्भर रहती है। इस विद्युत शक्ति का जितना ह्रास मानसिक उद्वेगों से होता है उतना और किसी कारण से नहीं होता। पन्द्रह दिन लंघन में जितनी जितनी शक्ति नष्ट होती है उससे कही अधिक हानि एक दिन के क्रोध या चिन्ता के कारण हो जाती है।

🔶 जिसका मन किसी न किसी कारण परेशान बना रहता है, जिसे अप्रसन्नता, आशंका तथा निराशा घेरे रहती है उसका शरीर इन्हीं अग्नियों से भीतर ही भीतर घुलकर खोखला होता रहेगा। चिन्ता को चिन्ता की उपमा दी गई है वह अकारण नहीं है। वह एक तथ्य है। चिन्तित रहने वाला व्यक्ति घुल घुलकर अपनी जीवन लीला को समय से बहुत पूर्व ही समाप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 156)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 एक-एक लाख की पाँच शृंखलाएँ सँजोने का संकेत हुआ। उसका तात्पर्य है कली से कमल बनने की तरह खिल पड़ना। अब हमें इस जन्म की पूर्णाहुति में पाँच हव्य सम्मिलित करने पड़ेंगे, वे इस प्रकार हैं:

🔶 १. एक लाख कुण्डों का गायत्री यज्ञ। २. एक लाख युग सृजेताओं को उभारना तथा शक्तिशाली प्रशिक्षण करना। ३. एक लाख वृक्षों का आरोपण। ४. एक लाख ग्रामतीर्थों की स्थापना। ५. एक लाख वर्ष का समयदान-संचय।

🔷 यों पाँचों कार्य एक से एक कठिन प्रतीत होते हैं और सामान्य मनुष्य की शक्ति से बाहर, किंतु वस्तुतः ऐसा है नहीं। वे सम्भव भी हैं और सरल भी। आश्चर्य इतना भर है कि देखने वाले उसे अद्भुत और अनुपम कहने लगें।

🔶 १-एक लाख गायत्री यज्ञः वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों में से प्रत्येक को अपना जन्मदिवसोत्सव अपने आँगन में मनाना होगा। उसमें एक छोटी चौकोर वेदी बनाकर गायत्री मंत्र की १०८ आहुतियाँ तो देनी ही होंगी। इसके साथ ही समयदान-अंशदान की प्रतिज्ञा को निबाहते रहने की शपथ भी लेनी होगी। अभ्यास में समाए हुए दुर्गुणों में से कम से कम एक को छोड़ना और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए न्यूनतम एक कदम उठाना होगा। इस प्रकार अंशदान से झोला पुस्तकालय चलने लगेगा और शिक्षितों को युग साहित्य पढ़ने तथा अशिक्षितों को सुनाने की विधि-व्यवस्था चल पड़ेगी। अपनी कमाई का एक अंश परमार्थ प्रयोजनों में लगाते रहने से वे सभी प्रायः चल पड़ेंगे, जिनके लिये प्रज्ञा मिशन द्वारा सभी प्रज्ञा-संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

🔷 हर गायत्री यज्ञ के साथ ज्ञानयज्ञ जुड़ा हुआ है। कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र, पड़ोसी आदि को अधिक संख्या में इस अवसर पर बुलाना चाहिए और ज्ञानयज्ञ के रूप में सुगम संगीत के अनुरूप प्रवचन करने की व्यवस्था बनानी चाहिए। यज्ञवेदी का मण्डप सूझ-बूझ और उपलब्ध सामग्री से सजाया जा सकता है। वेदी को लीपा-पोता जाए और चौक पूर कर सजाया जाए, तो वह देखने में सहज आकर्षक बन जाती है। मंत्रोच्चार सभी मिल जुलकर करें। हवन सामग्री के रूप में यदि सुगंधित द्रव्य मिलाए जा सकें तो गुड़ और घी से छोटे बेर जैसी गोली बनाई जा सकती है। १०८ गोलियों में १०८ आहुतियाँ हो जाती हैं। इससे सब घर का वातावरण एवं वायुमण्डल शुद्ध होता है। एक स्थान पर १ लाख गुणा १०८ लगभग एक करोड़ आहुतियों का यज्ञ हो जाएगा। यह न्यूनतम है। इससे अधिक हो सके, तो संख्या २४० तक बढ़ाई जा सकती है। आतिथ्य में कुछ खर्च करने की मनाही है। इसलिए हर गरीब-अमीर के लिए यह सुलभ है। महत्त्व को देखते हुए वह छोटी सी प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण सत्परिणाम उत्पन्न करने में समर्थ हो सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.178

