बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 26)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 समाज में स्वस्थ परम्परा कायम रहें, उसी से अपनी और सबकी सुविधा बनी रहेगी। यह ध्यान में रखते हुए हम में से प्रत्येक को अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करने में भावनापूर्वक दत्तचित्त होना चाहिए। समाज सबका है। सब लोग थोड़ा-थोड़ा बिगाड़ करें तो सब मिलाकर बिगाड़ की मात्रा बहुत बड़ी हो जाएगी, किंतु यदि थोड़े-थोड़े प्रयत्न सुधार भी बहुत हो सकता है। उचित यही है कि हम सब मिलकर अपने समाज को सुधारने, संचालित करने और स्वस्थ परम्पराएँ प्रचलित करने का प्रयत्न करें और सभ्य, सुविकसित लोगों की तरह भौतिक एवं आत्मिक प्रगति कर सुख-संतोष प्राप्त कर सकें।

🔵 दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा और स्वतंत्रता को स्वेच्छापूर्वक सीमित करना, सभ्य देश के सभ्य नागरिकों का कर्तव्य है। स्वच्छता को ही लीजिए, कहीं भी नाक, थूक साफ करना, पान-तम्बाकू की पीक डाल देना, अपने लिए कुछ दूर जाने का कष्ट भले ही बचाए, पर दूसरों को घृणा, असुविधा होगी और यदि अपने को कोई रोग है तो उसका आक्रमण उस गंदगी में आने-जाने वाले पर होगा। भले ही कोई रोके नहीं, पर हमारा नागरिक कर्तव्य है कि दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए स्वयं उस गंदगी को डालने के योग्य उपयुक्त स्थान तक जाकर उसे साफ करें।

🔴 बीड़ी-सिगरेट हम पीते हैं तो ध्यान रखें कि अस्वच्छ धुँआ छोड़ने से पास में बैठे हुए दूसरे लोगों की तबियत खराब तो नहीं होती, स्वयं ही पता लगाएँ कि किसी को असुविधा तो नहीं होती। यदि हमारी उस क्रिया से दूसरों को तकलीफ होती है, तो सभ्यता का तकाजा यही है कि कहीं अन्यत्र जाकर बीड़ी पिए और धुँआ छोड़ें। सबसे आग्रह यह है कि इस बुरी आदत को छोड़ ही दें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.38

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 122)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 ८. अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की शोध के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना। इसमें यज्ञ विज्ञान एवं गायत्री महाशक्ति का उच्चस्तरीय अनुसंधान चलता है। इसी उपक्रम को आगे बढ़ाकर जड़ी-बूटी विज्ञान की चरक कालीन प्रक्रिया का अभिनव अनुसंधान हाथ में लिया गया है। इसके साथ ही खगोल विद्या की टूटी हुई कड़ियों को नए सिरे से जोड़ा जा रहा है।

🔴 ९. देश के कोने-कोने में २४०० निजी इमारत वाली प्रज्ञा पीठ और बिना इमारत वाले ७५०० प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना करके नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की युगांतरीय चेतना को व्यापक बनाने का सफल प्रयत्न। इस प्रयास को ७४ देशों के प्रवासी भारतीयों में भी विस्तृत किया गया है।

🔵 १०. देश की समस्त भाषाओं तथा संस्कृतियों के अध्ययन, अध्यापन का एक अभिनव केंद्र स्थापित किया गया है ताकि हर वर्ग के लोगों तक नवयुग की विचारधारा को पहुँचाया जा सके। प्रचारक हर क्षेत्र में पहुँच सकें। अभी तो जन-जागरण के प्रचारक जत्थे जीप, गाड़ियों के माध्यम से हिंदी, गुजराती, उड़िया, मराठी क्षेत्रों में ही जाते हैं। अब वे देश के कोने-कोने में पहुँचेंगे और पवित्रता एवं एकात्मता की जड़ें मजबूत करेंगे।
  
🔴 ११-प्रचार तंत्र अब तक टैप रिकार्डरों और स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से ही चलता रहा है। अब उसमें वीडियो फिल्म निर्माण की एक कड़ी और जोड़ी जा रही है।
  
🔵 १२. प्रज्ञा अभियान की विचारधारा को फोल्डर योजना के माध्यम से देश की सभी भाषाओं में प्रसारित किया जा रहा है ताकि कोई कोना ऐसा न बचे, जहाँ नव चेतना का वातावरण न बने।

🔴 १३. प्रज्ञा पुराण के पाँच खण्डों का प्रकाशन हर भाषा में तथा उसके टैप प्रवचनों का निर्माण। इस आधार पर नवीनतम समस्याओं का पुरातन कथा आधार पर समाधान का प्रयास।

🔵 १४. प्रतिदिन शान्तिकुञ्ज के भोजनालय में शिक्षार्थियों, अतिथियों और तीर्थयात्रियों की संख्या प्रायः एक हजार रहती है। किसी से कोई मूल्य नहीं माँगा जाता। सभी भावश्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करके ही जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 विश्वासघात से प्राण जाना अच्छा।

🔴 महाराणा प्रताप के सदस्यों में एक बड़ा पराक्रमी योद्धा रघुपति सिंह था। वह छिपकर छापे मारने में बड़ा कुशल था। अकबर उससे बड़ा परेशान रहता। उसे पकड़ने के लिए एक बड़े इनाम की घोषणा की हुई थी।

🔵 एक बार रघुपति सिंह का लड़का बीमार पड़ा। वह उसे देखने के लिए वेष बदल कर घर को चला। चित्तौड़ के सभी दरवाजों पर पहरेदार बैठे थे। घर पहुँचने का कोई रास्ता न था। आखिर उसने पकड़े जाने का खतरा उठा कर भी मरणासन्न लड़के का मुँह देखने की ठानी। रघुपति सिंह ने एक पहरेदार के पास जाकर कहा-मेरा नाम रघुपति सिंह है। मैं अपने मरणासन्न बेटे को देखने आया हूँ। इस समय तुम मुझे पकड़ो मत, मैं घर जाकर वापिस तुम्हारे पास आ जाऊँगा तब तुम गिरफ्तार कर लेना। पहरेदार उसकी सच्चाई से बड़ा प्रभावित हुआ। उसने घर जाने की इजाजत दे दी। अपने वचनानुसार रघुपति सिंह लौटा और उसी पहरेदार के पास आकर अपने को गिरफ्तार करा दिया।

🔴 पहरेदार उसे अकबर के पास ले गया। जिस खूँखार योद्धा को पकड़ने के लिए इतने दिन से इतने प्रयत्न हो रहे थे और इतना इनाम घोषित था उसे हाथ पकड़कर एक साधारण पहरेदार लिए आ रहा है और वह चुपचाप चला आ रहा है, इस दृश्य को देखकर अकबर स्तब्ध रह गये। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। उन्होंने पहरेदार से इस अनहोनी बात का कारण पूछा तो उसने सच-सच सब बात कह सुनाई।

अकबर ने पूछा-तुम जब घर चले गये थे तो फिर छिपकर क्यों न भाग गये। पहरेदार के पास आकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाली?

🔴 रघुपति सिंह ने कहा-राजपूत अपने वचन पर दृढ़ रहते हैं, वे किसी के साथ विश्वासघात करने की अपेक्षा मरना अधिक अच्छा समझते हैं।

🔵 विश्वासघात मनुष्य का सबसे बड़ा अपराध है। सच्चे लोग कितनी ही बड़ी यहाँ तक कि प्राणों की हानि उठाकर भी शत्रु तक के साथ विश्वासघात नहीं करते।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १३

🌹  प्रेम एक महान शक्ति

🔵 प्रेम ही एक ऐसी महान शक्ति है जो प्रत्येक दिशा में जीवन को आगे बढ़ाने में सहायक होती है। बिना प्रेम के किसी के विचारों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। विचार तर्क- वितर्क की सृष्टि नहीं है। विचारणा तथा विश्वास बहुकाल के सत्संग से बनते हैं। अधिक समय की संगति का ही परिणाम प्रेम है। इसलिए विचार धारणा अथवा विश्वास प्रेम का विषय है।

🔴 यदि हम दूसरों पर विजय प्राप्त करके उनको अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं, उनके दृष्टिकोण को बदलकर अपनी बात मनवाना चाहते हैं, तो प्रेम का सहारा लेना चाहिए। तर्क और बुद्धि हमें आगे नहीं बढ़ा सकते हैं। विश्वास रखिए कि आपकी प्रेम और सहानुभूति सभी बातों को सुनने के लिए दुनियाँ विवश होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 13

🌹  Love, a Great Power

🔵 Love is a kind of power that can further any aspect of your life. It is impossible to bring about a change in anyone's thinking without love. Healthy mindsets are rarely ever formed through reasoning and arguments. Healthy mindsets as well as trust are developed through prolonged good company. The result of this prolonged good company is love. Therefore, a healthy mindset and trust are both the results of love.

🔴 We must use love to change others' outlook and way of thinking. Logic and intelligent arguments are not sufficient. If what you have to say is full of love and sympathy, the world will be willing to follow you.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 July

🔴 विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं। पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शक्ति अनन्त है। वे एक प्रकार के चुम्बक हैं जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस रक्त का उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमताएं उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं। पराक्रम के प्रवाह को दिशाधारा उसी से मिलती है।

🔵 सज्जनता का माहात्म्य बताना और धर्म की दुहाई देना सरल है। उसने वक्ता को धर्मोपदेश कहलाने का अवसर मिलता है और श्रोता भक्त जन समझे जाते हैं। यह सब सरल है। वाचाल और मूढ़मति इन दोनों कार्यों को सरलतापूर्वक करते और सस्ती वाहवाही लूटते रहते हैं। कठिन कार्य है अनीति का विरोध करना और अवाँछनीयता से जूझना। ऐसे जुझारू शूरवीर यदि उत्पन्न न हों तो समझना चाहिए अधर्म और अनाचार अपने स्थान पर यथावत बना रहेगा। उसे हटाने और मिटाने का कोई सुयोग न बनेगा। प्रतिरोध के अभाव में अनाचार के हौसले बढ़ते हैं और वह चौगुनी सौगुनी गति से बढ़कर उन लोगों को भी चपेट में लेता है जो मुँह न खोलने के कारण अपने को सुरक्षित समझते थे और सोचते थे कि हम किसी को नहीं छेड़ते तो हमें कोई क्यों छेड़ेगा?
                                               
🔴 अनाचारों का आक्रमण उन्हीं पर होता है जो सज्जनता की आड़ में अपनी कायरता को छिपाये बैठे रहते हैं। बहेलिये चिड़ियों और मछलियों को ही जाल में समेटते हैं। जलाशयों में रहने वाले घड़ियालों और जंगलों में घूमते चीतों से उन्हें भी डर लगता है। कीड़े-मकोड़ों को लोग पैरों तले कुचलते हैं पर साँप बिच्छुओं से उन्हें भी बच कर चलना पड़ता है। बर्र के छत्ते में हाथ कौन डालता है? अनीति करना बुरी बात है पर उसे सहन करते रहना उससे भी बुरा। जीत की सम्भावना न हो तो पिसते रहने की अपेक्षा विद्रोह पर उतारू होकर मर मिटना कहीं श्रेष्ठ है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 2)

🔴 नारी घर की नियन्त्री है। वह सब तरह से घर का नियंत्रण करती है। घर के सब कामों की देख−रेख संचालन, व्यवस्था, उत्तरदायित्व उसी पर है। “गृहणी गृह मुच्यते” कहकर हमारे पूर्वजों ने इसीलिए उसका सम्मान किया है।

🔵 नारी अन्नपूर्णा है। घर में वह सभी को आवश्यक खाद्य पदार्थों से तृप्त करती है। पति से लेकर सास-ससुर, घर के अन्य सभी सदस्यों को समान रूप से तृप्त करती है। इतना ही नहीं अतिथि, गृह-पालित पशु से लेकर पड़ौस के कुत्ते तक को भी समान स्नेह, प्रेम, वात्सल्य के साथ भोजन देकर तृप्त करती है। इसीलिए उसे अन्नपूर्णा कहा गया है।

🔴 नारी निर्मात्री है। गृहकार्य, गृह व्यवस्था के साथ-साथ सत्सन्तति का निर्माण भी नारी ही करती है। बालक को जन्म देने से लेकर उसका विधिवत पालन-पोषण, शिक्षा, प्रेरणा द्वारा बच्चों को महान् बनाने का उत्तरदायित्व नारी पर ही हैं। इसीलिए उसे बालक की प्रथम आचार्य बताया गया है।

🔵 इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी का मानव समाज में बहुत बड़ा स्थान है, वैसे भी नारी जाति मानव समाज का आधा अंग है। जिसकी स्थिति से सम्पूर्ण समाज प्रभावित होता है। किसी मनुष्य के शरीर का अर्द्धांग असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो या उसे लकवा मार जाय तो सम्पूर्ण शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। इसी तरह नारी जाति की उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का प्रभाव मानव समाज पर पड़ता है। नारी की गति स्थिति पद-पद पर मानव जीवन को प्रभावित करती है।