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 6)

🔶 उन्होंने लोगों के समक्ष कसौटी रखी कि यदि आज के विचार, रीति-रिवाज, क्रिया-कलाप, गतिविधियाँ सही साबित हों तो स्वीकार कीजिए, नहीं तो मना कीजिए। लोगों ने इनकार करना शुरू कर दिया—यह नहीं हो सकता। हमारे बाप-दादा किया करते थे तो हम क्या करें? इनकारी का नशा इस कदर चढ़ता चला गया कि सारी बातें वाहियात ठहराई जाने लगीं। यज्ञों के नाम पर जानवर काटे जाते थे, अश्वमेध के नाम पर घोड़े को मारकर हवन होता था। जो भी अनर्थ होता था वह इनकार किया जाने लगा। बुद्ध ने कहा कि यदि भगवान् कहते हैं कि ऐसा गलत काम करना चाहिए तो ऐसे भगवान् को भी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने वेदों को मानने से इनकार कर दिया, जिनका अनर्थ निकाला जाने लगा था और कहा—बुद्धं शरणं गच्छामि। बुद्ध को क्या कहेंगे? दार्शनिक-मनीषी। बाबाजी नहीं, मनीषी।
              
🔷 मनीषी इनसान की समस्याओं का समाधान देते हैं, व्यक्ति तैयार करते हैं, समाज बनाते हैं। सुकरात को तैयार करने वाले का नाम अरस्तू है और शिवाजी को तैयार करने वाले का नाम समर्थ गुरु रामदास है। चन्द्रगुप्त को तैयार करने वाले का नाम चाणक्य है और विवेकानन्द को तैयार करने वाले हैं रामकृष्ण परमहंस। ये कौन हैं? अरे भाई, ये मनीषी हैं। मनीषी विचार नहीं, दर्शन देते हैं, दर्शन जीकर दिखाते हैं और अनेक का जीवन बना देते हैं। आप कहेंगे दर्शन तो बद्रीनाथ का, जगन्नाथ का, सोमनाथ का किया जाता है। किराया खर्च करके जो दर्शन आप करते हैं, वह दर्शन नहीं है। दर्शन वह है, जो जमीला ने किया। जमीला ने सारी जिन्दगी भर पैसे जमा किए थे और कहती थी मैं काबा जाऊँगी और दर्शन करूँगी। जाने के वक्त पड़ गया अकाल। पानी न पड़ने से, अनाज न होने से लोग भूखों मरने लगे।
 
🔶 जमीला ने कहा मैं काबा हज करने जाने वाली थी। अब हज नहीं जाऊँगी। बच्चे भूख मर रहे हैं। इनके खाने का, दूध का, पानी का इन्तजाम किया जाए ताकि वे जिन्दा रखे जा सकें और उसने काबा जाने से इनकार कर दिया। मेरे पास कुछ है ही नहीं मैं कैसे जाऊँगी? इसे कहते हैं दर्शन, फिलॉसफी। देखने के अर्थ में नहीं फिलॉसफी के अर्थ में। बाद में खुदाबन्द करीम के यहाँ मीटिंग हुई तो यह तय किया गया कि हज किसका कबूल किया जाए। सारे फरिश्तों की मीटिंग में तय हुआ कि सिर्फ एक आदमी ने इस साल हज खुलकर किया। खुदाबन्द ने उसका नाम बताया—जमीला। फरिश्तों ने अपने रजिस्टर दिखाए व कहा कि वह तो गई ही नहीं। खुदाबन्द ने समझाया— देखने के लिए न गई तो न सही, लेकिन उसने काबा के ईमान को, प्रेरणा को समझा और हज करके जो अन्तरंग में बिठाया जाना चाहिए था, वह यहीं बैठकर लिया। शेष सब झक मारते रहे। इसलिए सबका नामंजूर। जमीला का कबूल।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Rain of Gems Caused Disaster

🔶 Lord Buddha was once beseeched by a young Brahmin who wanted to learn some Tantric ritual. Buddha taught him a secret Tantric method which if used on one particular date, could cause rain of gems. However, Buddha always thought he should have tested the maturity of the Brahmin before disclosing the secret.