🔴 आजकल हमारे गृहस्थ और सामाजिक जीवन में व्याप्त विषमता, कठिनाई, अशान्ति, क्लेश, दुराचार आदि का स्त्रियों पर भी कुछ कम उत्तरदायित्व नहीं है। पारिवारिक जीवन में फैली हुई बुराइयाँ, अशाँति, कलह, दाम्पत्य जीवन की शुष्कता और नीरसता तथा उलझनपूर्ण संघर्षों में नारी का भी बहुत बड़ा हाथ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (अंतिम भाग)

🔴 कैसे मित्र बनें? आप हमारा सहयोग कीजिए, हम आपका सहयोग करेंगे। अन्धे और पंगे का उदाहरण पेश कीजिए। अन्धे को आँख से दिखाई नहीं पड़ता था और पंगा चल नहीं सकता था। दोनों ने आपस में मित्रता बना ली और मित्रता बना करके एक नदी पार कर ली, आपने सुना होगा, हमारे और हमारे गुरुदेव के बारे में यही हुआ। हमारे गुरुदेव पंगे हैं; क्योंकि जिस सीमा में वह काम करते हैं, वहाँ से दौड़-धूप करना उनके लिए मुमकिन नहीं और हम अन्धे हैं। हमारे पास न ज्ञान है, न विचार है। हम दोनों ने आपस का तालमेल बिठा लिया है और तालमेल बिठा करके अन्धे और पंगे की तरह नदी पार करने का फैसला कर लिया है। आप भी ऐसा ही कर लीजिए। 

🔵 आप शान्तिकुञ्ज के साथ वही रिश्ता बना लीजिए, जो रिश्ता अन्धे और पंगे का है। आप ज्ञान के अभाव में, विचारों के अभाव में भटकने वाले हैं और हम पंगे हैं। हम सारे संसार में किस तरीके से काम करेंगे? हम और आप दोनों ही मिलें, तो मजा आ जाए। आप पीछे के लिए क्या छोड़ जाएँगे, मुझे मालूम नहीं। दौलत नहीं छोड़ पाये, तो हर्ज नहीं है; लेकिन आप ऐसी चीज छोड़कर चले जाएँ, जिससे आपकी औलाद यह कहती रहे कि हम ऐसे शानदार आदमी की सन्तान हैं। आप शानदार के लिए पीछे वालों के लिए ऐसा रास्ता छोड़कर जाइए, जिस पर चलने वाले दूसरे लोग सराहते रहें कि हमको कोई रास्ता बता गया था, किसी ने हमको रास्ता दिखाया था, जिस पर हम चले और चलने के बाद में अपनी नाव को पार कर लिया और दूसरों की नाव को पार लगा दिया। आप ऐसा रास्ता अपनाइए। नई जिन्दगी जीइए, नया चिन्तन ग्रहण कीजिए, नया दृष्टिकोण अपनाइए, नई हिम्मत से काम लीजिए और नया जीवन जीने की तैयारी करके यहाँ से विदा होइए। बस, हमारी बात समाप्त।

॥ॐ शान्ति:॥

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १२

🌹  दूसरों पर निर्भर न रहो

🔵 जिस दिन तुम्हें अपने हाथ- पैर और दिल पर भरोसा हो जावेगा, उसी दिन तुम्हारी अंतरात्मा कहेगी कि बाधाओं को कुचल कर तू अकेला चल अकेला।

🔴 जिन व्यक्तियों पर तुमने आशा के विशाल महल बना रखे हैं वे कल्पना के व्योम में विहार करने के समान हैं। अस्थिर सारहीन खोखले हैं। अपनी आशा को दूसरों में संश्लिष्ट कर देना स्वयं अपनी मौलिकता का हृास कर अपने साहस को पंगु कर देना है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता पर जीवन यात्रा करता है वह शीघ्र अकेला रह जाता है।

🔵 दूसरो को अपने जीवन का संचालक बना देना ऐसा ही है जैसा अपनी नौका को ऐसे प्रवाह में डाल देना जिसके अंत का आपको कोई ज्ञान नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य



👉 Lose Not Your Heart Day 12

🌹  Do not Depend on Others

🔵 The day you develop faith in the strength of your own hands, feet, and heart, your soul will tell you to go forth alone.

🔴 Keeping high expectations of others is like building castles in the air: unreal and worthless. Pinning your hopes on others cripples your own originality and courage. The person who centers his life around another person becomes alone very quickly.

🔵 Putting your life in another person's hands is like setting sail without knowing where you are going.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 July 2017


👉 Lose Not Your Heart Day 12

🌹  Do not Depend on Others

🔵 The day you develop faith in the strength of your own hands, feet, and heart, your soul will tell you to go forth alone.

🔴 Keeping high expectations of others is like building castles in the air: unreal and worthless. Pinning your hopes on others cripples your own originality and courage. The person who centers his life around another person becomes alone very quickly.

🔵 Putting your life in another person's hands is like setting sail without knowing where you are going.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 25)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 नियंत्रण में रहना आवश्यक है। मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे। अपने उत्तरदायित्वों को समझे और कर्तव्यों को निबाहें। नीति, सदाचार और धन का पालन करते हुए सीमित लाभ में संतोष करना पड़ सकता है। गरीबी और सादगी का जीवन बिताना पड़ सकता है, पर उसमें चैन अधिक है। अनीति अपनाकर अधिक धन एकत्रित कर लेना संभव है, पर ऐसा धन अपने साथ इतने उपद्रव लेकर आता है कि उनसे निपटना भारी त्रासदायक सिद्ध होता है।

🔵 दंभ और अहंकार का प्रदर्शन करके लोगों के ऊपर जो रौब जमाया जाता है, उससे आतंक और कौतूहल हो सकता है, पर श्रद्धा और प्रतिष्ठा का दर्शन भी दुर्लभ रहेगा। विलासिता और वासना का अनुपयुक्त भोग भोगने वाला अपना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन नष्ट करके खोखला ही बनता जाता है। परलोक और पुनर्जन्म को अंधकारमय बनाकर आत्मा को असंतुष्ट और परमात्मा को अप्रसन्न रखकर क्षणिक सूखों के लिए अनीति का मार्ग अपनाना, किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं कहा जा सकता।

🔴  बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म, कर्तव्य पालन का महत्त्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शांतिपूर्वक जिएँ और दूसरों को सुखपूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति अपनाने से ही संभव हो सकता है। कर्तव्य और धर्म का अंकुश परमात्मा ने हमारे ऊपर इसीलिए रखा है कि सन्मार्ग में भटकें नहीं। इन नियंत्रणों को तोड़ने की चेष्टा करना अपने और दूसरों के लिए महती विपत्तियों को आमंत्रित करने की मूर्खता करना ही गिना जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.37

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 Lose Not Your Heart Day 11

🌹  Walk Alone
🔵 Great men go far on their paths because they walk alone. Their inspiration comes from within. They alone spur their happiness and remove their sadness and they are helped along only by their own ideas.

🔴 Loneliness is an undeniable truth. To be afraid of it, feel inferior because of it, or lose sight of your duties because of it is the greatest sin. What you believe to be loneliness is actually a kind of solitude, given to you to develop your own inner strength. When you depend on yourself, you are better able to realize your full potential.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2017


सोमवार, 10 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 10

🌹  Look for the Treasure Within Yourself

🔵 Keep your mind engaged in useful tasks; do not let it go idle. Take life seriously. The task of spiritual growth is before you, and time is very short. If you are led astray by your own negligence, you alone will have to pay the price.

🔴 Patience and hope will enable you to face any situation. Stand on your own feet and challenge the entire world if you need to, but you should only be satisfied after attaining your highest goals. When others look outside for worldly treasure, look inside for the treasure within yourself.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 July 2017


रविवार, 9 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 9

🌹  Courtesy, Simplicity, Empathy, Compassion

🔵 It is your responsibility to cultivate courtesy, simplicity, empathy, and compassion. Before looking for and criticizing faults in others,
address the glaring flaws in yourself. If you are unable to control your speech, use it against yourself instead of others.

🔴 First, discipline yourself. Without discipline, you cannot experience your true nature. Courtesy, simplicity, empathy, and compassion are all manifestations of this true nature.

🔵 Disregard how others treat you and stay focused on your own growth. If you can grasp this, you have understood a great secret.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 24)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 आत्म प्रताडऩा सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है। जिसका मन अपने दुष्कर्मों के लिए अपने आपको धिक्कारता रहेगा, वह कभी आंतरिक दृष्टि से सशक्त न रह सकेगा। उसे अनेक मानसिक दोष दुर्गुण घेरेंगे और धीरे-धीरे अनेक मनोविकारों से ग्रस्त हो जाएगा।

🔵 मर्यादाओं का उल्लंघन करके लोग तात्कालिक थोड़ा लाभ उठाते देखे जाते हैं। दूरगामी परिणामों को न सोचकर लोग तुरंत के लाभ को देखते हैं। बेईमानी से धन कमाने, दंभ से अहंकार बढ़ाने और अनुपयुक्त भोगों के भोगने से जो क्षणिक सुख मिलता है, वह परिणाम में भारी विपत्ति बनकर सामने आता है। मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालने और आध्यात्मिक महत्ता एवं विशेषताओं को समाप्त करने में सबसे बड़ा कारण आत्म प्रताडऩा है। ओले पड़ने से जिस प्रकार फसल नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार आत्म प्रताडऩा की चोटें पड़ते रहने से मन और अंतःकरण के सभी श्रेष्ठ तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसा मनुष्य प्रेत-पिशाचों जैसी श्मशान मनोभूमि लेकर निरंतर विक्षुब्ध विचरता रहता है।

🔴 धर्म कर्तव्यों की मर्यादा को तोड़ने वाले उच्छृंखल, कुमार्गगामी मनुष्यों को गतिविधियों को रोकने के लिए, उन्हें दंड देने के लिए समाज और शासन की ओर से जो प्रतिरोधात्मक व्यवस्था हुई है, उससे सर्वथा बचे रहना संभव नहीं। धूर्तता के बल पर आज कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के लोग सामाजिक भर्त्सना से और कानून दंड से बच निकलने में सफल होते रहते हैं, पर यही चाल सदा सफल होती रहेगी, ऐसी बात नहीं है। असत्य का आवरण अंततः छँटना ही है। जन-मानस में व्याप्त घृणा का सूक्ष्म प्रभाव उस मनुष्य पर अदृश्य रूप से पड़ता है। जिसके अहित परिणाम ही सामने आते हैं।

🔵 राजदंड से बचे रहने के लिए ऐसे लोग रिश्वत में बहुत खर्च करते हैं, निरंतर डरे और दबे रहते हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं रहता। जो लोग उनसे लाभ उठाते हैं, वे भी भीतर ही भीतर घृणा करते हैं और समय आने पर शत्रु बन जाते हैं। जिनकी आत्मा धिक्कारेगी उनके लिए देर-सबेर में सभी कोई धिक्कारने वाले बन जाएँगे। ऐसी धिक्कार एकत्रित करके यदि मनुष्य जीवित रहा हो उसका जीवन न जीने के बराबर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.36

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

शनिवार, 8 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 8

🌹 Introspect

🔵 Whatever happens, let it happen. Whatever is said about you, let it be said. You should consider these things as illusory as a mirage. If you have really detached yourself from the world, then why should such things affect you? Focus on inspecting yourself thoroughly for weaknesses. Only then can you begin the process of growth.

🔴 Take advantage of every moment and every opportunity. Your path is very long, and time is very short. Concentrate your inner strength on reaching your goal.

🔵 Do not despair in any situation. Have faith not in the capacity of man, but in the capacity of God. God will show you the right path.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 July 2017


👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 23)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 अनियंत्रित मनुष्य कितना घातक हो सकता है, इसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। जिन असुरों, दानवों, दस्युओं, दुरात्माओं के कुकृत्यों से मानव सभ्यता कलंकित होती रहे है, वे शक्ल-सूरत से तो मनुष्य ही थे, पर उन्होंने स्वेच्छाचार अपनाया, मर्यादाओं को तोड़ा, न धर्म का विचार किया, न कर्तव्य का। शक्तियों के मद में जो कुछ उन्हें सूझा, जिसमें लाभ दिखाई दिया, वही करते रहे, फलस्वरूप उनका जीवन सब प्रकार घृणित और निकृष्ट बना रहा। उनके द्वारा असंख्यों का उत्पीड़न होता रहा। असुरता का अर्थ ही उच्छृंखलता है।

🔵 मर्यादाओं का उल्लंघन करने की घटनाएँ, दुर्घटनाएँ कहलाती हैं और उनके फलस्वरूप सर्वत्र विक्षोभ भी उत्पन्न होता है। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी सभी अपनी नियत कक्षा और धुरी पर घूमते हैं, एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति में बँधे रहते हैं और एक नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखते हैं। यदि वे नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखें, तो उसका परिणाम प्रलय ही हो सकता है। यदि ग्रह मार्ग में भटक जाएँगे तो एक दूसरे से टकराकर विनाश की प्रक्रिया उत्पन्न कर देंगे। मनुष्य भी जब अपने कर्तव्य मार्ग से भटकता है तो अपना ही नहीं, दूसरे अनेकों का नाश भी करता है।