🔷 One night Buddha was crossing a dense forest with that Brahmin. They were attacked by a gang of robbers who tied the Brahmin to a tree and told Buddha to get the ransom money to free his disciple. Buddha remembered that the next day was the auspicious date to use the Tantric method. Before departing, He whispered into the Brahmin's ears, "Son, Do not misuse the Tantric secret. I will surely return with ransom and set you free."

🔶 But next day, the Brahmin did not heed Buddha's warning and invoked Tantra. Gems rained from the sky. The robbers collected the gems, set him free and went away. On their way another gang of robbers attacked them, took all the gems and came to know about the Brahmin who could cause gems to rain from the sky. They caught the Brahmin again and ordered him to repeat the feat. But, the Brahmin told them that the method worked only on a particular day that arrived once in a year and expressed his inability to repeat the feat.

🔷 The greedy robbers did not believe him. They were extremely furious and killed the Brahmin. They then fought among themselves over the gems and killed each other as well. Buddha came back the next day. His apprehension had turned out to be horribly true. Seeing the ghastly scene Buddha said to himself, "Bestowing Divine blessings, without testing the worthiness is always disastrous."

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Nov 2017

🔶 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।    

🔷 तू सूर्य और चन्द्र को अपने पास नहीं उतार सका इसका कारण उनकी दूरी नहीं, तेरी दूरी की भावना है। तू संसार को बदल नहीं पाया इसका कारण संसार की अपरिवर्तनशीलता नहीं, वरन् तेरे प्रयासों की शिथिलता है। जब तू यह कहता है कि मैं अपने में परिवर्तन नहीं कर सकता, तो इसे स्थिति और विवशता कहकर न टाल, साफ-साफ अपनी कायरता और अकर्मण्यता कह; क्योंकि इच्छा की प्रबलता ही कार्य की सिद्धि है।

🔶 शान्तिकुञ्ज अनौचित्य की नींव हिला देने वाला एक क्रान्तिकारी विश्वविद्यालय है। यहाँ से इक्कीसवीं सदी का विशालकाय आन्दोलन प्रकट होकर ऐसा चमत्कार करेगा कि उसके आँचल में भारत ही नहीं समूचे विश्व को आश्रय मिलेगा।

🔷 आत्मा का यथार्थ ज्ञान संपादन करना प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म, अचल, शुद्ध और सच्चिदानन्द रूप है। जो मनुष्य यथार्थ ज्ञान दृष्टि से आत्मा को नहीं जानता, किन्तु भ्रम व अज्ञानवश होकर उसको कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुखी, स्थूल, कृश, अमुक का पिता, अमुक का पुत्र, अमुक की स्त्री, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इत्यादि भिन्न भिन्न प्रकार का समझना है, वह बड़ा अपराधी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 23 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Nov 2017


👉 जीवन का रहस्य

🔷 एक झेन फकीर हुआ, रिंझाई। वह एक गांव के रास्ते से गुजरता था। एक आदमी पीछे से आया, उसे लकड़ी से चोट की और भाग गया। लेकिन चोट करने में उसके हाथ से लकड़ी छूट गई और जमीन पर नीचे गिर गई। रिंझाई लकड़ी उठाकर पीछे दौड़ा कि मेरे भाई, अपनी लकड़ी तो लेते जाओ। पास एक दुकान के मालिक ने कहा, पागल हो गए हो? वह आदमी तुम्हें लकड़ी मारकर गया और तुम उसकी लकड़ी लौटाने की चिंता कर रहे हो! रिंझाई ने कहा, एक दिन में एक वृक्ष के नीचे लेटा हुआ था। वृक्ष से एक शाखा मेरे ऊपर गिर पड़ी। तब मैंने वृक्ष को कुछ भी नहीं कहा। आज इस आदमी के हाथ से लकड़ी मेरे ऊपर गिर पड़ी है, मैं इस आदमी को क्यों कुछ कहूं! नहीं समझा वह दुकानदार। उसने कहा, पागल हो! वृक्ष से शाखा का गिरना और बात है। इस आदमी से लकड़ी तुम्हारे ऊपर गिरना वही बात नहीं है।

🔶 रिंझाई कहने लगा, एक बार मैं नाव खे रहा था। एक खाली नाव आकर मेरी नाव से टकरा गई। मैंने कुछ भी न कहा। और एक बार ऐसा हुआ कि मैं किसी और के साथ नाव में बैठा था। और एक नाव, जिसमें कोई आदमी सवार था और चलाता था, आकर टकरा गई। तो वह जो नाव चला रहा था मेरी, वह गालियां बकने लगा। मैंने उससे कहा, अगर नाव खाली होती, तब तुम गाली बकते या न बकते? तो उस आदमी ने कहा, खाली नाव को क्यों गाली बकता! रिंझाई ने कहा, गौर से देखो, नाव भी एक हिस्सा है इस विराट की लीला का। वह आदमी जो बैठा है, वह भी एक हिस्सा है। नाव को माफ कर देते हो, आदमी पर इतने कठोर क्यों हो? शायद वह दुकानदार फिर भी नहीं समझा होगा। हममें से कोई भी नहीं समझ पाता है।

🔷 एक आदमी क्रोध से भर जाता है और किसी को लकड़ी मार देता है। इस मारने में प्रकृति के गुण ही काम कर रहे हैं। एक आदमी शराब पीए होता है और आपको गाली दे देता है, तब आप बुरा नहीं मानते; अदालत भी माफ कर सकती है उसे, क्योंकि वह शराब पीए था। लेकिन अगर एक आदमी शराब पीए, तो हम माफ कर देते हैं, और एक आदमी के शरीर में क्रोध के समय ऐड्रीनल नामक ग्रंथि से विष छूट जाता है, तब हम उसे माफ नहीं करते।

🔶 जब एक आदमी क्रोध में होता है, तो होता क्या है? उसके खून में विष छूट जाता है। उसके भीतर की ग्रंथियों से रस—स्राव हो जाता है। वह आदमी उसी हालत में आ जाता है, जैसा शराबी आता है। फर्क इतना ही है, शराबी ऊपर से शराब लेता है, इस आदमी को भीतर से शराब आ जाती है। अब जिस आदमी के खून में जहर छूट गया है, अगर वह घूंसा बांधकर मारने को टूट पड़ता है, तो इसमें इस आदमी पर नाराज होने की बात क्या है! यह इस आदमी के भीतर जो घटित हो रहा है प्रकृति का गुण, उसका परिणाम है।

🔷 जो आदमी जीवन के इस रहस्य को समझ लेता है, वह आदमी अनासक्त हो जाता है।

बुधवार, 22 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 5)

🔶 जब मैं शिलांग, डिब्रूगढ़ की तरफ अपने मिशन के लिए दौरा कर रहा था तो मेरी इच्छा हुई कि नागालैण्ड जाऊँ। नागा कैसे होते हैं? जरा देखकर आऊँ। हमारे कार्यकर्ता साथ चले, बोले हम दुभाषिए का काम करेंगे। उनकी जीप में बैठकर मैं नागालैण्ड चला गया। उन लोगों के बीच जो रेलगाड़ी पलट देते थे, तीर-कमानों से जिन्होंने सेना की नाक में दम कर रखा था। नागाओं के एक गाँव में जाकर एक चबूतरे पर मेरे मित्रों ने बिठा दिया व नागाओं से उनकी भाषा में कहा, ये हमारे गुरुजी हैं, महात्मा हैं, आशीर्वाद देते हैं। किसी का कोई दुःख हो तो इनसे कह लीजिए। ये नहीं कहा कि ये विद्वान हैं, कोई मिशन चलाते हैं। बस यही कहा कि कोई मनोकामना हो तो इनसे कहिए। कोई पचास-सौ नागा वहाँ बैठे थे। एक ने दूसरे से कहा, दूसरे ने तीसरे से कहा। सब ने आपस में पूछताछ कर ली व कहा कि हमारा तो कोई दुःख नहीं है, रोटी मिल जाती है। सोने के लिए फूस के मकान हैं, पहनने के लिए लोमड़ी के खाल है, मौज करते हैं। हमें दुःख काहे का।
             