🔴  परमात्मा ने हर मनुष्य की अंतरात्मा में एक मार्गदर्शन चेतना की प्रतिष्ठा की है, जो उसे हर उचित कर्म करने की प्रेरणा एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती हैं। सदाचरण कर्तव्यपालन के कार्य, धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव होता है। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अंतरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चाताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा। भीतर ही भीतर अशान्ति रहेगी और ऐसा लगेगा मानो अपना अंतरात्मा ही अपने को धिक्कार रहा है। इस आत्म प्रताडऩा की पीड़ा को भुलाने के लिए अपराधी प्रवृत्ति के लोग नशेबाजी का सहारा लेते हैं। फिर भी चैन कहाँ, पाप वृत्तियाँ जलती हुई अग्नि की तरह हैं। जो पहले वहीं जलन पैदा करती है जहाँ उसे स्थान मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुपूर्णिमा पर्व पर - मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं- मोक्षमूलं गुरुकृपा

🔵 संत कबीर कहते है कि गुरु गोविन्द दोनों खड़े है। मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूं? अंततः गुरु की बलिहारी लेते है कि है गुरुवर! यदि आप न होते तो मुझे गोविन्द की परमतत्त्व की ईश्वरत्व की प्राप्ति न हुई होती गुरु का महत्व इतना अधिक बताया गया है हमारे साँस्कृतिक वाङ्मय में बिना उसका स्मरण किये हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता। गुरुतत्त्व को जानने मानने उस पर अपनी श्रद्धा और अधिक गहरी जमाते हुए अपना अंतरंग न्यौछावर करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा व्यास पूर्णिमा।

🔴 गुरु वस्तुतः शिष्य को गढ़ता है एक कुम्भकार की तरह। इस कार्य में उसे कहीं चोट भी लगानी पड़ती है कुसंस्कारों का निष्कासन भी करना पड़ता है तथा कहीं अपने हाथों की थपथपाहट से उसे प्यारा का पोषण देकर उसमें सुसंस्कारों का प्रवेश भी वह कराता है। यह वस्तुतः एक नये व्यक्तित्व को गढ़ने की प्रक्रिया का नाम है। संत कबीर ने इसलिए गुरु को कुम्हार कहते हुये शिष्य को कुम्भ बताया है। मटका बनाने के लिये कुम्भकार को अंदर हाथ लगाकर बाहर से चोट लगानी पड़ती है कि कहीं कोई कमी तो रह नहीं गयी। छोटी-सी कमी मटके में कमजोरी उसके टूटने का कारण बन सकती है।

🔵 गुरु ही एक ऐसी प्राणी है जिससे शिष्य के आत्मिक सम्बन्धी की सम्भावनायें बनती है प्रगाढ़ होती चली जाती है। शेष पारिवारिक सामाजिक प्राणियों से शारीरिक मानसिक-भावनात्मक सम्बन्ध तो होते है आध्यात्मिक स्तर का उच्चस्तरीय प्रेम तो मात्र गुरु से ही होता है। गुरु अर्थात् मानवीय चेतना का मर्मज्ञ मनुष्य में उलट फेर कर सकने में उसका प्रारब्ध तक बदल सकने में समर्थ एक सर्वज्ञ। सभी साधक गुरु नहीं बन सकते। कुछ ही बन पाते व जिन्हें वे मिल जाते है, वे निहाल हो जाते है।

🔴 रामकृष्ण कहते थे सामान्य गुरु कान फूँकते है जब कि अवतारों पुरुष श्रेष्ठ महापुरुष सतगुरु-प्राण फूँकते है। उनका स्पर्श, दृष्टि व कृपा ही पर्याप्त हैं। ऐसे गुरु जब आते है तब अनेकों विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द, गुरु विरजानन्द, संत एकनाथ, गुरु जनार्दन नाथ, पंत निवृत्ति नाथ, गुरु गहिनी नाथ, योगी अनिर्वाण, गुरु स्वामी निगमानन्द, आद्य शंकराचार्य, गुरु गोविन्दपाद कीनाराम, गुरु कालूराम तैलंग स्वामी, गुरु भगीरथ स्वामी, महाप्रभु चैतन्य, गुरु ईश्वरपुरी जैसी महानात्माएं विनिर्मित हो जाती है। अंदर से गुरु का हृदय प्रेम से लबालब होता है बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हों। बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हो। उसके हाथ में तो हथौड़ा है जो अहंकार को चकनाचूर कर डालता है ताकि एक नया व्यक्ति विनिर्मित हो।

🔵 गुरु का अर्थ है सोयों में जगा हुआ व्यक्ति, अंधों में आँख वाला व्यक्ति अंधों में आँख वाला व्यक्ति। गुरु का अर्थ है वहाँ अब सब कुछ मिट गया है मात्र परमात्मा ही परमात्मा है वहाँ बस! ऐसे क्षणों में जब हमें परमात्मा बहुत दूर मालूम पड़ता है, सद्गुरु ही उपयोगी हो सकता है क्योंकि वह हमारे जैसा है

🔴 मनुष्य जैसा है हाड़ माँस मज्जा का है फिर भी हमसे कुछ ज्यादा ही है। जो हमने नहीं जाना उसने जाना है। हम कल क्या होने वाले है, उसकी उसे खबर है। वह हमारा भविष्य है, हमारी समस्त सम्भावनाओं का द्वार है। गुरु एक झरोखा है, जिससे दूरस्थ परमात्मा रूपी आकाश को हम देख सकते है।

🔵 वे अत्यन्त सौभाग्यशाली कहे जाते है जिन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। जो दर्शन नहीं कर पाए पर उनके शक्ति प्रवाह से जुड़ गये व अपने व्यक्तित्व में अध्यात्म चेतना के अवतरित होने की पृष्ठभूमि बनाते रहे, वे भी सौभाग्यशाली तो है ही जो गुरु की विचार चेतना से जुड़े गया वह उनके अनुदानों का अधिकारी बन गया। शर्त केवल एक ही है पात्रता का सतत् अभिवर्धन तथा गहनतम श्रद्धा का गुरु के आदर्शों पर आरोपण। जो इतना कुछ अंशों में भी कर लेता है वह उनका उतने ही अंशों में उत्तराधिकारी बनता चला जाता है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी दोनों ही आज हमारे बीच स्थूल शरीर से नहीं है किन्तु ऋषियुग्म रूपी गुरुसत्ता की सूक्ष्म व कारण शक्ति का प्रवाह यथावत् और भी प्रखर रूप में हम सबके बीच विद्यमान है। आवश्यकता है सही रूप में उनसे जुड़ने की। यों दीक्षित तो ढेरों उनसे जुड़ने की। ये दीक्षित तो ढेरों उनसे हो सकते हैं किन्तु दीक्षा का मूल अर्थ अपनी इच्छा उन्हें दी अपना अहं समर्पित कर स्वयं को खाली किया ऐसा जीवन में उतारने वाले कुछ सौ या हजार ही हो सकते हैं। ये ही सच्चे अर्थों में उनके शिष्य कहे जा सकते हैं। अनुदान के पात्र भी ये ही हो सकते हैं।

🔴 जिसने परमपूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्ष के तथा परमवंदनीय माताजी के सत्तर वर्ष के जीवन के थोड़े से भी हिस्से को देखा है तो उन्हें वहाँ अगाध स्नेह की गंगोत्री बहती मिली है। इतना प्यार इस सीमा तक स्नेह जितना कि सगी माँ भी पुत्र को नहीं दे सकती, गुरुवर ने व मातृ सत्ता ने अपनी पापी से पापी संतान से भी किया। जिसने उनकी इस प्रेम धार में बहकर उनके ज्ञानरूपी नौका में बैठने भर की हिम्मत कर ली, वह तर गया। जो डर गया। जो नहीं देख पाये उस दिव्य गुरुसत्ता को वह उनकी वसीयत और विरासत और धरोहर से उस प्राण ऊर्जा को पाते है। पूज्यवर ने जो कुछ भी लिखकर रख दिया एवं प्रवचनों में कह गये वह एक प्रकार से शक्तिपात का एक माध्यम बन गया। ऋतम्भरा प्रज्ञा का दूरदर्शी विवेकशीलता का जागरण जो परिजनों के मन में उनके सत्साहित्य के पठन मनन उनकी चर्चा से लीला प्रसंगों के श्रवण से हुआ वह शक्तिपात नहीं तो और क्या हैं।

🔵 लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों के जीवन की दिशाधारा को आमूलचूल बदल देने का कार्य कभी -कभी इस धरती पर सम्भवामि युगे-युगे कहकर आने वाली सत्ता ही करती है। वह कार्य इस युग में भी ऋषि युग्म की कारण सत्ता द्वारा सम्पन्न हो रहा है यह देखा व अनुभव किया जा सकता है। असंभव को भी संभव कर दिखाना महाकाल के स्तर की सत्ता की ही बात है। समय को पहचानना व सद्गुरु की पहचान कर उनसे अनन्य भाव से जुड़ जाना ही इस समय की सबसे बड़ी समझदारी है यह तथ्य भली-भाँति हृदयंगम कर लिया जाना चाहिये।

🔴 गायत्री परिवार-युगनिर्माण अनेकों को जलाता रहा है तो उसका भी एक ही कारण है वह है उसकी निष्ठा प्रामाणिकता तथा अविरल बहती स्नेह की धार। गुरुपर्व इसी गुरुता को स्मरण रखने का पर्व है। यदि गुरुसत्ता के जीवन में आ जाय तो हमारा जीवन धन्य बन जाय। शिष्यत्व सार्थक हो जाय।

🔵 श्रद्धा की परिपक्वता समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनन्त सम्भावनाओं के द्वार खोल देती है। शास्त्र पुस्तकें तो जानकारी भर देते है किन्तु पूज्यवर जैसी गुरुसत्ता स्वयं में जीवन्त शास्त्र होते है। उनकी एक झलक भर देख कर अपने जीवन में उतारने जीवन में उतारने का प्रयास ही शिष्य का सही अर्थों में गुरुवरण है। गुरुवरण का गुरु से एकत्व की अनुभूति का अर्थ है परमात्मा से एकात्मता। गुरु देह नहीं है सत्ता है शक्ति का पुँज है। देह जाने पर भी क्रियाशीलता यथावत् बरकरार रहती है, वस्तुतः वह बहुगुणित हो सक्रियता के परिणाम में और अधिक व्यापक हो जाती है।

🔴 हमें विश्वास रखना चाहिये कि गुरुसत्ता देह से हमारे बीच न हो हमारा वह सूक्ष्म कारण रूप में सतत् मार्गदर्शन करेगी। हम गुरुतत्त्व को नित्य जीवन में धारण करते रहने का अपना कर्तव्य पूरा करते रहें तो शेष कार्य वह स्वतः कर लेगी।

🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1995

👉 गुरु वन्दना

एक तुम्हीं आधार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार॥

   
जब तक मिलो न तुम जीवन में।
शान्ति कहाँ मिल सकती मन में॥
खोज फिरा संसार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥१॥

    कैसा भी हो तैरन हारा।
    मिले न जब तक शरण-सहारा॥
    हो न सका उस पार सद्गुरु॥
    एक तुम्हीं आधार  सद्गुरु॥२॥

हे प्रभु तुम्हीं विविध रूपों में।
हमें बचाते भव कूपों से॥
ऐसे परम उदार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥३॥

    हम आये हैं द्वार तुम्हारे।
    अब उद्धार करो दुःखहारे॥
    सुन लो दास पुकार सद्गुरु॥
    एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥४॥

छा जाता जग में अंधियारा।
तब पाने प्रकाश की धारा॥
आते तेरे द्वार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥५॥

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 8 July 2017


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 7

🌹 Look to Yourself for Guidance

🔵 One who knows himself to be part of God neither blames failure on others nor attributes success to himself. He does not become blinded by his own power and fail to see the real situation. Be as cautious of your own ego as you would of a rabid dog. Avoid attachment to your achievements as you would avoid a poisonous snake, and avoid people who will mock you for this. Direct every effort of your mind and heart towards God.

🔴 Depending on others for your happiness ultimately leads to helplessness and misery. Look within yourself for direction and not to others. Your true nature will help you become determined, and this determination will help you each your goal.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 7 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 July 2017


गुरुवार, 6 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 6

🌹 Surrender Yourself

🔵 You must be prepared to face hardships in your life. You may be predisposed to feel that you cannot face them, but where you find doubt, tiredness, and despair in yourself, you will also find immense strength. Finish your work wholeheartedly and step aside. Let the results come to you in due course of time.

🔴 Work to your full potential. Do not get discouraged by any situation. The only actions you can control are your own, not those of others. Do not criticize others, and do not hold any expectations of them. There is no need to be afraid; everything will turn out for the best. Do & note despair. You are standing on firm ground.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 आज का सद्चिंतन 6 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 July 2017


बुधवार, 5 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 5

🌹 Keep Smiling, Keep Laughing

🔵 Wake up! Do not rest until you have achieved your goal. If you regard gossip and ill-will as trivial and refuse to acknowledge them, hostility will not increase. For such things, silence is the best response. True happiness comes from focusing on one's duty rather than on shortcomings in others.

🔴 Life is full of ups and downs, but we must always remain cheerful. What good is a face that cannot smile or laugh? Do not be irritated by, criticism from others, and you will retain your mental equilibrium.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 July 2017


मंगलवार, 4 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 4

🌹 Make Your Life an Offering

🔵 To make your life an offering, make sure that you comply with the following:

•    See every person as worthy of kindness.
•    Utilize your time with honesty and discipline.
•    Work for the welfare of others.
•    Limit your speech to worthy causes.
•    Accept only that which you have honestly earned.
•    Constantly keep God in your thoughts.
•    Stay focused on your duties.
•    Maintain your mental equilibrium.