🔷 एक-दूसरे की ओर देखा तो बुड्ढा नागा उठा व दुभाषिए से बोला कि इन स्वामी जी से पूछिए कि इनको कोई दुःख तो नहीं है। हमसे बोले, ‘‘हमें तो कोई परेशानी नहीं किन्तु आप भूखे हों तो हमारे यहाँ चावल हैं, भूखे नहीं जाएँ हमारे दरवाजे से। पहनने के कपड़े न हों तो खालें ले जाएँ। हमारा अपना कोई कष्ट नहीं। हम तो प्रसन्न हैं। स्वामीजी को कोई दुःख हो तो हम दूर कर देंं।’’ मैं समझ गया आदमी का दर्शन यह है। नागाओं ने नागालैण्ड बना लिया। क्या वजह हो सकती है? यह उस बिरादरी का दर्शन है। जो कुछ हमारे पास है, उससे खुशी की जिन्दगी जिएँगे। उसे देखकर के खाएँगे। मस्ती का जीवन जिएँगे। यह दर्शन है। कौमें, बिरादरियाँ, समय और जातियाँ हमेशा दर्शन के आधार पर उठी हैं। यह दर्शन पैदा करना मनीषा का काम है। दर्शन को बनाने वाली माँ का नाम है ‘मनीषा’। मनीषा कैसी होती है? मनीषा ऐसी होती है जैसी कि बुद्ध के भीतर से पैदा हुई थी।
 
🔶 बुद्ध ने जमाने को देखा था। बड़ा वाहियात जमाना, बड़ा फूहड़ जमाना। माँस, मदिरा, मद्य, मुद्रा, मैथुन—ये पाँच चीजें ही उस समय जीवन का आधार बनी हुई थीं। यही उस समय का धर्म था। जो आज के समय का वाममार्ग है, वही उस समय का दर्शन ऐसी परिस्थितियों में एक बुद्ध नाम का आदमी उठ खड़ा हुआ। बुद्ध किसे कहते हैं? बुद्ध विचारशीलता का, भावनाशीलता का प्रतीक है। लोगों को दिशा देने वाले को बुद्ध कहते हैं। कथावाचक, धर्मोपदेशक उस जमाने में भी थे लेकिन मनीषी के रूप में अकेले बुद्ध सामने आए। उन्होंने लोगों से कहा, ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’—बुद्धि की, विवेक की, समझदारी की पकड़ में आ जाओ। क्यों और कैसे के सवाल पूछो।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Who Shapes the Course of Human Ascent?

🔶 Uncountable waves of lives emerge out of and submerge back into the eternal ocean of Nature. The March of Life records none of these into its incessant flow. Rare are those divine souls, whose lives engrave immortal imprints in the glorious chapters of human history.  Few years of their life-spans stand as beacons of light, faith and inspiration in the annals of humanity.

🔷 Ethics of humanity teach us that –– “an altruistic life of a poor man is far more blissful and liberated than that of a mighty king”; and “sacrificing self interest is always superior to oppressing others.”  Though these ethical values have been preached throughout the ages, only a few have lived them. It is the inner strength of such great characters, which has upheld the edifice of morality age after age.

🔶 Talent, skill, perseverance, wisdom, charisma and courage are necessary for nurturing aplomb and self-esteem. Leading others too cannot be effective and inspiring without inculcation in oneself the requisite virtues and attributes. Those devoid of such potentials cannot vaunt of altruist renunciation. Dullness and lethargy cannot masquerade as austerity, contentment and peace. How can the glow of moral eminence shine in the darkness of ignorance and inactivity? Great are those who, despite being endowed with brilliant talents, courage and strength, do not waste their precious efforts in the pursuit of egoistic aims. Their sagacity and potentials are creatively used towards the welfare and evolution of humanity.

🔷 Ideals must not be compromised to suit the weakness of our wavering minds, nor can they be put on as mere masks. The peaks of immortal glory cannot be conquered without traversing through the Everest of perennially uplifting values.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Nov 2017

🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।     

🔷 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 22 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Nov 2017

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...