🔴 Making your life an offering is the sign of true intelligence and farsight. Your life cannot truly be considered an offering until you give up your ego.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 आज का सद्चिंतन 4 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 July 2017


सोमवार, 3 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 3

🌹 Take Refuge in Your Conscience

🔵 If you desire peace, capabilities, and energy, then take refuge in your conscience. Even if you deceive the entire world, you will never be able to deceive your conscience. If you consult it on every occasion, you will never lose your ability for moral discretion, and no matter the opposition, you will be able to succeed.

🔴 When you begin to think of yourself as the most virtuous and exemplary individual, your spiritual decay begins and you lose contact with your conscience.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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शनिवार, 1 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 1

🌹 Recognize the Need for Spiritual Contemplation

🔵 Performing social service without a spiritual outlook makes people obsessed with own virtue. They consider themselves great They expect obedience and praise. Because of this, their increased arrogance makes them enemies of many. They become not philanthropists, but destroyers. Without a spiritual outlook, they can never develop humility, nor do they have the ability to change themselves. Such people go on committing endless mistakes and make their own lives unbearable.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 1 July 2017


👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

🔵 बहुत से लोग तो धर्म को केवल पुस्तकों में सुरक्षित रखने की वस्तु और वेद गीता आदि धर्म ग्रन्थों को अलमारियों में बन्द रहने की चीज समझते हैं। “इनका ख्याल है कि धर्म व्यवहार और आचरण में लाने की वस्तु नहीं-असली जीवन में उसका कोई सरोकार (सम्बन्ध) नहीं”। कोई-कोई तो ऐसी अनर्गल (बे सिर पैर की) बातें कहते हुए सुने जाते हैं कि “मैंने सब कुछ किया-चोरी की-जारी की, ठगी की-मक्कारी की, लेकिन धर्म नहीं खोया।” उस भोले भाले मानस से पूछो कि आखिर तुमने ‘धर्म खोना’ किस बात में समझ रखा है? यह तुरन्त उत्तर देगा कि “मैंने किसी के हाथ का छुआ नहीं खाया, दो-दो सौ मील का सफर किया, परन्तु कभी रेल में भोजन नहीं किया, चौके से बाहर पूड़ी, पराँठे की बात दूर, चने भी नहीं चाबे।

🔴 धर्म का वास्तविक रूप वह है जिसके धारण करने से किसी का अस्तित्व बना रहे, जैसे अग्नि का धर्म प्रकाश और गरमी है, अन्यथा राख का ढेर। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म वह है जिससे उसमें मनुष्यत्व बना रहे-इन्सानियत कायम रहे, यदि किसी कार्य से इन्सान में इन्सानियत की जगह वहशीपन आ जावे और उसके कारण वह दूसरों को मारने लगे-उनसे लड़ने लगे, तो यह उसका धर्म नहीं। जिसके द्वारा मनुष्य में-इन्सान में इन्स अर्थात् प्रेम का भाव उत्पन्न हो एक दूसरे की सेवा और सहायता का ख्याल पैदा हो वह ही धर्म है। शास्त्रों में लिखा है “यतोऽभ्युदय निश्रेयस सिद्धिःस धर्म” जिसके द्वारा मनुष्य ऐहिक उन्नति करता हुआ साँसारिक ऐश्वर्य भोगता हुआ आवागमन के चक्र से छूटकर मुक्ति लाभ करे- मोक्षधाम (नजात) प्राप्त करे, वह ही मनुष्य का धर्म है।

🔵 दूसरे शब्दों में धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों सुखों का साधन है। जो भी पुस्तक ऐसे धर्म का प्रतिपादन करे वह ‘धर्म-ग्रन्थ’ कहलाने की अधिकारिणी है चाहे वह वेद हो, बाईबल हो, कुरान, तौरेत हो या जिन्दावस्ता। जो पुस्तक एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का शत्रु बनावे अथवा एक मनुष्य समुदाय को दूसरे मनुष्य समुदाय के नाश के लिए उद्यत करे, वह पुस्तक कदापि ‘धर्म-ग्रन्थ, ईश्वर की ओर से ‘इलहामी’ कहलाने के योग्य नहीं और न ऐसा धर्म ही ईश्वर की और से हो सकता है, ईश्वरीय धर्म तो वह है जो सब की भलाई चाहे-जिससे विश्वभर का हित साधन हो।

🔴 महात्मा गाँधी के कथनानुसार- “जिस धर्म का हमारे दैनिक आचार व्यवहार पर कुछ असर न पड़े वह एक हवाई ख्याल के सिवा और कुछ नहीं है। मैं तो धर्म को ऐसी ही आवश्यक वस्तु समझता हूँ जैसे वायु, जल और अन्न। जैसी चाह आजकल बहुत से नवयुवकों को सिनेमा और अखबारों की है कि बिना अखबार पढ़े, बिना सिनेमा देखे, चैन ही नहीं पड़ता, ऐसी ही भूख धर्म की लगनी चाहिये। प्रतिदिन कोई न कोई परोपकार कार्य, दूसरों की भलाई का काम, अवश्य हो जाना चाहिए और न होने पर सिगरेट की तलब और सिनेमा की चाह की तरह, दिल में एक प्रकार की तड़प उठनी चाहिए कि अफसोस! आज का दिन व्यर्थ गया।”

🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.12

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 1)

🔴 समाज, परिवार के मूलाधार दाम्पत्य-जीवन की गाड़ी स्त्री और पुरुष दो पहियों पर चलती है। दोनों में से प्रत्येक कि स्थिति का प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता है। नारी का जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुष की तरह ही अपना एक विशिष्ट स्थान है। इसके प्रत्येक कार्यकलापों का प्रभाव भी मनुष्य के समस्त जीवन पर पड़ता है। योग्य सुशिक्षित स्त्रियाँ जिस परिवार, जिस समाज में होंगी उसकी उन्नति विकास एवं प्रगति भी निश्चित होगी। इसी तरह स्त्रियों की गिरी हुई अवस्था, पिछड़ापन, अज्ञान, मूर्खता, विकृति भी समाज के पतन और अधोगति का कारण बन जायेंगी। शीलवान, सच्चरित्र योग्य, सुशिक्षित, सती साध्वी नारियाँ पुरुष की प्रेरणा स्रोत बनकर समाज को पुरोगामी बनाती हैं तो फूहड़, मूर्ख, कटु-भाषिणी, कलह कारिणी, कामचोर, आलसी, फिजूल खर्च, फैशनपरस्त नारी पुरुष और समाज से जीवन-पथ का अवरोध बनकर, उसकी दुष्प्रवृत्तियों को भड़काकर, उसे पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

🔵 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहणी है, नियन्त्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है तो नारी पुरुष की प्रगति विकास की प्रेरणास्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम-स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मानव समाज के जीवन में नारी का बहुत बड़ा स्थान है। और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान पतन निर्भर करते हैं। दाम्पत्य जीवन की लौकिक सफलताओं में घर की व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई जायँ, साधन सामग्रियों को बड़ी मात्रा में जुटाया जाय किन्तु यदि उसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती है तो बड़ी-से-बड़ी योजनायें भी असफल हो जाएँगी। इसी तर घर की व्यवस्था पर ही परिवार की समृद्धि और दरिद्रता निर्भर करती है और इस गृहव्यवस्था का उत्तरदायित्व नारी पर ही है। इसीलिए उसे गृहणी कहा गया है। गृहणी की कार्यकुशलता, योग्यता आदि पर ही घर की उन्नति प्रगति, सुख, दुख, हानि, लाभ, आदि निर्भर करते हैं।

🔴 खाने-पीने के समान खुले पड़े हों, बिखरते हों, चूहे, बिल्ली, कुत्ते उन्हें नष्ट करते हों, बर्तन अस्त-व्यस्त पड़े हों, कपड़े-लत्ते इधर उधर बिखरे पड़े हों, बच्चे घर की चीजों के खिलौने बनाकर खेलते हों नौकर या पड़ोसी सामान चुराकर ले जाते हों, ढूँढ़ने पर कोई चीज न मिले और उसे खरीदना पड़े, इन स्थितियों में कोई व्यक्ति कितना ही कमाता हो, कितनी ही सम्पन्नता क्यों न हो किन्तु थोड़े ही दिनों में वहाँ दरिद्रता का साम्राज्य हो जायगा। मनुष्य तो केवल कमा सकता है। उसका कार्यक्षेत्र घर के बाहर है। पुरुष की कमाई का सदुपयोग कर घर की ठीक-ठीक व्यवस्था करना गृहणी के ऊपर ही है। सफल गृहणी समस्त सुख दुःख, अभाव-अभियोग, उतार-चढ़ाव में भी कुशलता से घर की नाव को चलाती रहती है जबकि कि अयोग्य स्त्री सम्पन्नता में भी दरिद्रता का साम्राज्य ला देती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 22)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि और शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, उनमें बुद्धि शक्ति ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता का चमत्कार ही सन्निहित है। इतनी बड़ी शक्ति देकर मनुष्य को परमात्मा ने कुछ उत्तरदायित्वों में भी बाँधा है, ताकि दी हुई शक्ति का दुरुपयोग न हो। उत्तरदायित्वों का नाम है-कर्तव्य धर्म।

🔵 रेलगाड़ी इंजन में विशेष शक्ति होती है, यह अपने मार्ग से भटक पड़े तो अनर्थ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जमीन पर दो पटरी बिछा दी गई हैं और इंजन को उसी पर चलते रहने की व्यवस्था बनाई गई है। बिजली में बहुत शक्ति रहती है। वह शक्ति इधर-उधर न बिखरे पड़े इसलिए उसका नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रबंध किया गया है कि बिजली तार में ही होकर प्रवाहित हो और वह तार भी ऊपर से ढका रहे। हर शक्तिशाली तत्त्व पर नियंत्रण आवश्यक होता है। नियंत्रित न रहने देने पर जो शक्तिशाली वस्तुएँ अनर्थ पैदा कर सकती हैं। मनुष्य को यदि परमात्मा ने नियंत्रित न रखा होता, उस पर धर्म कर्तव्यों का उत्तरदायित्व न रखा होता तो निश्चय ही मानव प्राणी इस सृष्टि का सबसे भयंकर सबसे अनर्थकारी प्राणी सिद्ध हुआ होता।

🔴  अशक्त या स्वल्प शक्ति वाले पदार्थ या जीव नियंत्रित रह सकते हैं क्योंकि उनके द्वारा बहुत थोड़ी हानि की संभावना रहती है। कीड़े-मकोड़े मक्खी-मच्छर कुत्ता-बिल्ली प्रभृति छोटे जीवों पर कोई बंधन नहीं रहते, पर बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जानवरों पर नाक की रस्सी (नाथ) लगाम, नकेल अंकुश आदि के द्वारा नियंत्रण रखा जाता है। यदि ऐसा प्रतिबंध न हो तो वह शक्तिशाली जानवर लाभकारी सिद्ध होने की अपेक्षा हानि ही उत्पन्न करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.34

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/mary

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 121)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ
🔵 ३. गायत्री तपोभूमि मथुरा के भव्य भवन का निर्माण शुभारम्भ अपनी पैतृक सम्पत्ति बेचकर किया। पीछे लोगों की अयाचित सहायता से उसका ‘‘धर्मतंत्र से लोक शिक्षण’’ का उत्तरदायित्व संभालने वाले केंद्रों के रूप में विशालकाय ढाँचा खड़ा हुआ।

🔴 ४. अखण्ड-ज्योति का सन् १९३७ से अनवरत प्रकाशन। बिना विज्ञापन और चंदा माँगे, लागत मूल्य पर निकलने वाली, गाँधी की हरिजन पत्रिका जबकि घाटे के कारण बंद करनी पड़ी थी, तब अखण्ड-ज्योति अनेकों मुसीबतों का सामना करती हुई निकलती रही और अभी एक लाख पचास हजार की संख्या में छपती है, एक अंक को कई पढ़ते हैं इस दृष्टि से पाठक दस लाख से कम नहीं है।

🔵 ५. साहित्य सृजन। आर्षग्रंथों का अनुवाद तथा व्यावहारिक जीवन में अध्यात्म सिद्धांतों का सफल समावेश करने वाली नितांत सस्ती, किंतु अत्यंत उच्चस्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन। इनका अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद। यह लेखन इतना है कि जिसे एक मनुष्य के शरीर भार के समान तोलने पर भी अधिक ही होगा। इसे करोड़ों ने पढ़ा है और नया प्रकाश पाया है।
  
🔴 ६. गायत्री परिवार का गठन-उसके द्वारा लोकमानस के परिष्कार के लिए प्रज्ञा अभियान का और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए युग निर्माण योजना का कार्यान्वयन। दोनों के अंतर्गत लाखों जागृत आत्माओं का एकीकरण। सभी का अपने-अपने ढंग से नव सृजन भाव-भरा योगदान।
  
🔵 ७. युग शिल्पी प्रज्ञा पुत्रों के लिए आत्मनिर्माण-लोक निर्माण की समग्र पाठ्य-विधि का निर्धारण और सत्र योजना के अंतर्गत नियमित शिक्षण, दस-दस दिन के गायत्री साधना सत्रों की ऐसी व्यवस्था जिसमें साधकों के लिए निवास भोजन आदि का भी प्रबन्ध है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari.2

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...